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भजन 23
भजन 23.
इस भजन में न तो प्रार्थनाएँ मिली हुई हैं, और न यह छुटकारा पाने के उद्देश्य से दुःखों की शिकायत करता है; परन्तु इसमें केवल धन्यवाद है, जिससे प्रकट होता है कि यह उस समय रचा गया जब दाऊद ने राज्य पर शान्तिपूर्ण अधिकार पा लिया था, और समृद्धि में, तथा उन सब वस्तुओं का आनन्द लेते हुए जीवन बिता रहा था जिनकी वह इच्छा कर सकता था। इसलिए कि वह अपनी बड़ी समृद्धि के समय उन सांसारिक मनुष्यों के समान न हो जाए, जो अपने को भाग्यवान समझते ही परमेश्वर को विस्मृति में गाड़ देते हैं और विलासिता से अपने सुख-भोगों में डूब जाते हैं, वह परमेश्वर में, जो उन सब आशीषों का कर्ता है जिनका वह आनन्द ले रहा था, आनन्दित होता है। और वह न केवल यह स्वीकार करता है कि जिस शान्ति की दशा में वह अब जी रहा है, और सब असुविधाओं और कष्टों से जो उसका छुटकारा है, वह परमेश्वर की भलाई के कारण है; परन्तु वह यह भी भरोसा रखता है कि उसके विधान के द्वारा वह अपने जीवन के अन्त तक सुखी बना रहेगा, और इस उद्देश्य से कि वह अपने आप को उसकी शुद्ध आराधना में लगाए रखे।
दाऊद का भजन।
भजन 23:1-4 "Lesquels ayans le vent a gre, comme on dit." — फ्रांसीसी. "जिनकी हवा उनके मन के अनुकूल बह रही है, जैसा कि कहावत है।"
1. यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी। 2. वह मुझे घास की चराइयों में बैठाता है; वह मुझे धीरे-धीरे बहनेवाले जल के पास ले चलता है। 3. वह मेरे प्राण को फेर लाता है; वह अपने नाम के निमित्त धार्मिकता के मार्गों में मेरी अगुवाई करता है। 4. चाहे मैं मृत्यु की छाया की तराई में होकर चलूँ, तौभी मैं किसी हानि से न डरूँगा: क्योंकि तू मेरे साथ है; तेरी लाठी और तेरा सोंटा मुझे शान्ति देते हैं।
1. यहोवा मेरा चरवाहा है। यद्यपि परमेश्वर अपने उपकारों के द्वारा, मानो अपनी पितृतुल्य मधुरता का स्वाद चखाकर, हमें कोमलता से अपनी ओर खींचता है, तौभी जब हम शान्ति और सुख का आनन्द ले रहे होते हैं, तब उसे भूल जाने से अधिक सहज रीति से हम और किसी बात में नहीं गिरते। हाँ, समृद्धि बहुतों को न केवल इतना मतवाला कर देती है कि वे अपने आमोद-प्रमोद में सब सीमाओं को लाँघ जाते हैं, वरन् वह उद्दण्डता भी उत्पन्न करती है, जो उन्हें घमण्ड से परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े होने और फूट पड़ने को प्रेरित करती है। इसी कारण, जो लोग परमेश्वर की अच्छी वस्तुओं का बहुतायत से आनन्द लेते हैं, उनमें से कठिनाई से सौवाँ भाग भी ऐसा होगा जो अपने आप को उसके भय में बनाए रखता हो, और उस नम्रता और संयम के अभ्यास में जीवन बिताता हो जो इतना शोभायमान होता। इस कारण हमें उस उदाहरण पर और भी अधिक सावधानी से ध्यान देना चाहिए जो दाऊद के द्वारा यहाँ हमारे सामने रखा गया है, जो सर्वोच्च राजसत्ता की गरिमा तक ऊँचा उठाया गया, धन और सम्मान के वैभव से घिरा हुआ था, सांसारिक अच्छी वस्तुओं की सबसे बड़ी बहुतायत का स्वामी था, और राजसी सुख-भोगों के बीच रहता था, तौभी न केवल यह गवाही देता है कि वह परमेश्वर को स्मरण रखता है, वरन् उन उपकारों को स्मरण करके जो परमेश्वर ने उस पर किए थे, उन्हें ऐसी सीढ़ियाँ बना लेता है जिनके द्वारा वह उसके और निकट चढ़ सके। इस रीति से वह न केवल अपने शरीर की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाता है, वरन् अपने आप को कृतज्ञता और भक्ति के अन्य अभ्यासों के लिए और भी अधिक उत्साह से उभारता है, जैसा कि भजन के अन्तिम वाक्य से प्रकट होता है, जहाँ वह कहता है, "मैं दीर्घ काल तक यहोवा के धाम में वास करूँगा।" इसी प्रकार 18वें भजन में, जो उसके जीवन के उस समय रचा गया था जब चारों ओर से उसकी प्रशंसा हो रही थी, उसने अपने आप को परमेश्वर का दास कहकर उस नम्रता और हृदय की सरलता को प्रकट किया जो उसने प्राप्त की थी, और साथ ही परमेश्वर की स्तुति के गुणगान में अपने आप को लगाकर खुले रूप से अपनी कृतज्ञता की गवाही दी।
"Le Seigneur est mon pasteur, porquoy je n'auray faute de rien." — फ्रांसीसी. "प्रभु मेरा चरवाहा है, इसलिए मुझे किसी वस्तु की घटी न होगी।"
"Il me mene aux eaux quoyes." — फ्रांसीसी. "वह मुझे शान्त [अथवा स्थिर] जल के पास ले चलता है।"
"Qui se contiene en la crainte de Dieu se selon la modestie et temperance qui seroit requise." — फ्रांसीसी.
