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भजन 27
भजन 27.
इस भजन में दाऊद उन अभिलाषाओं और ध्यान-मननों को दोहराता है जिनमें वह अपने बड़े संकटों के बीच अपने आप को लगाए रहता था। जो धन्यवाद वह उनके साथ मिलाता है, वे दिखाते हैं कि यह उसके छुटकारे के बाद रचा गया था। यह भी सम्भव है कि वह उन प्रार्थनाओं को, जिनमें उसके विभिन्न ध्यान-मननों के समय उसके विचार लगे रहते थे, एक साथ दोहराता है। अतः यहाँ यह देखा जा सकता है कि यह पवित्र जन कैसी अजेय आत्मिक दृढ़ता से सम्पन्न किया गया था, कि वह अपने शत्रुओं के अत्यन्त भीषण आक्रमणों पर विजय पा सके। उसकी अद्भुत भक्ति इसी में चमक उठती है कि वह परमेश्वर की सेवा करने के सिवा किसी और उद्देश्य से जीना नहीं चाहता था, और न कोई चिन्ता या क्लेश उसे इस उद्देश्य से हटा सकता था।
दाऊद का भजन।
भजन 27:1-3
1. यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है, मैं किस से डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का बल है, मैं किस का भय खाऊँ? 2. जब कुकर्मी मेरा मांस खाने को मुझ पर चढ़ आए, जब मेरे सतानेवाले और मेरे शत्रु मुझ पर चढ़ आए, तब वे ठोकर खाकर गिर पड़े। 3. चाहे सेनाएँ मेरे विरुद्ध छावनी डालें, तौभी मेरा हृदय न डरेगा; चाहे मेरे विरुद्ध युद्ध उठे, तौभी मैं इसी में निश्चिन्त रहूँगा।
1. यहोवा मेरी ज्योति है। इस आरम्भ का यह अर्थ समझा जा सकता है कि दाऊद, परमेश्वर की दया का अनुभव कर चुकने के बाद, अपनी कृतज्ञता की गवाही प्रकट करता है। परन्तु मेरा झुकाव एक दूसरे अर्थ की ओर अधिक है, अर्थात् यह कि जब उसने देखा कि उसे अत्यन्त तीखी परीक्षाओं से संघर्ष करना है, तब वह पहले से अपने आप को दृढ़ करता है, और मानो भरोसे की सामग्री एकत्र करता है: क्योंकि यह आवश्यक है कि पवित्र जन उन सन्देहों को दूर करने या दबाने के लिए, जिन्हें शरीर पालने की ओर इतना प्रवृत्त रहता है, अपने आप से गम्भीरता से मल्लयुद्ध करें, जिससे वे प्रसन्नता और शीघ्रता से प्रार्थना की ओर मुड़ सकें। अतः दाऊद, नाना प्रकार की आँधियों से उछाला जाकर, अन्त में फिर सम्भल जाता है, और उन क्लेशों पर, जिनसे वह सताया गया था, विजय का जयघोष करता है, और इस बात में आनन्द करता है कि जब कभी परमेश्वर अपनी दया और अनुग्रह प्रकट करता है, तब डरने की कोई बात नहीं रहती। यह बात उन शब्दों के ढेर से और भी स्पष्ट होती है जिनका वह प्रयोग करता है, जब वह परमेश्वर को न केवल अपनी ज्योति, वरन् अपना उद्धार, और अपने जीवन की चट्टान या बल कहता है। उसका उद्देश्य यह था कि अपने नाना प्रकार के भयों के विरुद्ध मानो एक तिहरी ढाल रख दे, जो उन्हें दूर रखने के लिए पर्याप्त हो। ज्योति शब्द, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है, पवित्रशास्त्र में आनन्द, या सुख की पूर्णता को सूचित करने के लिए प्रयुक्त होता है। फिर, अपना आशय स्पष्ट करने के लिए वह जोड़ता है कि परमेश्वर उसका उद्धार और उसके जीवन का बल था, क्योंकि उसी की सहायता से वह अपने आप को सुरक्षित, और मृत्यु के आतंकों से मुक्त अनुभव करता था। निश्चय ही हम पाते हैं कि हमारे सब भय इसी स्रोत से उत्पन्न होते हैं, कि हम अपने जीवन के विषय में अत्यधिक चिन्तित रहते हैं, जबकि हम यह स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर उसका रक्षक है। इसलिए जब तक हम इस दृढ़ निश्चय तक न पहुँचें कि हमारा जीवन भली-भाँति सुरक्षित है, क्योंकि वह उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के द्वारा रक्षित है, तब तक हमें कोई शान्ति नहीं मिल सकती। यह प्रश्न भी दिखाता है कि दाऊद ईश्वरीय संरक्षण को कितना ऊँचा मानता था, क्योंकि वह इस प्रकार अपने सब शत्रुओं और संकटों के विरुद्ध निर्भीकता से जयजयकार करता है। और निश्चय ही हम परमेश्वर को उचित आदर नहीं देते, जब तक कि उसकी प्रतिज्ञा की हुई सहायता पर भरोसा रखकर हम अपनी सुरक्षा की निश्चितता पर गर्व करने का साहस न करें। मानो पृथ्वी और नरक की सारी शक्ति को तराज़ू में तौलकर, दाऊद उस सब को एक पंख से भी हल्का गिनता है, और केवल परमेश्वर को उस सब से कहीं अधिक भारी मानता है।
इसलिए आइए, हम हमारी रक्षा करने की परमेश्वर की सामर्थ्य का ऐसा मूल्य आँकना सीखें कि वह हमारे सब भयों को भगा दे। यह नहीं कि विश्वासियों के मन शरीर की दुर्बलता के कारण हर समय भय से पूर्णतः रहित हो सकते हैं; परन्तु तुरन्त फिर साहस बटोरकर, आइए, हम अपने भरोसे के ऊँचे गुम्मट पर से अपने सब संकटों को तुच्छता की दृष्टि से नीचे देखें। जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह का कभी स्वाद नहीं चखा, वे काँपते हैं, क्योंकि वे उस पर निर्भर रहने से इनकार करते हैं, और कल्पना करते हैं कि वह प्रायः उन पर क्रुद्ध रहता है, या कम से कम उनसे दूर रहता है। परन्तु जब परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ, और वह अनुग्रह जो वे प्रस्तुत करती हैं, हमारी आँखों के सामने हैं, तब यदि हम अडिग साहस के साथ निर्भीकता से उसे अपने सब शत्रुओं के विरुद्ध खड़ा न करें, तो हमारा अविश्वास उसके प्रति घोर अन्याय करता है। इसलिए जब परमेश्वर कृपापूर्वक हमें अपनी ओर आकर्षित करता है, और हमें निश्चय दिलाता है कि वह हमारी सुरक्षा की चिन्ता करेगा, तो चूँकि हमने उसकी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण किया है, या इसलिए कि हम उसे विश्वासयोग्य मानते हैं, यह उचित है कि हम उसकी सामर्थ्य की बड़ी महिमा करें, जिससे वह हमारे हृदयों को अपनी प्रशंसा से मुग्ध कर ले। हमें इस तुलना पर भली-भाँति ध्यान देना चाहिए, कि परमेश्वर के सामने सब सृजी हुई वस्तुएँ क्या हैं? इसके अतिरिक्त, अपने विवेकों से सब भयों को निकाल देने के लिए हमें इस भरोसे को और भी आगे बढ़ाना चाहिए, पौलुस के समान, जो अपने अनन्त उद्धार के विषय में बोलते हुए निर्भीकता से पुकार उठता है,
"यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?" (रोमियों 8:31।) 2. जब कुकर्मी, इत्यादि। कुछ व्याख्याकारों के समान इस वाक्य का भविष्यत् काल में अनुवाद करने का कोई कारण नहीं है। परन्तु भविष्यद्वक्ता जिस भूतकाल का प्रयोग करता है उसे बनाए रखते हुए, इन शब्दों की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है। इसका अर्थ या तो यह है कि दाऊद उस विजय का उत्सव मनाता है जो उसने परमेश्वर की आशीष से प्राप्त की थी; या इसमें उस रीति की ओर संकेत है जिससे उसने अपनी परीक्षाओं के बीच भी, अर्थात् परमेश्वर के पिछले उपकारों पर विचार करके, सर्वोत्तम की आशा रखने के लिए अपने आप को प्रोत्साहित किया था। दूसरी व्याख्या ही वह है जिसे मैं श्रेष्ठ मानता हूँ। तौभी दोनों का सार एक ही है, और दोनों यह सूचित करती हैं कि जब दाऊद अपने पिछले अनुभव पर विचार करता था, तब उसके पास आगे से परमेश्वर की सहायता पर सन्देह करने का कोई कारण न था; क्योंकि हमारे विश्वास को दृढ़ करने के लिए उन घटनाओं के स्मरण से बढ़कर और कुछ उपयोगी नहीं, जिनमें परमेश्वर ने हमें न केवल अपने अनुग्रह का, वरन् अपनी सच्चाई और सामर्थ्य का भी स्पष्ट प्रमाण दिया है। इसलिए मैं इस पद को अगले पद के साथ जोड़ता हूँ। पहले पद में दाऊद उन विजयों को स्मरण करता है जो उसने परमेश्वर की सहायता से पहले ही प्राप्त कर ली थीं; और इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि चाहे कितनी भी सेनाएँ उसे घेर लें, या उसके शत्रु उसके विरुद्ध कैसी भी हानि की युक्ति रचें, वह निडर होकर उनका सामना करेगा। इब्रानी शब्द קרב karab का अर्थ है निकट आना; परन्तु यहाँ यह उस धावे की ओर संकेत करता है जो दाऊद के शत्रुओं ने उस पर आक्रमण करते समय किया था। कुछ लोग इसका अनुवाद लड़ना करते हैं, परन्तु यह अनुवाद नीरस है। अपनी निर्दोषता की गवाही देने के लिए वह उन्हें कुकर्मी या टेढ़े कहता है, और यह कहकर कि वे उसका मांस खाने को उस पर चढ़ आए, वह उनकी बर्बर क्रूरता को व्यक्त करता है। [579 … परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में इसका प्रयोग प्रायः भविष्यत् के लिए होता है। तौभी, जैसा कि कैल्विन कहते हैं, इस स्थल में क्रियाओं का भविष्यत् काल में अनुवाद करने की कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती, जिसमें दाऊद को परमेश्वर की उस भलाई के, जो उसने उसके प्रति दिखाई थी, पिछले प्रमाणों पर विचार करते हुए, और उनसे भविष्य के विषय में प्रोत्साहन पाते हुए माना जा सकता है।]
3. चाहे सेनाएँ छावनी डालें। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, वह अपने पिछले अनुभव से यह निष्कर्ष निकालता है कि उस पर चाहे कैसी भी विपत्ति आ पड़े, उसे भली आशा रखनी चाहिए, और उस ईश्वरीय संरक्षण के विषय में कोई आशंका नहीं रखनी चाहिए, जो उसकी पिछली आवश्यकता में उसे इतने प्रभावशाली रूप से प्रदान किया गया था। उसने यह बात पहले पद में भी कही थी, परन्तु अब उसका और प्रमाण पाकर वह इसे दोहराता है। छावनियों और सेनाओं शब्दों के अन्तर्गत वह संसार की हर उस वस्तु को सम्मिलित करता है जो सबसे अधिक भयावह है: मानो उसने कहा हो, चाहे सब मनुष्य मेरे विनाश के लिए षड्यन्त्र रचें, तौभी मैं उनकी हिंसा की परवाह न करूँगा, क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ्य, जिसे मैं जानता हूँ कि वह मेरी ओर है, उनकी सामर्थ्य से कहीं बढ़कर है। परन्तु जब वह घोषणा करता है, मेरा हृदय न डरेगा, तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह भय से पूर्णतः रहित होगा, — क्योंकि वह सद्गुण की अपेक्षा संवेदनहीनता के नाम के अधिक योग्य होता; परन्तु इसलिए कि जिन आतंकों का उसे सामना करना था उनके नीचे उसका हृदय मूर्छित न हो जाए, उसने उनके विरुद्ध विश्वास की ढाल खड़ी की। कुछ लोग उस शब्द को, जिसका अनुवाद इसी में किया गया है, अगले पद में ले जाते हैं, इस अर्थ में कि उसे निश्चय था कि वह परमेश्वर के भवन में वास करेगा; परन्तु मेरी सम्मति यह है कि वह पिछली शिक्षा से ही सम्बन्धित है। क्योंकि विश्वास तभी अपने समय पर अपना फल लाता है, जब हम संकटों के बीच दृढ़ और निडर बने रहते हैं। इसलिए दाऊद सूचित करता है कि जब परीक्षा आएगी, तब उसका विश्वास अजेय सिद्ध होगा, क्योंकि वह परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर है। [विद्वान कास्टेलियो का अनुवाद यह है, "Si invadant — offensuri sunt atque casuri;" — "यदि वे मुझ पर धावा करें तो वे ठोकर खाकर गिर पड़ेंगे। …" "ठोकर खाने" के लिए इब्रानी क्रियाएँ … ] [580 फ्रेंच और स्किनर पढ़ते हैं, "मेरा मांस निगल जाने को;" और टिप्पणी करते हैं कि "यह चित्र एक वनपशु से लिया गया है। तुलना कीजिए भजन 3:7, और भजन 22:13।"]
भजन 27:4-6
4. एक वर मैं ने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊँ, जिससे यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूँ, और उसके मन्दिर का यत्न से निरीक्षण करूँ। 5. क्योंकि वह विपत्ति के दिन मुझे अपने तम्बू में छिपा रखेगा: वह मुझे अपने तम्बू के गुप्त स्थान में छिपा लेगा; वह मुझे चट्टान पर चढ़ाएगा। 6. और अब वह मेरा सिर मेरे चारों ओर के शत्रुओं से ऊँचा करेगा: और मैं उसके डेरे में आनन्द के बलिदान चढ़ाऊँगा; मैं यहोवा का भजन गाऊँगा और उसकी स्तुति करूँगा।
