भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 14

भजन 14

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भजन 14

भजन 14.

आरम्भ में भजनकार परमेश्वर के प्रति उस दुष्ट तिरस्कार का वर्णन करता है जिसमें लगभग सारी प्रजा फूट निकली थी। अपनी शिकायत को और भी अधिक वज़न देने के लिए वह स्वयं परमेश्वर को उसे कहते हुए प्रस्तुत करता है। इसके पश्चात् वह एक उपाय की आशा से स्वयं को और दूसरों को शान्ति देता है, जिसके विषय में उसे निश्चय है कि परमेश्वर उसे बहुत शीघ्र प्रदान करेगा; यद्यपि इस बीच वह उस अव्यवस्था को देखकर, जो उसकी आँखों के सामने है, कराहता है और गहरी व्यथा अनुभव करता है।

प्रधान बजानेवाले के लिये दाऊद का भजन।

भजन 14:1

1. मूर्ख ने अपने मन में कहा है, कोई परमेश्वर है ही नहीं; उन्होंने बिगाड़ दिया है, उन्होंने घिनौना काम किया है; कोई सुकर्मी नहीं।

बहुत-से यहूदियों का मत है कि इस भजन में उनकी जाति पर भविष्य में होनेवाले अत्याचार के विषय में एक भविष्यद्वाणी की गई है: मानो दाऊद ने पवित्र आत्मा के प्रकाशन के द्वारा अन्यजातियों के अत्याचार के अधीन परमेश्वर की कलीसिया की दुःखित दशा पर विलाप किया हो। इसलिए जो कुछ यहाँ कहा गया है उसे वे अपनी उस तितर-बितर दशा पर लागू करते हैं जिसमें हम आज उन्हें देखते हैं, मानो वे परमेश्वर का वह बहुमूल्य निज भाग हों जिसे वन-पशु फाड़ खाते हैं। परन्तु यह बहुत स्पष्ट है कि अपनी जाति के कलंक को ढाँपने की इच्छा में वे इब्राहीम की हठीली सन्तान के विषय में कही गई बात को, बिना किसी उचित आधार के, तोड़-मरोड़कर अन्यजातियों पर लागू करते हैं। [“Combien que cependant il gemisse et se sente angoisse du desordre qu'il veoit.” — फ्रांसीसी.]

कैल्विन ने यहाँ इब्रानी शब्दों का शाब्दिक अनुवाद दिया है, उन्होंने बिगाड़ दिया है। कुछ लोग मानते हैं कि यहाँ “अपने आप को” समझ लेना चाहिए, जैसा निर्गमन 32:7 में है; दूसरे लोग “अपनी चाल को” समझते हैं, जैसा उत्पत्ति 6:12 में है; परन्तु कैल्विन ने इस वाक्यांश का जो अर्थ लगाया है वह यह है, उन्होंने सारी उत्तम व्यवस्था को बिगाड़ दिया है अथवा उलट दिया है।

निश्चय ही हमें प्रेरित पौलुस से अधिक योग्य व्याख्याकार नहीं मिल सकता, और वह इस भजन को स्पष्ट रूप से उन लोगों पर लागू करता है जो व्यवस्था के अधीन जीते थे (रोमियों 3:19)। इसके अतिरिक्त, यदि हमारे पास इस प्रेरित की गवाही न भी होती, तो भी भजन की बनावट बहुत स्पष्ट रूप से दिखाती है कि दाऊद का अभिप्राय विदेशी नहीं, वरन् घरेलू अत्याचारियों और विश्वासियों के घर के भीतर के शत्रुओं से है; और यह ऐसी बात है जिसे समझना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। हम जानते हैं कि यह एक ऐसी परीक्षा है जो हमें अत्यधिक पीड़ा देती है, जब हम कलीसिया के बीच दुष्टता को फूट निकलते और प्रबल होते देखते हैं, भले और सीधे-सादे लोगों को अन्याय से सताए जाते देखते हैं, जबकि दुष्ट अपनी इच्छा के अनुसार क्रूरता से प्रभुता करते हैं। यह दुःखद दृश्य हमें लगभग पूर्णतः हताश कर देता है; और इसलिए हमें उस उदाहरण से दृढ़ किए जाने की बड़ी आवश्यकता है जो दाऊद यहाँ हमारे सामने रखता है: ताकि कलीसिया में जो बड़े से बड़े उजाड़ हम देखते हैं उनके बीच भी हम इस निश्चय से अपने आप को शान्ति दें कि परमेश्वर अन्त में उसे उनसे छुड़ाएगा। मुझे कोई सन्देह नहीं कि यहाँ यहूदिया की उस अव्यवस्थित और उजड़ी हुई दशा का वर्णन है जिसे शाऊल ने तब उत्पन्न किया जब वह खुलेआम क्रोध से भड़कने लगा। तब, मानो मनुष्यों के मन से परमेश्वर का स्मरण बुझ गया हो, सारी भक्ति लुप्त हो गई थी; और मनुष्यों के बीच खराई अथवा सीधाई की बात करें, तो वह भी उतनी ही कम थी जितनी भक्ति।

