भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 24

भजन 24

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भजन 24

भजन 24.

परमेश्वर सृष्टिकर्ता और शासक के रूप में समस्त मानवजाति से सम्बन्ध रखता है; इसी विचार से दाऊद उस विशेष अनुग्रह की महिमा करता है जो परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान पर प्रकट किया, जब उसने शेष मानवजाति की अपेक्षा उन्हें अपनी निज प्रजा होने के लिए चुन लिया, और अपने पवित्रस्थान को अपने भवन के रूप में खड़ा किया ताकि वह उनके बीच वास करे। साथ ही वह यह भी दिखाता है कि यद्यपि पवित्रस्थान सब यहूदियों के लिए खुला था, तौभी परमेश्वर उन सब के निकट नहीं था, वरन् केवल उन्हीं के निकट था जो सच्चाई से उसका भय मानते और उसकी सेवा करते थे, और जिन्होंने संसार की अशुद्धताओं से अपने आप को शुद्ध कर लिया था, ताकि वे पवित्रता और धार्मिकता में अपने आप को समर्पित करें। इसके अतिरिक्त, क्योंकि मन्दिर के बन जाने के बाद परमेश्वर का अनुग्रह और भी स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ, इसलिए वह उस अनुग्रह का गुणगान भव्य काव्य की तान में करता है, ताकि सच्चे विश्वासियों को और भी अधिक तत्परता के साथ उसकी सेवा और आदर करने के अभ्यास में स्थिर बने रहने के लिए प्रोत्साहित करे।

दाऊद का भजन।

भजन 24:1-4

1. पृथ्वी और जो कुछ उसमें भरा है यहोवा ही का है; जगत और उसमें निवास करनेवाले भी। 2. क्योंकि उसी ने उसकी नींव समुद्रों के ऊपर डाली, और उसे महानदों के ऊपर स्थिर किया है। 3. यहोवा के पर्वत पर कौन चढ़ेगा? और उसके पवित्र स्थान में कौन खड़ा होगा? 4. वही जिसके हाथ स्वच्छ और हृदय शुद्ध है; जिसने अपने प्राण को व्यर्थ बात की ओर नहीं उठाया, और न कपट से शपथ खाई है।

1. पृथ्वी यहोवा ही की है। हम बहुत से अन्य स्थानों में अब्राहम की सन्तान की तुलना शेष समस्त मानवजाति से की गई पाएँगे, ताकि परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई, जिसके द्वारा उसने उन्हें अन्य सब जातियों में से चुन लिया और अपने अनुग्रह से उन्हें अपनाया, और भी अधिक स्पष्टता से चमक उठे। भजन के आरम्भ का उद्देश्य यह दिखाना है कि यहूदियों के पास अपनी ओर से ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके कारण वे अन्यजातियों की अपेक्षा परमेश्वर के अधिक निकट या अधिक घनिष्ठता से जाने के अधिकारी ठहरते। क्योंकि परमेश्वर अपने विधान से जगत को सम्भाले रहता है, इसलिए उसके शासन की सामर्थ्य सब पर समान रूप से फैली हुई है, जिससे सब को उसकी आराधना करनी चाहिए, जैसे वह भी बिना किसी अपवाद के सब मनुष्यों पर वह पितृवत् चिन्ता प्रकट करता है जो वह उनके लिए रखता है। परन्तु जब उसने यहूदियों को अन्य सब जातियों से बढ़कर चुना, तो यह अनिवार्य रूप से आवश्यक था कि उसके और उनके बीच कोई पवित्र सम्बन्ध-सूत्र हो, जो उन्हें अन्यजाति राष्ट्रों से अलग पहचान दे। इसी तर्क से दाऊद उन्हें पवित्रता के लिए आमन्त्रित करता और उभारता है। वह उनसे कहता है कि यह उचित ही था कि जिन्हें परमेश्वर ने अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है, वे अपने ऊपर कुछ विशेष चिह्न धारण करें, और परदेशियों के समान बिल्कुल न हों। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उन्हें इस बात के लिए उकसाता है कि वे केवल अपने लिए उसका अनुग्रह पाने के निमित्त परमेश्वर को दूसरों के विरुद्ध करने का यत्न करें; वरन् वह उनके चुनाव के लक्ष्य या अभिप्राय से उन्हें यह सिखाता है कि जो आदर परमेश्वर ने उन्हें अन्य जातियों से बढ़कर प्रदान किया है, उसका दृढ़ और शान्तिपूर्ण अधिकार उन्हें तभी सुनिश्चित रूप से प्राप्त होगा, जब वे अपने आप को सीधे और पवित्र जीवन के लिए समर्पित करेंगे। यदि वे पवित्रता की साधना में मन न लगाते, तो परमेश्वर की निज प्रजा के रूप में एक अलग समाज में उनका एकत्र किया जाना व्यर्थ ही होता। संक्षेप में, भजनकार परमेश्वर को सारे जगत का राजा घोषित करता है, ताकि सब मनुष्य जान लें कि प्रकृति के नियम से भी वे उसकी सेवा करने के लिए बँधे हुए हैं। और यह घोषित करके कि उसने मानवजाति के एक छोटे से भाग के साथ उद्धार की वाचा बाँधी, और तम्बू को खड़ा करके अब्राहम की सन्तान को अपनी उपस्थिति का चिह्न दिया, ताकि इसके द्वारा उन्हें अपने उनके बीच वास करने का निश्चय दिलाए, वह उन्हें सिखाता है कि यदि वे उसके पवित्र परिवार के सदस्य गिने जाना चाहते हैं, तो उन्हें हृदय और हाथों की शुद्धता प्राप्त करने का यत्न करना होगा।

"Son contenu." — टिप्पणी, फ्रांसीसी हाशिया। "अर्थात्, उसकी सामग्री।"

"Qu'adonc ils entrerent en ferme et paisible possession de l'honneur que Dieu leur a fait par dessus les autres nations." — फ्रांसीसी.

