भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 5

भजन 5

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भजन 5

भजन 5.

दाऊद, अपने शत्रुओं की क्रूरता से बुरी तरह सताया जाकर और आगे इससे भी अधिक विपत्ति की आशंका करते हुए, परमेश्वर से सहायता के लिए आग्रहपूर्वक विनती करता है। और जो कुछ वह माँगता है उसे और भी सहजता से पाने के लिए, अपनी प्रार्थनाओं की तीव्रता के द्वारा अपने दुःख की गहराई प्रकट करने के पश्चात्, वह पहले अपने शत्रुओं के असहनीय द्वेष को सामने रखता है, और दिखाता है कि यदि वे बिना दण्ड के छोड़ दिए जाएँ तो यह परमेश्वर के स्वभाव से कितना असंगत होगा। इसके बाद वह अपने विश्वास और धीरज, बल्कि अपनी सान्त्वना की भी चर्चा करता है, क्योंकि उसे किसी शुभ परिणाम के विषय में तनिक भी सन्देह नहीं। अन्त में वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जब वह छुड़ाया जाएगा, तब उसके छुटकारे से होनेवाले लाभ केवल उसी तक सीमित न रहेंगे, वरन् सब भक्तों तक पहुँचेंगे।

प्रधान बजानेवाले के लिये नहीलोत पर। दाऊद का भजन। कुछ लोग इब्रानी शब्द नहीलोत का अनुवाद मीरासें करते हैं, और कुछ सेनाएँ। पहले मत के लोग अपनी राय के पक्ष में यह कारण देते हैं कि दाऊद ने बारह गोत्रों के कल्याण के लिए प्रार्थना की, जिन्हें वह मीरासें कहता है। दूसरे मत के लोग अपने पक्ष में यह कहते हैं कि मनुष्यों की एक विशाल भीड़ से घिर जाने पर उसने सहायता के लिए परमेश्वर की शरण ली; और इस अर्थ के अनुसार पर शब्द का अर्थ विरुद्ध होगा। परन्तु उन बहुत-से लोगों के अनुमानों को स्वीकार न करते हुए, जो भजनों के इन शीर्षकों के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वे पहेलियाँ हों, मैं उन लोगों का मत अपनाता हूँ जो मानते हैं कि यह या तो कोई वाद्य-यन्त्र था या कोई धुन; परन्तु वह किस विशेष प्रकार का था, इसका पता लगाना मैं कम महत्त्व की बात समझता हूँ।

64 "Qu'il appelle Heritages." — फ्रांसीसी. 65 "Mais pource que je n'approuve point ce que devinent plusieurs parlans comme par enigmes sur ces inscriptions des Pseaumes." — फ्रांसीसी.

भजन 5:1-2

1. हे यहोवा, मेरे वचनों पर कान लगा; मेरी वाणी पर ध्यान दे। 2. हे मेरे राजा, हे मेरे परमेश्वर, मेरी दोहाई के शब्द को सुन; क्योंकि मैं तुझी से प्रार्थना करूँगा।

