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भजन 25
भजन 25.
यह भजन प्रार्थनाओं के साथ मिले हुए मननों से बना है। अपने शत्रुओं की क्रूरता के कारण कठोर व्यवहार सहते हुए और घोर संकट में पड़े हुए, दाऊद परमेश्वर से सहायता पाने के लिए पहले यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर ने न्यायपूर्वक इसी को उसके पापों के कारण उसे ताड़ना देने और दण्ड देने का साधन बनाया था; और इसलिए वह उन पापों की क्षमा के लिए प्रार्थना करता है, जिससे वह एक साथ ईश्वरीय अनुग्रह का निश्चय भी पाए और छुटकारा भी प्राप्त करे। फिर वह पवित्र आत्मा की सहायता के लिए गिड़गिड़ाकर विनती करता है, कि उसके द्वारा सँभाला जाकर वह इतनी परीक्षाओं के बीच भी परमेश्वर के भय में बना रहे। और अनेक स्थानों पर वह बीच-बीच में मनन को भी मिला देता है, जिससे वह अपने आप को परमेश्वर पर और अधिक भरोसा रखने के लिए उभारे, और अपने विचारों को संसार के प्रलोभनों से हटा ले।
दाऊद का भजन।
भजन 25:1-3
1. हे यहोवा! मैंने अपना मन तेरी ओर उठाया है। 2. हे मेरे परमेश्वर! मैंने तुझ पर भरोसा रखा है; मुझे लज्जित न होने दे; मेरे शत्रु मुझ पर आनन्द न करने पाएँ। 3. वरन् जितने तेरी बाट जोहते हैं उन में से कोई लज्जित न होगा; परन्तु जो अकारण विश्वासघात करते हैं वे ही लज्जित होंगे।
1. हे यहोवा! मैंने तेरी ओर इत्यादि। भजनकार आरम्भ ही में यह घोषणा करता है कि वह अधर्मियों की रीति पर इधर-उधर भटकाया नहीं जाता, परन्तु अपनी सब अभिलाषाएँ और प्रार्थनाएँ केवल परमेश्वर ही की ओर लगाता है। परमेश्वर से की जानेवाली सच्ची और निष्कपट प्रार्थना के साथ इससे बढ़कर असंगत और कुछ नहीं कि मनुष्य अन्यजातियों के समान संसार से किसी सहायता की आस में डगमगाता और चारों ओर ताकता फिरे; और साथ ही परमेश्वर को त्याग दे, या सीधे उसकी रखवाली और संरक्षण की शरण न ले। जो लोग यह समझते हैं कि दाऊद यहाँ यह घोषणा करता है कि उसने अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को समर्पित कर दिया था, मानो उसने अपने आप को बलिदान के रूप में चढ़ा दिया हो, वे इस वचन के आशय को ठीक से नहीं समझते। इसका अर्थ तो यह है कि अपनी विनती के पूरे होने की आशा को दृढ़ करने के लिए वह वही बात घोषित करता है जो प्रार्थना में सबसे अधिक महत्त्व की है — कि उसकी आशा परमेश्वर पर टिकी थी, और वह न तो संसार के प्रलोभनों में फँसा था, और न इनके कारण अपने मन को पूर्णता और निष्कपटता से परमेश्वर की ओर उठाने से रोका गया था। इसलिए, कि हम परमेश्वर से ठीक रीति से प्रार्थना करें, हम इस नियम के अनुसार चलें — कि हम अपने मनों को नाना प्रकार की और अनिश्चित आशाओं से विचलित न करें, न सांसारिक सहायता पर निर्भर रहें, परन्तु सच्ची और उत्कट प्रार्थना में अपने हृदयों को उसकी ओर उठाकर परमेश्वर को यह आदर दें। इसके अतिरिक्त, यद्यपि क्रिया का ठीक अनुवाद है, मैं उठाऊँगा, तौभी मैंने अन्य व्याख्याकारों का अनुसरण करते हुए इसे भूतकाल में बदल दिया है, मैंने उठाया है। तौभी भविष्यत् काल के द्वारा दाऊद एक निरन्तर कार्य को सूचित करता है।
2. हे मेरे परमेश्वर! मैंने तुझ पर भरोसा रखा है। इस पद से हम सीखते हैं (जो आगे और भी स्पष्ट प्रकट होगा) कि दाऊद का सामना मनुष्यों से था; परन्तु चूँकि उसे निश्चय था कि उसके शत्रु मानो परमेश्वर के कोड़े थे, इसलिए वह उचित कारण से माँगता है कि परमेश्वर अपने सामर्थ्य से उन्हें रोके, ऐसा न हो कि वे और भी ढीठ हो जाएँ और सब सीमाओं का उल्लंघन करते रहें। भरोसा शब्द के द्वारा वह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने अभी अपने मन को परमेश्वर की ओर उठाने के विषय में कही थी; क्योंकि यह शब्द या तो उस रीति का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त हुआ है जिससे विश्वासियों के मन ऊपर उठाए जाते हैं, या फिर विश्वास और आशा को ऐसे परिणाम के, अर्थात् मन के ऊपर उठाए जाने के, कारण के रूप में जोड़ा गया है। और सचमुच ये ही वे पंख हैं जिनके द्वारा हमारे मन इस संसार से ऊपर उठकर परमेश्वर तक पहुँचाए जाते हैं। अतः दाऊद अपने हृदय की सम्पूर्ण अभिलाषा के साथ परमेश्वर की ओर ऊपर उठाया गया, क्योंकि उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखकर वह उनके द्वारा निश्चित उद्धार की आशा रखता था। जब वह माँगता है कि परमेश्वर उसे लज्जित न होने दे, तो वह ऐसी प्रार्थना चढ़ाता है जो पवित्रशास्त्र की सामान्य शिक्षा से ली गई है, अर्थात् यह कि जो परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं वे कभी लज्जित न होंगे। जो कारण वह साथ में जोड़ता है, और जिसे वह यहाँ परमेश्वर को अपने ऊपर दया करने के लिए प्रेरित करने को प्रस्तुत करता है, उस पर भी ध्यान देना चाहिए। वह यह है कि वह अपने शत्रुओं के उपहास का पात्र न बने, जिनका घमण्ड भक्तों की भावनाओं को उतना ही चोट पहुँचाता है जितना वह परमेश्वर को अप्रिय है।
3. वरन् उन में से कोई नहीं इत्यादि। यदि इन शब्दों की व्याख्या अभिलाषा के रूप में की जाए, मानो दाऊद ने कहा हो, जितने तेरी बाट जोहते हैं उन में से कोई लज्जित न किया जाए, तो इस पद में वह अपनी प्रार्थना को जारी रखता है, और जो कुछ उसने केवल अपने विषय में कहा था उसे सब विश्वासियों तक सामान्य रूप से बढ़ा देता है। परन्तु मेरा झुकाव इन शब्दों को दूसरे अर्थ में समझने की ओर अधिक है, और यह मानने की ओर कि इनका अभिप्राय यह है कि दाऊद ईश्वरीय अनुग्रह के उस फल को दिखाता है जो उसके छुटकारे से निकलेगा। और वरन् शब्द में विशेष बल है; क्योंकि वह जानता था कि बहुत लोग उसे देख रहे हैं, और परमेश्वर पर उसके भरोसे की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई है, इसलिए उसका अभिप्राय यह है कि जो कुछ उसके व्यक्तित्व में किया जाएगा, वह दूसरों के लिए एक उदाहरण के रूप में दूर-दूर तक फैलेगा, और उसका यह प्रभाव होगा कि एक ओर तो परमेश्वर की सब सन्तानों में नया जीवन और उत्साह आएगा, और दूसरी ओर दुष्टों का अहंकार भूमि पर पटक दिया जाएगा। इन शब्दों को एक और अर्थ में भी समझा जा सकता है, अर्थात् यह कि दाऊद अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए अपने सामने वह प्रतिज्ञा रखता है जो परमेश्वर अपने वचन में बार-बार करता है। परन्तु जिस अर्थ में मैंने इनकी व्याख्या की है वह अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। अकारण विश्वासघात करनेवाले दुष्टों से निस्सन्देह उसका अभिप्राय विशेष रूप से अपने शत्रुओं से है। तदनुसार वह घोषणा करता है कि जब वह छुड़ाया जाएगा, तब उसका लाभ अकेला वही नहीं भोगेगा, परन्तु उसका फल सब सच्चे विश्वासियों तक पहुँचेगा; ठीक वैसे ही जैसे, दूसरी ओर, यदि परमेश्वर ने उसे त्याग दिया होता तो बहुतों का विश्वास डगमगा जाता। पद के अन्तिम भाग में, जिसे वह पहले भाग के विपरीत रखता है, वह यह तर्क देता है कि जब दुष्ट लज्जित होकर पड़े रहते हैं, तब इससे परमेश्वर की महिमा होती है; क्योंकि अपनी समृद्धि में वे जो डींग मारते हैं वह परमेश्वर का खुला उपहास है, जबकि वे उसके न्याय की अवहेलना करते हुए बुराई करने में और भी निडर होकर फूट पड़ते हैं। जब वह अकारण जोड़ता है, तो इसका प्रयोजन केवल अपराध की गम्भीरता को दिखाना है। मनुष्य की दुष्टता तब और भी असहनीय होती है जब वह किसी अन्याय से उकसाए बिना, अपनी ही इच्छा से, निर्दोष और निष्कलंक लोगों को हानि पहुँचाने पर उतारू हो जाता है। [टिप्पणी 553: "Que tons ceux qui s'attendant a toy ne soyent point confus." — फ्रांसीसी.]