4. एक वर मैं ने माँगा है। कुछ लोग इसे दाऊद के राज्य के स्थायित्व की भविष्यद्वाणी मानते हैं, जिस पर न केवल उसका अपना व्यक्तिगत सुख, वरन् उसकी सारी प्रजा का सुख भी निर्भर था; मानो उसने कहा हो, मैं परमेश्वर के अनुग्रह के इस अनुपम प्रमाण से इतना सन्तुष्ट हूँ कि रात-दिन और किसी बात का विचार नहीं कर सकता। तौभी मेरी सम्मति में इन शब्दों को इस अर्थ में लेना अधिक सरल व्याख्या प्रतीत होती है, कि यद्यपि दाऊद अपने देश से निर्वासित था, अपनी पत्नी से वंचित, अपने कुटुम्बियों से विहीन, और अन्त में अपनी सम्पत्ति से बेदखल कर दिया गया था, तौभी वह इन वस्तुओं को फिर से पाने के लिए उतना उत्सुक नहीं था, जितना वह परमेश्वर के पवित्रस्थान से अपने निर्वासन, और अपने पवित्र विशेषाधिकारों की हानि के कारण शोकित और दुःखी था। एक शब्द में एक निहित विरोधाभास है, जिसमें दाऊद, अन्य सब हितों की उपेक्षा करके, परमेश्वर की सेवा के प्रति अपना तीव्र प्रेम प्रकट करता है; यहाँ तक कि पवित्रस्थान से निर्वासित रहना उसे अपने ही घर में प्रवेश से वंचित किए जाने से अधिक कड़वा लगता था। इसलिए यह बात, कि दाऊद केवल एक ही वस्तु चाहता था, अर्थात् प्रभु के भवन में वास करना, एक ही वाक्य में पढ़ी जानी चाहिए। क्योंकि इसकी कोई सम्भावना नहीं कि इससे उसका आशय किसी गुप्त इच्छा से है जिसे उसने दबा रखा था, क्योंकि वह स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि वह कौन-सी बात थी जो उसे मुख्य रूप से व्याकुल करती थी। वह दृढ़ संकल्प भी जोड़ता है, यह घोषित करते हुए कि वह इन प्रार्थनाओं को बार-बार दोहराना नहीं छोड़ेगा। बहुत से लोग आरम्भ में बड़े आवेग से दौड़ते दिखाई देते हैं, जिनका उत्साह समय बीतने पर न केवल शिथिल पड़ जाता है, वरन् लगभग तुरन्त बुझ जाता है। इसलिए यह घोषित करके कि वह अपने सारे जीवन भर इस इच्छा में लगा रहेगा, वह अपने आप को कपटियों से अलग करता है। ["C'est, d'adversite." — फ्रांसीसी हाशिया-टिप्पणी. "अर्थात्, विपत्ति के।"]
तौभी हमें ध्यान देना चाहिए कि दाऊद किस प्रेरणा से इतनी प्रबलता से उत्तेजित हुआ था। कुछ लोग कह सकते हैं, "निश्चय ही वह मन्दिर की सीमाओं के बाहर भी परमेश्वर को पुकार सकता था। निर्वासित होकर वह जहाँ कहीं भटकता था, वहाँ परमेश्वर की बहुमूल्य प्रतिज्ञा अपने साथ लिए फिरता था, इसलिए उसे उस बाहरी भवन के दर्शन को इतना अधिक मूल्य देने की आवश्यकता न थी। ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी स्थूल कल्पना के कारण यह मानता है कि परमेश्वर लकड़ी और पत्थरों में बन्द किया जा सकता है।" परन्तु यदि हम इन शब्दों की अधिक ध्यान से जाँच करें, तो यह देखना सरल होगा कि उसका उद्देश्य उस उत्तम भवन और उसकी सजावट के, चाहे वह कितनी ही बहुमूल्य क्यों न हो, केवल दर्शन से सर्वथा भिन्न था। वह मन्दिर की मनोहरता की बात तो करता है, परन्तु वह उस मनोहरता को आँख से दिखाई देनेवाली शोभा में उतना नहीं रखता, जितना इस बात में कि वह वह स्वर्गीय नमूना था जो मूसा को दिखाया गया था, जैसा कि निर्गमन 25:40 में लिखा है, "और सावधान रहकर इन सब को उस नमूने के अनुसार बनवाना, जो तुझे इस पर्वत पर दिखाया गया है।"
चूँकि मन्दिर का रूप मनुष्य की बुद्धि के अनुसार नहीं गढ़ा गया था, वरन् वह आत्मिक बातों का प्रतिरूप था, इसलिए भविष्यद्वक्ता ने अपनी आँखें और अपनी सारी भावनाएँ इसी लक्ष्य की ओर लगाईं। इसलिए उन लोगों का पागलपन सचमुच घृणित है जो इस स्थल को चित्रों और मूर्तियों के पक्ष में तोड़-मरोड़ते हैं, जो मन्दिर की सजावटों में गिने जाने के योग्य होने के स्थान पर, गोबर और मैल के समान हैं, जो पवित्र वस्तुओं की सारी शुद्धता को अशुद्ध कर देते हैं। अब हमें विचार करना चाहिए कि क्या मसीही या सुसमाचार के प्रबन्ध के अधीन विश्वासियों को भी ऐसा ही मन रखना चाहिए। मैं अवश्य मानता हूँ कि हम प्राचीन पूर्वजों से बहुत भिन्न परिस्थितियों में हैं; परन्तु जहाँ तक परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा को एक निश्चित बाहरी व्यवस्था के अधीन बनाए रखता है, और पार्थिव शिक्षाओं के द्वारा उन्हें अपनी ओर खींचता है, वहाँ तक मन्दिरों की अब भी अपनी मनोहरता है, जिसे उचित रूप से विश्वासियों की भावनाओं और अभिलाषाओं को अपनी ओर खींचना चाहिए। वचन, संस्कार, सार्वजनिक प्रार्थनाएँ, और इसी प्रकार की अन्य सहायताएँ परमेश्वर की दुष्ट अवहेलना किए बिना उपेक्षित नहीं की जा सकतीं, जो इन विधियों में, मानो दर्पण या प्रतिमा में, अपने आप को हम पर प्रकट करता है।
5. क्योंकि वह मुझे अपने तम्बू में छिपा रखेगा। यहाँ भजनकार अपने आप को यह आश्वासन देता है कि उसकी प्रार्थना व्यर्थ न होगी। यद्यपि वह कुछ समय के लिए दृश्य पवित्रस्थान से वंचित है, तौभी उसे सन्देह नहीं कि वह जहाँ कहीं भी हो, परमेश्वर की रक्षा करनेवाली सामर्थ्य का अनुभव करेगा। और वह मन्दिर की ओर संकेत करता है, क्योंकि वह विश्वासियों के लिए ईश्वरीय उपस्थिति का प्रतीक था; मानो उसने कहा हो कि जो विनती उसने बताई उसे करने में उसका परिश्रम कदापि व्यर्थ नहीं गया; क्योंकि जो कोई सच्चाई से और शुद्ध हृदय से परमेश्वर को खोजेगा, वह उसके संरक्षण के पंखों के नीचे सुरक्षित छिपा रहेगा। इसलिए वह दृढ़ता से कहता है कि मन्दिर का प्रतिरूप निरर्थक न था, क्योंकि वहाँ परमेश्वर ने, यों कहें, सच्चे विश्वासियों को अपने संरक्षण में इकट्ठा करने के लिए अपने पंख फैलाए थे। इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि चूँकि उसकी इन पंखों के नीचे शरण लेने से बढ़कर और कोई अभिलाषा न थी, इसलिए विपत्ति के समयों में ईश्वरीय संरक्षण के अधीन उसके लिए एक आश्रय तैयार रहेगा, जो, जैसा कि वह चट्टान के रूपक के द्वारा हमें बताता है, उन गुम्मटों के समान अभेद्य होगा जो प्राचीन काल में दृढ़ता के लिए ऊँचे स्थानों पर बनाए जाते थे। इसलिए यद्यपि वह उस समय चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ था, तौभी वह गर्व करता है कि वह उन पर विजय पाएगा। पवित्रशास्त्र में यह कहना वास्तव में एक सामान्य रीति है कि जो शोक से दबे हुए हैं वे झुकी हुई पीठ और उदास मुख के साथ चलते हैं, जबकि दूसरी ओर, जब उनका आनन्द लौट आता है तब वे अपने सिर ऊँचे करते हैं। इसी प्रकार दाऊद ने भजन 3:4 में कहा, "हे यहोवा, तू ही मेरे सिर का ऊँचा करनेवाला है।" परन्तु चूँकि यहाँ इसके विपरीत घेराबन्दी रखी गई है, इसलिए उसका आशय यह था कि उस ईश्वरीय शरणस्थान में वह मानो ऊँचे पर उठा लिया जाएगा, जिससे वह अपने शत्रुओं के उन तीरों की निडर होकर उपेक्षा कर सके, जो अन्यथा उसे बेध सकते थे। और विजय की आशा रखने में, यद्यपि वह ऐसी सकेती में पड़ गया था जो तुरन्त मृत्यु की धमकी दे रही थी, वह हमें अपने विश्वास का एक उल्लेखनीय प्रमाण देता है; जिसके द्वारा हमें यह सिखाया जाता है कि हम परमेश्वर की सहायता को बाहरी रूप-रंग या दृश्य साधनों से न मापें, वरन् मृत्यु के बीच भी उसके सामर्थी और विजयी हाथ से छुटकारे की आशा रखें। ["Sous le regne de Christ." — फ्रांसीसी. "मसीह के राज्य के अधीन।"]
