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भजन 3
भजन 3.
दाऊद, यद्यपि अपने राज्य से निकाला गया था, और पृथ्वी की हर ओर से सहायता पाने की आशा से पूरी तरह निराश होकर दबा हुआ था, तौभी परमेश्वर को पुकारना नहीं छोड़ता, और बड़े से बड़े भयों के विरुद्ध, अपने शत्रुओं के ठट्ठों और क्रूर आक्रमणों के विरुद्ध, और अन्त में स्वयं मृत्यु के विरुद्ध भी, जो उस समय बलपूर्वक उसके ध्यान के सामने आ खड़ी हुई थी, परमेश्वर की प्रतिज्ञा के सहारे अपने आप को सम्भाले रहता है। भजन के अन्त में वह इन सब बातों के सुखद परिणाम पर अपने आप को और सारी कलीसिया को बधाई देता है।
दाऊद का भजन, जब वह अपने पुत्र अबशालोम के साम्हने से भागा जाता था।
अपने ही घराने के उस षड्यन्त्र के कारण, जो उसके अपने पुत्र के विश्वासघात से उठा था, दाऊद का शोक कितना कड़वा रहा होगा, इसका अनुमान हम में से हर कोई स्वाभाविक भावनाओं से सहज ही लगा सकता है। और जब इसके अतिरिक्त वह यह भी जानता था कि यह विपत्ति परमेश्वर ने उसके अपने दोष के कारण उस पर डाली है—क्योंकि उसने पराए पुरुष की पत्नी को अशुद्ध किया और निर्दोष का लोहू बहाया था—तो यदि परमेश्वर की प्रतिज्ञा से उसका ढाढ़स न बँधता, और वह इस प्रकार मृत्यु में भी जीवन की आशा न रखता, तो वह निराशा में डूब जाता और व्यथा से अभिभूत हो जाता। यहाँ वह अपने पापों का कोई उल्लेख नहीं करता, इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इस भजन में उसकी प्रार्थनाओं का केवल एक ही भाग सम्मिलित है; क्योंकि परमेश्वर ने उसे स्पष्ट रूप से उसके व्यभिचार और ऊरिय्याह के प्रति उसके दुष्ट विश्वासघात के कारण दण्ड दिया था, इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह आरम्भ में मन की भारी और भयानक यातनाओं से व्याकुल हुआ था। परन्तु जब उसने परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन किया, तब उसने हियाव बाँधा; और क्षमा पा लेने का पूरा निश्चय पाकर उसे पूरा भरोसा हो गया कि परमेश्वर उसकी ओर है, और वह जानता था कि परमेश्वर सदा उसके राज्य पर प्रभुता करेगा और अपने आप को उसका रक्षक प्रगट करेगा। तौभी उसने अपने पुत्र की और षड्यन्त्र में सम्मिलित सारे दल की शिकायत की, क्योंकि वह जानता था कि वे परमेश्वर के ठहराए हुए निर्णय को विफल करने के लिए दुष्टता से उठ खड़े हुए थे। इसी प्रकार, यदि कभी परमेश्वर दुष्ट और उपद्रवी मनुष्यों को हमें ताड़ना देने के लिए कोड़ों के रूप में काम में लाता है, तो हमें उचित है कि पहले उसके कारण पर ध्यानपूर्वक विचार करें, अर्थात् यह कि हम ऐसा कुछ नहीं भोगते जिसके हम योग्य न हों, ताकि यह विचार हमें पश्चाताप की ओर ले जाए। परन्तु यदि हमारे शत्रु हमें सताने में हमारे विरुद्ध नहीं, वरन् परमेश्वर के विरुद्ध लड़ते हैं, तो उनके ऐसा करने के विचार के तुरन्त पश्चात् हमारे मन में यह दृढ़ निश्चय उत्पन्न होना चाहिए कि हम उसकी रक्षा में सुरक्षित हैं, जिसके उस अनुग्रह को, जिसकी उसने हम से प्रतिज्ञा की है, वे तुच्छ जानते और पाँवों तले रौंदते हैं।