मूर्ख ने कहा है। क्योंकि इब्रानी शब्द נבל nabal का अर्थ केवल मूर्ख ही नहीं, वरन् हठीला, नीच और तुच्छ व्यक्ति भी है, इसलिए इस स्थान पर उसका ऐसा अनुवाद करना अनुचित न होता; तौभी मैं अधिक सामान्य रूप से स्वीकृत व्याख्या का अनुसरण करने से सन्तुष्ट हूँ, अर्थात् यह कि सब अपवित्र लोग, जिन्होंने परमेश्वर का सारा भय उतार फेंका है और अपने आप को अधर्म के हवाले कर दिया है, पागलपन के दोषी ठहराए जाते हैं। दाऊद अपने शत्रुओं पर साधारण मूर्खता का दोष नहीं लगाता, वरन् उन लोगों की मूर्खता और पागलपन-भरे दुस्साहस के विरुद्ध कड़े वचन कहता है जिन्हें संसार अपनी बुद्धि के कारण प्रतिष्ठित मानता है। हम प्रायः देखते हैं कि जो लोग अपनी और दूसरों की दृष्टि में चतुराई और बुद्धि में बहुत बढ़े-चढ़े हैं, वे अपनी धूर्तता को फन्दे बिछाने में लगाते हैं, और अपने मन की कुशलता को परमेश्वर का तिरस्कार और उपहास करने में प्रयुक्त करते हैं। इसलिए हमारे लिए पहले यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि संसार इन धूर्त और ठट्ठा करनेवाले लोगों की, जो अपने आप को किसी भी सीमा तक दुष्टता में लिप्त होने की छूट देते हैं, चाहे कितनी ही प्रशंसा क्यों न करे, फिर भी पवित्र आत्मा उन्हें मूर्ख ठहराता है; क्योंकि परमेश्वर को भूल जाने से बढ़कर पशुतुल्य कोई मूढ़ता नहीं। तौभी हमें साथ ही उस प्रमाण पर ध्यानपूर्वक दृष्टि करनी चाहिए जिसके आधार पर भजनकार इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि उन्होंने धर्म की सारी चेतना उतार फेंकी है, और वह यह है: कि उन्होंने सारी व्यवस्था को उलट दिया है, यहाँ तक कि वे अब उचित और अनुचित में कोई भेद नहीं करते, और न उन्हें सच्चाई का कोई ध्यान है, न मनुष्यता का कोई प्रेम। इसलिए दाऊद दुष्टों के हृदय के छिपे हुए भाव की चर्चा उसी सीमा तक करता है जिस सीमा तक वे अपने बाहरी कार्यों के द्वारा स्वयं को प्रकट करते हैं। उसके कथन का आशय यह है: यह कैसे होता है कि ये लोग इतने ढीठपन और इतनी उच्छृंखलता से अपनी अभिलाषाओं में लिप्त रहते हैं कि धार्मिकता या न्याय का कोई ध्यान नहीं रखते; संक्षेप में, कि वे पागलों की नाईं हर प्रकार की दुष्टता में कूद पड़ते हैं—यदि इसका कारण यह नहीं कि उन्होंने धर्म की सारी चेतना झटक दी है, और जहाँ तक उनसे बन पड़ा, अपने मन से परमेश्वर का सारा स्मरण बुझा दिया है? जब लोग अपने हृदय में धर्म की कुछ भी चेतना बनाए रखते हैं, तो उनमें अवश्य कुछ न कुछ लज्जा होगी, और वे कुछ हद तक रोके जाएँगे और अपने विवेक की आज्ञाओं की पूर्ण अवहेलना करने से बचाए जाएँगे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब अधर्मी अपने आप को अपनी ही प्रवृत्तियों के पीछे इतनी हठ और इतने दुस्साहस के साथ, बिना किसी लज्जा के, चलने की छूट देते हैं, जैसा यहाँ उनके विषय में बताया गया है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने परमेश्वर का सारा भय उतार फेंका है। [“Ce qui est dit de ceux qui, fausses enseignes serenomment enfans d'Abraham vivans autrement qu'il n'appartient.” — फ्रांसीसी. “उन लोगों के विषय में जो कहा गया है जो झूठे चिह्नों के आधार पर अपने आप को इब्राहीम की सन्तान कहते हैं, जबकि वे उस जीवन से भिन्न जीवन जीते हैं जो उन्हें जीना चाहिए।”]

भजनकार कहता है कि वे अपने मन में कहते हैं। सम्भव है वे इस घृणित निन्दा को, कोई परमेश्वर है ही नहीं, अपने मुँह से न बोलें; परन्तु उनके जीवन की बेलगाम स्वेच्छाचारिता ऊँचे और स्पष्ट स्वर में घोषणा करती है कि अपने हृदयों में, जो सारी भक्ति से रिक्त हैं, वे अपने आप को बहलाते हुए यही गीत गाते रहते हैं। यह नहीं कि वे लम्बे-चौड़े तर्कों या, जैसा वे कहते हैं, विधिवत् न्याय-वाक्यों के द्वारा यह प्रतिपादित करते हैं कि कोई परमेश्वर नहीं है (क्योंकि उन्हें और भी अधिक निरुत्तर करने के लिए परमेश्वर समय-समय पर सबसे दुष्ट मनुष्यों को भी विवेक की गुप्त वेदनाएँ अनुभव कराता है, ताकि वे उसके प्रताप और सर्वोच्च सामर्थ्य को स्वीकार करने पर विवश हों); परन्तु परमेश्वर उनमें जो कुछ सही ज्ञान डालता है, उसे वे कुछ तो उसके प्रति अपने द्वेष से दबा देते हैं और कुछ बिगाड़ देते हैं, यहाँ तक कि उनमें धर्म सुन्न और अन्त में मृत हो जाता है। सम्भव है वे स्पष्ट रूप से परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार न करें, परन्तु वे कल्पना करते हैं कि वह स्वर्ग में बन्द है, और अपनी धार्मिकता और सामर्थ्य से वंचित है; और यह परमेश्वर के स्थान पर एक मूरत गढ़ लेना ही है। मानो वह समय कभी आएगा ही नहीं जब उन्हें न्याय के लिए उसके सामने उपस्थित होना पड़ेगा, वे अपने जीवन के सब व्यवहारों और कार्यों में उसे यथासम्भव दूर हटाने, और अपने मन से उसके प्रताप की सारी आशंका मिटा डालने का प्रयत्न करते हैं। और जब परमेश्वर को उसके सिंहासन से घसीटकर उतार दिया जाता है, और न्यायी के रूप में उसकी पदवी उससे छीन ली जाती है, तब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है; और इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि दाऊद ने निश्चय ही सत्य के अनुसार कहा है जब उसने यह घोषणा की कि जो लोग दण्ड से बच निकलने की चापलूसी-भरी आशा में अपने आप को हर प्रकार की दुष्टता करने की छूट देते हैं, वे अपने मन में इस बात का इनकार करते हैं कि कोई परमेश्वर है। क्योंकि तिरपनवाँ भजन, उसमें बदले गए थोड़े-से शब्दों को छोड़कर, इसी भजन की पुनरावृत्ति मात्र है, इसलिए जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, मैं उचित स्थानों पर उन दोनों भजनों के बीच का अन्तर दिखाऊँगा। दाऊद यहाँ शिकायत करता है कि उन्होंने घिनौना काम किया है; परन्तु वहाँ “काम” शब्द के स्थान पर “अधर्म” शब्द का प्रयोग हुआ है। ध्यान देना चाहिए कि दाऊद एक या दो कामों की चर्चा नहीं करता; वरन् जैसे उसने कहा था कि उन्होंने सारी उचित व्यवस्था को उलट दिया अथवा बिगाड़ दिया है, वैसे ही अब वह यह जोड़ता है कि उन्होंने अपने सारे जीवन को इतना अशुद्ध कर दिया है कि वह घिनौना बन गया है; और इसका जो प्रमाण वह प्रस्तुत करता है वह यह है कि वे एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में सीधाई का कोई ध्यान नहीं रखते, वरन् अपने संगी प्राणियों के प्रति सारी मनुष्यता और सारी भलाई को भूल गए हैं। [कुछ समीक्षक यह टिप्पणी करते हैं कि क्योंकि यहाँ प्रयुक्त शब्द יהוה Yehovah नहीं है—वह नाम जो परमेश्वर के अनन्त, स्वयंभू सत्त्व को सूचित करता है—वरन् אלוהס है, एक ऐसा नाम जिसे वे जगत के न्यायी और शासक के रूप में परमेश्वर से सम्बन्धित मानते हैं, इसलिए पहले पद का अर्थ यह नहीं कि मूर्ख परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार करता है, वरन् केवल उसके विधान और जगत पर उसके शासन का; कि वह अपने आप को यह विश्वास दिला लेता है कि परमेश्वर को मनुष्यों के कार्यों की कोई चिन्ता नहीं, और आनेवाला कोई न्याय नहीं होगा; और इसलिए वह दण्ड से बच निकलने की आशा में पाप में बढ़ता चला जाता है। — देखिए Poole's Synopsis Criticorum. तर्गूम “कोई परमेश्वर नहीं” शब्दों की व्याख्या इस प्रकार करता है, “पृथ्वी पर परमेश्वर का कोई אלוהס शासन नहीं।”]