भजन 25:4-7
4. हे यहोवा! अपने मार्ग मुझ को दिखला; अपना पथ मुझे सिखला। 5. मुझे अपनी सच्चाई पर चला और शिक्षा दे; क्योंकि तू मेरा उद्धार करनेवाला परमेश्वर है; मैं दिन भर तेरी ही बाट जोहता रहा हूँ। 6. हे यहोवा! अपनी दया और करुणा के कामों को स्मरण कर; क्योंकि वे तो अनादिकाल से होते आए हैं। 7. हे यहोवा! मेरी जवानी के पापों और मेरे अपराधों को स्मरण न कर; अपनी करुणा के अनुसार, और अपनी भलाई के निमित्त, तू मुझे स्मरण कर।
4. हे यहोवा! अपने मार्ग मुझ को दिखला। प्रभु के मार्गों से दाऊद कभी-कभी, जैसा कि हम एक अन्य स्थान पर देख चुके हैं, कार्यों के सुखद और सफल परिणाम का अर्थ लेता है; परन्तु अधिकतर वह इस अभिव्यक्ति का प्रयोग पवित्र और धर्मी जीवन के नियम को सूचित करने के लिए करता है। चूँकि ठीक अगले पद में सच्चाई शब्द आता है, इसलिए मेरी समझ में जो प्रार्थना वह इस स्थान पर चढ़ाता है उसका आशय यह है: हे प्रभु, अपने दास को अपनी प्रतिज्ञाओं के दृढ़ निश्चय में स्थिर रख, और उसे दाहिनी या बाईं ओर मुड़ने न दे। जब हमारे मन इस प्रकार धीरज के लिए शान्त किए जाते हैं, तब हम कोई काम उतावलेपन से या अनुचित साधनों से नहीं करते, परन्तु पूर्ण रूप से परमेश्वर के विधान पर निर्भर रहते हैं। तदनुसार, इस स्थान पर दाऊद केवल यही नहीं चाहता कि परमेश्वर के आत्मा के द्वारा उसका मार्गदर्शन हो, ऐसा न हो कि वह सीधे मार्ग से भटक जाए, परन्तु यह भी कि परमेश्वर अपने वचन की प्रतिज्ञाओं में अपनी सच्चाई और विश्वासयोग्यता को उस पर स्पष्ट रूप से प्रकट करे, कि वह उसके सम्मुख शान्ति से जीवन बिताए और सब अधीरता से मुक्त रहे। यदि कोई इन शब्दों को सामान्य अर्थ में लेना अधिक पसन्द करे, मानो दाऊद ने अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंप दिया कि वह उस पर शासन करे, तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं। तौभी, चूँकि मैं इसे सम्भव समझता हूँ कि अगले पद में सच्चाई के नाम से वह यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के जिन मार्गों और पथों की वह यहाँ चर्चा करता है उनसे उसका क्या अभिप्राय है, इसलिए मुझे इस प्रार्थना को इसी परिस्थिति से जोड़ने में कोई संकोच नहीं, अर्थात् यह कि दाऊद, अधीरता की भावना, या बदला लेने की इच्छा, या किसी उच्छृंखल और अवैध आवेग के आगे झुक जाने से डरकर, यह माँगता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ उसके हृदय पर गहराई से अंकित और खुदी हुई हों। क्योंकि मैं पहले कह चुका हूँ कि जब तक हमारे मनों में यह विचार प्रबल रहता है कि परमेश्वर हमारी चिन्ता करता है, तब तक परीक्षाओं का सामना करने के लिए यही सबसे उत्तम और सबसे प्रभावशाली साधन है। तौभी, यदि कोई परमेश्वर के मार्गों और पथों से उसकी शिक्षा समझना अधिक पसन्द करे, तब भी मैं इसे एक निश्चित बात मानता हूँ कि भजनकार की भाषा में उन आकस्मिक और अनियमित आवेगों की ओर संकेत है जो विपत्ति से उछाले जाने पर हमारे मनों में उठते हैं, और जिनके द्वारा हम भ्रम के टेढ़े और छलपूर्ण पथों में धकेल दिए जाते हैं, जब तक कि उचित समय पर परमेश्वर के वचन के द्वारा वे दबाए या शान्त न किए जाएँ। अतः अर्थ यह है: हे प्रभु, चाहे कुछ भी हो, मुझे अपने मार्गों से गिरने न दे, न अपने अधिकार के प्रति हठीली अवज्ञा से, या किसी अन्य पापमय अभिलाषा से बह जाने दे; परन्तु तेरी सच्चाई, उसके प्रति दीन अधीनता के द्वारा, मुझे शान्त विश्राम और शान्ति की दशा में सुरक्षित रखे। इसके अतिरिक्त, यद्यपि वह एक ही बात को बार-बार दोहराता है, और माँगता है कि परमेश्वर उसे अपने मार्ग दिखाए, और उनमें उसे सिखाए, और अपनी सच्चाई पर उसे चलाए, तौभी कहने की इन रीतियों में कोई व्यर्थ पुनरुक्ति नहीं है। हमारी विपत्तियाँ प्रायः उस कुहरे के समान होती हैं जो आँखों को अन्धकारमय कर देता है; और हर कोई अपने अनुभव से जानता है कि जब तक अन्धकार के ये बादल छाए रहते हैं, तब तक यह पहचानना कितना कठिन है कि हमें किस मार्ग पर चलना चाहिए। परन्तु यदि दाऊद को, जो इतना प्रतिष्ठित भविष्यद्वक्ता था और इतनी बुद्धि से सम्पन्न था, ईश्वरीय शिक्षा की आवश्यकता थी, तो हमारा क्या होगा यदि हमारे क्लेशों में परमेश्वर हमारे मनों से अन्धकार के उन बादलों को दूर न करे जो हमें उसकी ज्योति देखने से रोकते हैं? इसलिए जब-जब कोई परीक्षा हम पर आक्रमण करे, तब-तब हमें सदा यह प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर अपनी सच्चाई की ज्योति हम पर चमकाए, ऐसा न हो कि हम पापमय युक्तियों का सहारा लेकर भटक जाएँ, और टेढ़े और वर्जित पथों में भटकते फिरें। [टिप्पणी 554: "Et sans estre trouble d'impatience." — फ्रांसीसी.]
साथ ही, हमें उस तर्क पर ध्यान देना चाहिए जिसे दाऊद यहाँ अपनी प्रार्थना पर बल देने के लिए प्रयोग करता है। परमेश्वर को अपने उद्धार का परमेश्वर कहकर, वह ऐसा इसलिए करता है कि जो उपकार वह उससे पहले ही पा चुका था उन पर विचार करके भविष्य के लिए परमेश्वर पर अपनी आशा को दृढ़ करे; और फिर वह परमेश्वर के प्रति अपने भरोसे की साक्षी को दोहराता है। इस प्रकार तर्क का पहला भाग स्वयं परमेश्वर के स्वभाव से, और उस कर्तव्य से लिया गया है जो मानो उसी का है; अर्थात् यह कि चूँकि वह भक्तों के कल्याण को बनाए रखने का दायित्व लेता है, और उनकी आवश्यकताओं में उनकी सहायता करता है, इसी आधार पर वह अन्त तक उनके प्रति वही अनुग्रह प्रकट करता रहेगा। परन्तु चूँकि यह आवश्यक है कि परमेश्वर पर हमारा भरोसा हमारे प्रति उसकी बड़ी भलाई के अनुरूप हो, इसलिए दाऊद साथ ही अपनी दृढ़ता की घोषणा के साथ इसे प्रस्तुत करता है। क्योंकि दिन भर, या प्रतिदिन, इस अभिव्यक्ति के द्वारा वह यह सूचित करता है कि वह स्थिर और अथक दृढ़ता के साथ केवल परमेश्वर ही पर निर्भर रहा। और निस्सन्देह विश्वास का यह गुण है कि वह अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में भी सदा परमेश्वर की ओर देखे, और उस सहायता की धीरज से बाट जोहे जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है। कि ईश्वरीय आशीषों का स्मरण हमारी आशा को पोषित और सँभाले रखे, आइए हम उस भलाई पर मनन करना सीखें जो परमेश्वर हमारे प्रति पहले ही प्रकट कर चुका है, जैसा कि हम देखते हैं कि दाऊद ने अपने भरोसे का यह आधार बनाकर किया, कि उसने अपने निजी अनुभव में परमेश्वर को उद्धार का कर्ता पाया था।
6. हे यहोवा, स्मरण कर; इससे पहले तो यह प्रकट होता है कि दाऊद घोर रूप से पीड़ित और परखा गया था, यहाँ तक कि उसने परमेश्वर की दया का सारा बोध खो दिया था: क्योंकि वह परमेश्वर से विनती करता है कि वह उसके लिए अपने अनुग्रह को ऐसे स्मरण करे मानो वह उसे पूरी रीति से भूल गया हो। इसलिए यह अत्यन्त वेदना सहते हुए और शोक से दबे हुए मनुष्य की शिकायत है। इससे हम यह सीख सकते हैं कि यद्यपि परमेश्वर कुछ समय के लिए अपनी भलाई का हर चिह्न हम से हटा ले, और जो दुःख हमें सताते हैं उनकी ओर से उदासीन प्रतीत होकर, मानो हम उसके लिए परदेशी हों और उसके अपने लोग न हों, हमें त्याग दे, तौभी हमें साहस से लड़ना चाहिए, जब तक कि इस परीक्षा से मुक्त होकर हम हृदय से वह प्रार्थना न चढ़ाएँ जो यहाँ लिखी है, और परमेश्वर से विनती करें कि वह अपने पहले व्यवहार की ओर लौटकर फिर से हमारे प्रति अपनी भलाई प्रकट करने लगे, और हम से अधिक अनुग्रहपूर्ण रीति से व्यवहार करे। प्रार्थना का यह रूप तब तक उचित रीति से प्रयोग नहीं किया जा सकता जब तक परमेश्वर हम से अपना मुख न छिपा रहा हो, और हम में तनिक भी रुचि न लेता प्रतीत हो। इसके अतिरिक्त, दाऊद परमेश्वर की दया या करुणा और भलाई की शरण लेकर यह साक्षी देता है कि वह आशा के किसी आधार के रूप में अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं रखता। जो मनुष्य सब कुछ केवल ईश्वरीय दया के सोते से ही प्राप्त करता है, वह परमेश्वर की दृष्टि में अपने भीतर प्रतिफल के योग्य कुछ भी नहीं पाता। परन्तु चूँकि दाऊद ने जिस अन्तराल का अनुभव किया था वह एक बाधा थी जो परमेश्वर के पास उसके स्वतन्त्र प्रवेश को रोकती थी, इसलिए वह सबसे उत्तम उपचार के द्वारा उससे ऊपर उठता है — इस विचार के द्वारा कि यद्यपि परमेश्वर, जो अपने स्वभाव ही से दयालु है, अपने आप को हटा ले, और कुछ समय के लिए अपना सामर्थ्य प्रकट करना बन्द कर दे, तौभी वह अपने आप का इन्कार नहीं कर सकता; अर्थात्, वह दया की उस भावना को अपने से अलग नहीं कर सकता जो उसमें स्वाभाविक है, और जो उसके अनन्त अस्तित्व से अधिक समाप्त नहीं हो सकती। परन्तु हमें इस शिक्षा को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए कि परमेश्वर आदि ही से दयालु रहा है, ताकि यदि कभी वह हमारे प्रति कठोरता से व्यवहार करता और हमारी प्रार्थनाओं को ठुकराता प्रतीत हो, तो हम यह कल्पना न करें कि वह अपने सच्चे स्वभाव के विपरीत कार्य करता है, या उसने अपना अभिप्राय बदल दिया है। इससे हम सीखते हैं कि पवित्रशास्त्र हर स्थान पर हमें किस उद्देश्य से यह बताता है कि सब युगों में परमेश्वर ने अपने दासों पर कृपादृष्टि की है, और उन पर अपनी दया दिखाई है। कम से कम इसे हमें एक स्थिर और निश्चित बात मानना चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर की भलाई कभी-कभी छिपी हुई, और मानो दृष्टि से ओझल गड़ी हुई हो, तौभी वह कभी बुझ नहीं सकती। [टिप्पणी 555: "Et use de douceur envers eux." — फ्रांसीसी.]
