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भजन 9
दाऊद, अपनी पिछली विजयों का वर्णन करने और उनके सुखद परिणाम में प्रकट हुए परमेश्वर के अनुग्रह और सामर्थ्य का उच्च स्वरों में गुणगान करने के पश्चात्, अब फिर से, जब वह नए शत्रुओं और नए संकटों को उठते देखता है, उसी परमेश्वर से सुरक्षा की याचना करता है जिसके द्वारा वह पहले छुड़ाया गया था, और उससे विनती करता है कि वह उसके शत्रुओं के घमण्ड को उलट दे।
प्रधान बजानेवाले के लिये: अल्मूत लबेन पर। दाऊद का भजन। इस शीर्षक की व्याख्या अनेक प्रकार से की जाती है। कुछ लोग इसका अनुवाद करते हैं, “लबेन की मृत्यु पर,” और उनका मत है कि वह दाऊद के शत्रुओं के प्रमुख सेनापतियों में से एक था। दूसरे लोग यह मानने की ओर झुकते हैं कि यह कोई कल्पित नाम था, और इस भजन में जिस व्यक्ति की चर्चा है वह गोलियत है। कुछ अन्य लोगों के अनुसार यह कोई वाद्य-यन्त्र था। परन्तु मुझे यह मत अधिक सही, अथवा कम से कम (जैसा कि विषय अस्पष्ट होने पर मैं कहने का अभ्यस्त हूँ) अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि यह किसी सुप्रसिद्ध गीत का आरम्भ था, जिसकी धुन पर यह भजन रचा गया। दाऊद यहाँ किस विजय का उत्सव मनाता है, इस विषय में व्याख्याकारों के विवाद मेरे विचार में अनावश्यक हैं और किसी अच्छे प्रयोजन को सिद्ध नहीं करते। पहली बात तो यह है कि उनका यह मत, कि यह विजय का गीत है जिसमें दाऊद केवल परमेश्वर का धन्यवाद करता है, भजन के उद्देश्य से ही खण्डित होता है और भ्रान्त सिद्ध होता है। इसका अधिकांश भाग तो निस्सन्देह परमेश्वर की स्तुति गाने में लगा है, परन्तु सम्पूर्ण भजन को एक प्रार्थना ही समझना चाहिए; जिसमें वह, परमेश्वर पर भरोसे के लिए अपने मन को ऊपर उठाने के उद्देश्य से, अपनी सामान्य रीति के अनुसार स्मरण करता है कि परमेश्वर के सामर्थ्य के कैसे अद्भुत प्रदर्शनों के द्वारा वह पहले अपने शत्रुओं की हिंसा और बल से छुड़ाया गया था। अतः इस धन्यवाद को, जिसमें उसका अभिप्राय अनेक छुटकारों को सम्मिलित करना था, एक ही विजय तक सीमित करना भूल है। [“Comme on a accoustum de parler quand la chose est obscure.” — फ्रांसीसी.]
भजन 9:1-3
1. मैं अपने सम्पूर्ण मन से यहोवा की स्तुति करूँगा; मैं तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन करूँगा। 2. मैं तुझ में आनन्दित और प्रफुल्लित होऊँगा; हाँ, हे परमप्रधान, मैं गीतों में तेरे नाम का गुणगान करूँगा। 3. जब मेरे शत्रु पीछे हटते हैं, तब वे तेरे सम्मुख से गिर पड़ते और भगा दिए जाते हैं।
1. मैं प्रभु की स्तुति करूँगा। दाऊद इस रीति से भजन का आरम्भ इसलिए करता है कि परमेश्वर को उन विपत्तियों में अपनी सहायता करने के लिए प्रेरित करे जिनसे वह उस समय पीड़ित था। जैसे परमेश्वर अपने लोगों पर बिना किसी अन्तराल के अपनी कृपा बनाए रखता है, वैसे ही जो कुछ भलाई उसने अब तक हमारे साथ की है, वह सब हममें यह भरोसा और आशा उत्पन्न करनेवाली होनी चाहिए कि आनेवाले समय में भी वह हम पर अनुग्रहकारी और दयालु रहेगा। इन शब्दों में निस्सन्देह उन उपकारों के लिए कृतज्ञता का अंगीकार है जो उसने परमेश्वर से पाए थे; परन्तु उसकी पिछली दयाओं को स्मरण करते हुए वह स्वयं को भविष्य के संकटों में भी सहायता और सहारे की आशा रखने के लिए उत्साहित करता है; और इस रीति से वह प्रार्थना का द्वार खोलता है। “सम्पूर्ण मन” से तात्पर्य सीधे अथवा निष्कपट मन से है, जो कपटी, दोहरे मन के विपरीत है। इस प्रकार वह स्वयं को न केवल उन घोर कपटियों से अलग करता है जो अपने हृदय के किसी भी रीति से प्रभावित हुए बिना केवल बाहरी होंठों से परमेश्वर की स्तुति करते हैं, वरन् यह भी स्वीकार करता है कि उसने अब तक जो कुछ प्रशंसनीय किया था, वह पूर्णतया परमेश्वर के शुद्ध अनुग्रह से ही निकला था। मैं मानता हूँ कि अधर्मी मनुष्य भी, जब कोई स्मरणीय विजय प्राप्त करते हैं, तो परमेश्वर को उस स्तुति से वंचित करने में लज्जित होते हैं जो उसका हक़ है; परन्तु हम देखते हैं कि जैसे ही वे परमेश्वर से मिली सहायता को स्वीकार करते हुए एक भी वाक्य बोल चुकते हैं, वैसे ही तुरन्त ऊँचे स्वर से डींग मारने और अपने ही पराक्रम के सम्मान में विजय-गीत गाने लगते हैं, मानो वे परमेश्वर के किसी भी प्रकार ऋणी न हों। संक्षेप में, जब वे यह अंगीकार करते हैं कि उनके पराक्रम के कार्य परमेश्वर की सहायता से हुए हैं, तब यह निरा उपहास ही है; क्योंकि उसे भेंट चढ़ाने के पश्चात् वे अपनी ही युक्तियों, कौशल, साहस और साधनों के आगे बलि चढ़ाते हैं। देखिए, हबक्कूक भविष्यद्वक्ता एक अहंकारी राजा के व्यक्तित्व के अधीन किस बुद्धिमानी से उस महत्त्वाकांक्षा को डाँटता है जो सब में सामान्य रूप से पाई जाती है (हबक्कूक 1:16)। हाँ, हम देखते हैं कि प्राचीन काल के वे प्रसिद्ध सेनापति, जो किसी युद्ध से विजयी होकर लौटने पर चाहते थे कि उनके नाम से देवताओं के लिए सार्वजनिक और विधिवत् धन्यवाद-उत्सव ठहराए जाएँ, अपने झूठे देवताओं का आदर करने की बात सबसे कम सोचते थे; वरन् वे केवल झूठे बहाने से उनके नामों का दुरुपयोग करते थे, ताकि इस प्रकार उन्हें व्यर्थ डींग मारने का अवसर मिले और उनका अपना श्रेष्ठ पराक्रम स्वीकार किया जाए। इसलिए दाऊद उचित ही यह कहता है कि वह इस संसार की सन्तानों के समान नहीं है, जिनका कपट या छल उस दुष्ट और बेईमान बँटवारे से प्रकट हो जाता है जो वे परमेश्वर और अपने बीच करते हैं, और जिस स्तुति को वे परमेश्वर को देने का दिखावा करते थे उसका अधिकांश भाग अपने लिए हड़प लेते हैं। उसने सम्पूर्ण मन से परमेश्वर की स्तुति की, जो उन्होंने नहीं की; क्योंकि निश्चय ही जब कोई नश्वर मनुष्य उस महिमा का छोटे से छोटा अंश भी अपना लेने का दुस्साहस करता है जिसे परमेश्वर अपने लिए माँगता है, तो वह सम्पूर्ण मन से परमेश्वर की स्तुति करना नहीं है। परमेश्वर यह सहन नहीं कर सकता कि उसकी महिमा तनिक भी सृष्टि के द्वारा हड़प ली जाए; उसके लिए उन लोगों का पवित्र-वस्तु-अपहारी अहंकार इतना असहनीय है जो अपनी प्रशंसा करके, जहाँ तक उनसे हो सकता है, उसकी महिमा को धुँधला कर देते हैं।
अथवा, “आनन्द से उछलूँगा।” इब्रानी शब्द אעלצה का यही ठीक-ठीक अर्थ है। सेप्टुआजिंट इसका अनुवाद ἀγαλλιάσομαι करता है, जिसका अर्थ भी यही है।
“Et sont ruinez devant ta face.” — फ्रांसीसी. “और तेरे मुख के सामने ढा दिए जाते हैं।”
“Doit servir pour nous asseurer et faire esperer qu'il nous sera propice et debonnaire, l'advenir.” — फ्रांसीसी.
“De la faveur qu'il a receu, de Dieu.” — फ्रांसीसी.
मैं तेरे सब आश्चर्यकर्मों का वर्णन करूँगा। यहाँ दाऊद उस बात की पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि वह इस भजन में केवल एक विजय अथवा एक ही छुटकारे की चर्चा नहीं करता; क्योंकि वह सामान्य रूप से उन सब आश्चर्यकर्मों को, जो परमेश्वर ने उसके पक्ष में किए थे, मनन के विषय के रूप में अपने सामने रखता है। “आश्चर्यजनक” शब्द को वह परमेश्वर से प्राप्त सब उपकारों पर नहीं, वरन् उन अधिक उल्लेखनीय और स्मरणीय छुटकारों पर लागू करता है जिनमें ईश्वरीय सामर्थ्य का उज्ज्वल और प्रभावशाली प्रकटीकरण दिखाई दिया था। परमेश्वर चाहता है कि हम उसे अपनी सब आशिषों का कर्ता मानें; परन्तु अपने कुछ वरदानों पर उसने अधिक स्पष्ट चिह्न अंकित कर दिए हैं, ताकि हमारी इन्द्रियों को, जो अन्यथा मानो सोई हुई या मरी हुई रहती हैं, और भी प्रभावशाली रीति से जगाए। इसलिए दाऊद के शब्द यह स्वीकारोक्ति हैं कि वह साधारण साधनों से नहीं, वरन् परमेश्वर के उस विशेष सामर्थ्य से बचाया गया था जो इस विषय में स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ; क्योंकि परमेश्वर ने आश्चर्यजनक रीति से, और सामान्य तथा प्रचलित मार्ग से ऊपर उठकर, अपना हाथ बढ़ाया था। [“Processions.” — फ्रांसीसी.]
“Afin que leurs belles prouesses veissent en cognaissance.” — फ्रांसीसी.
“Qu'ils sont entre Dieu et eux.” — फ्रांसीसी.