भजन 14:2-3

2. यहोवा ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की, कि देखे कि कोई बुद्धिमान, कोई परमेश्वर का खोजी है या नहीं। 3. वे सब के सब भटक गए हैं, वे सब मिलकर सड़ गए हैं [अथवा गल गए हैं]; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं।

2. यहोवा ने स्वर्ग में से दृष्टि की। यहाँ स्वयं परमेश्वर को मनुष्य की भ्रष्टता के विषय पर बोलते हुए प्रस्तुत किया गया है, और इससे दाऊद का कथन उसकी अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली हो जाता है जितना वह होता यदि वह यह निर्णय अपने ही व्यक्तित्व में सुनाता। जब परमेश्वर हमारे सामने अपने सिंहासन पर मनुष्यों के आचरण की जाँच करने के लिए बैठा हुआ दिखाया जाता है, तब, जब तक हम असाधारण रूप से जड़ न हो गए हों, उसका प्रताप हमें भय से भर देगा। पाप करने की आदत का परिणाम यह होता है कि मनुष्य अपने पापों में कठोर हो जाते हैं, और कुछ भी नहीं पहचानते, मानो वे घोर अन्धकार में लिपटे हों। इसलिए दाऊद उन्हें यह सिखाने के लिए कि जब संसार में दुष्टता बिना दण्ड के राज्य करती है, तब इस प्रकार अपनी चापलूसी करने और अपने आप को धोखा देने से उन्हें कुछ लाभ नहीं, यह गवाही देता है कि परमेश्वर स्वर्ग से नीचे दृष्टि करता है, और मनुष्यों के बीच जो कुछ होता है उसे जानने के उद्देश्य से चारों ओर अपनी आँखें दौड़ाता है। यह सत्य है कि परमेश्वर को पूछताछ या खोज करने की कोई आवश्यकता नहीं; परन्तु जब वह अपनी तुलना किसी पार्थिव न्यायी से करता है, तो यह हमारी सीमित समझ के अनुरूप होने के लिए है, और इसलिए कि हम धीरे-धीरे उसके गुप्त विधान की कुछ धारणा बना सकें, जिसे हमारी बुद्धि एक साथ नहीं समझ सकती। काश, बोलने की यह रीति हमें यह सिखाने का प्रभाव रखती कि हम अपने आप को उसके न्यायासन के सामने बुलाएँ; और जबकि संसार अपनी चापलूसी कर रहा है, और निकम्मे ठहराए हुए लोग अपनी विचारहीनता, कपट अथवा निर्लज्जता के द्वारा अपने पापों को विस्मृति में गाड़ देने का प्रयत्न कर रहे हैं, और अपनी हठ में मानो मतवाले होकर अन्धे हो गए हैं, तब हम इस सत्य पर विचार करके सारी उदासीनता और जड़ता को झटक देने के लिए प्रेरित हों, कि इतने पर भी परमेश्वर स्वर्ग में अपने ऊँचे सिंहासन पर से नीचे दृष्टि करता है, और जो कुछ यहाँ नीचे हो रहा है उसे देखता है! [“Et abolir de leurs esprits toute apprehension de sa majeste.” — फ्रांसीसी.]

कि देखे कि कोई बुद्धिमान है या नहीं। क्योंकि भले और धर्मी जीवन की सारी व्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि हम समझ के प्रकाश के द्वारा शासित और संचालित हों, इसलिए दाऊद ने भजन के आरम्भ में उचित ही हमें यह सिखाया है कि मूर्खता सारी दुष्टता की जड़ है। और इस वाक्यांश में भी वह बहुत उचित रूप से यह घोषणा करता है कि जीवन की खराई और सीधाई का आरम्भ एक प्रकाशित और स्वस्थ मन में निहित है। परन्तु क्योंकि अधिकांश लोग अपनी बौद्धिक शक्तियों का दुरुपयोग छलपूर्ण उद्देश्यों के लिए करते हैं, इसलिए दाऊद तुरन्त इसके पश्चात् एक ही शब्द में बताता है कि सच्ची समझ क्या है, अर्थात् यह कि वह परमेश्वर को खोजने में निहित है; जिससे उसका अभिप्राय यह है कि जब तक मनुष्य अपने आप को पूर्ण रूप से परमेश्वर को समर्पित न करें, उनका जीवन ठीक प्रकार से व्यवस्थित नहीं हो सकता। कुछ लोग משכיל maskil शब्द को, जिसका अनुवाद हमने “बुद्धिमान” (समझनेवाला) किया है, बहुत संकुचित अर्थ में लेते हैं; जबकि दाऊद यह घोषणा करता है कि निकम्मे ठहराए हुए लोग सारी विवेक-शक्ति और सारे न्याय-बोध से पूर्णतः रिक्त हैं।

वे सब के सब भटक गए हैं। कुछ लोग यहाँ प्रयुक्त סר sar शब्द का अनुवाद “दुर्गन्ध देना” करते हैं, मानो पाठ यह हो, उनमें से हर एक दुर्गन्ध छोड़ता है, ताकि यह अर्थ में अगले वाक्यांश की क्रिया से मेल खाए, जिसका इब्रानी में अर्थ सड़ जाना अथवा गल जाना है। परन्तु दोनों शब्दों की एक ही प्रकार से व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं, मानो एक ही बात दो बार दोहराई गई हो। अधिक उपयुक्त व्याख्या वह है जो यह मानती है कि यहाँ मनुष्य एक घृणित विद्रोह के दोषी ठहराए गए हैं, क्योंकि वे परमेश्वर से विमुख हो गए हैं, अथवा उससे दूर चले गए हैं; और इसके पश्चात् उनके सारे जीवन की घिनौनी भ्रष्टता अथवा सड़ाहट की ओर संकेत किया गया है, मानो धर्मत्यागियों से ऐसी किसी वस्तु के अतिरिक्त और कुछ नहीं निकल सकता जिसमें सड़ाहट और संक्रमण की तीखी गन्ध हो। इब्रानी शब्द סר sar लगभग सर्वत्र इसी अर्थ में लिया जाता है। तिरपनवें भजन में סג sag शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ यही है। संक्षेप में, दाऊद यह घोषणा करता है कि सब मनुष्य अपनी मनमौजी अभिलाषाओं के द्वारा इस प्रकार बहा ले जाए गए हैं कि उनके सारे जीवन में न पवित्रता पाई जाती है न खराई। इसलिए यह ऐसा पूर्ण पतन है जो सारी भक्ति को बुझा देता है। इसके अतिरिक्त, दाऊद यहाँ प्रजा के केवल एक भाग की निन्दा नहीं करता, वरन् घोषणा करता है कि वे सब समान रूप से एक ही दण्डाज्ञा में सम्मिलित हैं। निश्चय ही यह घृणा उत्पन्न करने के योग्य एक अद्भुत अनर्थ था, कि इब्राहीम की सारी सन्तान, जिसे परमेश्वर ने अपनी निज प्रजा होने के लिए चुना था, छोटे से बड़े तक इतनी भ्रष्ट हो गई थी।