7. मेरी जवानी के पापों को स्मरण न कर। चूँकि हमारे पाप हमारे और परमेश्वर के बीच एक दीवार के समान हैं, जो उसे हमारी प्रार्थनाएँ सुनने, या हमारी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाने से रोकती है, इसलिए दाऊद अब इस रुकावट को हटाता है। यह सामान्य रूप से सच है कि मनुष्य गलत रीति से और व्यर्थ प्रार्थना करते हैं, जब तक कि वे अपने पापों की क्षमा माँगने से आरम्भ न करें। परमेश्वर से कोई भी अनुग्रह पाने की आशा नहीं, जब तक कि उसका हम से मेल न हो जाए। वह हम से कैसे प्रेम करेगा, जब तक कि वह पहले सेंतमेंत हमारा मेल अपने साथ न करा ले? इसलिए प्रार्थना का ठीक और उचित क्रम, जैसा मैंने कहा है, यह है कि बिलकुल आरम्भ में ही यह माँगें कि परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करे। दाऊद यहाँ स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करता है कि वह अपने पापों के मिटाए जाने के सिवाय और किसी रीति से परमेश्वर के अनुग्रह का भागी नहीं हो सकता। इसलिए, कि परमेश्वर हमारे प्रति अपनी दया को स्मरण रखे, यह आवश्यक है कि वह हमारे पापों को भूल जाए, जिनका दर्शन मात्र उसके अनुग्रह को हम से फेर देता है। इस बीच, भजनकार इसके द्वारा उस बात की और भी स्पष्ट पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि यद्यपि दुष्टों ने उसके साथ क्रूरता का व्यवहार किया, और अन्याय से उसे सताया, तौभी जो सारा दुःख उसने सहा उसका कारण वह अपने ही पापों को ठहराता था। क्योंकि वह परमेश्वर की दया की शरण लेकर अपने पापों की क्षमा क्यों माँगता, यदि इसलिए नहीं कि वह यह स्वीकार करता था कि अपने शत्रुओं से मिले क्रूर व्यवहार के द्वारा वह केवल उस दण्ड को भोग रहा था जिसके वह न्यायपूर्वक योग्य था? इसलिए उसने बुद्धिमानी से अपने विचारों को अपने दुःख के मूल कारण की ओर मोड़ा है, कि वह सच्चा उपचार पा सके; और इस प्रकार वह अपने उदाहरण से हमें सिखाता है कि जब कोई बाहरी क्लेश हम पर दबाव डाले, तो हमें परमेश्वर से केवल यही विनती नहीं करनी चाहिए कि वह हमें उससे छुड़ाए, परन्तु यह भी कि वह हमारे उन पापों को मिटा दे जिनके द्वारा हमने उसके अप्रसन्नता को भड़काया है, और अपने आप को उसकी ताड़ना की छड़ी के अधीन कर दिया है। यदि हम इसके विपरीत करें, तो हम उन अनाड़ी वैद्यों के उदाहरण पर चलेंगे जो रोग के कारण की उपेक्षा करके केवल पीड़ा को कम करना चाहते हैं, और चंगाई के लिए केवल ऊपरी उपचार लगाते हैं। इसके अतिरिक्त, दाऊद केवल कुछ छोटे-मोटे अपराधों का ही अंगीकार नहीं करता, जैसा कि कपटी करने के आदी हैं, जो अपने दोष को सामान्य और औपचारिक रीति से स्वीकार करके या तो कोई बहाना ढूँढ़ते हैं, या अपने पाप की भयंकरता को घटाते हैं; परन्तु वह अपने पापों को अपने बचपन तक पीछे खोजता है, और विचार करता है कि उसने कितनी रीतियों से परमेश्वर के क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काया था। जब वह उन पापों का उल्लेख करता है जो उसने अपनी जवानी में किए थे, तो इससे उसका यह अर्थ नहीं कि जो पाप उसने अपने बाद के वर्षों में किए थे उनमें से किसी का उसे स्मरण नहीं था; परन्तु यह दिखाने के लिए है कि वह अपने आप को और भी बड़े दण्ड के योग्य समझता था। पहले तो, यह विचार करते हुए कि उसने हाल ही में पाप करना आरम्भ नहीं किया था, परन्तु बहुत समय से पाप पर पाप का ढेर लगाता आया था, वह, यदि हम ऐसा कहें, उस संचित बोझ के नीचे झुक जाता है; और दूसरे, वह संकेत करता है कि यदि परमेश्वर व्यवस्था की कठोरता के अनुसार उससे व्यवहार करे, तो केवल कल के, या कुछ दिनों के पाप ही उसके विरुद्ध न्याय में न आएँगे, परन्तु वे सब अवसर जिनमें उसने अपने बचपन ही से अपराध किया था, अब न्यायपूर्वक उसके सिर पर डाले जा सकते हैं। इसलिए जब-जब परमेश्वर अपने न्यायदण्डों और अपने क्रोध के चिह्नों के द्वारा हमें भयभीत करे, तब-तब हम न केवल उन पापों को स्मरण करें जो हमने हाल ही में किए हैं, परन्तु अपने बीते जीवन के सब अपराधों को भी, जो हमारे लिए नई लज्जा और नए विलाप का कारण बनें। इसके अतिरिक्त, यह और भी पूर्ण रूप से प्रकट करने के लिए कि वह सेंतमेंत क्षमा की याचना करता है, वह परमेश्वर के सामने केवल उसकी निरी सुइच्छा के आधार पर निवेदन करता है; और इसलिए वह कहता है, अपनी करुणा के अनुसार तू मुझे स्मरण कर। जब परमेश्वर हमारे पापों को विस्मृति में डाल देता है, तब यही उसे पितृतुल्य दृष्टि से हमें देखने की ओर ले जाता है। दाऊद परमेश्वर की इस पितृतुल्य दृष्टि का इसके सिवाय और कोई कारण नहीं खोज पाता कि वह भला है; और इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर को हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण करने के लिए प्रेरित करनेवाली उसकी अपनी सुइच्छा के सिवाय और कुछ नहीं। जब कहा जाता है कि परमेश्वर अपनी दया के अनुसार हमें स्मरण करता है, तो हमें मौन रूप से यह समझाया जाता है कि स्मरण करने की दो रीतियाँ हैं जो एक दूसरे के बिलकुल विपरीत हैं: एक तब जब वह अपने क्रोध में पापियों का दण्ड देता है, और दूसरी तब जब वह उन लोगों पर फिर से अपना अनुग्रह प्रकट करता है जिनकी वह कुछ समय तक कोई सुधि न लेता प्रतीत होता था। [टिप्पणी 556: "Redevable de tant plus grande condemnation." — फ्रांसीसी.]