"Mais rememorant les benefices qu'il repoit de luy." — फ्रांसीसी.
चरवाहे के दृष्टान्त के द्वारा वह उस देखभाल की सराहना करता है जो परमेश्वर ने अपने विधान में उसके प्रति की थी। उसके शब्दों का आशय यह है कि परमेश्वर ने उसकी उतनी ही चिन्ता की जितनी एक चरवाहा उन भेड़ों की करता है जो उसके हाथ सौंपी गई हैं। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर बार-बार चरवाहे का नाम अपने ऊपर लेता और उसका स्वरूप धारण करता है, और यह हमारे प्रति उसके कोमल प्रेम का कोई तुच्छ चिह्न नहीं है। चूँकि यह बोलने की एक दीन और घरेलू रीति है, इसलिए जो हमारे लिए इतना नीचे झुकने से घृणा नहीं करता, उसका हमारे प्रति प्रेम अवश्य ही असाधारण रूप से प्रबल होगा। इसलिए यह आश्चर्य की बात है कि जब वह इतनी कोमलता और आत्मीयता से हमें अपने पास बुलाता है, तब हम उसकी ओर खिंचते या आकर्षित नहीं होते, कि उसकी रखवाली में सुरक्षा और शान्ति से विश्राम करें। परन्तु यह ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर केवल उन्हीं का चरवाहा है जो अपनी निर्बलता और दरिद्रता के बोध से द्रवित होकर उसकी रक्षा की आवश्यकता अनुभव करते हैं, और जो स्वेच्छा से उसके भेड़शाले में बने रहते हैं, और अपने आप को उसके द्वारा शासित होने के लिए सौंप देते हैं। दाऊद, जो सामर्थ्य और धन दोनों में श्रेष्ठ था, तौभी उसने खुले मन से स्वीकार किया कि वह एक दीन भेड़ है, ताकि वह परमेश्वर को अपना चरवाहा पा सके। तो फिर हम में से कौन है जो अपने आप को इस आवश्यकता से मुक्त ठहराए, जबकि हमारी अपनी निर्बलता पर्याप्त रूप से दिखाती है कि यदि हम इस चरवाहे की रक्षा में न जीएँ तो हम अत्यन्त दयनीय से भी बढ़कर हैं? हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारा सुख इसी में है कि उसका हाथ हम पर शासन करने के लिए बढ़ा हुआ है, कि हम उसकी छाया में जीते हैं, और कि उसका विधान हमारे कल्याण पर पहरा और चौकसी रखता है। इसलिए यद्यपि हमारे पास सब सांसारिक अच्छी वस्तुओं की बहुतायत हो, तौभी हमें निश्चय जानना चाहिए कि जब तक परमेश्वर हमें अपने झुण्ड में गिनने की कृपा न करे, तब तक हम सचमुच सुखी नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त, हम परमेश्वर को चरवाहे का पद उचित और यथोचित सम्मान के साथ तभी देते हैं जब हमें यह निश्चय हो कि केवल उसका विधान ही हमारी सब आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। जैसे वे लोग, जो बाहरी अच्छी वस्तुओं की सबसे बड़ी बहुतायत का आनन्द लेते हैं, यदि परमेश्वर उनका चरवाहा न हो तो खाली और भूखे हैं; वैसे ही इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिन्हें उसने अपनी देखरेख में ले लिया है, उन्हें सब अच्छी वस्तुओं की भरपूर बहुतायत की घटी न होगी। इसलिए दाऊद घोषणा करता है कि उसे किसी वस्तु की घटी का भय नहीं, क्योंकि परमेश्वर उसका चरवाहा है।
