भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 28

भजन 28

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भजन 28

भजन 28.

परमेश्वर की सहायता से बड़े-बड़े संकटों से छुड़ाए जाने के पश्चात्, दाऊद इस भजन में अपनी रीति के अनुसार पहले उन मन्नतों का वर्णन करता है जो उसने अपनी कठिनाइयों के बीच मानी थीं, और फिर परमेश्वर के प्रति अपने धन्यवाद और स्तुति का, ताकि दूसरे लोग भी उसके उदाहरण का अनुसरण करने को प्रेरित हों। सम्भव है कि वह यहाँ उन सतावों की चर्चा करता है जो शाऊल के द्वारा उस पर हुए थे।

दाऊद का भजन।

भजन 28:1-2

1. हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूँगा; हे मेरे बल, मेरी ओर से चुप न रह; ऐसा न हो कि यदि तू मेरे प्रति चुप रहे, तो मैं कबर में उतरनेवालों के समान हो जाऊँ। 2. जब मैं तेरी दोहाई दूँ, जब मैं तेरी पवित्रता के पवित्रस्थान की ओर अपने हाथ उठाऊँ, तब मेरी प्रार्थनाओं का शब्द सुन ले।

1. हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूँगा। भजनकार यह घोषणा करते हुए आरम्भ करता है कि वह केवल परमेश्वर ही की सहायता की शरण लेगा, जिससे उसका विश्वास और उसकी सच्चाई दोनों प्रकट होते हैं। यद्यपि मनुष्य सब कहीं अनगिनत विपत्तियों के नीचे कष्ट उठाते हैं, तौभी सौ में से कठिनता से एक भी कभी परमेश्वर की शरण लेता है। प्रायः सब के सब, जिनके विवेक दोष से बोझिल हैं, और जिन्होंने ईश्वरीय अनुग्रह की उस सामर्थ्य का कभी अनुभव नहीं किया जो उन्हें उसकी शरण लेने को प्रेरित कर सकती, या तो घमण्ड से लगाम को चबाते रहते हैं, या व्यर्थ विलापों से आकाश को भर देते हैं, या निराशा के वश में होकर अपने क्लेशों के नीचे मूर्छित हो जाते हैं। परमेश्वर को अपना बल कहकर दाऊद और भी स्पष्टता से दिखाता है कि उसने परमेश्वर की सहायता पर केवल तभी भरोसा नहीं रखा जब वह छाया में और शान्ति में था, परन्तु तब भी जब वह अत्यन्त कठोर परीक्षाओं के सामने खड़ा था। अपनी तुलना मृतकों से करके भी वह संकेत करता है कि उसकी विपत्तियाँ कितनी बड़ी थीं; तौभी उसका उद्देश्य केवल अपने संकट की विशालता बताना नहीं था, परन्तु यह भी दिखाना था कि जब उसे सहायता की आवश्यकता पड़ी, तब उसने उसके लिए इधर-उधर नहीं देखा, वरन् केवल परमेश्वर ही पर भरोसा किया, जिसकी कृपा के बिना उसके लिए कोई आशा शेष न थी। इसलिए यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, यदि तू मुझे छोड़ दे तो मैं कुछ भी नहीं; यदि तू मेरी सहायता न करे तो मैं नाश हो जाऊँगा। जो मनुष्य क्लेश की ऐसी दशा में है, उसके लिए अपनी दुर्दशा का बोध होना ही पर्याप्त नहीं, जब तक कि वह अपने आप को सहायता करने में असमर्थ जानकर, और संसार की सारी सहायता को त्यागकर, केवल परमेश्वर ही की शरण न ले। और जैसे पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर सच्चे विश्वासियों को तब उत्तर देता है जब वह अपने कार्यों के द्वारा दिखाता है कि वह उनकी विनतियों पर ध्यान देता है, वैसे ही चुप शब्द उसकी सहायता के प्रत्यक्ष और वर्तमान अनुभव के विपरीत रखा गया है, जब वह मानो उनकी प्रार्थनाओं को सुनता हुआ दिखाई नहीं देता।

