भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 22

भजन 22

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भजन 22

भजन 22.

इस भजन में दाऊद विलाप करता है कि वह संकट की ऐसी दशा में पहुँचा दिया गया है कि वह एक निराश मनुष्य के समान हो गया है। परन्तु उन विपत्तियों का वर्णन करने के पश्चात् जिनसे वह इतनी कठोरता से पीड़ित था, वह परीक्षाओं के अथाह गड्ढे से ऊपर उभर आता है, और साहस बटोरकर छुटकारे के निश्चय से अपने आप को शान्ति देता है। साथ ही वह अपने ही व्यक्तित्व में हमारे सामने मसीह का एक प्रतिरूप रखता है, जिसके विषय में वह भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा जानता था कि पिता के द्वारा ऊँचा किए जाने से पहले उसका अद्भुत और असाधारण रीतियों से दीन किया जाना आवश्यक था। इस प्रकार यह भजन, अपने दोनों भागों में, यशायाह की उस भविष्यद्वाणी की व्याख्या करता है (यशायाह 53:8): "वह बन्दीगृह से और न्याय से उठा लिया गया; और उसकी पीढ़ी का वर्णन कौन करेगा?"

प्रधान बजानेवाले के लिये। भोर की हिरनी पर। दाऊद का भजन। यह शीर्षक अस्पष्ट है; परन्तु व्याख्याकारों ने एक छोटे-से महत्त्व के विषय में न जाने किस उदात्त रहस्य को खोजते हुए व्यर्थ ही अपने आप को उलझन में डाला है। कुछ का मत है कि अय्येलेत (אילת ayeleth) शब्द का अर्थ भोर का तारा है; दूसरे कहते हैं कि यह सामर्थ्य को सूचित करता है; परन्तु इसका अधिक ठीक अनुवाद "हिरनी" है। क्योंकि प्रेरितों की गवाही से यह स्पष्ट है कि यह भजन मसीह के विषय में एक भविष्यद्वाणी है, इसलिए प्राचीन व्याख्याकारों ने सोचा कि मसीह का पर्याप्त आदर और सम्मान तब तक नहीं होगा जब तक वे "हिरनी" शब्द पर कोई रहस्यमय या रूपकात्मक अर्थ न लगाएँ, और उसे उन विविध बातों की ओर संकेत करनेवाला न मानें जो एक बलिदान में सम्मिलित रहती हैं। जो लोग मूल शब्दों, अय्येलेत हश्शहर (השחר אילת ayeleth hashachar), का अनुवाद "दिन का या भोर का उदय" करना पसन्द करते हैं, उन्होंने भी यही करने का प्रयत्न किया है।

"En toutes les sortes qu'il est possible de penser." — फ्रांसीसी. "हर उस रीति से जिसकी कल्पना करना सम्भव है।" — और वे कहते हैं कि यह शीर्षक भजन के आरम्भ में इसलिए रखा गया है कि यह सारा भजन मसीह के विषय में है, जो भोर का तारा है।

परन्तु क्योंकि मैं इन बारीकियों में कोई ठोसपन नहीं पाता, इसलिए शीर्षक का वह अर्थ लेना अधिक अच्छा होगा जो अधिक सरल और स्वाभाविक है। मैं इसे अत्यन्त सम्भव समझता हूँ कि यह किसी प्रचलित गीत का आरम्भ था; और न मैं यह देखता हूँ कि इस शीर्षक का भजन की विषय-वस्तु से कोई सम्बन्ध है। पूरी रचना के भाव से यह प्रकट होता है कि दाऊद यहाँ केवल एक ही सताव की चर्चा नहीं करता, वरन् उन सब सतावों को समेट लेता है जो उसने शाऊल के अधीन सहे। तौभी यह अनिश्चित है कि उसने यह भजन उस समय रचा जब वह शान्तिपूर्वक अपने राज्य का सुख भोग रहा था, या अपने क्लेश के समय में; परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह यहाँ उन विचारों का वर्णन करता है जो उसकी परेशानियों, उलझनों और दुःखों के बीच उसके मन में से होकर गुज़रे।

भजन 22:1-2

1. हे मेरे परमेश्वर! हे मेरे परमेश्वर! तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया? तू मेरी सहायता से, और मेरे गर्जन के शब्दों से क्यों दूर है? 2. हे मेरे परमेश्वर! मैं दिन को पुकारता हूँ, परन्तु तू नहीं सुनता; और रात के समय भी, और मुझे कोई चुप्पी नहीं।

1. हे मेरे परमेश्वर! पहले पद में दो उल्लेखनीय वाक्य हैं, जो यद्यपि देखने में एक-दूसरे के विपरीत हैं, तौभी भक्तों के मन में सदा एक साथ प्रवेश करते रहते हैं। जब भजनकार परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिए जाने और त्याग दिए जाने की बात कहता है, तो यह किसी निराश मनुष्य का विलाप-सा जान पड़ता है; क्योंकि क्या किसी मनुष्य में विश्वास की एक भी चिनगारी शेष रह सकती है, जब वह यह मानता है कि परमेश्वर में अब उसके लिये कोई सहायता नहीं रही? और तौभी, परमेश्वर को दो बार अपना परमेश्वर कहकर, और अपने कराहने को उसकी गोद में उँडेलकर, वह अपने विश्वास का बहुत स्पष्ट अंगीकार करता है। जब कभी परमेश्वर उनसे अपनी कृपा के चिह्न हटा लेता है, तब भक्तों का इस भीतरी संघर्ष में अभ्यस्त किया जाना अनिवार्य है, यहाँ तक कि वे जिस ओर भी अपनी आँखें फेरें, उन्हें रात के अन्धकार के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के लोग, अपने आप से कुश्ती लड़ते हुए, एक ओर तो शरीर की दुर्बलता प्रकट करते हैं, और दूसरी ओर अपने विश्वास का प्रमाण देते हैं। जहाँ तक तिरस्कृतों की बात है, वे अपने हृदयों में परमेश्वर के प्रति अविश्वास को पालते हैं, इसलिए उनके मन की उलझन उन्हें दबा लेती है, और इस प्रकार उन्हें विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह की लालसा करने के लिये सर्वथा अयोग्य बना देती है। कि दाऊद ने परीक्षा के आक्रमणों को उनसे दबे या निगले बिना सह लिया, यह उसके शब्दों से सहज ही समझा जा सकता है। वह दुःख से अत्यन्त दबा हुआ था, परन्तु इसके बावजूद वह निश्चय की इस भाषा में फूट पड़ता है, हे मेरे परमेश्वर! हे मेरे परमेश्वर! जो वह इस विपरीत धारणा का, कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया है, दृढ़ता से विरोध किए बिना नहीं कर सकता था। भक्तों में से एक भी ऐसा नहीं जो प्रतिदिन अपने भीतर इसी बात का अनुभव न करता हो। शरीर के निर्णय के अनुसार वह सोचता है कि वह परमेश्वर के द्वारा त्याग दिया और छोड़ दिया गया है, जबकि साथ ही वह विश्वास के द्वारा परमेश्वर के उस अनुग्रह को थामे रहता है जो इन्द्रियों और बुद्धि की आँख से छिपा है; और इस प्रकार ऐसा होता है कि विश्वासियों की प्रार्थनाओं में विपरीत भावनाएँ मिली-जुली और गुँथी हुई रहती हैं। शारीरिक इन्द्रियाँ और बुद्धि परमेश्वर को, उन वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार जो उनकी दृष्टि के सामने आती हैं, या तो कृपालु या विरोधी समझने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकतीं। इसलिए जब वह हमें दीर्घ काल तक दुःख में पड़े रहने, और मानो उसमें घुलते जाने देता है, तब शरीर की धारणा के अनुसार हमें अनिवार्य रूप से ऐसा लगता है मानो उसने हमें पूरी तरह भुला दिया हो। जब ऐसा उलझानेवाला विचार मनुष्य के मन पर पूरा अधिकार कर लेता है, तब वह उसे गहरे अविश्वास में डुबो देता है, और वह न तो कोई उपाय खोजता है, न अब उसे पाने की आशा रखता है। परन्तु यदि ऐसी परीक्षा के विरुद्ध विश्वास उसकी सहायता को आ जाए, तो वही व्यक्ति, जो बातों के बाहरी रूप से न्याय करते हुए परमेश्वर को अपने विरुद्ध क्रोधित, या अपने को त्याग देनेवाला समझता था, प्रतिज्ञाओं के दर्पण में परमेश्वर के उस अनुग्रह को देखता है जो छिपा हुआ और दूर है। इन दो विपरीत भावनाओं के बीच विश्वासी डाँवाँडोल होते, और मानो लहरों पर डोलते रहते हैं, जब एक ओर शैतान उनकी दृष्टि के सामने परमेश्वर के क्रोध के चिह्न प्रस्तुत करके उन्हें निराशा की ओर धकेलता है, और उनके विश्वास को पूरी तरह उलट देने का प्रयत्न करता है; जबकि दूसरी ओर विश्वास उन्हें प्रतिज्ञाओं की ओर वापस बुलाकर सिखाता है कि वे धीरज से बाट जोहें और परमेश्वर पर भरोसा रखें, जब तक कि वह फिर से उन्हें अपना पितृ-मुख न दिखाए।

जो लोग इसका अनुवाद "सामर्थ्य" करते हैं वे इस शब्द को איל eyl, सामर्थ्य, से निकालते हैं, और ध्यान दिलाते हैं कि पद 20 के सजातीय शब्द, אילותי eyaluthi, का अनुवाद सेप्टुआजिंट में την βοηθειαν μου, मेरी सहायता या सामर्थ्य, किया गया है। "भोर की सामर्थ्य" से वे दिन का उदय समझते हैं। — लाइटफुट इन शब्दों को इसी अर्थ में समझता है।

"Mon Dieu, je crie tout le jour." — फ्रांसीसी. "हे मेरे परमेश्वर, मैं दिन भर पुकारता हूँ।"

तब हम उस स्रोत को देखते हैं जिससे यह पुकार, हे मेरे परमेश्वर! हे मेरे परमेश्वर! निकली, और जिससे वह विलाप भी निकला जो तुरन्त उसके पश्चात् आता है, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया? जब शोक की प्रचण्डता और शरीर की दुर्बलता ने भजनकार के मुँह से ये शब्द बरबस निकलवाए, मैं परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया हूँ, तब विश्वास ने, ऐसा न हो कि इतनी कठोर परीक्षा में वह निराशा में डूब जाए, उसके मुँह में इस भाषा का सुधार रख दिया, यहाँ तक कि उसने साहसपूर्वक उस परमेश्वर को, जिसके विषय में वह सोचता था कि उसने उसे छोड़ दिया है, अपना परमेश्वर कहा। हाँ, हम देखते हैं कि उसने पहला स्थान विश्वास को दिया है। अपने विलाप को शब्द देने से पहले, विश्वास को प्रधान स्थान देने के लिये, वह पहले यह घोषणा करता है कि वह अब भी परमेश्वर को अपना परमेश्वर करके दावा करता था, और शरण के लिये उसी के पास जाता था। और क्योंकि शरीर की भावनाएँ, एक बार फूट निकलने पर, सहज ही नहीं रुकतीं, वरन् हमें बुद्धि की सीमाओं से बाहर ले जाती हैं, इसलिए निश्चय ही यह अच्छा है कि उन्हें बिलकुल आरम्भ में ही दबा दिया जाए। अतः दाऊद ने सबसे उत्तम सम्भव क्रम का पालन किया, कि उसने अपने विश्वास को अग्रता दी—अपने शोक को प्रकट करने से पहले उसे व्यक्त किया, और उस विलाप को, जो वह बाद में अपनी विपत्तियों की महानता के विषय में करता है, भक्तिपूर्ण प्रार्थना के द्वारा संयमित किया। यदि उसने सीधे और ठीक इन्हीं शब्दों में कहा होता, हे प्रभु, तू मुझे क्यों छोड़ता है? तो वह इतने कड़वे विलाप के द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाता हुआ प्रतीत होता; और इसके अतिरिक्त, उसके शोक की महानता के कारण उसके मन के असन्तोष से कड़वा हो जाने का बड़ा संकट होता। परन्तु यहाँ कुड़कुड़ाहट और असन्तोष के विरुद्ध विश्वास का परकोटा खड़ा करके, वह अपने सब विचारों और भावनाओं को संयम में रखता है, ताकि वे उचित सीमाओं को तोड़कर बाहर न निकलें। और यह दोहराव भी व्यर्थ नहीं है जब वह दो बार परमेश्वर को अपना परमेश्वर कहता है; और थोड़ा आगे वह इन्हीं शब्दों को तीसरी बार भी दोहराता है। जब परमेश्वर, मानो हमारी सारी चिन्ता छोड़ चुका हो, हमारे दुःखों और कराहों को ऐसे अनदेखा कर देता है मानो उसने उन्हें देखा ही न हो, तब इस प्रकार की परीक्षा से संघर्ष कठिन और पीड़ादायक होता है, और इसलिए दाऊद अपने विश्वास की पुष्टि खोजने में और भी अधिक बल लगाता है। विश्वास पहली ही भिड़न्त में विजय नहीं पाता, वरन् बहुत-सी चोटें खाने के पश्चात्, और बहुत-से थपेड़ों में अभ्यस्त किए जाने के पश्चात्, वह अन्ततः विजयी होकर निकलता है। मैं यह नहीं कहता कि दाऊद ऐसा साहसी और वीर योद्धा था कि उसका विश्वास डगमगाया ही नहीं। विश्वासी अपनी शारीरिक भावनाओं को वश में करने के लिये अपना सारा प्रयत्न लगा सकते हैं, ताकि वे अपने आप को पूर्ण रूप से परमेश्वर के अधीन करें और उसे समर्पित करें; परन्तु तौभी उनमें कुछ न कुछ दुर्बलता सदा बनी रहती है। इसी से पवित्र याकूब का वह लँगड़ाना उत्पन्न हुआ, जिसका उल्लेख मूसा उत्पत्ति 32:24 में करता है; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर से मल्लयुद्ध करते हुए वह प्रबल हुआ, तौभी उसके बाद वह सदा अपनी पापमय त्रुटि का चिह्न धारण किए रहा। ऐसे उदाहरणों के द्वारा परमेश्वर अपने दासों को धीरज के साथ स्थिर बने रहने के लिये प्रोत्साहित करता है, ऐसा न हो कि अपनी दुर्बलता के बोध से वे निराशा में डूब जाएँ। इसलिए जब कभी हमारा शरीर उपद्रवी हो उठे, और प्रचण्ड आँधी के समान हमें अधीरता की ओर बहा ले जाए, तब हमें जो उपाय अपनाना चाहिए वह यह है कि हम उसके विरुद्ध संघर्ष करें, और उसके वेग को रोकने का प्रयत्न करें। ऐसा करते हुए, यह सच है कि हम डाँवाँडोल किए जाएँगे और कठोरता से परखे जाएँगे, परन्तु तौभी हमारा विश्वास सुरक्षित बना रहेगा, और जहाज़ के टूटने से बचाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, हम उस विलाप के रूप ही से, जो दाऊद यहाँ करता है, यह समझ सकते हैं कि उसने अकारण उन शब्दों को दोहरा कर नहीं कहा जिनसे उसका विश्वास सँभाला जा सकता था। वह केवल इतना ही नहीं कहता कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया, वरन् यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर उसकी सहायता से दूर था, क्योंकि जब उसने उसे सबसे बड़े संकट में देखा, तब भी उसने उसे छुटकारा पाने की आशा में प्रोत्साहित करने के लिये कोई चिह्न नहीं दिया। क्योंकि परमेश्वर में हमारी सहायता करने का सामर्थ्य है, इसलिए यदि वह हमें अपने शत्रुओं के आगे शिकार के समान पड़ा हुआ देखकर भी, मानो हमारी कुछ परवाह न करता हो, चुपचाप बैठा रहे, तो कौन यह न कहेगा कि उसने अपना हाथ इसलिए खींच लिया है कि वह हमें न छुड़ाए? फिर, मेरे गर्जन के शब्द इस अभिव्यक्ति के द्वारा भजनकार संकेत करता है कि वह चरम सीमा तक व्याकुल और पीड़ित था। निश्चय ही वह इतना कम साहसवाला मनुष्य नहीं था कि किसी हल्के या साधारण क्लेश के कारण वह इस प्रकार किसी पशु के समान चिल्लाए। इसलिए हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि वह संकट बहुत बड़ा था जो ऐसे मनुष्य से ऐसा गर्जन बरबस निकलवा सका, जो नम्रता के लिये, और उस निडर साहस के लिये प्रसिद्ध था जिससे वह विपत्तियों को सहता था।