भजन 25:8-11
8. यहोवा भला और सीधा है; इसलिये वह पापियों को मार्ग दिखलाएगा। 9. वह दीन लोगों को न्याय में अगुवाई करेगा, और दीन लोगों को अपना मार्ग सिखलाएगा। 10. जो यहोवा की वाचा और उसकी चितौनियों को मानते हैं, उनके लिये उसके सब मार्ग करुणा और सच्चाई हैं। 11. हे यहोवा! अपने नाम के निमित्त मेरे अधर्म को जो बहुत है क्षमा कर।
8. यहोवा भला और सीधा है। मानो अपनी प्रार्थना के क्रम में थोड़ी देर ठहरकर, वह अपने विचारों को परमेश्वर की भलाई पर मनन करने में लगाता है, कि वह नए उत्साह के साथ प्रार्थना की ओर लौटे। विश्वासी अनुभव करते हैं कि उनके हृदय प्रार्थना में शीघ्र ही शिथिल पड़ जाते हैं, जब तक कि वे नई-नई प्रेरणाओं के द्वारा अपने आप को निरन्तर उसके लिए उभारते न रहें; इस कर्तव्य में दृढ़ता और अथकता से लगे रहना इतना दुर्लभ और कठिन है। और सचमुच, जैसे आग को बनाए रखने के लिए बार-बार ईंधन डालना पड़ता है, वैसे ही प्रार्थना के अभ्यास को ऐसी सहायताओं की आवश्यकता होती है, कि वह शिथिल न पड़े और अन्त में पूरी रीति से बुझ न जाए। इसलिए दाऊद, अपने आप को दृढ़ बने रहने के लिए प्रोत्साहित करने की इच्छा से, अपने आप से बातें करता है, और पुष्टि करता है कि परमेश्वर भला और सीधा है, कि इस सत्य पर मनन करके नई शक्ति बटोरता हुआ वह और भी तत्परता से प्रार्थना की ओर लौटे। परन्तु हमें इस निष्कर्ष पर ध्यान देना चाहिए — कि चूँकि परमेश्वर भला और सीधा है, इसलिए वह पापियों को फिर से मार्ग पर लाने के लिए उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाता है। परमेश्वर में ऐसी सिधाई का आरोप करना जिसका प्रयोग वह केवल योग्यों और गुणवानों के प्रति करता हो, उसके स्वभाव का एक ठण्डा विचार है, और पापियों के लिए थोड़े ही लाभ का है; तौभी संसार सामान्यतः यही समझता है कि परमेश्वर किसी और अर्थ में भला नहीं। ऐसा क्यों होता है कि सौ में से कठिनाई से एक भी परमेश्वर की दया को अपने ऊपर लागू करता है, यदि इसलिए नहीं कि मनुष्य उसे केवल उसके योग्य लोगों तक सीमित कर देते हैं? नहीं, इसके विपरीत, यहाँ कहा गया है कि परमेश्वर अपनी सिधाई का प्रमाण तब देता है जब वह अपराधियों को मार्ग दिखाता है; और इसका आशय वही है जो उन्हें मन फिराव के लिए बुलाना, और सीधाई से जीवन बिताना सिखाना है। और सचमुच, यदि परमेश्वर की भलाई अधोलोक तक भी न पहुँचती, तो कोई भी मनुष्य कभी उसका भागी न होता। तो पोपपन्थी अपनी काल्पनिक तैयारियों पर जितना चाहें घमण्ड करें, परन्तु हम इसे एक पक्की और निश्चित शिक्षा मानें कि यदि परमेश्वर अपने अनुग्रह के द्वारा मनुष्यों से पहले आगे न बढ़े, तो वे सब के सब पूरी रीति से नाश हो जाएँगे। इसलिए दाऊद यहाँ इस पूर्ववर्ती अनुग्रह की, जैसा कि इसे कहा जाता है, प्रशंसा करता है, जो या तो तब प्रकट होता है जब परमेश्वर पहले-पहल हमें बुलाते समय पुनर्जन्म के आत्मा के द्वारा हमारे भ्रष्ट स्वभाव को नया करता है, या तब जब हमारे पापों के द्वारा उससे भटक जाने के बाद वह हमें फिर से सीधे मार्ग पर लाता है। क्योंकि जब उन्हें भी, जिन्हें परमेश्वर अपने चेलों के रूप में ग्रहण करता है, यहाँ पापी कहा गया है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उन्हें नया करता है कि वे सिखाने योग्य और आज्ञाकारी बनें।
557 "Humbles." — फ्रांसीसी. "दीन।"
9. वह दीन लोगों को न्याय में अगुवाई करेगा। भजनकार यहाँ अपने अनुग्रह के उस दूसरे प्रकटीकरण का उल्लेख करता है जो परमेश्वर उन लोगों के प्रति करता है जो उसके सामर्थ्य से वश में किए जाकर और उसके जूए के नीचे लाए जाकर उसे स्वेच्छा से उठाते हैं, और अपने आप को उसके शासन के अधीन कर देते हैं। परन्तु यह सिखाने योग्यता किसी भी मनुष्य में तब तक कभी न पाई जाएगी जब तक कि हृदय, जो स्वभाव से ही फूला हुआ और घमण्ड से भरा है, दीन और वश में न किया जाए। चूँकि इब्रानी शब्द ענוים anavim कंगाल या दुःखी लोगों को सूचित करता है, और रूपक के अर्थ में नम्र और दीन लोगों को सूचित करने के लिए प्रयुक्त होता है, इसलिए सम्भव है कि दाऊद इस शब्द के अन्तर्गत उन क्लेशों को, जो शरीर की हठधर्मिता को रोकने और वश में करने का काम करते हैं, और स्वयं दीनता के अनुग्रह को भी सम्मिलित करता है; मानो उसने कहा हो, जब परमेश्वर पहले उन्हें दीन कर देता है, तब वह कृपापूर्वक उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाता है, और उनके जीवन के सम्पूर्ण मार्ग में उनकी अगुवाई और मार्गदर्शन करता है। इसके अतिरिक्त, कुछ लोग इन शब्दों, प्रभु के न्याय और मार्ग, को धर्मी और सुव्यवस्थित जीवन-रीति को सूचित करनेवाला समझते हैं। दूसरे इन्हें परमेश्वर के विधान से जोड़ते हैं; यह व्याख्या अधिक सही और प्रसंग के अधिक अनुकूल प्रतीत होती है, क्योंकि तुरन्त आगे जोड़ा गया है, यहोवा के सब मार्ग करुणा और सच्चाई हैं। इसलिए अर्थ यह है कि जो लोग सचमुच अपने हृदयों में दीन किए गए हैं, और परमेश्वर पर अपना भरोसा रखने के लिए लाए गए हैं, वे अनुभव करेंगे कि वह अपनी सन्तानों की कितनी चिन्ता करता है, और उनकी आवश्यकताओं का कितना अच्छा प्रबन्ध करता है। अतः प्रभु के न्याय और मार्ग, ये शब्द इस स्थान पर केवल उसके शासन के ही आशय के हैं, जिसके प्रयोग में वह यह दिखाता है कि वह एक कृपालु पिता के समान अपनी सन्तानों के कल्याण में विशेष रुचि रखता है — जब वे सताए जाते हैं तब उन्हें छुड़ाकर, जब वे गिराए जाते हैं तब उन्हें उठाकर, जब वे शोकित होते हैं तब उन्हें प्रसन्न करके और शान्ति देकर, और जब वे दुःखी होते हैं तब उनकी सहायता करके। तो हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे प्रति अपने अनुग्रह के प्रकटीकरण में किस क्रम से आगे बढ़ता है। पहले, जब हम उससे भटकते और पथभ्रष्ट होते हैं, तब वह हमें फिर से मार्ग पर लाता है; या यों कहें, जब हम पहले ही उससे भगोड़े और निर्वासित हो चुके होते हैं, तब वह हमारी हठधर्मिता को रोकता है; और जहाँ हम पहले हठीले और विद्रोही थे, वहाँ वह अब हमें अपनी धार्मिकता की आज्ञाकारिता के अधीन कर देता है: और दूसरे, हमें दुःख देने और परखने के बाद वह हमें त्याग नहीं देता; परन्तु क्रूस के द्वारा हमें दीनता और नम्रता में ढालने और प्रशिक्षित करने के बाद भी, वह जीवन भर हमारी अगुवाई और मार्गदर्शन करने में अपने आप को एक बुद्धिमान और दूरदर्शी पिता दिखाता रहता है। [टिप्पणी 558: "Quel soin il ha de ses enfans." — फ्रांसीसी.]
10. यहोवा के सब मार्ग। इस पद की गलत व्याख्या वे लोग करते हैं जो यह समझते हैं कि यहाँ व्यवस्था की शिक्षा को सच्ची और मधुर बताया गया है, और जो उसका पालन करते हैं वे सचमुच उसे ऐसा ही अनुभव करते हैं; मानो यह वचन उसी आशय का हो जो यीशु मसीह ने कहा था, "मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।" (मत्ती 11:30)
ऐसी व्याख्या न केवल खींचतान की है, परन्तु उन अनेक समान वचनों से सहज ही खण्डित भी की जा सकती है जिनमें प्रभु के मार्ग यह अभिव्यक्ति कर्मवाच्य अर्थ में ली गई है — उस पितृतुल्य रीति के लिए जिससे वह अपने लोगों की रक्षा और पालन-पोषण करते हुए उनके साथ व्यवहार करता है; वरन् इस संसार के कार्यों के शासन और संचालन में उसके सम्पूर्ण आचरण के लिए भी। कही गई बात का सार यह है कि परमेश्वर अपने लोगों के प्रति ऐसी रीति से व्यवहार करता है कि वे सब बातों में अनुभव से जान लें कि वह दयालु और विश्वासयोग्य है। दाऊद यहाँ उस रूप की बात नहीं कर रहा जिसमें परमेश्वर सामान्यतः मनुष्यजाति के प्रति व्यवहार करता है, परन्तु इसकी कि उसकी अपनी सन्तान उसे कैसा पाती है। हम भजन 18:26 में पहले ही देख चुके हैं कि वह हठीलों और विद्रोहियों के प्रति कठोर और कड़ा है; और यद्यपि वह उनके प्रति कृपा से व्यवहार करे, और उनके अधर्म के होते हुए भी दयापूर्वक उनके प्रति सहनशीलता दिखाए, तौभी हम पाते हैं कि उसमें अपना पूर्ण आनन्द ढूँढ़ने और उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखने के स्थान पर, उन्हें उसकी भलाई का कोई बोध ही नहीं होता। वरन्, ज्योंही उन पर कोई विपत्ति आती है, वे या तो क्रोधित और चिड़चिड़े हो जाते हैं, और परमेश्वर पर अपने प्रति क्रूरता से व्यवहार करने का दोष लगाते हैं, या फिर शिकायत करते हैं कि वह उनकी प्रार्थनाओं के प्रति बहरा है; और जब वे समृद्धि भोगते हैं, तब उसे तुच्छ जानते और उसकी उपेक्षा करते हैं, और जहाँ तक उनसे बन पड़ता है उसकी उपस्थिति से भागते हैं। इसलिए दाऊद परमेश्वर की दया और विश्वासयोग्यता की चर्चा करते हुए उचित ही उन्हें भक्तों की निज सम्पत्ति के रूप में वर्णन करता है; मानो उसने कहा हो, यदि हम उसकी वाचा में बने रहें, तो हमें यह डरने का कोई कारण नहीं कि परमेश्वर हमें धोखा देगा। ये शब्द, वाचा और चितौनी, एक ही आशय के हैं, सिवाय इसके कि दूसरा पहले की व्याख्या के रूप में जोड़ा गया है। इनमें व्यवस्था की सम्पूर्ण शिक्षा सम्मिलित है, जिसके द्वारा परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों के साथ वाचा बाँधता है।
