भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 6

भजन 6

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भजन 6

भजन 6.

दाऊद, परमेश्वर के हाथ से पीड़ित होकर, यह मान लेता है कि उसने अपने पापों के द्वारा ईश्वरीय क्रोध को भड़काया था, और इसलिए छुटकारा पाने के लिए वह क्षमा की प्रार्थना करता है। साथ ही वह इस बात पर खेद प्रकट करता है कि यदि वह संसार से उठा लिया गया, तो परमेश्वर की स्तुति करने के अवसर से वंचित हो जाएगा। तत्पश्चात् भरोसा प्राप्त करके वह परमेश्वर के अनुग्रह का गुणगान करता है, और अपने उन शत्रुओं की ओर अपनी बात मोड़ता है जो उसकी विपत्तियों पर विजय का आनन्द मना रहे थे।

प्रधान बजानेवाले के लिये: नगीनोत पर, आठवें पर। दाऊद का गीत। “गीत” नाम यह दर्शाता है कि दाऊद ने इस भजन की रचना, जिसमें वह अपने संकटों के समय अपने शोक की तीव्र उथल-पुथल का वर्णन करता है, उन विपत्तियों से छुटकारा पा लेने के पश्चात् की, जिन पर वह विलाप करता है। जिस ताड़ना की वह चर्चा करता है, वह किस प्रकार की थी, यह निश्चित नहीं है। जो लोग इसे शारीरिक रोग तक ही सीमित करते हैं, वे अपने मत के समर्थन में कोई पर्याप्त वज़नदार तर्क प्रस्तुत नहीं करते। वे אמל amal शब्द पर बल देते हैं, जो तीसरे पद में आता है, जहाँ वह कहता है, “मैं निर्बल हूँ,” जिसका अर्थ निस्सन्देह रोगी होना है; परन्तु अधिक सम्भव यह है कि यहाँ इसका प्रयोग रूपक के रूप में हुआ है। वे यह भी कहते हैं कि हिजकिय्याह ने अपनी बीमारी से चंगा होने के पश्चात् मृत्यु के विषय में उन्हीं स्वरों में गीत गाया था जो यहाँ लिखे हैं। परन्तु भजन 116 में, जहाँ शारीरिक रोग का कोई उल्लेख नहीं है, भजनकार ने सारी कलीसिया के नाम से यही विलाप किया है। निस्सन्देह इन शब्दों से हम यह तो समझ सकते हैं कि दाऊद का जीवन अत्यन्त संकट में था, परन्तु सम्भव है कि जिस क्लेश के नीचे वह पीड़ित था, वह शारीरिक बीमारी के अतिरिक्त किसी और प्रकार का रहा हो। इसलिए हम इसी को अधिक निश्चित व्याख्या के रूप में ग्रहण कर सकते हैं कि उस पर कोई भारी विपत्ति आ पड़ी थी, अथवा उसे कोई ऐसा दण्ड दिया गया था जिसने उसकी दृष्टि के सामने चारों ओर केवल मृत्यु की छाया ही प्रस्तुत की। यह भी विचार करना चाहिए कि यह भजन ठीक उसी समय नहीं रचा गया जब उसने इसमें लिखी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के सामने रखीं; वरन् जिन प्रार्थनाओं पर उसने अपने संकटों और उदासी के बीच मनन किया था और जिन्हें उसने उच्चारित किया था, वे विश्राम पाने के पश्चात् लिपिबद्ध की गईं। इसी से यह स्पष्ट होता है कि वह उस शोक को, जिससे वह निश्चय ही कुछ समय तक जूझता रहा था, उस आनन्द के साथ क्यों जोड़ता है जिसका अनुभव उसने बाद में किया। “आठवें” शब्द के विषय में—जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि נגינות Neginoth किसी वाद्य-यन्त्र का सूचक है—मैं नहीं जानता कि यह कहना ठीक होगा या नहीं कि वह आठ तारोंवाली वीणा थी। मेरा झुकाव अधिकतर इस मत की ओर है कि इसका सम्बन्ध राग से है, और यह उस विशेष प्रकार के संगीत की ओर संकेत करता है जिसमें यह भजन गाया जाना था। तौभी, इतने अस्पष्ट और इतने कम महत्व के विषय में मैं हर एक को अपना अनुमान लगाने के लिए स्वतन्त्र छोड़ता हूँ।