2. मैं तुझ में आनन्दित और प्रफुल्लित होऊँगा। ध्यान दीजिए कि विश्वासी लोग परमेश्वर की स्तुति निष्कपटता से और बिना कपट के तब करते हैं, जब वे अपने सुख के लिए अपने ऊपर निर्भर नहीं रहते, और मूर्खतापूर्ण तथा शारीरिक घमण्ड से मतवाले नहीं होते, वरन् केवल परमेश्वर में आनन्दित होते हैं; जिसका अर्थ इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं कि अपने आनन्द का कारण परमेश्वर की कृपा में ढूँढें, किसी और स्रोत में नहीं, क्योंकि सिद्ध सुख उसी में निहित है। मैं तुझ में आनन्दित होऊँगा। हमें विचार करना चाहिए कि जिस आनन्द को मनुष्य अपने भीतर पाने का प्रयत्न करते हैं और जिस आनन्द को वे परमेश्वर में खोजते हैं, उन दोनों के स्वभाव में कितना बड़ा अन्तर और विरोध है। दाऊद, और भी प्रबलता से यह व्यक्त करने के लिए कि वह ऐसी हर वस्तु का त्याग करता है जो उसे व्यर्थ आनन्द में बाँधे रख सके या उलझा सके, “प्रफुल्लित होऊँगा” शब्द जोड़ता है, जिससे उसका अभिप्राय यह है कि वह परमेश्वर में आनन्द की ऐसी पूर्ण और उमड़ती हुई बहुतायत पाता है कि उसे किसी और स्थान में उसकी एक छोटी-सी बूँद भी खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। इसके अतिरिक्त, जो मैं पहले कह चुका हूँ उसे स्मरण रखना महत्त्वपूर्ण है, कि दाऊद ईश्वरीय भलाई की उन गवाहियों को, जिनका उसने पहले अनुभव किया था, अपने सामने इसलिए रखता है कि वह स्वयं को और भी उत्साह के साथ परमेश्वर के सामने अपना हृदय खोलने और अपनी प्रार्थनाएँ उसके सम्मुख रखने के लिए प्रोत्साहित करे। जो व्यक्ति अपनी प्रार्थना का आरम्भ यह कहकर करता है कि परमेश्वर ही उसके आनन्द का महान स्रोत और विषय है, वह प्रार्थना के सुननेवाले के सामने अपनी विनतियाँ प्रस्तुत करने में पहले से ही अत्यन्त दृढ़ भरोसे से स्वयं को सुदृढ़ कर लेता है।
3. जब मेरे शत्रु पीछे हटते हैं। इन शब्दों में वह कारण बताता है कि वह परमेश्वर की स्तुति गाने का बीड़ा क्यों उठाता है, अर्थात् इसलिए कि वह मानता है कि उसकी बार-बार की विजयें न तो उसके अपने बल से, और न उसके सैनिकों के बल से, वरन् परमेश्वर की सेंतमेंत कृपा से प्राप्त हुई थीं। पद के पहले भाग में वह ऐतिहासिक रूप से वर्णन करता है कि उसके शत्रु किस प्रकार परास्त हुए अथवा भगा दिए गए; और फिर वह वह बात जोड़ता है जिसे कहने में केवल विश्वास ही उसे समर्थ कर सकता था, कि यह मनुष्य के बल से या संयोग से नहीं हुआ, वरन् इसलिए हुआ कि परमेश्वर उसकी ओर से लड़ा, और युद्ध में उनके विरुद्ध खड़ा हुआ। वह कहता है, वे गिर पड़ते और तेरे सम्मुख से भगा दिए जाते हैं। इसलिए दाऊद ने बुद्धिमानी से काम किया, जब अपने शत्रुओं को पीठ फेरते देखकर उसने अपने मन की आँखें परमेश्वर की ओर उठाईं, ताकि यह समझ सके कि विजय उसे परमेश्वर की गुप्त और अगम्य सहायता के अतिरिक्त और किसी स्रोत से नहीं मिली। और निस्सन्देह वही अकेला है जो सीधे-सादे लोगों का बुद्धि के आत्मा द्वारा मार्गदर्शन करता है, जबकि चतुरों पर पागलपन डालता है और उन्हें विस्मय से मारता है,—जो मूर्छित और डरपोक लोगों में साहस फूँकता है, जबकि सबसे साहसी लोगों को भय से काँपने पर विवश करता है,—जो दुर्बलों को उनका बल लौटा देता है, जबकि बलवन्तों को निर्बल बना देता है,—जो मन हारे हुओं को अपने सामर्थ्य से सँभालता है, जबकि वीरों के हाथों से तलवार गिरवा देता है;—और अन्ततः जो युद्ध को, जैसा उसे भाए, सफल अथवा विनाशकारी परिणाम तक पहुँचाता है। इसलिए जब हम अपने शत्रुओं को उलटे हुए देखें, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि अपनी दृष्टि को उन अधर्मी मनुष्यों की नाईं, जो अपनी शारीरिक आँखों से देखते हुए भी अन्धे हैं, केवल उसी तक सीमित न कर दें जो इन्द्रियों की आँख को दिखाई देता है; वरन् हम तुरन्त इस सत्य को स्मरण करें कि जब हमारे शत्रु पीछे हटते हैं, तब वे प्रभु के सम्मुख से भगाए जाते हैं। “गिर पड़ते” और “भगा दिए जाते” क्रियाएँ इब्रानी में भविष्यत् काल में हैं, परन्तु मैंने उनका अनुवाद वर्तमान काल में किया है, क्योंकि दाऊद परमेश्वर की उस भलाई को, जो पहले उस पर प्रकट हुई थी, फिर से अपनी दृष्टि के सामने रखता है। [“Afin de deseouvrir son coeur a Dieu plus alaigrement.” — फ्रांसीसी.]
“Mais pource que Dieu a battacile pour luy. — फ्रांसीसी.
क्रिया כשל cashal में निहित भाव ठोकर खाने का है, और यहाँ इसका प्रयोग सैनिक अर्थ में हुआ है। भजन 27:2 में, जहाँ दाऊद के शत्रुओं के विषय में कहा गया है, “वे ठोकर खाकर गिर पड़े;” वहाँ “ठोकर खाने” के लिए यही क्रिया प्रयुक्त हुई है। वहाँ भाव ठीक-ठीक गिरने का नहीं, वरन् गिरने से पहले मार्ग की ठोकरों से घायल और निर्बल हो जाने का है। כשל cashal शब्द को सामने के इस खण्ड में भी उसी अर्थ का माना गया है। हैमंड कहता है, “यह उन लोगों की ओर संकेत करता है जो या तो कूच में मूर्छित हो जाते हैं या युद्ध में घायल होते हैं, अथवा विशेषकर वे जो भागते समय अपने मार्ग में कष्टदायक फन्दों से टकराते हैं, और इस प्रकार छिल जाते और लँगड़े हो जाते हैं, आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाते हैं, और इसलिए गिर पड़ते हैं, और पीछा किए जाने की सब बुरी घटनाओं के अधीन हो जाते हैं, और जैसा यहाँ है, पकड़े जाते और गिरकर नाश हो जाते हैं।”
भजन 9:4-5
4. क्योंकि तू ने मेरा न्याय और मेरा मुकद्दमा सँभाला है; तू धर्मी न्यायी के रूप में सिंहासन पर विराजमान है। 5. तू ने जाति जाति को डाँटा है; तू ने दुष्ट को नाश किया है; तू ने उनका नाम युगानुयुग के लिए मिटा दिया है।
भजनकार चौथे पद में एक कदम और आगे बढ़ता है, और घोषणा करता है कि परमेश्वर ने उसकी सहायता के लिए अपना हाथ इसलिए बढ़ाया, क्योंकि उसके शत्रु उसे अन्याय से सता रहे थे। और निश्चय ही, यदि हम परमेश्वर की सहायता का अनुग्रह पाना चाहते हैं, तो हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम उसी के झण्डे के नीचे लड़ें। इसलिए दाऊद उसे धार्मिकता का न्यायी, अथवा—जो एक ही बात है—धर्मी न्यायी कहता है; मानो वह कहता हो, परमेश्वर ने मेरे साथ अपनी सामान्य रीति और कार्य करने के अपने स्थिर नियम के अनुसार व्यवहार किया है, क्योंकि अच्छे मुकद्दमों की रक्षा का भार उठाना उसकी सामान्य रीति है। मैं इन शब्दों का अनुवाद “हे धर्मी न्यायी, तू विराजमान है,” करने की अपेक्षा “तू धर्मी न्यायी के रूप में विराजमान है,” करने की ओर अधिक झुकता हूँ, क्योंकि पहले पाठ के अनुसार अभिव्यक्ति का रूप अधिक प्रभावशाली है। इसका आशय यह है: परमेश्वर ने अन्ततः न्यायी का रूप धारण कर लिया है, और न्यायी का कार्य करने के लिए अपने न्याय-आसन पर चढ़ गया है। इसी कारण वह इस बात पर गर्व करता है कि व्यवस्था और न्याय उसके पक्ष में हैं, और घोषणा करता है कि परमेश्वर ही उसके न्याय और मुकद्दमे का पोषक था। अगले पद में जो आता है, तू ने दुष्ट को नाश [अथवा तितर-बितर] किया है, वह भी इसी विषय से सम्बन्धित है। जब वह अपने शत्रुओं को उलटे हुए देखता है, तो वह उनके विनाश पर, केवल उसी के रूप में विचार करके, आनन्दित नहीं होता; वरन् उनके अधर्म के कारण उन्हें दोषी ठहराते हुए वह कहता है कि उन्होंने वही दण्ड पाया है जिसके वे योग्य थे। “जातियों” नाम से उसका अभिप्राय यह है कि थोड़े से ही अधर्मी लोग नाश नहीं हुए, वरन् बड़ी-बड़ी सेनाएँ, हाँ, वे सब जो विभिन्न दिशाओं से उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए थे। और परमेश्वर की भलाई इस बात में और भी उज्ज्वल रूप से चमकती है कि अपने एक दास के प्रति अपनी कृपा के कारण उसने सम्पूर्ण जातियों को भी नहीं छोड़ा। जब वह कहता है, तू ने उनका नाम सदा के लिए मिटा दिया है, तो इसका अर्थ यह समझा जा सकता है कि वे फिर कभी उठ सकने की किसी आशा के बिना नाश किए गए, और अनन्त लज्जा के लिए अर्पित कर दिए गए। हम अन्यथा यह नहीं समझ सकते थे कि परमेश्वर अधर्मियों के नाम को उन्हीं के साथ कैसे गाड़ देता है, यदि हम उसे यह घोषणा करते न सुनते कि धर्मी का स्मरण सदा धन्य रहेगा (नीतिवचन 10:7)। [“C'est la face de Dieu qui les poursuit.” — फ्रांसीसी. “परमेश्वर का मुख ही उनका पीछा करता है।”]
“Ou pour juger justement.” — फ्रांसीसी हाशिया. “अथवा धार्मिकता से न्याय करने के लिए।”
भजन 9:6-8
6. हे शत्रु, उजाड़ सदा के लिए समाप्त हो गए हैं; और तू ने नगरों को नाश [अथवा ढा] दिया है; उनका स्मरण उनके साथ ही मिट गया है। 7. और यहोवा सदा विराजमान है, उसने न्याय के लिए अपना सिंहासन तैयार किया है। 8. और वह जगत का न्याय धार्मिकता से करेगा, वह जाति जाति का न्याय खराई से करेगा।