जब हमारा उद्धारकर्ता यीशु मसीह क्रूस पर लटका हुआ था, और अपने प्राण को परमेश्वर अपने पिता के हाथों में सौंपने को तैयार था, तब उसने ठीक इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया (मत्ती 27:46); अतः हमें विचार करना चाहिए कि ये दो बातें आपस में कैसे मेल खा सकती हैं, कि मसीह परमेश्वर का एकलौता पुत्र था, और फिर भी वह शोक से ऐसा बिंधा हुआ, और ऐसी बड़ी मानसिक व्याकुलता से ऐसा जकड़ा हुआ था कि वह पुकार उठा कि परमेश्वर उसके पिता ने उसे छोड़ दिया है। इन दोनों कथनों के बीच के प्रत्यक्ष विरोध ने बहुत-से व्याख्याकारों को, इस विषय में मसीह पर दोष लगाने के भय से, बचाव के मार्ग अपनाने के लिये विवश किया है। तदनुसार उन्होंने कहा है कि मसीह ने यह विलाप अपने पिता के द्वारा त्यागे जाने की किसी भावना के कारण नहीं, वरन् उन साधारण लोगों की धारणा के अनुसार किया, जो उसके दुःखों को देख रहे थे। परन्तु उन्होंने यह विचार नहीं किया कि यह कल्पना करके कि मसीह उन आतंकों से सर्वथा मुक्त रखा गया जो परमेश्वर का न्याय पापियों के मन में उत्पन्न करता है, वे हमारे छुटकारे के लाभ को बहुत घटा देते हैं। मसीह को इतने बड़े शोक के अधीन ठहराने से इस भय से डरना कि कहीं वे उसकी महिमा न घटा दें, एक निराधार भय था। क्योंकि पतरस प्रेरितों के काम 2:24 में स्पष्ट गवाही देता है कि "यह अनहोना था कि वह मृत्यु की पीड़ाओं के वश में रहता," इसलिए इससे यह निकलता है कि वह उनसे सर्वथा मुक्त नहीं रखा गया था। और क्योंकि वह हमारा प्रतिनिधि बना, और उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया, इसलिए निश्चय ही यह आवश्यक था कि वह परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने एक पापी के रूप में खड़ा हो। इसी से वह आतंक और भय उत्पन्न हुआ जिसने उसे मृत्यु से छुटकारे के लिये प्रार्थना करने को विवश किया; इसलिए नहीं कि केवल इस जीवन से विदा होना ही उसके लिये इतना कष्टदायक था; वरन् इसलिए कि उसकी आँखों के सामने परमेश्वर का वह शाप था, जिसके अधीन वे सब हैं जो पापी हैं। अब यदि अपने पहले संघर्ष के समय "उसका पसीना मानो लहू की बड़ी-बड़ी बूँदों के समान" था, और उसे शान्ति देने के लिये एक स्वर्गदूत की आवश्यकता पड़ी (लूका 22:43), तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि क्रूस पर अपने अन्तिम दुःखों में उसने ऐसा विलाप किया जो गहनतम शोक को प्रकट करता था। प्रसंगवश यह ध्यान देना चाहिए कि मसीह, यद्यपि मानवीय भावनाओं और स्नेहों के अधीन था, तौभी शरीर की दुर्बलता के कारण कभी पाप में नहीं गिरा; क्योंकि उसके स्वभाव की सिद्धता ने उसे हर अति से बचाए रखा। इसलिए वह उन सब परीक्षाओं पर, जिनसे शैतान ने उस पर आक्रमण किया, संघर्ष में कोई ऐसा घाव खाए बिना जय पा सका जो बाद में उसे लँगड़ाने को विवश करता। संक्षेप में, इसमें कोई सन्देह नहीं कि मसीह ने क्रूस पर यह पुकार उठाकर स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि यद्यपि दाऊद यहाँ अपने ही संकटों पर विलाप करता है, तौभी यह भजन भविष्यद्वाणी के आत्मा की प्रेरणा से दाऊद के राजा और प्रभु के विषय में रचा गया था।

"Ce qu il ne pouvoit faire si non en resistant vivement a la apprehension contraire." — फ्रांसीसी. — "Et de faict, il n'estoit point de si petit courage, que pour quelque real leger il hurlast ainsi comme une beste brute." — फ्रांसीसी. "मूल शब्द [गर्जन के लिये] उचित रूप से सिंह के गर्जन को सूचित करता है, और बहुधा रोग में पड़े मनुष्यों के गहरे कराहने के लिये प्रयुक्त होता है। अन्य स्थलों के साथ देखें, भजन 32:3; 38:9।" — बिशप मैंट। — "Pour crainte de charger Christ de ce blasme." — फ्रांसीसी.

2. हे मेरे परमेश्वर! मैं दिन को पुकारता हूँ। इस पद में भजनकार अपने क्लेश की दीर्घ अवधि को व्यक्त करता है, जिसने उसकी व्याकुलता और थकान को बढ़ा दिया था। यह उससे भी अधिक कष्टदायक परीक्षा थी कि उसका पुकारना केवल व्यर्थ परिश्रम-सा प्रतीत होता था; क्योंकि हमारी विपत्तियों में राहत का हमारा एकमात्र साधन परमेश्वर को पुकारना ही है, तो यदि हमें अपनी प्रार्थनाओं से कोई लाभ न मिले, तो हमारे लिये और कौन-सा उपाय शेष रह जाता है? इसलिए दाऊद विलाप करता है कि परमेश्वर मानो उसकी प्रार्थनाओं के प्रति बहरा है। जब वह दूसरे वाक्यांश में कहता है, और मुझे कोई चुप्पी नहीं, तो इसका अर्थ यह है कि उसे कोई शान्ति या सान्त्वना नहीं मिली, ऐसा कुछ भी नहीं जो उसके व्याकुल मन को चैन दे सके। जब तक क्लेश उस पर दबाव डालता रहा, उसका मन ऐसा अशान्त रहा कि वह पुकार उठने को विवश हुआ। यहाँ विश्वास की स्थिरता दिखाई गई है, कि विपत्तियों की लम्बी अवधि न तो उसे उलट सकी, न उसके अभ्यास में बाधा डाल सकी। इसलिए प्रार्थना करने का सच्चा नियम यह है कि जो व्यर्थ ही हवा को पीटता हुआ, या दीर्घ काल तक प्रार्थना करने में अपना परिश्रम खोता हुआ प्रतीत होता है, वह इस कारण उस कर्तव्य को छोड़ न दे, या उससे रुक न जाए। इस बीच, यह लाभ है जो परमेश्वर अपनी पितृ-कृपा से अपने लोगों को देता है, कि यदि वे कभी अपनी इच्छाओं और आशाओं में निराश हुए हों, तो वे अपनी उलझनें और संकट परमेश्वर पर प्रकट कर सकते हैं, और मानो उन्हें उसकी गोद में उतारकर अपना बोझ हल्का कर सकते हैं।

भजन 22:3-8

3. तौभी तू पवित्र है, जो इस्राएल की स्तुतियों में वास करता है। 4. हमारे पुरखा तुझी पर भरोसा रखते थे; वे भरोसा रखते थे, और तू ने उन्हें छुड़ाया। 5. उन्होंने तेरी दोहाई दी, और छुड़ाए गए; उन्होंने तुझ पर भरोसा रखा, और लज्जित न हुए। 6. परन्तु मैं तो कीड़ा हूँ, मनुष्य नहीं; मनुष्यों में मेरी नामधराई और लोगों में मेरा अपमान होता है। 7. वे सब जो मुझे देखते हैं मेरा ठट्ठा करते हैं; वे होंठ बिचकाते और सिर हिलाते हैं। 8. वे कहते हैं, "उसने अपना मामला यहोवा को सौंप दिया है [या, अपना मामला यहोवा पर डाल दिया है]: वह उसको छुड़ाए, वह उसको छुड़ाए, क्योंकि वह उससे प्रसन्न है।"

3. तौभी तू पवित्र है। इब्रानी में यह ठीक-ठीक इस प्रकार है, और तू पवित्र है: परन्तु संयोजक ו vau का अनुवाद, निस्सन्देह, विरोधसूचक अव्यय तौभी से किया जाना चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि यहाँ परमेश्वर की शाश्वत और अपरिवर्तनीय दशा को उन क्लेशों के विरोध में रखा गया है जिनका दाऊद ने अनुभव किया; परन्तु मैं इस मत से सहमत नहीं हो सकता। इस भाषा को इस अर्थ में देखना अधिक सरल और स्वाभाविक है कि परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों पर सदा अपने आप को अनुग्रहकारी दिखाया है। यहाँ जिस विषय पर विचार किया जा रहा है वह यह नहीं कि परमेश्वर स्वर्ग में क्या है, वरन् यह कि उसने मनुष्यों के प्रति अपने आप को कैसा दिखाया है। यह पूछा जा सकता है कि क्या दाऊद इन शब्दों में यह संकेत करके अपने विलाप को और तीव्र करता है कि वही एकमात्र व्यक्ति है जो परमेश्वर से कुछ नहीं पाता? या क्या वह इन शब्दों को ढाल के समान अपने सामने थामकर, अपनी दृष्टि के सामने यह सत्य रखते हुए कि परमेश्वर अपने लोगों का निरन्तर छुड़ानेवाला है, उस परीक्षा को पीछे हटाता है जिससे उस पर आक्रमण हुआ था? मैं मानता हूँ कि यह पद दाऊद के शोक की महानता की एक और अभिव्यक्ति है; परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि इस भाषा का प्रयोग करते हुए वह इससे अपने अविश्वास के विरुद्ध एक उपाय खोजता है। अपने आप को परमेश्वर के द्वारा छोड़ा हुआ देखना एक संकटपूर्ण परीक्षा थी; और इसलिए, ऐसा न हो कि उस पर निरन्तर सोचते रहने से वह उसे पोषित करे, उसने अपने मन को परमेश्वर के अनुग्रह के उन निरन्तर प्रमाणों के मनन की ओर मोड़ा, जिनसे वह सहायता पाने की आशा में अपने आप को प्रोत्साहित कर सके। इसलिए उसका अभिप्राय केवल यही पूछना नहीं था कि ऐसा कैसे हुआ कि परमेश्वर, जिसने अपने लोगों के साथ सदा दया का व्यवहार किया था, अब मानो अपने ही स्वभाव को भूलकर, एक दीन-दुःखी मनुष्य को इस प्रकार बिना किसी सहायता या सान्त्वना के छोड़ दे; वरन् वह एक ढाल भी उठाता है जिससे वह शैतान के जलते हुए तीरों से अपनी रक्षा करे। वह परमेश्वर को पवित्र कहता है, क्योंकि वह सदा अपने ही समान बना रहता है। वह कहता है कि वह इस्राएल की स्तुतियों में वास करता है; क्योंकि चुने हुए लोगों के प्रति ऐसी उदारता दिखाकर कि वह उन पर निरन्तर आशीषें बरसाता रहा, उसने उन्हें निरन्तर स्तुति और धन्यवाद के लिये विषय प्रदान किया। जब तक परमेश्वर हमारा भला करके हमें अपनी भलाई का स्वाद न चखाए, तब तक उसकी स्तुति के गुणगान के विषय में हमारा मौन हो जाना अनिवार्य है। क्योंकि दाऊद इन्हीं चुने हुए लोगों की गिनती में था, इसलिए वह उन सब बाधाओं के विरोध में, जिन्हें अविश्वास मार्ग में खड़ी हुई सुझा सकता था, यह आशा थामे रहने का प्रयत्न करता है कि वह अन्ततः इस समुदाय से जुड़ जाएगा, ताकि उनके साथ मिलकर परमेश्वर की स्तुति गाए।

इब्रानी में यह है, "उसने [अपने आप को] परमेश्वर पर लुढ़का दिया।" लातीनी संस्करण में हमारा लेखक पढ़ता है, "Devolvit ad Jehovam;" और फ्रांसीसी में, "Il a remis disent-ils, au Seigneur son a l'aime."