भजन 6:1

1. हे यहोवा, अपने क्रोध में मुझे न डाँट, और अपनी जलजलाहट में मुझे ताड़ना न दे।

जो विपत्ति दाऊद अब भोग रहा था, वह कदाचित् मनुष्यों के द्वारा उस पर लाई गई थी, परन्तु वह बुद्धिमानी से यह विचार करता है कि उसका सरोकार परमेश्वर से है। वे लोग अपने क्लेशों में बहुत अनुचित रीति से अभ्यास करते हैं, जो तुरन्त अपने पापों पर निकट और स्थिर दृष्टि नहीं डालते, ताकि इसके द्वारा उनमें यह दृढ़ निश्चय उत्पन्न हो कि वे परमेश्वर के क्रोध के योग्य ठहरे हैं। तौभी हम देखते हैं कि इस विषय में लगभग सब मनुष्य कितने विचारहीन और संवेदनहीन हैं; क्योंकि जब वे चिल्लाते हैं कि हम पीड़ित और दुखी हैं, तब सौ में से कठिनाई से एक भी उस हाथ की ओर दृष्टि करता है जो मारता है। इसलिए हमारे क्लेश चाहे किसी भी ओर से आएँ, आइए हम अपने विचारों को तुरन्त परमेश्वर की ओर मोड़ना सीखें, और उसे उस न्यायी के रूप में स्वीकार करें जो हमें अपराधी ठहराकर अपने न्यायासन के सामने बुलाता है, क्योंकि हम अपनी ही इच्छा से उसके न्याय से पहले स्वयं को नहीं जाँचते। परन्तु जब मनुष्यों को विवश होकर यह अनुभव करना पड़ता है कि परमेश्वर उनसे क्रुद्ध है, तब वे बहुधा अपने आप को और अपने पापों को दोष देने के बदले अभक्ति से भरी शिकायतें करने लगते हैं; इसलिए विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि दाऊद उन क्लेशों को, जिन्हें वह अब सह रहा है, केवल परमेश्वर से आया हुआ ही नहीं बताता, वरन् उन्हें अपने पापों का न्यायसंगत प्रतिफल स्वीकार करता है। वह परमेश्वर को इस प्रकार उलाहना नहीं देता मानो वह कोई शत्रु हो जो बिना किसी उचित कारण के उसके साथ क्रूरता का व्यवहार कर रहा हो; वरन् उसे डाँटने और ताड़ना देने का अधिकार सौंपकर वह केवल यही चाहता और प्रार्थना करता है कि उस पर दिए गए दण्ड की सीमा बाँध दी जाए। इसके द्वारा वह घोषित करता है कि मनुष्यों के पापों का पलटा लेने में परमेश्वर धर्मी न्यायी है। परन्तु जैसे ही वह यह मान लेता है कि उसे न्यायोचित रीति से ताड़ना मिल रही है, वह परमेश्वर से गिड़गिड़ाकर विनती करता है कि वह उसके साथ कठोर न्याय के अनुसार, अथवा व्यवस्था की चरम कठोरता के अनुसार, व्यवहार न करे। वह दण्ड को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करता, क्योंकि यह अनुचित होता; और उसकी समझ में दण्ड से रहित रहना उसके लिए लाभदायक होने की अपेक्षा अधिक हानिकारक होता; परन्तु जिस बात से वह डरता है वह परमेश्वर का क्रोध है, जो पापियों को विनाश और सर्वनाश की धमकी देता है। क्रोध और जलजलाहट के विपरीत दाऊद मौन रूप से पितृवत् और कोमल ताड़ना को रखता है, और इस दूसरी को वह सहने के लिए तैयार था। ऐसा ही विरोध हमें यिर्मयाह के शब्दों में मिलता है (यिर्मयाह 10:24): “हे यहोवा,” वह कहता है, “मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से; अपने क्रोध में नहीं।” निस्सन्देह जब कभी परमेश्वर पापियों को दण्ड देता है तब कहा जाता है कि वह उनसे क्रुद्ध है, परन्तु उचित और यथार्थ अर्थ में नहीं, क्योंकि वह उनके शोक को हल्का करने के लिए उसमें अपने अनुग्रह की कुछ मधुरता ही नहीं मिलाता, वरन् उनके दण्ड को घटाकर और दयापूर्वक अपना हाथ खींचकर अपने आप को उनके प्रति कृपालु भी दिखाता है। परन्तु जब कभी वह दुष्टता का पलटा लेनेवाले के रूप में प्रकट होता है, तब हमारा भय से त्रस्त होना अनिवार्य है; इसलिए यह अकारण नहीं कि दाऊद, शरीर की अनुभूति के अनुसार, उसके क्रोध और जलजलाहट से डरता है। अतः अर्थ यह है: हे प्रभु, मैं निस्सन्देह मान लेता हूँ कि मैं नष्ट किए जाने और मिटा दिए जाने के योग्य हूँ; परन्तु क्योंकि मैं तेरे क्रोध की कठोरता को सह न सकूँगा, इसलिए मेरे साथ मेरी योग्यता के अनुसार व्यवहार न कर, वरन् मेरे उन पापों को क्षमा कर जिनके द्वारा मैंने तेरे क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काया है। इसलिए जब जब हम विपत्ति से दबाए जाएँ, तब तब आइए हम दाऊद के उदाहरण से इस उपचार का सहारा लेना सीखें, कि हम परमेश्वर के साथ मेल की दशा में लाए जाएँ; क्योंकि यदि हम उसकी कृपा के भागी नहीं हैं, तो यह आशा नहीं की जा सकती कि हमारा भला हो या हम फलें-फूलें। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब तक वह हमारे पाप क्षमा न करे, तब तक हम बुराइयों के बोझ से कभी मुक्त न होंगे।