हैमंड स्वीकार करता है कि סר sar शब्द का अर्थ एक ओर हट जाना, अथवा मुड़ जाना है, और यह सामान्यतः किसी मार्ग या पथ के विषय में प्रयुक्त होता है, अर्थात् सही मार्ग से मुड़ जाना, अथवा गलत मार्ग पर चलना। परन्तु वह सोचता है कि यहाँ भाव भिन्न है, कि यह उस दाखमधु से लिया गया है जो फीका या खट्टा हो जाता है, ठीक जैसे होशे 4:18 में यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, סבאם סר sar sobim, “उनका पेय एक ओर हट गया है, अथवा खट्टा हो गया है।” वह इस मत की पुष्टि ठीक अगले वाक्यांश से मानता है, נאלחו ne-elachu, वे सड़ गए हैं, जो אלה alach से निकला है, जिसका अर्थ सड़ना या गल जाना है, और जो ठीक-ठीक उस मांस के विषय में प्रयुक्त होता है जो सड़ गया हो। वह कहता है, “इस प्रकार पेय और भोजन के बीच अनुपात भली-भाँति बना रहता है, एक फीका या खट्टा हो जाता है, जैसे दूसरा सड़ता और दुर्गन्ध देता है, और तब किसी काम का नहीं रहता, वरन् फेंक दिया जाता है।”

परन्तु यह पूछा जा सकता है कि दाऊद कोई अपवाद क्यों नहीं करता, वह यह घोषणा कैसे करता है कि कोई धर्मी नहीं बचा, एक भी नहीं, जबकि थोड़ी ही देर पश्चात् वह हमें बताता है कि दीन और दुःखी लोग परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं? फिर यह भी पूछा जा सकता है कि यदि सब के सब दुष्ट थे, तो वह इस्राएल कौन था जिसके भावी छुटकारे का गुणगान वह भजन के अन्त में करता है? वरन्, जब वह स्वयं उस प्रजा के समुदाय का एक अंग था, तो वह कम से कम अपने आप को अपवाद क्यों नहीं ठहराता? मैं उत्तर देता हूँ: वह यहाँ इस्राएली जाति के शारीरिक और पतित समुदाय के विरुद्ध कड़े वचन कहता है, और जो थोड़े-से लोग उस वंश को बनाते थे जिसे परमेश्वर ने अपने लिए अलग कर रखा था, वे उनमें सम्मिलित नहीं हैं। यही कारण है कि पौलुस रोमियों को लिखी अपनी पत्री 3:10 में इस कथन को सारी मनुष्यजाति पर लागू करता है। यह सत्य है कि दाऊद शाऊल के शासनकाल में बातों की अव्यवस्थित और उजड़ी हुई दशा पर विलाप करता है। तौभी साथ ही वह निःसन्देह परमेश्वर की सन्तान और उन सब के बीच तुलना करता है जो आत्मा के द्वारा नया जन्म नहीं पाए, वरन् अपने शरीर की प्रवृत्तियों के अनुसार बहा ले जाए जाते हैं। कुछ लोग भिन्न व्याख्या देते हैं, और यह प्रतिपादित करते हैं कि पौलुस ने दाऊद की गवाही उद्धृत करते हुए उसका यह अर्थ नहीं समझा कि मनुष्य स्वभाव से भ्रष्ट और बिगड़े हुए हैं; और यह कि जो सत्य दाऊद सिखाना चाहता था वह यह है कि प्रजा के शासक और अधिक प्रतिष्ठित लोग दुष्ट थे, और इसलिए संसार में अधर्म और दुष्टता को इतने व्यापक रूप से प्रबल होते देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। यह उत्तर सन्तोषजनक होने से बहुत दूर है। पौलुस वहाँ जिस विषय पर तर्क करता है वह यह नहीं कि अधिकांश मनुष्यों का चरित्र कैसा है, वरन् यह कि उन सब का चरित्र कैसा है जो अपने ही भ्रष्ट स्वभाव के द्वारा चलाए और शासित होते हैं। इसलिए ध्यान देना चाहिए कि जब दाऊद अपने आप को और भक्तों के छोटे-से बचे हुए भाग को एक ओर रखता है, और दूसरी ओर सामान्य रूप से प्रजा के समुदाय को रखता है, तो इसका निहितार्थ यह है कि परमेश्वर की उस सन्तान के बीच, जो उसके आत्मा के द्वारा नये सिरे से सृजी गई है, और आदम के सारे वंश के बीच, जिसमें भ्रष्टता और विकृति प्रभुता करती हैं, एक प्रकट अन्तर है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम सब जब जन्म लेते हैं, तो अपनी माता के गर्भ से यह मूर्खता और मलिनता, जो सारे जीवन में प्रकट होती है और जिसका दाऊद यहाँ वर्णन करता है, अपने साथ लाते हैं, और हम तब तक ऐसे ही बने रहते हैं जब तक परमेश्वर अपने रहस्यमय अनुग्रह के द्वारा हमें नई सृष्टि न बना दे।

दाऊद सारी मनुष्यजाति की बात करता है, केवल “परमेश्वर की प्रजा” और “धर्मियों की पीढ़ी” को छोड़कर, जिनकी चर्चा पद 4, 5 में हुई है, और जो शेष मानवजाति के विरोध में रखे गए हैं।

भजन 14:4

4. क्या सब अनर्थकारियों को कुछ भी ज्ञान नहीं, जो मेरे लोगों को ऐसे खा जाते हैं जैसे रोटी खाते हैं? वे यहोवा को नहीं पुकारते।