"वह उसको छुड़ाए, वह उसको छुड़ाए। यह दोहराव स्ट्रीट के द्वारा अपनाया गया अनुवाद भी है, और पूल ने इसका समर्थन किया है। पूल कहता है, "एक ही बात दो बार दोहराई गई है, ताकि उनकी घृणा की प्रचण्डता और उसके विरुद्ध सफलता के उनके भरोसे, दोनों को दिखाया जाए।"

केवल "वास करना" ही नहीं, वरन् "बने रहना" या "स्थिर रहना" भी सूचित करता है (देखें भजन 102:13), हैमण्ड सोचता है कि यहाँ यही अन्तिम अर्थ है, और इस शब्द का अनुवाद यों करता है, "परन्तु तू पवित्र बना रहता या स्थिर रहता है, हे तू, इस्राएल की स्तुतियाँ, या जो इस्राएल की स्तुतियाँ है, अर्थात् उनकी सारी स्तुतियों का विषय; या अधिक सरलता से, परन्तु तू पवित्र बना रहता है, इस्राएल की स्तुतियाँ।" — बिशप हॉर्सली इन शब्दों (पद 7) को यों पढ़ता है, "वे सब जो मुझे देखते हैं उपहास की भंगिमाओं से [मेरा] अपमान करते हैं:" और कहता है, "मैं क्रिया לעג का अनुवाद इस परिधि-कथन के सिवाय और किसी प्रकार नहीं कर सकता।" बिशप मैंट पूरे पद का अनुवाद इस प्रकार करता है, "वे सब जो मुझे वध के लिये ले जाया जाता देखते हैं, मेरी संकटमय दशा की हँसी उड़ाते हैं; वे होंठ बिचकाते, वे सिर हिलाते हैं, वे ताने भरा ठट्ठा करते हैं:"

4. हमारे पुरखा तुझी पर भरोसा रखते थे। यहाँ भजनकार यह कारण बताता है कि क्यों परमेश्वर इस्राएल के गोत्रों की स्तुतियों के बीच विराजमान है। कारण यह है कि अपने विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा के लिये उसका हाथ सदा बढ़ा रहा था। दाऊद, जैसा मैंने अभी कहा, सब बीते युगों के उदाहरणों को एकत्र करता है, ताकि उनके द्वारा वह अपने आप को प्रोत्साहित करे, दृढ़ करे और प्रभावशाली रीति से यह निश्चय दिलाए कि जैसे परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों में से किसी को कभी नहीं त्यागा, वैसे ही वह भी उन लोगों की गिनती में होगा जिनके लिये छुटकारा परमेश्वर के हाथ में सुरक्षित रखा हुआ है। इसलिए वह स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि वह उन लोगों की सन्तान में से है जिनकी सुनी गई थी, और इसके द्वारा संकेत करता है कि वह उसी अनुग्रह का उत्तराधिकारी है जिसका उन्होंने अनुभव किया था। उसकी दृष्टि उस वाचा पर है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को अपनी निज प्रजा होने के लिये लेपालक बनाया था। उन विविध उदाहरणों को जानना, जिनमें परमेश्वर ने अपने लोगों के प्रति अपनी दया का प्रयोग किया है, थोड़े ही महत्त्व का होगा, जब तक हम में से प्रत्येक अपने आप को उनकी गिनती में न गिन सके, जैसे दाऊद अपने आप को परमेश्वर की कलीसिया में सम्मिलित करता है। तीन बार यह दोहराने में कि पुरखाओं ने भरोसा रखने के द्वारा छुटकारा पाया, इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह पूरी नम्रता के साथ चुपचाप यह संकेत करना चाहता है कि उसकी भी वही आशा थी जिससे वे प्रेरित थे, ऐसी आशा जो अपने परिणाम के रूप में हमारे पक्ष में प्रतिज्ञाओं की पूर्ति को अपने पीछे खींच लाती है। इसलिए कि कोई मनुष्य उन आशीषों से प्रोत्साहन पाए जो परमेश्वर ने पूर्व समयों में अपने दासों को प्रदान की हैं, उसे अपना ध्यान परमेश्वर के वचन की सेंत-मेंत प्रतिज्ञाओं की ओर, और उस विश्वास की ओर लगाना चाहिए जो उन पर टिका रहता है। संक्षेप में, यह दिखाने के लिये कि यह भरोसा न तो ठण्डा था न मरा हुआ, दाऊद साथ ही हमें बताता है कि उन्होंने परमेश्वर की दोहाई दी। जो यह दिखावा करता है कि वह परमेश्वर पर भरोसा रखता है, और फिर भी अपनी विपत्तियों में ऐसा सुस्त और उदासीन रहता है कि उसकी सहायता की याचना नहीं करता, वह लज्जाजनक रीति से झूठ बोलता है। अतः प्रार्थना के द्वारा सच्चा विश्वास पहचाना जाता है, जैसे पेड़ की भलाई उसके फल से पहचानी जाती है। यह भी ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर केवल उन्हीं प्रार्थनाओं को ठीक मानता है जो विश्वास से निकलती हैं और विश्वास के साथ होती हैं। इसलिए यह अकारण नहीं कि दाऊद ने दोहाई दी शब्द को चौथे पद के इन शब्दों, वे तुझी पर भरोसा रखते थे, वे भरोसा रखते थे, और पाँचवें पद के इन शब्दों, उन्होंने तुझ पर भरोसा रखा, के बीच में रखा है।

6. परन्तु मैं तो कीड़ा हूँ, मनुष्य नहीं। दाऊद परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे नहीं कुड़कुड़ाता मानो परमेश्वर ने उसके साथ कठोर व्यवहार किया हो; वरन् अपनी दशा पर विलाप करते हुए, परमेश्वर को अपने ऊपर दया दिखाने के लिये और भी प्रभावशाली रीति से प्रेरित करने हेतु, वह कहता है कि उसे मनुष्य तक नहीं गिना जाता। यह सच है कि पहली दृष्टि में यह मन को हतोत्साहित करने, वरन् विश्वास को नष्ट करने की प्रवृत्ति रखता प्रतीत होता है; परन्तु आगे के भाग से यह और भी स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसा होना तो दूर, दाऊद यह घोषणा करता है कि उसकी दशा कितनी दयनीय है, ताकि इसी के द्वारा वह राहत पाने की आशा में अपने आप को प्रोत्साहित करे। इसलिए वह यह तर्क देता है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर अन्ततः उसे बचाने के लिये अपना हाथ न बढ़ाए; उसे बचाने के लिये, मैं कहता हूँ, जो इतनी कठोरता से पीड़ित था, और निराशा की कगार पर खड़ा था। यदि परमेश्वर ने उन सब पर दया की है जो कभी भी पीड़ित हुए, यद्यपि वे केवल साधारण मात्रा में पीड़ित थे, तो वह अपने दास को कैसे छोड़ सकता था जब वह सब विपत्तियों के सबसे निचले गड्ढे में डूबा हुआ था? इसलिए जब कभी हम क्लेशों के बड़े भार के नीचे दब जाएँ, तब अपने आप को निराशा में गिरने देने के बदले, हमें इसी से छुटकारे की आशा रखने के लिये प्रोत्साहन का तर्क लेना चाहिए। यदि परमेश्वर ने अपने सबसे विशिष्ट दास दाऊद को इतनी कठोरता से अभ्यस्त किया, और उसे इतना दीन किया कि मनुष्यों में सबसे तुच्छ लोगों के बीच भी उसका कोई स्थान न रहा, तो यदि उसके उदाहरण के अनुसार हम नीचे गिराए जाएँ, तो हम इसे बुरा न मानें। तौभी हमें मुख्य रूप से परमेश्वर के पुत्र को स्मरण करना चाहिए, जिसके व्यक्तित्व में, हम जानते हैं, यह भी पूरा हुआ, जैसा यशायाह ने पहले से कहा था, "वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुःखी पुरुष था, और दुःख से उसकी जान-पहचान थी; और हम ने मानो उससे अपने मुख छिपा लिए; वह तुच्छ जाना गया, और हम ने उसका मूल्य न जाना।" (यशायाह 53:3)

भविष्यद्वक्ता के इन शब्दों के द्वारा हमें उन लोगों की तुच्छ बारीकी का पर्याप्त खण्डन मिल जाता है, जिन्होंने कीड़ा शब्द पर ऐसे दार्शनिक तर्क गढ़े हैं मानो दाऊद यहाँ मसीह की उत्पत्ति में किसी अनोखे रहस्य की ओर संकेत करता हो; जबकि उसका अर्थ केवल यह है कि वह सब मनुष्यों से नीचे गिरा दिया गया था, और मानो जीवितों की गिनती से काट डाला गया था। यह तथ्य कि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को ऐसे अपमान तक पहुँचाए जाने दिया, हाँ, अधोलोक तक भी उतर गया, उसकी स्वर्गीय महिमा को किसी भी प्रकार धुँधला करना तो दूर, वरन् एक उज्ज्वल दर्पण है जिसमें हमारे प्रति उसका अनुपम अनुग्रह प्रतिबिम्बित होता है।

7. वे सब जो मुझे देखते हैं मेरा ठट्ठा करते हैं, इत्यादि। यह पिछले वाक्य की व्याख्या है। उसने कहा था कि वह मनुष्यों में सबसे नीच लोगों के लिये, और मानो प्रजा के कूड़े-करकट के लिये भी, उपहास का पात्र था। अब वह हमें उस अपमान के विषय में बताता है जो उसके साथ किया गया था,—कि निन्दापूर्ण भाषा से सन्तुष्ट न होकर, उन्होंने अपनी भंगिमाओं से भी अपनी ढिठाई दिखाई, होंठ बिचकाकर भी और सिर हिलाकर भी। क्योंकि जिन शब्दों का अनुवाद हम वे होंठ बिचकाते हैं करते हैं, वे इब्रानी में हैं, वे होंठ से खोलते हैं, इसलिए कुछ लोग उनका अर्थ "निन्दा करना" बताते हैं। परन्तु यह मत मुझे उपयुक्त नहीं जान पड़ता; क्योंकि अक्षर ב beth, जिसका अर्थ "से" है, यहाँ अनावश्यक है, जैसा इब्रानी में बहुधा होता है। इसलिए मैंने मूल शब्दों का अनुवाद वे होंठ बिचकाते हैं करना उचित समझा है; जो उन लोगों की भंगिमा है जो खुले रूप से और अपमानजनक रीति से ठट्ठा करते हैं। जो निन्दापूर्ण भाषा इसके पश्चात् आती है, वह और भी अधिक कष्टदायक थी, जब उन्होंने उस पर यह आरोप लगाया कि परमेश्वर, जिसे वह खुले रूप से अपना पिता मानता था, उससे विमुख हो गया है। हम जानते हैं कि दाऊद, जब वह अपने आप को संसार के द्वारा अन्यायपूर्वक दोषी ठहराया हुआ देखता था, तब इस निश्चय से अपने आप को सँभालने और सान्त्वना देने का अभ्यस्त था कि क्योंकि उसके पास शुद्ध विवेक की अनुमोदन करनेवाली गवाही है, इसलिए स्वर्ग में परमेश्वर उसका रक्षक है, जो उसकी निन्दा करनेवालों से पलटा लेने में समर्थ है।

परन्तु अब वे सब जो उसे देखते थे उसकी निन्दा करते थे कि उसने व्यर्थ अहंकार के साथ, बिना किसी आधार के, उस सहायता की डींग मारी थी जो उसे परमेश्वर से मिलनेवाली थी। वे कहते हैं, कहाँ है वह परमेश्वर जिस पर वह टिका रहता था? कहाँ है वह प्रेम जिस पर उसने भरोसा रखा? शैतान के पास मनुष्यों के प्राणों को घायल करने के लिये इससे अधिक घातक तीर कोई नहीं, जब वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को उपहास में बदलकर हमारे मनों से आशा को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करता है। तौभी दाऊद के शत्रु केवल इतना ही नहीं कहते कि उसकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ थीं, और परमेश्वर का वह प्रेम, जिसकी वह डींग मारता था, धोखा था; वरन् वे परोक्ष रूप से उस पर कपटी होने का दोष लगाते हैं, कि उसने झूठा दिखावा किया कि वह परमेश्वर की सन्तानों में से एक है, जिससे वह पूर्ण रूप से पराया था।

यह परीक्षा दाऊद के लिए कितनी कठोर रही होगी, इसका अनुमान हर मनुष्य अपने अनुभव से लगा सकता है। परन्तु जिस उपाय का उसने सहारा लिया, उसके द्वारा उसने अपने भरोसे की सच्चाई का प्रमाण दिया: क्योंकि यदि परमेश्वर उसके हृदय की सच्चाई का निःसन्देह साक्षी और अनुमोदक न होता, तो वह यह शिकायत लेकर उसके सम्मुख आने का साहस कभी न करता। इसलिए जब कभी मनुष्य हम पर कपट का दोष लगाएँ, तो हमारा यह प्रयत्न हो कि हमारे हृदयों की भीतरी सच्चाई परमेश्वर के सम्मुख हमारी ओर से उत्तर दे। और जब कभी शैतान चुभती हुई निन्दा और निर्दय ठट्ठे के द्वारा हमारे मनों से विश्वास को उखाड़ने का प्रयत्न करे, तो यही हमारा पवित्र लंगर हो — कि हम परमेश्वर को इसका साक्षी होने के लिए पुकारें, और यह कि वह इसे देखकर हमारे न्याय की रक्षा करने में अपनी धार्मिकता प्रकट करने की कृपा करे; क्योंकि उसके पवित्र नाम पर इससे बढ़कर घृणित निन्दा का कलंक नहीं लगाया जा सकता कि यह कहा जाए कि जो उस पर भरोसा रखते हैं वे व्यर्थ भरोसे से फूले हुए हैं, और जो अपने मन में यह निश्चय करते हैं कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है वे एक निराधार कल्पना से अपने आप को धोखा देते हैं। जब परमेश्वर के पुत्र पर इसी हथियार से आक्रमण किया गया, तो यह निश्चित है कि शैतान सच्चे विश्वासियों पर, जो उसके अंग हैं, उससे अधिक दया नहीं करेगा। इसलिए उन्हें इस विचार से अपनी रक्षा करनी चाहिए — कि यद्यपि मनुष्य उन्हें निराशाजनक दशा में समझें, तौभी यदि वे अपने आप को और अपने सब कामों को परमेश्वर के हाथ सौंप दें, तो उनकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ न होंगी। גל गोल क्रिया के द्वारा, जिसका अनुवाद सौंपना किया गया है, विश्वास का स्वभाव और उसका प्रभाव बहुत अच्छी रीति से व्यक्त किया गया है, जो परमेश्वर के विधान पर टिककर हमारे मनों को उन चिन्ताओं और क्लेशों के बोझ से मुक्त करता है जिनसे वे व्याकुल रहते हैं।

और टिप्पणी करता है, "भविष्यद्वाणी के इस चित्र की स्पष्टता और उसके रंग कल्पना को उतने ही प्रभावशाली लगते हैं, जितना यह विषय हृदय को पीड़ादायक है।"

"पूर्व में निचले होंठ को बाहर निकालना तिरस्कार का अत्यन्त प्रबल संकेत माना जाता है। इसका प्रयोग मुख्यतः निम्न वर्ग के लोगों तक सीमित है।" — बाइबल पर सचित्र टीका (Illustrated Commentary upon the Bible)।

,בשפהबेसाफ़ाह, होंठ से।

"Qu'il avoit Dieu au ciel pour garent qui s'avoir bien faire la vengence de ses mesdisans." — फ्रांसीसी। कि स्वर्ग में परमेश्वर उसका जामिन था, जो उसकी निन्दा करनेवालों से भली भाँति पलटा लेना जानता था।

भजन 22:9-11

9. निश्चय तू ही ने मुझे गर्भ से निकाला, और जब मैं अपनी माता की छातियों पर था, तब ही से तू ने मुझे भरोसा रखना सिखाया। 10. मैं गर्भ ही से तुझ पर छोड़ दिया गया; मेरी माता के पेट ही से तू मेरा परमेश्वर है। 11. मुझ से दूर न हो, क्योंकि संकट निकट है, और कोई सहायक नहीं।