2. वह मुझे घास की चराइयों में बैठाता है। शब्दों के विषय में, इब्रानी में चराइयाँ, अथवा घास के मैदान है, जिसका अर्थ है हरी-भरी और उपजाऊ भूमि। कुछ लोग נאות neoth शब्द का, जिसका अनुवाद हमने चराइयाँ किया है, अनुवाद चरवाहों की झोंपड़ियाँ या डेरे करते हैं। यदि यह अनुवाद अधिक उचित समझा जाए, तो भजनकार का अर्थ यह होगा कि उपजाऊ चरागाहों में भेड़शाले तैयार किए गए थे, जिनके नीचे वह सूर्य की गर्मी से बचाया जा सके। यदि ठण्डे देशों में भी कभी-कभी पड़नेवाली अत्यधिक गर्मी भेड़ों के झुण्ड के लिए कष्टदायक होती है, तो यहूदिया जैसे गरम प्रदेश में भेड़शालों के बिना वे ग्रीष्म की गर्मी को कैसे सह सकती थीं?
"Que sa seule providence est suffisante pour nous administrer toutes nos necessitez." — फ्रांसीसी.
क्रिया רבף rabats, लेटना, अथवा विश्राम करना, उसी बात की ओर संकेत करती प्रतीत होती है। दाऊद ने धीरे-धीरे बहनेवाले जल को व्यक्त करने के लिए शान्त जल वाक्यांश का प्रयोग किया है; क्योंकि तेज़ धाराएँ भेड़ों के पीने के लिए असुविधाजनक होती हैं, और अधिकतर हानिकारक भी होती हैं। इस पद में, और आगे के पदों में, वह पहले पद के अन्तिम वाक्यांश, मुझे कुछ घटी न होगी, की व्याख्या करता है। वह बताता है कि परमेश्वर ने उसकी सब आवश्यकताओं की कितनी भरपूरी से व्यवस्था की थी, और वह ऐसा उस तुलना को छोड़े बिना करता है जिसका प्रयोग उसने आरम्भ में किया था। जो कहा गया है उसका सार यह है कि स्वर्गीय चरवाहे ने ऐसी कोई बात नहीं छोड़ी जो उसकी देखरेख में उसे सुख से जीने में सहायक हो सकती थी। इसलिए वह वर्तमान जीवन के प्रयोजनों के लिए आवश्यक सब वस्तुओं की उस बड़ी बहुतायत की, जिसका वह आनन्द लेता था, तुलना घास से भरपूर ढके हुए मैदानों से, और धीरे-धीरे बहनेवाली जलधाराओं से करता है; अथवा वह ऐसी वस्तुओं के लाभ या उपयोगिता की तुलना भेड़शालों से करता है; क्योंकि उपजाऊ चरागाह में चराया जाना और तृप्त किया जाना पर्याप्त न होता, यदि पीने के लिए जल और उसे ठण्डक और ताज़गी देने के लिए भेड़शाले की छाया का भी प्रबन्ध न किया गया होता।
3. वह मेरे प्राण को फेर लाता है। जैसे एक अच्छे चरवाहे का कर्तव्य है कि अपनी भेड़ों का पालन-पोषण करे, और जब वे रोगी या निर्बल हों तो उनकी सेवा-टहल करे और उन्हें सँभाले, वैसे ही दाऊद घोषणा करता है कि परमेश्वर ने उसके साथ इसी रीति से व्यवहार किया। प्राण का फेर लाना, जैसा हमने अनुवाद किया है, अथवा प्राण का लौटाना, जैसा इसका शाब्दिक अनुवाद है, उसका वही आशय है जो नया बनाना, अथवा पुनः स्वस्थ करना का है, जैसा कि 19वें भजन के सातवें पद में पहले ही बताया जा चुका है।
धार्मिकता के मार्गों से उसका अभिप्राय सरल और समतल मार्गों से है। चूँकि वह अब भी अपने रूपक को जारी रखता है, इसलिए इसे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के सन्दर्भ में समझना अनुचित होगा। उसने थोड़ा पहले कहा है कि परमेश्वर वर्तमान जीवन के निर्वाह के लिए आवश्यक सब कुछ उदारता से उसे देता है, और अब वह आगे कहता है कि वह उसके द्वारा सब कष्टों से बचाया जाता है। जो कहा गया है उसका सार यह है कि परमेश्वर किसी भी बात में अपने लोगों के प्रति कमी नहीं करता, क्योंकि वह अपनी सामर्थ्य से उन्हें सँभालता, उन्हें बल देता और जिलाता है, और जो कुछ हानिकारक