2. जब मैं तेरी दोहाई दूँ, तब मेरी प्रार्थनाओं का शब्द सुन ले। यह दोहराव व्याकुल हृदय का चिह्न है। प्रार्थना में दाऊद की उत्कटता और प्रचण्डता शब्द का अर्थ देनेवाली संज्ञा और दोहाई देना का अर्थ देनेवाली क्रिया के द्वारा भी सूचित होती है। उसका आशय यह है कि वह चिन्ता और भय से इतना व्याकुल था कि उसने ठण्डे मन से नहीं, परन्तु जलती हुई, प्रबल लालसा से प्रार्थना की, उन लोगों के समान जो शोक के दबाव में ऊँचे स्वर से चिल्ला उठते हैं। पद के दूसरे भाग में उपलक्षण अलंकार के द्वारा चिह्न से चिह्नित वस्तु का संकेत किया गया है। सब युगों में मनुष्यों की यह सामान्य रीति रही है कि वे प्रार्थना में अपने हाथ उठाते हैं। प्रकृति ने यह मुद्रा अन्यजाति मूर्तिपूजकों से भी करवा ली है, ताकि एक दृश्य चिह्न के द्वारा यह दिखाया जाए कि उनके मन केवल परमेश्वर ही की ओर लगे हुए थे। यह सच है कि अधिकांश लोग इस विधि से ही सन्तुष्ट होकर अपनी ही गढ़ी हुई बातों में व्यर्थ लगे रहते हैं; परन्तु जब कपट और छल न हो, तब हाथों का उठाना ही भक्तिपूर्ण और उत्साहपूर्ण प्रार्थना में एक सहायता है। तौभी दाऊद यहाँ यह नहीं कहता कि उसने अपने हाथ स्वर्ग की ओर उठाए, परन्तु पवित्रस्थान की ओर, ताकि उसकी सहायता से वह और भी सहजता से स्वर्ग तक चढ़ सके। वह ऐसा स्थूल-बुद्धि, या बाहरी पवित्रस्थान से ऐसे अन्धविश्वासपूर्वक बँधा हुआ न था कि यह न जानता हो कि परमेश्वर को आत्मिक रीति से खोजना चाहिए, और कि मनुष्य उसके निकट तभी आते हैं जब वे संसार को छोड़कर विश्वास के द्वारा स्वर्गीय महिमा तक प्रवेश करते हैं। परन्तु यह स्मरण रखते हुए कि वह मनुष्य है, उसने अपनी दुर्बलता के लिए दी गई इस सहायता की उपेक्षा न की। क्योंकि पवित्रस्थान परमेश्वर की वाचा का बयाना या चिह्न था, इसलिए दाऊद ने वहाँ परमेश्वर के प्रतिज्ञा किए हुए अनुग्रह की उपस्थिति को ऐसे देखा मानो वह दर्पण में दिखाई गई हो; ठीक वैसे ही जैसे आज विश्वासी, यदि वे यह अनुभव करना चाहते हैं कि परमेश्वर उनके निकट है, तो उन्हें तुरन्त अपना विश्वास मसीह की ओर लगाना चाहिए, जो अपने देहधारण में हमारे पास उतर आया, ताकि हमें पिता तक ऊपर उठाए। तो हम यह समझ लें कि दाऊद पवित्रस्थान से किसी और उद्देश्य से नहीं, केवल इसी से लिपटा रहा कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा की सहायता से वह संसार की आदि-शिक्षाओं से ऊपर उठ सके, जिनका उपयोग वह फिर भी व्यवस्था के ठहराव के अनुसार करता था। इब्रानी शब्द דביר debir, जिसका अनुवाद हमने पवित्रस्थान किया है, निवासस्थान या मन्दिर की भीतरी कोठरी, अर्थात् परमपवित्र स्थान का अर्थ देता है, जहाँ वाचा का सन्दूक रखा रहता था; और उसका यह नाम उन उत्तरों या दैववाणियों के कारण पड़ा जो परमेश्वर वहाँ से देता था, ताकि अपनी प्रजा को यह प्रमाण दे कि उसकी कृपा उनके बीच उपस्थित है।

भजन 28:3-5

3. मुझे दुष्टों के साथ, और अनर्थकारियों के साथ घसीट न ले जा, जो अपने पड़ोसियों से शान्ति की बातें बोलते हैं, जबकि उनके मन में बुराई रहती है। 4. उनके कामों के अनुसार, और उनकी करनी की बुराई के अनुसार उन्हें दे; उनके हाथों के काम के अनुसार उन्हें दे; उनका बदला उन्हें दे। 5. क्योंकि वे यहोवा के कामों पर, और उसके हाथों के काम पर ध्यान नहीं देते, वह उन्हें ढा दे, और फिर न बनाए।