यह प्रश्न पिछली शिक्षा को और अधिक विस्तार से स्पष्ट करने के लिए जोड़ा गया है। भविष्यद्वक्ता ने कहा था कि परमेश्वर ने स्वर्ग से मनुष्यों के कामों को देखा, और उन सब को मार्ग से भटका हुआ पाया; और अब वह उसे विस्मय के साथ यह पुकारते हुए प्रस्तुत करता है, यह कैसा पागलपन है, कि जिन्हें मेरी प्रजा का पालन-पोषण करना चाहिए, और लगन से उनके प्रति हर प्रकार का भला व्यवहार करना चाहिए, वे मनुष्यता की किसी भावना के बिना वन-पशुओं की नाईं उन पर अत्याचार कर रहे और टूट पड़ रहे हैं? वह बोलने की यह रीति परमेश्वर से इसलिए नहीं जोड़ता कि कोई बात घट सकती है जो उसके लिए विचित्र या अप्रत्याशित हो, वरन् इसलिए कि उसका रोष और भी प्रबलता से व्यक्त हो। भविष्यद्वक्ता यशायाह भी इसी प्रकार (यशायाह 59:16), लगभग इसी विषय पर बात करते हुए, कहता है, “और परमेश्वर ने देखा कि कोई भी पुरुष नहीं, और इससे उसको अचम्भा हुआ कि कोई बिनती करनेवाला नहीं।” (यशायाह 59:16)

यह सच है कि परमेश्वर स्वयं अपने भीतर वास्तव में ऐसे मनोभावों का अनुभव नहीं करता, परन्तु वह अपने आप को उनसे युक्त करके प्रस्तुत करता है, ताकि हम अपने पापों के कारण अत्यन्त घृणा और भय से भर जाएँ, जब वह घोषित करता है कि वे ऐसे भयंकर स्वरूप के हैं कि उनके कारण वह मानो विचलित और व्याकुल हो उठता है। और यदि हम पत्थरों से भी अधिक कठोर न होते, तो संसार में फैली हुई दुष्टता के प्रति हमारी घृणा हमारे सिर के बाल खड़े कर देती, क्योंकि परमेश्वर स्वयं अपने व्यक्तित्व में हमें यह गवाही देता है कि वह उससे कितनी घृणा करता है। इसके अतिरिक्त, यह पद उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने आरम्भ में कही थी, कि दाऊद इस भजन में परदेशी अत्याचारियों या कलीसिया के खुले शत्रुओं के विषय में नहीं, वरन अपनी ही प्रजा के शासकों और प्रधानों के विषय में बोलता है, जो सामर्थ्य और प्रतिष्ठा से सम्पन्न थे। यह वर्णन उन मनुष्यों पर लागू नहीं होता जो परमेश्वर की प्रकट इच्छा से पूर्णतः अनजान थे; क्योंकि जिनके पास नैतिक व्यवस्था, अर्थात् जीवन का नियम, नहीं है, उन्हें हिंसा और अन्धेर के काम में लगे देखना कोई आश्चर्य की बात न होती। परन्तु जिन कार्यों की यहाँ निन्दा की गई है उनकी जघन्यता इस बात से कुछ कम नहीं बढ़ जाती कि स्वयं वे चरवाहे ही, जिनका पद झुण्ड को चराना और उसकी देखभाल करना है, उसे निर्दयता से निगल जाते हैं, और परमेश्वर की प्रजा और उसके निज भाग को भी नहीं छोड़ते। ऐसी ही एक शिकायत मीका 3:1-3 में है: "और मैं ने कहा, हे याकूब के प्रधानो, हे इस्राएल के घराने के न्यायियो, सुनो! क्या न्याय का जानना तुम्हारा काम नहीं? तुम तो भलाई से बैर और बुराई से प्रीति रखते हो; तुम लोगों पर से उनकी खाल और उनकी हड्डियों पर से उनका मांस उधेड़ लेते हो; तुम मेरे लोगों का मांस भी खा लेते और उनकी खाल उधेड़ते हो," इत्यादि। यदि वे लोग, जो परमेश्वर को जानने और उसकी सेवा करने का दावा करते हैं, बेबीलोनियों या मिस्रियों के प्रति ऐसी क्रूरता करते, तो वह ऐसा अन्याय होता जिसका कोई बहाना स्वीकार नहीं हो सकता; परन्तु जब वे पवित्र लोगों के लहू और मांस से ऐसे तृप्त होते हैं जैसे रोटी खाते हों, तो यह ऐसा भयंकर अधर्म है जो स्वर्गदूतों और मनुष्यों दोनों को चकित कर दे। यदि ऐसे लोगों में खरी समझ का कण-मात्र भी शेष रहता, तो वह उन्हें ऐसे भयानक मूढ़तापूर्ण आचरण से रोक लेता। इसलिए वे निश्चय ही शैतान के द्वारा पूर्णतः अन्धे कर दिए गए होंगे, और विवेक तथा समझ से सर्वथा रहित हो गए होंगे, क्योंकि वे जान-बूझकर और अपनी इच्छा से परमेश्वर की प्रजा की खाल उधेड़ते और उसे ऐसी निर्ममता से निगल जाते हैं। यह खण्ड हमें सिखाता है कि जो लोग भक्तों के चरवाहे होने का ढोंग करते हैं, उनके द्वारा भक्तों पर की जानेवाली क्रूरता परमेश्वर को कितनी अप्रिय और कितनी घृणित है। पद के अन्त में, जहाँ वह कहता है कि वे प्रभु को नहीं पुकारते, वह फिर इस निरंकुश दुष्टता के स्रोत और कारण की ओर संकेत करता है, अर्थात् यह कि ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है। धर्म ही वह सर्वोत्तम शिक्षिका है जो हमें एक-दूसरे के प्रति न्याय और खराई बनाए रखना सिखाती है; और जहाँ धर्म की चिन्ता बुझ जाती है, वहाँ न्याय का सारा ध्यान भी उसके साथ ही नष्ट हो जाता है। परमेश्वर को पुकारने के वाक्यांश के विषय में यह जानना चाहिए कि चूँकि यह भक्ति का प्रमुख अभ्यास है, इसलिए यह उपलक्षण (synecdoche) के द्वारा, (अलंकार-शास्त्र की वह रीति जिसमें अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखा जाता है,) न केवल यहाँ, वरन पवित्रशास्त्र के अनेक अन्य स्थलों में भी, परमेश्वर की सम्पूर्ण उपासना को सम्मिलित करता है।

"Il faut que l'horreur des meschancetez qui regnent au monde nous face dresser les cheveux en la teste." — फ्रांसीसी। कैल्विन यहाँ Dominus पढ़ता है, यद्यपि इब्रानी पाठ में शब्द יהוה Yehovah है, जिसे वह लगभग सदा ज्यों का त्यों रखता है। सेप्तुआजिंट में יהוה का अनुवाद सदा ὁ Κυριος, प्रभु, के द्वारा किया गया है, जो Dominus के समतुल्य है, और प्रभुत्व या स्वामित्व को व्यक्त करता है, — यह ऐसा शब्द है जो यहोवा नाम से भिन्न विचार प्रकट करता है, क्योंकि यहोवा नाम स्वतन्त्र और अनन्त अस्तित्व को सूचित करता है। सेप्तुआजिंट के अनुवादकों ने יהו के लिए ὁΚυριος का प्रयोग यहूदियों की उन शंकाओं का ध्यान रखते हुए किया, जिन्होंने यह निर्देश दिया था कि जहाँ कहीं יהוה आए, वहाँ אדני पढ़ा जाए।