है उसे उनसे दूर रखता है, ताकि वे समतल और सीधे मार्गों में निश्चिन्त होकर चल सकें। फिर भी, इसलिए कि वह अपनी योग्यता या पुण्य को कुछ भी श्रेय न दे, दाऊद परमेश्वर की भलाई को इतनी बड़ी उदारता का कारण बताता है, और घोषणा करता है कि परमेश्वर ये सब वस्तुएँ उसे अपने नाम के निमित्त देता है। और निश्चय ही, उसका हमें अपनी भेड़ें होने के लिए चुनना, और हमारे प्रति चरवाहे के सब कर्तव्यों को पूरा करना, ऐसी आशीष है जो पूर्णतः उसकी सेंत-मेंत और प्रभुतापूर्ण भलाई से निकलती है, जैसा कि हम पैंसठवें भजन में देखेंगे। [टिप्पणी 534: वॉलफ़र्ड इस मत को अपनाता है और उसका समर्थन करता है। उसका पाठ है, "वह सीधे मार्गों में मेरी अगुवाई करता है।" वह कहता है, "यह अनुवाद कदाचित् पाठक की भावनाओं को पूर्णतः रुचिकर न लगे, क्योंकि वह अंग्रेज़ी बाइबल में एक भिन्न अभिव्यक्ति का अभ्यस्त है। परन्तु बिम्ब-विधान की संगति इस परिवर्तन की माँग करती है; अन्यथा हमारे सामने भौतिक और नैतिक रूपकों का एक बेमेल मिश्रण आ जाता है। एक सावधान चरवाहा अपनी भेड़ों को हरी-भरी चराइयों में ले जाता है, उन्हें शान्त जल के निकट ले चलता है, थक जाने पर उन्हें ताज़गी के साधन देता है, और उन्हें ऊबड़-खाबड़ और टेढ़े-मेढ़े मार्गों से हटाकर ऐसे मार्गों पर ले चलता है जो सीधे और सुगम हों।"]
4. चाहे मैं चलूँ। सच्चे विश्वासी, यद्यपि परमेश्वर की रक्षा में सुरक्षित वास करते हैं, तौभी अनेक खतरों के सामने खुले रहते हैं, वरन् वे उन सब विपत्तियों के अधीन हैं जो सामान्य रूप से मनुष्यजाति पर आती हैं, ताकि वे और भी अच्छी रीति से अनुभव करें कि उन्हें परमेश्वर की रक्षा की कितनी आवश्यकता है। इसलिए दाऊद यहाँ स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि यदि उस पर कोई विपत्ति आ पड़े, तो वह परमेश्वर के विधान पर टेक लगाएगा। इस प्रकार वह अपने आप से निरन्तर सुख-भोगों की प्रतिज्ञा नहीं करता; परन्तु वह परमेश्वर की सहायता से अपने आप को दृढ़ करता है कि उन विविध विपत्तियों को साहस के साथ सहे जो उस पर आ सकती हैं। अपने रूपक को जारी रखते हुए, वह उस देखभाल की, जो परमेश्वर सच्चे विश्वासियों पर शासन करने में करता है, तुलना चरवाहे की लाठी और सोंटे से करता है, और घोषणा करता है कि वह इसी से सन्तुष्ट है, मानो यह उसके जीवन की रक्षा के लिए सर्वथा पर्याप्त है। जैसे एक भेड़, जब वह किसी अन्धेरी तराई में इधर-उधर भटकती है, केवल चरवाहे की उपस्थिति के द्वारा जंगली पशुओं के आक्रमणों से और अन्य प्रकार की हानि से सुरक्षित रखी जाती है, वैसे ही दाऊद अब घोषणा करता है कि जब-जब वह किसी खतरे के सामने होगा, तब-तब परमेश्वर की चरवाही देखरेख में होने के कारण उसे पर्याप्त बचाव और रक्षा प्राप्त होगी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अपनी समृद्धि में वह कभी नहीं भूला कि वह मनुष्य है, वरन् उस समय भी वह समय रहते उन विपत्तियों पर मनन करता था जो बाद में उस पर आ सकती थीं। और निश्चय ही, जब परमेश्वर को क्रूस के द्वारा हमें अभ्यास कराना भाता है, तब हम इतने भयभीत इसलिए होते हैं क्योंकि हर