11. हे यहोवा, अपने नाम के निमित्त। क्योंकि मूल पाठ में इस पद के दोनों वाक्यांशों के बीच संयोजक "और" रखा गया है, इसलिए कुछ लोग समझते हैं कि पहला वाक्यांश अधूरा है, और कोई शब्द जोड़ना चाहिए; और तब वे इन शब्दों को, मेरे अधर्म को क्षमा कर इत्यादि, एक स्वतन्त्र वाक्य के रूप में पढ़ते हैं। और इस प्रकार उनके मत के अनुसार अर्थ यह होगा: हे प्रभु, यद्यपि मैं ने तेरी वाचा का पूरा पालन नहीं किया, तौभी इस कारण मुझ पर अपनी करुणा दिखाना बन्द न कर; और इसलिए कि मेरा अधर्म तेरी भलाई को मुझ तक पहुँचने से न रोके, तू अनुग्रहपूर्वक उसे क्षमा कर। परन्तु मैं दूसरों के मत से अधिक सहमत हूँ, जो मानते हैं कि यहाँ संयोजक, जैसा कि अन्य बहुत से स्थानों में होता है, अनावश्यक है, ताकि सारा पद एक ही जुड़ा हुआ वाक्य बने। क्रिया के काल के विषय में भी व्याख्याकारों में मतभेद है। कुछ इसका अनुवाद भूतकाल में इस प्रकार करते हैं, तू ने क्षमा किया है, मानो दाऊद यहाँ परमेश्वर का धन्यवाद कर रहा हो कि उसने उसका पाप क्षमा कर दिया था। परन्तु दूसरी व्याख्या, जो अधिक सामान्य रूप से मानी जाती है, सबसे सही भी है, अर्थात् यह कि दाऊद क्षमा पाने के लिए फिर से परमेश्वर की दया को अपने एकमात्र शरणस्थान के रूप में खोजता है। अक्षर ו vau, जो "और" के तुल्य है, इब्रानी क्रियाओं में प्रायः काल को बदल देने की शक्ति रखता है, जिससे भविष्यकाल प्रायः इच्छार्थक अर्थ में लिया जाता है। इसके अतिरिक्त, मैं इस पद को पिछले पद से इस प्रकार जोड़ता हूँ: भविष्यद्वक्ता ने इस बात पर विचार करके कि परमेश्वर अपनी सेवा करनेवालों के प्रति दयालु और विश्वासयोग्य है, अब अपने हृदय को जाँचता है, और मान लेता है कि जब तक परमेश्वर उसे उसके पापों की क्षमा न दे, तब तक वह उनकी गिनती में नहीं गिना जा सकता; और इसलिए वह क्षमा के लिए प्रार्थना की शरण लेता है: जैसे भजन संहिता 19:13 में, व्यवस्था का पालन करनेवाले विश्वासियों के लिए रखे हुए प्रतिफल की चर्चा करने के बाद, वह तुरन्त पुकार उठता है, "अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है?" अतः यद्यपि दाऊद इस बात से अनजान नहीं कि परमेश्वर अपनी वाचा का पालन करनेवालों को सुखमय जीवन से सम्बन्धित सब कुछ उदारता से देने की प्रतिज्ञा करता है, तौभी साथ ही यह विचार करते हुए कि वह अभी व्यवस्था की सिद्ध धार्मिकता से कितनी दूर है, वह उस पर अपना भरोसा नहीं टिकाता, वरन उन अनेक अपराधों का उपचार खोजता है जिनका वह अपने आप को दोषी अनुभव करता है। और इस प्रकार, इसलिए कि परमेश्वर हमें अपने दासों की गिनती में गिने, हमें सदा दाऊद के उदाहरण के अनुसार उसके पास आकर उससे विनती करनी चाहिए कि वह अपनी पितृतुल्य करुणा से हमारी दुर्बलताओं को सह ले, क्योंकि पापों की सेंतमेंत क्षमा के बिना हमारे पास अपने कामों के किसी प्रतिफल की आशा करने का कोई कारण नहीं है। साथ ही यह ध्यान दिया जाए कि यह और भी स्पष्ट रूप से दिखाने के लिए कि वह पूर्ण रूप से परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह पर निर्भर है, वह स्पष्ट कहता है, अपने नाम के निमित्त; जिसका अर्थ यह है कि परमेश्वर जब-जब अपने लोगों को क्षमा करने की कृपा करता है, तब-तब वह अपनी ही इच्छा की प्रसन्नता को छोड़ किसी अन्य कारण से ऐसा नहीं करता; ठीक जैसे उसने थोड़ा पहले, उसी पद में, कहा था, अपनी भलाई के निमित्त। अपने अपराध की विशालता के विचार ने भी उसे परमेश्वर के नाम को पुकारने के लिए विवश किया: क्योंकि वह तुरन्त अंगीकार के रूप में जोड़ता है, क्योंकि मेरा अधर्म बड़ा है, या बहुत है, (क्योंकि शब्द רב rab का अनुवाद दोनों प्रकार से किया जा सकता है;) मानो वह कह रहा हो, मेरे पाप सचमुच एक भारी बोझ के समान हैं जो मुझे दबा देता है, यहाँ तक कि उनकी अधिकता या भयंकरता मुझे क्षमा की सारी आशा से वंचित कर सकती है; परन्तु हे प्रभु, तेरे नाम की अनन्त महिमा तुझे मुझे त्याग देने न देगी।
भजन 25:12-15
12. वह कौन मनुष्य है जो यहोवा का भय मानता है? वह उसे उस मार्ग की शिक्षा देगा जिसे उसे चुनना चाहिए। 13. उसका प्राण भलाई में बसा रहेगा, और उसका वंश पृथ्वी का अधिकारी होगा। 14. यहोवा का भेद उसके डरवैयों के साथ है, कि वह अपनी वाचा उन पर प्रगट करे। 15. मेरी आँखें सदैव यहोवा की ओर लगी रहती हैं, क्योंकि वही मेरे पाँवों को जाल में से निकालेगा।
12. वह कौन मनुष्य है। उस स्वरूप को फिर से स्मरण करके जिसमें परमेश्वर अपने दासों पर अपने आप को प्रगट करता है, वह नया बल और साहस प्राप्त करता है। क्योंकि हम कह चुके हैं कि सच्ची और एकाग्र प्रार्थना में शिथिलता आ जाने से बढ़कर सहज कुछ नहीं होता, जब तक कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का स्मरण उसे सम्भाले न रखे। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि दाऊद अपने आप को दोषी भी ठहराता है, और एक उत्तम आशा रखते हुए परमेश्वर के भय में बने रहने के लिए प्रोत्साहन भी पाता है। पहले तो, यह संकेत करके कि मनुष्य सही समझ और ठीक विवेक से रहित हैं, क्योंकि वे आदर और भय के साथ परमेश्वर के द्वारा चलाए जाने के लिए अपने आप को नहीं सौंपते, वह इसे अपने ही आलस्य का दोष ठहराता है कि अपने मन के अन्धकार के कारण वह अपनी अभिलाषाओं के पीछे इतनी दूर भटक गया था; और फिर भी, दूसरी ओर, वह अपने आप से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और अगुवाई की प्रतिज्ञा करता है, यदि वह केवल अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंप दे, और यह दिखाए कि वह सीखने को तैयार है। इसके अतिरिक्त, बोलने की प्रश्नवाचक शैली, जिसका वह यहाँ प्रयोग करता है, यह दिखाने के लिए जान पड़ती है कि परमेश्वर का भय माननेवाले कितने थोड़े हैं: क्योंकि यद्यपि सामान्यतः सब मनुष्य प्रार्थना करते हैं, और भक्ति का कुछ दिखावा प्रगट करते हैं, तौभी इतनों में ऐसा एक भी कहाँ है जो सचमुच सच्चे मन से ऐसा करता हो? इसके विपरीत, लगभग सब मनुष्य अपनी ही तन्द्रा में पड़े रहते हैं। इसलिए परमेश्वर का भय अत्यन्त दुर्लभ है; और इसी कारण संसार अधिकांशतः युक्ति और बुद्धि के आत्मा से रहित बना रहता है। ["Ou, secret." — फ्रांसीसी। "या, भेद।"]