भजन 14:5-6 "Desquels l'office est de paistre et governer le troupeau." — फ्रांसीसी।

5. वहाँ वे भय के मारे काँप उठे, क्योंकि परमेश्वर धर्मी की पीढ़ी में [अथवा, के साथ, अथवा, के पक्ष में] है। 6. तुम दीन की युक्ति का उपहास करते हो, क्योंकि यहोवा उसकी आशा है।

5. वहाँ वे भय के मारे काँप उठे। अब भविष्यद्वक्ता अपने आप को और सब विश्वासियों को सब सान्त्वनाओं में से सर्वोत्तम सान्त्वना से ढाढ़स देता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अन्त तक अपनी प्रजा को नहीं त्यागेगा, वरन अन्ततः अपने आप को उनका रक्षक प्रकट करेगा। कुछ लोग स्थानवाचक क्रियाविशेषण वहाँ का यह अर्थ बताते हैं कि परमेश्वर अपने पवित्र लोगों की उपस्थिति में दुष्टों से पलटा लेगा, क्योंकि उन्होंने उन पर अपना अत्याचार चलाया था। परन्तु मैं यह समझना अधिक उचित मानता हूँ कि इस शब्द वहाँ के द्वारा उनके दण्ड की निश्चितता व्यक्त की गई है, मानो भजनकार उसकी ओर उँगली उठाकर संकेत कर रहा हो। इससे वह बात भी सूचित हो सकती है जो हम भजन 53 से ग्रहण कर सकते हैं, कि परमेश्वर का न्याय उन पर अचानक, और जब वे उसके विषय में सोच भी न रहे हों, आ पड़ेगा; क्योंकि वहाँ यह जोड़ा गया है, जहाँ कोई भय नहीं, अथवा, जहाँ कोई भय न था। मैं जानता हूँ कि व्याख्याकार इन शब्दों की व्याख्या में मतभेद रखते हैं। कुछ लोग समान या तुल्य शब्द जोड़कर यह पढ़ते हैं, उसके समान कोई भय नहीं। अन्य लोग इन्हें उन गुप्त आशंकाओं से जोड़ते हैं जिनसे भक्तिहीन लोग पीड़ित रहते हैं, तब भी जब भय का कोई कारण न हो। परमेश्वर अपनी व्यवस्था के उल्लंघन करनेवालों को ऐसी मानसिक यातना की धमकी देता है कि "जब कोई उनका पीछा न करता हो तब भी वे भागेंगे," (लैव्यव्यवस्था 26:17, और नीतिवचन 28:1) और कि "पत्ते के खड़कने का शब्द भी उन्हें भगा देगा," (लैव्यव्यवस्था 26:36) ठीक जैसे हम देखते हैं कि वे स्वयं ही अपने आप को यातना देनेवाले होते हैं, और कोई बाहरी कारण न होने पर भी मानसिक व्याकुलता से डाँवाडोल रहते हैं। परन्तु मैं समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ भिन्न है, अर्थात् यह कि जब उनके कामकाज अत्यन्त शान्ति और समृद्धि की दशा में होंगे, तब परमेश्वर अचानक उन पर अपने पलटे के वज्र छोड़ेगा।

यह सामान्य मत है कि यह भजन अबशालोम के विद्रोह से उत्पन्न भय और संकट के समय रचा गया था, और कि यह उस षड्यन्त्र की विफलता की भविष्यद्वाणी है। परन्तु काल्मे (Calmet) और मज (Mudge) इस भजन को बेबीलोन की बन्धुआई से जोड़ते हैं, और मज यह मानता है कि इस पद और पिछले पद में उस बड़े आतंक की ओर संकेत है जिसमें अन्यजाति लोग अपनी अधर्मी रंगरलियों के बीच डाल दिए गए थे; जिसे कुछ लोग बेलशस्सर के भोज में घटित उस दृश्य से जोड़ते हैं, जब दीवार पर लिखता हुआ हाथ दिखाई दिया था। फिर भी, अधिकांश भजनों के किन अवसरों पर रचे जाने के विषय में बड़ी अनिश्चितता है; और जिन लोगों ने इस विषय पर व्याख्याकारों के भिन्न-भिन्न मतों की जाँच की है, उन्हें निश्चय ही यह मान लेना पड़ेगा कि इस सम्बन्ध में किसी निश्चितता-जैसी बात तक पहुँचना कितना कठिन है।

"Avec ou pour." — फ्रांसीसी हाशिया।

यद्यपि परमेश्वर की प्रजा पर अन्धेर करनेवालों पर, जिनके विषय में भजनकार ने पिछले पद में कहा था, अभी तक वास्तव में दण्ड नहीं आया था, तौभी वह उनके दण्ड के विषय में ऐसे बोलता है मानो वह घट चुका हो। भविष्यद्वाणी-काव्य में भविष्य की बातों के विषय में बोलने की इस रीति का कारण हॉर्सली (Horsley) यह बताता है, "कि भविष्य का प्रतिरूप एक दृश्य भविष्यद्वक्ता की कल्पना के सामने प्रस्तुत किया जाता है, और जो कुछ वह उस दृश्य में देखता है, उसके विषय में वह ऐसे बोलता है मानो वह हो चुका हो।"

अव्यय שם का प्रयोग संकेतवाचक रूप में, उस दृश्य के सम्बन्ध में किया गया है जो प्रेरित कवि की कल्पना के सामने है। "वह देखो, वहाँ!" — हॉर्सली।

सेप्तुआजिंट संस्करण में, वहाँ वे बड़े भय में थे, इन शब्दों के साथ ये शब्द जोड़े गए हैं, οὑουκ ἠν ὁφόβος, जहाँ कोई भय न था; सम्भवतः प्रतिलिपिकारों ने इन्हें स्मृति से भजन 53:6 से ले लिया, अथवा अनुवादकों ने इन शब्दों को व्याख्या-रूप में जोड़ दिया।

"क्योंकि जब लोग कहते होंगे, कि कुशल है और कुछ भय नहीं, तो उन पर एकाएक विनाश आ पड़ेगा," (1 थिस्सलुनीकियों 5:3)।

इसलिए भविष्यद्वक्ता विश्वासियों को इस प्रत्याशा से ढाढ़स और सहारा देता है कि भक्तिहीन लोग, जब वे अपने आप को सब संकटों से मुक्त समझते हैं और निश्चिन्त होकर अपनी विजय का उत्सव मना रहे होते हैं, अचानक विनाश से अभिभूत हो जाएँगे।