भजन 3:1-2
1. हे यहोवा, मेरे सतानेवाले कितने बढ़ गए हैं! बहुत से मेरे विरुद्ध उठते हैं। 2. बहुत से मेरे प्राण से कहते हैं, कि परमेश्वर में उसके लिये कुछ सहायता नहीं। सेला।
पवित्र इतिहास सिखाता है कि दाऊद न केवल सिंहासन से उतार दिया गया, वरन् लगभग सब मनुष्यों ने उसे त्याग दिया; यहाँ तक कि जितनी उसकी प्रजा थी, लगभग उतने ही उसके शत्रु हो गए। यह सच है कि उसके भागने में कुछ थोड़े से विश्वासयोग्य मित्र उसके साथ थे; परन्तु वह उनकी सहायता और रक्षा के द्वारा उतना नहीं, जितना जंगल के छिपने के स्थानों के द्वारा सुरक्षित बच निकला। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वह अपने विरोधियों की बड़ी संख्या से घबरा गया, क्योंकि उसकी ओर से ऐसे अचानक विद्रोह से बढ़कर कोई बात अनपेक्षित नहीं हो सकती थी। ऐसे बड़े त्रास से मारे जाने पर भी स्वतन्त्रता से परमेश्वर के सामने अपनी शिकायत रखने का साहस करना, और मानो अपना प्राण उसकी गोद में उण्डेल देना, असाधारण विश्वास का चिह्न था। और निश्चय ही हमारे भयों को शान्त करने का एकमात्र उपाय यही है कि जो चिन्ताएँ हमें व्याकुल करती हैं, उन सब को हम उस पर डाल दें; जैसे दूसरी ओर, जिन लोगों को यह धारणा है कि वे उसकी कृपादृष्टि के पात्र नहीं हैं, वे उन विपत्तियों से, जो उन पर आ पड़ती हैं, अवश्य ही गिरा दिए और कुचल दिए जाएँगे।
भजन के शीर्षक या लेख में इसका सम्बन्ध अबशालोम के षड्यन्त्र से बताया गया है, और यह भजन इसी से सम्बन्ध रखता है, यह इसके सम्पूर्ण आशय से प्रकट है। “परन्तु ये शीर्षक अधिकार से रहित हैं, जैसा कि भजनों का सावधान पाठक शीघ्र ही देख लेगा; इन्हें केवल यहूदियों की हाशिये की टिप्पणियाँ समझना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र की व्याख्या के लिए अच्छे मार्गदर्शक नहीं हैं।” — फ्राई कृत भजन संहिता का अनुवाद और व्याख्या। Et s'en monstreroit le protecteur. — फ्रांसीसी. En nous poursuyvant. — फ्रांसीसी.
Il a ose venir familierement faire sa complainte a Dieu et comme se discharger a lui. — फ्रांसीसी.
तीसरे पद में वह अपने शत्रुओं के उस घमण्ड को अधिक स्पष्टता और अधिक बल के साथ प्रगट करता है, जिसके कारण वे उसे एक त्यागे हुए मनुष्य के समान, और ऐसे व्यक्ति के समान ठट्ठों में उड़ाते थे जिसकी दशा आशा से परे हो चुकी हो। और उसका अभिप्राय यह है कि इसी कारण उनका दुस्साहस बढ़ गया, क्योंकि उन्हें निश्चय था कि परमेश्वर ने उसे त्याग दिया है। सम्भवतः इन शब्दों में उनकी अभक्ति की ओर भी परोक्ष संकेत है, क्योंकि जिस राजा को परमेश्वर ने चुना था, उसकी रक्षा करने में वे परमेश्वर की सहायता को कुछ भी नहीं गिनते थे। और यह दूसरा अर्थ अधिक सम्भव है, क्योंकि अबशालोम ने परमेश्वर की कृपा की आशा से अपने आप को बहलाया नहीं, वरन् उसकी पूरी उपेक्षा करके अपने ही बल से विजय की आशा की। इसलिए दाऊद जानबूझकर उसे और बाकी सब को इस प्रकार बोलते हुए प्रस्तुत करता है, ताकि यह दिखाए कि वे परमेश्वर के प्रति