3. मुझे दुष्टों के साथ घसीट न ले जा। अर्थ यह है कि ऐसी भिन्न परिस्थितियों में परमेश्वर धर्मियों को दुष्टों के साथ एक ही अन्धाधुन्ध विनाश में न मिला दे। निःसन्देह अपने शत्रुओं के विषय में बोलते हुए वह परोक्ष रूप से अपनी खराई का भी दावा करता है। परन्तु उसने इस प्रकार इसलिए प्रार्थना नहीं की कि वह सोचता था कि परमेश्वर मनुष्यों पर बिना भेद और बिना कारण क्रोधित होता है; वरन् वह परमेश्वर के स्वभाव से यह तर्क करता है कि उसे अच्छी आशा रखनी चाहिए, क्योंकि धर्मी और दुष्ट के बीच भेद करना, और हर एक को उसका उचित प्रतिफल देना परमेश्वर का विशेषाधिकार है। अनर्थकारियों से उसका अभिप्राय उन मनुष्यों से है जो पूर्णतः दुष्टता के अधीन हो गए हैं। परमेश्वर की सन्तान कभी-कभी गिर पड़ती है, भूलें करती है, और किसी न किसी रीति से अनुचित आचरण करती है, परन्तु वे अपने बुरे कामों में कोई आनन्द नहीं पाते; इसके विपरीत, परमेश्वर का भय उन्हें मन फिराव के लिए उकसाता है। इसके बाद दाऊद उन लोगों की दुष्टता को, जिनका वह वर्णन करता है, परिभाषित करता और विस्तार से बताता है; क्योंकि वे मित्रता का बहाना करके भले मनुष्यों को विश्वासघात से धोखा देते थे, अपनी जीभ से एक बात कहते थे, जबकि अपने हृदयों में बिलकुल दूसरी बात रखते थे। खुली भ्रष्टता को सहना लोमड़ी की इस धूर्तता से सहज है, जब लोग हानि पहुँचाने का अवसर पाने के लिए सुन्दर रूप धारण करते हैं। अतः यह सत्य हमें चेतावनी देता है कि परमेश्वर की दृष्टि में वे लोग अत्यन्त घृणित हैं, जो सीधे-सादे और असावधान लोगों पर मीठी बातों से ऐसे आक्रमण करते हैं मानो विष से।

शब्द דביר debir, דבר dabar से निकला है, जिसका अर्थ है बोलना। क्रिया משך mashak, जिसका अनुवाद यहाँ घसीट ले जाना किया गया है, जैसा कि हैमण्ड टिप्पणी करता है, "खींचना और पकड़ लेना दोनों का अर्थ देती है," और "यहाँ इसका सबसे अच्छा अनुवाद यह हो सकता है, मुझे न पकड़, जैसे कोई किसी को घसीटकर या खींचकर प्राणदण्ड के लिए ले जाने को पकड़ लेता है। सेप्टुआजिंट, इब्रानी का शाब्दिक अनुवाद ΜὴσυνελκύσὟς την ψυχήν μου, मेरे प्राण को … के साथ न खींच इत्यादि करने के पश्चात्, यह भी जोड़ता है Κίαν μὴσυναπολέσὟς με इत्यादि, और मुझे … के साथ नाश न कर इत्यादि।" कैल्विन यहाँ स्पष्टतः यही दृष्टिकोण अपनाता है; यद्यपि वह इसे शब्द-समीक्षा के रूप में व्यक्त नहीं करता।