भरपूरी शब्द के विषय में मैं स्वीकार करता हूँ कि इसके अन्तर्गत वह सारा धन सम्मिलित है जिससे पृथ्वी सुशोभित है, जैसा कि पौलुस के प्रमाण से सिद्ध होता है; परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि इस अभिव्यक्ति से भजनकार का अभिप्राय स्वयं मनुष्यों से है, जो पृथ्वी के सबसे उज्ज्वल आभूषण और महिमा हैं। यदि वे न रहें, तो पृथ्वी उजाड़ और सूनेपन का ऐसा दृश्य प्रस्तुत करेगी जो उससे कम भयानक न होगा, मानो परमेश्वर ने उसका अन्य सारा धन छीन लिया हो। इतने प्रकार के फल, और वे भी इतनी बहुतायत से, किस प्रयोजन से उत्पन्न होते हैं, और इतने सुहावने और मनोरम देश क्यों हैं, यदि वे मनुष्यों के उपयोग और सुख के लिए नहीं? इसी कारण दाऊद अगले वाक्यांश में स्पष्ट करता है कि वह मुख्यतः मनुष्यों के विषय में बोल रहा है। एक ही बात को दो बार दोहराना उसकी सामान्य शैली है, और यहाँ पृथ्वी की भरपूरी और जगत के निवासी, दोनों का एक ही अर्थ है। तौभी मैं इसका इनकार नहीं करता कि जिस धन से पृथ्वी मनुष्यों के उपयोग के लिए भरपूर है, वह भी इन अभिव्यक्तियों के अन्तर्गत आ जाता है। इसलिए पौलुस (1 कुरिन्थियों 10:26) भोजन-वस्तुओं के विषय में चर्चा करते हुए अपने तर्क के समर्थन में ठीक ही इस वचन को उद्धृत करता है, और यह प्रतिपादित करता है कि कोई भी भोजन अशुद्ध नहीं, क्योंकि "पृथ्वी और उसकी भरपूरी प्रभु की है।"

2. क्योंकि उसी ने उसकी नींव समुद्रों के ऊपर डाली। भजनकार यहाँ इस सत्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य उचित रूप से परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य के अधीन हैं, इसलिए सब स्थानों और सब देशों में उन्हें उसे राजा मानना चाहिए। और वह इसकी पुष्टि सृष्टि में प्रकट हुई व्यवस्था ही से करता है; क्योंकि परमेश्वर का अद्भुत विधान पृथ्वी के सम्पूर्ण रूप में स्पष्ट झलकता है। इसे सिद्ध करने के लिए वह ऐसा प्रमाण सामने लाता है जो अत्यन्त प्रत्यक्ष है। पृथ्वी जल के ऊपर कैसे दिखाई देती है, यदि इसलिए नहीं कि परमेश्वर ने जान-बूझकर मनुष्यों के लिए एक निवास तैयार करने का अभिप्राय रखा? स्वयं दार्शनिक भी स्वीकार करते हैं कि जल का तत्त्व पृथ्वी से ऊँचा होने के कारण, पृथ्वी के किसी भी भाग का जल से खुला और रहने योग्य बना रहना इन दोनों तत्त्वों के स्वभाव के विरुद्ध है। इसी कारण अय्यूब (अय्यूब 28:11, 25) भव्य शब्दों में उस विशेष आश्चर्यकर्म की प्रशंसा करता है जिसके द्वारा परमेश्वर समुद्र के प्रचण्ड और तूफ़ानी उफान को रोके रखता है, ताकि वह पृथ्वी को डुबा न दे; और यदि वह इस प्रकार रोका न जाता, तो तुरन्त ऐसा कर डालता और भयानक गड़बड़ी उत्पन्न कर देता। मूसा भी सृष्टि के वृत्तान्त में इसका उल्लेख करना नहीं भूलता। यह वर्णन करने के बाद कि जल ऐसा फैला हुआ था कि उसने सारी पृथ्वी को ढाँप लिया था, वह आगे कहता है कि परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा से वह एक स्थान में हट गया, ताकि उन जीवित प्राणियों के लिए खाली स्थान छोड़ दे जिनकी सृष्टि बाद में होनी थी (उत्पत्ति 1:9)। उस वचन से हम सीखते हैं कि मनुष्यों के अस्तित्व में आने से पहले ही परमेश्वर को उनकी चिन्ता थी, क्योंकि उसने उनके लिए निवास-स्थान और अन्य सुविधाएँ तैयार कीं; और उसने उन्हें पूर्ण परदेशी नहीं समझा, क्योंकि उसने उनकी आवश्यकताओं का प्रबन्ध उससे कम उदारता से नहीं किया जितनी उदारता से एक परिवार का पिता अपनी सन्तान के लिए करता है। जब दाऊद कहता है कि पृथ्वी की नींव समुद्रों के ऊपर डाली गई है, तो वह यहाँ पृथ्वी की स्थिति के विषय में दार्शनिक विवाद नहीं करता। वह लोक-प्रचलित भाषा का प्रयोग करता है, और अपने आप को अनपढ़ों की समझ के अनुकूल ढालता है। तौभी बोलने की यह रीति, जो आँखों से परखी जा सकनेवाली बातों से ली गई है, अकारण नहीं है। यह सच है कि पृथ्वी का तत्त्व, जहाँ तक वह गोलों के क्रम में सबसे निचला स्थान रखता है, जल के नीचे है; परन्तु पृथ्वी का बसने योग्य भाग जल के ऊपर है; और हम इस बात का कारण कैसे बताएँ कि जल का पृथ्वी से यह पृथक्करण स्थिर बना रहता है, यदि इसलिए नहीं कि परमेश्वर ने जल को मानो नींव के रूप में नीचे रख दिया है? अब, क्योंकि जगत की सृष्टि से ही परमेश्वर ने अपनी पितृवत् चिन्ता सारी मानवजाति तक फैलाई, इसलिए आदर का वह विशेषाधिकार, जिसके द्वारा यहूदी अन्य सब जातियों से बढ़कर थे, केवल उस स्वतन्त्र और सार्वभौम चुनाव से उत्पन्न हुआ जिसके द्वारा परमेश्वर ने उन्हें अलग किया।