एक भयंकर और उद्दण्ड तिरस्कार के कारण ही उसके विरुद्ध ऐसे क्रोध में भर गए थे, मानो वे इस बात को बिलकुल कुछ नहीं गिनते थे कि वह बार-बार बड़े से बड़े संकटों से आश्चर्यजनक रीति से छुड़ाया गया था। जब अभक्त लोग हमें नष्ट करने के लिए उठते हैं, तब चाहे वे खुलकर ऐसी ढिठाई न दिखाएँ कि यह दावा करें कि परमेश्वर की कृपा से हमें कोई लाभ मिलना असम्भव है; तौभी, क्योंकि वे या तो हर बात भाग्य के अधीन मानते हैं, या यह मत रखते हैं कि मनुष्य की सफलता उसके बल के अनुपात में होगी, और इसलिए उचित-अनुचित हर उपाय से अपना उद्देश्य पाने के लिए निडर होकर आगे बढ़ते हैं, मानो उनके लिए यह बराबर ही हो कि परमेश्वर उन से क्रोधित है या उन पर कृपालु—इससे स्पष्ट है कि वे परमेश्वर की कृपा का कुछ भी मूल्य नहीं समझते, और विश्वासियों का ठट्ठा करते हैं, मानो परमेश्वर की देखरेख और रक्षा में रहने से उन्हें कुछ भी लाभ न होगा।
कुछ लोगों का यह अनुवाद, “बहुत से मेरे प्राण के विषय में कहते हैं,” इस वचन का सच्चा अर्थ नहीं देता। यह सच है कि इब्रानी में ל lamed अक्षर कभी-कभी “के विषय में” के अर्थ में प्रयुक्त होता है, परन्तु दाऊद यहाँ इससे कुछ अधिक प्रगट करना चाहता था, अर्थात् यह कि उसके शत्रुओं के ठट्ठों से उसका हृदय मानो छिद गया था। इसलिए मेरी समझ में यहाँ “प्राण” शब्द भावनाओं के आसन का अर्थ देता है। और एक वचन में भी, जो हमें एक दूसरे भजन में मिलेगा, उसका यही अर्थ है (भजन 35:3), “मेरे प्राण से कह, कि मैं तेरा उद्धार हूँ।” इस प्रकार दाऊद अपने उदाहरण से हमें सिखाता है कि यद्यपि सारा संसार एक स्वर से हमें निराशा की ओर धकेलने का प्रयत्न करे, तौभी हमें उसकी बात सुनने के बदले केवल परमेश्वर ही की ओर कान लगाना चाहिए, और जिस उद्धार की उसने प्रतिज्ञा की है, उसकी आशा को सदा अपने भीतर सँजोए रखना चाहिए; और जैसे अभक्त लोग हमारे प्राणों को नष्ट करने का यत्न करते हैं, वैसे ही हमें अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा उनकी रक्षा करनी चाहिए। “सेला” शब्द के विषय में व्याख्याकार एकमत नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह दृढ़ कथन का चिह्न है, और इसका वही अर्थ है जो “सचमुच” या “आमीन” का है। दूसरे इसका अर्थ “सदा के लिये” समझते हैं। परन्तु क्योंकि סלל Selal, जिससे यह बना है, का अर्थ “ऊँचा उठाना” है, इसलिए हम उन लोगों के मत की ओर झुकते हैं जो समझते हैं कि यह गाने के अभ्यास में स्वर-संगति के साथ आवाज़ के ऊँचे उठाए जाने को सूचित करता है। साथ ही यह ध्यान देना चाहिए कि संगीत भाव के अनुकूल बनाया जाता था, और इस प्रकार स्वर-संगति गीत के स्वरूप या विषय-वस्तु से मेल खाती थी; जैसे यहाँ दाऊद, अपने शत्रुओं की इस बात की शिकायत करने के पश्चात् कि वे उसकी आशा को लज्जाजनक रीति से हँसी में उड़ाते हैं, मानो परमेश्वर की रक्षा उसके किसी काम न आएगी, “सेला” शब्द के प्रयोग से इस निन्दा पर ध्यान केन्द्रित करता है, जिसने उसके हृदय को गहरा घाव दिया था; और जैसे थोड़ा आगे, जब वह अपने शरीर की सुरक्षा के विषय में भरोसे का एक नया आधार जोड़ता है, तब वह वही शब्द दोहराता है।