मैं निश्चित रूप से यह निर्धारित करने का साहस नहीं करता कि दाऊद इस भजन में किसी विशेष समय पर अपने शत्रुओं के हाथों सहे गए अन्यायों पर विलाप करता है, या वह सामान्य रूप से उन विविध सतावों की शिकायत करता है जिनसे वह शाऊल के अधीन बहुत समय तक दुःख पाता रहा। कुछ यहूदी टीकाकार तो इस भजन को अबशालोम पर भी लागू करते हैं, क्योंकि उनके विचार में हत्यारे और छली मनुष्य से दोएग और अहीतोपेल की ओर संकेत किया गया है। परन्तु मुझे यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि जब दाऊद ने शाऊल की मृत्यु के पश्चात् राज्य को शान्तिपूर्वक अपने अधिकार में ले लिया, तब उसने उन प्रार्थनाओं को लिखित रूप दिया जिन पर उसने अपने क्लेशों और संकटों में मनन किया था। परन्तु अब शब्दों पर आएँ:— पहले, वह एक ही बात को तीन भिन्न रीतियों से व्यक्त करता है; और यह दोहराव उसकी भावना की प्रबलता और प्रार्थना में उसकी लम्बी लगन को प्रकट करता है। क्योंकि वह बहुत-से शब्दों का ऐसा शौकीन न था कि अर्थहीन विविध अभिव्यक्तियों का प्रयोग करे; वरन् प्रार्थना में गहराई से लीन होकर उसने इन विविध अभिव्यक्तियों के द्वारा अपनी शिकायतों की विविधता को प्रकट किया। अतः इसका अर्थ यह है कि उसने न तो ठण्डे मन से और न केवल थोड़े-से शब्दों में प्रार्थना की; वरन् जैसे-जैसे उसके दुःख की प्रचण्डता उसे प्रेरित करती गई, वैसे-वैसे वह परमेश्वर के सामने अपनी विपत्तियों पर आग्रहपूर्वक विलाप करता रहा; और क्योंकि यह तुरन्त प्रकट न हुआ कि उनका परिणाम क्या होगा, इसलिए वह उन्हीं शिकायतों को दोहराने में लगा रहा। फिर, वह स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता कि वह परमेश्वर से क्या माँगना चाहता है; परन्तु इस प्रकार बात को दबा रखने में स्पष्ट रूप से कहने की अपेक्षा कहीं अधिक बल है। अपने हृदय की अभिलाषाओं को शब्दों में न कहकर वह और भी प्रबलता से यह दिखाता है कि उसकी भीतरी भावनाएँ, जिन्हें वह अपने साथ परमेश्वर के सामने लाया, ऐसी थीं कि भाषा उन्हें व्यक्त करने में असमर्थ थी। फिर, दोहाई शब्द, जिसका अर्थ है ऊँचे और गूँजते स्वर में बोलना, उसकी अभिलाषा की तीव्रता को प्रकट करता है। दाऊद ऐसे नहीं चिल्लाया मानो किसी बहरे के कानों में चिल्ला रहा हो; वरन् उसके दुःख की प्रचण्डता और उसकी भीतरी वेदना इस दोहाई के रूप में फूट निकली। क्रिया הגה hagah, जिससे संज्ञा הגיג hagig, वाणी, निकली है, जिसका प्रयोग भविष्यद्वक्ता यहाँ करता है, उसका अर्थ स्पष्ट रूप से बोलना भी है और फुसफुसाना या बुदबुदाना भी। परन्तु इस स्थल के लिए दूसरा अर्थ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। सामान्य रूप से यह कहने के पश्चात् कि परमेश्वर उसके वचनों को सुनता है, वह तुरन्त ही, और अधिक स्पष्ट करने के उद्देश्य से, उन्हें दो प्रकारों में बाँटता प्रतीत होता है, एक को वह अस्पष्ट या धुँधली कराहें कहता है और दूसरे को ऊँची दोहाई। पहले से उसका अभिप्राय एक उलझी हुई बुदबुदाहट से है, जैसी हिजकिय्याह के गीत में वर्णित है, जब शोक ने उसे स्पष्ट बोलने और अपना स्वर सुनाने से रोक दिया था: "सारस या अबाबील के समान मैं चीं-चीं करता रहा, मैं पिण्डुक के समान विलाप करता रहा" (यशायाह 38:14)। अतः यदि किसी समय हम प्रार्थना करने में आलसी हों, या हमारी भक्तिपूर्ण भावनाएँ अपनी उष्णता खोने लगें, तो हमें यहाँ ऐसे तर्क ढूँढ़ने चाहिए जो हमें सजीव करें और आगे बढ़ाएँ। और जैसे परमेश्वर को अपना राजा और अपना परमेश्वर कहकर उसका अभिप्राय यह था कि वह अपने क्लेशों के परिणाम के विषय में अधिक सजीव और अनुकूल आशाएँ रखने के लिए स्वयं को उभारे, वैसे ही आइए, हम भी इन उपाधियों का ऐसा ही उपयोग करना सीखें, अर्थात् परमेश्वर के साथ अपने को अधिक घनिष्ठ बनाने के लिए। अन्त में वह यह गवाही देता है कि वह अविश्वासियों की रीति के अनुसार मुँह फुलाकर लगाम को नहीं चबाता, वरन् अपनी कराह को परमेश्वर की ओर लगाता है; क्योंकि जो लोग परमेश्वर की उपेक्षा करके या तो भीतर ही भीतर कुढ़ते हैं या मनुष्यों के सामने अपनी शिकायतें कहते हैं, वे इस योग्य नहीं कि वह उनकी सुधि ले। कुछ लोग अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद यों करते हैं, जब मैं तुझ से प्रार्थना करता हूँ; परन्तु मुझे तो यह उस बात का कारण प्रतीत होता है जो दाऊद ने ठीक पहले कही थी, और उसका उद्देश्य यह है कि वह इस सामान्य सिद्धान्त को मानकर परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए स्वयं को उत्साहित करे कि जो कोई अपनी विपत्तियों में परमेश्वर को पुकारते हैं, वे उसकी ओर से कभी ठुकराए नहीं जाते।

66 "Il a aussi represente et exprime ses gemissemens qui estoyent en grand nombre et de beaucoup de sortes." — फ्रांसीसी. 67 "Ce qu'il vent requerir a Dieu." — फ्रांसीसी.

भजन 5:3

3. भला होता कि तू भोर को मेरी वाणी सुनता! हे यहोवा, भोर को मैं सीधा तेरी ओर अभिमुख होऊँगा, और पहरा देता रहूँगा।

पहले वाक्य को निश्चयार्थ भविष्यत् काल में भी पढ़ा जा सकता है, तू मेरी प्रार्थना सुनेगा। परन्तु मेरी सम्मति में यह क्रिया इच्छार्थक रूप में है, जैसा कि मैंने इसका अनुवाद किया है। परमेश्वर से अपनी विनतियाँ पूरी करने की याचना करने के पश्चात्, अब वह उससे शीघ्रता करने की विनती करता है। कुछ लोग सोचते हैं कि वह उन प्रातःकालीन प्रार्थनाओं की ओर संकेत करता है जो व्यवस्था के ठहराव के अनुसार मन्दिर में प्रतिदिन के बलिदानों के साथ की जाती थीं। यद्यपि मैं इस मत को अस्वीकार नहीं करता, फिर भी मुझे कोई सन्देह नहीं कि कुछ लम्बे विलम्ब की थकान से विवश होकर वह चाहता है कि उसका छुटकारा शीघ्र हो; मानो वह कहता हो, "जैसे ही मैं जागता हूँ, यही मेरे विचारों का पहला विषय होगा। इसलिए, हे प्रभु, जिस सहायता की मुझे आवश्यकता है उसमें अब और विलम्ब न कर, वरन् मेरी अभिलाषाओं को तुरन्त पूरा कर।" परमेश्वर की ओर अभिमुख होना—इस अभिव्यक्ति का अर्थ मैं वही समझता हूँ जो सीधे परमेश्वर के पास जाने का है। बहुत-से लोग, मानो भाषा में कुछ छूट गया हो, अपनी प्रार्थना शब्द जोड़ देते हैं। परन्तु मेरी समझ में दाऊद का अभिप्राय यह घोषित करना है कि वह इधर-उधर नहीं भटकाया गया, और न उन परीक्षाओं के द्वारा, जिनके सम्मुख वह था, विभिन्न दिशाओं में खींचा गया, वरन् परमेश्वर की शरण लेना उसके जीवन का स्थिर क्रम था। इन शब्दों में एक निहित विरोध है: एक ओर उन लोगों की भटकती और अनिश्चित गतिविधियाँ, जो सांसारिक सहायता के लिए चारों ओर ताकते हैं या अपनी ही युक्तियों पर निर्भर रहते हैं, और दूसरी ओर विश्वास की सीधी अगुवाई, जिसके द्वारा सब भक्त संसार के व्यर्थ प्रलोभनों से हटकर केवल परमेश्वर ही की शरण लेते हैं। इब्रानी शब्द ערך arac का अर्थ है क्रम में रखना या व्यवस्थित करना, और कभी-कभी सजाना या ठीक करना। यह अर्थ इस स्थल के लिए बहुत उपयुक्त है, जिसमें दाऊद स्पष्ट रूप से अपना यह निश्चय घोषित करता है कि वह अपने व्यवस्थित मार्ग से हटकर भूल और पाप के टेढ़े और घुमावदार पथों में तनिक भी न खिंचेगा, वरन् सीधा परमेश्वर के पास आएगा। पहरा शब्द के द्वारा वह चिन्ता के साथ-साथ आशा और धीरज का भी भाव प्रकट करता है। क्योंकि इब्रानी में צפה tsapah का अर्थ बाट जोहना भी है और ताकना भी, इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि दाऊद यह कहना चाहता था कि अपनी चिन्ताओं को परमेश्वर की गोद में उँडेल देने के पश्चात्, वह व्याकुल मन से, मानो एक पहरुए के समान, तब तक ताकता रहेगा जब तक यह प्रकट न हो जाए कि परमेश्वर ने सचमुच उसकी सुन ली है। निःसन्देह लालसा के अभ्यास में सदा कुछ न कुछ बेचैनी निहित रहती है; परन्तु जो व्यक्ति उत्कट अभिलाषा के साथ परमेश्वर के अनुग्रह की बाट जोहता है, वह धीरज से उसकी प्रतीक्षा करेगा। अतः यह स्थल हमें सिखाता है कि वे प्रार्थनाएँ व्यर्थ हैं जिनके साथ वह आशा नहीं जुड़ी, जो मानो प्रार्थना करनेवालों के मन को एक पहरे की मीनार पर ऊँचा उठा देती है।

