भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 1

भजन 1

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भजन 1

टीका

भजन संहिता की पुस्तक पर

भजन 1.

जिसने भजनों को एक ग्रन्थ में संकलित किया — चाहे वह एज्रा रहा हो या कोई और — उसने इस भजन को प्रस्तावना के रूप में आरम्भ में रखा प्रतीत होता है, जिसमें वह सब भक्तों पर परमेश्वर की व्यवस्था पर ध्यान करने का कर्तव्य दृढ़ता से अंकित करता है। इस सम्पूर्ण भजन का सार और तत्त्व यह है कि धन्य वे हैं जो अपना मन स्वर्गीय ज्ञान की खोज में लगाते हैं; परन्तु परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले अधर्मी लोग, यद्यपि कुछ समय तक अपने आप को सुखी समझें, फिर भी अन्त में उनका अत्यन्त दयनीय अन्त होगा।

भजन 1:1-2

1. क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता, और न ठट्ठा करनेवालों के आसन पर बैठता है। 2. परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता है; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।

1. क्या ही धन्य है वह पुरुष। भजनकार का आशय, जैसा मैं ऊपर कह चुका हूँ, यह है कि परमेश्वर के उन भक्त सेवकों का सदा भला ही होगा, जिनका निरन्तर प्रयत्न यही रहता है कि वे उसकी व्यवस्था के अध्ययन में उन्नति करें। मनुष्यजाति का अधिकांश भाग पवित्र लोगों के आचरण को निरा भोलापन कहकर उसकी हँसी उड़ाने और उनके परिश्रम को पूर्णतः व्यर्थ गया समझने का आदी है; इसलिए यह आवश्यक था कि धर्मी लोग पवित्रता के मार्ग में दृढ़ किए जाएँ — इस बात पर विचार करके कि परमेश्वर की आशीष के बिना सब मनुष्यों की दशा कितनी दयनीय है, और इस दृढ़ निश्चय के द्वारा कि परमेश्वर केवल उन्हीं पर अनुग्रह करता है जो उत्साह के साथ ईश्वरीय सत्य के अध्ययन में अपने आप को लगा देते हैं। इसके अतिरिक्त, क्योंकि संसार में भ्रष्टता सदा इतनी प्रबल रही है कि मनुष्यों के जीवन का सामान्य स्वरूप परमेश्वर की व्यवस्था से निरन्तर हटते जाने के सिवा और कुछ नहीं, इसलिए भजनकार, ईश्वरीय व्यवस्था के विद्यार्थियों की धन्यता की घोषणा करने से पहले, उन्हें चिताता है कि वे अपने चारों ओर की भीड़ की अधर्मता में बह जाने से सावधान रहें। दुष्टों के प्रति अपनी घृणा की घोषणा से आरम्भ करके वह हमें सिखाता है कि जिसने पहले अपने आप को अधर्मियों की संगति से अलग और पृथक् नहीं कर लिया, उसके लिए परमेश्वर की विधियों पर ध्यान करने में अपना मन लगाना कितना असम्भव है। निश्चय ही यह एक आवश्यक चेतावनी है; क्योंकि हम देखते हैं कि मनुष्य कितनी असावधानी से अपने आप को शैतान के फन्दों में डाल देते हैं; कम से कम, तुलना में ऐसे लोग कितने थोड़े हैं जो पाप के प्रलोभनों से अपनी रक्षा करते हैं। अपने संकट से पूर्णतः सचेत रहने के लिए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि संसार घातक भ्रष्टता से भरा हुआ है, और भले जीवन की ओर पहला कदम यह है कि अधर्मियों की संगति को त्याग दिया जाए; अन्यथा वह निश्चय ही हमें भी अपनी अशुद्धता से दूषित कर देगी।