9. निश्चय तू। दाऊद यहाँ फिर एक नया गढ़ खड़ा करता है, ताकि शैतान की युक्तियों का सामना करे और उन्हें पीछे हटाए। वह संक्षेप में उन उपकारों को गिनाता है जो परमेश्वर ने उस पर किए थे, और जिनके द्वारा उसने बहुत पहले ही यह सीख लिया था कि वह उसका पिता है। हाँ, वह यह घोषित करता है कि उसके जन्म से पहले ही परमेश्वर ने उसके प्रति अपने पितृ-प्रेम का ऐसा प्रमाण दिया था कि यद्यपि वह अब मृत्यु के अन्धकार में डूबा हुआ था, तौभी वह उचित आधार पर उससे जीवन की आशा रखने का साहस कर सकता था। और पवित्र आत्मा ही विश्वासयोग्य लोगों को यह बुद्धि सिखाता है कि जब वे भय और संकट की दशा में पड़ें, तब वे परमेश्वर की भलाई के प्रमाणों को एकत्र करें, ताकि उनके द्वारा अपने विश्वास को सम्भालें और दृढ़ करें। हमें इसे एक स्थापित सिद्धान्त मानना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर अपनी उदारता के प्रयोग में कभी थकता नहीं, और अत्यन्त भरपूर दान भी उसके धन को समाप्त नहीं कर सकता, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि जैसे हमने अपनी आरम्भिक शैशवावस्था से उसे पिता के रूप में अनुभव किया है, वैसे ही वह अत्यन्त बुढ़ापे तक भी हमारे प्रति अपने आप को वैसा ही प्रकट करेगा। जब वह यह स्वीकार करता है कि वह परमेश्वर के हाथ से गर्भ से निकाला गया, और परमेश्वर ने उसे उसकी माता की छातियों पर भरोसा रखना सिखाया, तो इसका अर्थ यह है कि यद्यपि शिशु प्राकृतिक कारणों की क्रिया से संसार में आते हैं और अपनी माता के दूध से पोषित होते हैं, तौभी उसमें परमेश्वर का अद्भुत विधान उज्ज्वल रूप से चमकता है। यह सच है कि इस आश्चर्यकर्म को, उसके सामान्य रूप से घटने के कारण, हम कम महत्व देते हैं। परन्तु यदि कृतघ्नता हमारी आँखों पर मूढ़ता का परदा न डाल देती, तो संसार में होनेवाले प्रत्येक जन्म पर हम विस्मय से मुग्ध हो जाते। जन्म का समय आने से पहले बालक को, जैसा कि सौ बार सम्भव है, अपनी ही सड़ाहट में नष्ट होने से कौन रोकता है, सिवाय इसके कि परमेश्वर अपनी गुप्त और अगम्य सामर्थ से उसे उसकी कब्र में जीवित रखता है? और संसार में आने के बाद, जब वह इतने अधिक दुःखों के अधीन है और अपनी सहायता के लिए एक उँगली भी नहीं हिला सकता, तो वह एक दिन भी कैसे जीवित रह सकता, यदि परमेश्वर उसे पोषण देने और उसकी रक्षा करने के लिए अपनी पितृ-गोद में न उठा लेता? इसलिए यह उचित ही कहा गया है कि शिशु उस पर छोड़ दिया जाता है; क्योंकि यदि वह कोमल नन्हे बच्चों का पालन न करता, और धाय के सब कार्यों की देख-रेख न करता, तो जन्म लेने के ठीक उसी समय वे सौ प्रकार की मृत्युओं के सम्मुख होते, जिनसे वे क्षण भर में दम घुटकर मर जाते। अन्त में, दाऊद यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर उसका परमेश्वर था। यह सच है कि देखने में परमेश्वर वैसी ही भलाई, जिसकी यहाँ प्रशंसा की गई है, पशुओं पर भी प्रकट करता है; परन्तु वह केवल मनुष्यजाति ही पर अपने आप को विशेष रीति से पिता प्रकट करता है। और यद्यपि वह शिशुओं को तुरन्त अपने ज्ञान से सम्पन्न नहीं करता, तौभी कहा गया है कि वह उन्हें भरोसा देता है, क्योंकि वास्तव में यह दिखाकर कि वह उनके जीवन की चिन्ता करता है, वह एक प्रकार से उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है; जैसा कि एक और स्थान में कहा गया है, "वह पशुओं को और कौवे के बच्चों को जो पुकारते हैं, आहार देता है," (भजन 147:9।)

"Qui m'as donne asseurance, lorsque je suchoye les mammelles de ma mere." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, जब मैं अपनी माता की छातियाँ चूसता था, तब तू ने मुझे भरोसा दिया।" "Abandonne entre tes mains." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, तेरे हाथों में छोड़ दिया गया।" पूल (Poole) इसे मसीह पर लागू करते हुए कहता है, "मैं उस मनुष्य के समान था जिसे उसके माता-पिता ने त्याग दिया हो, और जो पूर्ण रूप से तेरे विधान पर छोड़ दिया गया हो। पृथ्वी पर मेरा कोई पिता न था; और मेरी माता दरिद्र और असहाय थी।"

जब परमेश्वर इस प्रकार अपने अनुग्रह से छोटे शिशुओं को, उनके बुद्धि का उपयोग करने योग्य होने से पहले ही, पहले से सम्भाल लेता है, तो यह निश्चित है कि जब उसके दास उससे विनती करते और उसे पुकारते हैं, तब वह उनकी आशा को कभी निष्फल न करेगा। यही वह तर्क है जिसके द्वारा दाऊद ने परीक्षा से संघर्ष किया और उस पर जय पाने का प्रयत्न किया।

11. मुझ से दूर न हो। यहाँ वह परमेश्वर को अपने ऊपर दया दिखाने के लिए प्रेरित करने हेतु एक और तर्क काम में लाता है, यह कहते हुए कि वह बड़े से बड़े संकट से बुरी रीति से दबा और घिरा हुआ है। निःसन्देह उसने अपनी आँखों के सामने वह पद रखा जो पवित्रशास्त्र सर्वत्र परमेश्वर को देता है — अर्थात् दुखियों की सहायता करना, और जितना अधिक हम क्लेशित हों, उतना ही अधिक हमारी सहायता के लिए तत्पर रहना। इसलिए स्वयं निराशा भी उसके मन को भक्तिपूर्ण और उत्कट प्रार्थना के अभ्यास तक ऊपर उठाने के लिए एक सीढ़ी बन गई। इसी प्रकार हमारे क्लेशों का जो अनुभव हमें होता है, उसे हमें परमेश्वर के पंखों के नीचे शरण लेने के लिए उकसाना चाहिए, ताकि वह हमें अपनी सहायता प्रदान करके यह दिखाए कि वह हमारे कल्याण में गहरी रुचि रखता है।

भजन 22:12-16

12. बलवन्त सांडों ने मुझे घेर लिया है; बाशान के सांड मेरे चारों ओर घेरा डाले हुए हैं। 13. वे फाड़ने और गरजनेवाले सिंह के समान मुझ पर अपना मुँह पसारे हुए हैं। 14. मैं जल के समान बह गया हूँ, और मेरी सब हड्डियों के जोड़ उखड़ गए हैं: मेरा हृदय मोम हो गया है; वह मेरी देह के भीतर पिघल गया है। 15. मेरा बल ठीकरे के समान सूख गया है, और मेरी जीभ मेरे तालू से चिपक गई है; और तू ने मुझे मृत्यु की धूल में डाल दिया है। 16. क्योंकि कुत्तों ने मुझे घेर लिया है; दुष्टों की मण्डली ने मुझे चारों ओर से घेर रखा है: उन्होंने मेरे हाथ और मेरे पैर छेद डाले हैं।

12. बलवन्त सांडों ने मुझे घेर लिया है। भजनकार अब अपने शत्रुओं की क्रूरता और बर्बर क्रोध की शिकायत करता है; और वह उनकी तुलना पहले सांडों से, दूसरे सिंहों से, और तीसरे कुत्तों से करता है। जब सांडों का क्रोध भड़कता है, तो हम जानते हैं कि वे कितने उग्र और भयानक होते हैं। सिंह भी एक क्रूर पशु है, और मनुष्यजाति के लिए भयावह है। और जिस उत्सुक और उग्र ढिठाई से कुत्ते, एक बार भड़क जाने पर, किसी मनुष्य को हानि पहुँचाने के लिए उस पर झपटते हैं, वह भली भाँति ज्ञात है। संक्षेप में, दाऊद के शत्रु इतने रक्त-पिपासु और क्रूर थे कि वे मनुष्यों की अपेक्षा जंगली पशुओं के अधिक समान थे। वह उन्हें केवल सांड नहीं, वरन बलवन्त सांड कहता है। मूल शब्द רבים रब्बीम का अनुवाद, जैसा हमने किया है, बलवन्त करने के स्थान पर कुछ लोग उसका अनुवाद बहुत करेंगे: जिससे मैं सहमत नहीं हो सकता। यह सच है कि दाऊद पर शत्रुओं की बड़ी-बड़ी सेनाओं ने आक्रमण किया था; परन्तु पद के दूसरे वाक्यांश से यह प्रकट होता है कि यहाँ उनकी संख्या का नहीं, वरन उनके बल का वर्णन किया गया है। वहाँ वह उन्हें बाशान के सांड कहता है; इस अभिव्यक्ति से उसका अर्थ है भली भाँति पले हुए सांड, और फलस्वरूप बड़े और बलवन्त: क्योंकि हम जानते हैं कि बाशान का पहाड़ अपनी समृद्ध और उपजाऊ चराइयों के लिए प्रसिद्ध था। ["यह ज्ञात है कि सांड एक उग्र पशु है, और बाशान के सांड, उसकी हरी-भरी चराइयों के कारण, असाधारण रूप से ऐसे थे।" — डॉ. गेडीज़ (Geddes)।]

14. मैं जल के समान बह गया हूँ। अब तक उसने हमें बताया है कि जंगली पशुओं से घिरा होने के कारण वह मृत्यु से दूर न था, मानो वह हर क्षण निगल लिए जाने की कगार पर हो। अब वह इसके अतिरिक्त अपनी भीतरी व्यथा पर विलाप करता है; जिससे हम सीखते हैं कि वह संकटों में मूढ़ या संवेदनहीन न था। वह कोई साधारण भय नहीं हो सकता था जिसने उसे लगभग घुला दिया, जिससे उसकी हड्डियों के जोड़ उखड़ गए, और उसका हृदय जल के समान बह गया। तो हम देखते हैं कि दाऊद पर क्लेश की लहरें ऐसी चट्टान के समान नहीं टकराईं जो हिलाई नहीं जा सकती, वरन वह भीतर ही भीतर घोर संकटों और परीक्षाओं से व्याकुल था, जिन्हें वह शरीर की दुर्बलता के कारण कभी सह न पाता, यदि परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ ने उसकी सहायता न की होती। ये दुःख मसीह पर कैसे लागू होते हैं, यह मैं तुम्हें थोड़ा पहले बता चुका हूँ। सच्चा मनुष्य होने के कारण वह वास्तव में हमारे शरीर की दुर्बलताओं के अधीन था, केवल पाप के कलंक के बिना। उसके स्वभाव की सिद्ध पवित्रता ने मानवीय भावनाओं को बुझा नहीं दिया; उसने केवल उन्हें नियन्त्रित किया, ताकि वे अति के कारण पापमय न हो जाएँ। इसलिए उसके दुःखों की महानता उसे इतना निर्बल नहीं कर सकी कि वह अपने अत्यन्त तीव्र कष्टों के बीच भी शान्त और स्थिर मन से अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अधीन करने से रुक जाए। अब, यद्यपि हमारे विषय में ऐसा नहीं है, जिनके भीतर उपद्रवी और अव्यवस्थित भावनाएँ हैं, और जो उन्हें कभी इतने संयम में नहीं रख सकते कि उनके वेग से इधर-उधर न धकेले जाएँ, तौभी दाऊद के उदाहरण के अनुसार हमें साहस रखना चाहिए; और जब हम अपनी दुर्बलता के कारण मानो लगभग निर्जीव हो जाएँ, तब हमें अपनी कराहें परमेश्वर की ओर लगानी चाहिए, उससे यह विनती करते हुए कि वह अनुग्रहपूर्वक हमें फिर बल और शक्ति प्रदान करने की कृपा करे। ["Ace qu'il luy plaise nous remettre sus, et nous rendre force et vigueur." — फ्रांसीसी।]

15. मेरा बल सूख गया है। उसका अभिप्राय उस शक्ति से है जो हमें उस मूल नमी के द्वारा प्राप्त होती है, जैसा कि वैद्य उसे कहते हैं। अगले वाक्यांश में वह जो जोड़ता है, मेरी जीभ मेरे तालू से चिपक गई है, उसका भी यही आशय है। हम जानते हैं कि अत्यधिक शोक न केवल प्राण-शक्ति को क्षीण कर देता है, वरन हमारी देह में की लगभग सारी नमी को भी सुखा देता है। आगे वह घोषित करता है कि इसके परिणामस्वरूप वह कब्र के योग्य ठहराया गया या उसके लिए अर्पित कर दिया गया: तू ने मुझे मृत्यु की धूल में डाल दिया है। इसके द्वारा वह संकेत करता है कि जीवन की सारी आशा उससे छीन ली गई थी; और इसी अर्थ में पौलुस भी कहता है, (2 कुरिन्थियों 1:9,) कि "उसने अपने मन में समझ लिया था कि हम पर मृत्यु की आज्ञा हो चुकी है।" परन्तु दाऊद यहाँ अपने विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा में बोलता है, और वह ऐसा इसलिए करता है कि हमें अपने से आगे मसीह तक ले जाए। हमारे उद्धारकर्ता का मृत्यु के साथ वह भयानक संघर्ष, जिसके कारण उसकी देह से पसीने के स्थान पर लहू निकला; उसका अधोलोक में उतरना, जिसके द्वारा उसने परमेश्वर के उस क्रोध का स्वाद चखा जो पापियों के योग्य था; और संक्षेप में, उसका अपने आप को शून्य कर देना — इन्हें बोलचाल के किसी भी साधारण रूप से पर्याप्त रीति से व्यक्त नहीं किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, दाऊद मृत्यु के विषय में वैसे ही बोलता है जैसे संकट में पड़े लोग उसके विषय में बोला करते हैं, जो भय से मारे हुए, धूल और विनाश में मिल जाने के अतिरिक्त और कुछ सोच ही नहीं पाते। जब कभी पवित्र जनों के मन इस अन्धकार से घिरे और दबे होते हैं, तो उनके इस अभ्यास में सदा कुछ अविश्वास मिला रहता है, जो उन्हें एकाएक उससे निकलकर नए जीवन की ज्योति में आने से रोकता है। परन्तु मसीह में ये दो बातें अद्भुत रीति से एक साथ जुड़ी हुई थीं, अर्थात् परमेश्वर के शाप के बोध से उत्पन्न होनेवाला आतंक, और विश्वास से उत्पन्न होनेवाला धीरज, जिसने मन की सारी भावनाओं को शान्त कर दिया, जिससे वे परमेश्वर के अधिकार के प्रति पूर्ण और स्वेच्छापूर्ण अधीनता में बनी रहीं। जहाँ तक हमारी बात है, जो वैसी सामर्थ से सम्पन्न नहीं हैं, यदि कभी अपने निकट विनाश के अतिरिक्त और कुछ न देखकर हम कुछ समय के लिए बहुत घबरा जाएँ, तो हमें धीरे-धीरे साहस फिर से प्राप्त करने का, और अपने आप को उस आशा तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करना चाहिए जो मरे हुओं को जिलाती है।