4. उनके कामों के अनुसार उन्हें दे। इस प्रकार परमेश्वर से यह विनती करने के पश्चात् कि वह उसकी निर्दोषता पर ध्यान दे, भजनकार अपने शत्रुओं के विरुद्ध एक शाप गरजकर सुनाता है। और शब्दों का यह ढेर दिखाता है कि ऐसे प्रतिशोध की इच्छा करने को फूट पड़ने से पहले वह बहुत समय तक और बड़ी पीड़ा से उस बोझ के नीचे कराहता रहा था। वह संकेत करता है कि जिन दुष्टों के विषय में वह बोलता है, उन्होंने न एक बार, न थोड़े समय तक, न एक ही रीति से अपराध किया था, परन्तु वे अपने निरन्तर बुरे कामों में इतने आगे बढ़ गए थे कि उनका दुस्साहस अब सहा नहीं जा सकता था। हम जानते हैं कि दुष्टों को बिना सीमा और बिना अन्त के आगे बढ़ते देखना कैसी कष्टदायक और दुःखद परीक्षा है, मानो परमेश्वर उनकी दुष्टता की ओर से आँखें मूँद लेता हो। इसलिए दाऊद, मानो निरन्तर सहते-सहते थककर, और बोझ के नीचे मूर्छित होकर, अन्त में परमेश्वर से विनती करता है कि वह उसके शत्रुओं की उस उच्छृंखलता को रोके, जो हाल में दुष्टता पर दुष्टता का ढेर लगाते नहीं थकते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस पद में कुछ भी अनावश्यक नहीं है, जब वह कामों के साथ उनकी करनी की बुराई और उनके हाथों का काम जोड़ता है, और तीन बार विनती करता है कि वे वह प्रतिफल पाएँ जिसके वे योग्य हैं। इसके साथ यह भी जोड़ो कि वह साथ ही अपने विश्वास की भी गवाही देता है, जिसके लिए डींग मारनेवाले कपटी अक्सर परमेश्वर की सन्तान को विवश कर देते हैं, जबकि वे अपने छल और कुतर्कों के द्वारा संसार के निर्णयों को धोखा देते हैं। हम देखते हैं कि दुष्टता के लिए प्रसिद्ध मनुष्य स्वयं दण्ड से बचे रहने से सन्तुष्ट न होकर, झूठे दोष लगाकर निर्दोषों पर अत्याचार करने से नहीं रुक सकते, ठीक उस भेड़िये के समान जिसने, प्रचलित कहावत के अनुसार, मेमनों को अपना शिकार बनाने की इच्छा से उन पर पानी गंदा करने का दोष लगाया। इसलिए दाऊद इस आवश्यकता से विवश होकर सुरक्षा के लिए परमेश्वर को पुकारता है। यहाँ फिर प्रतिशोध के लिए प्रार्थना करने का कठिन प्रश्न सामने आता है, जिसे फिर भी मैं थोड़े शब्दों में निपटाऊँगा, क्योंकि मैं अन्यत्र उस पर विचार कर चुका हूँ। तो पहली बात यह निर्विवाद है कि यदि शरीर हमें बदला लेने को उकसाता है, तो वह इच्छा परमेश्वर की दृष्टि में दुष्ट है। वह न केवल हमें निजी हानियों का बदला लेने के लिए अपने शत्रुओं पर बुराई का शाप देने से मना करता है, परन्तु यह अन्यथा हो ही नहीं सकता कि घृणा से उत्पन्न होनेवाली सब इच्छाएँ अव्यवस्थित हों। इसलिए दाऊद का उदाहरण वे लोग प्रस्तुत न करें जो अपनी असंयमी वासना से प्रेरित होकर प्रतिशोध चाहते हैं। पवित्र भविष्यद्वक्ता यहाँ अपने शत्रुओं को विनाश के लिए अर्पित करने में अपने निजी शोक से भड़का हुआ नहीं है; परन्तु शरीर की इच्छा को एक ओर रखकर, वह स्वयं विषय के सम्बन्ध में न्याय करता है। इसलिए इससे पहले कि कोई मनुष्य दुष्टों के विरुद्ध प्रतिशोध की घोषणा कर सके, उसे पहले अपने मन की सब अनुचित भावनाओं से अपने आप को झाड़कर मुक्त करना चाहिए।

"Que ceste finesse de renard, quand on use de beaux semblans pour avoir occasion de nuire." — फ्रांसीसी.

"Voulant devorer les agneaux." — फ्रांसीसी.