एक मनुष्य, गहरी और निर्विघ्न नींद सोने के लिए, अपने आप को शारीरिक निश्चिन्तता में लपेट लेता है। परन्तु मूर्खता की इस नींद और उस विश्राम के बीच, जो विश्वास उत्पन्न करता है, बड़ा अन्तर है। चूँकि परमेश्वर विपत्ति के द्वारा विश्वास को परखता है, इसलिए इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी परमेश्वर पर सच्चा भरोसा नहीं रखता, सिवाय उसके जो उन सब भयों का सामना करने के लिए, जिनसे उस पर आक्रमण हो सकता है, अजेय दृढ़ता से सुसज्जित है। तौभी दाऊद का यह कहना अभिप्राय नहीं था कि वह सब भय से रहित था, परन्तु केवल यह कि वह उस पर ऐसी विजय पाएगा कि जहाँ कहीं उसका चरवाहा उसे ले जाए, वहाँ वह निर्भय होकर जाएगा। यह प्रसंग से और भी स्पष्ट प्रकट होता है। वह पहले कहता है, मैं किसी हानि से न डरूँगा; परन्तु तुरन्त इसका कारण जोड़ते हुए, वह खुले रूप से स्वीकार करता है कि वह अपने चरवाहे की लाठी पर मनन करने और उस पर अपनी आँखें लगाए रखने में अपने भय का उपचार ढूँढ़ता है: क्योंकि तेरी लाठी और तेरा सोंटा मुझे शान्ति देते हैं। यदि वह भय से व्याकुल और विचलित न होता, तो उसे उस सान्त्वना की क्या आवश्यकता होती? इसलिए यह स्मरण रखना चाहिए कि जब दाऊद ने उन विपत्तियों पर विचार किया जो उस पर आ सकती थीं, तब वह किसी और रीति से नहीं, केवल अपने आप को परमेश्वर की रक्षा पर डाल देने के द्वारा ही भय और परीक्षाओं पर विजयी हुआ। यह बात उसने पहले भी, यद्यपि कुछ अधिक अस्पष्टता से, इन शब्दों में कही थी, क्योंकि तू मेरे साथ है। इसका आशय यह है कि वह भय से पीड़ित हुआ था। यदि ऐसा न होता, तो वह किस प्रयोजन से परमेश्वर की उपस्थिति की इच्छा करता? [टिप्पणी 535: "Celuy qui est arme d'une constance invincible pour resister a toutes les fraycurs qui penvent survenir." — फ्रांसीसी.]
इसके अतिरिक्त, वह परमेश्वर की रक्षा को केवल जीवन की सामान्य और साधारण विपत्तियों के विरुद्ध ही नहीं रखता, वरन् उनके विरुद्ध भी जो मृत्यु के अन्धकार से मनुष्यों के मन को व्याकुल और भ्रमित कर देती हैं। क्योंकि यहूदी व्याकरणाचार्य समझते हैं कि צלמות tsalmaveth, जिसका अनुवाद हमने मृत्यु की छाया किया है, एक समस्त शब्द है, मानो कोई कहे प्राणघातक छाया।
दाऊद यहाँ जंगली पशुओं की अन्धेरी कन्दराओं या माँदों की ओर संकेत करता है, जिनके निकट जब कोई व्यक्ति पहुँचता है, तो प्रवेश करते ही वह अचानक मृत्यु की आशंका और भय से जकड़ लिया जाता है। अब, चूँकि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में अपने आप को हमारे चरवाहे के रूप में उससे कहीं अधिक स्पष्टता से प्रकट किया है जितना उसने प्राचीन काल में व्यवस्था के अधीन रहनेवाले पूर्वजों पर किया था, इसलिए यदि हम उसकी रक्षक देखभाल को निहारने के लिए अपनी आँखें न उठाएँ, और उन्हें उस पर लगाए रखकर सब भयों और आतंकों को अपने पाँवों तले न रौंदें, तो हम उसे पर्याप्त आदर नहीं देते।
भजन 23:5-6
5. तू मेरे सतानेवालों के सामने मेरे लिये मेज़ बिछाएगा; तू मेरे सिर पर तेल मलेगा; मेरा कटोरा उमड़ रहा है। 6. निश्चय भलाई और करुणा जीवन भर मेरे साथ-साथ बनी रहेंगी; और मैं दीर्घ काल तक यहोवा के धाम में वास करूँगा।
