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भजन 32
भजन 32.
दाऊद ने बहुत अधिक और बड़ी पीड़ा के साथ यह अनुभव किया था कि पाप के कारण परमेश्वर के हाथ को अपने ऊपर भारी अनुभव करना कितनी दयनीय दशा है; इसलिए वह पुकार उठता है कि सुखी जीवन का सर्वोच्च और सर्वोत्तम भाग इसी में है कि परमेश्वर मनुष्य का दोष क्षमा करे और उसे अनुग्रहपूर्वक अपनी कृपा में ग्रहण करे। प्राप्त हुई क्षमा के लिए धन्यवाद देने के पश्चात्, वह दूसरों को अपने इस आनन्द में सहभागी होने का निमन्त्रण देता है, और अपने ही उदाहरण से वह मार्ग दिखाता है जिसके द्वारा यह आनन्द प्राप्त किया जा सकता है।
दाऊद का भजन, जो शिक्षा देता है। इस भजन का शीर्षक उसके विषय का कुछ आभास देता है। कुछ लोग सोचते हैं कि इब्रानी शब्द משכיל maskil, जिसका अनुवाद हमने "शिक्षा देनेवाला" किया है, सातवें पद से लिया गया है; परन्तु अधिक ठीक यह मानना है कि यह शीर्षक भजन को उसके सम्पूर्ण अभिप्राय और विषय-वस्तु के अनुसार दिया गया है। जब परमेश्वर अपने क्रोध के चिह्न दिखाकर दाऊद को कठोरता से परख रहा था, तब बहुत समय तक भयानक यातनाएँ सहने के पश्चात्, अन्त में कृपा प्राप्त करके, दाऊद ईश्वरीय भलाई के इस प्रमाण को अपने और सारी कलीसिया के लाभ के लिए काम में लाता है, ताकि उसके द्वारा वह अपने आप को और उन्हें यह सिखाए कि उद्धार की मुख्य बात किसमें है। जब तक मनुष्यों को यह निश्चय न हो जाए कि परमेश्वर उनसे मेल कर चुका है, तब तक सब मनुष्यों को अनिवार्य रूप से या तो दयनीय यातना में रहना पड़ता है, या—जो इससे भी बुरा है—अपने आप को और परमेश्वर को भूलकर घातक जड़ता में पड़े रहना पड़ता है। इसलिए दाऊद यहाँ हमें सिखाता है कि मनुष्यों का सुख केवल पापों की सेंतमेंत क्षमा में है, क्योंकि परमेश्वर को अपना शत्रु बना लेने से अधिक भयानक कुछ भी नहीं हो सकता; और वह हमारे अपराधों को क्षमा करने के अतिरिक्त किसी और रीति से हम पर अनुग्रह नहीं कर सकता।
659 "Pour lequel nous avons traduit, Donnant instruction." — फ्रांसीसी. 660 जहाँ कहा गया है, "मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और तुझे सिखाऊँगा।"
भजन 32:1-2
1. क्या ही धन्य हैं वे जिनका अधर्म क्षमा किया गया, और जिनका अपराध ढाँपा गया है। 2. क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके लेखे में यहोवा कोई पाप नहीं गिनता, और जिसकी आत्मा में कपट नहीं है।
1. क्या ही धन्य हैं वे जिनका अधर्म क्षमा किया गया। यह उद्गार भजनकार के हृदय के उत्कट भाव से भी और गम्भीर मनन से भी फूट निकला है। क्योंकि लगभग सारा संसार अपने विचारों को परमेश्वर के न्याय से हटाकर अपने ऊपर एक घातक विस्मृति ले आता है, और छल-भरे सुख-विलासों से अपने आप को मतवाला कर लेता है; इसलिए दाऊद, मानो परमेश्वर के क्रोध के भय से आहत होकर, ताकि वह ईश्वरीय दया की शरण ले, दूसरों को भी इसी अभ्यास के लिए जगाता है, और स्पष्ट तथा ऊँचे शब्द में यह घोषणा करता है कि केवल वे ही धन्य हैं जिनसे परमेश्वर का मेल हो गया है, यहाँ तक कि जिन्हें वह न्यायपूर्वक अपने शत्रुओं के समान बरत सकता था, उन्हें वह अपनी सन्तान मान लेता है। कुछ लोग कपट और घमण्ड से, और कुछ परमेश्वर के प्रति ऐसी घोर अवहेलना से अन्धे हो गए हैं कि वे क्षमा ढूँढ़ने की कुछ भी चिन्ता नहीं करते; तौभी सब यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें क्षमा की आवश्यकता है; और ऐसा कोई मनुष्य जीवित नहीं जिसका विवेक परमेश्वर के न्यायासन के सामने उस पर दोष न लगाता हो, और बहुत से डंकों से उसे न छेदता हो। इसलिए यह स्वीकारोक्ति—कि सब को क्षमा की आवश्यकता है, क्योंकि कोई मनुष्य सिद्ध नहीं, और कि हमारा भला केवल तभी है जब परमेश्वर हमारे पाप क्षमा करता है—स्वयं प्रकृति दुष्ट मनुष्यों से भी बलपूर्वक करवा लेती है। परन्तु इसी बीच, कपट बहुतेरों की आँखें बन्द कर देता है, और दूसरे एक विकृत शारीरिक निश्चिन्तता से ऐसे भरमाए जाते हैं कि उन्हें ईश्वरीय क्रोध का या तो कोई भी बोध नहीं होता, या केवल एक ठण्डा-सा बोध होता है।
इससे दोहरी भूल उत्पन्न होती है: पहली यह कि ऐसे मनुष्य अपने पापों को हल्का समझते हैं, और परमेश्वर के कोप से अपने ऊपर आनेवाले संकट के सौवें भाग पर भी विचार नहीं करते; और दूसरी यह कि वे अपने आप को दोष से छुड़ाने और परमेश्वर की कृपा मोल लेने के लिए निरर्थक प्रायश्चित्त गढ़ लेते हैं। इस प्रकार सब युगों में सब कहीं यह मत प्रचलित रहा है कि यद्यपि सब मनुष्य पाप से दूषित हैं, तौभी साथ ही वे ऐसे गुणों से भी शोभित हैं जो उनके लिए परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के योग्य हैं; और यद्यपि वे अपने अपराधों से उसके क्रोध को भड़काते हैं, तौभी अपनी मुक्ति पाने के लिए उनके पास प्रायश्चित्त और दण्ड-पूर्तियाँ तैयार रहती हैं। शैतान का यह भ्रम पोप के अनुयायियों, तुर्कों, यहूदियों और अन्य जातियों में समान रूप से फैला हुआ है। इसलिए हर वह मनुष्य जो पोपतन्त्र के प्रचण्ड उन्माद में बह नहीं गया है, इस कथन की सच्चाई मान लेगा कि जब तक परमेश्वर मनुष्यों के पापों का दोष उन पर न लगाकर उनसे दया का व्यवहार न करे, तब तक वे दयनीय दशा में हैं। परन्तु दाऊद इससे भी आगे बढ़कर घोषणा करता है कि मनुष्य का सारा जीवन परमेश्वर के क्रोध और शाप के अधीन है, सिवाय इसके कि वह अपने सेंतमेंत अनुग्रह से उन्हें अपनी कृपा में ग्रहण करने की कृपा करे; और इस बात का, जो आत्मा दाऊद के द्वारा बोला, वही पौलुस के मुँह से हमारे लिए निश्चित व्याख्याता और साक्षी है (रोमियों 4:6)। यदि