"Car a quelle fin font produits des fruits de tant de sortes, et en telle abondance, et qu'il y a tant de vieux de plaisance, si non pour l'usage et commodite des hommes?" — फ्रांसीसी. "C'est contre la nature des deux elemens." — फ्रांसीसी.

3. कौन चढ़ेगा इत्यादि। यह भली-भाँति प्रसिद्ध होने के कारण कि परमेश्वर ने शुद्ध अनुग्रह ही से अपना पवित्रस्थान खड़ा किया, और यहूदियों के बीच अपने लिए एक निवास-स्थान चुना, दाऊद इस विषय का केवल मौन संकेत करता है।

वह मुख्य रूप से इस पद में निहित दूसरी बात पर बल देता है, अर्थात् सच्चे इस्राएलियों को झूठे और वर्णसंकरों से अलग पहचानने पर। जिस तर्क से वह यहूदियों को पवित्र और धर्मी जीवन बिताने के लिए उभारता है, वह इस बात से लिया गया है कि परमेश्वर ने उन्हें शेष संसार से अलग करके अपना निज भाग बनाया था। यह सच है कि शेष मानवजाति भी, क्योंकि उसी के द्वारा सृजी गई, उसके साम्राज्य से सम्बन्ध रखती है; परन्तु जो कलीसिया में स्थान पाता है, वह उससे और भी निकट सम्बन्ध रखता है। इसलिए जिन सब को परमेश्वर अपने झुण्ड में ग्रहण करता है, उन्हें वह पवित्रता के लिए बुलाता है; और अपने लेपालकपन के द्वारा वह उन्हें उसका अनुसरण करने के दायित्व में बाँध देता है। इसके अतिरिक्त, इन शब्दों के द्वारा दाऊद परोक्ष रूप से उन कपटियों को डाँटता है जो परमेश्वर का पवित्र नाम झूठमूठ अपने ऊपर लेने में कोई संकोच नहीं करते थे; जैसा कि हम जानते हैं, वे प्रायः उन उपाधियों के कारण घमण्ड से फूल जाते हैं जिन्हें वे उनमें निहित गुणों के बिना धारण कर लेते हैं, और केवल बाहरी पहचान-चिह्न धारण करने में ही सन्तुष्ट रहते हैं; वरन् वह जान-बूझकर परमेश्वर के इस अनुपम अनुग्रह की महिमा करता है, ताकि हर एक मनुष्य स्वयं सीख ले कि जब तक वह शुद्धता से परमेश्वर की सेवा करने के लिए अपने आप को पवित्र न करे, तब तक उसे पवित्रस्थान में प्रवेश करने या पहुँचने का कोई अधिकार नहीं। यह सच है कि अभक्त और दुष्ट लोग तम्बू में जाया करते थे; और इसी कारण परमेश्वर यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा (यशायाह 1:12) उन्हें इस बात के लिए धिक्कारता है कि वे अयोग्य रीति से उसके आँगनों में आते और उनके फ़र्श को रौंदते हैं। परन्तु दाऊद यहाँ उनके विषय में कहता है जो उचित रीति से परमेश्वर के पवित्रस्थान में प्रवेश कर सकते हैं। परमेश्वर का भवन पवित्र होने के कारण, यदि कोई ढिठाई से और बिना अधिकार के उसमें घुस पड़े, तो उनकी भ्रष्टता और दुरुपयोग उसे अशुद्ध करने के सिवा और कुछ नहीं। इसलिए क्योंकि वे वहाँ उचित रीति से नहीं चढ़ते, दाऊद उनके चढ़ने को कुछ भी नहीं गिनता; वरन् इन शब्दों में दुष्ट और अपवित्र मनुष्यों के इस आचरण की कड़ी भर्त्सना सम्मिलित है कि वे पवित्रस्थान में चढ़ने और अपनी अशुद्धता से उसे अपवित्र करने का दुस्साहस करते हैं। इस विषय पर मैं पन्द्रहवें भजन में अधिक विस्तार से कह चुका हूँ। पद के दूसरे भाग में वह दृढ़ बने रहने को सूचित करता प्रतीत होता है, मानो उसने कहा हो, कौन सिय्योन के पर्वत पर चढ़ेगा कि परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित हो और खड़ा रहे? यह सच है कि इब्रानी शब्द קום kum कभी-कभी उठने का अर्थ देता है, परन्तु सामान्यतः उसे खड़े रहने के अर्थ में लिया जाता है, जैसा कि हम पहले भजन में देख चुके हैं। और यद्यपि यह पिछले वाक्यांश में कहे गए उसी विचार की पुनरावृत्ति है, तौभी यह केवल पुनरावृत्ति नहीं; वरन् दाऊद उस लक्ष्य को व्यक्त करके जिसके लिए उन्हें चढ़ना चाहिए, विषय को स्पष्ट और विस्तृत करता है; और इस प्रकार की पुनरावृत्ति और विस्तार का प्रयोग हम उसे अन्य भजनों में भी प्रायः करते पाते हैं। संक्षेप में, दाऊद के समय में कलीसिया में दुष्ट लोग भले लोगों के साथ चाहे जितने भी मिले-जुले रहे हों, वह यह घोषित करता है कि जब तक साथ ही भीतरी मनुष्य में सच्चाई न हो, तब तक बाहरी अंगीकार करना कितनी व्यर्थ बात है। वाचा के तम्बू के विषय में वह जो कहता है, उसे कलीसिया के निरन्तर शासन पर लागू करना चाहिए।