भजन 3:3-4
3. और तू, हे यहोवा, मेरे लिये ढाल है, तू मेरी महिमा है, और मेरे सिर को ऊँचा करनेवाला है। 4. मैं ने अपने शब्द से यहोवा को पुकारा, और उसने अपने पवित्र पर्वत पर से मेरी सुन ली। सेला।
संयोजक “और” को विरोधवाचक अव्यय “परन्तु” के अर्थ में लेना चाहिए, क्योंकि दाऊद अपने शत्रुओं की ढिठाई और अपवित्र ठट्ठों के विरोध में पूरे भरोसे से भरी भाषा का प्रयोग करता है, और साक्षी देता है कि वे चाहे जो कहें, वह तौभी परमेश्वर के वचन पर निर्भर रहेगा। इसके अतिरिक्त यह भी प्रकट होता है कि वह पहले से ही छुटकारे की निश्चित आशा रखता था, क्योंकि यहाँ वह अपनी वर्तमान विपत्ति का उल्लेख परमेश्वर के हाथ से उस पर डाली गई ताड़ना के रूप में नहीं करता; वरन् ईश्वरीय सहायता पर निर्भर होकर वह साहस के साथ अपने उन शत्रुओं का सामना करता है जो उसके विरुद्ध अभक्ति और दुष्टता से भरा युद्ध चला रहे थे, क्योंकि उनका उद्देश्य एक सच्चे और वैध राजा को उसके सिंहासन से उतार देना था। संक्षेप में, पहले अपने पाप को मान लेने के पश्चात् अब वह केवल वर्तमान मामले के गुण-दोष पर विचार करता है। और जब दुष्ट लोग परमेश्वर के दासों को सताएँ, तब उन्हें इसी प्रकार आचरण करना उचित है। अपने पापों पर शोक करके और दीनता से परमेश्वर की दया की शरण लेकर, उन्हें अपने क्लेशों के प्रत्यक्ष और तात्कालिक कारण पर दृष्टि लगाए रखनी चाहिए, ताकि जब वे बिना कारण बुरे व्यवहार के अधीन किए जाएँ, तब उन्हें परमेश्वर की सहायता के विषय में कोई सन्देह न रहे। विशेषकर जब उनके साथ बुरा व्यवहार किए जाने के द्वारा परमेश्वर की सच्चाई का विरोध होता है, तब उन्हें बड़ा ढाढ़स बँधना चाहिए, और इस निश्चय में घमण्ड करना चाहिए कि परमेश्वर निःसन्देह ऐसे विश्वासघाती और भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध अपनी प्रतिज्ञाओं की सच्चाई को स्थिर रखेगा। यदि दाऊद के साथ ऐसा न होता, तो ऐसा प्रतीत हो सकता था कि उसने ये बातें निराधार ही अपने लिए ले लीं, क्योंकि परमेश्वर को अप्रसन्न करके उसने अपने आप को उसकी स्वीकृति और सहायता से वंचित कर लिया था। परन्तु यह निश्चय पाकर कि वह परमेश्वर की कृपा से पूरी तरह कट नहीं गया है, और कि परमेश्वर का उसे राजा होने के लिए चुनना अपरिवर्तित बना है, वह अपनी वर्तमान परीक्षाओं के शुभ परिणाम की आशा रखने के लिए अपने आप को उत्साहित करता है। और पहले तो परमेश्वर की तुलना ढाल से करके उसका अभिप्राय यह है कि वह उसकी सामर्थ्य के द्वारा सुरक्षित रखा गया। इसी से वह यह निष्कर्ष भी निकालता है कि परमेश्वर उसकी महिमा था, क्योंकि जिस राजकीय प्रतिष्ठा को परमेश्वर ने उसे देना उचित समझा था, उसका वह रखवाला और रक्षक होगा। और इसी कारण वह इतना निडर हो गया कि वह घोषणा करता है कि वह बिना लज्जित हुए, सिर ऊँचा करके चलेगा।
L'audace de ses ennemis et risee accompagnee de sacrilege. — फ्रांसीसी. En l'offensant. — फ्रांसीसी.