पौलुस ने इस साक्षी का उपयोग न किया होता, तो उसके पाठक भविष्यद्वक्ता के वास्तविक अर्थ तक कभी न पहुँच पाते; क्योंकि हम देखते हैं कि पोप के अनुयायी, यद्यपि अपने मन्दिरों में "धन्य हैं वे जिनके अधर्म क्षमा किए गए" इत्यादि गाते हैं, तौभी वे इसे ऐसे टाल देते हैं मानो यह कोई साधारण और कम महत्त्व की कहावत हो। परन्तु पौलुस के लिए यह विश्वास की धार्मिकता की पूर्ण परिभाषा है; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, मनुष्य केवल तभी धन्य हैं जब वे सेंतमेंत परमेश्वर से मेल कर लेते हैं, और उसके द्वारा धर्मी गिने जाते हैं। इसलिए जिस धन्यता का दाऊद गुणगान करता है, वह कर्मों की धार्मिकता को पूर्णतः नष्ट कर देती है। आंशिक धार्मिकता की वह युक्ति, जिससे पोप के अनुयायी और दूसरे लोग अपने आप को भरमाते हैं, निरी मूर्खता है; और उन लोगों में भी जो स्वर्गीय शिक्षा के प्रकाश से वंचित हैं, कोई ऐसा पागल न मिलेगा जो अपने लिए सिद्ध धार्मिकता का दावा करे—जैसा उन प्रायश्चित्तों, स्नानों और परमेश्वर को शान्त करने के अन्य उपायों से प्रकट है जो सब जातियों में सदा से प्रचलित रहे हैं। तौभी वे अपने सद्गुणों को परमेश्वर पर थोपने में कोई संकोच नहीं करते, मानो उनके द्वारा उन्होंने स्वयं अपनी धन्यता का एक बड़ा भाग प्राप्त कर लिया हो।
परन्तु दाऊद एक बिलकुल भिन्न क्रम ठहराता है; अर्थात् यह कि सुख की खोज में सब को इस सिद्धान्त से आरम्भ करना चाहिए कि जो अनन्त विनाश के योग्य हैं, उनसे परमेश्वर का मेल किसी और रीति से नहीं हो सकता सिवाय इसके कि वह उन्हें सेंतमेंत क्षमा करे और उन पर अपनी कृपा करे। और वह उचित ही घोषणा करता है कि यदि उनसे दया रोक ली जाए, तो सब मनुष्य पूर्णतः अभागे और शापित होंगे; क्योंकि यदि सब मनुष्य, जब तक उनका नया जन्म न हो, स्वभाव से केवल बुराई ही की ओर झुके हुए हैं, तो स्पष्ट है कि उनका सारा पिछला जीवन परमेश्वर की दृष्टि में घृणित और घिनौना ही होगा। इसके अतिरिक्त, क्योंकि नये जन्म के पश्चात् भी मनुष्यों का कोई काम परमेश्वर को तब तक प्रसन्न नहीं कर सकता जब तक वह उस पाप को क्षमा न करे जो उसमें मिला हुआ है, इसलिए उन्हें उद्धार की आशा से वंचित ही रहना पड़ेगा। निश्चय ही उनके लिए अत्यन्त भय के कारण के सिवा और कुछ शेष न रहेगा। यह बात कि पवित्र लोगों के काम प्रतिफल के योग्य नहीं, क्योंकि उन पर धब्बे लगे हैं, पोप के अनुयायियों को कठोर वचन लगता है। परन्तु इसमें वे अपना घोर अज्ञान प्रकट करते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय को अपनी ही धारणाओं के अनुसार आँकते हैं, जिसकी दृष्टि में तारों की चमक भी अन्धकार ही है। इसलिए यह एक स्थिर सिद्धान्त बना रहे कि क्योंकि हम परमेश्वर के सामने केवल पापों की सेंतमेंत क्षमा के द्वारा ही धर्मी गिने जाते हैं, इसलिए यही अनन्त उद्धार का द्वार है; और इस कारण केवल वे ही धन्य हैं जो परमेश्वर की दया पर भरोसा रखते हैं। हमें उस विरोध को स्मरण रखना चाहिए जिसका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ—एक ओर विश्वासी, जो पापों की क्षमा को ग्रहण करके केवल परमेश्वर के अनुग्रह पर भरोसा रखते हैं, और दूसरी ओर अन्य सब लोग, जो ईश्वरीय अनुग्रह के पवित्रस्थान की शरण लेने की उपेक्षा करते हैं।
इसके अतिरिक्त, जब दाऊद एक ही बात को तीन बार दोहराता है, तो यह व्यर्थ पुनरुक्ति नहीं है। यह तो स्वयं में पर्याप्त रूप से स्पष्ट है कि वह मनुष्य धन्य होगा जिसका अधर्म क्षमा किया गया है; परन्तु अनुभव हमें सिखाता है कि इस बात का ऐसा निश्चय होना कि वह हमारे हृदयों में पूर्णतः जम जाए, कितना कठिन है। अधिकांश लोग, जैसा मैं तुम्हें पहले दिखा चुका हूँ, अपनी ही युक्तियों में उलझकर, जहाँ तक उनसे बन पड़ता है, विवेक के आतंकों और ईश्वरीय क्रोध के सारे भय को अपने से दूर कर देते हैं। निःसन्देह उनमें परमेश्वर से मेल करने की इच्छा तो है; तौभी वे सच्चाई से और पूरे मन से उसके अनुग्रह को ढूँढ़ने के बजाय उसकी दृष्टि से बचते फिरते हैं। दूसरी ओर, जिन्हें परमेश्वर ने सचमुच ऐसा जगा दिया है कि वे अपनी दुर्दशा के जीवित बोध से प्रभावित होते हैं, वे इतने निरन्तर व्याकुल और अशान्त रहते हैं कि उनके मन में शान्ति लौटाना कठिन होता है। वे परमेश्वर की दया का स्वाद तो चखते हैं, और उसे थामने का यत्न भी करते हैं, तौभी अपने ऊपर होनेवाले नाना प्रकार के आक्रमणों के नीचे वे बार-बार लज्जित हो जाते या डगमगा जाते हैं। भजनकार पापों की क्षमा के विषय पर इतना बल देता है, उसके दो कारण ये हैं—एक ओर, कि वह सोए हुओं को उठाए, लापरवाहों में विचारशीलता उत्पन्न करे, और मन्दों को सजीव करे; और दूसरी ओर, कि वह भयभीत और चिन्तित मनों को निश्चित और स्थिर भरोसे से शान्त करे। पहले प्रकार के लोगों पर यह शिक्षा इस रीति से लागू की जा सकती है: "हे अभागे मनुष्यो! इसका क्या अर्थ है कि विवेक के एक-दो डंक तुम्हें व्याकुल नहीं करते? मान लो कि तुम्हारे पापों का एक सीमित-सा ज्ञान तुम्हें भय से भर देने के लिए पर्याप्त नहीं, तौभी जब तुम पापों के अपार बोझ से दबे हुए हो, तब निश्चिन्त सोते रहना कितनी उलटी बात है?" और यह पुनरुक्ति निर्बलों और डरपोकों को भी थोड़ी सान्त्वना और दृढ़ता नहीं देती। क्योंकि उन पर एक के बाद एक सन्देह बार-बार आते रहते हैं, इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि वे केवल एक ही संघर्ष में विजयी हों। इसलिए, ताकि जिन नाना प्रकार के उलझानेवाले विचारों से वे व्याकुल होते हैं उनके बीच निराशा उन्हें अभिभूत न कर दे, पवित्र आत्मा अनेक घोषणाओं के द्वारा पापों की क्षमा को पुष्ट और प्रमाणित करता है।