68 बिशप हॉर्न इस शब्द का सुन्दर अनुवाद "कबूतर-सी कराहें" करते हैं, और बिशप हॉर्सली "आहें भरना"। हैमण्ड कहते हैं, "यह शब्द नियमित रूप से आह या पुकार का अर्थ देता है, कोई ऊँचा, गूँजता स्वर नहीं, वरन् ऐसा स्वर जिसमें शिकायतें की जाती हैं।" 69 "Il semble que puis apres, pour mieux specifier, it en met deux sortes appelant les unes Complaintes obscures, et les autres Cri." — फ्रांसीसी.

70 "Quand la douleur l'empesche de parler distinctement et faire entendre sa voix." — फ्रांसीसी.

भजन 5:4-6

4. क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ वास न करेगी। 5. मूर्ख तेरे सम्मुख खड़े न रहने पाएँगे; तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है। 6. तू उनको जो झूठ बोलते हैं नष्ट करेगा; यहोवा रक्त के प्यासे और छली मनुष्य से घिन करेगा।

यहाँ दाऊद अपने शत्रुओं के द्वेष और दुष्टता को अपनी इस प्रार्थना के समर्थन में तर्क बनाता है कि परमेश्वर उस पर अनुग्रह करे। भाषा सचमुच टूटी-फूटी है, जैसा कि पवित्र लोग प्रार्थना में प्रायः हकलाते हैं; परन्तु यह हकलाना परमेश्वर को अलंकार-शास्त्र की सब शोभाओं से, चाहे वे कितनी ही सुन्दर और चमकीली क्यों न हों, कहीं अधिक ग्रहणयोग्य है। इसके अतिरिक्त, दाऊद का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि क्योंकि उसके शत्रुओं की क्रूरता और विश्वासघात अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुके थे, इसलिए यह असम्भव था कि परमेश्वर शीघ्र ही उन्हें उनके मार्ग में रोक न दे। उसका तर्क परमेश्वर के स्वभाव पर आधारित है। क्योंकि धार्मिकता और खरा व्यवहार उसे भाते हैं, इससे दाऊद यह निष्कर्ष निकालता है कि वह सब अन्यायियों और दुष्टों से पलटा लेगा। और जब वह जगत का न्यायी है, तो यह कैसे सम्भव है कि वे बिना दण्ड पाए उसके हाथ से बच निकलें? यह स्थल हमारे विशेष ध्यान के योग्य है। क्योंकि हम जानते हैं कि दुष्टों की असीम ढिठाई से हम कितने निरुत्साहित हो जाते हैं। यदि परमेश्वर उसे तुरन्त न रोके, तो हम या तो सुन्न और भयभीत हो जाते हैं, या निराशा में गिर पड़ते हैं। परन्तु दाऊद इससे उलटा उत्साह और भरोसे का कारण पाता है। उसके शत्रु जितनी अधिक उच्छृंखलता से उसके विरुद्ध बढ़ते गए, उतनी ही अधिक लगन से उसने परमेश्वर से रक्षा की विनती की, जिसका कार्य सब दुष्टों को नष्ट करना है, क्योंकि वह सब दुष्टता से घृणा करता है। अतः सब भक्त यह सीखें कि जब-जब उन्हें हिंसा, छल और अन्याय से संघर्ष करना पड़े, तब-तब वे अपने विचारों को परमेश्वर की ओर उठाएँ, ताकि छुटकारे की निश्चित आशा में स्वयं को उत्साहित करें, जैसा कि पौलुस भी 2 थिस्सलुनीकियों 1:5 में उन्हें समझाता है: "यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट प्रमाण है," वह कहता है, "कि तुम परमेश्वर के राज्य के योग्य ठहरो, जिसके लिये तुम दुःख भी उठाते हो; क्योंकि परमेश्वर के निकट यह न्याय है कि जो तुम्हें क्लेश देते हैं उन्हें बदले में क्लेश दे, और तुम्हें जो क्लेश पाते हो, हमारे साथ चैन दे।" और निश्चय ही, यदि उसके पास सब अभक्तों के लिए प्रतिफल संचित न रखा होता, तो वह जगत का न्यायी न होता। अतः इस शिक्षा का एक उपयोग यह है:—जब हम दुष्टों को अपनी अभिलाषाओं में मग्न देखते हैं, और परिणामस्वरूप हमारे मन में यह सन्देह घर करने लगता है कि परमेश्वर हमारी कुछ चिन्ता करता भी है या नहीं, तब हमें इस विचार से सन्तुष्ट होना सीखना चाहिए कि परमेश्वर, जो सब अधर्म से घृणा और घिन करता है, उन्हें बिना दण्ड के जाने न देगा; और यद्यपि वह कुछ समय तक उन्हें सहता रहे, तौभी अन्त में वह न्याय-आसन पर विराजमान होगा, और अपने आप को पलटा लेनेवाला प्रकट करेगा, क्योंकि वह अपने लोगों का रक्षक और संरक्षक है। फिर, इस स्थल से हम वह सामान्य शिक्षा भी निकाल सकते हैं कि परमेश्वर, यद्यपि शैतान और अभक्तों के द्वारा कार्य करता है और अपने न्याय-दण्डों को पूरा करने के लिए उनके द्वेष का उपयोग करता है, तौभी इस कारण वह पाप का रचयिता नहीं है, और न उससे प्रसन्न होता है, क्योंकि जिस अन्त का वह उद्देश्य रखता है वह सदा धर्ममय होता है; और जिन्हें वह अपने रहस्यमय विधान के द्वारा जहाँ चाहे वहाँ हाँक ले जाता है, उन्हें वह न्यायपूर्वक दोषी ठहराता और दण्ड देता है।