क्योंकि भविष्यद्वक्ता सबसे पहले भक्तों को बुराई के प्रलोभनों से सावधान रहने की आज्ञा देता है, इसलिए हम भी उसी क्रम का अनुसरण करेंगे। उसका यह कथन कि धन्य वे हैं जिनकी अधर्मियों के साथ कोई सहभागिता नहीं, ऐसी बात है जिसे मनुष्यजाति की सामान्य भावना और धारणा कठिनाई से ही स्वीकार करेगी; क्योंकि यद्यपि सब मनुष्य स्वभाव से सुख की अभिलाषा और खोज करते हैं, तौभी हम देखते हैं कि वे कितनी निश्चिन्तता से अपने पापों में लिप्त रह सकते हैं; हाँ, उनमें से जो अपनी अभिलाषाओं की तृप्ति में धार्मिकता से सबसे दूर भटक गए हैं, वे ही सुखी गिने जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने मन की इच्छाएँ प्राप्त हो जाती हैं। इसके विपरीत, भविष्यद्वक्ता यहाँ यह सिखाता है कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर के भय और सेवा के लिए, और उसकी व्यवस्था के अध्ययन के लिए, तब तक उचित रूप से उत्साहित नहीं हो सकता जब तक उसे यह दृढ़ निश्चय न हो जाए कि सब अधर्मी दयनीय हैं, और जो उनकी संगति से अलग नहीं होते वे उन्हीं के साथ उसी विनाश में फँसेंगे। परन्तु क्योंकि उन अधर्मियों से, जिनके साथ हम संसार में मिले-जुले रहते हैं, ऐसे बचे रहना कि उनसे पूरी तरह पराए हो जाएँ, कोई सहज बात नहीं, इसलिए भजनकार अपनी चेतावनी को और अधिक बल देने के लिए अनेक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करता है।

पहले तो वह हमें उनकी युक्ति पर चलने से मना करता है; दूसरे, उनके मार्ग में खड़े होने से; और अन्त में, उनके आसन पर बैठने से।

सेप्तुआजिन्त में पाठ है μακαριος ἀνηρ, धन्य है वह पुरुष। कैल्विन ने और हमारे अंग्रेज़ी अनुवादकों ने भी यही अनुवाद अपनाया है। परन्तु इब्रानी शब्द אשרי, जिसका अनुवाद "धन्य" किया गया है, बहुवचन में है, और האיש ha-ish, "पुरुष", एकवचन में। इसलिए इन शब्दों को एक विस्मयादिबोधक उद्गार माना गया है, और इनका शब्दशः अनुवाद यों किया जा सकता है: अहा, उस पुरुष की धन्यताएँ! यह अभिव्यक्ति का एक सुन्दर और प्रभावशाली रूप है।