अब यहाँ प्रयुक्त अभिव्यक्तियों के विशेष बल को तौलना उचित है। निश्चय ही जिस क्षमा की यहाँ चर्चा है, वह दण्ड-पूर्तियों के साथ मेल नहीं खाती। परमेश्वर पापों को उठा लेने या दूर करने में, और उसी प्रकार उन्हें ढाँपने और उनका लेखा न लेने में, उन्हें सेंतमेंत क्षमा करता है। इस कारण पोप के अनुयायी अपनी दण्ड-पूर्तियों और—जैसा वे उन्हें कहते हैं—अतिरिक्त पुण्य-कर्मों को बीच में घुसाकर अपने आप को इस धन्यता से वंचित कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त, दाऊद इन शब्दों को पूर्ण क्षमा पर लागू करता है। इसलिए दण्ड की क्षमा और दोष की क्षमा के बीच जो भेद पोप के अनुयायी यहाँ करते हैं, जिसके द्वारा वे केवल आधी क्षमा बना देते हैं, वह यहाँ कुछ भी संगत नहीं है। अब यह विचार करना आवश्यक है कि यह सुख किसका है, और यह बात समय की परिस्थिति से सहज ही समझी जा सकती है। जब दाऊद को यह सिखाया गया कि वह केवल परमेश्वर की दया ही के द्वारा धन्य है, तब वह परमेश्वर की कलीसिया से परदेशी नहीं था; इसके विपरीत, वह परमेश्वर के भय और सेवा में, और जीवन की पवित्रता में बहुतों से बढ़कर उन्नति कर चुका था, और भक्ति के सब कर्तव्यों में अपने आप को अभ्यस्त कर चुका था। और धर्म में यह प्रगति कर लेने के पश्चात् भी परमेश्वर ने उसे ऐसा अभ्यास कराया कि उसने अपने उद्धार का आदि और अन्त परमेश्वर के साथ अपने सेंतमेंत मेल में ही रखा। और यह अकारण नहीं कि जकर्याह अपने गीत में "उद्धार के ज्ञान" को "पापों की क्षमा" के जानने में ठहराता है (लूका 1:77)। जो कोई पवित्रता में जितना अधिक श्रेष्ठ होता है, वह अपने आप को सिद्ध धार्मिकता से उतना ही दूर अनुभव करता है, और उतनी ही स्पष्टता से समझता है कि वह केवल परमेश्वर की दया के सिवा और किसी पर भरोसा नहीं रख सकता। इससे प्रकट होता है कि वे लोग बड़ी भूल में हैं जो समझते हैं कि पाप की क्षमा केवल धार्मिकता के आरम्भ के लिए आवश्यक है। क्योंकि विश्वासी प्रतिदिन बहुत से दोषों में फँसते हैं, इसलिए उनका एक बार धार्मिकता के मार्ग में प्रवेश कर लेना उन्हें कुछ लाभ न देगा, जब तक वही अनुग्रह जो उन्हें उसमें लाया, उनके जीवन के अन्तिम पग तक उनके साथ न रहे। यदि कोई आपत्ति करे कि अन्यत्र उन्हें धन्य कहा गया है "जो यहोवा का भय मानते हैं," "जो उसके मार्गों पर चलते हैं," "जो मन के सीधे हैं," इत्यादि, तो उत्तर सरल है; अर्थात्, क्योंकि यहोवा का सिद्ध भय, उसकी व्यवस्था का सिद्ध पालन और मन की सिद्ध सीधाई कहीं भी नहीं पाई जाती, इसलिए पवित्रशास्त्र धन्यता के विषय में जहाँ कहीं जो कुछ कहता है, वह सब परमेश्वर की उस सेंतमेंत कृपा पर आधारित है जिसके द्वारा वह हमें अपने से मिला लेता है।
2. जिसकी आत्मा में कपट नहीं है। इस वाक्यांश में भजनकार विश्वासियों को कपटियों से भी और परमेश्वर के अचेत तिरस्कारियों से भी अलग करता है; इनमें से कोई भी इस सुख की परवाह नहीं करता, और न उसके आनन्द तक पहुँच सकता है। दुष्टों को निश्चय ही अपने दोष का भीतर ही भीतर बोध रहता है, फिर भी वे अपनी दुष्टता में आनन्द मनाते हैं; अपनी निर्लज्जता में अपने आप को कठोर कर लेते हैं, और धमकियों पर हँसते हैं; या कम से कम वे छल-भरी चापलूसियों में अपने आप को बहलाते हैं, ताकि उन्हें परमेश्वर की उपस्थिति में आने को विवश न होना पड़े। हाँ, यद्यपि अपनी दुर्दशा के बोध से वे अभागे बन जाते हैं और गुप्त यातनाओं से सताए जाते हैं, तौभी विकृत विस्मृति से वे परमेश्वर के सारे भय को दबा देते हैं। जहाँ तक कपटियों की बात है, यदि कभी उनका विवेक उन्हें डंक मारता है, तो वे निष्फल उपचारों से अपनी पीड़ा को सहला लेते हैं; यहाँ तक कि यदि परमेश्वर कभी उन्हें अपने न्यायासन के सामने बुलाए, तो वे अपनी रक्षा के लिए न जाने कैसी-कैसी छायाएँ अपने सामने खड़ी कर लेते हैं; और उनके पास ऐसे आवरणों की कभी कमी नहीं रहती जिनके द्वारा वे प्रकाश को अपने हृदयों से बाहर रख सकें। मनुष्यों के ये दोनों वर्ग भीतरी कपट के कारण परमेश्वर के पितृवत् प्रेम में अपना सुख ढूँढ़ने से रोके जाते हैं। इतना ही नहीं, उनमें से बहुत से हठपूर्वक परमेश्वर की उपस्थिति में घुस पड़ते हैं, या घमण्ड-भरी ढिठाई से फूल उठते हैं, और यह स्वप्न देखते हैं कि वे सुखी हैं, यद्यपि परमेश्वर उनके विरुद्ध है। इसलिए दाऊद का अभिप्राय यह है कि कोई मनुष्य तब तक यह स्वाद नहीं चख सकता कि पापों की क्षमा क्या है, जब तक उसका हृदय पहले कपट से शुद्ध न किया जाए। अतः "कपट" शब्द से उसका क्या अभिप्राय है, यह मेरे कहे हुए से समझा जा सकता है। जो कोई अपने आप को परमेश्वर की उपस्थिति में होने के समान नहीं जाँचता, वरन् इसके विपरीत उसके न्याय से बचते हुए या तो अपने आप को अन्धकार में छिपा लेता है, या पत्तों से ढाँप लेता है, वह अपने साथ भी और परमेश्वर के साथ भी छल का व्यवहार करता है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि जो अपने रोग का अनुभव नहीं करता, वह उपचार को अस्वीकार कर देता है। इस कपट के जिन दो प्रकारों का मैंने उल्लेख किया है, उन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कदाचित् थोड़े ही लोग ऐसे कठोर होंगे कि परमेश्वर के भय से और उसके अनुग्रह की किसी इच्छा से वे बिलकुल भी प्रभावित न हों, तौभी क्षमा ढूँढ़ने के लिए वे केवल ठण्डे मन से प्रेरित होते हैं। इसी से यह होता है कि वे अभी तक यह नहीं समझते कि परमेश्वर की कृपा का भागी होना कैसा अवर्णनीय सुख है। कुछ समय तक दाऊद की भी यही दशा थी, जब एक विश्वासघाती निश्चिन्तता उस पर चुपके से छा गई, उसके मन को अन्धकारमय कर दिया, और उसे इस सुख के पीछे उत्साह से लगने से रोक दिया। पवित्र लोग प्रायः इसी रोग से पीड़ित रहते हैं। इसलिए यदि हम उस सुख का आनन्द लेना चाहते हैं जो दाऊद यहाँ हमारे सामने रखता है, तो हमें अत्यन्त सावधान रहना चाहिए कि कहीं शैतान हमारे हृदयों को कपट से भरकर हमसे अपनी दुर्दशा का सारा बोध न छीन ले—वह दुर्दशा जिसमें हर वह व्यक्ति, जो बहानों का सहारा लेता है, अवश्य ही घुल-घुलकर क्षीण होता जाता है।