6. और मैं उसके डेरे में जयजयकार के बलिदान चढ़ाऊँगा। संकटों से छुड़ाए जाने के बाद धन्यवाद की एक गम्भीर मन्नत मानकर, वह छुटकारे की आशा में अपने आप को फिर से दृढ़ करता है। हम जानते हैं कि व्यवस्था के अधीन विश्वासी, जब वे परमेश्वर की ओर से कोई उल्लेखनीय आशीष का अनुभव करते थे, तब एक गम्भीर विधि के द्वारा अपनी मन्नतें पूरी किया करते थे। इसलिए यहाँ दाऊद, यद्यपि निर्वासन में है और मन्दिर के निकट जाने से रोका गया है, गर्व करता है कि वह फिर से परमेश्वर की वेदी के पास आएगा, और स्तुतिरूपी बलिदान चढ़ाएगा। तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस पवित्र आनन्द और उन गीतों को, जिनके द्वारा वह परमेश्वर का धन्यवाद करने की प्रतिज्ञा करता है, मौन रूप से संसार के अपवित्र जयोत्सवों के विरुद्ध रखता है।
भजन 27:7-9 [583 "Sacrificia jubili." — लातीनी. "Sacrifice de triomphe." — फ्रांसीसी. एन्सवर्थ पढ़ते हैं, "जयजयकार के, या विजय के, आनन्दमय नाद और रणनाद के बलिदान।" वे कहते हैं, "इसका सम्बन्ध उस व्यवस्था से है जिसने बलिदानों के ऊपर तुरहियाँ फूँकने की आज्ञा दी, गिनती 10:10, जिनका सबसे मुख्य, सबसे ऊँचा, आनन्दमय और विजयी नाद trughnah [अथवा, תרועה truah, वही शब्द जो यहाँ प्रयुक्त है,] 'विजय,' 'रणनाद,' या 'जयजयकार' कहलाता था, गिनती 10:5-7।"]
7. हे यहोवा, मेरा शब्द सुन, जिससे मैं तुझे पुकारता हूँ; मुझ पर दया कर और मुझे उत्तर दे। 8. मेरे हृदय ने तुझ से कहा, मेरे मुख के खोजी हो; इसलिए, हे यहोवा, मैं तेरे मुख का खोजी रहूँगा। 9. अपना मुख मुझ से न छिपा; अपने क्रोध में अपने दास को न हटा: तू मेरा बल रहा है; हे मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर, मुझे न तज, और न मुझे पूरी रीति से छोड़।
7. हे यहोवा, मेरा शब्द सुन। भजनकार फिर से प्रार्थना की ओर लौटता है, और ऐसा करते हुए वह घोषित करता है कि अपनी परीक्षाओं को भेदकर पार निकलने के लिए वह किस कवच से सुसज्जित था। पुकारना शब्द के द्वारा वह अपनी तीव्रता व्यक्त करता है, जैसा कि मैं अन्यत्र कह चुका हूँ, जिससे वह परमेश्वर को अपनी सहायता के लिए शीघ्र प्रेरित करे। इसी उद्देश्य से वह थोड़ी देर बाद अपनी दुर्दशा का भी उल्लेख करता है, क्योंकि विश्वासी जितने अधिक दबाए जाते हैं, उतनी ही अधिक उनकी आवश्यकता ही परमेश्वर को उनके प्रति अपना अनुग्रह बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।
8. मेरे हृदय ने तुझ से कहा। क्रियाओं में पुरुष के परिवर्तन के कारण इस पद की नाना प्रकार की व्याख्याएँ हुई हैं। परन्तु जो कोई दाऊद के अभिप्राय की ध्यान से जाँच करेगा, वह देखेगा कि पाठ पूर्णतः ठीक बैठता है। चूँकि हमें यह शोभा नहीं देता कि जब तक परमेश्वर पहले हमें न बुलाए तब तक हम उतावली से उसकी उपस्थिति में घुस पड़ें, इसलिए दाऊद पहले हमें बताता है कि उसने ध्यान से विचार किया कि परमेश्वर कितनी कोमलता और मधुरता से अपनी प्रजा से पहले ही आगे बढ़ आता है, उन्हें स्वयं अपनी ओर से अपने मुख को खोजने का निमन्त्रण देकर; और फिर, अपनी प्रसन्नता को पुनः पाकर, वह घोषित करता है कि परमेश्वर उसे जहाँ कहीं बुलाए, वह वहाँ आएगा। इब्रानी शब्द לך leka का अर्थ कुछ अस्पष्ट है। इसका अर्थ वही हो सकता है जो लातीनी में tibi, तुझ से, का है। परन्तु चूँकि इब्रानी अक्षर ל lamed प्रायः के विषय में सम्बन्धसूचक के लिए प्रयुक्त होता है, इसलिए इसका अनुवाद भली-भाँति यह भी किया जा सकता है, मेरे हृदय ने तेरे विषय में कहा है; एक व्याख्या जिसकी ओर अधिकांश व्याख्याकारों का झुकाव है। तौभी मेरी सम्मति में यह अधिक सम्भव है कि यह परमेश्वर और भविष्यद्वक्ता के बीच एक परस्पर वार्तालाप को सूचित करता है। मैंने अभी कहा है कि कोई भी विश्वासपूर्वक परमेश्वर को खोजने के लिए तब तक नहीं उठ सकता जब तक कि परमेश्वर के निमन्त्रण के द्वारा पहले मार्ग न खोला जाए, जैसा कि मैंने अन्यत्र भविष्यद्वक्ता की इस घोषणा से दिखाया है, "मैं उनके विषय में कहूँगा, ये मेरी प्रजा हैं; और वे कहेंगे, यहोवा हमारा परमेश्वर है," (जकर्याह 13:9।)
इसी कारण दाऊद कहता है कि इस रीति से उसके लिए परमेश्वर को खोजने का द्वार खुल गया था: वह इस प्रतिज्ञा को आगे रखता है, और इस प्रकार मानो परमेश्वर को उत्तर देता है। और निश्चय, यदि यह स्वर-मेल पहले न हो, तो कोई भी मनुष्य उस निमन्त्रण के गान का ठीक-ठीक संचालन नहीं कर सकेगा। इसलिए ज्योंही हम परमेश्वर को अपने आप को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करते हुए सुनें, त्योंही हम सच्चे मन से उत्तर दें, आमीन; और हम अपने मन में उसकी प्रतिज्ञाओं पर ऐसा विचार करें, मानो वे घनिष्ठता के साथ हम ही से कही गई हों। इस प्रकार सच्चे विश्वासियों को परमेश्वर के अनुग्रह में प्रवेश पाने के लिए किसी सूक्ष्म युक्ति या थका देनेवाले घुमावदार मार्गों को खोजने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह भूमिका उनके लिए इतना सरल मार्ग तैयार कर देती है: "हे प्रभु, हम तेरे द्वारा ग्रहण किए जाने के चाहे कितने ही अयोग्य क्यों न हों, तौभी तेरी आज्ञा, जिसके द्वारा तू हमें अपने पास आने का आदेश देता है, हमारे लिए पर्याप्त प्रोत्साहन है।" इसलिए परमेश्वर की वाणी हमारे हृदयों में वैसे ही गूँजनी चाहिए जैसे खोखले स्थानों में प्रतिध्वनि गूँजती है, ताकि इस पारस्परिक मेल से उसे पुकारने का भरोसा उत्पन्न हो।
["Ou dit de toy." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "या तेरे विषय में कहा।"] "Pourtant." — फ्रांसीसी.