दूसरी बात यह कि विवेक से काम लिया जाना चाहिए, ताकि जो बुराइयाँ हमें ठेस पहुँचाती हैं उनकी जघन्यता हमें असंयमी उत्साह की ओर न ढकेल दे, जैसा कि मसीह के चेलों के साथ भी हुआ, जब उन्होंने चाहा कि स्वर्ग से आग उतारी जाए कि वह उन्हें भस्म कर दे जिन्होंने उनके स्वामी को ठहराने से इनकार किया था (लूका 9:54)। यह सच है कि उन्होंने एलिय्याह के उदाहरण के अनुसार काम करने का बहाना किया; परन्तु मसीह ने उन्हें कड़ाई से डाँटा, और उनसे कहा कि वे नहीं जानते कि वे किस आत्मा से प्रेरित हैं। विशेष रूप से हमें यह सामान्य नियम मानना चाहिए कि हम सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण की हृदय से इच्छा करें और उसके लिए परिश्रम करें। इस प्रकार यह होगा कि हम न केवल परमेश्वर की दया के कार्य को स्थान देंगे, परन्तु उन लोगों के मन फिराव की भी इच्छा करेंगे जो हठपूर्वक अपने ही विनाश की ओर दौड़ते हुए दिखाई देते हैं। सारांश यह कि दाऊद, हर बुरी वासना से मुक्त होकर, और विवेक तथा न्याय के आत्मा से भी सम्पन्न होकर, यहाँ अपने कारण की उतनी पैरवी नहीं करता जितनी परमेश्वर के कारण की। और इस प्रार्थना के द्वारा वह अपने आप को और विश्वासियों को आगे यह स्मरण दिलाता है कि यद्यपि दुष्ट कुछ समय तक दण्ड से बचे रहकर हर प्रकार के दुराचार को करने में अपने आप को खुली छूट दे सकते हैं, तौभी अन्त में उन्हें परमेश्वर के न्यायासन के सामने खड़ा होना ही पड़ेगा।

5. क्योंकि वे यहोवा के कामों पर ध्यान नहीं देते। इस पद में वह अभक्ति की जड़ को खोलकर दिखाता है, यह घोषणा करते हुए कि दुष्ट हानि पहुँचाने में इतने ढीठ इसलिए हैं, क्योंकि जब वे इस प्रकार अपनी घृणा को पूरा करते और हर प्रकार की दुष्टता करते हैं, तब वे सोचते हैं कि उनका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं। और जब विवेक उन्हें डंक मारता है, तब वे झूठी आशाओं से अपने आप को बहलाते हैं, और अन्त में हठ करके अपने आप को कठोर बनाकर संवेदनहीन हो जाते हैं। पहले तो, समृद्धि के नशे में चूर होकर, वे अपने आप को यह फुसलाते हैं कि परमेश्वर उनका मित्र है, जबकि उन भले मनुष्यों की उसे कोई चिन्ता नहीं जो इतने क्लेशों से दबे हुए हैं; और फिर, वे अपने मन को यह समझा लेते हैं कि संसार संयोग से चलता है, और इस प्रकार दिन के स्पष्ट प्रकाश के बीच अपने आप को अन्धा कर लेते हैं। इसी रीति से दाऊद के विरोधी, जान-बूझकर इस बात से अनजान बने रहकर कि परमेश्वर ने उसे राजा ठहराया था, उसे सताने का साहस करते थे। इसलिए वह इस विषय में उनकी घोर अज्ञानता की शिकायत करता है, ठीक जैसे यशायाह (यशायाह 5:20) अपने दिनों के सब दुष्टों के विरुद्ध सामान्य शब्दों में यही शिकायत करता है। तो इस शिक्षा का दोहरा उपयोग है। पहला, परमेश्वर की सन्तान के लिए यह कोई छोटी सान्त्वना नहीं है कि जब वे अन्याय से सताई जाती हैं, तब उन्हें यह निश्चय हो कि परमेश्वर के विधान के द्वारा वे इस प्रकार लाभदायक रीति से धीरज में अभ्यस्त की जा रही हैं; और कि जब इस संसार के सब काम उथल-पुथल और गड़बड़ी की दशा में हैं, तब भी परमेश्वर स्वर्ग में सर्वोच्च होकर विराजमान है, और सब वस्तुओं का संचालन और शासन करता है। दूसरा, यह हमारे शरीर की वासनाओं को वश में करने के लिए बहुत उचित लगाम है, ताकि हम अण्डाबेटीज़ के समान अन्धेरे में और आँखें मूँदकर न लड़ें, मानो परमेश्वर नीचे यहाँ होनेवाली बातों को न देखता हो और न उनकी चिन्ता करता हो। इसलिए आओ, हम ध्यानपूर्वक यह विचार करना सीखें कि जो न्याय परमेश्वर करता है, वे सब मानवजाति के शासन में उसकी धार्मिकता के इतने ही प्रमाण हैं; और कि यद्यपि सब वस्तुएँ गड़बड़ी में एक साथ उलझी हुई हों, तौभी विश्वास की आँख स्वर्ग की ओर लगी रहनी चाहिए, ताकि वह परमेश्वर के गुप्त न्यायों पर विचार करे। और क्योंकि परमेश्वर घोरतम अन्धकार के बीच भी अपने विधान के कुछ चिह्न देना कभी नहीं छोड़ता, इसलिए उन पर ध्यान न देना अक्षम्य आलस्य है। भविष्यद्वक्ता इस हठीलेपन को और भी गम्भीर ठहराता है, जब वह फिर से परमेश्वर के हाथों के काम दोहराता है। इस प्रकार वह संकेत करता है कि दुष्ट लापरवाही से अपने मार्ग पर चलते हुए, परमेश्वर के जो भी काम उनके उन्माद को रोकने के लिए उनके सामने आते हैं, उन सब को पाँवों तले रौंद डालते हैं।