शमीनीत, अर्थात् “आठवाँ”, “सबसे तीखा अथवा सबसे ऊँचा स्वर माना जाता है, जैसे अलामोत सबसे नीचा; इनके विषय में 1 इतिहास 15:20, 21 देखिए। परन्तु यह सब केवल अनुमान है; और स्वयं यहूदियों को भी अपने प्राचीन संगीत का, और उससे सम्बन्धित शब्दों के अर्थ का, कोई निश्चित ज्ञान नहीं है।” — पूल की टिप्पणियाँ (Poole's Annotations)।

भजन 6:2-3 “En faisant vengence des forfaits des hommes.” — फ्रांसीसी.

अथवा “अत्यन्त भयभीत है”। यह मूल शब्दों का बहुत ही सही अनुवाद है; מאד נבהלה nibhalah meod: और ये शब्द उन शब्दों से बहुत मिलते-जुलते हैं जो उद्धारकर्ता ने अपनी वेदना में कहे थे, “मेरा जी बहुत उदास है, यहाँ तक कि मेरे प्राण निकला चाहते हैं।”

84 “Mais toy, Seigneur, jusques a quand m'affligeras-tu?” — फ्रांसीसी. “परन्तु तू, हे प्रभु, कब तक मुझे दुःख देता रहेगा?” 85 “Des maux et chastiemens.” — फ्रांसीसी.

2. हे यहोवा, मुझ पर दया कर, क्योंकि मैं निर्बल हूँ; हे यहोवा, मुझे चंगा कर, क्योंकि मेरी हड्डियाँ भयभीत हैं। 3. और मेरा प्राण अत्यन्त व्याकुल है; और तू, हे यहोवा, कब तक?