कुछ व्याख्याकार चुने शब्द का अनुवाद भविष्यकाल चुनेगा के स्थान पर वर्तमानकाल में करते हैं; मानो यह कहा गया हो कि परमेश्वर वह मार्ग दिखाता है जिसे वह स्वीकार करता है, और जिस पर वह चाहता है कि मनुष्य चलें। इस व्याख्या से मैं सहमत नहीं हो सकता; क्योंकि मेरे विचार में चुने शब्द का सम्बन्ध प्रत्येक व्यक्ति से है; मानो यह कहा गया हो, यदि हम परमेश्वर का भय मानने को तत्पर हों, तो वह अपनी ओर से कोई कमी न करेगा, वरन बुद्धि के आत्मा के द्वारा सदा हमें सही मार्ग चुनने के लिए चलाएगा। जब हमें जीवन में कोई विशेष मार्ग अपनाने के लिए बुलाया जाता है, तब हम अपने आप को मानो दो मार्गों के बीच खड़ा पाते हैं, और नहीं जानते कि उनमें से किस पर चलें; वरन, यदि परमेश्वर हमें मार्ग दिखाने के लिए प्रगट न हो, तो लगभग अपने सब कामों में हम असमंजस और सन्देह में लटके रहते हैं। इसलिए दाऊद कहता है कि यद्यपि मनुष्य नहीं जानते कि क्या उचित है, और उन्हें क्या चुनना चाहिए, तौभी यदि वे भक्तिपूर्ण नम्र मन से परमेश्वर के अधीन हो जाएँ, और उसके पीछे चलने को तैयार हों, तो वह सदा उनके प्रति अपने आप को एक निश्चित और विश्वासयोग्य मार्गदर्शक के रूप में प्रगट करेगा। तौभी, क्योंकि परमेश्वर का भय स्वभाव से हम में नहीं है, इसलिए किसी मनुष्य का इस स्थान से यह तर्क करना मूर्खता होगी कि परमेश्वर तब तक मनुष्यों की चिन्ता करना आरम्भ नहीं करता जब तक वे अपने ही पहले के प्रयत्नों से उसकी कृपा में प्रवेश न कर लें, ताकि वह उनके भक्तिपूर्ण प्रयत्नों में उनकी सहायता करे। दाऊद अभी-अभी घोषणा कर चुका है कि यह अनुग्रह सीधे परमेश्वर की ओर से आता है, जब वह कहता है कि परमेश्वर अपराधियों को शिक्षा देता है: और अब वह दूसरे स्थान पर यह जोड़ता है कि जब मनुष्य एक बार वश में किए जाकर आत्मा की नम्रता में ढाले जा चुके हैं, तब भी परमेश्वर उन्हें अपनी देखरेख में लेता है, और उनका मार्गदर्शन और अगुवाई तब तक करता रहता है जब तक वे पवित्र आत्मा की ज्योति के द्वारा यह जानने के योग्य न हो जाएँ कि उनका कर्तव्य क्या है।
13. उसका प्राण भलाई में बसा रहेगा। यदि मनुष्य का परम सुख इसी में है कि वह परमेश्वर की आज्ञा के बिना कुछ भी आरम्भ या प्रयत्न न करे, तो इससे यह निकलता है कि जीवन भर उसे अपना अगुवा और मार्गदर्शक पाना, जिससे हम कभी भटक न जाएँ, एक महान् और अतुलनीय वरदान भी है। परन्तु इसके अतिरिक्त यहाँ एक पार्थिव आशीष की प्रतिज्ञा की गई है, जिसमें पूर्वोक्त अनुग्रह का फल स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, जैसा कि पौलुस भी सिखाता है, "भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है।" (1 तीमुथियुस 4:8,)
सारांश यह है कि जो सचमुच परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे न केवल आत्मिक बातों में धन्य हैं, वरन वर्तमान जीवन की दशा के विषय में भी उसके द्वारा आशीषित होते हैं। यह सच है कि परमेश्वर सदा उनके साथ उनकी इच्छाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करता, और जिन आशीषों की वे कामना करते हैं वे सदा निश्चित और एक-सी रीति से नहीं बहतीं। इसके विपरीत, प्रायः ऐसा होता है कि वे रोग और संकट से उछाले जाते हैं, जबकि दुष्ट समृद्धि का आनन्द लेते हैं। परन्तु हमें जानना चाहिए कि जब-जब परमेश्वर अपने लोगों से अपनी आशीष हटा लेता है, तब-तब वह इस उद्देश्य से ऐसा करता है कि उन्हें उनकी दशा का बोध कराने के लिए जगाए, और उन पर प्रगट करे कि वे परमेश्वर के सिद्ध भय से अभी कितनी दूर हैं। और फिर भी, जितना उनके लिए हितकर है, उतना वे अभी परमेश्वर की आशीषों का आनन्द लेते हैं, यहाँ तक कि संसारी मनुष्यों और परमेश्वर के तुच्छ जाननेवालों की तुलना में वे सचमुच सुखी और धन्य हैं, क्योंकि अपनी घोर दरिद्रता में भी वे इस निश्चय को कभी नहीं खोते कि परमेश्वर उनके साथ उपस्थित है; और इस सान्त्वना से सम्भाले जाकर वे मन की शान्ति और चैन का आनन्द लेते हैं। यह सच है कि हमारे सब दुःख इसी एक स्रोत से निकलते हैं — कि अपने पापों के द्वारा हम ईश्वरीय आशीष को एक-सी धारा में अपने ऊपर उतरने से रोक देते हैं; और फिर भी ऐसी अव्यवस्था की दशा के बीच उसका अनुग्रह चमकना कभी बन्द नहीं करता, यहाँ तक कि भक्तों की दशा सदा दूसरों की दशा से उत्तम रहती है: क्योंकि यद्यपि वे अच्छी वस्तुओं से तृप्त नहीं किए जाते, तौभी उन्हें निरन्तर परमेश्वर की पितृतुल्य कृपा का अनुभव कराया जाता है। और इसी से मैं प्राण शब्द को जोड़ना चाहता हूँ, अर्थात् यह कि परमेश्वर के दानों को ग्रहण करते समय वे उनकी मिठास का अनुभव किए बिना उन्हें निगल नहीं जाते, वरन सचमुच उनका स्वाद लेते हैं, यहाँ तक कि थोड़ी-सी जीविका उन्हें तृप्त करने में उससे अधिक सफल होती है जितनी बड़ी से बड़ी बहुतायत अभक्तों को तृप्त करने में। इस प्रकार, जिस मात्रा में प्रत्येक मनुष्य अपनी दशा से सन्तुष्ट रहता है, और आनन्द के साथ धीरज और शान्ति की आत्मा बनाए रखता है, उसी मात्रा में उसका प्राण भलाई में बसा हुआ कहा जाता है। कुछ व्याख्याकार इस शब्द बसना या टिके रहना को मृत्यु के समय पर लागू करते हैं; परन्तु यह व्याख्या ठोस होने की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। प्रेरित लेखक, जैसा हम पहले कह चुके हैं, वर्तमान जीवन की दशा के विषय में ही बोलता है। वह दूसरे स्थान पर उदाहरण के रूप में यह जोड़ता है कि विश्वासियों का वंश देश का अधिकारी होगा, और इससे यह निकलता है कि परमेश्वर उन पर अपनी कृपा बढ़ाता रहता है। यहाँ से हम फिर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्वर के दासों की मृत्यु का अर्थ उनका पूर्ण विनाश नहीं है, और जब वे इस संसार से जाते हैं तो उनका अस्तित्व समाप्त नहीं होता, वरन वे सदा जीवित रहते हैं। यह मानना बेतुका होगा कि परमेश्वर उन्हें पूरी रीति से जीवन से वंचित कर देगा जिनके कारण वह दूसरों के साथ भी भलाई करता है। यहाँ जो कहा गया है कि पवित्र लोगों की सन्तान देश की अधिकारी होगी, उसकी चर्चा अन्यत्र की जा चुकी है, और सैंतीसवें भजन पर यह और भी पूर्ण रूप से दिखाया जाएगा कि यह किन बातों में और किस प्रकार पूरा होता है। ["Les gachans lequel prendre." — फ्रांसीसी। "यह न जानते हुए कि किसे लें।"]
14. यहोवा का भेद। भजनकार यहाँ उस बात की पुष्टि करता है जो उसने अभी पिछले पद में कही थी, अर्थात् यह कि परमेश्वर सब भक्तों के प्रति शिक्षक और गुरु का कार्य विश्वासयोग्यता से पूरा करेगा; और अपनी सामान्य रीति के अनुसार वह एक ही पद में एक ही भाव को दो बार दोहराता है, क्योंकि परमेश्वर की वाचा उसके भेद या परामर्श को छोड़ और कुछ नहीं है। भेद शब्द का प्रयोग करके वह उस शिक्षा की श्रेष्ठता की बड़ाई और महिमा करना चाहता है जो परमेश्वर की व्यवस्था में हम पर प्रगट की गई है। संसारी मनुष्य अपने हृदय के घमण्ड और अहंकार के कारण मूसा और भविष्यद्वक्ताओं को चाहे जितना तुच्छ जानें, तौभी विश्वासी यह मानते हैं कि उनमें निहित शिक्षा में स्वर्ग के वे भेद प्रगट और खोले गए हैं जो मनुष्य की समझ से बहुत परे हैं। इसलिए जो कोई व्यवस्था से शिक्षा पाना चाहता है, वह उसमें निहित शिक्षा को आदर और सम्मान की दृष्टि से देखे। इसके अतिरिक्त, इस स्थान से हमें नम्रता और दीनता के गुणों को बढ़ाने की चेतावनी मिलती है, कहीं ऐसा न हो कि अपनी ही बुद्धि पर निर्भर होकर, या अपनी ही समझ पर भरोसा करके, हम अपने ही प्रयत्नों से उन रहस्यों और भेदों को समझने का प्रयास करें, जिनका ज्ञान, दाऊद यहाँ घोषणा करता है, केवल परमेश्वर का ही विशेषाधिकार है। फिर, क्योंकि यहोवा का भय उसकी इच्छा की सही समझ का आरम्भ, और मानो उस तक पहुँचानेवाला मार्ग कहा गया है, (भजन संहिता 111:10,) इसलिए जिस मात्रा में कोई विश्वास में बढ़ना चाहता है, उसी मात्रा में वह यहोवा के भय में भी आगे बढ़ने का प्रयत्न करे। इसके अतिरिक्त, जब हृदय में भक्ति राज्य करती है, तब हमें परमेश्वर को खोजने में अपना परिश्रम व्यर्थ जाने का कोई भय रखने की आवश्यकता नहीं। यह सच है कि परमेश्वर की वाचा एक ऐसा भेद है जो मनुष्य की समझ से बहुत परे है; परन्तु क्योंकि हम जानते हैं कि वह हमें व्यर्थ ही अपने को खोजने की आज्ञा नहीं देता, इसलिए हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि जो सब सीधी अभिलाषा से उसकी सेवा करने का प्रयत्न करते हैं, वे पवित्र आत्मा की शिक्षा के द्वारा उस स्वर्गीय बुद्धि के ज्ञान तक पहुँचाए जाएँगे जो उनके उद्धार के लिए ठहराई गई है। परन्तु साथ ही दाऊद परोक्ष रूप से उन्हें डाँटता है जो झूठे और निराधार रूप से यह घमण्ड करते हैं कि परमेश्वर की वाचा में उनका भाग है, जबकि वे केवल व्यवस्था के अक्षर पर टिके रहते हैं, और परमेश्वर के भय की कोई उद्धारदायक छाप उनमें नहीं है। यह सच है कि परमेश्वर अपना वचन धर्मियों और दुष्टों दोनों को बिना भेदभाव के सुनाता है; परन्तु जब तक मनुष्यों में सच्ची भक्ति न हो, वे उसे नहीं समझते; ठीक जैसे यशायाह 29:11 कहता है कि अभक्तों के लिए व्यवस्था "मुहरबन्द पुस्तक" के समान है। और इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि यहाँ उनके बीच, जो सचमुच परमेश्वर की सेवा करते हैं और जिन पर वह अपना भेद प्रगट करता है, और दुष्टों या कपटियों के बीच भेद किया गया है। परन्तु जब हम दाऊद को इस भरोसे में साहस के साथ परमेश्वर की पाठशाला में आते, और दूसरों को भी अपने साथ ले आते देखते हैं, तो हमें जान लेना चाहिए, जैसा वह स्पष्ट रूप से दिखाता है, कि साधारण लोगों को पवित्र शास्त्र से इस बहाने वंचित करने का प्रयास करना कि वह एक गुप्त रहस्य है, एक दुष्ट और घृणित आविष्कार है; मानो वे सब जो हृदय से उसका भय मानते हैं, अन्य बातों में उनकी स्थिति या दशा चाहे जो हो, स्पष्ट रूप से परमेश्वर की वाचा के ज्ञान के लिए बुलाए न गए हों।