मुख शब्द का अर्थ प्रायः सहायता या उद्धार समझाया जाता है; मानो यह कहा गया हो, मुझे खोजो। परन्तु मुझे निश्चय है कि यहाँ पवित्रस्थान की ओर भी संकेत है, और दाऊद प्रकटीकरण की उस रीति की चर्चा करता है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने आप को किसी मात्रा में दृश्य बनाया करता था। निःसन्देह, उसके विषय में कोई स्थूल या शारीरिक कल्पना बनाना अनुचित है; परन्तु क्योंकि उसने वाचा के सन्दूक को अपनी उपस्थिति का चिह्न ठहराया था, इसलिए बिना किसी अनौचित्य के वह सर्वत्र उसका मुख कहलाता है। यह सच है कि जब तक हम इस संसार में रहते हैं, तब तक हम परमेश्वर से दूर हैं, क्योंकि विश्वास दृष्टि से बहुत दूर है; परन्तु यह भी उतना ही सच है कि अभी हम परमेश्वर को मानो दर्पण में धुँधला-सा देखते हैं (1 कुरिन्थियों 13:12), जब तक कि वह अन्तिम दिन अपने आप को हम पर खुलकर प्रकट न करे। इसलिए मुझे निश्चय है कि इस शब्द के अन्तर्गत हमारे सामने वे सहायक साधन प्रस्तुत किए गए हैं जिनके द्वारा परमेश्वर हमें अपनी उपस्थिति तक उठाता है — वह अपनी अकल्पनीय महिमा से उतरकर हमारे पास आता है, और पृथ्वी पर ही हमें अपनी स्वर्गीय महिमा का दर्शन प्रदान करता है। परन्तु क्योंकि परमेश्वर अपनी ही सर्वोच्च इच्छा के अनुसार हमें अपनी ओर देखने का अनुग्रह देता है (जैसा वह वचन और संस्कारों में करता है), इसलिए हमें उचित है कि हम अपनी आँखें दृढ़ता से इसी दर्शन पर लगाए रखें, ताकि हमारी दशा पोपवादियों के समान न हो, जो अत्यन्त उच्छृंखल गढ़ी हुई बातों के द्वारा दुष्टता से परमेश्वर को उन्हीं रूपों में बदल डालते हैं जो उनकी कल्पना को भाते हैं, या जिन्हें उनके मस्तिष्क ने गढ़ लिया है।
9. अपना मुख मुझ से न छिपा। भजनकार उसी कथन-शैली को सुन्दरता से जारी रखता है, परन्तु भिन्न अर्थ में। अब परमेश्वर का मुख उसके अनुग्रह और कृपा के अनुभवगम्य प्रभावों का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त हुआ है: मानो यह कहा गया हो, हे प्रभु, मुझे सचमुच यह अनुभव करा कि तू मेरे निकट रहा है, और मुझे अपने उद्धार करनेवाले सामर्थ्य को स्पष्ट रूप से देखने दे। हमें परमेश्वर के वचन से प्राप्त सैद्धान्तिक ज्ञान और उसके अनुग्रह के तथाकथित अनुभवजन्य ज्ञान के बीच के भेद पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार परमेश्वर (जैसा लोग प्रायः कहते हैं) अपने कार्य में अपने आप को उपस्थित दिखाता है, उसी प्रकार पहले उसे उसके वचन में खोजना आवश्यक है। इसके बाद आनेवाले वाक्य, अपने दास को अपने क्रोध में न ठुकरा, की व्याख्या कुछ यहूदी व्याख्याकार बहुत खींच-तानकर यह करते हैं कि, अपने दास को इस संसार की दुष्ट चिन्ताओं में डूबने न दे, जो क्रोध और पागलपन के सिवा कुछ नहीं। परन्तु मैं इब्रानी शब्द נטה natah का अनुवाद, जैसा बहुत-से लोग करते हैं, "दूर हटाना" या "अलग कर देना" करना अधिक पसन्द करता हूँ। उन लोगों का अर्थ अधिक सम्भव है जो इसकी व्याख्या यों करते हैं, अपने दास को क्रोध की ओर झुकने न दे। जब कोई मनुष्य परमेश्वर द्वारा पूरी रीति से त्याग दिया जाता है, तब वह भीतर ही भीतर कुड़कुड़ाहट के विचारों से व्याकुल हुए बिना नहीं रह सकता, और झुँझलाहट और क्रोध के प्रदर्शनों में फूट पड़ता है। यदि कोई यह समझे कि दाऊद यहाँ इस परीक्षा का पूर्वानुमान करता है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि वह अधीरता से अकारण नहीं डरता था, जो हमें निर्बल कर देती है और हमें विवेक की सीमाओं से बाहर ले जाती है। परन्तु मैं पहली व्याख्या पर ही स्थिर रहता हूँ, क्योंकि उसकी पुष्टि आगे आनेवाले दो शब्दों से होती है; और इस प्रकार क्रोध शब्द पाप का एक मौन अंगीकार सूचित करता है; क्योंकि यद्यपि दाऊद स्वीकार करता है कि परमेश्वर न्यायपूर्वक उसे त्याग सकता था, तौभी वह उसके क्रोध से बचाए जाने की विनती करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के पिछले उपकारों का स्मरण करके वह और अधिक की आशा रखने के लिए अपने आप को प्रोत्साहित करता है, और इसी तर्क से वह परमेश्वर को प्रेरित करता है कि वह अपनी सहायता जारी रखे और अपने कार्य को अधूरा न छोड़े।
कैल्विन का अभिप्राय यह प्रतीत होता है:— परमेश्वर ने अपने वचन में हमें वह अनुग्रहपूर्ण आज्ञा या निमन्त्रण दिया है, "मेरे मुख को खोजो," जिसके द्वारा वह हमें प्रार्थना और धर्म के अन्य अभ्यासों के द्वारा उसे खोजने के लिए बुलाता है। अब, जब दाऊद कहता है, "मेरे हृदय ने तुझ से कहा, मेरे मुख को खोजो," तो उसका अर्थ यह है कि उसके हृदय ने परमेश्वर को उसकी आज्ञा या निमन्त्रण का स्मरण दिलाया; और इसके द्वारा उसने परमेश्वर के मुख को खोजने के लिए अपने आप को प्रोत्साहित किया, जिसे करने का अपना संकल्प वह अगले उपवाक्य में व्यक्त करता है, "हे यहोवा, तेरे मुख को मैं खोजूँगा।"
भजन 27:10-12
10. जब मेरे पिता और मेरी माता मुझे छोड़ देंगे, तब यहोवा मुझे सम्भाल लेगा। 11. हे यहोवा, मुझे अपना मार्ग सिखा, और मेरे द्रोहियों के कारण मुझ को सीधे मार्ग पर ले चल। 12. मुझ को मेरे सतानेवालों की इच्छा के वश में न कर; क्योंकि झूठे साक्षी मेरे विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं, और वह भी जो उपद्रव उगलता है।