16. उन्होंने मेरे हाथ और मेरे पैर छेद डाले हैं। वह मूल शब्द जिसका अनुवाद हमने उन्होंने छेद डाले हैं किया है, כאריका-अरी है, जिसका शाब्दिक अनुवाद है, सिंह के समान। चूँकि आज के दिन सब इब्रानी बाइबलें, बिना किसी अपवाद के, यही पाठ रखती हैं, इसलिए मुझे उस पाठ से हटने में बड़ा संकोच होता जिसका वे सब समर्थन करती हैं, यदि प्रसंग का अभिप्राय मुझे ऐसा करने के लिए विवश न करता, और यदि यह अनुमान करने के लिए प्रबल आधार न होते कि यहूदियों ने इस स्थल को छल से बिगाड़ दिया है। सेप्तुआजिंट अनुवाद के विषय में इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनुवादकों ने इब्रानी पाठ में ,כארוका-अरू पढ़ा था, अर्थात् वहाँ וवाव अक्षर था, जहाँ अब יयोद अक्षर है। यहूदी इस विषय में बहुत बकवाद करते हैं कि मूल शब्द का अनुवाद उन्होंने छेद डाले हैं करके हम जान-बूझकर और सोच-समझकर शाब्दिक अर्थ को उलट देते हैं: परन्तु इस आरोप में सच्चाई का लेशमात्र भी नहीं है। ऐसे विषय में, जहाँ इसकी तनिक भी आवश्यकता न थी, इतनी ढिठाई से खिलवाड़ करने की क्या आवश्यकता थी? परन्तु झूठ का बहुत बड़ा सन्देह उन्हीं पर आता है, क्योंकि उनके हृदयों की सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु से उसके राजचिह्न छीन लें, और उसे मसीहा और उद्धारकर्ता के पद से वंचित कर दें। यदि हम यह पाठ उसी रीति से ग्रहण करें जैसा वे चाहते हैं, तो अर्थ अद्भुत अस्पष्टता में लिपट जाएगा। पहले तो यह एक अधूरी अभिव्यक्ति होगी, और उसे पूरा करने के लिए वे कहते हैं कि घेरना या घेर लेना क्रिया को जोड़ना आवश्यक है। परन्तु हाथों और पैरों को घेर लेने से उनका क्या अभिप्राय है? घेर लेना मनुष्य की देह के इन अंगों पर पूरे मनुष्य की अपेक्षा अधिक लागू नहीं होता। जब इस तर्क की असंगति प्रकट हो गई, तो वे अपनी सामान्य रीति के अनुसार बूढ़ी स्त्रियों की अत्यन्त हास्यास्पद कहानियों का सहारा लेते हैं, यह कहते हुए कि सिंह, जब मार्ग में किसी मनुष्य से मिलता है, तो अपने शिकार पर झपटने से पहले अपनी पूँछ से उसके सामने एक घेरा बनाता है: जिससे यह भरपूर रीति से प्रकट है कि अपने मत के समर्थन में तर्कों के लिए वे असमंजस में हैं। [इस शब्द ने बहुत वाद-विवाद उत्पन्न किया है। इब्रानी बाइबल में केतीब अर्थात् पाठ में लिखा हुआ रूप ,,כאריका-अरी, सिंह के समान, है; क़ेरे अर्थात् हाशिये का पाठ ,כארוका-अरू, "उन्होंने छेद डाले," है, जो ,כרהकराह, काटना, खोदना या छेदना, से बना है। दोनों पाठों का समर्थन हस्तलिपियों से होता है। तौभी इसमें सन्देह करने का कोई आधार नहीं कि वास्तविक पाठ ,,כארוका-अरू है। चूँकि सेप्तुआजिंट यहाँ ωρυξαν, उन्होंने छेद डाले, पढ़ता है, इसलिए निःसन्देह अनुवादकों ने यही समझा कि इब्रानी पाठ का शुद्ध पाठ ,כארוका-अरू था। वल्गेट, सीरियाई, अरबी और इथियोपियाई अनुवाद भी ऐसा ही अर्थ देते हैं। सब सुसमाचार-लेखक भी इस स्थल को उद्धृत करते और मसीह के क्रूस पर चढ़ाए जाने पर लागू करते हैं। इसके अतिरिक्त, दूसरा पाठ ,,כאריका-अरी, सिंह के समान, इस स्थल को दुर्बोध बना देता है। कसदी अनुवाद ने छेदे और सिंह के समान दोनों विचारों को मिला दिया है, और यह पढ़ता है, "सिंह के समान मेरे हाथों और मेरे पैरों को काटते हुए।" हमारा लेखक यह मानता है कि यहूदियों ने पाठ को छल से बिगाड़ दिया है, और जान-बूझकर ,כארוका-अरू को ,כאריका-अरी में बदल दिया है। परन्तु यह मानने की कोई आवश्यकता नहीं कि इस विषय में कोई छल हुआ है। प्रतिलिपि बनाने की प्रक्रिया में यह परिवर्तन अनजाने में हो सकता था, וवाव अक्षर के स्थान पर יयोद अक्षर रख दिए जाने से, जो उससे बहुत मिलता-जुलता है। वॉलफ़र्ड (Walford) टिप्पणी करता है, "कि वर्तमान पाठ [,כאריका-अरी] पूर्णतः सन्तोषजनक है, यदि उसे आत्मवाचक रूप में बहुवचन कृदन्त माना जाए, और उसका अनुवाद किया जाए, 'मेरे हाथों और मेरे पैरों के घायल करनेवाले।'"]

फिर, चूँकि दाऊद ने पिछले पद में सिंह की उपमा का प्रयोग किया है, इसलिए इस पद में उसका दोहराया जाना अनावश्यक होगा। हमारे कुछ व्याख्याकारों ने जो टिप्पणी की है, उस पर मैं बल नहीं देता, अर्थात् यह कि जब इस संज्ञा के आगे כकाफ़ अक्षर लगा होता है, जिसका अर्थ के समान है और जो उपमा-सूचक शब्द है, तो उसमें सामान्यतः उन बिन्दुओं से भिन्न स्वर-चिह्न होते हैं जो इस स्थल में प्रयुक्त हुए हैं। तौभी मेरा उद्देश्य यहाँ यहूदियों को, जो विवाद में अत्यन्त हठी और अपनी ही राय पर अड़े रहनेवाले हैं, कायल करने का परिश्रम करना नहीं है। मैं केवल संक्षेप में यह दिखाना चाहता हूँ कि इस स्थान में पाए जानेवाले भिन्न पाठ के कारण वे मसीहियों को उलझाने का कैसा दुष्टतापूर्ण प्रयत्न करते हैं। जब वे यह आपत्ति करते हैं कि व्यवस्था के विधान के अनुसार किसी मनुष्य को कीलों से क्रूस पर नहीं जड़ा जाता था, तो इसमें वे इतिहास के विषय में अपनी घोर अज्ञानता प्रकट करते हैं, क्योंकि यह निश्चित है कि रोमियों ने अपने जीते हुए प्रान्तों में अपने बहुत से रीति-रिवाज और चाल-चलन प्रचलित कर दिए थे। यदि वे यह आपत्ति करें कि दाऊद को कभी क्रूस पर कीलों से नहीं जड़ा गया, तो उत्तर सहज है, अर्थात् यह कि अपनी दशा पर विलाप करते हुए उसने एक उपमा का प्रयोग किया है, यह घोषित करते हुए कि उसके शत्रुओं ने उसे उस मनुष्य से कम दुःख नहीं दिया जो क्रूस पर लटकाया गया हो, और जिसके हाथ और पैर कीलों से आर-पार छेदे गए हों। थोड़ा आगे हम इसी प्रकार के और रूपकों से मिलेंगे।

भजन 22:17-21

17. मैं अपनी सब हड्डियाँ गिन लूँगा; वे मुझे देखते और घूरते हैं। 18. वे मेरे वस्त्र आपस में बाँटते हैं, और मेरे पहिरावे पर चिट्ठी डालते हैं। 19. इसलिए हे यहोवा, तू दूर न रह। हे मेरे बल, मेरी सहायता के लिए फुर्ती कर। 20. मेरे प्राण को तलवार से बचा; मेरे अकेले प्राण को कुत्ते के हाथ [या वश] से। 21. मुझे सिंह के मुँह से बचा, और जंगली सांडों के सींगों से मुझे उत्तर दे।

17. मैं गिन लूँगा। इब्रानी शब्द עצמותअत्समोत, जिसका अर्थ हड्डियाँ है, एक और शब्द से निकला है जिसका अर्थ बल है; और इसलिए यह शब्द कभी-कभी मित्रों के लिए प्रयुक्त होता है, जिनकी रक्षा से हम बल पाते हैं, या उन तर्कों और कारणों के लिए जो किसी पक्ष की रक्षा की मानो नसें और बल होते हैं। इसलिए कुछ लोग इस स्थल का यह अर्थ लगाते हैं, — अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए अपने सब तर्कों को गिनाने से मुझे कुछ भी लाभ न होगा; क्योंकि मेरे शत्रुओं ने न्याय के निर्देशों का कुछ भी ध्यान रखे बिना, उचित या अनुचित, किसी न किसी उपाय से मुझे नष्ट करने का पूरा निश्चय कर लिया है। दूसरे इसकी व्याख्या यों करते हैं: यद्यपि मैं उन सब सहायताओं को एकत्र कर लूँ जो मुझे सहारा देने में समर्थ जान पड़ें, तौभी वे मेरे किसी काम न आएँगी। परन्तु जो व्याख्या अधिक सामान्य रूप से स्वीकार की जाती है, वही मुझे अधिक सरल और स्वाभाविक भी जान पड़ती है, और इसलिए मैं उसे और भी तत्परता से अपनाता हूँ। वह यह है — कि दाऊद शिकायत करता है कि उसकी देह इतनी दुबली और क्षीण हो गई थी कि उसके सब भागों से हड्डियाँ उभरी हुई दिखाई देती थीं; क्योंकि वह इसके तुरन्त बाद जोड़ता है कि उसके शत्रु उसे इतनी दयनीय दशा में देखकर आनन्दित होते थे। इस प्रकार पद के दोनों वाक्यांश सुन्दर रीति से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसके शत्रुओं की क्रूरता इतनी अतृप्त थी कि एक अभागे मनुष्य को शोक से क्षीण और मानो घुलता हुआ देखकर वे ऐसे दुःखद दृश्य से अपनी आँखों को तृप्त करने में आनन्द पाते थे।

"Asgavoir, vie, qui est seule." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, मेरा प्राण, जो अकेला है।" "Et me respon, en me sauvant des cornes des licornes." — फ्रांसीसी। "और जंगली सांडों के सींगों से मुझे बचाकर मुझे उत्तर दे।"

अगले पद में उसके वस्त्रों के विषय में जो कहा गया है, वह रूपकात्मक है। मानो वह यह कह रहा हो कि उसकी सारी सम्पत्ति उसके शत्रुओं का शिकार बन गई थी, ठीक जैसे विजेता पराजितों को लूटा करते हैं, या लूट को चिट्ठी डालकर, जिससे यह निश्चित हो कि प्रत्येक का भाग क्या है, आपस में बाँट लेते हैं। अपने आभूषणों, धन और अपनी सारी सम्पत्ति की तुलना अपने वस्त्रों से करते हुए वह शिकायत करता है कि उनसे वंचित किए जाने के बाद उसके शत्रुओं ने उन्हें लूट के माल के समान आपस में बाँट लिया, और साथ ही उसका ठट्ठा भी किया; और इस ठट्ठे से उनके आचरण की दुष्टता और भी बढ़ गई, क्योंकि वे उस पर ऐसे जयजयकार करते थे मानो वह मरा हुआ मनुष्य हो। सुसमाचार-लेखक इस स्थान को, जैसा हम कहते हैं, अक्षरशः और बिना किसी अलंकार के उद्धृत करते हैं; और उनके ऐसा करने में कोई असंगति नहीं है। हमें और भी निश्चित रूप से यह सिखाने के लिए कि इस भजन में भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा मसीह का वर्णन हमारे सामने किया गया है, स्वर्गीय पिता ने यह ठहराया कि जो बातें दाऊद में छाया के रूप में दिखाई गई थीं, वे उसके पुत्र के व्यक्तित्व में प्रत्यक्ष रूप से पूरी हों। मत्ती, (मत्ती 8:16, 17,) यह वर्णन करते हुए कि लकवे के मारे, अन्धे और लंगड़े अपने रोगों से चंगे किए गए, कहता है कि यह इसलिए हुआ "कि जो वचन यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था वह पूरा हो, कि उसने आप हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारी बीमारियों को उठा लिया;" यद्यपि भविष्यद्वक्ता उस स्थान में परमेश्वर के पुत्र को आत्मिक वैद्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करता है। हम विश्वास करने में अत्यन्त मन्द और पिछड़े हुए हैं; और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हमारी समझ की मन्दता के कारण हमें मसीह के स्वरूप का ऐसा प्रमाण दिया गया है जो हमारी इन्द्रियों के लिए स्पर्शयोग्य है, और जो हमारी बुद्धि की सुस्ती को जगाने का प्रभाव रख सके। ["Il nous a este faite une demonstration si grossiere, qu'on la pouvoit taster, au doigt." — फ्रांसीसी। "हमें ऐसा स्पष्ट प्रमाण दिया गया है कि उसे उँगली से छुआ जा सकता था।"]