भजन 32:3-4
3. जब मैं चुप रहा, तब मेरी हड्डियाँ गल गईं, और जब मैं दिन भर चिल्लाता रहा तब भी। 4. क्योंकि रात दिन तेरा हाथ मुझ पर भारी रहा; और मेरी तरावट धूपकाल की सी झुर्राहट बन गई।
3. जब मैं चुप रहा, तब मेरी हड्डियाँ गल गईं। यहाँ दाऊद अपने ही अनुभव से उस शिक्षा की पुष्टि करता है जो उसने रखी थी; अर्थात् यह कि जब वह परमेश्वर के हाथ के नीचे दीन किया गया, तब उसने अनुभव किया कि उसकी कृपा से वंचित होने से बढ़कर दयनीय और कुछ नहीं है; और इससे वह संकेत करता है कि जब तक परमेश्वर अपने क्रोध का बोध कराकर हमें परख न ले, तब तक यह सत्य ठीक-ठीक समझा नहीं जा सकता। और वह किसी साधारण परीक्षा की बात नहीं करता, वरन् घोषणा करता है कि वह अत्यन्त कठोरता से पूरी तरह दबा दिया गया था। और निश्चय ही इस विषय में हमारे शरीर की सुस्ती उसकी ढिठाई से कम आश्चर्यजनक नहीं है। यदि हम बलपूर्वक खींचे न जाएँ, तो हम परमेश्वर से मेल ढूँढ़ने के लिए कभी उतनी लगन से शीघ्रता नहीं करेंगे जितनी करनी चाहिए। सारांश यह कि प्रेरित लेखक अपने ही उदाहरण से हमें सिखाता है कि जब तक हम भीतरी परीक्षाओं के साथ कठोर संघर्षों से पूरी तरह यह अनुभव न कर लें कि परमेश्वर का क्रोध कितना भयानक है, तब तक हम यह कभी नहीं समझ पाते कि परमेश्वर की कृपा का आनन्द लेना कितना बड़ा सुख है। वह आगे कहता है कि चाहे वह चुप रहा, या चाहे उसने अपनी चिल्लाहट और गर्जन से अपने दुःख को उँडेलने का यत्न किया, उसकी हड्डियाँ पुरानी पड़ गईं; दूसरे शब्दों में, उसका सारा बल सूख गया। इससे यह निकलता है कि पापी चाहे किसी भी ओर मुड़े, या उसके मन की दशा चाहे जैसी भी हो, जब तक वह परमेश्वर की कृपा में फिर से स्थापित न किया जाए, तब तक उसका रोग किसी भी अंश में हल्का नहीं होता, और न उसका कल्याण किसी भी अंश में बढ़ता है। प्रायः ऐसा होता है कि वे लोग सबसे तीखे दुःख से यातना पाते हैं जो लगाम को चबाते रहते हैं, और अपने शोक को भीतर ही भीतर निगलते रहते हैं, और उसे प्रकट किए बिना भीतर बन्द करके रखते हैं; यद्यपि बाद में वे मानो अचानक उन्माद से पकड़ लिए जाते हैं, और उनके दुःख का वेग जितने अधिक समय तक रोका गया था, उतने ही अधिक ज़ोर से फूट निकलता है। "चुप रहने" शब्द से दाऊद का अभिप्राय न तो संवेदनहीनता है और न जड़ता, वरन् वह भाव है जो धीरज और हठ के बीच में स्थित है, और जो सद्गुण से जितना सम्बन्धित है उतना ही दुर्गुण से भी। क्योंकि उसकी हड्डियाँ बुढ़ापे से नहीं, वरन् उसके मन की भयानक यातनाओं से क्षीण हुई थीं। तौभी उसकी चुप्पी आशा या आज्ञाकारिता की चुप्पी नहीं थी, क्योंकि उससे उसकी दुर्दशा में कुछ भी राहत नहीं मिली।
हमारी अंग्रेज़ी बाइबल में इस पद का अनुवाद यह है, "When I kept silence, my bones waxed old through my roaring all the day long" ("जब मैं चुप रहा, तब दिन भर गर्जन करते-करते मेरी हड्डियाँ पुरानी पड़ गईं"); इस पर स्ट्रीट टिप्पणी करता है, "मुझे स्वीकार करना होगा कि मैं नहीं समझता कि जो मनुष्य दिन भर गर्जन करता रहता है, उसे चुप रहनेवाला कैसे कहा जा सकता है।" इसलिए "जब मैं चुप रहा" के स्थान पर वह पढ़ता है, "जब मैं विचार में खोया रहता हूँ"; और टिप्पणी करता है कि क्रिया חרש हिफ़ील रूप में "मनन करना, विचार करना, गहरे विचार में डूबे रहना" का अर्थ देती है। परन्तु कैल्विन के अनुवाद और व्याख्या के अनुसार पद के पहले और दूसरे वाक्यांश के बीच कोई असंगति नहीं है। एक ही समय चुप रहने और फिर भी दिन भर गर्जन करते रहने के प्रत्यक्ष विरोध से बचने के लिए, डॉ. बूथरॉयड "गर्जन" के स्थान पर "पीड़ाएँ" पढ़ता है।
4. क्योंकि रात दिन तेरा हाथ मुझ पर भारी रहा। इस पद में वह और अधिक पूर्णता से समझाता है कि इतना भारी दुःख कहाँ से उत्पन्न हुआ; अर्थात् इस कारण कि उसने परमेश्वर के हाथ को अपने विरुद्ध कठोर अनुभव किया। सब क्लेशों में सबसे बड़ा क्लेश यह है कि परमेश्वर के हाथ से ऐसा भारी दबाया जाए कि पापी को यह अनुभव हो कि उसका काम एक ऐसे न्यायी से पड़ा है जिसके कोप और कठोरता में अनन्त मृत्यु के अतिरिक्त और भी बहुत सी मृत्युएँ समाई हुई हैं। इसलिए दाऊद शिकायत करता है कि उसकी तरावट सूख गई, केवल इसलिए नहीं कि वह अपने भारी क्लेशों पर मनन करता था, वरन् इसलिए कि उसने उनके कारण और स्रोत को पहचान लिया था। जब परमेश्वर न्यायी के रूप में प्रकट होता है, और अपनी अप्रसन्नता के चिह्न दिखाकर मनुष्यों को दीन करता और भूमि पर गिरा देता है, तब उनका सारा बल जाता रहता है। तब यशायाह का यह वचन पूरा होता है, "घास सूख जाती है, फूल मुर्झा जाता है, क्योंकि यहोवा की साँस उस पर चलती है।" (यशायाह 40:7)