इस सबका सार यह है कि परमेश्वर के सेवकों को अधर्मी मनुष्यों के जीवन से पूर्णतः घृणा करने का प्रयत्न करना चाहिए। परन्तु क्योंकि शैतान की नीति यह है कि वह अपने छलों को अत्यन्त धूर्तता से भीतर सरका दे, इसलिए भविष्यद्वक्ता, ताकि कोई अनजाने में धोखा न खाए, यह दिखाता है कि मनुष्य साधारणतः किस प्रकार थोड़ा-थोड़ा करके सीधे मार्ग से भटकने को प्रेरित किए जाते हैं। वे पहले ही कदम में परमेश्वर के घमण्डपूर्ण तिरस्कार तक नहीं पहुँच जाते; परन्तु जब वे एक बार बुरी युक्ति पर कान देने लगते हैं, तब शैतान उन्हें कदम-कदम पर और अधिक भटकाता ले जाता है, यहाँ तक कि वे सिर के बल खुले अपराध में जा गिरते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता युक्ति से आरम्भ करता है, और इस शब्द से मैं वह दुष्टता समझता हूँ जो अभी खुलकर प्रकट नहीं होती। फिर वह मार्ग की बात करता है, जिसे जीवन की अभ्यस्त रीति या ढंग समझना चाहिए। और इस चढ़ते क्रम के शिखर पर वह आसन को रखता है, और इस रूपकात्मक अभिव्यक्ति से वह उस कठोरता को सूचित करता है जो पापमय जीवन की आदत से उत्पन्न होती है। इसी प्रकार इन तीन वाक्यांशों को भी — चलना, खड़ा होना, और बैठना — समझना चाहिए। जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी भ्रष्ट अभिलाषाओं की तृप्ति के पीछे चलता है, तब पाप करने का अभ्यास उसे ऐसा मूढ़ बना देता है कि वह अपने आप को भूलकर दुष्टता में कठोर हो जाता है; और इसी को भविष्यद्वक्ता पापियों के मार्ग में खड़ा होना कहता है। फिर अन्त में एक हताश हठ आता है, जिसे वह बैठने के रूपक से व्यक्त करता है। इब्रानी शब्दों רשעים reshaim, חטאים chataim, और לצים letsim में भी क्या यही क्रमिक चढ़ाव है, अर्थात् बुराई की क्रमशः बढ़ती हुई मात्रा, इसका निर्णय मैं दूसरों पर छोड़ता हूँ। मुझे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता, सिवाय सम्भवतः अन्तिम शब्द के। क्योंकि ठट्ठा करनेवाले वे कहलाते हैं जो परमेश्वर का सारा भय उतार फेंककर, दण्ड से बच निकलने की आशा में बेरोक-टोक पाप करते हैं, और बिना किसी पछतावे या भय के परमेश्वर के न्याय का उपहास करते हैं, मानो उन्हें कभी उसे लेखा देने के लिए बुलाया ही न जाएगा। इब्रानी शब्द חטאים chataim, क्योंकि वह खुले दुष्टों का बोध कराता है, मार्ग शब्द के साथ बहुत उचित रूप से जोड़ा गया है, जो जीवन की घोषित और अभ्यस्त रीति का द्योतक है। और यदि भजनकार के समय में परमेश्वर के भक्त उपासकों के लिए अपने जीवन को ठीक रीति से गढ़ने हेतु अधर्मियों की संगति से अलग रहना आवश्यक था, तो आज के दिनों में, जब संसार इतना अधिक भ्रष्ट हो गया है, हमें कितना अधिक सावधानी से हर संकटपूर्ण संगति से बचना चाहिए, ताकि हम उसकी अशुद्धताओं से निष्कलंक बने रहें। तौभी भविष्यद्वक्ता विश्वासियों को केवल यही आज्ञा नहीं देता कि वे अधर्मियों से दूषित होने के डर से उनसे दूर रहें, वरन् उसकी चेतावनी में यह भी निहित है कि हर एक व्यक्ति सावधान रहे कि वह स्वयं अपने आप को भ्रष्ट न करे, और न अपने आप को अधर्मता के हाथ सौंप दे। सम्भव है कि किसी मनुष्य ने बुरे उदाहरणों से अशुद्धता न ग्रहण की हो, और फिर भी वह उनके भ्रष्ट आचरण का स्वेच्छा से अनुकरण करके दुष्टों के समान बन जाए।

C'est a dire, un accroissement de mal comme par degrez. — फ्रांसीसी. Il est bien conjoint avec le verbe signifiant une profession de vivre et un train tout accoustume. — फ्रांसीसी.

Et s'adonner de soy-mesme a impiete. — फ्रांसीसी.

दूसरे पद में भजनकार, जैसा अन्य स्थानों में करता है, केवल यह नहीं कहता कि जो परमेश्वर का भय मानते हैं वे धन्य हैं, वरन् वह भक्ति को व्यवस्था के अध्ययन के द्वारा पहचान कराता है, और हमें सिखाता है कि परमेश्वर की सच्ची सेवा तभी होती है जब उसकी व्यवस्था का पालन किया जाता है।