"Il n'en fait yci que bien petite mention et comme en passant." — फ्रांसीसी. "वह यहाँ इस विषय का केवल हल्का-सा, और मानो चलते-चलते, उल्लेख करता है।" "Comme nous s'avons que c'est leur coustume de s'eslever par orgueil a cause des titres qu'ils prenent sans avoir l'effect, se contentans de porter seulement les marques par dehors." — फ्रांसीसी.

4. वही जिसके हाथ स्वच्छ और हृदय शुद्ध है। हाथों और हृदय की शुद्धता तथा परमेश्वर के नाम के प्रति श्रद्धा के अन्तर्गत वह सम्पूर्ण धर्म को समेट लेता है, और एक सुव्यवस्थित जीवन को सूचित करता है। निःसन्देह सच्ची शुद्धता का आसन हृदय में है, परन्तु वह अपने फल हाथों के कामों में प्रकट करती है। इसलिए भजनकार बहुत उचित रीति से शुद्ध हृदय के साथ सम्पूर्ण जीवन की शुद्धता को जोड़ता है; क्योंकि जो मनुष्य खरे हृदय का घमण्ड करता है, परन्तु अपने फलों से यह नहीं दिखाता कि जड़ अच्छी है, वह हास्यास्पद भूमिका निभाता है। दूसरी ओर, हाथों, पैरों और आँखों को धार्मिकता के नियम के अनुसार ढालना पर्याप्त न होगा, जब तक हृदय की शुद्धता बाहरी संयम से पहले न हो। यदि किसी को यह अनुचित लगे कि पहला स्थान हाथों को दिया गया है, तो हम बिना हिचकिचाहट उत्तर देते हैं कि प्रायः परिणामों का नाम उनके कारणों से पहले लिया जाता है; इसलिए नहीं कि वे क्रम में उनसे पहले आते हैं, परन्तु इसलिए कि कभी-कभी उन बातों से आरम्भ करना लाभदायक होता है जो सबसे अधिक जानी-पहचानी हैं। अतः दाऊद चाहता है कि यहूदी परमेश्वर के सम्मुख शुद्ध हाथ लाएँ, और उनके साथ निष्कपट हृदय भी। अपने प्राण को उठाना, या लेना, मुझे कोई सन्देह नहीं कि यहाँ शपथ खाने के अर्थ में रखा गया है। इसलिए यहाँ परमेश्वर के सेवकों से यह अपेक्षा की गई है कि जब वे शपथ खाएँ, तो श्रद्धा और शुद्ध विवेक के साथ खाएँ; और एक विशेष बात के द्वारा, उपलक्षण (synecdoche) से, जीवन के सब कार्यों में विश्वासयोग्यता और खराई बनाए रखने का कर्तव्य सूचित किया गया है। यहाँ शपथों का उल्लेख किया गया है, यह उन शब्दों से प्रकट होता है जो तुरन्त बाद आते हैं, और न कपट से शपथ खाई है, जो पूर्ववर्ती बात की व्याख्या के रूप में जोड़े गए हैं। परन्तु क्योंकि हिरेक (hirek) बिन्दु के कारण प्राण के लिए इब्रानी शब्द का दोहरा पाठ है, अर्थात् उसे मेरा प्राण या उसका प्राण पढ़ा जा सकता है, इसलिए कुछ यहूदी टीकाकार पढ़ते हैं, जिसने मेरे प्राण को व्यर्थ बात की ओर नहीं उठाया, और मेरा शब्द को परमेश्वर की ओर से कहा गया समझते हैं; यह ऐसी व्याख्या है जिसे मैं कठोर और खींची-तानी हुई मानकर अस्वीकार करता हूँ। यह बोलने की ऐसी रीति है जिसमें बड़ा बल है, क्योंकि इसका अर्थ यह है कि जो शपथ खाते हैं, वे अपने प्राणों को परमेश्वर के पास बन्धक के रूप में अर्पित करते हैं। तौभी कुछ लोग कदाचित् इस मत को अधिक पसन्द करें कि प्राण को उठाना उसे झूठ की ओर लगाने के अर्थ में रखा गया है; इस व्याख्या को अपनाने में मुझे कोई बड़ी आपत्ति नहीं, क्योंकि अर्थ में इससे थोड़ा ही अन्तर पड़ता है। यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है — यह पूछा जा सकता है कि दाऊद विश्वास और परमेश्वर से प्रार्थना करने के विषय में एक शब्द भी क्यों नहीं कहता। इसका कारण सहज ही समझाया जा सकता है। क्योंकि ऐसा कदाचित् ही होता है कि कोई मनुष्य अपने भाइयों के प्रति सीधाई और निर्दोषता से व्यवहार करे, जब तक वह परमेश्वर के सच्चे भय से ऐसा सम्पन्न न हो कि उसके सम्मुख सावधानी से चले, इसलिए दाऊद बहुत उचित रीति से मनुष्यों की परमेश्वर के प्रति भक्ति का अनुमान उनके संगी मनुष्यों के प्रति उनके आचरण के स्वरूप से लगाता है। इसी कारण मसीह (मत्ती 23:23) न्याय, दया और विश्वास को व्यवस्था की मुख्य बातें बताता है; और पौलुस "प्रेम" को कभी "व्यवस्था का सार" (1 तीमुथियुस 1:5) और कभी "सिद्धता का बन्धन" (कुलुस्सियों 3:14) कहता है।