10. जब मेरे पिता और मेरी माता मुझे छोड़ देंगे। क्योंकि पवित्र इतिहास से यह प्रकट होता है कि यिशै ने, जहाँ तक उसे अवसर मिला, अपने पुत्र दाऊद के प्रति अपना कर्तव्य पूरा किया, इसलिए कुछ लोगों का मत है कि यहाँ रूपक के रूप में सरदारों और मन्त्रियों का उल्लेख किया गया है; परन्तु यह उपयुक्त नहीं। और न ही वे इस शंका को किसी उचित कारण से उठाते हैं। दाऊद यह शिकायत नहीं करता कि उसके पिता या माता ने स्वाभाविक स्नेह के विरुद्ध उसे धोखा दिया; परन्तु इस तुलना के द्वारा वह परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा बढ़ाता है, और यह घोषित करता है कि चाहे सब मनुष्य उसे त्याग दें, तौभी वह परमेश्वर को अपनी सहायता के लिए सदा तत्पर पाएगा। इब्रानी अव्यय כי ki का अर्थ अधिकतर क्योंकि होता है, परन्तु यह भी विदित है कि वह बहुधा समयवाचक क्रियाविशेषण जब के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए दाऊद यह सूचित करना चाहता था कि मनुष्यों में जो भी परोपकार, प्रेम, उत्साह, ध्यान या सेवा पाई जाए, वह सब उस पितृतुल्य दया से बहुत नीचे है जिससे परमेश्वर अपने लोगों को घेरे रहता है। यह सच है कि मनुष्यों के बीच प्रेम की सबसे ऊँची मात्रा उन माता-पिताओं में पाई जाती है जो अपने बच्चों से अपनी अंतड़ियों के समान प्रेम करते हैं। परन्तु परमेश्वर हमें इससे भी ऊँचा उठाता है, जब वह यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा यह घोषणा करता है कि चाहे माता अपने गर्भ के बालक को भूल जाए, तौभी वह हमें सदा स्मरण रखेगा (यशायाह 49:15)। इसी पद पर दाऊद उसे रखता है, ताकि वह, जो सारी भलाई का सोता है, उन सब नश्वर मनुष्यों से कहीं बढ़कर ठहरे जो स्वभाव से ही दुर्भावनापूर्ण और कंजूस हैं। तौभी यह कथन की एक अपूर्ण रीति है, वैसी ही जैसी यशायाह 63:16 में है, "निश्चय तू हमारा पिता है, यद्यपि इब्राहीम हमें नहीं पहचानता, और इस्राएल हमें ग्रहण नहीं करता।" ["C'est, plaisir." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, इच्छा या प्रसन्नता।"]
पूरे कथन का सार यह है: पृथ्वी के माता-पिता स्वभाव से अपने बच्चों की सहायता करने के लिए चाहे कितने ही प्रवृत्त हों, वरन् चाहे वे अत्यन्त प्रबल स्नेह से उनका पालन-पोषण करने का प्रयत्न करें, तौभी यदि पृथ्वी पर से स्नेह पूरी रीति से बुझ भी जाए, तो भी परमेश्वर अपने लोगों के प्रति पिता और माता दोनों का कर्तव्य पूरा करेगा। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि हमारा विश्वास स्वभाव के सारे स्नेहों से ऊपर नहीं उठता, तो हम परमेश्वर के अनुग्रह का नीचतापूर्वक अनादर करते हैं; क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को निराश करे, इससे पहले तो प्रकृति के नियम सौ बार उलट जाएँगे।
11. हे यहोवा, मुझे अपना मार्ग सिखा। बहुत-से लोग सोचते हैं कि दाऊद यहाँ यह विनती करता है कि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा उसकी अगुवाई करे, ऐसा न हो कि वह उपद्रव और दुष्टता से काम करने में अपने शत्रुओं से भी आगे बढ़ जाए। निःसन्देह यह शिक्षा बहुत उपयोगी है, परन्तु यह इस खण्ड के अभिप्राय से मेल खाती नहीं दिखती। मेरी समझ में अधिक सरल व्याख्या यह मानना है कि दाऊद अपने शत्रुओं के फन्दों और उपद्रव से बचने के लिए यह चाहता है कि परमेश्वर उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाए और उसे सुरक्षित ले चले, जिससे उसके कामों का सुखद परिणाम हो। वह सीधे मार्ग को उन कठिनाइयों और बाधाओं के विपरीत रखता है जो ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम स्थानों में होती हैं, जिन पर विजय पाने में वह असमर्थ था, जब तक कि परमेश्वर उसकी अगुवाई करने के लिए मार्गदर्शक का पद स्वयं न ग्रहण करे। परन्तु जो इस प्रकार अपने आप को परमेश्वर की रक्षा और शरण में सौंपना चाहता है, उसे पहले धूर्त और दुष्ट युक्तियों का त्याग करना होगा। हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर, जो केवल सीधे मनवालों को और उसकी सच्चाई पर भरोसा रखनेवालों को ही सुखद परिणाम देने की प्रतिज्ञा करता है, टेढ़ी और दुष्ट युक्तियों को आशीष देगा।
12. मुझ को मेरे सतानेवालों की इच्छा के वश में न कर। इब्रानी संज्ञा נפש nephesh का अर्थ लालसा, इच्छा या अभिलाषा है; और दाऊद की भाषा का आशय यह है, मुझे मेरे शत्रुओं की मनमानी या लालसा के हाथ में न सौंप; और इस प्रकार वह सूचित करता है कि वे लालच से मुँह फाड़े उसके विनाश की बाट जोह रहे थे। परमेश्वर अपने लोगों को दो रीतियों से छुड़ाता है: या तो दुष्टों की क्रूरता को शान्त करके और उन्हें नम्र बनाकर; या, यदि वह उन्हें क्रोध से जलने देता है, तो उनकी शक्ति और उपद्रव पर रोक लगाकर, जिससे वे हानि पहुँचाने की इच्छा और प्रयत्न व्यर्थ ही करते रहें। इसके बाद भजनकार यह जोड़ता है कि उसे निन्दाओं और झूठे दोषारोपणों के द्वारा भी, और खुले उपद्रव के द्वारा भी सताया जाता है; क्योंकि जब वह कहता है कि वे