4. मैं ने अपने शब्द से यहोवा को पुकारा। यहाँ वह हमें बताता है कि वह विपत्ति से कभी इतना टूटा नहीं, और न अभक्तों के ठट्ठों से इतना गिराया गया, कि परमेश्वर से प्रार्थना करने से रुक जाए। और प्रार्थना करने के द्वारा संकटों के बीच भी अपने विश्वास को काम में लाना उसके विश्वास का अचूक प्रमाण था। यदि सचमुच हमें उसकी प्रतिज्ञा पर कुछ भी विश्वास है, तो इससे बढ़कर अनुचित बात कुछ नहीं कि हम जिस लगाम से बाँधे गए हैं उसे कुढ़कर चबाते रहें, और अपना कराहना परमेश्वर से रोक रखें। और न इन शब्दों में, “मैं ने अपने शब्द से पुकारा,” कोई व्यर्थ शब्द-बाहुल्य है। दाऊद अपने शब्द का अलग से उल्लेख इसलिए करता है कि यह और अच्छी तरह प्रगट करे कि अभक्त लोग उसके विरुद्ध चाहे कितना ही क्रोध करें, वह किसी प्रकार गूँगा नहीं कर दिया गया, वरन् उसने ऊँचे और स्पष्ट शब्द से अपने परमेश्वर का नाम लिया; और ऐसी भारी और कठोर परीक्षा में ऐसा करना कठिन काम था। वह अपने शब्द का विशेष उल्लेख इसलिए भी करता है कि यह दिखाए कि वह प्रार्थना के शब्द को उन लोगों के कोलाहलपूर्ण चिल्लाने के विरोध में रखता है जो या तो भाग्य को दोष देते हैं, या परमेश्वर को कोसते हैं, या अत्यधिक विलाप में बह जाते हैं; संक्षेप में, उन लोगों के विरोध में जो उत्तेजित गड़बड़ी के साथ अपना असीम शोक उण्डेलते हैं। परन्तु मुझे दाऊद का अभिप्राय मुख्यतः यह प्रतीत होता है कि शत्रुओं की उन निन्दाओं के बीच, जिनके द्वारा वे उसके विश्वास को डुबो देने का यत्न करते थे, वह चुप नहीं कराया गया, वरन् उसने परमेश्वर की ओर अपना शब्द ऊँचा किया, जिसके विषय में अभक्त समझते थे कि वह उसका शत्रु बन गया है। वह यह भी जोड़ता है कि उसकी पुकार व्यर्थ नहीं गई, ताकि सब भक्तों को ऐसी ही स्थिरता के लिए उत्साहित करे। जहाँ तक “उसकी पवित्रता के पर्वत पर से” इस वाक्यांश का प्रश्न है, या, जिसका अर्थ वही है, “उसके पवित्र पर्वत पर से,” इसे स्वर्ग के विषय में समझाना, जैसा कुछ लोगों ने किया है, अनुचित है। मैं मानता हूँ कि दूसरे स्थानों में स्वर्ग को प्रायः परमेश्वर का पवित्र भवन कहा गया है; परन्तु यहाँ दाऊद निःसन्देह वाचा के सन्दूक की ओर संकेत करता है, जो उस समय सिय्योन पर्वत पर रखा था। और वह स्पष्ट रूप से कहता है कि वहीं से उसकी सुनी गई, यद्यपि उसे जंगल में भाग जाने पर विवश होना पड़ा था। पवित्र इतिहास बताता है (2 शमूएल 15:24) कि जब एब्यातार याजक ने आज्ञा दी कि लेवीय सन्दूक को साथ ले चलें, तब दाऊद ने ऐसा न होने दिया। और इसमें उस पवित्र पुरुष का अद्भुत विश्वास स्पष्ट चमकता है। वह जानता था कि प्रभु ने सिय्योन को सन्दूक का निवास-स्थान होने के लिए चुना है, तौभी वह किसी ऐसी नई बात को चलाने से, जो स्वर्ग की इच्छा से स्वीकृत न हो, यह कहीं अधिक अच्छा