2. मुझ पर दया कर। क्योंकि वह परमेश्वर से गिड़गिड़ाकर विनती करता है कि वह उस पर दया करे, इससे और भी स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि “क्रोध” और “जलजलाहट” शब्दों से उसका अभिप्राय क्रूरता अथवा अनुचित कठोरता नहीं था, वरन् केवल वैसा न्याय जैसा परमेश्वर तिरस्कृत लोगों पर करता है, जिन्हें वह दया करके उस प्रकार नहीं छोड़ता जैसे अपनी सन्तानों को छोड़ता है। यदि उसने यह शिकायत की होती कि उसे अन्यायपूर्वक और अत्यधिक कठोरता से दण्ड दिया जा रहा है, तो वह अब केवल कुछ इस आशय की बात जोड़ता: अपने आप को रोक, कि मुझे दण्ड देने में तू मेरे अपराध के परिमाण से आगे न बढ़ जाए। इसलिए केवल परमेश्वर की दया का आश्रय लेकर वह यह दिखाता है कि वह इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहता कि उसके साथ कठोर न्याय के अनुसार, अथवा उसकी योग्यता के अनुसार, व्यवहार न किया जाए। परमेश्वर को अपने प्रति क्षमाशील दया दिखाने के लिए प्रेरित करने हेतु वह घोषित करता है कि वह मिटने पर है: हे यहोवा, मुझ पर दया कर, क्योंकि मैं निर्बल हूँ। जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वह अपने आप को निर्बल इसलिए नहीं कहता कि वह रोगी था, वरन् इसलिए कि जो कुछ उस पर अब आ पड़ा था उससे वह गिरा दिया गया और टूट गया था। और जैसे हम जानते हैं कि हम पर दण्ड लाने में परमेश्वर का उद्देश्य हमें दीन करना है, वैसे ही जब कभी हम उसकी छड़ी के नीचे झुका दिए जाते हैं, तब उसकी दया के हम तक पहुँचने के लिए द्वार खुल जाता है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि रोगियों को चंगा करना, गिरे हुओं को उठाना, निर्बलों को सम्भालना, और अन्त में मरे हुओं को जीवन देना उसी का विशेष कार्य है, इसलिए यह बात कि हम अपने क्लेशों के नीचे डूबते जा रहे हैं, अपने आप में इस बात का पर्याप्त कारण है कि हम उसकी कृपा के खोजी हों।

जब दाऊद यह घोषित कर चुका कि उसने अपने उद्धार की आशा केवल परमेश्वर की दया पर रखी है, और शोक के साथ यह बता चुका कि वह कितना नीचे गिराया गया है, तब वह इसका वह परिणाम जोड़ता है जो उसके शारीरिक स्वास्थ्य को क्षीण करने में हुआ, और इस आशीष के पुनः प्राप्त होने के लिए प्रार्थना करता है: हे यहोवा, मुझे चंगा कर। और यही वह क्रम है जिसका हमें पालन करना चाहिए, ताकि हम जानें कि जितनी आशीषें हम परमेश्वर से माँगते हैं, वे सब उसकी सेंतमेंत भलाई के सोते से बहती हैं, और कि हम विपत्तियों और ताड़नाओं से तभी, और केवल तभी, छुड़ाए जाते हैं जब वह हम पर दया कर चुका होता है। — क्योंकि मेरी हड्डियाँ भयभीत हैं। यह उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने अभी कही, अर्थात् अपने क्लेशों की गम्भीरता ही के कारण उसने किसी राहत की आशा बाँधी; क्योंकि परमेश्वर दुखियों को जितना अधिक दबा हुआ और लगभग डूबा हुआ देखता है, उतना ही अधिक वह उनकी सहायता के लिए तत्पर रहता है। वह अपनी हड्डियों में भय का आरोप इसलिए नहीं करता कि उनमें अनुभूति है, वरन् इसलिए कि उसके शोक की प्रचण्डता ऐसी थी कि उसने उसके सारे शरीर को प्रभावित कर दिया। वह अपने मांस की चर्चा नहीं करता, जो शरीर-रचना का अधिक कोमल और संवेदनशील भाग है, वरन् अपनी हड्डियों का उल्लेख करता है, और इसके द्वारा संकेत करता है कि उसकी देह के सबसे दृढ़ भाग भी भय से काँप उठे थे। इसके पश्चात् वह इसका कारण बताते हुए कहता है, और मेरा प्राण अत्यन्त भयभीत है। मेरी समझ में संयोजक अव्यय “और” का यहाँ कारणवाचक अव्यय “क्योंकि” का अर्थ है, मानो वह कहता, मेरे हृदय की भीतरी वेदना इतनी तीव्र और प्रचण्ड है कि वह मेरे शरीर के प्रत्येक अंग की शक्ति को प्रभावित और क्षीण कर देती है। मैं उस मत से सहमत नहीं हूँ जो यहाँ “प्राण” को “जीवन” के अर्थ में लेता है, और न ही वह इस खण्ड के अभिप्राय से मेल खाता है।