उपद्रव उगलते हैं, तो उसका अर्थ यह है कि वे युद्ध और संहार के सिवा और किसी बात की चर्चा नहीं करते। इस प्रकार हम देखते हैं कि वह पवित्र जन चारों ओर से बुरी तरह सताया गया था। उसकी खराई भी, जो हम जानते हैं कि असाधारण थी, उसे कड़वी और घातक निन्दाओं से मुक्त न कर सकी, और साथ ही वह अपने शत्रुओं के उपद्रव और बल से दबा हुआ था। इसलिए यदि अधर्मी कभी हमारे विरुद्ध न केवल धमकियों और क्रूर उपद्रव के साथ उठें, वरन् अपनी शत्रुता को न्याय का रूप देने के लिए झूठ के द्वारा हमारी निन्दा भी करें, तो हम दाऊद के उदाहरण को स्मरण करें, जिस पर दोनों रीतियों से आक्रमण किया गया; वरन् हम यह भी स्मरण करें कि परमेश्वर के पुत्र मसीह ने झूठी जीभों से उपद्रव से कम हानि नहीं सही। इसके अतिरिक्त, यह प्रार्थना हमारी शान्ति के लिए लिखवाई गई थी, यह सूचित करने के लिए कि परमेश्वर हमारी निर्दोषता की रक्षा कर सकता है, और हमारे शत्रुओं की क्रूरता के विरुद्ध अपनी सुरक्षा की ढाल खड़ी कर सकता है।
["En la sauvegarde et protection de Dieu." — फ्रांसीसी.] हैमण्ड इन शब्दों का अनुवाद करता है, "हानि या लूट के फूँकनेवाले या बोलनेवाले; חמס का अर्थ हानि या लूट है, और פוח का अर्थ बोलना।" ऐन्सवर्थ पढ़ता है, "वह जो उपद्रवपूर्ण अन्याय फूँकता या उगलता है।"
भजन 27:13-14
13. यदि मुझे यह विश्वास न होता कि मैं जीवितों की भूमि में यहोवा की भलाई को देखूँगा: 14. यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बाँध, और वह तेरे हृदय को दृढ़ करेगा; हाँ, यहोवा ही की बाट जोहता रह।
13. यदि मुझे यह विश्वास न होता कि मैं यहोवा की भलाई को देखूँगा। व्याख्याकारों में सामान्यतः यह सहमति है कि यह वाक्य अधूरा है। तौभी कुछ लोगों का मत है कि इब्रानी अव्यय לולא lulë दृढ़ कथन के लिए प्रयुक्त हुआ है, मानो यह एक प्रकार की शपथ हो; क्योंकि इब्रानी लोग संक्षिप्त रूप में शपथ खाने के अभ्यस्त थे; वे कथन के बीच में रुककर उसे अधूरा छोड़ देते थे, और उसके स्थान पर एक शाप समझा जाता था, अर्थात् यह कि यदि वे झूठी शपथ खाएँ तो परमेश्वर उन्हें दण्ड दे। परन्तु अधिकांश लोग एक भिन्न व्याख्या देते हैं, अर्थात् यह कि दाऊद सूचित करता है कि वह केवल विश्वास ही के द्वारा सम्भाला गया था, नहीं तो वह सौ बार नष्ट हो चुका होता। अतः वे जो अर्थ निकालते हैं वह यह है: यदि मैंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा न रखा होता, और मुझे पक्का निश्चय न होता कि वह मुझे सुरक्षित बनाए रखेगा, और यदि मैं इस निश्चय में दृढ़ न बना रहता, तो मैं पूरी रीति से नष्ट हो गया होता: इसके सिवा और कोई उपाय न था। कुछ लोग जीवितों की भूमि से स्वर्गीय मीरास समझते हैं; परन्तु यह व्याख्या खींच-तान की है, और पवित्रशास्त्र की सामान्य शैली से मेल नहीं खाती। जब हिजकिय्याह यशायाह 38:11 में लिखे अपने गीत में विलाप करता है कि उसे "जीवितों की भूमि में" परमेश्वर को देखने की कोई आशा नहीं रही, तो निःसन्देह उसका अर्थ वर्तमान जीवन है, जैसा वह तुरन्त जोड़ता है, "मैं संसार के निवासियों के बीच फिर मनुष्य को न देखूँगा।" ऐसा ही कथन एक अन्य स्थान पर भी आता है (यिर्मयाह 11:19)। अतः दाऊद को विश्वास था कि वह इसी संसार में अब भी परमेश्वर की भलाई का आनन्द लेगा, यद्यपि अब वह उसकी कृपा के सारे अनुभव से वंचित था, और उसे प्रकाश की एक चिनगारी भी दिखाई न देती थी। इसलिए मृत्यु के अन्धकार में से वह अपने आप को ईश्वरीय कृपा के दर्शन की प्रतिज्ञा देता है, और इसी निश्चय से उसका जीवन सम्भला रहता है, यद्यपि शारीरिक बुद्धि के निर्णय के अनुसार वह सुधार से परे और खोया हुआ था। तौभी यह ध्यान देने योग्य है कि दाऊद उतावली से ईश्वरीय प्रतिज्ञा से आगे नहीं बढ़ता। यह सच है कि "भक्ति सब बातों के लिए लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिए है" (1 तीमुथियुस 4:8); परन्तु यदि उसे विशेष प्रकाशन के द्वारा सूचित न किया गया होता, और निश्चित रूप से एक ऐसे उत्तराधिकारी की प्रतिज्ञा न दी गई होती जो सदा उसके सिंहासन पर विराजमान रहेगा (भजन 132:11, 12), तो वह यह निश्चय रखने का साहस कभी न करता। इसलिए उसका यह निश्चय उचित था कि जब तक यह प्रतिज्ञा पूरी न हो जाए, तब तक वह नहीं मरेगा। इसलिए, ऐसा न हो कि कोई मनुष्य उसके उदाहरण का अनुचित अनुकरण करके विश्वास की सीमाओं को लाँघ जाए, यह समझना आवश्यक है कि कौन-सी बात उसी के लिए विशेष थी और हम पर लागू नहीं होती। तौभी सामान्य रूप से हम सब को यह आशा रखनी चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर हमारे लिए खुले रूप में छुटकारा न दे, या दृश्य रीति से हम पर अपनी कृपा प्रकट न करे, तौभी वह इस वर्तमान जीवन में भी हम पर सदा दयालु रहेगा।