हॉर्सली (Horsley) इन शब्दों को भावी अवस्था की धन्यता पर लागू करता है। वह पढ़ता है, "उसका प्राण आनन्द में विश्राम करेगा;" और उसकी यह टिप्पणी है: — "תליך, pernoctavit [उसने रात बिताई]। ये शब्द भले मनुष्य के दिवंगत प्राण की सुखमय अवस्था की ओर संकेत करते जान पड़ते हैं, जबकि उसका वंश वर्तमान संसार में फलता-फूलता है।" अर्थात्, कनान देश, जिसे परमेश्वर ने आज्ञाकारी इस्राएलियों और उनके वंश के लिए स्थायी बनाए रखने की प्रतिज्ञा की थी। पूल (Poole) कहता है, "वह अनुग्रह की सम्पूर्ण वाचा और उसकी सब प्रतिज्ञाओं के बयाने के रूप में प्रतिज्ञा किया और दिया गया था, और इसलिए अलंकार (synecdoche) के द्वारा उन सब के स्थान पर रखा गया है। अर्थ यह है कि उसका वंश आशीषित होगा।"
15. मेरी आँखें सदैव यहोवा की ओर लगी रहती हैं। दाऊद यहाँ अपने विश्वास और उसकी दृढ़ता के विषय में घमण्ड के रूप में नहीं बोलता, वरन अपनी विनतियों के पूरे होने की आशा में अपने आप को प्रोत्साहित करने के लिए, ताकि वह और भी तत्परता और आनन्द के साथ प्रार्थना में लगा रहे। क्योंकि परमेश्वर पर भरोसा रखनेवाले सब लोगों से यह प्रतिज्ञा की गई है कि वे अपनी आशा में निराश न होंगे, और कभी लज्जित न किए जाएँगे, इसलिए पवित्र लोग प्रायः इसे अपनी रक्षा की ढाल बनाते हैं। इसी बीच दाऊद अपने उदाहरण से दूसरों को प्रार्थना की सही रीति दिखाता है, और उनसे कहता है कि उन्हें अपने विचारों को परमेश्वर पर टिकाए रखने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि दृष्टि की इन्द्रिय बहुत तीव्र है, और सारे शरीर पर पूरा प्रभाव रखती है, इसलिए आँखें शब्द से सब भावनाओं का बोध कराया जाना कोई असामान्य बात नहीं। जो कारण तुरन्त आगे दिया गया है वह और भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि दाऊद के मन में आशा अभिलाषा के साथ जुड़ी हुई थी; मानो वह कह रहा हो कि परमेश्वर की सहायता पर अपना भरोसा टिकाते हुए उसने ऐसा सन्देह या अनिश्चितता में नहीं किया, वरन इसलिए कि उसे निश्चय था कि वह उसका छुड़ानेवाला होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सर्वनाम वही भी बलपूर्वक प्रयुक्त है। यह दिखाता है कि दाऊद उन लोगों की रीति पर, जो अनिश्चितता में पड़े रहकर अपने लिए छुटकारे और उद्धार के विभिन्न उपाय गढ़ते हैं, चारों ओर ताकता नहीं रहा, वरन वह केवल परमेश्वर से ही सन्तुष्ट था।
भजन 25:16-22
16. मेरी ओर दृष्टि कर, और मुझ पर दया कर, क्योंकि मैं अकेला और दीन हूँ। 17. मेरे हृदय के संकट बढ़ गए हैं; तू मुझे मेरे क्लेशों में से निकाल। 18. मेरे दुःख और मेरे कष्ट पर दृष्टि कर, और मेरे सब पापों को दूर कर। 19. मेरे शत्रुओं को देख, क्योंकि वे बढ़ गए हैं; और वे मुझ से क्रूर बैर रखते हैं। 20. मेरे प्राण की रक्षा कर, और मुझे छुड़ा, कि मैं लज्जित न होऊँ; क्योंकि मैं ने तुझ पर भरोसा रखा है। 21. खराई और सीधाई मेरी रक्षा करें, क्योंकि मैं ने तेरी बाट जोही है। 22. हे परमेश्वर, तू इस्राएल को उसके सारे संकटों से छुड़ा।
16. मेरी ओर दृष्टि कर। क्योंकि जब परमेश्वर हमारी सहायता में अपनी सामर्थ प्रगट करना बन्द कर देता है, तब शरीर सदा हमारे मन में यह विचार डालने को तत्पर रहता है कि परमेश्वर ने हमें भुला दिया है, इसलिए दाऊद यहाँ उसी क्रम का पालन करता है जो स्वभाव सिखाता है, और परमेश्वर से माँगता है कि वह उसकी ओर दृष्टि करे, मानो उसने पहले उसकी पूरी उपेक्षा की हो। अब, मुझे ऐसा जान पड़ता है कि इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: मेरी ओर दृष्टि कर, कि मुझ पर दया करे। वह परमेश्वर की दृष्टि में आने को अपने उद्धार का कारण और स्रोत दोनों मानता है; और फिर वह उसका परिणाम जोड़ता है: क्योंकि ज्यों ही परमेश्वर अपनी इच्छा की प्रसन्नता से हमारी ओर दृष्टि करने की कृपा करेगा, त्यों ही उसका हाथ भी हमारी सहायता के लिए तैयार होगा। फिर, परमेश्वर की करुणा को जगाने के लिए वह अपनी दुर्दशा प्रस्तुत करता है, और स्पष्ट कहता है कि वह अकेला है, अर्थात् एकाकी; और फिर वह अपने आप को दीन बताता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस प्रकार बोलते हुए वह उन प्रतिज्ञाओं की ओर संकेत करता है जिनमें परमेश्वर घोषणा करता है कि वह दुःखियों और सताए हुओं की सहायता और उपकार करने के लिए सदा उनके साथ उपस्थित रहेगा। ["Mon souci et travail." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "मेरी चिन्ता और परिश्रम।"]
"C'est, cruelle." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, क्रूर।"
17. मेरे हृदय के संकट बढ़ गए हैं। इस पद में वह न केवल यह मानता है कि उसे बाहर से अपने शत्रुओं और उनके द्वारा उत्पन्न किए गए संकटों से संघर्ष करना पड़ा, वरन यह भी कि वह भीतर से भी शोक और हृदय की वेदना से पीड़ित था। उस वर्णन-शैली पर भी ध्यान देना आवश्यक है जिसका वह यहाँ प्रयोग करता है, और जिसके द्वारा वह संकेत करता है कि उसकी परीक्षाओं का भार और उनकी संख्या इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने उसके सारे हृदय को भर दिया, ठीक जैसे जल की बाढ़ हर बाँध को तोड़कर और दूर-दूर तक फैलकर सारे देश को ढाँप लेती है। अब, जब हम देखते हैं कि दाऊद का हृदय कभी-कभी पूरी रीति से वेदना से भर गया था, तो हमें फिर इस बात पर आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं कि कभी-कभी परीक्षा का वेग हमें अभिभूत कर दे; परन्तु आओ, हम दाऊद के साथ यह माँगें कि जब हम मानो निराशा की कगार पर हों, तब भी परमेश्वर हमारी सहायता करे।
18. मेरे दुःख पर दृष्टि कर। इन शिकायतों को इतनी बार दोहराकर वह स्पष्ट दिखाता है कि जिन विपत्तियों से उस पर आक्रमण हुआ था वे कोई हल्की और तुच्छ बुराइयाँ न थीं। और हमें इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, ताकि जब उसी रीति से परीक्षाएँ और क्लेश हमारे भाग में नापकर दिए जाएँ, तब हम प्रार्थना में अपने प्राणों को परमेश्वर की ओर उठाने के योग्य हों; क्योंकि पवित्र आत्मा ने यह चित्र हमारी आँखों के सामने इसलिए रखा है कि क्लेशों की अधिकता या भार के नीचे हमारा मन हार न जाए। परन्तु इन दुःखों में राहत पाने के लिए दाऊद फिर प्रार्थना करता है कि उसके पाप क्षमा किए जाएँ, और उस बात को स्मरण करता है जो वह पहले कह चुका था, कि जब तक वह सेंतमेंत क्षमा पाकर पहले परमेश्वर से मेल न कर ले, तब तक वह ईश्वरीय कृपा का आनन्द लेने की आशा नहीं कर सकता था। और सचमुच वे बहुत संवेदनहीन हैं जो शारीरिक क्लेश से छुटकारा पाकर सन्तुष्ट हो जाते हैं, और अपने हृदयों की बुराइयों को, अर्थात् अपने पापों को, नहीं खोजते, वरन जहाँ तक उनके वश में है, यही चाहते हैं कि वे विस्मृति में गाड़ दिए जाएँ। इसलिए अपनी चिन्ताओं और शोकों का उपचार पाने के लिए दाऊद अपने पापों की क्षमा की याचना से आरम्भ करता है, क्योंकि जब तक परमेश्वर हम से क्रोधित है, तब तक यह अनिवार्य रूप से होगा कि हमारे सब कामों का अन्त दुःखद हो; और जब तक हमारे पाप बने रहते हैं, अर्थात् जब तक वह उन्हें क्षमा नहीं करता, तब तक उसके पास हम से अप्रसन्न होने का सदा उचित कारण रहता है। और यद्यपि प्रभु अपने लोगों को क्रूस के अधीन लाने में अनेक उद्देश्य रखता है, तौभी हमें इस सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए कि जब-जब परमेश्वर हमें दुःख देता है, तब-तब हम अपने हृदयों को जाँचने और दीनता से उसके साथ मेल खोजने के लिए बुलाए जाते हैं।