5. तू बिछाएगा। ये शब्द, जो भविष्यत् काल में रखे गए हैं, यहाँ एक निरन्तर कार्य को सूचित करते हैं। इसलिए दाऊद अब बिना किसी रूपक के वही बात दोहराता है जो उसने अब तक चरवाहे के दृष्टान्त के द्वारा परमेश्वर की उदारता के विषय में घोषित की है। वह हमें बताता है कि उसकी उदारता के द्वारा उसे इस जीवन के निर्वाह के लिए आवश्यक सब कुछ दिया जाता है। जब वह कहता है, तू मेरे लिये मेज़ बिछाता है, तो उसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर ने उसकी ओर से बिना किसी परिश्रम या कठिनाई के उसे भोजन दिया, ठीक वैसे ही जैसे कोई पिता अपने बच्चे को भोजन देने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। वह इस उपकार को इस अतिरिक्त विचार से और भी बढ़ाकर बताता है कि यद्यपि अनेक द्वेषी लोग उसके सुख से डाह करते हैं, और उसका विनाश चाहते हैं, हाँ, उसे परमेश्वर की आशीष से वंचित करने का यत्न करते हैं; तौभी परमेश्वर उसके प्रति अपनी उदारता दिखाने और उसका भला करने से नहीं रुकता। तेल के विषय में जो वह आगे जोड़ता है, वह उस प्रथा की ओर संकेत करता है जो उस समय प्रचलित थी। हम जानते हैं कि प्राचीन काल में अधिक भव्य भोजों में सुगन्धित तेलों का प्रयोग होता था, और कोई भी मनुष्य यह नहीं समझता था कि उसने अपने अतिथियों का आदर के साथ स्वागत किया है यदि उसने उन्हें उनसे सुगन्धित न किया हो। अब, तेल के इस उमड़ते भण्डार की, और इस उमड़ते कटोरे की भी, व्याख्या उस बहुतायत को सूचित करनेवाली समझनी चाहिए जो जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की मात्र पूर्ति से आगे बढ़ जाती है; क्योंकि यह उस राजकीय सम्पत्ति की प्रशंसा में कहा गया है जिससे, जैसा कि पवित्र इतिहासकार लिखता है, दाऊद भरपूर रूप से सम्पन्न किया गया था। यह सच है कि सब मनुष्यों के साथ उसी उदारता का व्यवहार नहीं किया जाता जिससे दाऊद के साथ किया गया; परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो उन उपकारों के कारण, जो परमेश्वर ने उस पर किए हैं, परमेश्वर का ऋणी न हो, यहाँ तक कि हम यह स्वीकार करने को बाध्य हैं कि वह अपने सब लोगों के लिए एक दयालु और उदार पिता है। इस बीच, हम में से हर एक अपने आप को परमेश्वर के उपकारों के लिए उसके प्रति कृतज्ञता में उभारे; और जितनी अधिक बहुतायत से वे हम पर किए गए हैं, उतनी ही अधिक हमारी कृतज्ञता होनी चाहिए। यदि वह मनुष्य कृतघ्न है जिसके पास केवल एक मोटी रोटी है और वह उसमें परमेश्वर के पितृतुल्य विधान को नहीं पहचानता, तो उन लोगों की मूर्खता कितनी कम सहन की जा सकती है जो परमेश्वर की अच्छी वस्तुओं की उस बड़ी बहुतायत से, जो उनके पास है, अपने आप को ठूँस-ठूँसकर भरते हैं, और अपने प्रति उसकी भलाई का कोई बोध या स्वाद नहीं रखते? इसलिए दाऊद अपने उदाहरण के द्वारा धनवानों को उनके कर्तव्य की चेतावनी देता है, कि परमेश्वर उन्हें जितनी अधिक सुकुमारता से खिलाता है, उतना ही अधिक उत्साह से वे उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करें। और