["De glaives et autre tels efforts." — फ्रांसीसी. "तलवारों और ऐसे ही अन्य हथियारों से।"] इब्रानी में यह पद अधूरा है, जैसा कैल्विन ने यहाँ इसका अनुवाद किया है। फ्रांसीसी संस्करण में वह पद के अन्त में ये शब्द जोड़कर लुप्त अंश की पूर्ति करता है, "C'estoit fait de moy," "मैं नष्ट हो गया होता।" हमारे अंग्रेज़ी संस्करण में पद के आरम्भ में पूरक के रूप में ये शब्द रखे गए हैं, "मैं मूर्च्छित हो गया होता।" कैल्विन का पूरक और हमारे अंग्रेज़ी संस्करण का पूरक, जो सार रूप में एक ही हैं, निःसन्देह इस खण्ड का अर्थ स्पष्ट करते हैं; परन्तु वे भजनकार द्वारा प्रयुक्त अभिव्यक्ति के उस सुन्दर आकस्मिक रूप को नष्ट कर देते हैं, जो अपने कथन के बीच में वाक्य पूरा किए बिना रुक जाता है, यद्यपि वह जो कहना चाहता था वह बहुत स्पष्ट है। "यदि मुझे यह विश्वास न होता कि मैं जीवितों की भूमि में प्रभु की भलाई को देखूँगा — तो क्या! हाय, मेरा क्या हुआ होता!" — डॉ. एडम क्लार्क। तौभी, क्योंकि לולא lulë, जिसका अनुवाद यदि न किया गया है, प्राचीन अनुवादों और कई हस्तलिपियों में नहीं है, इसलिए कुछ लोग इसे बाद में जोड़ा गया अंश मानते हैं, और बिना किसी लोप के पद का अनुवाद करते हैं। इस प्रकार वॉलफ़र्ड इसका अनुवाद करता है, "मैंने विश्वास किया है कि मैं जीवितों की भूमि में यहोवा की भलाई को देखूँगा।"
14. यहोवा की बाट जोहता रह। यह सन्देह किया जा सकता है कि क्या दाऊद, पिछले पदों में अपने विषय में बोलने के बाद, यहाँ अपना कथन दूसरों की ओर मोड़ता है, और अपने उदाहरण के द्वारा उन्हें दृढ़ता और स्थिर धीरज के लिए उत्साहित करता है, जैसा वह भजन 31:19 के अन्त में करता है, जहाँ विशेष रूप से अपने विषय में बोलने के बाद वह विषय बदलकर सब भक्तों को सम्बोधित करता है। परन्तु क्योंकि वह यहाँ एकवचन में बोलता है, और ऐसा कोई चिह्न प्रयुक्त नहीं करता जिससे प्रकट हो कि वह अपना कथन दूसरों की ओर निर्देशित करता है, इसलिए मेरी समझ में यह सम्भव है कि वह इसे अपने ही ऊपर लागू करता है, ताकि परमेश्वर पर अपने भरोसे को और अधिक प्रोत्साहित करे, ऐसा न हो कि किसी समय उसका हृदय मूर्च्छित हो जाए। क्योंकि वह अपनी निर्बलता से अवगत था, और जानता था कि उसका विश्वास उसे सुरक्षित रखने का महान साधन था, इसलिए वह भविष्य के लिए समय रहते अपने आप को दृढ़ करता है। बाट जोहने शब्द के द्वारा भी वह अपने आप को नई परीक्षाओं का स्मरण दिलाता है, और उस क्रूस को अपनी आँखों के सामने रखता है जिसे उसे उठाना होगा। हमारे विषय में तब कहा जाता है कि हम परमेश्वर की बाट जोहते हैं, जब वह अपना अनुग्रह हम से हटाकर हमें क्लेशों के नीचे मुरझाने देता है। इसलिए दाऊद एक संघर्ष से पार होकर नए संघर्षों का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार करता है। परन्तु क्योंकि इससे कठिन कोई बात नहीं कि जब परमेश्वर अपने आप को हम से छिपाता है, या अपनी सहायता में विलम्ब करता है, तब हम उस पर भरोसा रखकर उसे आदर दें, इसलिए दाऊद बल बटोरने के लिए अपने आप को उभारता है; मानो वह कहता हो, यदि भय तुझ पर चुपके से आ जाए; यदि परीक्षा तेरे विश्वास को डगमगाए; यदि शरीर की भावनाएँ उपद्रव मचाते हुए उठें, तो मूर्च्छित न हो; वरन् मन के अजेय संकल्प के द्वारा उनसे ऊपर उठने का प्रयत्न कर। इससे हम सीख सकते हैं कि परमेश्वर की सन्तान हठी उदासी से नहीं, परन्तु धीरज से विजय पाती है, जब वह शान्ति से अपने प्राण परमेश्वर को सौंप देती है; जैसा यशायाह कहता है, "शान्त रहने और भरोसा रखने में तुम्हारी वीरता होगी" (यशायाह 30:15)। ["A ce que sa foy ne soit jamais esbranier." — फ्रांसीसी. "ताकि उसका विश्वास कभी डगमगाए नहीं।"]
क्योंकि दाऊद अपने आप को बड़े और कठिन प्रयत्नों के योग्य नहीं पाता था, इसलिए वह प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर से बल उधार लेता है। यदि वह केवल इतना ही कहता, पुरुषार्थ कर, तो ऐसा प्रतीत होता कि वह अपनी स्वतन्त्र इच्छा की प्रेरणाओं का दावा कर रहा है; परन्तु क्योंकि वह तुरन्त सुधार के रूप में यह जोड़ता है कि परमेश्वर उसके हृदय को दृढ़ करने के लिए निकट रहेगा, इसलिए वह पर्याप्त स्पष्टता से दिखाता है कि जब पवित्र लोग जी-जान से संघर्ष करते हैं, तब वे अपने नहीं, वरन् किसी दूसरे के बल से लड़ते हैं। दाऊद पोपवादियों के समान अपने प्रयत्नों को आगे की पंक्ति में नहीं रखता, और फिर उसके बाद ईश्वरीय सहायता के लिए विनती नहीं करता; परन्तु अपना कर्तव्य करके भी, यह जानते हुए कि वह अपने आप में बल से रहित है, वह यह विनती करता है कि उसकी घटी पवित्र आत्मा के अनुग्रह से पूरी की जाए। और क्योंकि वह जानता था कि यह युद्ध उसके सारे जीवन भर चलता रहेगा, और प्रतिदिन नए संघर्ष उठेंगे, और पवित्र लोगों के क्लेश बहुधा लम्बे समय तक खिंचे रहते हैं, इसलिए वह परमेश्वर की बाट जोहने के विषय में अपनी कही हुई बात को फिर दोहराता है: केवल यहोवा ही की बाट जोहता रह।
कैल्विन यहाँ सेप्टुआजिंट संस्करण का प्रयोग करता प्रतीत होता है। जिसका अनुवाद वह पाठ में "हियाव बाँध" करता है, उसका अनुवाद सेप्टुआजिंट में ἀνδρίζου है, "पुरुषार्थी बन, या पुरुष के समान काम कर।" वल्गेट, जैसा वह सामान्यतः करता है, सेप्टुआजिंट का अनुसरण करते हुए "vinliter ae" पढ़ता है। पौलुस 1 कुरिन्थियों 16:13 में यही शब्द-प्रयोग करता है। ऐन्सवर्थ कहता है, "ये शिथिलता, भय, हृदय की मूर्च्छा, या अन्य दुर्बलताओं के विरुद्ध प्रोत्साहन के शब्द हैं।"