इसका कारण पद के अन्तिम भाग में जोड़ा गया है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने धर्मियों की रक्षा करने और उनके मुकद्दमे को अपने हाथ में लेने का निश्चय कर लिया है: क्योंकि परमेश्वर धर्मी की पीढ़ी में है। अब, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए, उसे अवश्य ही स्वर्ग से उनके शत्रुओं पर अपने कोप में गरजना होगा, जो अन्याय से उन पर अन्धेर करते और हिंसा तथा लूट-खसोट के द्वारा उन्हें उजाड़ते हैं। तौभी דור dor शब्द में, जिसका अनुवाद हमने पीढ़ी किया है, कुछ अस्पष्टता है। चूँकि इब्रानी में यह संज्ञा कभी-कभी युग, अथवा मानव जीवन की अवधि का अर्थ देती है, इसलिए इस वाक्य की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: यद्यपि कुछ समय तक ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर दुष्टों के द्वारा अपने दासों पर किए गए अन्यायों पर ध्यान नहीं देता, तौभी वह सदा उनके साथ उपस्थित रहता है, और उनके सारे जीवन भर उन पर अपना अनुग्रह करता रहता है। परन्तु मुझे इस वाक्यांश की यह व्याख्या अधिक सरल और स्वाभाविक जान पड़ती है: कि परमेश्वर धर्मियों की ओर है, और, जैसा कहा जाता है, उनका पक्ष लेता है; अतः यहाँ דור dor का वही अर्थ होगा जो लातीनी लोगों में कभी-कभी natio [जाति] शब्द का होता है।

भजन 53:5 में भजनकार एक वाक्य जोड़ता है जो इस भजन में नहीं आता: क्योंकि परमेश्वर ने उसकी हड्डियाँ तितर-बितर कर दी हैं जो तुझे घेरे हुए है; तू उन्हें लज्जित करेगा, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें तुच्छ जानकर त्याग दिया है। इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता और भी स्पष्ट रूप से समझाता है कि परमेश्वर धर्मियों की रक्षा किस प्रकार करता है, अर्थात् उन्हें मृत्यु के जबड़ों से छुड़ाकर, ठीक वैसे ही जैसे कोई उन लोगों को भगा दे जिन्होंने किसी नगर को घेर रखा हो, और उसके उन निवासियों को स्वतन्त्र कर दे जो पहले बड़े संकट में थे और पूरी तरह घिरे हुए थे।

"Qui les foullent injustement et usent de violence et extorsion." — फ्रांसीसी। "Et tient leur parte, comme on dit." — फ्रांसीसी।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि हम चाहते हैं कि अपने सबसे बड़े संकट के समय परमेश्वर के हाथ से हमारी रक्षा और संरक्षण हो, तो हमें अन्धेर को धीरज से सहना चाहिए। हड्डियाँ शब्द का प्रयोग रूपक के रूप में बल या सामर्थ्य के लिए किया गया है। भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से उनकी सामर्थ्य की चर्चा करता है; क्योंकि यदि दुष्टों के पास धन, युद्ध-सामग्री और सेनाएँ न होतीं, जो उन्हें भयानक बनाती हैं, तो पर्याप्त प्रमाण के साथ यह प्रकट न होता कि अन्ततः उन्हें कुचलनेवाला परमेश्वर का ही हाथ है। फिर भजनकार विश्वासियों को पवित्र घमण्ड करने के लिए उभारता है, और उनसे कहता है कि वे निश्चिन्त रहें कि दुष्टों के सिर पर अपमानजनक विनाश मँडरा रहा है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया है; और यदि वह उनके विरुद्ध है, तो अन्ततः उनकी सब बातें बिगड़ ही जाएँगी। चूँकि מאס maäs, जिसका अनुवाद हमने त्याग देना किया है, कभी-कभी तुच्छ जानना का अर्थ देता है, इसलिए कुछ लोग इसका अनुवाद यों करते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें तुच्छ जाना है; परन्तु मेरे विचार में यह इस खण्ड के अनुकूल नहीं है। यह पढ़ना अधिक उपयुक्त होगा, — उसने उन्हें तुच्छ बना दिया है, अथवा, उन्हें अनादर और अपमान के अधीन कर दिया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब वे मानो परमेश्वर के विरोध में अपने आप को ऊँचा उठाने का यत्न करते हैं, तब वे केवल अपने ऊपर अनादर और अपकीर्ति ही लाते हैं।

6. तुम दीन की युक्ति का उपहास करते हो। वह उन दानवों के विरुद्ध कड़ा प्रहार करता है जो विश्वासियों की सरलता का ठट्ठा करते हैं, क्योंकि वे अपने संकटों में शान्ति से यह प्रतीक्षा करते हैं कि परमेश्वर अपने आप को उनका छुड़ानेवाला प्रकट करेगा। और निश्चय ही शरीर को इससे अधिक तर्कहीन कुछ नहीं लगता कि हम परमेश्वर की शरण लें, जबकि वह हमें हमारी विपत्तियों से छुटकारा नहीं दे रहा; और इसका कारण यह है कि शरीर परमेश्वर का न्याय केवल उसके अनुग्रह के उस अंश के अनुसार करता है जो वह वर्तमान में देखता है। इसलिए जब कभी अविश्वासी परमेश्वर की सन्तानों को विपत्तियों से दबा हुआ देखते हैं, तो वे उनके भरोसे को, जो उन्हें निराधार प्रतीत होता है, लेकर उनकी निन्दा करते हैं, और व्यंग्यपूर्ण ठट्ठों के साथ उस दृढ़ आशा पर हँसते हैं जिसके साथ वे परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं, जिससे, इतने पर भी, उन्हें कोई प्रत्यक्ष सहायता प्राप्त नहीं होती। इसलिए दाऊद दुष्टों की इस ढिठाई को ललकारता और उसका उपहास करता है, और यह चेतावनी देता है कि उनका दीनों और दुखियों का ठट्ठा करना, और परमेश्वर की सुरक्षा पर निर्भर रहने तथा अपनी विपत्तियों के नीचे न डूबने के कारण उन पर मूर्खता का दोष लगाना, उनके विनाश का कारण बनेगा। साथ ही वह उन्हें यह सिखाता है कि हम जो भी संकल्प कर सकते हैं, उनमें परमेश्वर पर निर्भर रहने के संकल्प से बढ़कर सुविचारित कोई संकल्प नहीं है, और कि उसके उद्धार पर, तथा उस सहायता पर जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, विश्राम करना, चाहे हम विपत्तियों से घिरे हुए ही क्यों न हों, सर्वोच्च बुद्धिमानी है।

"Ne plus ne morns que si quelqu'un mettoit en fuite ceux qui auroyent dress, le siege derant une ville, et mettoit en liber, les habitans d'icelle qui estoyent auparavant en grande extremit, et bien enserrez." — फ्रांसीसी।

भजन 14:7

7. कौन इस्राएल को सिय्योन से उद्धार [अथवा छुटकारा] देगा? जब यहोवा अपनी प्रजा को बन्धुआई से लौटा लाएगा, तब याकूब मगन होगा और इस्राएल आनन्दित होगा।