वह उन्हें ढा दे, और फिर न बनाए। कुछ लोगों का मत है कि इस पद का पहला भाग अन्तिम उपवाक्य की क्रियाओं के लिए संज्ञा के स्थान पर कर्ता है; मानो दाऊद ने कहा हो, यह पाशविक उन्माद उन्हें ढा देगा; परन्तु इसके स्थान पर परमेश्वर का नाम जोड़ना चाहिए, और तब प्रसंग बहुत उत्तम रीति से चलेगा। तौभी, क्योंकि इब्रानी में क्रियाएँ भविष्यत् काल में हैं, इसलिए वाक्य की व्याख्या यों भी की जा सकती है कि दाऊद अब उन निकम्मों के विनाश का, जिसके लिए उसने अभी-अभी प्रार्थना की थी, अपने आप को निश्चय दिलाता है। मैं इस व्याख्या को अस्वीकार नहीं करता; परन्तु मेरी सम्मति में ये शब्द उसकी विनतियों का ही सिलसिला हैं। इस रीति से वह प्रार्थना करता है कि दुष्ट ऐसे उलट दिए जाएँ कि फिर न उठें, और न अपनी पहली दशा को फिर से पाएँ। यह अभिव्यक्ति, वह उन्हें ढा दे, और फिर न बनाए, इब्रानियों में बोलचाल की एक सामान्य रीति है, उसके अनुसार जो मलाकी एदोम के विषय में कहता है, "सेनाओं का यहोवा यों कहता है, वे बनाएँगे, परन्तु मैं ढा दूँगा" (मलाकी 1:4)। इसलिए, कहीं ऐसा न हो कि हम किसी असाध्य विपत्ति से मारे जाएँ, आओ हम परमेश्वर के कामों पर विचार करने के लिए अपने मनों को जगाना सीखें, ताकि हम उसका भय मानना, धीरज में स्थिर रहना, और भक्ति में बढ़ते जाना सीखें।

भजन 28:6-8

6. यहोवा धन्य हो, क्योंकि उसने मेरी गिड़गिड़ाहट का शब्द सुना है। 7. यहोवा मेरा बल और मेरी ढाल है; मेरे मन ने उस पर भरोसा रखा, और मेरी सहायता हुई है; इसलिए मेरा हृदय आनन्दित होगा, और मैं गीत गाकर उसकी स्तुति करूँगा। 8. यहोवा उनका बल है; और वह अपने अभिषिक्त के उद्धारों [या छुटकारों] का भी बल है।

"Conduisant et gouvernant toutes choses." — फ्रांसीसी. "C'estoyent certains peuples ou escrimeurs qui souloyent ainsi comme etre. Voyez les Chiliades d'Erasme." — टिप्पणी, फ्रांसीसी हाशिया. "ये कुछ लोग या तलवारबाज़ थे, जो इसी रीति से लड़ा करते थे। इरैस्मस की कीलियाडीज़ देखिए।"

"वह उन्हें ढा देगा, और फिर न बनाएगा।"