इसके अतिरिक्त भजनकार हमें बताता है कि जिस ताड़ना के द्वारा उसे परमेश्वर के कोप का सच्चा भय मानना सिखाया गया, वह कोई साधारण ताड़ना नहीं थी; क्योंकि प्रभु का हाथ दिन और रात उस पर भारी रहने से नहीं रुका। यह सच है कि बचपन ही से पवित्र आत्मा के गुप्त प्रभाव के द्वारा उसके मन में परमेश्वर का भय उत्पन्न किया गया था, और खरे सिद्धान्त तथा शिक्षा के द्वारा वह सच्चे धर्म और भक्ति में प्रशिक्षित किया गया था। तौभी इस बुद्धि को प्राप्त करने के लिए वह शिक्षा इतनी अपर्याप्त सिद्ध हुई कि उसे अपनी दौड़ के ठीक बीच में फिर से एक नए आरम्भ करनेवाले के समान सिखाया जाना पड़ा। हाँ, यद्यपि वह अब बहुत समय से अपने पापों पर विलाप करने का अभ्यस्त हो चुका था, तौभी वह प्रतिदिन नए सिरे से इसी अभ्यास में लाया जाता था; और इससे हम सीखते हैं कि मनुष्य एक बार गिर जाने के पश्चात् कितनी देर में सम्भल पाते हैं; और यह भी कि वे आज्ञा मानने में कितने मन्द होते हैं, जब तक परमेश्वर समय-समय पर उनकी मार को दुगुना न करे और दिन-प्रतिदिन उसे बढ़ाता न जाए। यदि कोई दाऊद के विषय में यह पूछे कि क्या वह उन मारों के नीचे कठोर हो गया था, जिनके विषय में वह भली-भाँति जानता था कि वे परमेश्वर के हाथ से उस पर पड़ रही हैं, तो प्रसंग ही इसका उत्तर देता है; अर्थात् यह कि वह व्याकुल करनेवाले शोकों के द्वारा दबाया और जकड़ा हुआ रहा, और लम्बी पीड़ाओं से विचलित होता रहा, जब तक कि वह भली-भाँति वश में होकर नम्र न हो गया—और यही उपचार खोजने का पहला चिह्न है। और यह फिर हमें सिखाता है कि यह अकारण नहीं है कि वे ताड़नाएँ, जिनके द्वारा परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करता हुआ प्रतीत होता है, बार-बार दोहराई जाती हैं, और उसका हाथ हम पर भारी किया जाता है, जब तक कि हमारा उग्र अहंकार—जिसे हम जानते हैं कि सबसे भारी मारों से वश में किए बिना वह कभी पालतू नहीं होता—नम्र न कर दिया जाए।
भजन 32:5-7
5. मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया, और अपना अधर्म नहीं छिपाया। मैंने कहा, मैं यहोवा के सामने अपने विरुद्ध अपनी दुष्टता मान लूँगा; और तूने मेरे पाप का दोष क्षमा कर दिया। सेला। 6. इस कारण हर एक नम्र जन तेरे मिलने के समय तुझ से प्रार्थना करेगा; जिससे बहुत जल की बाढ़ में भी वे उसके निकट न पहुँचेंगे। 7. तू मेरा छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे छुटकारे के गीतों से घेर लेगा। सेला।
5. मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया। अब भविष्यद्वक्ता अपने दुःख का परिणाम वर्णन करता है, ताकि वह सबको उस आनन्द को प्राप्त करने का सीधा मार्ग दिखाए जिसका वह उल्लेख करता है। जब परमेश्वर के कोप की अनुभूति ने उसे बुरी तरह सताया और पीड़ित किया, तब उसका एकमात्र सहारा यही था कि वह निष्कपट भाव से परमेश्वर के सामने अपने आप को दोषी ठहराए, और नम्रता से उसके पास भागकर उससे क्षमा की याचना करे। तौभी वह यह नहीं कहता कि उसके पाप केवल उसे स्मरण आ गए; क्योंकि कैन और यहूदा के पाप भी उन्हें स्मरण आए थे, यद्यपि उससे उन्हें कोई लाभ न हुआ; क्योंकि जब दुष्टों के विवेक उनके पापों से व्याकुल होते हैं, तब वे अपने आप को सताते और परमेश्वर के विरुद्ध कुढ़ते रहते हैं: हाँ, यद्यपि वह उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने न्यायासन के सामने खींच लाता है, तौभी वे अपने आप को छिपाने की उत्कट लालसा रखते हैं। परन्तु यहाँ पाप को मान लेने की एक बिलकुल भिन्न रीति का वर्णन किया गया है; अर्थात् जब पापी स्वेच्छा से परमेश्वर की शरण लेता है, और अपने उद्धार की आशा हठ या कपट पर नहीं, बल्कि क्षमा की विनती पर रखता है। यह स्वेच्छा से किया गया अंगीकार सदा विश्वास के साथ जुड़ा रहता है; क्योंकि अन्यथा पापी निरन्तर ऐसे छिपने के स्थान खोजता रहेगा जहाँ वह परमेश्वर से अपने आप को छिपा सके। दाऊद के शब्द स्पष्ट दिखाते हैं कि वह निष्कपट भाव से और पूरे मन से परमेश्वर की उपस्थिति में आया, ताकि वह कुछ भी न छिपाए। जब वह हमें बताता है कि उसने अपना पाप मान लिया और उसे नहीं छिपाया, तो यह बाद का वाक्यांश इब्रानी मुहावरे के अनुसार बल देने के लिए जोड़ा गया है। इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि दाऊद ने, जब वह परमेश्वर के सामने उपस्थित हुआ, अपना सारा मन उण्डेल दिया। हम जानते हैं कि कपटी लोग अपने बुरे कामों को हल्का दिखाने के लिए या तो उन्हें छिपाते हैं या उन्हें तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं; संक्षेप में, वे खरे और खुले मुँह से उनका सच्चा अंगीकार कभी नहीं करते। परन्तु दाऊद इस बात से इनकार करता है कि वह इस नीचता का दोषी था। बिना किसी छल के उसने जो कुछ उसे दुःख देता था वह सब परमेश्वर पर प्रगट कर दिया; और इसकी पुष्टि वह इन शब्दों से करता है, मैंने कहा। जहाँ दुष्ट बलपूर्वक घसीटे जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई न्यायी अपराधियों को न्याय के लिए उपस्थित होने को विवश करता है, वहाँ वह हमें निश्चय दिलाता है कि वह सोच-समझकर और मन के पूरे संकल्प के साथ आया; क्योंकि कहा शब्द का अर्थ केवल यही है कि उसने अपने मन में विचार किया। इसलिए इससे यह निकलता है कि उसने परमेश्वर की दया के द्वारा क्षमा का अपने आप से वचन दिया और अपने आप को उसका निश्चय दिलाया, ताकि भय उसे अपने पापों का स्वतन्त्र और खरा अंगीकार करने से न रोके।
"Ou, peine." — फ्रांसीसी हाशिया। "अथवा, दण्ड।" "De grandes eaux." — फ्रांसीसी. "बड़े जलों की।"
अपने ऊपर, या अपने विरुद्ध, यह वाक्यांश संकेत करता है कि दाऊद ने उन सब बहानों और आड़ों को अपने से दूर कर दिया, जिनके द्वारा मनुष्य अपना बोझ उतारने के अभ्यस्त होते हैं—अपना दोष दूसरों पर डालकर, या उसका कारण दूसरे लोगों में ढूँढ़कर। इसलिए दाऊद ने ठान लिया कि वह अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर के न्याय के अधीन कर देगा, और अपना दोष प्रगट करेगा, ताकि स्वयं को दोषी ठहराकर वह एक विनती करनेवाले के रूप में क्षमा प्राप्त करे।