19. इसलिए हे यहोवा, तू मुझ से दूर न रह! दाऊद ने अब तक अपने विषय में जो कुछ बताया है, वह सब हमें स्मरण रखना चाहिए। जब उसके दुःख अपनी चरम सीमा तक पहुँच गए थे, और जब उसे छुटकारे की आशा दिलाने के लिए आशा की एक किरण भी दिखाई न देती थी, तब यह विश्वास की सामर्थ का एक अद्भुत उदाहरण है कि उसने न केवल अपने क्लेशों को धीरज से सहा, वरन निराशा की अथाह गहराई से उठकर परमेश्वर को पुकारा। इसलिए हम विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दें कि दाऊद ने अपने विलाप इस विचार से नहीं उण्डेले कि वे व्यर्थ और निष्फल हैं, जैसे उलझन में पड़े लोग प्रायः अपनी कराहें यों ही उण्डेल देते हैं। जो प्रार्थनाएँ वह साथ जोड़ता है, वे पर्याप्त रूप से दिखाती हैं कि वह ऐसे परिणाम की आशा रखता था जैसा वह चाहता था। जब वह परमेश्वर को अपना बल कहता है, तो इस विशेषण के द्वारा वह अपने विश्वास का और भी स्पष्ट प्रमाण देता है। वह सन्देह के साथ प्रार्थना नहीं करता; वरन वह अपने आप से उस सहायता की प्रतिज्ञा करता है जिसे इन्द्रियों की आँख अभी तक नहीं देख पाई थी। तलवार, कुत्ते के हाथ, सिंह के मुँह और जंगली सांडों के सींगों के द्वारा वह संकेत करता है कि वह उस समय मृत्यु के संकट के सम्मुख था, और वह भी अनेक प्रकार से। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यद्यपि इस प्रकार मृत्यु से घिरा होने पर वह अपने आप में पूर्णतः मूर्छित हो गया था, तौभी वह प्रभु में दृढ़ बना रहा, और जीवन का आत्मा उसके हृदय में सदा सबल बना रहा। कुछ लोग अकेला प्राण, या अकेला जीवन, शब्दों को प्रिय और बहुमूल्य के अर्थ में लेते हैं; परन्तु यह विचार मुझे उपयुक्त नहीं जान पड़ता। उसका अभिप्राय यह है कि इतनी मृत्युओं के बीच उसे सारे संसार में कोई सहायता या सहारा न मिला; जैसे भजन 35:17 में अकेला प्राण शब्द इसी अर्थ में ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुए हैं जो अकेला और सब सहायता और सहारे से रहित है। यह भजन 25:16 से और भी स्पष्ट हो जाएगा, जहाँ दाऊद अपने आप को दीन और अकेला कहकर निःसन्देह यह शिकायत करता है कि वह मित्रों से पूर्णतः वंचित और सारे संसार द्वारा त्यागा हुआ था। जब 21वें पद के अन्त में कहा गया है, मुझे उत्तर दे, या जंगली सांडों के सींगों से मेरी सुन, तो बोलने की यह इब्रानी रीति हमारे कानों को विचित्र और अस्पष्ट लग सकती है, परन्तु अर्थ तनिक भी सन्दिग्ध नहीं है। यहाँ केवल कारण को कार्य के स्थान पर रखा गया है; क्योंकि हमारा छुटकारा परमेश्वर के हमारी सुनने का परिणाम या फल है। यदि यह पूछा जाए कि इसे मसीह पर कैसे लागू किया जा सकता है, जिसे पिता ने मृत्यु से नहीं छुड़ाया? तो मैं एक शब्द में उत्तर देता हूँ कि वह उससे कहीं अधिक सामर्थ के साथ छुड़ाया गया, जितना कि यदि परमेश्वर उसे मृत्यु का शिकार होने से रोक देता; ठीक जैसे किसी गम्भीर रोग से चंगा होने की अपेक्षा मरे हुओं में से फिर जी उठना कहीं बड़ा छुटकारा है। इसलिए मृत्यु ने मसीह के पुनरुत्थान को अन्ततः इस बात की साक्षी देने से नहीं रोका कि उसकी सुनी गई थी।

भजन 22:22-24

अर्थात्, मेरा प्राण, जो मुझे प्रिय और बहुमूल्य है।

"La vie esseulee." — फ्रांसीसी। "त्यागा हुआ या अकेला छोड़ा हुआ जीवन।"

22. मैं अपने भाइयों के सामने तेरे नाम का प्रचार करूँगा: सभा के बीच मैं तेरी स्तुति करूँगा। 23. [यह कहते हुए,] हे यहोवा के डरवैयो, उसकी स्तुति करो: हे याकूब के सब वंशजो, उसकी महिमा करो; और हे इस्राएल के सब वंशजो, उसका भय मानो। 24. क्योंकि उसने दीन को तुच्छ नहीं जाना और न उससे घृणा की; न उसने उससे अपना मुख छिपाया; पर जब उसने उसकी दोहाई दी, तब उसने उसकी सुन ली। ["Disant." — फ्रांसीसी। "यह कहते हुए।"]

22. मैं तेरे नाम का प्रचार करूँगा। दाऊद यह प्रतिज्ञा करके कि छुटकारा पाने पर वह कृतघ्न न होगा, उस बात की पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि वह परीक्षा से कभी इतना गिराया नहीं गया था कि उसका सामना करने का साहस ही न कर सके। यदि उसने पहले से छुटकारे की निश्चित आशा न रखी होती, तो वह, जैसा कि यहाँ कर रहा है, परमेश्वर को धन्यवाद का बलिदान चढ़ाने के लिए अपने आप को कैसे तैयार कर सकता था? यदि हम यह भी मान लें कि यह भजन दाऊद के वास्तव में अपनी इच्छित वस्तु पा लेने के बाद रचा गया, तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो कुछ उसने बाद में लिखा, वह उन्हीं ध्यानों और विचारों से बना था जो उसके भारी क्लेशों के समय उसके मन में से होकर गुज़रे थे। विशेष रूप से इस पर ध्यान देना चाहिए कि जिस कृतज्ञता की वह प्रतिज्ञा करता है, वह कोई साधारण चिह्न नहीं, वरन ऐसी है जैसी परमेश्वर विरले आशीषों के लिए चाहता था; अर्थात् यह कि विश्वासयोग्य लोग उसके पवित्रस्थान में आएँ, और वहाँ उस अनुग्रह की गम्भीर साक्षी दें जो उन्होंने पाया था। सार्वजनिक और गम्भीर धन्यवाद का उद्देश्य यह है कि विश्वासयोग्य लोग सब प्रकार की रीतियों से परमेश्वर की सेवा और उसका आदर करने में लगे रहें, और एक-दूसरे को वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करें। हम जानते हैं कि दाऊद की रक्षा में परमेश्वर की अद्भुत सामर्थ चमक उठी थी; और वह केवल एक आश्चर्यकर्म से नहीं, वरन अनेकों से। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह एक गम्भीर मन्नत के द्वारा अपने आप को इस बात के लिए बाध्य करता है कि परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति और विश्वासयोग्यता का खुला और सार्वजनिक अंगीकार करे। अपने भाइयों से उसका अभिप्राय इस्राएलियों से है; और वह उन्हें यह नाम केवल इसलिए नहीं देता कि वह और वे एक ही वंश से उत्पन्न हुए थे, वरन इससे बढ़कर इसलिए कि जो धर्म उनमें समान रूप से था, वह एक पवित्र बन्धन के समान उन्हें आत्मिक सम्बन्ध के द्वारा एक-दूसरे से जोड़े रखता था। प्रेरित, (इब्रानियों 2:12) इस पद को मसीह पर लागू करते हुए इससे यह तर्क देता है कि वह हमारे ही समान स्वभाव का सहभागी था, और शरीर की सच्ची संगति के द्वारा हमसे जुड़ा हुआ था, क्योंकि वह हमें अपने भाई स्वीकार करता है, और हमें इतनी आदरपूर्ण उपाधि देने की कृपा करता है। मैं पहले ही बार-बार कह चुका हूँ, (और इस भजन के अन्त से इसे सिद्ध करना भी सहज है) कि दाऊद के रूप के अन्तर्गत मसीह ने

भजन का दूसरा भाग यहाँ से आरम्भ होता है। यहाँ गहनतम वेदना की भाषा से उच्च आनन्द और कृतज्ञता की भाषा की ओर परिवर्तन है। दुःख उठानेवाला मसीहा यहाँ अपने दुःखों के धन्य परिणामों पर ध्यान करता है।

…यहाँ हमारे लिए पूर्वाभास के रूप में दिखाया गया है। इसलिए प्रेरित उचित रूप से इससे यह निष्कर्ष निकालता है कि "भाइयों" के नाम के अन्तर्गत और उसी के द्वारा मसीह के साथ भ्रातृ-सम्बन्ध का अधिकार हमारे लिए पक्का किया गया है। निःसन्देह यह कुछ सीमा तक सारी मनुष्यजाति से सम्बन्ध रखता है, परन्तु इसका सच्चा उपभोग उचित रूप से केवल सच्चे विश्वासियों ही का है। इसी कारण स्वयं मसीह ने अपने ही मुँह से इस उपाधि को अपने चेलों तक सीमित किया, जब उसने कहा, "मेरे भाइयों के पास जाकर उनसे कह दे, कि मैं अपने पिता, और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूँ।" (यूहन्ना 20:17)

अभक्त लोग अपने अविश्वास के द्वारा देह के उस सम्बन्ध को तोड़ डालते और विघटित कर देते हैं जिसके द्वारा उसने अपने आप को हमसे जोड़ा है, और इस प्रकार वे अपने ही दोष से उसके लिए पूर्णतः पराए बन जाते हैं। जिस प्रकार दाऊद ने "भाइयों" शब्द के अन्तर्गत अब्राहम के सारे वंश को सम्मिलित करते हुए, तुरन्त बाद (पद 23) विशेष रूप से अपनी बात परमेश्वर के सच्चे उपासकों को सम्बोधित की; उसी प्रकार मसीह ने, यद्यपि यहूदियों और अन्यजातियों के बीच की "जुदाई की बीच की दीवार" को ढा दिया, और सब जातियों में लेपालकपन की आशीषों का प्रचार किया, और इस प्रकार अपने आप को उनके सामने भाई के रूप में प्रकट किया, तौभी वह भाइयों की श्रेणी में सच्चे विश्वासियों को छोड़ और किसी को नहीं रखता।

23. हे यहोवा के डरवैयो। यहाँ भजनकार फिर से उस सार्वजनिक और गम्भीर धन्यवाद के फल को, जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, और भी स्पष्ट रूप से प्रकट करता है, और घोषणा करता है कि इस अभ्यास में लगकर हर एक मनुष्य अपने अपने स्थान में अपने उदाहरण के द्वारा कलीसिया को परमेश्वर की स्तुति करने के लिए आमन्त्रित करता और उभारता है। वह हमें बताता है कि जिस उद्देश्य से वह सार्वजनिक सभा में परमेश्वर के नाम की स्तुति करेगा, वह यह है कि उसके भाई भी वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित हों। परन्तु क्योंकि कपटी लोग प्रायः कलीसिया में घुस आते हैं, और प्रभु के खलिहान में भूसी गेहूँ के साथ मिली रहती है, इसलिए वह स्पष्ट रूप से भक्तों को, और उन्हें जो परमेश्वर का भय मानते हैं, सम्बोधित करता है। अशुद्ध और दुष्ट मनुष्य खुले मुँह से परमेश्वर का गुणगान कर सकते हैं, परन्तु निश्चय ही वे उसके पवित्र नाम को अशुद्ध और अपवित्र करने के सिवा और कुछ नहीं करते। यह सचमुच अत्यन्त वांछनीय बात होती कि संसार में सब प्रकार की दशाओं के मनुष्य एक मन होकर प्रभु के लिए पवित्र गीत में सम्मिलित हों। परन्तु क्योंकि इस सुर-मेल का मुख्य और सबसे आवश्यक अंश हृदय के निष्कपट और शुद्ध प्रेम से निकलता है, इसलिए कोई भी कभी उचित रीति से परमेश्वर की महिमा का गुणगान नहीं करेगा, सिवाय उस मनुष्य के जो पवित्र भय के प्रभाव में उसकी उपासना करता है। दाऊद थोड़ा आगे चलकर याकूब और इस्राएल के वंश का नाम लेता है, और इसमें उसका ध्यान प्रजा की सामान्य बुलाहट पर है; और निश्चय ही उसने अब्राहम की सारी सन्तान को भी एक मन होकर परमेश्वर की स्तुति करने से रोकने के लिए मार्ग में कोई बाधा नहीं डाली। परन्तु क्योंकि उसने देखा कि बहुत से इस्राएली जारज और पतित थे, इसलिए वह सच्चे और निष्कपट इस्राएलियों को उनसे अलग करता है; और साथ ही यह दिखाता है कि जहाँ सच्ची भक्ति और परमेश्वर का भीतरी भय नहीं है, वहाँ परमेश्वर के नाम का गुणगान यथोचित रीति से नहीं होता। इसलिए अपने उपदेश में वह फिर से परमेश्वर की स्तुति और उसके प्रति श्रद्धा को एक साथ जोड़ता है।—हे इस्राएल के वंश, उसका भय मानो, वह कहता है; क्योंकि इस विषय में कपटी लोग जो सुन्दर-सुन्दर मुखौटे धारण करते हैं, वे सब निरा उपहास ही हैं। तौभी जिस भय की वह अनुशंसा करता है, वह ऐसा नहीं जो विश्वासियों को डराकर परमेश्वर के निकट आने से रोक दे, बल्कि ऐसा जो उन्हें सचमुच दीन बनाकर उसके पवित्रस्थान में ले आए, जैसा कि पाँचवें भजन में कहा जा चुका है। कुछ लोगों को यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि दाऊद उन्हीं लोगों को परमेश्वर की स्तुति करने का उपदेश देता है, जिनकी उसने पहले ऐसा करने के लिए सराहना की थी। परन्तु इसकी व्याख्या सहज है, क्योंकि संसार के सबसे पवित्र मनुष्य भी परमेश्वर के भय से कभी इतने पूर्ण रूप से भरे नहीं होते कि उन्हें उसके अभ्यास के लिए निरन्तर उभारे जाने की आवश्यकता न रहे। इसलिए जब वह परमेश्वर का भय माननेवालों के विषय में बोलते हुए उन्हें उपदेश देता है कि वे उसका भय मानें और दीनता से उसके सामने दण्डवत् करें, तो यह उपदेश किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं है।

24. क्योंकि उसने तुच्छ नहीं जाना। एक-दूसरे की भलाई में आनन्दित होना, और एक-दूसरे के कल्याण के लिए मिलकर धन्यवाद देना, उस सहभागिता का एक अंग है जो परमेश्वर के लोगों के बीच होनी चाहिए, जैसा कि पौलुस भी सिखाता है, "ताकि जो वरदान बहुतों के द्वारा हमें मिला, उसके कारण बहुत लोग हमारी ओर से धन्यवाद करें।" (2 कुरिन्थियों 1:11)