6. हे शत्रु, उजाड़ सदा के लिए समाप्त हो गए हैं। इस छठे पद की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जाती है। कुछ लोग अक्षर ה को प्रश्नवाचक चिह्न मानकर इसे प्रश्न के रूप में पढ़ते हैं, मानो दाऊद अपने शत्रुओं को सम्बोधित करके उनसे पूछ रहा हो कि क्या उन्होंने अपना विनाश का काम पूरा कर लिया है, जैसा कि उन्होंने हर वस्तु को नाश करने का निश्चय किया था; क्योंकि क्रिया תמם tamam का अर्थ कभी पूरा करना और कभी किसी वस्तु का अन्त कर देना होता है। और यदि हम यहाँ इसे इसी अर्थ में लें, तो दाऊद व्यंग्य अथवा कटाक्ष की भाषा में अपने शत्रुओं के मूर्खतापूर्ण भरोसे को डाँटता है। दूसरे लोग इस पद को बिना प्रश्न के पढ़कर व्यंग्य को और भी स्पष्ट कर देते हैं, और समझते हैं कि दाऊद इन तीन पदों में दोहरी स्थिति का वर्णन करता है: पहले (पद 6) वह अपने शत्रुओं को क्रूर हिंसा के साथ उसे सताते हुए और अपनी क्रूरता में दृढ़ हठ के साथ डटे हुए प्रस्तुत करता है, यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत होता था मानो उनका दृढ़ संकल्प यही था कि जब तक दाऊद का राज्य पूर्णतया नष्ट न हो जाए तब तक वे कभी न रुकें; और दूसरे (पद 7, 8) वह परमेश्वर को उनके ठीक सामने अपने न्याय-आसन पर विराजमान दिखाता है, ताकि उनके उन्मत्त प्रयत्नों को दबा दे। यदि यह अर्थ स्वीकार किया जाए, तो सातवें पद के आरम्भ में जो संयोजक है, जिसका अनुवाद हमने “और” किया है, उसे विरोधवाचक अव्यय “परन्तु” के रूप में इस प्रकार अनुवादित करना होगा: हे शत्रु, तू ने संहार और नगरों के विनाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहा; परन्तु अन्ततः परमेश्वर ने दिखा दिया है कि वह स्वर्ग में अपने सिंहासन पर न्यायी के रूप में विराजमान है, ताकि पृथ्वी पर जो बातें उलझी हुई हैं उन्हें उचित व्यवस्था में ले आए। दूसरों के अनुसार, दाऊद परमेश्वर का धन्यवाद इसलिए करता है कि जब अधर्मी अपने चारों ओर सर्वत्र विनाश फैलाने का पूरा निश्चय कर चुके थे, तब उसने उनके उजाड़ने के कामों का अन्त कर दिया। अन्य लोग इन शब्दों को और भी सीमित अर्थ में लेते हैं, मानो अधर्मियों के उजाड़ इसलिए पूरे हो गए कि परमेश्वर ने अपने धर्मी न्याय में वे विपत्तियाँ और वह विनाश, जो उन्होंने दाऊद के विरुद्ध गढ़े थे, उन्हीं के सिरों पर डाल दिए। कुछ और लोगों के अनुसार, दाऊद छठे पद में यह शिकायत करता है कि परमेश्वर ने बहुत समय तक चुपचाप अपने लोगों का दयनीय उजाड़ सहन किया, यहाँ तक कि अधर्मी, बिना रोक-टोक के छोड़ दिए जाने के कारण, अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ उजाड़ते और नष्ट करते रहे; और वे समझते हैं कि सातवें पद में वह अपनी सान्त्वना के लिए यह जोड़ता है कि इसके होते हुए भी परमेश्वर मानवीय कार्यों पर अध्यक्षता करता है। मुझे इस विचार पर कोई आपत्ति नहीं कि पहले व्यंग्य के साथ यह वर्णन किया गया है कि शत्रु का बल, जब उन्होंने अपना पूरा ज़ोर लगाया, कितना भयानक था; और फिर उसके विरोध में परमेश्वर का वह न्याय रखा गया है जिसने उनकी अपेक्षा के विपरीत अचानक उनकी कार्यवाहियों का एकाएक अन्त कर दिया। उन्होंने ऐसे किसी परिणाम की आशा नहीं की थी; क्योंकि हम जानते हैं कि अधर्मी लोग, यद्यपि खुले रूप से परमेश्वर को उसके अधिकार और प्रभुता से वंचित करने का दुस्साहस न करें, फिर भी दुष्टता की हर अति की ओर ऐसे ही निर्भीकता से सिर के बल दौड़ते हैं मानो वह बेड़ियों से बँधा हुआ हो। इसी से लगभग मिलती-जुलती कहने की रीति पर हम पिछले एक भजन (भजन 7:13) में ध्यान दे चुके हैं। [“J'ay mieux aime traduire, Tu t'es assis juste juge; que, O juste juge tu t'es assis.” — फ्रांसीसी.]
“ढा दिया। इब्रानी शब्द भवनों की नींवों के उखाड़ दिए जाने को व्यक्त करता है।” —हॉर्सली.
शत्रुओं—परमेश्वर और उसके लोगों के शत्रुओं—के बल और उनकी कार्यवाहियों को तोड़ डालने में परमेश्वर के कार्य के बीच यह विरोध उस सहायता के अद्भुत स्वरूप को बहुत अच्छी रीति से स्पष्ट करता है जो उसने अपने लोगों को दी। अधर्मियों ने हानि पहुँचाने के काम में अपने लिए सब वस्तुओं के पूर्ण विनाश के अतिरिक्त और कोई सीमा नहीं ठहराई थी, और आरम्भ में पूर्ण विनाश निकट ही दिखाई देता था; परन्तु जब बातें इस उलझन की दशा में थीं, तब परमेश्वर ठीक समय पर अपने लोगों की सहायता के लिए प्रकट हुआ।
“Que s'il avait les pieds et mains liees.” — फ्रांसीसी. “मानो उसके हाथ-पाँव बँधे हुए हों।”
इसलिए जब-जब हम चाहे जिस ओर मुड़ें और हमें विनाश के अतिरिक्त और कुछ दिखाई न दे, तब-तब हम स्मरण रखें कि अपनी आँखें उस स्वर्गीय सिंहासन की ओर उठाएँ, जहाँ से परमेश्वर नीचे यहाँ होनेवाली सब बातों को देखता है। संसार में हमारी दशा ऐसी चरम सीमा तक पहुँच गई हो सकती है कि उसके विषय में अब कोई आशा न रही हो; परन्तु वह ढाल, जिससे हमें उन सब परीक्षाओं को पीछे हटाना चाहिए जिनसे हम पर आक्रमण होता है, यह है कि परमेश्वर फिर भी स्वर्ग में न्यायी के रूप में विराजमान है। हाँ, जब वह हमारी ओर कोई ध्यान देता हुआ नहीं दिखता, और उन बुराइयों का तुरन्त उपचार नहीं करता जिन्हें हम सहते हैं, तब हमें उचित है कि विश्वास के द्वारा उसके गुप्त विधान को अनुभव करें। भजनकार पहले कहता है, परमेश्वर सदा विराजमान है, जिससे उसका अभिप्राय यह है कि मनुष्यों की हिंसा चाहे कितनी भी ऊँची चली जाए, और उनका क्रोध चाहे बिना माप के फूट पड़े, फिर भी वे परमेश्वर को उसके आसन से कभी नहीं घसीट सकते। इस वाक्यांश से उसका आगे यह भी अभिप्राय है कि परमेश्वर के लिए न्यायी के पद और अधिकार को त्याग देना असम्भव है; यह सत्य वह पद के दूसरे भाग में और भी स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, उसने न्याय के लिए अपना सिंहासन तैयार किया है, जिसमें वह घोषणा करता है कि परमेश्वर केवल अपने प्रताप और महिमा को अत्यन्त महान बनाने के उद्देश्य से ही नहीं, वरन् जगत पर धार्मिकता से शासन करने के उद्देश्य से भी राज्य करता है।
8. और वह जगत का न्याय धार्मिकता से करेगा। जैसे दाऊद ने अभी-अभी यह गवाही दी है कि परमेश्वर का सामर्थ्य निष्क्रिय नहीं है, कि वह स्वर्ग में केवल भोग-विलास में लीन रहता हो, वरन् वह निरन्तर कार्य करनेवाला सामर्थ्य है जिसे वह अपने अधिकार को बनाए रखने और जगत पर धार्मिकता और न्याय से शासन करने में प्रयोग करता है; वैसे ही इस पद में वह इस शिक्षा का उपयोग जोड़ता है, जो यह है कि परमेश्वर का सामर्थ्य स्वर्ग में बन्द नहीं है, वरन् मनुष्यों की सहायता करने में स्वयं को प्रकट करता है। इस विषय में सच्ची शिक्षा यह नहीं है कि एपिकूरस की नाईं हम यह कल्पना करें कि परमेश्वर पूर्णतया आराम और सुख-भोग में लीन रहनेवाला प्राणी है, जो केवल अपने आप से सन्तुष्ट होकर मनुष्यजाति की कुछ भी चिन्ता नहीं करता; वरन् यह है कि हम उसे सामर्थ्य और न्याय के सिंहासन पर बैठाएँ, ताकि हमें पूरा निश्चय हो जाए कि यद्यपि वह अन्याय से सताए गए लोगों की तुरन्त सहायता नहीं करता, फिर भी ऐसा एक भी क्षण नहीं जिसमें वह उनमें गहरी रुचि लेना छोड़ देता हो। और जब वह कुछ समय के लिए बातों पर ध्यान न देता हुआ प्रतीत हो, तब हमें जिस निष्कर्ष पर सबसे निश्चित रूप से पहुँचना चाहिए वह यह नहीं कि वह अपना पद छोड़ देता है, वरन् यह कि वह इसके द्वारा अपने लोगों के धीरज को परखना चाहता है, और इसलिए हमें धीरज से और मन की शान्ति के साथ परिणाम की बाट जोहनी चाहिए। मेरे विचार में निश्चयवाचक सर्वनाम “वह” बड़ा वज़न रखता है। इसका आशय ऐसा है मानो दाऊद ने कहा हो, कोई भी परमेश्वर को जगत के न्यायी के उसके पद से वंचित नहीं कर सकता, और न उसे अपने न्याय को सब जातियों तक फैलाने से रोक सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह अपने लोगों का न्यायी तो और भी अधिक होगा। दाऊद इन न्यायों को धार्मिक घोषित करता है, ताकि जब हमें अन्याय और क्रूरता से सताया जाए, तब हम इस दृढ़ आशा के साथ परमेश्वर से सहायता माँगने को प्रेरित हों कि वह हमें मिलेगी; क्योंकि जब वह जातियों का न्याय धार्मिकता से करता है, तो वह अन्याय और अत्याचार को जगत में सदा बिना दण्ड के राज्य करने न देगा, और न निर्दोषों को अपनी सहायता से वंचित करेगा। [“Dieu s'est montre bien a propos pour secourir les gens.” — फ्रांसीसी.]