6. यहोवा धन्य हो, जिसने सुना है। यह भजन का दूसरा भाग है, जिसमें भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को धन्यवाद देना आरम्भ करता है। हम देख चुके हैं कि अपने संकटों के बीच वह किस प्रकार प्रार्थना में लगा रहा; और अब इस धन्यवाद के द्वारा वह हमें सिखाता है कि उसकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं थीं। इस प्रकार वह अपने ही उदाहरण से पुष्टि करता है कि जब कभी उसके लोग सच्चाई और निष्कपटता से उसे खोजते हैं, तब परमेश्वर उनकी सहायता करने को तैयार रहता है। अगले पद में वह यही सत्य और भी पूर्णता से घोषित करता है, परमेश्वर को अपना बल और अपनी ढाल कहकर; क्योंकि इस बात से कि वह आश्चर्यजनक रीति से सुरक्षित रखा गया था, उसे निश्चय हो गया था कि परमेश्वर ने उसकी सुन ली है। वह आगे कहता है कि उसके भरोसे और आशा के कारण उसकी सहायता हुई; क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि जो परमेश्वर को पुकारते हैं, वे फिर भी अपने ही अविश्वास के कारण उसके अनुग्रह से वंचित रह जाते हैं। तीसरी बात, वह कहता है कि वह अपने आनन्द के साथ अपनी कृतज्ञता की गवाही भी जोड़ेगा। दुष्ट मनुष्य और कपटी, जब कठिनाइयों से दब जाते हैं, तब परमेश्वर की ओर भागते हैं, परन्तु ज्योंही वे उनसे बच निकलते हैं, अपने छुड़ानेवाले को भूलकर उन्मत्त हर्ष से आनन्द मनाते हैं। सारांश यह कि दाऊद ने व्यर्थ भरोसा नहीं रखा, क्योंकि उसने सचमुच अनुभव से जान लिया कि परमेश्वर के पास अपने दासों की रक्षा करने की सदा उपस्थित सामर्थ्य है; और कि उसके लिए यह सच्चे और ठोस आनन्द का विषय था कि उसने परमेश्वर को सदा अपने प्रति कृपालु पाया। इसी कारण वह यह प्रतिज्ञा भी करता है कि वह परमेश्वर को स्मरण रखेगा और उसका कृतज्ञ रहेगा। और निःसन्देह, जब परमेश्वर हमारे हृदयों में प्रफुल्लता फैलाता है, तो वह इसलिए होता है कि हमारे मुँह उसकी स्तुति गाने के लिए खुलें।

8. यहोवा उनका बल है। व्याख्या के रूप में वह वही दोहराता है जो उसने पहले कहा था, कि परमेश्वर उसका बल रहा था; अर्थात् इसलिए कि उसने उसकी सेनाओं को आशीष दी थी। दाऊद ने निश्चय ही मनुष्यों के हाथ और परिश्रम का उपयोग किया था, परन्तु विजय का श्रेय वह केवल परमेश्वर ही को देता है। क्योंकि वह जानता था कि मनुष्यों से जो भी सहायता उसे मिली थी वह परमेश्वर ही से आई थी, और कि उसकी सफलता भी उसकी सेंतमेंत कृपा ही से बही थी, इसलिए उसने इन साधनों में उसके हाथ को ऐसी स्पष्टता से पहचाना मानो वह स्वर्ग से बढ़ाया गया हो। और निश्चय ही यह अत्यन्त लज्जा की बात है कि मानवीय साधन, जो परमेश्वर की सामर्थ्य के केवल उपकरण हैं, उसकी महिमा को धुँधला कर दें; यद्यपि इससे अधिक सामान्य कोई पाप नहीं। यह बोलने की एक बड़ी वजनदार रीति है, जब अपने सैनिकों के विषय में बोलते हुए वह केवल सर्वनाम उनका का प्रयोग करता है, मानो वह उँगली से उनकी ओर संकेत कर रहा हो। दूसरा उपवाक्य पहले का कारण बताता है। वह घोषित करता है कि वह स्वयं और उसकी सारी सेना स्वर्ग से विजयी वीरता से सम्पन्न की गई थी, क्योंकि वह परमेश्वर के झण्डे के नीचे लड़ता था। अभिषिक्त शब्द का यही अर्थ है; क्योंकि यदि परमेश्वर ने उसे राजा न ठहराया होता, और सेंतमेंत उसे गोद न लिया होता, तो वह उस पर शाऊल से अधिक कृपा न करता। इस रीति से, केवल परमेश्वर की उस सामर्थ्य की बड़ाई करते हुए जिसने उसे राज्य तक पहुँचाया, वह अपनी नीति या अपनी शक्ति को कुछ भी श्रेय नहीं देता। इस बीच हम यह सीख सकते हैं कि जब किसी को अपनी बुलाहट के वैध होने का निश्चय हो, तब यह शिक्षा उसे अपने कामों के सफल परिणाम के विषय में अच्छी आशा रखने के लिए प्रोत्साहित करती है। विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है, जैसा कि हम अन्य स्थान पर संक्षेप में बता चुके हैं, कि वह सोता जिससे वे सब आशीषें बहती हैं जो परमेश्वर हमें प्रदान करता है, यह है कि उसने हमें मसीह में चुन लिया है।