71 "Ou le mauvais." — फ्रांसीसी. हाशिये में: "या दुष्ट।" 72 मूल में शब्द ये हैं, דמים איש ish damim, अक्षरशः, रक्तों का मनुष्य। बहुवचन का प्रयोग सम्भवतः हमें यह सिखाने के लिए किया गया है कि जो मनुष्य मानव-रक्त का प्यासा है, वह किसी एक शिकार से कदाचित् ही तृप्त होता है।

चौथे पद में कुछ लोग רע ra को पुल्लिंग में लेकर दुष्ट मनुष्य अर्थ करते हैं; परन्तु मैं इसे दुष्टता ही के अर्थ में समझता हूँ। दाऊद सीधे-सीधे यह घोषित करता है कि परमेश्वर और अधर्म में कोई मेल नहीं। इसके तुरन्त बाद वह स्वयं मनुष्यों के विषय में कहने लगता है, मूर्ख तेरे सम्मुख खड़े न रहने पाएँगे; और इससे यह बहुत ही उचित निष्कर्ष निकलता है कि अधर्म परमेश्वर को घृणित है, और इसलिए वह सब दुष्टों को उचित दण्ड देगा। पवित्रशास्त्र में इस शब्द के प्रचलित प्रयोग के अनुसार वह उन्हें मूर्ख कहता है जो अन्धी वासना से प्रेरित होकर पाप में सिर के बल कूद पड़ते हैं। अभक्तों के लिए इससे बढ़कर कोई मूर्खता नहीं कि वे परमेश्वर का भय त्याग दें और हानि पहुँचाने की लालसा को अपना शासक सिद्धान्त बनने दें; हाँ, परमेश्वर के तिरस्कार से बुरा कोई पागलपन नहीं, जिसके प्रभाव में मनुष्य सारे न्याय को उलट देते हैं। दाऊद यह सत्य अपनी सान्त्वना के लिए अपने सामने रखता है; परन्तु हम भी इससे ऐसी शिक्षा निकाल सकते हैं जो हमें परमेश्वर के भय में प्रशिक्षित करने के लिए बहुत उपयोगी है; क्योंकि पवित्र आत्मा, परमेश्वर को दुष्टता का पलटा लेनेवाला घोषित करके, हम पर लगाम डालता है, ताकि हम दण्ड से बच निकलने की व्यर्थ आशा में पाप करने से रुके रहें।

भजन 5:7

7. और मैं तेरी करुणा की बहुतायत [या प्रचुरता] में तेरे भवन में प्रवेश करूँगा; मैं तेरा भय मानकर तेरे पवित्र मन्दिर में दण्डवत करूँगा।