परन्तु दाऊद का यह कथन एक और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भी पूरा करता है—यह हर एक मनुष्य को यह आशा रखने के लिए प्रोत्साहित करता है कि परमेश्वर उसके प्रति भी वैसी ही दया दिखाएगा। प्रसंगवश, इन शब्दों से हमें यह सिखाया जाता है कि परमेश्वर के लोगों को अपने क्लेश धीरज से सहने चाहिए, चाहे प्रभु को उन्हें संकट की दशा में कितने ही समय तक रखना भाए, ताकि अन्त में वह उनकी सहायता करे, और जब वे इतनी कठोरता से परखे जाएँ तब उन्हें अपनी सहायता प्रदान करे।

भजन 22:25-29

25. बड़ी सभा में मेरी स्तुति तुझी से निकलेगी; मैं उसके डरवैयों के सामने अपनी मन्नतें पूरी करूँगा। 26. दीन लोग भोजन करके तृप्त होंगे; जो यहोवा के खोजी हैं वे उसकी स्तुति करेंगे: तुम्हारा मन सदा जीवित रहेगा। 27. पृथ्वी के सब छोर स्मरण करेंगे, और यहोवा की ओर फिरेंगे; और अन्यजातियों के सब कुल उसके सम्मुख दण्डवत् करेंगे। 28. क्योंकि राज्य यहोवा का है, कि वह जातियों के बीच शासक हो। 29. पृथ्वी के सब हृष्ट-पुष्ट लोग खाएँगे और दण्डवत् करेंगे; मिट्टी में उतरनेवाले सब उसके सामने झुकेंगे; और वह भी जो अपने प्राण को जीवित नहीं रखता [अथवा, वह जो अपने आप को जीवित रखने में असमर्थ है]।

लातीनी और फ्रांसीसी दोनों संस्करणों में यहाँ "परमेश्वर की स्तुति करो" है; परन्तु विचार-क्रम यह माँग करता प्रतीत होता है कि यह "परमेश्वर का भय मानो" होना चाहिए।

"Ate laus mea." — लातीनी। "Ma louange proviendra de toy." — फ्रांसीसी। "Ou, ma louange sera de toy." — फ्रांसीसी हाशिया। "अथवा, मेरी स्तुति तेरी ओर से होगी।"

25. मेरी स्तुति तुझी से निकलेगी। मैं दूसरे अनुवाद को अस्वीकार नहीं करता; परन्तु मेरी सम्मति में यहाँ अभिव्यक्ति की इब्रानी शैली यह अर्थ चाहती है—कि दाऊद अपने स्तुति-गीत की सामग्री परमेश्वर से लेगा। इसलिए मैं क्रिया निकलेगी, अथवा बहेगी, जोड़ देता हूँ,—मेरी स्तुति तुझी से निकलेगी अथवा बहेगी; और उसने यह कथन इसलिए किया कि वह इस बात की साक्षी दे कि उसका छुटकारा पूर्णतः परमेश्वर ही की देन है। हम जानते हैं कि बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर की स्तुति करने के बहाने अपनी और अपने मित्रों की प्रशंसा का ढोल पीटते हैं, और परमेश्वर को पीछे छोड़कर किसी न किसी बात से अपनी विजयों का गुणगान करने का अवसर ढूँढ़ लेते हैं। भजनकार उस बात को दोहराता है जिसे उसने थोड़ा पहले छुआ था, कि वह अपनी कृतज्ञता के चिह्न सार्वजनिक रीति से प्रकट करेगा, जिससे वह दूसरों की उन्नति करे। वह यह भी जोड़ता है कि इन चिह्नों में व्यवस्था द्वारा ठहराया गया भक्ति का गम्भीर अभ्यास भी होगा: मैं उसके डरवैयों के सामने अपनी मन्नतें पूरी करूँगा। महत्त्वपूर्ण कार्यों में, और जब निकट संकट का भय होता था, तब परमेश्वर की प्राचीन प्रजा में मेलबलि की मन्नत मानना एक सामान्य प्रथा थी, और अपनी इच्छित वस्तु पा लेने के बाद वे अपनी मन्नत पूरी करते थे। इसलिए दाऊद, जो पवित्र लोगों की गिनती में था, जैसा उसे उचित था, कलीसिया के उस सामान्य और सर्वविदित नियम के अनुसार चला। जिन मन्नतों को पूरा करने की वह प्रतिज्ञा करता है, वे वही हैं जिनके विषय में वह संकेत करता है कि उसने उन्हें अपने घोर संकट में माना था; और वह उन्हें उदार और प्रफुल्ल हृदय से, हाँ, भरोसे से भरे हृदय से पूरा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है। अब यद्यपि उसके लिए यह उचित था कि वह धर्म का यह गम्भीर कार्य बिना भेदभाव सारी सभा के सामने करे, तौभी वह फिर से स्वीकार करता है कि उसकी यह अभिलाषा है कि जितने वहाँ उसके साक्षी होने को उपस्थित हों, वे सब परमेश्वर के सच्चे उपासक हों। इस प्रकार, यद्यपि परमेश्वर की कलीसिया को शुद्ध करना हमारे वश में न हो, तौभी उसकी शुद्धता की अभिलाषा करना हमारा कर्तव्य है। पोप के अनुयायी, अपनी झूठी और छलपूर्ण मन्नतों के समर्थन के लिए इस खण्ड को तोड़-मरोड़कर, अपने आप को इतना मूर्ख और हास्यास्पद सिद्ध करते हैं कि उनका खण्डन करने में अधिक समय लगाना अनावश्यक है। उन बचकानी मूर्खताओं में, जिनके द्वारा वे अपनी ही कल्पना के अनुसार परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं, और कृतज्ञता की इस पवित्र साक्षी में, जिसे न केवल धर्म की सच्ची समझ और परमेश्वर के भय ने पूर्वजों को सुझाया, बल्कि जिसकी आज्ञा स्वयं परमेश्वर ने दी और अपनी व्यवस्था में जिसे पक्का किया—इन दोनों में क्या समानता है? हाँ, वे अपने मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक अन्धविश्वासों को सब बलिदानों में सबसे बहुमूल्य बलिदान—धन्यवाद के बलिदान—के बराबर ठहराने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं? जैसा कि पवित्रशास्त्र साक्षी देता है कि परमेश्वर की सेवा का मुख्य अंग यही है कि सच्चे विश्वासी सार्वजनिक और गम्भीर रीति से यह स्वीकार करें कि वही सब अच्छी वस्तुओं का कर्ता है।

26. दीन लोग भोजन करेंगे। भजनकार उस प्रथा की ओर संकेत करता है जो उस समय यहूदियों में प्रचलित थी, अर्थात् अपने बलिदानों पर भोज करने की, जैसा कि भली-भाँति विदित है। वह यहाँ अपने प्रेम का अभ्यास करने और उसे प्रमाणित करने के लिए इस भोज की प्रतिज्ञा करता है। और निश्चय ही वह भेंट परमेश्वर को मनभावनी और ग्रहणयोग्य है जिसके साथ करुणा और दया जुड़ी हो। इनके बिना वे सब विधियाँ, जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर की उपासना करने का दावा करते हैं, अपनी सारी धूमधाम और भव्यता के साथ धुएँ में उड़ जाती हैं। तौभी दाऊद केवल यह प्रतिज्ञा नहीं करता कि वह दीनों और भूखों को देह के पोषण मात्र के लिए कुछ दे देगा। वह घोषणा करता है कि वे एक और उद्देश्य से इस भोज के सहभागी होंगे, अर्थात् इसलिए कि उन्हें सान्त्वना की सामग्री पहुँचाई जाए, जिससे उनके हृदयों में आनन्द लौट आए और फिर से लहलहा उठे। क्योंकि उस भोज में वे, मानो दर्पण में, सब क्लेशितों के लिए प्रकट की गई परमेश्वर की भलाई को देखते थे, जो अद्भुत सान्त्वना के द्वारा उनकी सब विपत्तियों से उत्पन्न शोक को शान्त कर सकती थी। इसलिए भजनकार जोड़ता है, जो यहोवा के खोजी हैं वे उसकी स्तुति करेंगे। निःसन्देह जिस भरपूर भोजन में वे सहभागी हुए थे, उसे उन्हें परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिए उभारना चाहिए था; परन्तु यहाँ विशेष रूप से अभिप्राय उस छुटकारे के लिए परमेश्वर की स्तुति करने से है, जिसके कृतज्ञ स्मरण में वह बलिदान चढ़ाया गया था। यह पद के अन्तिम वाक्यांश से और भी स्पष्ट प्रकट होता है: तुम्हारा मन सदा जीवित रहेगा। एक भोजन उनके हृदयों को सदा जीवित रखने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता था। बल्कि यह उस आशा के द्वारा हुआ जो वे परमेश्वर से तत्पर सहायता पाने के विषय में रखते थे; क्योंकि सब विश्वासी उचित रूप से इस एक मनुष्य के छुटकारे को विशेष रूप से अपने लिए किया गया छुटकारा गिनते थे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मेलबलियों में परमेश्वर की स्तुति इस रीति से की जाती थी कि सच्चे उपासक उनमें अपनी आशा का भी अभ्यास करते थे। फिर, क्योंकि कपटी लोग केवल खोखली और निर्जीव विधि पूरी करके सन्तुष्ट हो जाते हैं, इसलिए भजनकार इस अभ्यास के उचित पालन को सच्चे और पवित्र इस्राएलियों तक सीमित करता है; जो यहोवा के खोजी हैं वे उसकी स्तुति करेंगे; और परमेश्वर को खोजना सच्ची भक्ति का निश्चित चिह्न है। अब यदि व्यवस्था के अधीन पूर्वजों का आत्मिक जीवन उनके पवित्र भोजों के द्वारा नया और बलवन्त होता था, तो आज के दिन मसीह के पवित्र भोज में यह सामर्थ्य कहीं अधिक भरपूरी से प्रकट होगी, यदि वे जो उसमें सहभागी होने आते हैं, सच्चाई से और अपने सारे हृदय से प्रभु को खोजें।

27. पृथ्वी के सब छोर स्मरण करेंगे। यह खण्ड निःसन्देह दिखाता है कि दाऊद अपने ही व्यक्तित्व पर नहीं रुकता, बल्कि अपने आप को एक प्रतिरूप ठहराकर उसके अन्तर्गत प्रतिज्ञा किए हुए मसीहा का वर्णन करता है। क्योंकि उस समय भी यह बात भली-भाँति विदित होनी चाहिए थी कि परमेश्वर ने उसे इसलिए राजा ठहराया था कि प्रजा एक साथ जुड़ी रहे और एक ही सिर के अधीन सुखी जीवन का आनन्द ले; और यह अन्त में मसीह में पूर्ण रूप से पूरा हुआ। मैं मानता हूँ कि आस-पास की जातियों में दाऊद का नाम बड़ा और प्रसिद्ध था; परन्तु सारे संसार की तुलना में उनका अधिकृत प्रदेश था ही क्या? इसके अतिरिक्त, जिन विदेशी जातियों को उसने वश में किया था, उन्हें उसने कभी परमेश्वर की सच्ची उपासना की ओर नहीं फेरा था। इसलिए वह विवश और दासवत् अधीनता, जिसे विजय के द्वारा अन्यजातियाँ एक पार्थिव राजा के प्रति स्वीकार करने को बाध्य की गई थीं, सच्ची भक्ति की उस स्वेच्छापूर्ण आज्ञाकारिता से बहुत भिन्न थी, जिसके द्वारा वे अपने दयनीय भटकाव से लौटाई जातीं और परमेश्वर के पास इकट्ठी की जातीं। और जब भजनकार कहता है कि जातियाँ परमेश्वर के अनुग्रह से भली-भाँति परिचित होकर उसकी ओर फिरेंगी, तो उसका अभिप्राय किसी साधारण परिवर्तन से नहीं है। इसके अतिरिक्त, उन्हें पवित्र भोज की संगति में जोड़कर वह स्पष्ट रूप से उन्हें कलीसिया की देह में साटता है।

कुछ लोग इन शब्दों, वे स्मरण करेंगे, का अर्थ यह बताते हैं कि जब अन्यजातियों को विश्वास की ज्योति फिर से प्राप्त होगी, तब वे उस परमेश्वर को स्मरण करने लगेंगी जिसे वे कुछ समय के लिए भूल गई थीं; परन्तु यह मुझे अत्यधिक सूक्ष्म और अर्थ से बहुत दूर प्रतीत होता है। मैं मानता हूँ कि जिस फिरने या लौटने का यहाँ उल्लेख है, उसका तात्पर्य यह है कि वे पहले दुष्ट धर्मत्याग के द्वारा परमेश्वर से अलग हो गई थीं; परन्तु इस स्मरण का सीधा अर्थ यह है कि अन्यजातियाँ परमेश्वर द्वारा किए गए अद्भुत आश्चर्यकर्मों से जागकर फिर से उस सच्चे धर्म को अपनाएँगी जिससे वे गिर गई थीं। फिर, यह ध्यान देने योग्य है कि परमेश्वर की सच्ची उपासना उसके ज्ञान से उत्पन्न होती है; क्योंकि भजनकार की भाषा का तात्पर्य यह है कि वे ही परमेश्वर के सामने दीन आराधना में दण्डवत् करने आएँगे, जिन्होंने उसके कार्यों पर मनन करने में इतनी उन्नति कर ली हो कि उनमें फिर घमण्ड और तिरस्कार के साथ उसके विरुद्ध भड़क उठने की कोई इच्छा न रहे।

यह अर्थ उस कारण से और भी पूर्ण रूप से पुष्ट होता है जो अगले पद में जोड़ा गया है, (28) राज्य यहोवा का है, कि वह जातियों पर शासन करे। कुछ लोग इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं:—इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अन्यजातियाँ उस परमेश्वर को आदर देने के लिए विवश की जाएँ, जिसने उन्हें रचा और जिसके हाथ से उनका शासन होता है, यद्यपि उसने उनके साथ जीवन की वाचा नहीं बाँधी। परन्तु मैं इसे एक दुर्बल और असन्तोषजनक व्याख्या समझकर अस्वीकार करता हूँ। मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह खण्ड उन बहुत सी अन्य भविष्यद्वाणियों से मेल खाता है जो परमेश्वर के सिंहासन को ऐसा स्थापित किया हुआ दिखाती हैं, जिस पर मसीह बैठकर संसार की देखरेख और शासन करे। इसलिए यद्यपि परमेश्वर का विधान सारे संसार पर फैला हुआ है, और उसका कोई भाग इससे अलग नहीं है; तौभी हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह सचमुच अपना अधिकार तब चलाता है, जब अज्ञान के अन्धकार को दूर करके और अपने वचन की ज्योति फैलाकर वह अपने सिंहासन पर स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। उसके राज्य का ऐसा ही वर्णन यशायाह भविष्यद्वक्ता करता है, "वह जाति जाति का न्याय करेगा, और देश देश के लोगों के झगड़ों को मिटाएगा।" (यशायाह 2:4) इसके अतिरिक्त, क्योंकि परमेश्वर ने संसार को तब तक अपने अधीन नहीं किया था जब तक कि वे लोग, जो पहले अजेय थे, सुसमाचार के प्रचार के द्वारा स्वेच्छापूर्ण आज्ञाकारिता के अधीन न कर दिए गए, इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह परिवर्तन केवल मसीह के प्रबन्ध और शासन के अधीन ही सम्पन्न हुआ। यदि यह आपत्ति की जाए कि सारा संसार अब तक कभी परिवर्तित नहीं हुआ, तो इसका समाधान सहज है। यहाँ उस विलक्षण काल की, जिसमें परमेश्वर सुसमाचार के प्रचार के द्वारा अचानक सब कहीं जाना गया, उस प्राचीन व्यवस्था-काल से तुलना की गई है, जब उसने अपने ज्ञान को यहूदिया की सीमाओं के भीतर बन्द कर रखा था। हम जानते हैं कि मसीह बिजली की कौंध के समान अद्भुत वेग से पूर्व से पश्चिम तक जा पहुँचा, ताकि संसार के सब भागों से अन्यजातियों को कलीसिया में ले आए।