“De quelque coste que nous-nous seachions tourner.” — फ्रांसीसी.
भजन 9:9-12
9. और यहोवा दीनों के लिए शरणस्थान, और संकट में उचित समयों पर रक्षा ठहरेगा। 10. और जो तेरे नाम को जानते हैं वे तुझ पर भरोसा रखेंगे: क्योंकि हे यहोवा, तू अपने खोजियों को नहीं त्यागता। 11. यहोवा का, जो सिय्योन में वास करता है, भजन गाओ, और जाति जाति के बीच उसके कामों का प्रचार करो। 12. क्योंकि लहू का लेखा लेते हुए उसने उसे स्मरण किया है: वह दीनों की दोहाई को नहीं भूला।
9. और यहोवा दीनों के लिए शरणस्थान ठहरेगा। दाऊद यहाँ उस परीक्षा का उपचार प्रस्तुत करता है जो निर्बलों को बहुत सताती है, जब वे अपने आप को और अपने समान लोगों को अधर्मियों की इच्छा पर छोड़ा हुआ देखते हैं, और परमेश्वर चुप रहता है। वह हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर अपनी सहायता में विलम्ब करता है, और बाहरी रूप से अपने विश्वासयोग्य लोगों को त्यागता हुआ प्रतीत होता है, ताकि अन्ततः उनकी आवश्यकता और क्लेश की महानता के अनुसार अधिक उपयुक्त समय पर उनकी सहायता करे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह अपने पद के निर्वाह से किसी भी प्रकार नहीं रुकता, चाहे वह भले और निर्दोष लोगों को अत्यन्त दरिद्रता तक पहुँचने दे, और चाहे वह उन्हें रोने और विलाप करने में परखे; क्योंकि ऐसा करके वह एक दीपक जलाता है, जिससे वे उसके न्यायों को और भी स्पष्टता से देख सकें। इसी के अनुसार दाऊद स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि परमेश्वर अपने लोगों के क्लेशों में ठीक समय पर अपनी सुरक्षा बीच में ले आता है। प्रभु संकट में उचित समयों पर दीनों के लिए रक्षा ठहरेगा। इससे हमें यह कर्तव्य सिखाया जाता है कि हम उसके विधान को समय दें, ताकि वह आवश्यकता की घड़ी में अन्ततः स्वयं को प्रकट करे। और यदि परमेश्वर के सामर्थ्य द्वारा सुरक्षा और उसकी पितृवत् कृपा का अनुभव वह सबसे बड़ी आशिष है जो हम पा सकते हैं, तो संसार के सामने दरिद्र और अभागे गिने जाने पर हम इतने व्याकुल न हों, वरन् यह सान्त्वनादायक विचार हमारे शोक को शान्त करे कि परमेश्वर हमसे दूर नहीं है, क्योंकि हमारे क्लेश उसे हमारी सहायता के लिए आने को पुकारते हैं। हम यह भी ध्यान दें कि जब परमेश्वर विश्वासियों के क्लेश के समय उनकी सहायता करता है, तब कहा जाता है कि वह उचित समयों पर निकट है। नौवें पद के अन्त में जो इब्रानी शब्द आता है, उसे कुछ लोग ऐसे समझते हैं मानो वह वही साधारण शब्द हो जिसका अर्थ गढ़ अथवा रक्षा है; परन्तु यहाँ वे रूपक के रूप में इसका अनुवाद “संकट” करते हैं, जो उन कठिन परिस्थितियों को सूचित करता है जिनमें मनुष्य इतना कसकर घिर जाता है और ऐसी चरम दशा में पहुँच जाता है कि उसे निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता। परन्तु मुझे उन लोगों के मत में अधिक सम्भावना प्रतीत होती है जो בצרה batsarah के पहले अक्षर ב को एक सहायक अक्षर मानते हैं, जिसका अर्थ “में” है, जो इसका सामान्य अर्थ है। तो यहाँ जो कहा गया है वह यह है कि परमेश्वर आवश्यकता के समय, अर्थात् क्लेश में, अथवा जब वे उसके नीचे दबे होते हैं, अपने लोगों की सहायता करता है, क्योंकि तभी सहायता सबसे अधिक आवश्यक और सबसे अधिक उपयोगी होती है। [“Exposez a l'appetit et cruaute des meschans, sans que Dieu fkee semblant d'en rien veoir ne scavoir.” — फ्रांसीसी. “दुष्टों की लालसा और क्रूरता के आगे छोड़ दिए गए, जबकि परमेश्वर ऐसा प्रतीत होता है मानो वह उसके विषय में न कुछ देखता है न कुछ जानता है।”]
दसवें पद में भजनकार हमें सिखाता है कि जब प्रभु धर्मियों को छुड़ाता है, तो उससे जो फल उत्पन्न होता है वह यह है कि वे स्वयं, और शेष सब धर्मी भी, उसके अनुग्रह पर बढ़ता हुआ भरोसा प्राप्त करते हैं; क्योंकि जब तक हमें पूरा निश्चय न हो कि परमेश्वर मनुष्यों और मानवीय कार्यों की चिन्ता करता है, तब तक हमारा निरन्तर अशान्ति से व्याकुल रहना अनिवार्य है। परन्तु क्योंकि अधिकांश मनुष्य अपनी आँखें मूँद लेते हैं ताकि परमेश्वर के न्यायों को न देखें, इसलिए दाऊद इस लाभ को केवल विश्वासियों तक सीमित करता है; और निश्चय ही, जहाँ भक्ति नहीं, वहाँ परमेश्वर के कार्यों का कोई बोध भी नहीं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि वह परमेश्वर का ज्ञान विश्वासियों को देता है; क्योंकि धर्म इसी से उत्पन्न होता है, जबकि मनुष्यों की अज्ञानता और मूढ़ता के कारण वह बुझ जाता है। बहुत से लोग परमेश्वर के नाम को केवल स्वयं परमेश्वर के अर्थ में लेते हैं; परन्तु, जैसा कि मैं पिछले एक भजन पर अपनी टिप्पणियों में कह चुका हूँ, मेरे विचार में इस शब्द से कुछ अधिक व्यक्त होता है। क्योंकि परमेश्वर का सार गुप्त और अगम्य है, इसलिए उसके नाम का अर्थ ठीक उसका स्वरूप है, जहाँ तक उसने उसे हम पर प्रकट करना उचित समझा है। फिर दाऊद परमेश्वर पर इस भरोसे का आधार यह बताता है कि वह अपने खोजियों को नहीं त्यागता। परमेश्वर को दो प्रकार से खोजा जाता है, या तो प्रार्थना और विनतियों के द्वारा, अथवा पवित्र और सीधा जीवन बिताने का यत्न करने के द्वारा; और वास्तव में, एक सदा दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ा रहता है। परन्तु क्योंकि भजनकार यहाँ परमेश्वर की उस सुरक्षा की चर्चा कर रहा है जिस पर भक्तों का कुशल-क्षेम निर्भर है, इसलिए, जैसा मैं समझता हूँ, परमेश्वर को खोजने का अर्थ है संकट और विपत्ति में सहायता और राहत के लिए उसकी शरण लेना।
11. यहोवा का भजन गाओ। दाऊद, व्यक्तिगत रूप से और केवल अपनी ओर से धन्यवाद देने से सन्तुष्ट न होकर, विश्वासियों को उपदेश देता है कि वे परमेश्वर की स्तुति करने में उसके साथ मिल जाएँ; और ऐसा केवल इसलिए नहीं कि एक दूसरे को इस धार्मिक अभ्यास के लिए उभारना उनका कर्तव्य है, वरन् इसलिए भी कि जिन छुटकारों की वह चर्चा करता है वे सार्वजनिक और विधिवत् रूप से मनाए जाने के योग्य थे; और यह बात दूसरे भाग में और भी स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है, जहाँ वह आज्ञा देता है कि उनका प्रचार जाति जाति के बीच किया जाए। इसका अर्थ यह है कि जब तक सारा जगत उनकी कीर्ति से भर न जाए, तब तक उनका प्रचार या उत्सव वैसा नहीं होता जैसा उनके योग्य है। जाति जाति के बीच परमेश्वर के कामों का प्रचार करना वास्तव में मानो बहरों के सामने गाना था; परन्तु इस कहने की रीति से दाऊद का अभिप्राय यह दिखाना था कि यहूदिया का प्रदेश यहोवा की स्तुतियों की अनन्त महानता को समाने के लिए बहुत छोटा था। वह परमेश्वर को यह उपाधि देता है, वह जो सिय्योन में वास करता है, ताकि उसे अन्यजातियों के सब झूठे देवताओं से अलग पहचाना जाए। इस वाक्यांश में उस परमेश्वर के, जिसने अब्राहम और इस्राएल से अपनी वाचा बाँधी, और उन सब देवताओं के बीच एक मौन तुलना है जो यहूदिया को छोड़ संसार के हर दूसरे भाग में मनुष्यों की अन्धी और भ्रष्ट कल्पनाओं के अनुसार पूजे जाते थे। लोगों के लिए यह पर्याप्त नहीं कि वे बिना भेद के या मनमाने ढंग से किसी देवता का आदर और श्रद्धा करें; उन्हें स्पष्ट रूप से एकमात्र जीवित और सच्चे परमेश्वर को वह आराधना अर्पित करनी चाहिए जो उसी की है, और जिसकी वह आज्ञा देता है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि परमेश्वर ने विशेष रूप से सिय्योन को उस स्थान के रूप में चुना था जहाँ उसका नाम लिया जाए, इसलिए दाऊद बहुत उचित रूप से उसे उसका विशेष निवास-स्थान ठहराता है; इसलिए नहीं कि जिसे “स्वर्ग वरन् सबसे ऊँचा स्वर्ग भी नहीं समा सकता” (1 राजा 8:1), उसे किसी विशेष स्थान में बन्द करने का प्रयत्न करना उचित है, वरन् इसलिए कि, जैसा हम आगे देखेंगे (भजन 132:12), उसने उसे सदा के लिए अपना विश्रामस्थान बनाने की प्रतिज्ञा की थी। दाऊद ने अपनी कल्पना के अनुसार परमेश्वर के लिए वहाँ निवास-स्थान नियुक्त नहीं किया; वरन् उसने स्वर्ग से प्रकाशन के द्वारा समझा कि स्वयं परमेश्वर की इच्छा यही थी, जैसा कि मूसा ने अनेक बार पहले से कहा था (व्यवस्थाविवरण 12:1)। इससे बहुत हद तक वह बात सिद्ध होती है जो मैंने पहले कही थी, कि यह भजन गोलियत पर दाऊद की विजय के अवसर पर नहीं रचा गया; क्योंकि दाऊद के राज्य के अन्त के निकट ही वाचा का सन्दूक परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सिय्योन में लाया गया था। कुछ लोगों का यह अनुमान कि दाऊद ने भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा सिय्योन पर सन्दूक के निवास के विषय में एक भावी घटना के रूप में कहा, मुझे अस्वाभाविक और खींच-तानकर निकाला हुआ प्रतीत होता है। फिर, हम देखते हैं कि पवित्र पूर्वज, जब परमेश्वर