समझता था कि ईश्वरीय उपस्थिति के उस पवित्र चिह्न से अलग कर दिया जाए (जो उसके लिए ऐसा दुःखदायी था मानो उसकी अपनी अन्तड़ियाँ उससे नोच ली गई हों)। अब वह घमण्ड करता है कि यद्यपि वह सन्दूक के दर्शन से वंचित था, और उससे इतनी दूर हटा दिया गया था, तौभी परमेश्वर उसकी प्रार्थनाएँ सुनने के लिए उसके निकट था। इन शब्दों से वह संकेत करता है कि उसने उचित सन्तुलन बनाए रखा, क्योंकि न तो उसने उस दृश्य चिह्न को तुच्छ जाना जिसे प्रभु ने उस समय की अपरिपक्वता के कारण ठहराया था, और न किसी विशेष स्थान को अन्धविश्वासपूर्ण महत्व देकर परमेश्वर की महिमा के विषय में शारीरिक धारणाएँ रखीं। इस प्रकार उसने अविश्वासियों की रीति के अनुसार व्यर्थ शब्द नहीं बिखेरे जो हवा में उड़ जाते, क्योंकि वे भी प्रार्थना तो करते हैं, परन्तु सन्देह में रहते हैं कि अपनी बात किस ओर निर्देशित करें। दाऊद सीधे उस तम्बू की ओर मुड़ा, जहाँ से परमेश्वर ने अपने दासों पर दया करने की प्रतिज्ञा की थी। इसी से वह भरोसा आया जिसके साथ उसने प्रार्थना की; और यह भरोसा निष्फल नहीं गया। हमारे दिनों में, क्योंकि जो कुछ पहले व्यवस्था के प्रतीकों के द्वारा छाया के रूप में दिखाया गया था, वह मसीह में पूरा हो गया है, इसलिए परमेश्वर के पास पहुँचने का कहीं अधिक सरल मार्ग हमारे लिए खोल दिया गया है, यदि हम जानबूझकर और अपनी इच्छा से उस मार्ग से भटक न जाएँ।
De la procede l'asseurance dont il fait mention puis apres qu'il marchera hardiment la teste levee. — फ्रांसीसी. इसी से वह भरोसा उत्पन्न हुआ जिसका उल्लेख वह थोड़ा आगे करता है, कि वह बिना लज्जित हुए सिर ऊँचा करके निडरता से चलेगा।
Par les mocqueries malheureuses des meschans. — फ्रांसीसी. दुष्टों के तुच्छ ठट्ठों के द्वारा।
D'esloigner de Dieu nos gemissemens, et les luy cacher — फ्रांसीसी. अपने कराहने को परमेश्वर से रोक रखना, और उन्हें उससे छिपाना।
भजन 3:5-6
5. मैं लेटकर सो गया; मैं जाग उठा, क्योंकि यहोवा ने मुझे सम्भाला। 6. मैं उन दस हजार लोगों से न डरूँगा, जिन्होंने चारों ओर मेरे विरुद्ध अपनी छावनियाँ डाली हैं।
इब्रानियों की रीति के अनुसार ये शब्द, जो भूतकाल में हैं, “मैं लेटकर सो गया,” कभी-कभी भविष्यकाल के अर्थ में लिए जाते हैं, “मैं लेटूँगा और सोऊँगा।” यदि हम क्रिया को भूतकाल में ही पढ़ें, तो दाऊद मन की एक अद्भुत और लगभग अविश्वसनीय स्थिरता प्रगट करता है, कि वह अनेक मृत्युओं के बीच ऐसी गहरी नींद सोया, मानो वह सब संकटों की पहुँच से परे हो। निःसन्देह वह चिन्ता की निर्दय लहरों के बीच उछाला गया था, परन्तु यह निश्चित है कि विश्वास के द्वारा उनका वेग शान्त कर दिया गया था, यहाँ तक कि वह चाहे कितना ही व्याकुल हुआ, उसने परमेश्वर में विश्राम पाया। इस प्रकार