भजन 24:5-6

5. वह यहोवा से आशीष, और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर से धार्मिकता पाएगा। 6. यही उसके खोजनेवालों की पीढ़ी है, उनकी जो तेरे मुख के खोजी हैं, हे याकूब! सेला।

"Par ainsi il est yci requis des serviteurs de Dieu, que quand ils jurent, ce soit avec reverence et en bonne conscience." — फ्रांसीसी. मूल पाठ में נפשו naphshiv, उसका प्राण, है; हाशिये का पाठ נפשו naphshi, मेरा प्राण, है। परन्तु मूल पाठ अपनी स्पष्टता और सरलता के कारण निःसन्देह सही है। हैमण्ड कहते हैं, "बिन्दु נפשת का अनुवाद मेरा प्राण करने का संकेत देते हैं, और इसी प्रकार अन्तर्रेखीय अनुवाद animam meam, मेरा प्राण या जीवन, पढ़ता है, मानो वह इस पद का वक्ता परमेश्वर को बना रहा हो, और तब यह परमेश्वर का जीवन या प्राण होता है। परन्तु मूल पाठ में ו लिखा है, י नहीं, और प्रसंग भी उसी से सहमत है; इसलिए तर्कसंगत रूप से बिन्दु-चिह्नों को पीछे हटना ही चाहिए; और तदनुसार सब प्राचीन अनुवादकों ने इसे נפשו उसका प्राण पढ़ा प्रतीत होता है, जिसका अर्थ है उसका अपना प्राण, अर्थात् शपथ खानेवाले का प्राण।"

"Asfavoir, Jacob." — फ्रांसीसी. "अर्थात्, याकूब।"

5. वह आशीष पाएगा। इस्राएलियों के मनों को और भी प्रभावशाली रीति से उभारने के लिए दाऊद घोषित करता है कि परमेश्वर के झुण्ड में गिने जाने और कलीसिया के सदस्य होने से बढ़कर वांछनीय कुछ भी नहीं। हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि सच्चे इस्राएलियों और उनमें से उन लोगों के बीच, जो पतित और वर्णसंकर थे, एक निहित विरोधाभास है। दुष्ट लोग अपने आप को जितनी अधिक छूट देते हैं, उतनी ही अधिक ढिठाई से वे परमेश्वर के नाम का दावा करते हैं, मानो वह उनका ऋणी हो, क्योंकि वे सच्चे विश्वासियों के समान ही बाहरी चिह्नों या पहचान-पट्टों से सुशोभित हैं। इसी कारण अगले पद का संकेतवाचक सर्वनाम यही बड़ा भार रखता है, क्योंकि यह उस समस्त वर्णसंकर पीढ़ी को स्पष्ट रूप से बाहर कर देता है जो केवल बाहरी विधियों के मुखौटे पर घमण्ड करती थी। और इस पद में जब वह आशीष की बात करता है, तो वह संकेत करता है कि प्रतिज्ञा की हुई आशीष के भागी वे नहीं होंगे जो केवल नाम रखते हुए परमेश्वर के सेवक होने का घमण्ड करते हैं, वरन् केवल वे ही होंगे जो सम्पूर्ण हृदय से और बिना कपट के अपनी बुलाहट के अनुरूप चलते हैं। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, जब विश्वासियों को यह निश्चय दिलाया जाता है कि धार्मिकता का अनुसरण करने में उनका परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर ने उनके लिए ऐसी आशीष रख छोड़ी है जो कभी विफल नहीं हो सकती, तो यह भक्ति और सीधे जीवन के लिए एक अत्यन्त प्रबल प्रेरणा होती है। धार्मिकता शब्द की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है। या तो इसका अर्थ परमेश्वर के वे सब उपकार हैं जिनके द्वारा वह अपनी प्रजा से की गई प्रतिज्ञाओं को पूरा करके उनके प्रति अपने आप को धर्मी और विश्वासयोग्य सिद्ध करता है, या यह विश्वासी की धार्मिकता के फल या प्रतिफल को सूचित करता है। वास्तव में दाऊद का अभिप्राय भरपूर स्पष्ट है। वह एक ओर यह दिखाना चाहता है कि जो लोग अधर्म से परमेश्वर की पवित्र आराधना को अपवित्र करते हैं, उन्हें धार्मिकता का फल या प्रतिफल मिलने की आशा नहीं करनी चाहिए; और दूसरी ओर यह कि परमेश्वर के लिए अपने सच्चे उपासकों को निराश करना असम्भव है; क्योंकि उनका भला करके अपनी धार्मिकता का प्रमाण देना उसका विशेष कार्य है।