को बलिदान चढ़ाने के लिए सिय्योन जाते थे, तो केवल अपने मन की प्रेरणा के अनुसार काम नहीं करते थे; वरन् जो कुछ वे करते थे वह परमेश्वर के वचन पर विश्वास से निकलता था, और उसकी आज्ञा के पालन में किया जाता था; और इसलिए वह उनकी धार्मिक सेवा के कारण उन्हें ग्रहणयोग्य ठहराता था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उन धार्मिक रीतियों के पक्ष में, जिन्हें अन्धविश्वासी लोगों ने अपनी ही कल्पना से अपने लिए गढ़ लिया है, उनके उदाहरण को तर्क या बहाने के रूप में प्रयोग करने का कोई भी आधार नहीं है। इसके अतिरिक्त, उन दिनों विश्वासियों के लिए यह पर्याप्त नहीं था कि वे परमेश्वर के वचन पर निर्भर रहें और उन विधि-सम्बन्धी सेवाओं में लगे रहें जिनकी वह माँग करता था, जब तक कि वे बाहरी चिह्नों की सहायता से अपने मनों को उनसे ऊपर उठाकर परमेश्वर को आत्मिक आराधना न दें। परमेश्वर ने निस्सन्देह उस दृश्य पवित्रस्थान में अपनी उपस्थिति के वास्तविक चिह्न दिए, परन्तु इस उद्देश्य से नहीं कि अपने लोगों की इन्द्रियों और विचारों को पार्थिव तत्त्वों से बाँध दे; वरन् वह चाहता था कि ये बाहरी चिह्न ऐसी सीढ़ियों का काम दें जिनके द्वारा विश्वासी स्वर्ग तक चढ़ सकें। संस्कारों, और धर्म के सब बाहरी अभ्यासों की नियुक्ति में आरम्भ से परमेश्वर का उद्देश्य यही था कि वह अपने लोगों की दुर्बलता और निर्बल समझ का ध्यान रखे। इसी के अनुसार आज भी उनका सच्चा और उचित उपयोग यह है कि वे परमेश्वर को उसकी स्वर्गीय महिमा में आत्मिक रूप से खोजने में हमारी सहायता करें, न कि हमारे मनों को इस संसार की वस्तुओं में उलझाएँ, अथवा उन्हें शरीर की व्यर्थताओं में जकड़े रखें—यह एक ऐसा विषय है जिस पर पूरी रीति से विचार करने का अधिक उपयुक्त अवसर हमें आगे मिलेगा। और जैसे प्रभु ने प्राचीन काल में, जब उसने स्वयं को “वह जो सिय्योन में वास करता है” कहा, अपने लोगों को भरोसे, शान्ति और आनन्द का पूर्ण और ठोस आधार देने का अभिप्राय रखा; वैसे ही अब भी, जब व्यवस्था सिय्योन से निकल चुकी है, और अनुग्रह की वाचा उसी सोते से बहकर हम तक पहुँची है, हम जानें और हमें पूरा निश्चय हो कि जहाँ कहीं विश्वासी, जो उसके वचन की नियुक्ति के अनुसार शुद्धता से और उचित रीति से उसकी आराधना करते हैं, धार्मिक आराधना के विधिवत् कार्यों में लगने के लिए एकत्र होते हैं, वहाँ वह अनुग्रहपूर्वक उपस्थित रहता है और उनके बीच अध्यक्षता करता है। [“Notons aussi que Dieu est dit estre prest en temps opportun quand il subvient aux fideles lors qu'ils sour, affligez.” — फ्रांसीसी.]
“निर्णायक समयों में,” לעתות leitoth; “संकट [के समय] में,” בצרה batsarah. בצרה, संज्ञा צרה है जो अपने ही सम्बन्धसूचक अव्यय ב के अधीन है, और इसका अनुवाद עתות के पश्चात् आनेवाले सम्बन्धकारक के रूप में करना उतना उचित नहीं है।” —हॉर्सली.
12. क्योंकि लोहू का पलटा लेने में। मूल में यह शब्द "लोहू" बहुवचन में है, अर्थात् "लोहुओं"; और इसलिये इसके तुरन्त बाद आनेवाला सम्बन्धवाचक शब्द, और उन्हें स्मरण रखता है, इस शब्द से बड़ी उचित रीति से इस प्रकार जोड़ा जा सकता है: वह लोहुओं का पलटा लेता है, और उन्हें स्मरण रखता है। परन्तु इब्रानी भाषा में यह बात काफी सामान्य है कि पूर्ववर्ती शब्द और सम्बन्धवाचक शब्द का क्रम उलट दिया जाए, और सम्बन्धवाचक को उस शब्द से पहले रख दिया जाए जिससे उसका सम्बन्ध है; इसलिये कुछ लोग इसे दीनों के विषय में समझाते हैं, इस प्रकार: लोहू का पलटा लेने में उसने उन्हें, अर्थात् उन दीनों को, जिनका वर्णन वह थोड़ा आगे करता है, स्मरण किया है। जहाँ तक विषय के सार और तत्त्व का प्रश्न है, इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि हम सम्बन्धवाचक शब्द को इन दोनों में से किस रीति से समझाएँ; परन्तु मेरी दृष्टि में पहली व्याख्या अधिक स्वाभाविक है। यहाँ उसी बात की पुनरावृत्ति है जो भजनकार ने थोड़ा पहले कही थी, कि हमें परमेश्वर की सामर्थ पर विशेष रूप से उस रूप में ध्यान देना चाहिये जिसमें वह उस दया में प्रकट होती है जो वह अपने उन दासों पर करता है जिन्हें दुष्ट मनुष्य अन्याय से सताते हैं। परमेश्वर के असंख्य कामों में से वह एक को चुनता है, और उसे विशेष रूप से स्मरण रखने योग्य ठहराकर उसकी प्रशंसा करता है, अर्थात् दीनों को मृत्यु से छुड़ाने का उसका काम। परमेश्वर कभी-कभी अपने पवित्र विधान में उन्हें मनुष्यों के हाथ सताए जाने के लिये छोड़ देता है; परन्तु अन्त में वह उन पर किए गए अन्यायों का पलटा लेता है। दाऊद जिन शब्दों का प्रयोग करता है वे एक निरन्तर चलते रहनेवाले कार्य को सूचित करते हैं; परन्तु मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन उदाहरणों के द्वारा, जिनका वर्णन उसने भजन के पिछले भाग में किया है, उसका अभिप्राय मनुष्यों को इस बात को मानने की ओर ले चलना है कि परमेश्वर निर्दोष लोहू का पलटा लेता है, और अपनी प्रजा की दोहाई को स्मरण रखता है। ["Et de mettre Eux, devant le mot auquel il se rapporte." — फ्रांसीसी. और "उन्हें" को उस शब्द से पहले रखना जिससे उसका सम्बन्ध है।]
वह फिर उसी बात पर बल देता है जिसकी ओर मैंने पहले संकेत किया था, कि परमेश्वर अन्यायों को सदा उतनी शीघ्रता से नहीं रोकता जितनी हम चाहते हैं, और न दुष्टों के प्रयत्नों को आरम्भ में ही तोड़ डालता है, वरन् अपनी सहायता को रोक रखता और उसमें विलम्ब करता है, यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हम उसकी दोहाई व्यर्थ ही देते हैं; यह एक ऐसा सत्य है जिसे समझना हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है; क्योंकि यदि हम परमेश्वर की सहायता को अपनी इन्द्रियों के अनुसार मापें, तो हमारा साहस बार-बार टूटता रहेगा, और अन्त में हमारी आशा पूरी तरह बुझ जाएगी, और निराशा और हताशा को स्थान दे देगी। जैसा मैं कह चुका हूँ, हम बड़ी लालसा से यह चाहते हैं कि वह दूर ही से अपना हाथ बढ़ाए और उन विपत्तियों को पीछे हटा दे जिन्हें वह हमारे लिये तैयार होते देखता है; तौभी वह मानो कुछ ध्यान ही नहीं देता, और निर्दोषों का लोहू बहाए जाने से नहीं रोकता। तौभी यह सान्त्वना देनेवाला विचार हमें सम्भाले रहे, कि अन्त में वह वास्तव में दिखा देगा कि हमारा लोहू उसकी दृष्टि में कितना बहुमूल्य था। यदि यह आपत्ति की जाए कि जब हम सारी विपत्तियाँ सह चुके होते हैं तब परमेश्वर की सहायता बहुत देर से आती है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि परमेश्वर हस्तक्षेप करने में उससे अधिक विलम्ब नहीं करता जितना वह जानता है कि हमारे लिये क्रूस के नीचे दीन किए जाने के निमित्त लाभदायक है; और यदि वह बुराई के आ पड़ने से पहले हमारी सहायता करने के बजाय हमारे अत्याचार सह लेने के बाद पलटा लेना चुनता है, तो इसका कारण यह नहीं कि वह हमें सहायता देने के लिये सदा इच्छुक और तत्पर नहीं है; वरन् यह कि वह जानता है कि हर समय उसके अनुग्रह को प्रकट करने का उचित समय नहीं होता। प्रसंगवश, यह न केवल हमारे प्रति उसके पितृ-तुल्य प्रेम का, वरन् उस धन्य अमरता का भी एक उल्लेखनीय प्रमाण है जो परमेश्वर की सब सन्तानों का भाग है, कि वह उनके मरने के बाद भी उनकी चिन्ता करता है। यदि वह अपने अनुग्रह से सदा हम पर क्लेश आने से रोक देता, तो हम में से कौन ऐसा है जो पूरी रीति से इसी वर्तमान जीवन से चिपटा न रहता? परन्तु जब वह हमारी मृत्यु का पलटा लेता है, तो इससे प्रकट होता है कि मरे हुए होकर भी हम उसकी उपस्थिति में अब भी जीवित बने रहते हैं। क्योंकि वह मनुष्यों की नाईं उन लोगों की स्मृति का आदर मात्र नहीं करता जिन्हें वह जीवित न बचा सका हो, वरन् वह वास्तव में दिखाता है कि जो लोग शरीर के अनुसार देखने पर अब नहीं रहे, उन्हें वह अपनी गोद में दुलारता और उनकी रक्षा करता है। और यही कारण है कि दाऊद कहता है कि जब वह लोहू का पलटा लेता है तब उसे स्मरण रखता है; क्योंकि यद्यपि वह अपने दासों को तुरन्त दुष्टों की तलवारों से न छुड़ाए, तौभी वह उनकी हत्या को बिना दण्ड के जाने नहीं देता। अन्तिम वाक्यांश का भी यही आशय है, वह दीन लोगों की दोहाई को नहीं भूलता। हो सकता है कि परमेश्वर तुरन्त छुटकारा या राहत देकर यह न दिखाए कि वह अपने दासों की शिकायतों पर तुरन्त कान लगाता है; परन्तु अन्त में वह अकाट्य रूप से प्रमाणित कर देता है कि उसने उन पर ध्यान दिया है। दोहाई देने का स्पष्ट उल्लेख इसलिये किया गया है कि वे सब जो परमेश्वर को अपने छुड़ानेवाले और रक्षक के रूप में अनुभव करना चाहते हैं, उत्साहित होकर अपनी अभिलाषाएँ, अपनी कराहें और अपनी प्रार्थनाएँ उसी की ओर लगाएँ। ["Car ce n'est pas qu'il face comme les hommes qui auront en estime et reverence apres la mort la memoire de leurs amis quand ils ne leur ont peu sauver la vie. — फ्रांसीसी. "क्योंकि वह उन मनुष्यों की नाईं नहीं करता जो अपने मित्रों के मरने के बाद उनकी स्मृति का आदर और सम्मान करते हैं, जब वे उनका जीवन और अधिक बचा नहीं सकते।"]