और तूने मेरे पाप का दोष क्षमा कर दिया। यह वाक्यांश उन भारी और भयानक व्याकुलताओं के विपरीत रखा गया है, जिनके विषय में वह कहता है कि विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह के पास आने से पहले वह उनसे सताया जाता था। परन्तु ये शब्द यह भी सिखाते हैं कि जब-जब पापी खरे अंगीकार के साथ दया के सिंहासन के सामने उपस्थित होता है, तब-तब वह परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप को अपनी प्रतीक्षा करते हुए पाएगा। दूसरे शब्दों में, भजनकार का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर न केवल उसे क्षमा करने को तैयार था, बल्कि उसका उदाहरण यह सामान्य शिक्षा भी देता है कि संकट में पड़े हुए लोग अपने प्रति परमेश्वर की कृपा पर सन्देह न करें, ज्यों ही वे सच्चे और इच्छुक मन से उसकी शरण लें। यदि कोई इससे यह निष्कर्ष निकाले कि पश्चाताप और अंगीकार अनुग्रह प्राप्त करने का कारण हैं, तो उत्तर सरल है; अर्थात् यह कि दाऊद यहाँ कारण के विषय में नहीं, बल्कि उस रीति के विषय में बोल रहा है जिससे पापी का परमेश्वर से मेल-मिलाप होता है। निःसन्देह अंगीकार बीच में आता है, परन्तु हमें इससे आगे बढ़कर यह विचार करना चाहिए कि वह विश्वास ही है जो हमारे हृदयों और जीभों को खोलकर वास्तव में हमारे लिए क्षमा प्राप्त करता है। यह स्वीकार नहीं किया जाता कि जो कुछ क्षमा से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, वह सब उसके कारणों में गिना जाए। अथवा, और सरलता से कहें तो, दाऊद ने अपने अंगीकार के द्वारा क्षमा पाई, इसलिए नहीं कि उसने अंगीकार करने के मात्र कार्य से उसे कमाया, बल्कि इसलिए कि विश्वास की अगुवाई में उसने नम्रता से अपने न्यायी से उसकी याचना की। इसके अतिरिक्त, जैसे अंगीकार की वही रीति आज हमारे बीच प्रचलित होनी चाहिए जो पूर्वकाल में व्यवस्था के अधीन पूर्वजों द्वारा अपनाई जाती थी, वैसे ही यह पोप के उस अत्याचारी आदेश का पर्याप्त खण्डन करता है, जिसके द्वारा वह हमें परमेश्वर से विमुख करके क्षमा पाने के लिए अपने याजकों के पास भेजता है।
6. इस कारण हर एक नम्र जन तुझ से प्रार्थना करेगा। यहाँ भजनकार स्पष्ट रूप से कहता है कि जो कुछ उसने अब तक अपने व्यक्तित्व में प्रस्तुत किया है, वह परमेश्वर की सब सन्तानों पर समान रूप से लागू होता है। और इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, क्योंकि अपने स्वाभाविक अविश्वास के कारण हम में से अधिकांश लोग परमेश्वर के अनुग्रह को अपना बनाने में मन्द और अनिच्छुक होते हैं। हम इससे यह भी सीख सकते हैं कि दाऊद ने क्षमा, जैसा कुछ लोग कहते हैं, अंगीकार के मात्र कार्य से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रार्थना के द्वारा प्राप्त की। यहाँ वह विश्वासियों को उसे प्राप्त करने के उसी साधन की ओर निर्देशित करता है, और उन्हें प्रार्थना की शरण लेने को कहता है, जो विश्वास का सच्चा बलिदान है। इसके अतिरिक्त, हमें यह सिखाया जाता है कि दाऊद में परमेश्वर ने अपनी दया का एक ऐसा उदाहरण दिया, जो न केवल हम सब तक पहुँच सकता है, बल्कि हमें यह भी दिखा सकता है कि मेल-मिलाप किस प्रकार खोजा जाए। हर एक शब्द प्रत्येक भक्त जन की पुष्टि के लिए है; परन्तु भजनकार साथ ही यह भी दिखाता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के सामने विनती करनेवाले के रूप में दण्डवत् किए बिना उद्धार की आशा प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि बिना किसी अपवाद के सबको उसकी दया की आवश्यकता है।
इसके ठीक बाद आनेवाले वाक्यांश, मिलने के समय, के विषय में कुछ लोग सोचते हैं कि यह प्रार्थना के सामान्य और नियत समयों की ओर संकेत करता है; परन्तु अन्य लोग, मेरी समझ में अधिक ठीक रीति से, इसकी तुलना यशायाह के उस स्थान से करते हैं (यशायाह 55:6), जहाँ कहा गया है, "जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।" यह सच है कि परमेश्वर को खोजना कभी भी असमय नहीं होता, क्योंकि हर क्षण हमें उसके अनुग्रह की आवश्यकता है, और वह सदा हम से मिलने को तैयार रहता है। परन्तु क्योंकि आलस्य या जड़ता हमें उसे खोजने से रोकती है, इसलिए दाऊद यहाँ विशेष रूप से उन निर्णायक अवसरों की ओर संकेत करता है जब विश्वासी अपनी आवश्यकता के बोध से उत्तेजित होकर परमेश्वर की शरण लेते हैं। पोप के अनुयायियों ने इस स्थान का दुरुपयोग अपने इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिए किया है कि हमारे लिए स्वर्ग में ऐसे वकील होने चाहिए जो हमारे लिए प्रार्थना करें; परन्तु इस वचनांश से ऐसे सिद्धान्त के समर्थन में तर्क गढ़ने का प्रयत्न इतना घोर बेतुका है कि वह खण्डन के योग्य भी नहीं है। तौभी इससे हम देख सकते हैं कि या तो उन्होंने सारे पवित्रशास्त्र को कितनी दुष्टता से बिगाड़ा है, या वे कितनी घोर अज्ञानता से सबसे स्पष्ट बातों में भी भूल करते हैं।
बहुत जल की बाढ़ में। यह कथन योएल की उस भविष्यद्वाणी से मेल खाता है, "जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा।" (योएल 2:32) इसका अर्थ यह है कि यद्यपि मृत्यु के गहरे भँवर हमें चारों ओर से घेर लें, तौभी हमें यह भय नहीं करना चाहिए कि वे हमें निगल जाएँगे; बल्कि यह विश्वास करना चाहिए कि यदि हम केवल परमेश्वर की दया की शरण लें, तो हम सुरक्षित और अक्षत रहेंगे। इस प्रकार हमें बलपूर्वक सिखाया जाता है कि भक्त लोग मृत्यु में भी निश्चित उद्धार पाएँगे, बशर्ते वे परमेश्वर के अनुग्रह के पवित्रस्थान की शरण लें। बाढ़ शब्द से वे सब संकट सूचित किए गए हैं जिनसे बच निकलने का कोई उपाय दिखाई नहीं देता।