6. यही पीढ़ी है। मैंने अभी-अभी कहा है कि संकेतवाचक सर्वनाम यही के द्वारा भजनकार परमेश्वर के सेवकों की सूची में से उन सब नकली इस्राएलियों के नाम मिटा देता है, जो केवल अपने ख़तने और पशुओं के बलिदानों पर भरोसा रखते हुए अपने आप को परमेश्वर को अर्पित करने की कोई चिन्ता नहीं करते; और फिर भी साथ ही वे ढिठाई से कलीसिया में घुस पड़ते हैं। ऐसे लोग बार-बार उसके मन्दिर में आकर परमेश्वर की सेवा में आनन्द रखने का दिखावा कर सकते हैं, परन्तु उनका और कोई अभिप्राय नहीं होता सिवाय इसके कि जहाँ तक हो सके अपने आप को उससे दूर रखें। अब, क्योंकि उनमें से हर एक के मुँह में इससे अधिक सामान्य बात और कोई न थी कि वे सब पवित्र वंश के हैं, इसलिए भजनकार ने पवित्र पीढ़ी का नाम व्यवस्था का सच्चाई से पालन करनेवालों तक सीमित कर दिया है; मानो उसने कहा हो, जितने शरीर के अनुसार अब्राहम से उत्पन्न हुए हैं, वे सब इस कारण उसकी वैध सन्तान नहीं हैं। निःसन्देह बहुत से अन्य स्थानों में, जैसा कि हम भजन 27 में देखेंगे, यह ठीक ही कहा गया है कि वे परमेश्वर के मुख के खोजी थे जो अपनी भक्ति की गवाही देने के लिए वाचा के सन्दूक के सामने विधियों का पालन करते थे; अर्थात्, यदि वे शुद्ध और पवित्र भावना से वहाँ लाए गए हों। परन्तु क्योंकि कपटी भी सच्चे पवित्र लोगों के समान एक प्रकार से बाहरी रीति से परमेश्वर को खोजते हैं, जबकि वे अपने टेढ़े-मेढ़े मार्गों और झूठे बहानों से उससे दूर भागते हैं, इसलिए दाऊद यहाँ घोषित करता है कि जब तक पवित्रता और धार्मिकता की उत्साहपूर्ण साधना पहले न हो, तब तक परमेश्वर को सच्चाई से नहीं खोजा जाता। इस वाक्य को अधिक बल देने के लिए वह इसे मध्यम पुरुष का प्रयोग करते हुए और अपनी बात परमेश्वर को सम्बोधित करते हुए दोहराता है। यह ऐसा है मानो वह उन कपटियों को परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुलाता हो, जो संसार के सामने परमेश्वर के नाम का झूठा प्रयोग करना कुछ नहीं समझते; और इस प्रकार वह हमें सिखाता है कि वे मनुष्यों के बीच अपनी खोखली बातों में चाहे जो कहें, परमेश्वर का न्याय बिल्कुल भिन्न बात होगी। उसी शिक्षा की पुष्टि के लिए वह याकूब शब्द जोड़ता है, और उसे उन लोगों के लिए रखता है जो याकूब के वंशज थे; मानो उसने कहा हो, यद्यपि ख़तना शरीर के अनुसार याकूब के सारे वंश को अन्यजातियों से अलग करता है, तौभी हम चुनी हुई प्रजा को केवल परमेश्वर के भय और श्रद्धा ही से पहचान सकते हैं, जैसा कि मसीह ने कहा, "देखो, यह सचमुच इस्राएली है, इसमें कपट नहीं!" (यूहन्ना 1:47)।

भजन 24:7-10

7. हे फाटको, अपने सिर ऊँचे करो! और हे सनातन के द्वारो, ऊँचे हो जाओ! और महिमा का राजा प्रवेश करेगा। 8. यह महिमा का राजा कौन है? यहोवा जो सामर्थी और पराक्रमी है, यहोवा जो युद्ध में पराक्रमी है। 9. हे फाटको, अपने सिर ऊँचे करो! हे सनातन के द्वारो, ऊँचे हो जाओ! और महिमा का राजा प्रवेश करेगा। 10. यह महिमा का राजा कौन है? सेनाओं का यहोवा, वही महिमा का राजा है। सेला।