भजन 9:13-14
13. हे यहोवा, मुझ पर दया कर; मेरे उस दुःख को देख जो मैं अपने सतानेवालों के हाथ से सहता हूँ, हे तू जो मुझे मृत्यु के फाटकों से उठाता है। 14. ताकि मैं सिय्योन की बेटी के फाटकों में तेरी सारी स्तुति का वर्णन करूँ, और तेरे उद्धार से मगन होऊँ।
13. हे यहोवा, मुझ पर दया कर। मेरी समझ में यह भजन का दूसरा भाग है। परन्तु दूसरे लोग भिन्न मत रखते हैं, और समझते हैं कि दाऊद, अपनी बार-बार की रीति के अनुसार, अपने लिये किए गए छुटकारे के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करते हुए, अपने धन्यवाद के साथ इस बात का विवरण भी मिला देता है कि अपने संकट की चरम दशा में उसकी प्रार्थना का विषय क्या रहा था; और मैं मानता हूँ कि इसी प्रकार के उदाहरण भजन संहिता में सर्वत्र मिलते हैं। परन्तु जब मैं सारी परिस्थितियों पर अधिक ध्यान से विचार करता हूँ, तो मैं दूसरे मत की ओर झुकने को विवश होता हूँ, अर्थात् यह कि आरम्भ में उसने अपने ऊपर किए गए उपकारों का गुणगान इसलिये किया कि प्रार्थना के लिये मार्ग तैयार हो; और भजन अन्त में प्रार्थना ही के साथ समाप्त होता है। अतः वह यहाँ प्रसंगवश उन प्रार्थनाओं को नहीं जोड़ता जो उसने पहले अपने संकटों और चिन्ताओं के बीच की थीं; वरन् वह जान-बूझकर वर्तमान समय में परमेश्वर से सहायता की याचना करता है, और माँगता है कि जिसे उसने बार-बार अपने छुड़ानेवाले के रूप में अनुभव किया था, वह उसके प्रति उसी अनुग्रह को निरन्तर प्रकट करता रहे। सम्भवतः उसके शत्रुओं ने, जिन्हें वह विभिन्न अवसरों पर पहले ही पराजित कर चुका था, नया साहस बटोरकर और नई सेनाएँ खड़ी करके एक हताश प्रयत्न किया, जैसा हम प्रायः देखते हैं कि जो लोग निराशा की दशा तक पहुँचा दिए जाते हैं वे और भी अधिक वेग और क्रोध के साथ अपने शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं। यह तो निश्चित है कि जब दाऊद ने यह प्रार्थना की, तब वह अत्यन्त भय से ग्रस्त था; क्योंकि किसी छोटी-सी बात के कारण वह परमेश्वर को इस प्रकार अपने क्लेश का साक्षी होने के लिये न पुकारता, जैसा वह यहाँ करता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब वह दीनता से परमेश्वर की दया की शरण लेता है, तब वह उस क्रूस को, जो उस पर रखा गया था, धीरज और अधीनता के मन से सहता है। परन्तु हमें मुख्य रूप से उस पदवी पर ध्यान देना चाहिये जो वह परमेश्वर को देता है, जब वह उसे मृत्यु के फाटकों से अपना उठानेवाला कहता है; क्योंकि इब्रानी शब्द מרומם मेरोमेम के लिये "उठाना" से अधिक उपयुक्त अभिव्यक्ति हमें नहीं मिल सकती। इसके द्वारा भजनकार पहले तो अपने पिछले अनुभव से अपने विश्वास को दृढ़ करता है, क्योंकि वह बार-बार बड़े से बड़े संकटों से छुड़ाया गया था। और दूसरे, वह मृत्यु के जबड़ों में होते हुए भी अपने छुटकारे का निश्चय कर लेता है; क्योंकि परमेश्वर की यह रीति है कि वह केवल अपने दासों की सहायता ही नहीं करता और उन्हें साधारण साधनों द्वारा उनकी विपत्तियों से ही नहीं छुड़ाता, वरन् जीवन की सारी आशा कट जाने के बाद भी उन्हें कब्र में से निकाल लाता है; क्योंकि मृत्यु के फाटक एक रूपक है, जो उन चरम संकटों को सूचित करता है जो विनाश की धमकी देते हैं, अथवा यों कहें कि जो कब्र को हमारे सामने खोल देते हैं। इसलिये, ताकि न तो उन विपत्तियों का बोझ जिन्हें हम इस समय सहते हैं, और न उन विपत्तियों का भय जिन्हें हम अपने ऊपर मँडराते देखते हैं, हमारे विश्वास को डुबो दे या हमारी प्रार्थनाओं को बाधित करे, आइए हम स्मरण करें कि अपनी प्रजा को मृत्यु के फाटकों से उठाने का कार्य परमेश्वर पर व्यर्थ ही आरोपित नहीं किया गया है। ["बारहवें पद में," हॉर्स्ली कहता है, "भजनकार ने परमेश्वर के स्वभाव के एक अंग के रूप में यह उल्लेख करके कि परमेश्वर असहायों की दोहाई को नहीं भूलता, स्वाभाविक रूप से अपनी असहाय दशा के विषय में सोचता है, और तेरहवें और चौदहवें पदों में छुटकारे के लिये दोहाई देता है। उस गुट के विनाश की प्रतिज्ञा, जो उसके क्लेश के मुख्य साधन थे, फिर उसके विचारों में लौट आने पर, वह पन्द्रहवें पद में फिर से जयजयकार के स्वरों में फूट पड़ता है।" भजन के पिछले भाग की विजय की भाषा से तेरहवें पद की प्रार्थना और विलाप की भाषा की ओर यह संक्रमण, और भजन के शेष भाग में विजय और विलाप का यह मिश्रण, बहुत उल्लेखनीय है। यह भजनकार की तत्कालीन संकटपूर्ण दशा का स्वाभाविक परिणाम था। एक ओर उसके क्लेश का दबाव उसे उदासी की भाषा बोलने को प्रेरित करता था; तो दूसरी ओर छुटकारे की उसकी दृढ़ आशा उसे विजय की भाषा बोलने को उकसाती थी।]
14. ताकि मैं वर्णन करूँ। दाऊद का अभिप्राय केवल यह है कि वह सब सभाओं में, और जहाँ कहीं लोगों की सबसे बड़ी भीड़ इकट्ठी होती है, परमेश्वर की स्तुति का गुणगान करेगा (क्योंकि उस समय नगरों के फाटकों पर सभाएँ करने की रीति थी); परन्तु साथ ही ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ उन मृत्यु के फाटकों की ओर संकेत है जिनकी चर्चा उसने अभी की है, मानो वह कह रहा हो, कब्र से छुड़ाए जाने के बाद मैं अपने छुटकारे में प्रकट हुई परमेश्वर की भलाई की गवाही यथासम्भव सबसे सार्वजनिक रीति से देने का यत्न करूँगा। परन्तु क्योंकि केवल अपनी जीभों से परमेश्वर की स्तुति कहना पर्याप्त नहीं, यदि वह हृदय से न निकले, इसलिये भजनकार पद के अन्तिम वाक्यांश में उस भीतरी आनन्द को व्यक्त करता है जिसके साथ वह इस कार्य में लगेगा, और तेरे उद्धार से मगन होऊँ; मानो वह कह रहा हो, मैं इस संसार में और किसी प्रयोजन से नहीं, केवल इसी के लिये जीना चाहता हूँ कि परमेश्वर के अनुग्रह से बचाए जाने के कारण आनन्द करूँ। जैसा सर्वविदित है, बेटी नाम से यहूदी किसी प्रजा या नगर का अर्थ लेते थे; परन्तु यहाँ वह नगर का नाम उसके प्रमुख भाग के आधार पर रखता है, अर्थात् सिय्योन।
भजन 9:15-16
15. अन्यजातियाँ उसी गड़हे में धँस गईं जो उन्होंने बनाया था; जो जाल उन्होंने छिपाया था उसी में उनके अपने पाँव फँस गए। 16. यहोवा न्याय चुकाने के द्वारा जाना गया है। दुष्ट अपने ही हाथों के काम में फँस गया है। हिग्गायोन। सेला।
"Or il faut noter que quand il ya humblement au recours a la misericorde de Dieu, c'est signe qu'il portoit doucement et patienment, la croix que Dieu luy avoir comme raise sur les espaules." — फ्रांसीसी. "परन्तु ध्यान देना चाहिये कि जब वह दीनता से परमेश्वर की दया की शरण लेता है, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसने उस क्रूस को, जिसे परमेश्वर ने मानो उसके कन्धों पर रख दिया था, अधीनता और धीरज के साथ उठाया।"
15. अन्यजातियाँ धँस गईं। दाऊद अब पवित्र भरोसे तक ऊँचा उठाया जाकर अपने शत्रुओं पर जयजयकार करता है। पहले वह रूपक में कहता है कि वे अपनी ही चतुराई और फन्दों में पकड़े गए। फिर वह उसी बात को बिना अलंकार के व्यक्त करता है, कि वे अपनी ही दुष्टता में फँस गए। और वह दृढ़ता से कहता है कि यह संयोग से नहीं हुआ, वरन् परमेश्वर का काम था, और उसके न्याय का एक स्पष्ट प्रमाण था। जब वह अपने शत्रुओं की तुलना शिकारियों या बहेलियों से करता है, तो ऐसा करने का उसके पास उचित आधार है। यह सच है कि दुष्ट प्रायः उपद्रव और अत्याचार करते हैं, तौभी छल और धूर्त युक्तियों में वे सदा अपने पिता शैतान का अनुकरण करते हैं, जो झूठ का पिता है; और इसलिये उनमें जो कुछ भी चतुराई है, उसे वे दुष्टता करने और बुराई की युक्तियाँ गढ़ने में लगाते हैं। अतः जब-जब दुष्ट मनुष्य चतुराई से हमारे विनाश की साज़िश रचें, तब-तब हम स्मरण रखें कि परमेश्वर की सन्तानों के लिये जाल और फन्दे बिछाना उनके लिये कोई नई बात नहीं है। साथ ही, हम इस विचार से अपने आप को शान्ति दें कि वे हमारे विरुद्ध चाहे जो कुछ करने का प्रयत्न करें, उसका परिणाम उनके वश में नहीं है, और परमेश्वर उनके विरुद्ध होगा, न केवल उनकी युक्तियों को विफल करने के लिये, वरन् उन्हें उन्हीं दुष्ट युक्तियों में अचानक पकड़ लेने के लिये जो वे गढ़ते हैं, और उनकी बुराई के सारे साधनों को उन्हीं के सिरों पर गिरा देने के लिये।