भी, हमें स्मरण रखना चाहिए कि जिनके पास दूसरों से अधिक बहुतायत है, वे संयम रखने के लिए उतने ही बाध्य हैं जितने कि तब होते जब उनके पास इस जीवन की अच्छी वस्तुएँ केवल उतनी ही होतीं जितनी उनके सीमित और संयमित उपभोग के लिए पर्याप्त होतीं। हम स्वभाव से ही अति की ओर बहुत अधिक झुके हुए हैं; और इसलिए जब परमेश्वर सांसारिक वस्तुओं के विषय में अपने लोगों के प्रति उदार होता है, तो यह इसलिए नहीं कि उनमें इस रोग को उभारे और पोषित करे। सब मनुष्यों को पौलुस के उस नियम पर ध्यान देना चाहिए, जो फिलिप्पियों 4:12 में दिया गया है, कि वे "दीन होना भी जानें, और बढ़ना भी जानें।" ऐसा न हो कि अभाव हमें निराशा में डुबो दे, इसके लिए हमें धैर्यपूर्ण सहनशीलता से सँभाले जाने की आवश्यकता है; और दूसरी ओर, ऐसा न हो कि अत्यधिक बहुतायत हमें सीमा से अधिक फुला दे, इसके लिए हमें संयम की लगाम से रोके जाने की आवश्यकता है। इसलिए प्रभु, जब अपने लोगों को धनी करता है, तब साथ ही भरोसे के आत्मा के द्वारा शरीर की स्वच्छन्द अभिलाषाओं को रोकता है, कि वे अपनी ही इच्छा से अपने लिए संयम के नियम ठहराएँ। यह नहीं कि धनवानों के लिए अपने पास की बहुतायत का, उससे अधिक खुलकर उपभोग करना अनुचित है जितना वे तब करते जब परमेश्वर ने उन्हें छोटा भाग दिया होता; परन्तु सब मनुष्यों को (और राजाओं को तो और भी अधिक) सावधान रहना चाहिए, ऐसा न हो कि वे भोग-विलास के सुखों में घुल जाएँ। निस्सन्देह दाऊद ने, जैसा कि पूर्णतः उचित था, अपने आप को उससे अधिक छूट दी जितनी वह तब लेता यदि वह केवल साधारण लोगों में से एक होता, या यदि वह अब भी अपने पिता की झोंपड़ी में रहता; परन्तु उसने अपने सुस्वादु भोजनों के बीच अपने आप को ऐसा संयमित रखा कि शरीर को ठूँसने और मोटा करने में उसे तनिक भी आनन्द नहीं आता था। वह भली-भाँति जानता था कि उस मेज़ में, जो परमेश्वर ने उसके लिए बिछाई थी, और सूअरों की नाँद में कैसे भेद करे। यह भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि दाऊद अपनी भूमि, कर-धन और राज्य की अन्य आय पर जीवन निर्वाह करता था, तौभी उसने परमेश्वर का ऐसा धन्यवाद किया मानो परमेश्वर प्रतिदिन अपने ही हाथ से उसे उसका भोजन देता हो। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह अपने धन से अन्धा नहीं हुआ था, वरन् सदा परमेश्वर को अपना गृहस्वामी मानता था, जो अपने ही भण्डार से भोजन और पेय निकालकर उचित समय पर उसे बाँटता था। [टिप्पणी 536: "Car s'il n'y eust point en de crainte, a quel propos desireroit il la presence de Dieu?" — फ्रांसीसी.]
"मूल शब्द, צלמות כניא, अत्यन्त प्रभावशाली है, 'मृत्यु-छाया की तराई में या उसमें होकर।' यह अभिव्यक्ति आसन्न संकट, (यिर्मयाह 2:6,) घोर क्लेश, (भजन संहिता 44:19,) भय और आतंक, (भजन संहिता 107:10, 14; अय्यूब 24:17,) और भयानक अन्धकार, (अय्यूब 10:21, 22) को सूचित करती प्रतीत होती है। — मॉरिसन की भजन संहिता पर टीका।
"Si non qu'eslevans la nos yeux et les y ayans fichez, nons foullions aux pieds craintes et espouantemens." — फ्रांसीसी.