भक्त लोग अन्त में अपने सब भयों पर विजयी होने से कभी नहीं चूकते, जबकि अभक्त लोग, जो परमेश्वर पर भरोसा नहीं रखते, छोटे से छोटे संकट आने पर भी निराशा से दब जाते हैं। कुछ लोग समझते हैं कि यहाँ कालों का परिवर्तन है; और इसलिए वे क्रियाओं का अनुवाद भविष्यकाल में करते हैं, “मैं लेटूँगा, और सोऊँगा, और जागूँगा,” क्योंकि इसके तुरन्त बाद भविष्यकाल की एक क्रिया जोड़ी गई है, “यहोवा मुझे सम्भालेगा।” परन्तु क्योंकि इन अन्तिम शब्दों से वह एक निरन्तर चलनेवाली क्रिया प्रगट करता है, इसलिए मैंने पहली तीन क्रियाओं के कालों को बदलना आवश्यक नहीं समझा। तौभी हमें जानना चाहिए कि सुरक्षा के इस भरोसे को विशेष रूप से उसके क्लेश के समय से सम्बन्धित नहीं करना चाहिए, या कम से कम उसी तक सीमित नहीं करना चाहिए: क्योंकि मेरी समझ में दाऊद यह घोषित करता है कि उसने विश्वास और प्रार्थना के द्वारा कितनी बड़ी भलाई पाई थी, अर्थात् सुव्यवस्थित मन की शान्त और अविचलित दशा। इसे वह रूपक द्वारा प्रगट करता है जब कहता है कि उसने जीवन के साधारण काम बिना भय से व्याकुल हुए किए। वह कहता है, “मैं अपने बिछौने पर जागता और बेचैन नहीं पड़ा रहा; परन्तु मैं गहरी नींद सोया, यद्यपि ऐसी नींद प्रायः उन लोगों को नहीं आती जो चिन्ता और भय से भरे होते हैं।” परन्तु आइए हम विशेष रूप से ध्यान दें कि दाऊद को सुरक्षा का यह भरोसा परमेश्वर की रक्षा से मिला था, मन की जड़ता से नहीं। दुष्ट लोग भी मन के मतवालेपन के कारण गहरी नींद में पड़े रहते हैं, जबकि वे यह स्वप्न देखते हैं कि उन्होंने मृत्यु से वाचा बाँध ली है। दाऊद के साथ ऐसा नहीं था, जिसने किसी और आधार पर नहीं, केवल इसी कारण विश्राम पाया कि वह परमेश्वर की सामर्थ्य से सम्भाला गया और उसकी सहायता से सुरक्षित रखा गया था। अगले पद में वह इस भरोसे की उस अपार प्रभावशीलता का विस्तार करता है, जिसकी कुछ समझ सब भक्तों को ईश्वरीय रक्षा के अपने अनुभव से होती है। जैसे परमेश्वर की सामर्थ्य असीम है, वैसे ही वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह सारे संसार के सब आक्रमणों, अत्याचारों, तैयारियों और सेनाओं के विरुद्ध अजेय रहेगी। और सचमुच, जब तक हम परमेश्वर को यह आदर न दें, हमारा साहस सदा हमारा साथ छोड़ता रहेगा। इसलिए आइए हम संकटों में यह सीखें कि परमेश्वर की सहायता को मनुष्य की रीति से न नापें, वरन् जो भी भय हमारे मार्ग में खड़े हों उन्हें तुच्छ जानें, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध जो भी प्रयत्न करें, वे बहुत थोड़े या कुछ भी महत्व के नहीं हैं।
Selon l'usage des Hebrieux, ces mots qui sont en un temps passe, Je suis couche et endormi se prenent ancunesfois pour un temps a-venir, Je me coucheray et dormiray. — फ्रांसीसी.