16. यहोवा न्याय चुकाने में जाना जाता है। शब्दों का शाब्दिक पाठ यह है, जाने-पहचाने यहोवा ने न्याय किया है। यह कथन-शैली आकस्मिक है, और इसकी संक्षिप्तता ही इसे अस्पष्ट बना देती है। इसलिये इसकी व्याख्या दो प्रकार से की जाती है। कुछ लोग इसे इस प्रकार समझाते हैं: परमेश्वर तब जाना जाने लगता है जब वह दुष्टों को दण्ड देता है। परन्तु दूसरा अर्थ इस स्थल के अधिक उपयुक्त है, अर्थात् यह कि जब-जब परमेश्वर दुष्टों को उनकी अपनी ही दुर्भावना में फँसाता है, तब-तब यह बात सब पर प्रकट और स्पष्ट हो जाती है कि वह न्यायी का पद निभाता है। सारांश यह कि जब कभी परमेश्वर दुष्टों की गढ़ी हुई बुराई की सारी युक्तियों को उन्हीं पर लौटा देता है, तब दाऊद घोषणा करता है कि उस दशा में ईश्वरीय न्याय इतना स्पष्ट होता है कि जो कुछ होता है उसे न तो प्रकृति पर और न भाग्य पर आरोपित किया जा सकता है। अतः यदि परमेश्वर किसी समय इस प्रकार अपने हाथ की सामर्थ को स्पष्ट रूप से प्रकट करे, तो आइए हम अपनी आँखें खोलना सीखें, ताकि जो न्याय वह अपनी कलीसिया के शत्रुओं पर चुकाता है उनसे हमारा विश्वास अधिकाधिक दृढ़ होता जाए। जहाँ तक हिग्गायोन शब्द का प्रश्न है, जिसका ठीक अर्थ ध्यान या मनन है, मैं इस समय इसके यहाँ रखे जाने का इससे अच्छा कोई कारण नहीं बता सकता कि दाऊद का अभिप्राय भक्तों के मनों को परमेश्वर के न्यायों पर मनन करने में स्थिर करना था। सेला शब्द का भी यही प्रयोजन था, और जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वह गायन को इस प्रकार नियमित करता था कि संगीत शब्दों और भाव के अनुरूप हो।
भजन 9:17-18
17. दुष्ट नरक में लौटा दिए जाएँगे, और वे सब जातियाँ भी जो परमेश्वर को भूल जाती हैं। 18. क्योंकि दरिद्र सदा भूला हुआ न रहेगा; दीन लोगों की आशा सर्वदा के लिये नष्ट न होगी।
17. दुष्ट नरक में लौटा दिए जाएँगे। बहुत से लोग इस क्रिया का अनुवाद इच्छार्थक रूप में करते हैं, दुष्ट नरक में लौटा दिए जाएँ, मानो यह एक शाप हो। परन्तु मेरे विचार में दाऊद यहाँ भविष्य के विषय में अपने आप को और सब भक्तों को दृढ़ करता है, और घोषणा करता है कि दुष्ट चाहे जो कुछ करने का प्रयत्न करें, उसका अन्त उन्हीं के लिये विनाशकारी होगा। लौटाना शब्द से उसका अभिप्राय यह है कि परिणाम उनकी कल्पना से बिलकुल भिन्न होगा; क्योंकि इसमें उनके अहंकार की ऊँचाई और उनके पतन की गहराई के बीच एक मौन विषमता निहित है। क्योंकि उनमें परमेश्वर का भय नहीं है, इसलिये वे अपने आप को बादलों से भी ऊपर उठा लेते हैं; और फिर, मानो उन्होंने यशायाह के शब्दों में "मृत्यु से वाचा बाँधी" हो (यशायाह 28:15), वे और भी अधिक घमण्डी और ढीठ हो जाते हैं। परन्तु जब हम उन्हें बिना किसी संकट की आशंका के उन्मत्त होकर क्रोध करते देखते हैं, तब भविष्यद्वक्ता हमें चेतावनी देता है कि उनका पागलपन उन्हें सिर के बल गिरा ले जाता है, यहाँ तक कि अन्त में वे उसी कब्र में जा गिरते हैं जिससे वे अपने आप को बहुत दूर समझते थे। अतः यहाँ हमारे सामने उस अचानक और अप्रत्याशित परिवर्तन का वर्णन है जिसके द्वारा परमेश्वर, जब चाहता है, उलझी हुई बातों को फिर से व्यवस्थित कर देता है। इसलिये जब हम दुष्टों को सब प्रकार के भय से रहित होकर ऊँचे उड़ते देखें, तब आइए हम विश्वास की आँखों से उस कब्र को देखें जो उनके लिये तैयार की गई है; और निश्चिन्त रहें कि परमेश्वर का हाथ, यद्यपि वह दिखाई नहीं देता, बहुत निकट है, जो उन्हें उनके उस मार्ग के बीच ही में, जिसमें वे स्वर्ग तक पहुँचने का लक्ष्य रखते हैं, लौटा सकता है और पल भर में नरक में लुढ़का सकता है। इब्रानी शब्द שאולה शेओलाह का अर्थ सन्दिग्ध है, परन्तु मैंने इसका अनुवाद नरक करने में संकोच नहीं किया। जो लोग इसका अनुवाद कब्र करते हैं, मैं उनमें दोष नहीं निकालता; परन्तु यह निश्चित है कि भविष्यद्वक्ता साधारण मृत्यु से कुछ अधिक का अर्थ लेता है, अन्यथा वह यहाँ दुष्टों के विषय में उससे अधिक कुछ न कहता जो उनके साथ-साथ सब विश्वासियों पर भी समान रूप से घटता है। अतः यद्यपि वह स्पष्ट शब्दों में अनन्त विनाश की चर्चा नहीं करता, वरन् केवल इतना कहता है कि वे कब्र में लौटा दिए जाएँगे, तौभी कब्र के रूपक के अन्तर्गत वह यह संकेत करता है कि सब भक्तिहीन नाश होंगे, और वह अहंकार, जिसके सहारे वे हर अनुचित साधन से अपने आप को ऊँचा उठाते हैं ताकि धार्मिकता को पाँवों तले रौंदें और निर्दोषों पर अत्याचार करें, उन पर विनाश और सर्वनाश ले आएगा। यह सच है कि विश्वासी भी कब्र में उतरते हैं, परन्तु ऐसे भयानक वेग से नहीं जो उन्हें फिर बाहर निकलने की आशा के बिना उसमें डुबो दे। ऐसा होना तो दूर, वे कब्र में बन्द रहते हुए भी आशा के द्वारा अभी से स्वर्ग में वास करते हैं। ["Le mot Hebreu, pour lequel nous avons traduit Enfer signifie aussi Sepulchre; mais j'ay mieux aime retenir ceste signification. — फ्रांसीसी. "जिस इब्रानी शब्द का अनुवाद हमने नरक किया है, उसका अर्थ कब्र भी है; परन्तु मैंने शब्द का पहला अर्थ बनाए रखना अधिक उचित समझा है।"]
18. क्योंकि दरिद्र सदा भूला हुआ न रहेगा। यह कथन कि परमेश्वर दरिद्रों और दुःखियों को सर्वदा के लिये न त्यागेगा, पिछले वाक्य की पुष्टि है। इसके द्वारा वह संकेत करता है कि कुछ समय के लिये वे वास्तव में त्यागे हुए प्रतीत हो सकते हैं। इसलिये आइए हम स्मरण रखें कि परमेश्वर ने हमें अपनी सहायता की प्रतिज्ञा हमारे क्लेशों को रोक देने के रूप में नहीं, वरन् इस रूप में दी है कि जब हम लम्बे समय तक क्रूस के नीचे दबे रह चुके हों, तब अन्त में वह हमारी सहायता करे। दाऊद स्पष्ट रूप से आशा या प्रतीक्षा की चर्चा करता है, ताकि इसके द्वारा हमें प्रार्थना के लिये उत्साहित करे। परमेश्वर जो हमारे क्लेशों पर मानो कुछ ध्यान नहीं देता, उसका कारण यह है कि वह चाहता है कि हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा उसे जगाएँ; क्योंकि जब वह हमारी विनतियाँ सुनता है, तब (मानो वह तभी हमें स्मरण करने लगा हो) वह हमारी सहायता के लिये अपना सामर्थी हाथ बढ़ाता है। दाऊद फिर दोहराता है कि यह तुरन्त नहीं किया जाता, ताकि हम भलाई की आशा रखने में दृढ़ बने रहें, चाहे हमारी आशाएँ तुरन्त पूरी न भी हों।
भजन 9:19-20
19. हे यहोवा, उठ; मनुष्य प्रबल न होने पाए; जातियों का न्याय तेरे सम्मुख किया जाए। 20. हे यहोवा, उनको भय दिला; ताकि जातियाँ जान लें कि वे मनुष्य ही हैं।
19. हे यहोवा, उठ। जब दाऊद परमेश्वर से उठने की विनती करता है, तो यह अभिव्यक्ति ठीक-ठीक परमेश्वर पर लागू नहीं होती, वरन् बाहरी रूप और हमारी इन्द्रियों से सम्बन्ध रखती है; क्योंकि जब तक परमेश्वर मानो न्याय-आसन पर बैठा हुआ हमारी आँखों के सामने प्रकट न हो, तब तक हम उसे अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला नहीं पहचानते। इसके साथ एक विचार या कारण जोड़ा गया है जो परमेश्वर को अपनी प्रजा पर किए गए अन्यायों का पलटा लेने के लिये प्रेरित करे, अर्थात् यह कि मनुष्य प्रबल न होने पाए; क्योंकि जब परमेश्वर उठता है, तब भक्तिहीनों की सारी उग्रता को तुरन्त गिर पड़ना और हार माननी पड़ती है। दुष्ट इतने निर्लज्ज रूप से ढीठ कैसे हो जाते हैं, या बुराई करने की इतनी बड़ी शक्ति उनके पास कहाँ से आ जाती है, यदि इसलिये नहीं कि परमेश्वर चुप रहता है और उनकी लगाम ढीली छोड़ देता है? परन्तु जैसे ही वह अपने न्याय का कोई चिह्न दिखाता है, वह तुरन्त उनके घमण्डी उपद्रवों को रोक देता है, और केवल अपने इशारे मात्र से उनके बल और सामर्थ को तोड़ डालता है। प्रार्थना की इस रीति से हमें यह सिखाया जाता है कि हमारे शत्रु चाहे कितने ही ढीठपन और घमण्ड से इस बात की डींग मारें कि वे क्या-क्या करेंगे, तौभी वे परमेश्वर के हाथ में हैं, और उससे अधिक कुछ नहीं कर सकते जितनी वह उन्हें अनुमति देता है; और इसके अतिरिक्त यह कि परमेश्वर निःसन्देह, जब कभी चाहे, उनके सारे प्रयत्नों को व्यर्थ और निष्फल कर सकता है। इसलिये भजनकार उनकी चर्चा करते हुए उन्हें मनुष्य कहता है। मूल में यह शब्द אנוש एनोश है, जो एक ऐसे धातु से निकला है जिसका अर्थ दुर्दशा या दयनीयता है; और इसलिये यह वैसा ही है मानो उसने उन्हें नश्वर या दुर्बल मनुष्य कहा हो। इसके अतिरिक्त, भजनकार परमेश्वर से विनती करता है कि वह अन्यजातियों का न्याय अपने सम्मुख करे। परमेश्वर के विषय में यह तब कहा जाता है जब वह उन्हें किसी न किसी साधन से अपने न्याय-आसन के सामने उपस्थित होने को विवश करता है। हम जानते हैं कि अविश्वासी, जब तक बलपूर्वक परमेश्वर की उपस्थिति में घसीटे न जाएँ, जहाँ तक बन पड़े उससे मुँह फेरे रहते हैं, ताकि अपने मनों से उसके अपने न्यायी होने का सारा विचार बाहर निकाल दें। ["L'homme mortel." — फ्रांसीसी. "नश्वर मनुष्य।" — "Solo nutu." - Lat. "Enfaisant signe seulement du bout du doigt." — फ्रांसीसी.]