कुछ लोग सोचते हैं कि और शब्द, जिसके द्वारा यह वाक्य पिछले वाक्य से जोड़ा गया है, परन्तु के स्थान पर रखा गया है; मानो दाऊद अपनी तुलना अभक्तों से करते हुए यह घोषित करता और अपने आप को निश्चय दिलाता हो कि परमेश्वर उस पर दया करेगा, जबकि वह दुष्टों से घिन करता है और उन्हें नष्ट करेगा। परन्तु मैं यह अपने पाठकों के निर्णय पर छोड़ता हूँ कि क्या इस स्थल के लिए यह अधिक उपयुक्त नहीं कि इस पद को पिछली बातों से निकला हुआ निष्कर्ष माना जाए, जिसे इस रूप में रखा जा सकता है: "हे प्रभु, तू दुष्टों को सह नहीं सकता; इसलिए जब मैं तेरी सामर्थ्य से उनके हाथों से बचाया जाऊँगा, तब मैं तेरे मन्दिर में तेरे सम्मुख उपस्थित होने आऊँगा, ताकि उस छुटकारे के लिए तेरा धन्यवाद करूँ जो तूने मुझे कृपापूर्वक दिया है।" यदि पहली व्याख्या को प्राथमिकता दी जाए, तो भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के प्रति केवल अपनी भक्ति की सराहना करके अपने आप को उस वर्ग से अलग करता है जिसके विषय में उसने कहा था। परन्तु इस स्थल का अभिप्राय हमें यह समझने की ओर ले जाता है कि वह परमेश्वर का धन्यवाद करने की प्रतिज्ञा कर रहा है। उसने पहले अपने शत्रुओं के विषय में कहा था कि वे परमेश्वर के घृणापात्र हैं; और अब, इस बात का निश्चय करके कि परमेश्वर उसे सुरक्षित रखेगा, वह अपने आप को कृतज्ञता के अभ्यास के लिए बुलाता है। वह कहता है, मैं तेरी करुणा की बहुतायत में तेरे मन्दिर में आऊँगा; मानो वह कहता हो, इस समय मैं लगभग निराशाजनक दशा में प्रतीत हो सकता हूँ, परन्तु परमेश्वर की कृपा से मैं पूर्ण सुरक्षा में रखा जाऊँगा। अतः यह स्थल हमें सिखाता है कि जब हम अत्यन्त कष्टदायक परीक्षाओं से पीड़ित हों, तब हमें परमेश्वर के अनुग्रह को अपनी आँखों के सामने रखना चाहिए, ताकि उसके द्वारा बड़े से बड़े संकटों के बीच भी ईश्वरीय हस्तक्षेप की आशा से सँभाले रहें। फिर, क्योंकि हमारा शारीरिक मन या तो दुष्टता से परमेश्वर के अनुग्रह का अवमूल्यन करता है, या उसका वही तुच्छ मूल्य आँकता है जो संसार साधारणतः आँकता है, इसलिए आइए, हम उसकी अद्भुत महानता की स्तुति करना सीखें, जो हमें सब भयों पर जय पाने के योग्य बनाने के लिए पर्याप्त है। दाऊद का प्राथमिक उद्देश्य यह था कि परमेश्वर की दया से रक्षा पाने की निश्चित आशा में अपने आप को उत्साहित करे; परन्तु साथ ही वह यह भी दिखाता है कि छुटकारा पाने पर वह उसके लिए परमेश्वर का कृतज्ञ रहेगा और उसे स्मरण रखेगा। और क्योंकि कपटी लोग परमेश्वर का धन्यवाद करते समय उसके नाम को अपवित्र करने के सिवा और कुछ नहीं करते, इसलिए कि वे स्वयं अपवित्र और अशुद्ध हैं, अतः वह परमेश्वर के भय में आने का निश्चय करता है, ताकि सच्चे और खरे हृदय से उसकी आराधना करे। फिर, इससे हम यह सामान्य सत्य निकाल सकते हैं कि केवल परमेश्वर की भलाई ही के द्वारा हमें उसके पास पहुँच मिलती है; और कोई मनुष्य ठीक रीति से प्रार्थना नहीं करता, सिवाय उसके जो उसके अनुग्रह का अनुभव करके विश्वास करता है और पूर्ण रूप से निश्चय रखता है कि वह उस पर दयालु होगा। साथ ही परमेश्वर का भय भी जोड़ा गया है, ताकि सच्चे और भक्तिपूर्ण भरोसे को शरीर के व्यर्थ आत्मविश्वास से अलग पहचाना जा सके।

भजन 5:8-10

73 "Comme il est protecteur et defenseur des siens." — फ्रांसीसी. 74 "Pour la multitude." — फ्रांसीसी. "बहुतायत के कारण।"

8. हे यहोवा, मेरे शत्रुओं के कारण अपनी धार्मिकता में मेरी अगुवाई कर; अपने मार्ग को मेरे सामने सीधा कर। 9. क्योंकि उनके मुँह में कोई सच्चाई नहीं; उनका भीतरी भाग निरी दुष्टता है; उनका गला खुली हुई कब्र है; वे अपनी जीभ से छल करते हैं। 10. हे परमेश्वर, उन्हें भटका दे; वे अपनी ही युक्तियों से गिर जाएँ; उनके अपराधों की बहुतायत में उन्हें नष्ट कर दे; क्योंकि उन्होंने तेरे विरुद्ध बलवा किया है।

8. हे यहोवा, मेरी अगुवाई कर, इत्यादि। कुछ लोग इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: मुझे दिखा कि क्या उचित है, और मुझे उस धार्मिकता के आचरण में पूर्ण रूप से समर्पित कर दे जो तेरे स्वभाव की शोभा है; और यह मेरे शत्रुओं के कारण कर; क्योंकि पवित्र लोग, अभक्तों के दुष्ट आचरण और छलपूर्ण युक्तियों से प्रेरित होकर, सीधे मार्ग से भटक जाने के संकट में रहते हैं। यह अर्थ निःसन्देह भक्तिपूर्ण और उपयोगी है। परन्तु दूसरी व्याख्या अधिक उपयुक्त है, जो इन शब्दों को इस प्रार्थना के रूप में देखती है कि परमेश्वर अपने दास को उसके शत्रुओं के फन्दों के बीच से सुरक्षित ले चले, और उसके लिए बच निकलने का मार्ग खोल दे, उस समय भी जब वह देखने में पकड़ा गया और चारों ओर से घिरा हुआ था। अतः इस स्थल में, जैसे और बहुत-से स्थलों में, परमेश्वर की धार्मिकता को उसकी उस विश्वासयोग्यता और दया के अर्थ में समझना चाहिए जो वह अपने लोगों की रक्षा और संरक्षण करने में दिखाता है। परिणामस्वरूप, अपनी धार्मिकता में का अर्थ वही है जो अपनी धार्मिकता के कारण या अपनी धार्मिकता के अनुसार का है। दाऊद, परमेश्वर को अपने मार्ग का अगुवा पाने की अभिलाषा करते हुए, अपनी विनती पूरी होने की आशा में अपने आप को उत्साहित करता है, क्योंकि परमेश्वर धर्मी है; मानो वह कहता हो, हे प्रभु, क्योंकि तू धर्मी है, अपनी सहायता से मेरी रक्षा कर, ताकि मैं अपने शत्रुओं के दुष्ट षड्यन्त्रों से बच निकलूँ। पद के अन्तिम वाक्यांश का भी यही आशय है, जहाँ वह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर का मार्ग उसके सामने सीधा किया जाए; दूसरे शब्दों में, कि वह परमेश्वर की सामर्थ्य से उन संकटों से छुड़ाया जाए जिनसे वह ऐसा पूरी तरह घिरा था कि शरीर के विचार के अनुसार उसे बच निकलने का कोई मार्ग मिलने की आशा ही न थी। और इस प्रकार वह स्वीकार करता है कि उसके लिए अपने शत्रुओं के फन्दों में उलझने से बचना कितना असम्भव था, जब तक कि परमेश्वर उसे बुद्धि न दे और उसके लिए वहाँ मार्ग न खोले जहाँ कोई मार्ग नहीं। उसके उदाहरण के अनुसार हमें भी यही करना उचित है; ताकि जब हमारी युक्ति विफल हो जाए और हमारे शत्रुओं का द्वेष और दुष्टता प्रबल हो, तब हम अपने आप पर भरोसा न रखकर शीघ्र परमेश्वर की शरण लें, जिसके हाथों में मृत्यु से बचने के उपाय हैं, जैसा कि हम आगे देखेंगे (भजन 69:1)।