अन्त में भजनकार धन्यवाद देने में लग जाता है, और यद्यपि परमेश्वर की कृपा का गुणगान करने में वह थोड़े ही शब्दों का प्रयोग करता है, तौभी उसकी संक्षिप्तता में बड़ी शक्ति है। पहले, वह इस बात से इनकार करता है कि स्वयं परमेश्वर को छोड़ सुरक्षा का कोई और आश्रय-स्थान है। दूसरे, वह अपने आप को निश्चय दिलाता है कि परमेश्वर आगे भी उसका विश्वासयोग्य रक्षक रहेगा; क्योंकि मैं क्रिया के भविष्यत् काल को स्वेच्छा से बनाए रखता हूँ, यद्यपि कुछ लोग बिना किसी कारण उसका अनुवाद भूतकाल में करते हैं। तौभी उसका यह अर्थ नहीं समझा जाना चाहिए कि वह अपने आप को भविष्य के क्लेशों से सुरक्षित मानता था, बल्कि वह उनके विरुद्ध परमेश्वर की रखवाली को खड़ा करता है। अन्त में, उस पर चाहे कैसी भी विपत्ति आ पड़े, उसे पूरा भरोसा है कि परमेश्वर उसका छुड़ानेवाला होगा। घेर लेगा शब्द से उसका अभिप्राय अनेक और विविध प्रकार के छुटकारे से है; मानो उसने कहा हो कि वह असंख्य रीतियों से परमेश्वर का ऋणी होगा, और उसे हर ओर से उसकी स्तुति करने के लिए अत्यन्त प्रचुर विषय मिलेगा। इसी बीच हम देख सकते हैं कि वह अपनी सामान्य रीति के अनुसार किस प्रकार परमेश्वर को अपनी कृतज्ञता की सेवा अर्पित करता है, और सहायता के स्थान पर छुटकारे के गीत रखता है।
सेप्टुआजिन्ट अनुवाद में इसका अनुवाद है, "अनुग्रह पाने के समय में;" अरबी में, "सुनने के समय में;" और सीरियाई में, "ग्रहणयोग्य समय में।"
"Qu'ils nous faut avoir des advocats au ciel qui prient pour nous." — फ्रांसीसी.
भजन 32:8-11
8. मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उसमें तुझे सिखाऊँगा: मैं अपनी आँख से तुझे सम्मति दूँगा। 9. तुम घोड़े या खच्चर के समान न बनो, जो समझ नहीं रखते: तू उसके जबड़े को लगाम और बाग से बाँधेगा, कहीं ऐसा न हो कि वे तेरे विरुद्ध लात मारें [या तेरे विरुद्ध उपद्रवी हो जाएँ, या हठपूर्वक तेरी आज्ञा न मानें]। 10. दुष्ट को बहुत से दुःख होंगे: परन्तु जो मनुष्य यहोवा पर आशा रखता है, करुणा उसे घेरे रहेगी। 11. हे धर्मियो, यहोवा में आनन्दित और मगन हो: और हे सब सीधे मनवालो, जयजयकार करो।
8. मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और तुझे सिखाऊँगा। ताकि उसके उपदेश में अधिक बल हो, यह ईश्वरीय वक्ता अपना वचन प्रत्येक मनुष्य को व्यक्तिगत रूप से सम्बोधित करता है; क्योंकि जो शिक्षा कही जाती है, वह मन में तब अधिक सहजता से प्रवेश करती है जब प्रत्येक मनुष्य उसे विशेष रूप से अपने ऊपर लागू करता है। जब यहाँ परमेश्वर की सन्तानों को उद्धार का मार्ग दिखाया जाता है, तब इस बात की सबसे अधिक सावधानी रखनी चाहिए कि कोई भी मनुष्य उससे तनिक भी न भटके। हम इस स्थान से यह भी सीख सकते हैं कि हमारा परमेश्वर से मेल-मिलाप इस शर्त पर होता है कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाइयों को उसी लाभ का सहभागी बनाने का यत्न करे। दाऊद, उनके विषय में अपनी चिन्ता को और भी दृढ़ता से प्रकट करने के लिए, उसका वर्णन आँख की दृष्टि के द्वारा करता है। प्रसंगवश यह ध्यान देना चाहिए कि जो लोग हमारे कल्याण के लिए चिन्तित रहते हैं, वे प्रभु द्वारा हमारे मार्ग के अगुवे नियुक्त किए गए हैं; जिससे प्रकट होता है कि हमारे विषय में उसकी पितृवत् चिन्ता कितनी बड़ी है।
"Ou, je guideray de mon oeil." — फ्रांसीसी हाशिया। "अथवा, मैं अपनी आँख से तेरी अगुवाई करूँगा।" इब्रानी में यह पद अत्यन्त संक्षिप्त और अस्पष्ट है। इसलिए कैल्विन के अनुवाद के अतिरिक्त, जो इस स्थान के अभिप्राय से भली-भाँति मेल खाता है, इसके और भी कई अनुवाद किए गए हैं। हमारी अंग्रेज़ी बाइबल में अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद है, "कहीं ऐसा न हो कि वे तेरे निकट आएँ," अर्थात् तुझ पर आक्रमण करने के लिए। परन्तु यह स्पष्टतः एक अशुद्ध अनुवाद है। यह इन पशुओं का सामान्य स्वभाव नहीं है, जो डरपोक होते हैं, हिंसक नहीं; लगाम और बाग उन्हें हम से दूर रखने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें वश में करने, चलाने और हमारी इच्छा के अधीन करने के लिए प्रयोग की जाती हैं; और यदि यही अर्थ होता, तो यह उपमा अनुपयुक्त होती, क्योंकि भजनकार का उद्देश्य मनुष्यों को परमेश्वर के निकट आने के लिए प्रेरित करना है। इसलिए बहुत से विद्वान् इस वाक्यांश का अनुवाद करते हैं, "अन्यथा वे तेरे निकट नहीं आएँगे;" अर्थात् वे तुझ से भाग जाएँगे। इस अन्तिम वाक्यांश के लिए इब्रानी है, "तेरे पास आना नहीं है।"
9. तुम घोड़े या खच्चर के समान न बनो। अब दाऊद संक्षेप में उस सम्मति का सार समझाता है जिसे देने की बात उसने पहले कही थी। वह सबको उपदेश देता है कि वे शान्त भाव से सीखें, हठ को त्याग दें, और नम्रता की आत्मा धारण करें। भक्तों को उनकी ढिठाई सुधारने के लिए जो सम्मति वह देता है, उसमें भी बड़ी बुद्धि है; क्योंकि यदि हम परमेश्वर की ताड़नाओं पर उतना ध्यान देते जितना हमें देना चाहिए, तो हर कोई उत्सुकता से उसकी कृपा खोजने को दौड़ता। सब में इतनी मन्दता कहाँ से पाई जाती है, सिवाय इसके कि हम या तो जड़-बुद्धि हैं या हठीले? इसलिए हठीलों की तुलना पशुओं से करके दाऊद उन्हें लज्जित करता है, और साथ ही यह घोषणा करता है कि "पैने पर लात मारने" से उन्हें कुछ भी लाभ न होगा। वह कहता है, मनुष्य लगाम और बाग के द्वारा घोड़ों की उग्रता को वश में करना जानते हैं; तो फिर वे क्या सोचते हैं कि परमेश्वर क्या करेगा, जब वह उन्हें अवश पाएगा?