यहाँ प्रयुक्त इब्रानी शब्द יחיד yachid, unus, एक, है, जो प्रायः, जैसा इस स्थान में, एकाकी और उजाड़ व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। दाऊद अब त्यागा हुआ, उजाड़ और सब सहायता से रहित था। यह शब्द इसी अर्थ में भजन संहिता 22:20 और 35:17 में भी प्रयुक्त हुआ है। "Cependant que nos pechez demeurent c'est a dire iusaues a ce qu'il les pardonne." — फ्रांसीसी। "जब तक हमारे पाप बने रहते हैं, अर्थात् जब तक वह उन्हें क्षमा नहीं करता।"
19. मेरे शत्रुओं को देख। इस पद में दाऊद अपने शत्रुओं की संख्या और क्रूरता की शिकायत करता है, क्योंकि परमेश्वर के लोग जितने अधिक सताए जाते हैं, उतना ही अधिक वह उनकी सहायता करने की ओर झुकता है; और जिस संकट से वे घिरे होते हैं उसकी विशालता के अनुपात में वह उनकी और भी सामर्थ के साथ सहायता करता है। उपद्रव का बैर, ये शब्द यहाँ क्रूर और रक्तपिपासु बैर के अर्थ में समझे जाने चाहिए। अब, क्योंकि दाऊद के शत्रुओं का क्रोध इतना बड़ा था कि उसकी मृत्यु से कम कुछ भी उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सकता था, इसलिए वह परमेश्वर को पुकारता है कि वह उसके प्राण का रक्षक और संरक्षक बने; और इससे, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह इस समय घोर संकट में पड़ा हुआ था। इसके तुरन्त बाद आनेवाला वाक्यांश, कि मैं लज्जित न होऊँ, दो प्रकार से समझा जा सकता है। कुछ लोग भविष्यकाल बनाए रखते हैं, मैं लज्जित न होऊँगा, मानो दाऊद को निश्चय था कि परमेश्वर उसकी सुन चुका है, और अपनी आशा के प्रतिफल के रूप में वह अपनी प्रार्थनाओं के अनुग्रहपूर्ण उत्तर की प्रतिज्ञा अपने आप से करता है। मैं विपरीत मत की ओर अधिक झुकता हूँ — कि इन शब्दों को अब भी उसकी प्रार्थना का भाग माना जाए। अतः जो कहा गया है उसका सार यह है कि क्योंकि वह परमेश्वर पर भरोसा रखता है, इसलिए वह प्रार्थना करता है कि उद्धार की जो आशा उसने बाँधी थी वह निष्फल न हो। हमारी प्रार्थनाओं में पवित्र उत्साह भरने के लिए इससे उत्तम कुछ नहीं कि हम सच्चे हृदय से यह गवाही दे सकें कि हम परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं। और इसलिए हमें उचित है कि और भी अधिक यत्न के साथ उससे माँगें कि जब हमारी आशा छोटी हो तो वह उसे बढ़ाए, जब वह सोई हुई हो तो उसे जगाए, जब वह डगमगाती हो तो उसे स्थिर करे, जब वह निर्बल हो तो उसे बलवन्त करे, और जब वह गिरा दी गई हो तो उसे फिर उठा खड़ा करे।
21. खराई और सीधाई मेरी रक्षा करें। कुछ लोगों का मत है कि इन शब्दों में दाऊद केवल यह प्रार्थना करता है कि वह सब हानि से बचाया जाए, इस आधार पर कि उसने दूसरों के प्रति निर्दोष आचरण किया था, और सब छल और उपद्रव से दूर रहा था। अन्य लोग इन शब्दों में प्रार्थना के दोहरे विषय को देखते हैं, और समझते हैं कि इनमें साथ ही यह अभिलाषा भी सम्मिलित है कि परमेश्वर उसे हृदय का सच्चा और सीधा संकल्प प्रदान करे; और यह सब इसलिए कि कहीं वह पलटा लेने में, या अपने प्राण को बचाने के अन्य अनुचित उपायों में न टूट पड़े। तब अर्थ यह होगा: हे प्रभु, यद्यपि मेरा शरीर मुझे उकसाए कि जहाँ कहीं से भी राहत दिखाई दे वहीं से उसे खोजूँ, और मेरे शत्रु भी अपने हठ से मुझे ऐसा करने के लिए विवश करें, तौभी तू मेरे भीतर हर पापमय वासना और हर कुटिल अभिलाषा को वश में कर, ताकि मैं सदा अपने मन पर शुद्ध और पूरा नियन्त्रण रख सकूँ; और खराई और सीधाई मेरी रक्षा के दो प्रबल साधनों के रूप में पर्याप्त हों। हम पहली व्याख्या को अधिक उचित समझते हैं, क्योंकि वह तुरन्त अपनी खराई का एक प्रमाण जोड़ता है। जो कोई नम्र और शान्त आत्मा के साथ परमेश्वर की बाट जोहता है, वह अपने शत्रुओं से अधर्म के साथ संघर्ष करने देने की अपेक्षा मनुष्यों के द्वारा दिया गया कोई भी दुःख सह लेना अधिक पसन्द करेगा। इसलिए मेरे विचार में दाऊद यह घोषणा करता है कि मनुष्यों के बीच उसका आचरण ऐसा सीधा था कि उसके शत्रुओं का सताव पूरी रीति से अकारण और अन्यायपूर्ण था; और यह जानते हुए कि उसने किसी को ठेस नहीं पहुँचाई, वह परमेश्वर को अपनी निर्दोषता का रक्षक मानकर पुकारता है। परन्तु क्योंकि वह पहले ही तीन विभिन्न स्थानों पर मान चुका है कि वह न्याय के साथ क्लेश से दण्डित किया गया था, इसलिए यह विचित्र लग सकता है कि वह अब अपनी खराई पर घमण्ड करे। इस प्रत्यक्ष असंगति का समाधान एक अन्य स्थान पर पहले ही किया जा चुका है, जहाँ हम ने दिखाया है कि पवित्र लोग अपने विषय में सदा दीनता के साथ परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं, और उससे क्षमा की याचना करते हैं: और फिर भी यह बात उन्हें उसके सामने अपने पक्ष की भलाई और अपने दावों की न्यायसंगतता प्रस्तुत करने से नहीं रोकती। साथ ही, यह कहकर कि उसने परमेश्वर पर भरोसा रखा, वह केवल वही बताता है जो सचमुच अत्यावश्यक है; क्योंकि अपनी रक्षा का कार्य हाथ में लेते समय यह पर्याप्त नहीं कि न्याय हमारे पक्ष में हो, जब तक हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर होकर भरोसे के साथ उसकी सुरक्षा पर आश्रित न हों। प्रायः ऐसा होता है कि दृढ़ और विवेकी मनुष्य, अपना पक्ष अच्छा होने पर भी, उसकी रक्षा में सदा सफल नहीं होते, क्योंकि वे अपनी ही समझ पर भरोसा करते हैं, या भाग्य पर निर्भर रहते हैं। इसलिए, कि परमेश्वर हमारी निर्दोषता का रक्षक और संरक्षक बने, आओ, हम पहले अपने शत्रुओं के प्रति सीधाई और निर्दोषता से आचरण करें, और फिर अपने आप को पूरी रीति से उसकी सुरक्षा में सौंप दें।
इब्रानी शब्दों का शाब्दिक अनुवाद है, "उपद्रव के बैर से।"
22. हे परमेश्वर, तू इस्राएल को छुड़ा। इस समापन के द्वारा दाऊद दिखाता है कि जिन शत्रुओं की वह शिकायत करता था वे किस प्रकार के थे। इससे यह प्रतीत होता है कि वे घरेलू शत्रु थे, जो अंतड़ियों के भीतर भड़कनेवाले किसी रोग के समान, उस समय परमेश्वर के लोगों के लिए संकट और क्लेश का कारण बने हुए थे। छुड़ा शब्द से, जिसका वह यहाँ प्रयोग करता है, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उस समय कलीसिया कठोर दासत्व के नीचे दबी हुई थी; और इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि इस भजन में वह शाऊल और उन अन्य लोगों की ओर संकेत करता है जिन्होंने उसके साथ अत्याचारपूर्ण रीति से शासन किया। साथ ही वह दिखाता है कि उसकी दृष्टि केवल अपने ही लाभ पर नहीं है, वरन वह अपनी प्रार्थना में सारे राज्य की दशा को सम्मिलित करता है, ठीक जैसे पवित्र लोगों के बीच विद्यमान परस्पर सहभागिता और सम्बन्ध यह माँगते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, सारी कलीसिया पर आनेवाली सार्वजनिक विपत्तियों के बोध से गहराई से प्रभावित होकर, अन्य सब के साथ मिलकर परमेश्वर के सामने विलाप करे। इस बात ने दाऊद के विश्वास को दृढ़ करने में कोई छोटा योगदान नहीं दिया, जब उसने सब बातों में अपने आप को विश्वासियों की सम्पूर्ण देह से जुड़ा हुआ मानकर यह विचार किया कि जितने क्लेश और अन्याय उसने सहे, वे सब उसके और उनके बीच साझे थे। और हमें इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझना चाहिए कि इसी नियम के अनुसार हम में से प्रत्येक, अपने निजी दुःखों और परीक्षाओं पर विलाप करते हुए, अपनी अभिलाषाओं और प्रार्थनाओं को सारी कलीसिया तक फैलाए।