6. निश्चय भलाई और करुणा। उन आशीषों का वर्णन करने के बाद जो परमेश्वर ने उस पर की थीं, वह अब अपने जीवन के अन्त तक उनके बने रहने का अपना निस्सन्देह विश्वास प्रकट करता है। परन्तु यह भरोसा, जिसके द्वारा वह अपने आप को निश्चय दिलाता है कि परमेश्वर की उदारता और करुणा सदा उसके साथ रहेंगी, कहाँ से निकला, यदि उस प्रतिज्ञा से नहीं, जिसके द्वारा परमेश्वर उन आशीषों को, जो वह सच्चे विश्वासियों को देता है, सुस्वादु बनाने का अभ्यस्त है, कि वे बिना कोई स्वाद या रुचि लिए उन्हें बिना सोचे-समझे निगल न जाएँ? जब उसने पहले अपने आप से कहा था कि मृत्यु के अन्धकार के बीच भी वह परमेश्वर के विधान को निहारने में अपनी आँखें लगाए रखेगा, तब उसने पर्याप्त रूप से यह गवाही दी कि वह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं था, और न परमेश्वर के अनुग्रह को शरीर के न्याय के अनुसार नापता था, वरन् जब हर सांसारिक ओर से सहायता उसका साथ छोड़ देती थी, तब भी उसका विश्वास परमेश्वर के वचन में बन्द रहता था। इसलिए यद्यपि अनुभव ने उसे अच्छी आशा रखने की ओर ले चला, तौभी वह मुख्य रूप से उस प्रतिज्ञा पर निर्भर था जिसके द्वारा परमेश्वर भविष्य के विषय में अपने लोगों को दृढ़ करता है। यदि यह आपत्ति की जाए कि इस अनिश्चित और परिवर्तनशील संसार में किसी मनुष्य का अपने आप से निरन्तर समृद्धि की प्रतिज्ञा करना ढिठाई है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि दाऊद ने इस रीति से परमेश्वर पर कोई नियम थोपने के विचार से नहीं कहा; परन्तु उसने अपने प्रति परमेश्वर की उदारता के ऐसे प्रयोग की आशा की जैसा इस संसार की दशा अनुमति देती है, और उसी से वह सन्तुष्ट रहता। वह यह नहीं कहता, मेरा कटोरा सदा भरा रहेगा, अथवा, मेरा सिर सदा तेल से सुगन्धित रहेगा; परन्तु सामान्य रूप से वह यह आशा रखता है कि चूँकि परमेश्वर की भलाई कभी नहीं चूकती, इसलिए वह अन्त तक भी उस पर कृपालु रहेगा।
मैं यहोवा के धाम में वास करूँगा। इस अन्तिम वाक्य के द्वारा वह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वह अपने विचारों को सांसारिक सुखों या आरामों तक सीमित नहीं रखता; परन्तु जिस लक्ष्य पर उसकी दृष्टि लगी है वह स्वर्ग में स्थिर है, और उस तक पहुँचना ही सब बातों में उसका महान उद्देश्य था। मानो वह कहता है, मैं केवल जीने के लिए नहीं जीता, वरन् इसलिए कि परमेश्वर के भय और सेवा में अपने आप को अभ्यस्त करूँ, और सच्ची भक्ति की सब शाखाओं में प्रतिदिन उन्नति करूँ। वह अपने और उन अधर्मी मनुष्यों के बीच, जो केवल स्वादिष्ट भोजन से अपना पेट भरने में आनन्द पाते हैं, स्पष्ट भेद करता है। और केवल इतना ही नहीं, वरन् वह यह भी संकेत करता है कि उसकी दृष्टि में परमेश्वर के लिए जीना इतने बड़े महत्त्व की बात है कि वह शरीर के सब आरामों का मूल्य केवल उसी अनुपात में आँकता था जिस अनुपात में वे उसे परमेश्वर के लिए जीने में सहायक होते थे। वह स्पष्ट रूप से कहता है कि उन सब उपकारों में, जो परमेश्वर ने उस पर किए थे, जिस उद्देश्य पर उसकी दृष्टि थी वह यह था कि वह प्रभु के धाम में वास करे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब वह इस आशीष के उपभोग से वंचित होता, तब वह अन्य सब वस्तुओं को कुछ भी न गिनता; मानो वह कहता है, मुझे सांसारिक आरामों में कोई आनन्द न मिलेगा, जब तक कि मैं साथ ही परमेश्वर के झुण्ड का न होऊँ, जैसा कि वह एक अन्य स्थान पर भी लिखता है, "क्या ही धन्य है वह प्रजा जिसकी ऐसी दशा हो; हाँ, क्या ही धन्य है वह प्रजा जिसका परमेश्वर यहोवा है," (भजन संहिता 144:15)।
वह मन्दिर में बार-बार जाने की इतनी बड़ी इच्छा क्यों रखता था, सिवाय इसके कि वहाँ अपने संगी आराधकों के साथ बलिदान चढ़ाए, और धर्म के अन्य अभ्यासों के द्वारा स्वर्गीय जीवन पर मनन करने में उन्नति करे? इसलिए यह निश्चित है कि दाऊद का मन, उस सांसारिक समृद्धि की सहायता से जिसका वह आनन्द लेता था, अनन्त मीरास की आशा तक ऊँचा उठाया गया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे मनुष्य पशुवत् हैं जो परमेश्वर के निकट आने से उत्पन्न होनेवाले सुख को छोड़ किसी और सुख को अपना लक्ष्य बनाते हैं।