दाऊद, सान्त्वना की शिक्षा प्रस्तुत करने के पश्चात्, फिर प्रार्थनाओं और कराहों की ओर लौटता है। इसके द्वारा वह हमें सिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर हमें बहुत समय तक कुढ़ते रहने के लिए छोड़ दे, तौभी हमें थकना या हियाव नहीं छोड़ना चाहिए, वरन सदा उसी पर घमण्ड करना चाहिए; और फिर, कि जब तक हमारे क्लेश बने रहें, तब तक हमारे लिए सबसे प्रभावशाली सान्त्वना यही है कि हम बार-बार प्रार्थना के अभ्यास की ओर लौटें। जब वह यह प्रश्न पूछता है, कौन उद्धार देगा? तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह दाहिनी या बाईं ओर देख रहा था, अथवा किसी अन्य छुड़ानेवाले की खोज में उसने अपनी आँखें परमेश्वर से फेर ली थीं; उसका अभिप्राय केवल अपनी अभिलाषा की तीव्रता को व्यक्त करना है, मानो उसने कहा हो, अन्ततः वह समय कब आएगा जब परमेश्वर अपना उद्धार प्रकट करेगा और उसे पूर्णतः प्रत्यक्ष कर देगा? सिय्योन शब्द के द्वारा, जिसे वह जोड़ता है, वह यह गवाही देता है कि उसकी आशा परमेश्वर पर टिकी है; क्योंकि सिय्योन वह पवित्र स्थान था जहाँ से परमेश्वर ने अपने दासों की प्रार्थनाएँ सुनने की प्रतिज्ञा की थी; और वह वाचा के सन्दूक का निवास-स्थान था, जो परमेश्वर की उपस्थिति का बाहरी बयाना और चिह्न था। इसलिए उसे इसमें सन्देह नहीं कि उसके उद्धार का कर्ता कौन होगा; परन्तु वह दुखी हृदय से पूछता है कि अन्ततः वह उद्धार कब प्रकट होगा जिसकी आशा केवल परमेश्वर को छोड़ किसी अन्य स्रोत से नहीं की जा सकती। तौभी यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यदि यह प्रार्थना शाऊल के समय से सम्बन्ध रखती है, तो सिय्योन का नाम उचित रूप से ऐसे कैसे लिया जा सकता है मानो वह पहले से ही परमेश्वर का पवित्रस्थान हो? मैं इससे इनकार नहीं करूँगा कि भजनकार ने भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा वह बात पहले से कह दी हो जो अभी तक वास्तव में घटी न थी; परन्तु मैं इसे अत्यन्त सम्भव समझता हूँ कि यह भजन तब तक नहीं रचा गया जब तक वाचा का सन्दूक सिय्योन पर्वत पर स्थापित नहीं हो गया था। जैसा हम जानते हैं, दाऊद अपने अवकाश के घण्टे आनेवाली पीढ़ियों के हित के लिए उन घटनाओं को लेखबद्ध करने में लगाता था जो बहुत पहले घट चुकी थीं। इसके अतिरिक्त, इस्राएल के छुटकारे की अपनी अभिलाषा व्यक्त करके वह हमें यह सिखाता है कि उसे मुख्यतः कलीसिया की सम्पूर्ण देह के कल्याण की चिन्ता थी, और कि उसके विचार अपने निजी व्यक्तित्व की अपेक्षा इसी में अधिक लगे रहते थे। यह बात और भी ध्यानपूर्वक चिन्हित करने योग्य है जब हम यह विचार करते हैं कि जब हमारा ध्यान हमारे अपने निजी दुखों में डूबा रहता है, तब हम अपने भाइयों के कल्याण की लगभग पूरी तरह उपेक्षा कर देने के संकट में रहते हैं। और फिर भी, वे विशेष क्लेश जिनके द्वारा परमेश्वर हम में से हर एक की सुधि लेता है, इस उद्देश्य से हैं कि हमें चिताएँ कि हम अपना ध्यान और अपनी चिन्ता कलीसिया की सम्पूर्ण देह की ओर लगाएँ, और उसकी आवश्यकताओं पर विचार करें, ठीक जैसे हम यहाँ दाऊद को अपने साथ इस्राएल को सम्मिलित करते हुए देखते हैं।

जब प्रभु अपनी प्रजा को बन्धुआई से लौटा लाएगा। इन शब्दों में दाऊद यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर विश्वासियों को निरन्तर दुःख में कुढ़ते रहने नहीं देगा, जैसा एक अन्य भजन में कहा गया है, (भजन 126:5) "जो आँसू बहाते हुए बोते हैं, वे जयजयकार करते हुए लवने पाएँगे।" निस्सन्देह उसका लक्ष्य अपने आप को और सब भक्तों को प्रतिज्ञा किए हुए छुटकारे की आशा रखने के लिए दृढ़ करना और प्रोत्साहित करना है। इसलिए वह पहले तो यह कहता है कि यद्यपि परमेश्वर विलम्ब करे, अथवा कम से कम उतनी शीघ्रता न करे जितनी हम चाहते हैं, तौभी वह अपनी प्रजा को बन्धुआई से छुड़ाकर अपने आप को उसका रक्षक प्रकट करेगा। और फिर, वह उनके दुःख को यह दिखाकर शान्त करता है कि उसका परिणाम आनन्दमय होगा, क्योंकि अन्ततः वह आनन्द में बदल दिया जाएगा। जिस बन्धुआई का वह उल्लेख करता है, वह बेबीलोन की बन्धुआई, या अन्यजातियों के बीच उसकी प्रजा का तितर-बितर होना नहीं है; वरन वह घर के भीतर के उस अन्धेर से सम्बन्ध रखती है, जब दुष्ट लोग कलीसिया में अत्याचारियों के समान प्रभुता करते हैं। इसलिए इन शब्दों के द्वारा हमें सिखाया जाता है कि जब ऐसे प्रचण्ड शत्रु परमेश्वर के झुण्ड को उजाड़ते और नष्ट करते हैं, अथवा घमण्ड से उसे पाँवों तले रौंदते हैं, तब हमें परमेश्वर की शरण लेनी चाहिए, जिसका यह विशेष कार्य है कि वह अपने इस्राएल को उन सब स्थानों से, जहाँ वे तितर-बितर कर दिए गए हैं, फिर से इकट्ठा करे। और बन्धुआई शब्द, जिसका वह प्रयोग करता है, यह सूचित करता है कि जब दुष्ट लोग कलीसिया के बीच सारी अच्छी और विधिसम्मत व्यवस्था को अपनी इच्छा के अनुसार उलट देते हैं, तब वह एक बेबीलोन या मिस्र में बदल जाती है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि दाऊद पवित्र प्रजा के आनन्द को उनके छुटकारे के समय तक टाल देता है, तौभी उसकी सान्त्वनादायक प्रत्याशा को न केवल हमारे शोक को कम करने के काम आना चाहिए, वरन उसमें आनन्द मिलाकर उसे मधुर बनाने के काम भी आना चाहिए।

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