7. हे फाटको, अपने सिर ऊँचे करो! क्योंकि मन्दिर की वह भव्य और शानदार इमारत, जिसमें तम्बू की अपेक्षा अधिक बाहरी प्रताप था, अभी तक खड़ी नहीं की गई थी, इसलिए दाऊद यहाँ उसके भावी निर्माण के विषय में बोलता है। ऐसा करके वह भक्त इस्राएलियों को उत्साहित करता है कि वे व्यवस्था की विधियों के पालन में और भी अधिक तत्परता और अधिक भरोसे के साथ लगे रहें। यह परमेश्वर की भलाई का कोई साधारण चिह्न नहीं था कि उसने अपनी उपस्थिति के एक दृश्य चिह्न के द्वारा उनके बीच वास करने की कृपा की, और यह चाहा कि उसका स्वर्गीय निवास-स्थान पृथ्वी पर दिखाई दे। यह शिक्षा आज के दिन हमारे लिए भी उपयोगी होनी चाहिए; क्योंकि यह परमेश्वर के अनमोल अनुग्रह का एक उदाहरण है कि जहाँ तक हमारे शरीर की दुर्बलता अनुमति देती है, धर्म के अभ्यासों के द्वारा हम परमेश्वर तक भी उठाए जाते हैं। वचन के प्रचार, संस्कारों, पवित्र सभाओं, और कलीसिया के सम्पूर्ण बाहरी शासन का उद्देश्य इसके सिवा और क्या है कि हम परमेश्वर से संयुक्त हों? इसलिए यह अकारण नहीं कि दाऊद व्यवस्था में ठहराई गई परमेश्वर की सेवा की इतनी ऊँची प्रशंसा करता है, क्योंकि परमेश्वर ने वाचा के सन्दूक में अपने पवित्र लोगों पर अपने आप को प्रकट किया, और इसके द्वारा उन्हें यह निश्चित प्रतिज्ञा-चिह्न दिया कि जब कभी वे सहायता के लिए उसे पुकारेंगे, तब वह शीघ्र उनकी सहायता करेगा। यह सच है कि परमेश्वर "हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता," और न वह बाहरी आडम्बर से प्रसन्न होता है; परन्तु क्योंकि यह उपयोगी था, और परमेश्वर की इच्छा भी यही थी, कि उसकी प्राचीन प्रजा, जो अनगढ़ और अभी अपनी बाल्यावस्था में थी, पार्थिव तत्त्वों के द्वारा उस तक उठाई जाए, इसलिए दाऊद यहाँ उनके विश्वास की पुष्टि के लिए मन्दिर के भव्य भवन को उनके सामने रखने में संकोच नहीं करता, ताकि उन्हें निश्चय दिलाए कि वह कोई व्यर्थ रंगमंच नहीं था; वरन् जब वे उसके वचन के ठहराव के अनुसार उसमें परमेश्वर की उचित आराधना करते, तो वे मानो उसकी उपस्थिति में खड़े होते, और वास्तव में अनुभव करते कि वह उनके निकट है। जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है कि जिस मात्रा में वह मन्दिर, जिसे परमेश्वर ने सिय्योन पर्वत पर अपने लिए बनाए जाने की आज्ञा दी थी, भव्यता में तम्बू से बढ़कर था, उसी मात्रा में वह यहूदियों के बीच वास करनेवाले परमेश्वर की महिमा और सामर्थ्य का और भी उज्ज्वल दर्पण होता। इसी बीच, जैसे दाऊद स्वयं मन्दिर के निर्माण की तीव्र अभिलाषा से जल रहा था, वैसे ही वह सब भक्तों के हृदयों को उसी प्रबल अभिलाषा से प्रज्वलित करना चाहता था, ताकि व्यवस्था की आरम्भिक शिक्षाओं की सहायता से वे परमेश्वर के भय में अधिकाधिक उन्नति करते जाएँ। वह फाटकों को सनातन कहता है, क्योंकि परमेश्वर की प्रतिज्ञा उनकी निरन्तर स्थिरता को सुनिश्चित करती थी। मन्दिर सामग्री और कारीगरी में उत्कृष्ट था, परन्तु उसकी मुख्य उत्कृष्टता इस बात में थी कि उस पर परमेश्वर की प्रतिज्ञा अंकित थी, जैसा कि हम भजन 132:14 में देखेंगे, "यह युग-युग के लिए मेरा विश्रामस्थान है।" फाटकों को सनातन कहकर, मुझे कोई सन्देह नहीं कि भजनकार साथ ही तम्बू और मन्दिर के बीच एक मौन विरोध भी दिखाता है। तम्बू का कोई निश्चित स्थायी ठिकाना कभी न था, वरन् समय-समय पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जाने के कारण वह एक बटोही के समान था। परन्तु जब सिय्योन पर्वत चुना गया और मन्दिर बनाया गया, तब परमेश्वर का वहाँ एक निश्चित और स्थिर निवास-स्थान होने लगा। मसीह के आगमन से वह दृश्य छाया लुप्त हो गई; और इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मन्दिर अब सिय्योन पर्वत पर दिखाई नहीं देता, क्योंकि अब वह इतना विशाल है कि सारे जगत को घेरे हुए है। यदि यह आपत्ति की जाए कि बाबुल की बँधुआई के समय वे फाटक, जिन्हें सुलैमान ने बनवाया था, ढा दिए गए, तो मैं उत्तर देता हूँ कि उस अस्थायी विनाश के होते हुए भी परमेश्वर का निर्णय अटल रहा; और उसी के बल से मन्दिर शीघ्र ही फिर से बनाया गया; जो ऐसा ही था मानो वह सदा अखण्ड बना रहा हो। सेप्तुआजिन्त ने अज्ञानता से इस वचन को बिगाड़ दिया है। इब्रानी शब्द ראשים rashim, जिसका अनुवाद हमने सिर किया है, निःसन्देह कभी-कभी लाक्षणिक रूप से प्रधानों के लिए लिया जाता है; परन्तु उसके साथ यहाँ जोड़ा गया तुम्हारे शब्द पर्याप्त रूप से दिखाता है कि हम इससे इसके सिवा कोई दूसरा अर्थ नहीं निकाल सकते — कि फाटक अपने सिर ऊँचे करें; अन्यथा हमें कहना पड़ेगा, तुम्हारे प्रधान। इसलिए कुछ लोग सोचते हैं कि यहाँ राजाओं और न्यायाधीशों को उनके कर्तव्य की चेतावनी दी गई है, जो यह है कि वे मार्ग खोलें और परमेश्वर को प्रवेश दें। यह व्याख्या आकर्षक तो है, परन्तु भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय और शब्दों से बहुत दूर है। सबसे बढ़कर, शब्दों के स्वाभाविक अर्थ से हम देख सकते हैं कि पोपवादियों ने उस भद्दी और हास्यास्पद धारणा की पुष्टि के लिए इस वचन का कितनी मूर्खता और नीचता से दुरुपयोग किया है, जिसके द्वारा वे मसीह को प्रवेश पाने के लिए अधोलोक के फाटक पर खटखटाते हुए प्रस्तुत करते हैं। इसलिए आओ, हम इससे यह सीखें कि परमेश्वर के पवित्र वचन को संयम और श्रद्धा के साथ बरतें, और उन पोपवादियों से घृणा करें जो अपनी घृणित अभक्ति के द्वारा उसे इस प्रकार बिगाड़ने और झुठलाने को मानो खेल समझते हैं।

"Lequel toutesfois ils fuyent par leurs destours et faux semblans." — फ्रांसीसी. वह पहले कहता है, "जो उसके खोजनेवाले हैं," और फिर, "जो तेरे मुख के खोजी हैं।"