यह हर मनुष्य पर नहीं छोड़ा गया कि वह अपने ही विचार के अनुसार धर्म की कोई व्यवस्था गढ़ ले, वरन् भक्ति का मानदण्ड परमेश्वर के वचन से लिया जाना चाहिए। जब दाऊद यहाँ व्यवस्था की बात करता है, तो इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो पवित्रशास्त्र के अन्य भाग अलग कर दिए गए हों; वरन्, क्योंकि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र व्यवस्था की व्याख्या के सिवा और कुछ नहीं, इसलिए सिर के रूप में व्यवस्था के अन्तर्गत सारा शरीर समाया हुआ है। अतः भविष्यद्वक्ता व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए शेष सब प्रेरित लेखों को भी उसमें सम्मिलित करता है। इसलिए यह समझना चाहिए कि उसका आशय विश्वासियों को भजनों के पढ़ने के लिए भी प्रेरित करना है। उसके द्वारा भक्तों को प्रभु की व्यवस्था से प्रसन्न रहनेवालों के रूप में चित्रित करने से हम यह सीख सकते हैं कि विवशता की या दासवत् आज्ञाकारिता परमेश्वर को कदापि ग्रहणयोग्य नहीं, और व्यवस्था के योग्य विद्यार्थी केवल वे ही हैं जो प्रसन्न मन से उसके पास आते हैं, और उसकी शिक्षाओं से इतने आनन्दित होते हैं कि उसमें उन्नति करने से बढ़कर किसी वस्तु को अधिक वांछनीय या मधुर नहीं समझते। व्यवस्था के इसी प्रेम से उस पर निरन्तर ध्यान करना उत्पन्न होता है, जिसका उल्लेख भविष्यद्वक्ता पद के अन्तिम भाग में करता है; क्योंकि जो सचमुच व्यवस्था के प्रेम से प्रेरित हैं, उन सबको उसके परिश्रमपूर्ण अध्ययन में आनन्द अवश्य मिलेगा।

भजन 1:3

3. वह उस वृक्ष के समान होगा जो जल की नदियों के किनारे लगाया गया है, जो अपनी ऋतु में अपना फल देता है; जिसके पत्ते नहीं मुरझाएँगे; और जो कुछ वह करेगा वह सफल होगा।

भजनकार यहाँ पिछले पद में कही गई बात को एक रूपक के द्वारा स्पष्ट करता है और साथ ही उसकी पुष्टि भी करता है; क्योंकि वह दिखाता है कि जो परमेश्वर का भय मानते हैं वे किस अर्थ में धन्य गिने जाने चाहिएँ — अर्थात् इसलिए नहीं कि वे किसी क्षणिक और खोखले आनन्द का उपभोग करते हैं, वरन् इसलिए कि वे एक वांछनीय दशा में हैं। इन शब्दों में एक निहित विरोध है: एक ओर भरपूर सींचे हुए स्थान में लगाए गए वृक्ष की हरियाली और बल, और दूसरी ओर उस वृक्ष का मुरझाया हुआ रूप जो, चाहे कुछ समय तक सुन्दरता से फूले-फले, तौभी जिस भूमि में वह लगा है उसकी बंजरता के कारण शीघ्र सूख जाता है। जहाँ तक अधर्मियों का सम्बन्ध है, जैसा हम आगे देखेंगे, (भजन 37:35) वे कभी-कभी "लबानोन के देवदारों" के समान होते हैं। उनके पास धन और सम्मान की ऐसी उमड़ती हुई बहुतायत होती है कि उनके वर्तमान सुख में कुछ भी घटी नहीं जान पड़ती। परन्तु वे चाहे कितने ही ऊँचे उठाए जाएँ, और अपनी डालियाँ कितनी ही दूर-दूर तक फैलाएँ, तौभी क्योंकि उनकी जड़ भूमि में नहीं है, और न उन्हें इतनी नमी ही मिलती है जिससे वे पोषण पा सकें, इसलिए उनकी सारी शोभा थोड़े ही समय में लुप्त होकर मुरझा जाती है। अतः केवल परमेश्वर की आशीष ही किसी को समृद्ध दशा में बनाए रखती है। जो लोग विश्वासियों के अपनी ऋतु में फल लाने के रूपक की व्याख्या यों करते हैं कि वे बुद्धिमानी से पहचान लेते हैं कि कोई काम कब करना चाहिए ताकि वह भली-भाँति हो, वे मेरी समझ में विवेक से अधिक चतुराई दिखाते हैं, क्योंकि वे भविष्यद्वक्ता के शब्दों पर ऐसा अर्थ थोपते हैं जो उसका कभी अभिप्राय नहीं था। उसका स्पष्ट आशय इससे अधिक कुछ नहीं था कि परमेश्वर की सन्तान निरन्तर फलती-फूलती रहती है, और ईश्वरीय अनुग्रह के गुप्त प्रभावों से सदा सींची जाती है, यहाँ तक कि उन पर जो कुछ भी आ पड़े वह उनके उद्धार के लिए सहायक होता है; जबकि दूसरी ओर, अधर्मी अचानक आई आँधी से उड़ा लिए जाते हैं, या झुलसानेवाली गर्मी से भस्म हो जाते हैं। और जब वह कहता है, वह अपनी ऋतु में अपना फल देता है, तो वह उत्पन्न हुए फल की पूर्ण परिपक्वता को व्यक्त करता है; जबकि अधर्मी, यद्यपि समय से पहले फलवन्त होने का रूप दिखाएँ, तौभी ऐसा कुछ उत्पन्न नहीं करते जो पूर्णता तक पहुँचे।