"Toute la fierte et arrogance." — फ्रांसीसी. "सारा अभिमान और अहंकार।"
"Leur rage et insolence." — फ्रांसीसी. "उनका क्रोध और ढिठाई।"
20. हे यहोवा, उनको भय दिला। सेप्टुआजिन्ट מורה मोरह का अनुवाद [νομοθέτης,] अर्थात् व्यवस्था देनेवाला करता है, और इसे ירה यारह से निकला हुआ मानता है, जिसका अर्थ कभी-कभी सिखाना होता है। परन्तु इस स्थल का आशय यह माँग करता है कि हम इसे भय या आतंक के अर्थ में समझें; और सब खरे व्याख्याकारों का यही मत है। अब यह विचार करना है कि दाऊद किस प्रकार के भय की चर्चा करता है। परमेश्वर सामान्यतः अपने चुने हुए लोगों को भी भय के द्वारा आज्ञाकारिता के अधीन करता है। परन्तु क्योंकि वह उनके प्रति अपनी कठोरता को संयमित करता है, और साथ ही उनके पत्थर-से हृदयों को कोमल कर देता है, जिससे वे स्वेच्छा से और शान्तिपूर्वक अपने आप को उसके अधीन कर देते हैं, इसलिये ठीक-ठीक यह नहीं कहा जा सकता कि वह उन्हें भय के द्वारा विवश करता है। तिरस्कृत लोगों के साथ वह भिन्न रीति से व्यवहार करता है। क्योंकि उनकी कठोरता ऐसी अटल है कि उन्हें झुकाने की अपेक्षा तोड़ना सहज है, इसलिये वह उनकी हताश हठधर्मिता को बलपूर्वक दबाता है; इसलिये नहीं कि वे सुधर जाते हैं, वरन् इसलिये कि वे चाहें या न चाहें, उनसे उनकी अपनी दुर्बलता की स्वीकृति बलपूर्वक निकलवा ली जाती है। वे दाँत पीसें और क्रोध से खौलें, और क्रूरता में जंगली पशुओं से भी बढ़ जाएँ, परन्तु जब परमेश्वर का आतंक उन्हें आ घेरता है, तब वे अपने ही उपद्रव से गिरा दिए जाते हैं, और अपने ही बोझ से ढह पड़ते हैं। कुछ लोग इन शब्दों को एक ऐसी प्रार्थना के रूप में समझाते हैं कि परमेश्वर जातियों को दाऊद के जूए के अधीन कर दे और उन्हें उसके शासन का करदाता बना दे; परन्तु यह एक फीकी और खींच-तान की हुई व्याख्या है। भय शब्द में सामान्य रूप से परमेश्वर की वे सब विपत्तियाँ सम्मिलित हैं, जिनके द्वारा, मानो हथौड़े के भारी प्रहारों से, उन लोगों का विद्रोह पीछे धकेला जाता है जो बिना विवश किए कभी उसकी आज्ञा न मानते।
कसदी अनुवाद में "भय" पढ़ा गया है, परन्तु सुरियानी, इथियोपियाई और वल्गेट अनुवाद सेप्टुआजिन्ट का अनुसरण करते हैं। अरबी अनुवाद लगभग उसी आशय का एक शब्द प्रयोग करता है, जिसका अर्थ व्यवस्था का शिक्षक या उपदेशक है। उसमें यह है, "हे प्रभु, उन पर एक शिक्षक ठहरा।" ऑगस्टीन और जेरोम ने, जिन्होंने सेप्टुआजिन्ट का पाठ अपनाया, इन शब्दों का अनुवाद यों किया है, "हे प्रभु, उन पर एक व्यवस्था देनेवाला ठहरा;" और उनका मत यह था कि व्यवस्था देनेवाले का अर्थ मसीह-विरोधी है, जिसे परमेश्वर ने अपने क्रोध में जातियों पर प्रभुता दी। दूसरों के अनुसार व्यवस्था देनेवाले का अर्थ मसीह है। डॉ. हॉर्स्ली का पाठ है, "हे यहोवा, तू उन पर एक शिक्षक नियुक्त कर।" ऐन्सवर्थ और डॉ. एडम क्लार्क भी यही अनुवाद अपनाते हैं, और इन शब्दों को एक ऐसी प्रार्थना मानते हैं कि जातियाँ दीनता और भक्ति सीखें, कि वे परमेश्वर के प्रति अपनी जवाबदेही को जानें, और उद्धार के लिये बुद्धिमान बनें।
इसके बाद वह बात आती है जिस तक जातियों को पहुँचाया जाना है, अर्थात् यह कि वे अपने आप को नश्वर मनुष्य मान लें। पहली दृष्टि में यह एक छोटी-सी बात प्रतीत होती है; परन्तु जो शिक्षा इसमें निहित है वह तुच्छ होने से कोसों दूर है। मनुष्य है ही क्या, कि वह अपने ही बल पर एक उँगली भी हिलाने का साहस करे? तौभी सब भक्तिहीन ऐसे साहस और ढिठाई से अति की ओर दौड़ते हैं मानो उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ करने से रोकनेवाला कुछ भी न हो। निश्चय ही यह एक विकृत कल्पना के कारण है कि वे उस बात का दावा अपने लिये करते हैं जो केवल परमेश्वर ही की है; और संक्षेप में, यदि वे अपनी दशा से अनजान न होते, तो वे कभी इतनी बड़ी अति की ओर न दौड़ते। दाऊद, जब परमेश्वर से विनती करता है कि वह जातियों को आतंकित करे, ताकि वे जान लें कि वे मनुष्य ही हैं, तो उसका अर्थ यह नहीं कि भक्तिहीन परमेश्वर की छड़ियों और ताड़नाओं के अधीन इतना लाभ उठाएँगे कि सच्चाई से और हृदय से दीन हो जाएँ; वरन् जिस ज्ञान की वह चर्चा करता है उसका अर्थ केवल अपनी दुर्बलता का अनुभव है। उसकी भाषा मानो यह कह रही है, हे प्रभु, क्योंकि उनकी अपने विषय की अज्ञानता ही उन्हें मेरे विरुद्ध क्रोध में दौड़ा ले जाती है, इसलिये उन्हें वास्तव में यह अनुभव करा कि उनका बल उनके मूर्खतापूर्ण अहंकार के बराबर नहीं है, और अपनी व्यर्थ आशाओं में निराश होने के बाद वे लज्जा से घबराए और नीचा किए हुए पड़े रहें। प्रायः ऐसा हो सकता है कि जो लोग अपनी दुर्बलता का बोध प्राप्त कर लेते हैं, वे फिर भी नहीं सुधरते; परन्तु यह बड़ा लाभ है जब उनका भक्तिहीन अहंकार संसार के सामने ठट्ठे और तिरस्कार का पात्र बना दिया जाता है, ताकि प्रकट हो जाए कि वह भरोसा कितना हास्यास्पद था जो उन्होंने ढिठाई से अपने बल पर रखा था। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उसकी ताड़नाओं के अधीन दूसरी रीति से लाभ उठाना चाहिये। उन्हें उचित है कि अपनी दुर्बलता के बोध से दीन हों, और स्वेच्छा से सारे व्यर्थ भरोसे और अहंकार को त्याग दें। और यदि वे स्मरण रखें कि वे केवल मनुष्य ही हैं, तो ऐसा ही होगा। ऑगस्टीन ने ठीक और बुद्धिमानी से कहा है कि मनुष्य की सारी दीनता आत्म-ज्ञान ही में है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि अहंकार सब में स्वाभाविक है, इसलिये परमेश्वर को आवश्यक होता है कि वह बिना भेदभाव के सब मनुष्यों को आतंकित करे, ताकि एक ओर उसकी अपनी प्रजा दीन होना सीखे, और दूसरी ओर दुष्ट, यद्यपि वे अपने आप को मनुष्य की दशा से ऊपर उठाना नहीं छोड़ते, लज्जा और व्याकुलता के साथ पीछे धकेल दिए जाएँ।
"Tous fleax de Dieu par lesquels est rembarre comme a grans coups de marteau." — फ्रांसीसी.
मूल शब्द אנוש एनोश है; और इसलिये यह एक प्रार्थना है कि वे अपने आप को केवल दुःखी, दुर्बल और मरनहार मनुष्य जान लें। यह शब्द एकवचन में है, परन्तु इसका प्रयोग समूहवाचक रूप में हुआ है।