10. दुष्ट को बहुत से दुःख होंगे। यहाँ वह बिना किसी उपमा के घोषित करता है कि विद्रोहियों और हठीलों की दशा क्या होगी।
उसने पहले कहा था कि परमेश्वर के पास उनकी टेढ़ाई को रोकने के लिए लगाम और बाग की कमी नहीं है; और अब वह जोड़ता है कि जब तक वे पूरी रीति से नष्ट न हो जाएँ, तब तक उनके दुःखों का न कोई अन्त होगा न कोई सीमा। इसलिए यद्यपि परमेश्वर कुछ समय तक हम पर दया करके हमें छोड़ दे, तौभी यह चेतावनी हमें भय से भर दे, और हमें अपने आप को कठोर करने से बचाए रखे क्योंकि हम अब तक दण्डित नहीं हुए; और हमारी समृद्धि, जो परमेश्वर द्वारा शापित है, हमें ऐसा धोखा न दे कि हमारे मन उन अदृश्य दुःखों पर विचार करने के लिए बन्द हो जाएँ जिनकी धमकी वह सब दुष्टों को देता है। और जैसे भजनकार ने एक ओर हमें बताया है कि परमेश्वर दुष्टों के विरुद्ध असंख्य विपत्तियों से सुसज्जित है, वैसे ही दूसरी ओर वह जोड़ता है कि वह असीम भलाई से परिपूर्ण है, जिसके द्वारा वह अपने सब लोगों की सहायता कर सकता है। सारांश यह है कि हमारे क्लेशों का इसके सिवाय कोई और उपचार नहीं कि हम परमेश्वर के हाथ के नीचे अपने आप को दीन करें, और अपने उद्धार की नींव केवल उसकी दया पर रखें; और यह कि जो लोग परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, वे सब प्रकार से धन्य होंगे, क्योंकि शैतान चाहे किसी भी ओर से उन पर आक्रमण करे, प्रभु वहीं उसका सामना करेगा और अपनी रक्षा करनेवाली सामर्थ्य से उनकी ढाल बनेगा।
अधिकांश टीकाकार इस पद में यहोवा को वक्ता मानते हैं। तौभी कैल्विन दाऊद को वक्ता मानता है। इस मत में वॉलफ़र्ड उसका अनुसरण करता है। यह विद्वान् कहता है, "भजन संहिता 51:13 में, जो लगभग उसी समय और उसी अवसर पर लिखा गया था, दाऊद यह कारण प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर उसे अपने उद्धार का आनन्द फिर से दे, जिससे वह अपराधियों को उसके मार्ग सिखा सके, और पापी उसकी ओर फिरें। इसी प्रकार हमारे सामने के इस वचनांश में वह पापियों को सम्बोधित करके कहता है, 'मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उसमें तुझे सिखाऊँगा।'"
फ़्राई इसे यों पढ़ता है, "हठीलों के घाव बहुत हैं;" जिस पर उसकी यह टिप्पणी है:- "हम इस स्थान में ושץ का ठीक-ठीक भाव देखते हैं, जो अड़ियल, आज्ञा न माननेवाले, न झुकनेवाले, बेकाबू खच्चर या घोड़े की ओर संकेत करता है। यह בטח के विपरीत है, जिसका अर्थ है भरोसा रखना, झुक जाना, या अधीन हो जाना, जैसे सीधा पशु पूरी तरह भरोसा रखकर अपने आप को अपने हाँकनेवाले के संचालन में सौंप देता है।"
11. यहोवा में आनन्दित हो। यह सिखाने के पश्चात् कि सच्चा आनन्द सब भक्तों के लिए कितना तैयार और सुलभ है, दाऊद उचित ही उन्हें आनन्द मनाने का उपदेश देता है। वह उन्हें प्रभु में आनन्दित होने की आज्ञा देता है, मानो उसने कहा हो कि उन्हें परमेश्वर की कृपा का अपने आप को निश्चय दिलाने से रोकनेवाली कोई बात नहीं है, क्योंकि वह इतनी उदारता और इतनी करुणा से उनके साथ मेल-मिलाप करने का प्रस्ताव रखता है। इसी बीच हम देख सकते हैं कि यही विश्वास का वह अनुपम फल है जिसकी प्रशंसा पौलुस भी करता है, अर्थात् जब भक्तों के विवेक शान्त और प्रसन्न होकर शान्ति और आत्मिक आनन्द का उपभोग करते हैं। जहाँ कहीं विश्वास सजीव होता है, वहाँ यह पवित्र आनन्द अवश्य आता है। परन्तु क्योंकि संसार की अपनी ही अभक्ति उसे इस आनन्द में सहभागी होने से रोकती है, इसलिए दाऊद केवल धर्मियों को सम्बोधित करता है, जिन्हें वह सीधे मनवाले कहता है, ताकि हमें सिखाए कि धार्मिकता का वह बाहरी रूप, जो मनुष्यों को भाता है, परमेश्वर की दृष्टि में किसी काम का नहीं। परन्तु वह उन्हें धर्मी कैसे कहता है, जिनका सारा आनन्द परमेश्वर की उस सेंतमेंत दया में निहित है जो उनके पापों को उनके लेखे में नहीं गिनती? मैं उत्तर देता हूँ कि केवल वे ही कृपा में ग्रहण किए जाते हैं जो अपने पापों के कारण अपने आप से असन्तुष्ट हैं, और अपने पूरे मन से पश्चाताप करते हैं; इसलिए नहीं कि यह पश्चाताप क्षमा कमाता है, बल्कि इसलिए कि विश्वास नये जन्म की आत्मा से कभी अलग नहीं किया जा सकता। जब वे अपने आप को परमेश्वर को समर्पित करने लगते हैं, तब वह उनके हृदयों के सीधे स्वभाव को ऐसा ग्रहण करता है मानो वह शुद्ध और सिद्ध हो; क्योंकि विश्वास न केवल मनुष्य का परमेश्वर से मेल कराता है, बल्कि उसमें जो कुछ अपूर्ण है उसे भी पवित्र करता है, ताकि परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह से वह धर्मी ठहरे, जो अपनी किसी भी योग्यता से इतनी बड़ी आशीष कभी प्राप्त न कर सकता था।