75 "Par ainsi il confesse n'avoir ne dexterite ne force, ne mesme aucun moyen pour eviter les embusches des ennemis." — फ्रांसीसी. "इस प्रकार वह स्वीकार करता है कि उसके पास न कौशल है न शक्ति, और न कोई भी ऐसा उपाय जिससे वह अपने शत्रुओं के फन्दों से बच सके।" 76 "Gouffres qui devorent tout." — फ्रांसीसी. "सब कुछ निगल जानेवाले गड्ढे।"

9. क्योंकि उनके मुँह में कोई सच्चाई नहीं। वह अब भी वही शिकायतें दोहराता है जो उसने पहले की थीं, ताकि इसके द्वारा अपने शत्रुओं को परमेश्वर की दृष्टि में और भी घृणित ठहराए, और अपने पक्ष में परमेश्वर की उस दया को जगाए जिसने अन्याय से सताए हुओं की सहायता करने की प्रतिज्ञा की है। और इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि हमारे शत्रु जितनी अधिक क्रूरता हमारे विरुद्ध प्रकट करें, या जितनी अधिक दुष्टता से हमें सताएँ, उतने ही अधिक भरोसे के साथ हमें अपनी कराहें स्वर्ग की ओर भेजनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर उनके क्रोध को चरम सीमा तक बढ़ने न देगा, वरन् उनके द्वेष और दुष्ट युक्तियों को प्रकाश में ले आएगा। पहले तो वह उन पर विश्वासघात का दोष लगाता है, क्योंकि वे कुछ भी खराई या सच्चाई से नहीं बोलते; और इसका कारण वह यह बताता है कि भीतर से वे अधर्म से भरे हुए हैं। इसके बाद वह उनकी तुलना कब्रों से करता है, उनका गला खुली हुई कब्र है; मानो वह कहता हो, वे सब कुछ निगल जानेवाले गड्ढे हैं; और इससे उसका अभिप्राय उनकी रक्त बहाने की अतृप्त लालसा से है। पद के अन्त में वह फिर उनके छल की चर्चा करता है। इन सब बातों से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जिन अन्यायों से उसकी परीक्षा हुई वे साधारण प्रकार के न थे, वरन् उसे अत्यन्त दुष्ट शत्रुओं से संघर्ष करना पड़ा, जिनमें न मानवता थी न संयम। इतनी दयनीय रीति से सताए जाने पर भी वह न केवल प्रार्थना में लगा रहता है, वरन् अपनी बाहरी दशा की उलझन और प्रत्यक्ष निराशा से भी आशा का आधार पा लेता है।

जब पौलुस (रोमियों 3:13) इस स्थल को उद्धृत करते हुए इसे सारी मानवजाति पर, यहूदियों और अन्यजातियों दोनों पर, लागू करता है, तो वह इसे उससे अधिक व्यापक अर्थ नहीं देता जितना पवित्र आत्मा देना चाहता था। क्योंकि वह इसे एक निर्विवाद बात मानकर चलता है कि यहाँ दाऊद के व्यक्तित्व के अन्तर्गत हमारे सामने कलीसिया का वर्णन किया गया है, मसीह के व्यक्तित्व में भी, जो सिर है, और उसके अंगों में भी; अतः इससे यह निकलता है कि वे सब उसके शत्रुओं की गिनती में गिने जाने चाहिए जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नया जन्म नहीं पाए हैं, चाहे वे दृश्य कलीसिया की सीमा के बाहर हों या उसके भीतर। क्योंकि दाऊद इस स्थल में न तो अश्शूरियों को और न मिस्रियों को परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने बुलाता है, वरन् उन भ्रष्ट यहूदियों को, जो शरीर में खतना पाकर अब्राहम के पवित्र वंश से उत्पन्न होने पर घमण्ड करते थे। अतः पौलुस इन शब्दों को सारी मानवजाति पर लागू करते समय उनके वास्तविक अर्थ को तोड़ता-मरोड़ता नहीं, वरन् सच्चाई के साथ यह कहता है कि दाऊद ने इनमें यह दिखाया कि स्वभाव से सम्पूर्ण मानव-परिवार का चरित्र कैसा है।