भजन 1:4

4. दुष्ट ऐसे नहीं हैं; वे उस भूसी के समान हैं जिसे पवन उड़ा ले जाता है।

भजनकार उचित रूप से अधर्मियों की तुलना ऐसे वृक्ष से कर सकता था जो शीघ्र सूख जाता है, जैसे यिर्मयाह उनकी उपमा जंगल में उगनेवाले अधमुए पेड़ से देता है (यिर्मयाह 17:6)। परन्तु इस रूपक को पर्याप्त प्रबल न समझकर वह एक और रूपक का प्रयोग करके उन्हें नीचा दिखाता है, जो उन्हें और भी अधिक तुच्छ रूप में प्रस्तुत करता है; और इसका कारण यह है कि उसकी दृष्टि उस समृद्ध दशा पर नहीं टिकी है जिस पर वे थोड़े समय तक घमण्ड करते हैं, वरन् उसका मन गम्भीरता से उस विनाश पर विचार कर रहा है जो उनकी बाट जोह रहा है और अन्त में उन्हें आ घेरेगा। अतः अर्थ यह है कि यद्यपि अधर्मी अभी समृद्धि में जीते हैं, तौभी थोड़े ही समय में वे भूसी के समान हो जाएँगे; क्योंकि जब प्रभु उन्हें नीचे गिरा देगा, तब वह उन्हें अपने क्रोध के झोंके से इधर-उधर उड़ा देगा। इसके अतिरिक्त, इस कथन-शैली के द्वारा पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि जो बात अन्यथा अविश्वसनीय लग सकती है, उसे हम विश्वास की आँख से देखें; क्योंकि यद्यपि अधर्मी मनुष्य ऊँचा उठे और किसी भव्य वृक्ष के समान बड़ा शोभायमान दिखाई दे, तौभी हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि जब कभी परमेश्वर उसे अपने मुँह की फूँक से उसके ऊँचे पद से नीचे गिराना चाहेगा, तब वह भूसी या कूड़े-करकट के समान ही हो जाएगा।

"और वह अपनी सारी उपज को परिपक्वता तक पहुँचाता है।" — (स्ट्रीट का भजन संहिता का नया शाब्दिक अनुवाद, New Literal Version of the Psalms।)

भजन 1:5-6

5. इस कारण दुष्ट लोग न्याय में स्थिर न रहेंगे, और न पापी धर्मियों की मण्डली में। 6. क्योंकि यहोवा धर्मियों का मार्ग जानता है; परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा।

पाँचवें पद में भविष्यद्वक्ता सिखाता है कि सुखी जीवन शुद्ध विवेक पर निर्भर है, और इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अधर्मी उस सुख से अचानक गिर पड़ें जिसके स्वामी होने की वे कल्पना करते थे। और इन शब्दों में एक प्रकार की स्वीकारोक्ति निहित है; भविष्यद्वक्ता चुपचाप यह मान लेता है कि जब तक संसार में नैतिक अव्यवस्था का राज्य रहता है, तब तक अधर्मी अपने आप को प्रसन्न रखते, सुख भोगते और विजय का उल्लास मनाते हैं; ठीक वैसे ही जैसे डाकू, न्याय की पहुँच से बाहर रहते हुए, जंगलों और गुफाओं में रंगरलियाँ मनाते हैं। परन्तु वह हमें निश्चय दिलाता है कि बातें सदा अपनी वर्तमान गड़बड़ी की दशा में नहीं रहेंगी, और जब वे उचित क्रम में ला दी जाएँगी, तब ये अधर्मी लोग अपने सुखों से पूर्णतः वंचित कर दिए जाएँगे, और अनुभव करेंगे कि जब वे अपने आप को सुखी समझते थे, तब वे मूढ़ता में पड़े थे। अब हम देखते हैं कि भजनकार अधर्मियों को दयनीय क्यों ठहराता है: क्योंकि सुख शुद्ध विवेक की भीतरी आशीष है। वह इस बात से इनकार नहीं करता कि न्याय के सामने खींचे जाने से पहले उनके सब काम सफल होते हैं; परन्तु वह इस बात से इनकार करता है कि वे सुखी हैं, जब तक कि उन्हें सँभालनेवाली ठोस और स्थिर खराई उनके चरित्र में न हो: क्योंकि धर्मियों की सच्ची खराई तभी प्रकट होती है जब अन्त में उसकी परीक्षा होती है। यह सच है कि प्रभु प्रतिदिन धर्मियों और दुष्टों में भेद करके न्याय करता है, परन्तु क्योंकि इस जीवन में यह केवल आंशिक रूप से होता है, इसलिए यदि हम धर्मियों की उस मण्डली को देखना चाहते हैं जिसका यहाँ उल्लेख है, तो हमें और ऊपर दृष्टि लगानी होगी।