8. यह महिमा का राजा कौन है? इत्यादि। जिन स्तुतियों के द्वारा यहाँ परमेश्वर की सामर्थ्य की महिमा की गई है, उनका उद्देश्य यहूदियों को यह बताना है कि वह अपने मन्दिर में निठल्ला नहीं बैठा था, वरन् उसने उसमें इसलिए निवास किया कि अपने आप को अपनी प्रजा की सहायता के लिए तत्पर दिखाए। ध्यान देने योग्य है कि प्रश्न में और उसी वाक्य की पुनरावृत्ति में, दोनों में, बड़ा बल है। भविष्यद्वक्ता एक चकित होनेवाले व्यक्ति का रूप धारण करता है, ताकि इसके द्वारा और भी अधिक प्रभाव के साथ यह व्यक्त करे कि परमेश्वर अपनी प्रजा को सम्भालने और बचाने, और विश्वासियों को अपनी छाया तले सुरक्षित रखने के लिए अजेय सामर्थ्य से सुसज्जित होकर आता है। हम पहले कह चुके हैं कि जब परमेश्वर के मन्दिर में वास करने की बात कही जाती है, तो इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि उसका अनन्त और अगम्य सार उसमें बन्द या सीमित कर दिया गया था; वरन् यह कि वह अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह के द्वारा वहाँ उपस्थित था, जैसा कि उस प्रतिज्ञा में निहित है जो उसने मूसा से की थी, "जहाँ जहाँ मैं अपने नाम का स्मरण कराऊँ वहाँ वहाँ मैं आकर तुझे आशीष दूँगा" (निर्गमन 20:24)।

यह कोई व्यर्थ और खोखली प्रतिज्ञा न थी, वरन् परमेश्वर सचमुच प्रजा के बीच वास करता था, इसका अनुभव उन विश्वासियों ने किया जिन्होंने उसे अन्धविश्वास से नहीं खोजा, मानो वह मन्दिर से बँधा हुआ हो, परन्तु जिन्होंने मन्दिर का और उसमें होनेवाली सेवा का उपयोग अपने हृदयों को स्वर्ग की ओर उठाने के लिए किया। जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है कि जब कभी प्रजा मन्दिर में परमेश्वर को पुकारती, तो उसके पश्चात् होनेवाले परिणाम से यह प्रत्यक्ष हो जाता कि वाचा का सन्दूक परमेश्वर की उपस्थिति का कोई व्यर्थ और भ्रामक चिह्न नहीं था, क्योंकि वह अपनी प्रजा की रक्षा और बचाव के लिए सदा अपनी सर्वशक्तिमान भुजा बढ़ाता। यह पुनरावृत्ति हमें सिखाती है कि सच्चे विश्वासी इस विषय पर मनन करने में कभी अत्यधिक स्थिर और परिश्रमी नहीं हो सकते। परमेश्वर का पुत्र, हमारे शरीर को धारण करके, अब अपने आप को महिमा का राजा और सेनाओं का प्रभु प्रकट कर चुका है; और वह अपने मन्दिर में केवल छायाओं और प्रतीकों के द्वारा नहीं, वरन् वास्तव में और सचमुच प्रवेश कर चुका है, ताकि वह हमारे बीच वास करे। इसलिए हमें यह घमण्ड करने से कोई भी बात नहीं रोकती कि उसकी सामर्थ्य से हम अजेय होंगे। यह सच है कि सिय्योन पर्वत आज पवित्रस्थान के लिए ठहराया गया स्थान नहीं है, और वाचा का सन्दूक अब करूबों के बीच वास करनेवाले परमेश्वर की प्रतिमा या प्रतिरूप नहीं रहा; परन्तु क्योंकि हमें पूर्वजों के साथ यह विशेषाधिकार समान रूप से प्राप्त है कि वचन के प्रचार और संस्कारों के द्वारा हम परमेश्वर से संयुक्त हो सकते हैं, इसलिए हमें इन सहायताओं का श्रद्धा के साथ उपयोग करना उचित है; क्योंकि यदि हम घृणित घमण्ड से इन्हें तुच्छ जानें, तो परमेश्वर अन्ततः अपने आप को हम से पूरी तरह अलग किए बिना नहीं रह सकता।

सेप्तुआजिन्त पढ़ता है, Αρατε πύλὰς οἱἄρχοντες ὑμῶν, जिसका अनुवाद यह किया जा सकता है, "हे प्रधानो, अपने फाटकों को ऊँचा करो।" वुल्गाता का पाठ भी ऐसा ही है: "Attollite portas principes vestras"; और अरबी तथा इथियोपियाई पाठ भी ऐसे ही हैं। परन्तु जैसा कैल्विन ठीक ही कहता है, वह अनुवाद अग्राह्य है; क्योंकि इब्रानी पाठ में प्रत्यय כם kem, तुम्हारे, ראשי roshey, सिर, के साथ जुड़ा है, שערים shearim, फाटक, के साथ नहीं। तौभी यद्यपि सेप्तुआजिन्त के पाठ का अनुवाद ऊपर दिए अनुसार, "हे प्रधानो, अपने फाटकों को ऊँचा करो," किया जा सकता है, हैमण्ड का विचार है कि अधिक सम्भावना यह है कि अनुवादकों ने οἱἄρχοντες ὑμῶν, तुम्हारे प्रधान, को ראשיכם rashekem का प्रतिरूप ठहराने का अभिप्राय रखा, मानो उन्होंने भूल से वाक्य-रचना को उलट दिया हो, और "तुम्हारे सिर" को ऐसा लिया हो कि यह पाठ बन जाए, "तुम्हारे सिर, या प्रधान, फाटकों को ऊँचा करें," इसके स्थान पर कि "हे फाटको, अपने सिर ऊँचे करो।"

"Par lesquels ils introduissent Christ frappant a la porte pour entrer les enfers." — फ्रांसीसी.

"Qui comme sacrileges execrables tienent pour jeu de la corrompre et falsifier en ceste sorte." — फ्रांसीसी.

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