10. उन्हें भटका दे। क्योंकि इब्रानी शब्द אשם asam का अर्थ काट डालना या नष्ट करना भी है और पाप करना भी, और लाक्षणिक रूप में भटकना या धोखा खाना भी लिया जाता है, इसलिए इनमें से कोई भी अर्थ इस स्थल के लिए उपयुक्त है; परन्तु क्योंकि दाऊद इसके तुरन्त बाद जोड़ता है, वे अपनी युक्तियों से गिर जाएँ, इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह पहली प्रार्थना दूसरी से सम्बन्धित और उसी के समान है। अतः मैं इन दोनों वाक्यांशों को कारण और परिणाम के रूप में एक साथ जोड़ता हूँ। पहले में वह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर उनकी समझ छीन ले और उन्हें भूल में धकेल दे; और दूसरे में वह प्रार्थना करता है कि इसके परिणामस्वरूप उनकी युक्तियाँ निष्फल हो जाएँ, दूसरे शब्दों में, कि उनके उद्यम असफल सिद्ध हों। क्योंकि अभक्त लोग व्यर्थ युक्ति क्यों करते हैं, और बिना सोच-विचार या विवेक के इधर-उधर क्यों बहाए जाते हैं, और इतने नीचतापूर्वक हठीले क्यों हो जाते हैं, यदि इसलिए नहीं कि प्रभु उन्हें उन्हीं की चतुराई में अचानक पकड़ लेता है, उनकी धूर्त योजनाओं को तोड़ देता है, और उन्हें उन्माद और चक्कर की आत्मा से ऐसा मतवाला कर देता है कि वे छोटी से छोटी बातों में भी मूर्खता से काम करते हैं? अतः यदि हम मनुष्यों के फन्दों और छल से डरते हों, और यदि हम पाएँ कि जो हमें हानि पहुँचाना चाहते हैं वे स्पष्ट बुद्धिवाले और तीक्ष्ण मति के लोग हैं, तो आइए, हम स्मरण रखें कि अधर्म करने में बुद्धिमानों को मूढ़ता और पागलपन से मारना परमेश्वर का निरन्तर कार्य है। इस प्रकार ऐसा होगा कि यद्यपि हम सोए हुए हों, तौभी प्रभु अपने मुँह की फूँक से उनकी युक्तियों को, चाहे वे कितनी ही सूक्ष्म क्यों न हों, तितर-बितर कर देगा, और अन्त में उन्हें सारे संसार के उपहास का पात्र बना देगा। संक्षेप में, दाऊद चाहता है कि परमेश्वर अपने शत्रुओं पर हाथ डाले और उनकी दुष्ट मन्त्रणाओं को रोक दे। और वास्तव में यह आवश्यक है कि परमेश्वर उन योजनाओं को निष्फल कर दे जिन्हें दुष्ट लोग चतुराई से गढ़ते हैं, क्योंकि शैतान, जो सब छलों का गढ़नेवाला है, वही उन्हें हानि पहुँचाने की सब विधियाँ सुझाता है। वे अपनी युक्तियों से गिर जाएँ—यह प्रार्थना करके उसका अभिप्राय यह है कि जो कुछ उन्होंने ठान लिया था उसे वे प्राप्त या पूरा न कर पाएँ। फिर, वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार दण्ड दे, क्योंकि एक निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध अन्याय और दुष्टता से युद्ध करके उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध बलवा किया। घमण्डी लोग सचमुच इस बात का कभी विचार नहीं करते कि जिन दीनों को वे सताते और तुच्छ जानते हैं, वे परमेश्वर की दृष्टि में इतने मूल्यवान हैं कि वह उनके व्यक्तित्व में अपना अपमान और अपनी हानि अनुभव करता है; क्योंकि वे यह कल्पना नहीं करते कि उन पर किए गए प्रहार स्वर्ग के विरुद्ध किए जाते हैं, वरन् ऐसा समझते हैं मानो उन्होंने थोड़ी-सी धूल या मिट्टी को अपने पैरों तले रौंद दिया हो। परन्तु परमेश्वर अपने दासों को यह अमूल्य प्रतिफल देता है कि वह उनके मुकद्दमे को अपने हाथ में ले लेता है। अतः जिस किसी का विवेक उसे निर्दोष ठहराता है, और जो अपनी खराई से नहीं हटता, यद्यपि वह अन्याय से सताया जाए, उसके पास इस बात पर सन्देह करने का कोई कारण नहीं कि उसे अपने शत्रुओं के विरुद्ध परमेश्वर को ढाल के रूप में काम में लाने का अधिकार है।

भजन 5:11-12

77 "C'est a dire, ne vienent a bout de leurs enterprises." — फ्रांसीसी. 78 पुराने लातीनी संस्करणों में, और फ्रांसीसी संस्करण में, आनन्द करने और प्रफुल्लित होने की क्रियाएँ हाशिये पर भविष्यत् काल में दी गई हैं, इस प्रकार:— "और जितने तुझ पर भरोसा रखते हैं वे सब आनन्द करेंगे; हाँ, वे सर्वदा आनन्द करेंगे; और तू उन्हें ढाँप ले, और जो तेरे नाम से प्रेम रखते हैं वे तुझ में प्रफुल्लित होंगे।"

11. और जितने तुझ पर भरोसा रखते हैं वे सब आनन्द करें, हाँ, वे सर्वदा आनन्द करते रहें; और तू उन्हें ढाँप ले, और जो तेरे नाम से प्रेम रखते हैं वे तुझ में प्रफुल्लित हों। 12. क्योंकि हे यहोवा, तू धर्मी को आशीष देगा; तू उन्हें अपनी करुणा से मानो ढाल से घेरे रहेगा।