इस संसार में भी, जब-जब परमेश्वर अपने न्याय के चिह्न प्रकट करता है, तब-तब अधर्मियों की समृद्धि ढलने लगती है; (क्योंकि तब वे नींद से जगाए जाकर, चाहे-अनचाहे, यह मानने को विवश होते हैं कि धर्मियों की मण्डली में उनका कोई भाग नहीं;) परन्तु क्योंकि वर्तमान दशा में यह न तो सदा पूरा होता है और न सब मनुष्यों के विषय में, इसलिए हमें धीरज से उस अन्तिम प्रकाशन के दिन की बाट जोहनी चाहिए, जिसमें मसीह भेड़ों को बकरियों से अलग करेगा। साथ ही, हमें इसे एक सामान्य सत्य के रूप में दृढ़ता से थामे रहना चाहिए कि अधर्मी दुर्दशा के लिए ठहराए गए हैं; क्योंकि उनका अपना ही विवेक उनकी दुष्टता के कारण उन्हें दोषी ठहराता है; और जब-जब उन्हें अपने जीवन का लेखा देने के लिए बुलाया जाता है, तब-तब उनकी नींद टूट जाती है, और वे जान लेते हैं कि जब वे अपने हृदय की सच्ची दशा को भीतर झाँककर देखे बिना अपने आप को सुखी समझ रहे थे, तब वे केवल स्वप्न देख रहे थे।

इसके अतिरिक्त, क्योंकि यहाँ सब बातें संयोग की दया पर इधर-उधर धकेली जाती प्रतीत होती हैं, और चारों ओर छाई इस गड़बड़ी के बीच भजनकार की कही बात की सच्चाई को स्वीकार करना हमारे लिए सहज नहीं, इसलिए वह हमारे विचार के लिए यह महान् सिद्धान्त प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर संसार का न्यायी है। यह मान लेने पर, यह निष्कर्ष निकलता है कि सीधे और धर्मी लोगों का भला होना अनिवार्य है, जबकि दूसरी ओर, अधर्मियों पर अत्यन्त भयानक विनाश अवश्य मँडराता है। सारे बाहरी रूप के अनुसार, परमेश्वर के सेवकों को अपनी सीधाई से कोई लाभ न मिलता दिखाई दे; परन्तु क्योंकि उनकी रक्षा करना और उनके कुशल-क्षेम की चिन्ता करना परमेश्वर का विशेष कार्य है, इसलिए उसकी शरण में वे अवश्य सुखी रहेंगे। और इससे हम यह निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं कि, क्योंकि वह दुष्टता का निश्चित पलटा लेनेवाला है, इसलिए यद्यपि कुछ समय तक वह अधर्मियों पर ध्यान न देता हुआ प्रतीत हो, तौभी अन्त में वह उन पर विनाश लाएगा। इसलिए उनके काल्पनिक सुख से अपने आप को धोखा खाने देने के बदले, आइए हम संकट की परिस्थितियों में परमेश्वर के विधान को सदा अपनी आँखों के सामने रखें, जिसका काम है संसार के मामलों को व्यवस्थित करना और गड़बड़ी में से व्यवस्था उत्पन्न करना।

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