क्योंकि यह नहीं कहा गया कि वे क्या स्मरण करेंगे, इसलिए कुछ टीकाकार इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं: कि वे पश्चात्ताप के साथ अपने पापों को, और विशेष रूप से अपनी मूर्तिपूजा को, स्मरण करेंगे। दूसरे कहते हैं कि वे खोए हुए संसार के प्रति मसीह के द्वारा प्रकट परमेश्वर की भलाई और दया को स्मरण करेंगे। और कुछ और कहते हैं कि वे उस परमेश्वर को स्मरण करेंगे जिसे वे भूल गए थे, और जिसके स्थान पर वे लकड़ी और पत्थरों की उपासना करते थे। यह अन्तिम मत ही वह प्रतीत होता है जिसकी ओर कैल्विन संकेत करता है।—वह कारण कि अन्यजातियाँ क्यों स्मरण करेंगी और प्रभु की ओर फिरेंगी।

29. पृथ्वी के सब हृष्ट-पुष्ट लोग खाएँगे और दण्डवत् करेंगे। कहीं यह असंगत न समझा जाए कि अब पृथ्वी के हृष्ट-पुष्ट लोग इस भोज में अतिथि के रूप में सम्मिलित किए जाते हैं, जिसे दाऊद ने ठीक पहले केवल दीनों के लिए ठहराया हुआ प्रतीत होता था, हमें स्मरण रखना चाहिए कि पहला स्थान दीनों को इसलिए दिया गया क्योंकि दाऊद के उदाहरण में मुख्यतः उन्हीं के लिए सान्त्वना प्रस्तुत की गई थी। तौभी यह आवश्यक था कि दूसरे स्थान पर धनी और समृद्ध लोग भी भोज में बुलाए जाएँ, ताकि वे अपने आप को उसी अनुग्रह की सहभागिता से वंचित न समझें। यह सच है कि वर्तमान विपत्तियों का दबाव उन्हें शोक के लिए सान्त्वना खोजने को विवश नहीं करता, परन्तु उन्हें एक ऐसी औषधि की आवश्यकता है जो उन्हें अपने सुख-भोगों में मतवाले होने से रोके, और उन्हें इसके बजाय अपना आनन्द स्वर्ग में संचित करने को उभारे। फिर, क्योंकि वे भी नाना प्रकार के कष्टों के अधीन हैं, इसलिए यदि उनकी भरपूरी उनके मनों को पृथ्वी ही से बाँधे रखे, तो वह उनके लिए शाप बन जाएगी। भजनकार के कथन का सार यह है कि यह बलिदान उनके लिए जो स्वस्थ, बलवन्त और सम्पन्न दशा में हैं, उतना ही सामान्य होगा जितना उनके लिए जो दुबले, दरिद्र और भोजन के अभाव से अधमरे हैं; ताकि पहले वाले अपना घमण्ड छोड़कर परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करें, और दूसरे वाले, यद्यपि वे नीचे गिराए गए हों, आत्मिक आनन्द के द्वारा अपने मनों को सब अच्छी वस्तुओं के कर्ता परमेश्वर की ओर उठाएँ, जैसा कि याकूब (याकूब 1:9, 10) इन शब्दों में दोनों वर्गों को चेतावनी देता है, "दीन भाई अपने ऊँचे पद पर घमण्ड करे, और धनवान अपनी नीच दशा पर।" अब यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के अधीन तृप्त को भूखे के साथ, कुलीन को साधारण के साथ, और सुखी को दुःखी के साथ जोड़ा, तो आज के दिन सुसमाचार के अधीन यह कहीं अधिक होना चाहिए। इसलिए जब धनी लोग सुनते हैं कि उन्हें पार्थिव भरपूरी के अतिरिक्त कहीं और भोजन दिया जाता है, तो वे सीखें कि परमेश्वर ने वर्तमान जीवन के प्रयोजनों के लिए जो बाहरी अच्छी वस्तुएँ उन्हें दी हैं, उनका उपयोग ऐसे संयम से करें कि वे आत्मिक भोजन से ऊब न जाएँ, या अरुचि के कारण उससे मुँह न फेर लें। जब तक वे अपनी ही मलिनता में लोटते रहेंगे, तब तक वे कभी पवित्र अभिलाषा से इस भोजन की लालसा नहीं करेंगे; और यद्यपि वह उनके हाथ में हो, तौभी वे उसे चखने में कभी आनन्द नहीं पाएँगे ("Et encores qu'ils les ayent en main, ils ne pourront prendre plaisir in les savourer." — फ्रांसीसी.)। फिर, जैसे हृष्ट-पुष्ट लोगों को दुबला होना चाहिए, ताकि वे खिलाए-पिलाए और पोषित किए जाने के लिए अपने आप को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करें, वैसे ही दाऊद भूखों में निश्चित और निर्भीक भरोसा उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है, कहीं ऐसा न हो कि उनकी दरिद्रता उन्हें भोज में आने से रोके। हाँ, वह मृतकों को भी भोज में आने का निमन्त्रण देता है, ताकि सबसे तुच्छ समझे जानेवाले, और वे जो संसार की दृष्टि में लगभग सड़ती हुई लोथों के समान हैं, प्रभु की पवित्र मेज़ पर अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित और साहसी बनें। पद के अन्त में भजनकार जो वचन का परिवर्तन बहुवचन से एकवचन में करता है, वह अर्थ को कुछ धुँधला कर देता है; परन्तु निःसन्देह अभिप्राय यह है कि वे भी, जो पहले ही धूल में मिलाए हुए प्रतीत होते हैं, और जिनके मृत्यु से जीवन में लौटाए जाने की मानो कोई आशा नहीं रही, उसके साथ उसी अनुग्रह के सहभागी होंगे।

भजन 22:30-31

30. उनका वंश उसकी सेवा करेगा, और पीढ़ी-पीढ़ी के लिए प्रभु के नाम लिखा जाएगा। 31. वे आएँगे, और उत्पन्न होनेवाली प्रजा के सामने उसकी धार्मिकता का वर्णन करेंगे, क्योंकि उसी ने यह किया है।

30. उनका वंश उसकी सेवा करेगा। उपकार की महानता को और भी ऊँचा उठाने के लिए वह घोषणा करता है कि वह ऐसा होगा कि आनेवाली पीढ़ियाँ उसे कभी नहीं भूलेंगी। और वह दिखाता है कि वह किस प्रकार स्थायी बना रहेगा, अर्थात् इसलिए कि संसार का वह परिवर्तन, जिसकी उसने चर्चा की है, केवल थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि युग-युग तक बना रहेगा। इससे हम फिर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यहाँ जिसका गुणगान किया गया है, वह अन्यजातियों के सामने परमेश्वर की महिमा का ऐसा प्रकटीकरण नहीं जो किसी क्षणिक और मिटनेवाली अफ़वाह से उत्पन्न हो, बल्कि ऐसा जो समय के अन्त तक अपनी किरणों से संसार को प्रकाशित करता रहेगा। इसलिए यहाँ कलीसिया की निरन्तरता भरपूरी से, और बहुत स्पष्ट शब्दों में, सिद्ध होती है: इसलिए नहीं कि वह सदा फलती-फूलती रहती है या क्रमागत युगों में एक ही समान मार्ग पर चलती रहती है, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर, यह न चाहते हुए कि उसका नाम संसार से मिट जाए, सदा कुछ लोगों को खड़ा करता रहेगा जो सच्चे मन से अपने आप को उसकी सेवा में समर्पित करें। हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह वंश, जिसमें परमेश्वर की सेवा सुरक्षित रहनी थी, अविनाशी बीज का फल है; क्योंकि परमेश्वर अपनी कलीसिया को केवल अपने वचन के द्वारा ही जन्म देता और बढ़ाता है।

यह अभिव्यक्ति, पीढ़ी-पीढ़ी के लिए प्रभु के नाम लिखा जाना, दो प्रकार से समझाई जाती है। कुछ लोग इब्रानी शब्द דור दोर को युगों के क्रम के अर्थ में लेते हैं, और वाक्यांश की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: वे युग-युग प्रभु के नाम लिखे जाएँगे। दूसरे इसे उस अर्थ में "पीढ़ी" लेते हैं जिसमें लातीनी भाषा में natio [जाति] शब्द का प्रयोग होता है। क्योंकि ये दोनों अर्थ भली-भाँति उपयुक्त हैं और लगभग एक ही बात पर पहुँचते हैं, इसलिए मैं अपने पाठकों को इनमें से चुनने की स्वतन्त्रता देता हूँ। तौभी मैं मानता हूँ कि मेरा झुकाव इस मत की ओर अधिक है कि इस शब्द के द्वारा परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा और निज जाति का संकेत है, जो परमेश्वर का निज भाग गिनी जा सके। फिर, क्योंकि यहाँ यहोवा नाम, जो परमेश्वर के सार को व्यक्त करता है, उस प्रकार प्रयुक्त नहीं हुआ जैसा थोड़ा पहले हुआ है, बल्कि अदोनै शब्द प्रयुक्त हुआ है (यहाँ इब्रानी शब्द אדני Adonai है), इसलिए मैं उन लोगों के मत को अस्वीकार नहीं करता जो सोचते हैं कि यहाँ मसीह को स्पष्ट रूप से कलीसिया पर अधिकार दिया गया है, ताकि वह उन सब को लिखे जो परमेश्वर अपने पिता के पक्ष में अपना नाम लिखवाएँ। और सचमुच, क्योंकि हमारे स्वर्गीय पिता ने अपने सब चुने हुओं को अपने ही पुत्र की रक्षा और देखरेख में सौंप दिया है, इसलिए वह मसीह के झुण्ड के लोगों को छोड़ और किसी को अपनी प्रजा नहीं मानता।

31. वे आएँगे, और वर्णन करेंगे। भजनकार यहाँ उस बात की पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि क्योंकि पिता इस उपकार का ज्ञान, मानो हाथों-हाथ, अपनी सन्तानों को सौंपेंगे, इसलिए परमेश्वर का नाम सदा प्रसिद्ध रहेगा। इससे हम यह अतिरिक्त सत्य भी निकाल सकते हैं कि केवल परमेश्वर के अनुग्रह के प्रचार के द्वारा ही कलीसिया नाश होने से बचाई जाती है। साथ ही यह ध्यान दिया जाए कि यहाँ हम पर ईश्वरीय सत्य को फैलाने में सावधानी और परिश्रम की आज्ञा दी गई है, ताकि वह हमारे इस संसार से उठा लिए जाने के बाद भी बना रहे। क्योंकि पवित्र आत्मा सब विश्वासियों पर यह कर्तव्य ठहराता है कि वे अपनी सन्तानों को शिक्षा देने में परिश्रमी हों, ताकि परमेश्वर की सेवा करने के लिए सदा एक के बाद दूसरी पीढ़ी बनी रहे, इसलिए उन लोगों का आलस्य, जिन्हें परमेश्वर के स्मरण को अनन्त मौन में गाड़ देने में अन्तःकरण का कोई संकोच नहीं—और यह पाप वस्तुतः उन सब पर लगता है जो अपनी सन्तानों से उसकी चर्चा करने की उपेक्षा करते हैं, और इस प्रकार उसके नाम को पूर्णतः नाश होने से रोकने के लिए कुछ नहीं करते—अत्यन्त घोर लज्जा का विषय ठहराकर दोषी ठहराया गया है। इस स्थान पर धार्मिकता शब्द उस विश्वासयोग्यता से सम्बन्ध रखता है जो परमेश्वर अपनी प्रजा की रक्षा में बनाए रखता है, जिसका एक स्मरणीय उदाहरण हमें दाऊद के छुटकारे में मिलता है। अपने दास को दुष्टों के उपद्रव और अत्याचार से बचाकर उसने अपने आप को धर्मी प्रमाणित किया। इससे हम सीख सकते हैं कि हमारा कल्याण परमेश्वर को कितना प्रिय है, क्योंकि वह उसे अपनी ही धार्मिकता की स्तुति के गुणगान के साथ जोड़ता है। तो यदि परमेश्वर की धार्मिकता इसमें प्रकाशमान रूप से प्रकट होती है कि वह हमारी आशा को निष्फल नहीं करता, न संकटों में हमें त्यागता है, बल्कि हमारी रक्षा करता और हमें पूर्ण सुरक्षा में रखता है, तो यह डरने का उससे अधिक कोई कारण नहीं कि वह हमारी आवश्यकता के समय हमें त्याग देगा, जितना यह डरने का कारण है कि वह अपने आप को भूल सकता है। तौभी हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस खण्ड में हमसे परमेश्वर की स्तुति के गुणगान की माँग किसी एक व्यक्ति को दी गई किसी विशेष सहायता के लिए नहीं, बल्कि मनुष्यजाति के छुटकारे के लिए की गई है। संक्षेप में, पवित्र आत्मा दाऊद के मुँह से हमें मसीह के पुनरुत्थान के प्रचार की अनुशंसा करता है।

इस भजन के अन्त में कुछ टीकाकार כי की, "क्योंकि," अव्यय को אשר अशेर, "जो," सर्वनाम में बदल देते हैं, मानो यह कहा गया हो, वह धार्मिकता जो उसने की है। परन्तु यदि हम "क्योंकि" पढ़ें और खण्ड की व्याख्या इस प्रकार करें, तो वाक्य अधिक पूर्ण होगा: वे आएँगे, और उसकी धार्मिकता का वर्णन करेंगे, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता का प्रमाण या प्रदर्शन दे दिया होगा—परिणाम के द्वारा, अर्थात् स्वयं कार्य के द्वारा, यह प्रमाण दे दिया होगा कि वह अपनी प्रजा का विश्वासयोग्य रक्षक है।

इब्रानी शब्द Adonai (अदोनै) एक ऐसी क्रिया से निकला है जिसका अर्थ है निर्देश देना, शासन करना, न्याय करना; और इसलिए इसका अर्थ है निर्देशक, शासक, न्यायी।

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