दाऊद उद्धारों या छुटकारों का प्रयोग बहुवचन में करता है, क्योंकि वह बार-बार और विविध रीतियों से बचाया गया था। इसलिए अर्थ यह है कि जिस समय से परमेश्वर ने शमूएल के हाथ से उसका अभिषेक किया था, उसने उसकी सहायता करना कभी नहीं छोड़ा, परन्तु अनगिनत रीतियों से उसे छुड़ाता रहा, जब तक कि उसने उसमें अपने अनुग्रह का कार्य पूरा न कर लिया।

भजन 28:9

9. अपनी प्रजा का उद्धार कर, और अपने निज भाग को आशीष दे; उनकी चरवाही कर, और सदा उन्हें उठाए रह।

इस पद में वह दिखाता है कि उसकी चिन्ता का विषय उसका अपना कल्याण उतना नहीं था जितना सम्पूर्ण कलीसिया का कल्याण, और कि वह न अपने लिए जीता था और न अपने लिए राज्य करता था, परन्तु प्रजा की सामान्य भलाई के लिए। वह भली-भाँति जानता था कि वह किसी और उद्देश्य से राजा नियुक्त नहीं किया गया था। इसमें वह अपने आप को परमेश्वर के पुत्र का प्रतिरूप घोषित करता है, जिसके विषय में जब जकर्याह (जकर्याह 9:9) भविष्यद्वाणी करता है कि वह "उद्धार पाए हुए" आएगा, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उसके अंगों से अलग उसे कुछ भी देने की प्रतिज्ञा नहीं करता, परन्तु यह कि इस उद्धार के प्रभाव उसकी सम्पूर्ण देह में फैल जाएँगे। अतः इस उदाहरण के द्वारा वह पृथ्वी के राजाओं के लिए एक नियम ठहराता है, कि वे सार्वजनिक भलाई के लिए अपने आप को समर्पित करके, केवल अपनी प्रजा के निमित्त ही सुरक्षित रखे जाने की इच्छा करें। वास्तव में स्थिति इससे कितनी भिन्न है, यह कहना अनावश्यक है। घमण्ड और अहंकार से अन्धे होकर वे शेष संसार को तुच्छ जानते हैं, मानो उनकी धूमधाम और प्रतिष्ठा ने उन्हें मनुष्य की सामान्य दशा से बिलकुल ऊपर उठा दिया हो। और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मानवजाति राजाओं के द्वारा ऐसे अहंकार और अपमान से पाँवों तले रौंदी जाती है, क्योंकि उनमें से अधिकांश मसीह के क्रूस को उतार फेंकते और उसे उठाने से घृणा करते हैं। इसलिए हम स्मरण रखें कि दाऊद एक दर्पण के समान है, जिसमें परमेश्वर अपने अनुग्रह का निरन्तर प्रवाह हमारे सामने रखता है। केवल हमें इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि हमारे विश्वास की आज्ञाकारिता उसके पितृ-प्रेम के अनुरूप हो, ताकि वह हमें अपनी प्रजा और अपना निज भाग स्वीकार करे। पवित्रशास्त्र अक्सर दाऊद को चरवाहे के नाम से पुकारता है; परन्तु वह स्वयं यह पद परमेश्वर को सौंपता है, और इस प्रकार स्वीकार करता है कि वह उसके लिए पूर्णतः अयोग्य है, केवल उतने ही अंश को छोड़कर जितने में वह परमेश्वर का सेवक है।

"Que tout la prospetite qu'ils se souhaitent soit a cause du peuple. — फ्रांसीसी. "कि जिस समृद्धि की वे इच्छा करते हैं, वह सब प्रजा के निमित्त हो।"

"Veu que la plus grand part rejette et desdaigne de porter le joug de Christ." — फ्रांसीसी.

"Qu'il n'en est pas digne." — फ्रांसीसी. "कि वह उसके योग्य नहीं है।"

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