11. और सब आनन्द करें, इत्यादि। अर्थ की दृष्टि से इसमें बहुत कम अन्तर पड़ता है कि हम इन शब्दों को भविष्यत् काल में पढ़ें, सब आनन्द करेंगे, इत्यादि, या इच्छार्थक रूप में, सब आनन्द करें, इत्यादि; क्योंकि दोनों रीतियों से भविष्यद्वक्ता का अर्थ एक ही रहेगा; अर्थात् यह कि यदि परमेश्वर उसे छुड़ाए, तो इस छुटकारे का फल सब भक्तों का साझा होगा; मानो वह कहता हो, हे प्रभु, यदि तू मेरी सहायता करे, तो जो भलाई तू मुझ पर करेगा वह केवल मुझ पर ही न ठहरेगी, वरन् तेरे सब दासों तक पहुँचेगी; क्योंकि इससे उनका विश्वास और भी दृढ़ होगा, और वे तेरे नाम की और भी अधिक स्तुति करेंगे। अतः परमेश्वर को अपना छुटकारा देने के लिए प्रेरित करने हेतु वह उस अन्त या परिणाम को तर्क के रूप में प्रस्तुत करता है जो उससे उत्पन्न होगा, क्योंकि वह सब भक्तों को परमेश्वर पर अधिक भरोसा रखने के लिए उभारेगा, और उन्हें उसकी स्तुति और धन्यवाद करने के लिए उत्साहित करेगा। यह स्थल हमें सिखाता है कि यदि परमेश्वर हमारे पड़ोसियों पर जो भी आशीषें देता है उनसे हम उत्साह और सान्त्वना नहीं लेते, तो हम परमेश्वर के प्रति कृतघ्न हैं, क्योंकि इनके द्वारा वह यह गवाही देता है कि वह सब भक्तों पर समान रूप से अपनी भलाई करने के लिए सदा तैयार रहेगा। तदनुसार इस आनन्द का कारण भी जोड़ा गया है, क्योंकि प्रभु उन्हें ढाँपेगा या उनकी रक्षा करेगा। जब-जब परमेश्वर किसी विश्वासयोग्य जन पर कोई आशीष देता है, तब-तब शेष लोगों को, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वह उनके प्रति भी अपने आप को उपकारी प्रकट करेगा। फिर, यह स्थल हमें सिखाता है कि सच्चा आनन्द परमेश्वर की रक्षा के सिवा और किसी स्रोत से नहीं निकलता। हम हजार मृत्युओं के सामने खुले हो सकते हैं, परन्तु यह एक ही विचार हमारे लिए भरपूर पर्याप्त होना चाहिए कि हम परमेश्वर के हाथ से ढाँपे और बचाए हुए हैं। और ऐसा ही होगा, यदि इस संसार की व्यर्थ छायाएँ हमें ऐसा बहका न लें कि हम उनके नीचे शरण लेने को उकसाए जाएँ। हमें इस कथन पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए कि जो प्रभु पर भरोसा रखते हैं वे उसके नाम से प्रेम रखते हैं। जब परमेश्वर हमें अपनी भलाई का स्वाद चखा देता है, तब उसका स्मरण हमें मधुर लगना चाहिए, और हमारे हृदयों को आनन्द से भर देना चाहिए, वरन् हमें उसके प्रेम से मुग्ध कर देना चाहिए; जैसे, दूसरी ओर, सब अविश्वासी चाहते हैं कि परमेश्वर का नाम दफ़न हो जाए, और वे भय के साथ उसके स्मरण से भागते हैं।

12. क्योंकि हे यहोवा, तू धर्मी को आशीष देगा। भजनकार यहाँ पिछले पद के अन्तिम वाक्य की पुष्टि करता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर के सब दास समान रूप से उस बात से अपने विश्वास के लिए सहारा पाएँगे जिसका उसने अनुभव किया था; क्योंकि वह चाहता है कि हम एक उदाहरण से सब भक्तों के प्रति परमेश्वर के अनुग्रह की अपरिवर्तनशीलता और स्थायित्व के विषय में अपना निर्णय बनाएँ। फिर, इसके द्वारा वह हमें सिखाता है कि कोई सच्चा और उचित आनन्द नहीं, सिवाय उसके जो परमेश्वर के पितृवत् प्रेम के बोध से उत्पन्न होता है। इब्रानी में आशीष देना शब्द का अर्थ, (जब हम इसे मनुष्यों के कार्य के रूप में कहते हैं,) किसी के लिए सुख और समृद्धि की कामना करना और उसके लिए प्रार्थना करना है; परन्तु जब इसे परमेश्वर के कार्य के रूप में कहा जाता है, तो इसका अर्थ वही है जो किसी मनुष्य को समृद्ध करना, या उसे सब अच्छी वस्तुओं से भरपूर धनी बनाना है; क्योंकि परमेश्वर की कृपा प्रभावशाली होने के कारण, उसकी आशीष अपने आप ही हर अच्छी वस्तु की बहुतायत उत्पन्न करती है। धर्मी नाम किसी एक मनुष्य तक सीमित नहीं, वरन् सामान्य रूप से परमेश्वर के सब दासों का बोधक है। तौभी, जो पवित्रशास्त्र में धर्मी कहलाते हैं, वे अपने कामों की योग्यता के कारण ऐसे नहीं कहलाते, वरन् इसलिए कि वे धार्मिकता की अभिलाषा रखते हैं; क्योंकि जब परमेश्वर उनके पापों को उनके लेखे में न गिनकर उन्हें अपनी कृपा में ग्रहण कर लेता है, तब वह उनके खरे प्रयत्नों को सिद्ध धार्मिकता के रूप में स्वीकार करता है। इसके बाद जो आता है उसका आशय पिछले वाक्यांश के ही समान है, तू उन्हें अपनी सेंतमेंत कृपा, या सद्भावना, से मानो ढाल से मुकुटित करेगा। भजनकार का अर्थ यह है कि विश्वासयोग्य लोग चारों ओर से पूर्ण रूप से सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि वह किसी भी दशा में उनसे अपना अनुग्रह न रोकेगा, जो उनके लिए एक अजेय गढ़ है, और अपने साथ निश्चित सुरक्षा लाता है। मुकुटित करना शब्द, जिसका भजनकार प्रयोग करता है, इब्रानी में प्रायः शोभा या महिमा का बोधक होता है; परन्तु क्योंकि इसके साथ ढाल की उपमा जोड़ी गई है, इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह इसे लाक्षणिक रूप में दृढ़ करने या चारों ओर से घेरने के अर्थ में प्रयोग करता है। अतः अर्थ यह है कि धर्मियों को घेरनेवाले संकट चाहे कितने ही बड़े और विविध क्यों न हों, तौभी वे बच निकलेंगे और उद्धार पाएँगे, क्योंकि परमेश्वर उन पर कृपालु है।

79 "Signifie, souhaitter bien et prosperite a quelquun et prier pour luy." — फ्रांसीसी.

80 बिशप हॉर्सली का विचार है कि כצנה katsinah, मानो ढाल से, का अन्वय רצונ ratson, कृपा या सद्भावना, के साथ होना चाहिए, और वे इन शब्दों का अनुवाद इस प्रकार करते हैं: "सद्भावना की ढाल के समान तू उसके चारों ओर पहरा देगा।" सेप्तुआजिंट का पाठ भी यही है: Ως ὁπλω εὐδοκιας, सद्भावना की ढाल के समान। צנה tsinah शब्द का अर्थ उस प्रकार की ढाल है जिसके बीच से एक बड़ा उभार निकला होता था, जिसके ऊपर एक कटार लगी होती थी, और जो प्राचीन युद्ध में बचाव और आक्रमण दोनों के हथियार के रूप में अत्यन्त उपयोगी थी।

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