भजन 3:7-8
7. उठ, हे यहोवा! हे मेरे परमेश्वर, मुझे बचा! क्योंकि तू ने मेरे सब शत्रुओं के जबड़ों पर मारा है; तू ने दुष्टों के दाँत तोड़ डाले हैं। 8. उद्धार यहोवा ही का है; तेरी आशीष तेरी प्रजा पर है। सेला।
7. उठ, हे यहोवा। क्योंकि पिछले पदों में दाऊद ने अपनी शान्त दशा पर घमण्ड किया था, इसलिए अब ऐसा प्रतीत होगा कि वह प्रभु से यह चाहता है कि वह अपने सारे जीवन भर सुरक्षित रखा जाए; मानो वह कहता हो, हे प्रभु, क्योंकि तू ने मेरे शत्रुओं को उलट दिया है, इसलिए ऐसा कर कि तेरी यह भलाई मेरे पीछे-पीछे चले, और मेरी दौड़ के अन्त तक बनी रहे। परन्तु क्योंकि भजनों में दाऊद का विभिन्न भावनाओं को आपस में मिला देना कोई असामान्य बात नहीं, इसलिए यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि परमेश्वर पर अपने भरोसे का उल्लेख करने के पश्चात् वह फिर से वही प्रार्थनाएँ करने लौटता है जो उसने आरम्भ में की थीं। इसलिए वह सुरक्षित रखे जाने की विनती करता है, क्योंकि वह बड़े संकट में था। आगे जो उसके शत्रुओं के मारे जाने के विषय में आता है, उसकी व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है: या तो प्रार्थना करते हुए वह अपनी पिछली विजयों को स्मरण करता है, या परमेश्वर की सहायता का अनुभव करके और अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर पाकर अब वह उसके बाद धन्यवाद देता है: और इस पिछले अर्थ को मैं स्वीकार करने की ओर अधिक झुकता हूँ। तो पहले वह घोषित करता है कि संकटों में वह सहायता के लिए परमेश्वर की शरण में भागा, और दीनता से छुटकारे के लिए प्रार्थना की, और जब उसे उद्धार प्रदान किया गया, तब वह धन्यवाद देता है, जिसके द्वारा वह साक्षी देता है कि जो छुटकारा उसने पाया था, उसका कर्ता उसने परमेश्वर को माना।
8. उद्धार यहोवा ही का है। क्योंकि इब्रानी लोग कभी-कभी ל को מך Min के स्थान पर प्रयोग करते हैं, इसलिए कुछ लोग इस वाक्यांश का अनुवाद अनुचित रूप से नहीं करते, “उद्धार यहोवा से है।” परन्तु मैं स्वाभाविक और स्पष्ट अर्थ केवल यही समझता हूँ कि उद्धार या छुटकारा केवल परमेश्वर ही के हाथों में है। इन शब्दों के द्वारा दाऊद न केवल उद्धार करने के पद और उसकी स्तुति को केवल परमेश्वर ही के लिए दावा करता है, और चुपचाप उसकी सामर्थ्य को सारी मानवीय सहायता के विरोध में रखता है; वरन् यह भी घोषित करता है कि यद्यपि उसके लोगों पर सहस्र मृत्युएँ मँडराती हों, तौभी इससे परमेश्वर उन्हें बचाने में असमर्थ नहीं हो सकता, और न वह उस छुटकारे को बिना किसी परिश्रम के शीघ्र भेजने से रोका जा सकता है जिसे देने में वह सदा समर्थ है। भजन के अन्त में दाऊद यह पुष्टि करता है कि यह अनुग्रह केवल एक व्यक्ति के रूप में उसे उतना नहीं, जितना सारी प्रजा को दिया गया, ताकि सार्वभौमिक कलीसिया, जिसका कल्याण उसके राज्य की सुरक्षा और समृद्धि पर निर्भर था, विनाश से बचाई जाए। इसलिए दाऊद स्वीकार करता है कि इस दुष्ट षड्यन्त्र का छिन्न-भिन्न होना उस चिन्ता के कारण हुआ जो परमेश्वर को अपनी कलीसिया की सुरक्षा के विषय में थी। इस वचन से हम सीखते हैं कि कलीसिया उन विपत्तियों से, जो उस पर आ पड़ती हैं, सदा छुड़ाई जाएगी, क्योंकि परमेश्वर, जो उसे बचाने में समर्थ है, अपना अनुग्रह और अपनी आशीष उससे कभी नहीं हटाएगा।
A faire les mesmes prieres qu'au commencement. — फ्रांसीसी.
Et puis a cause qu'il a obtenu cela, c'est a dire, qu'il est demeure, en sauvete, it luy en rend graces; tesmoignant par cela qu'il tient de Dieu sa deliverance et la recognoist de luy. — फ्रांसीसी. और फिर इसे प्राप्त कर लेने के कारण, अर्थात् सुरक्षित बचाए जाने के पश्चात्, वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और इसके द्वारा साक्षी देता है कि उसका छुटकारा उसी से है, और वह उसे उसी की ओर से आया हुआ स्वीकार करता है।