3. और तू, हे यहोवा, कब तक? यह अधूरी कथन-शैली शोक की प्रचण्डता को और भी प्रबलता से व्यक्त करने का काम करती है, जो मनुष्यों के मनों को ही नहीं, वरन् उनकी जीभों को भी जकड़ लेती है, और वाक्य के बीच ही में उनकी वाणी को तोड़ और काट देती है। तौभी इस आकस्मिक कथन का अर्थ सन्दिग्ध है। कुछ लोग वाक्य को पूरा करने के लिए ये शब्द जोड़ते हैं, “क्या तू मुझे दुःख देता रहेगा, अथवा ताड़ना देता रहेगा?” दूसरे इस प्रकार पढ़ते हैं, “तू कब तक अपनी दया को रोके रखेगा?” परन्तु जो अगले पद में कहा गया है, उससे प्रकट होता है कि यह दूसरा अर्थ अधिक सम्भव है, क्योंकि वहाँ वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि वह कृपा और करुणा की दृष्टि से उस पर दृष्टि करे। इसलिए वह शिकायत करता है कि परमेश्वर ने अब उसे त्याग दिया है, अथवा उसकी कुछ भी सुधि नहीं लेता; ठीक जैसे जब कभी उसकी सहायता अथवा अनुग्रह वास्तव में हमारे पक्ष में प्रकट नहीं होता, तब परमेश्वर हमसे दूर प्रतीत होता है। परमेश्वर अपनी करुणा के कारण हमें अनुमति देता है कि हम उससे प्रार्थना करें कि वह शीघ्र हमारी सहायता करे; परन्तु जब हम उसके लम्बे विलम्ब की खुलकर शिकायत कर चुकें, तब इसलिए कि इस कारण हमारी प्रार्थनाएँ अथवा हमारा शोक सीमा से बाहर न चला जाए, हमें अपना मामला पूरी रीति से उसकी इच्छा के अधीन कर देना चाहिए, और यह नहीं चाहना चाहिए कि जितनी शीघ्रता उसे भली लगे, उससे अधिक शीघ्रता वह करे।

भजन 6:4-5

4. हे प्रभु, लौट आ, मेरे प्राण को छुड़ा; अपनी दया के निमित्त मेरा उद्धार कर। 5. क्योंकि मृत्यु में तेरा स्मरण नहीं होता; और कब्र में कौन तेरा धन्यवाद करेगा?

4. हे प्रभु, लौट आ। पिछले पदों में भजनकार ने परमेश्वर की अनुपस्थिति पर विलाप किया था, और अब वह उसकी उपस्थिति के चिह्नों के लिए गिड़गिड़ाकर विनती करता है; क्योंकि हमारा सुख इसी में है कि हम ईश्वरीय कृपादृष्टि के पात्र हों, परन्तु यदि वह हमें अपनी चिन्ता का कोई ठोस प्रमाण न दे, तो हम समझते हैं कि वह हमसे विमुख हो गया है। कि दाऊद उस समय अत्यन्त संकट में था, यह हम इन शब्दों से समझते हैं, जिनमें वह प्रार्थना करता है कि उसका प्राण मानो मृत्यु के जबड़ों से छुड़ाया जाए, और वह फिर से सुरक्षा की दशा में पहुँचाया जाए। तौभी किसी शारीरिक रोग का कोई उल्लेख नहीं है, और इसलिए मैं उसके क्लेश के प्रकार के विषय में कोई निर्णय नहीं देता। दाऊद फिर उस बात की पुष्टि करता है जिसे उसने दूसरे पद में परमेश्वर की दया के विषय में छुआ था, अर्थात् यही एकमात्र स्रोत है जिससे वह छुटकारे की आशा रखता है: अपनी दया के निमित्त मेरा उद्धार कर। मनुष्य अपनी दुर्दशाओं का उपचार तब तक कभी न पाएँगे जब तक वे अपनी योग्यताओं को—जिन पर भरोसा करके वे केवल अपने आप को धोखा देते हैं—भूलकर परमेश्वर की सेंतमेंत दया का आश्रय लेना न सीख लें।

5. क्योंकि मृत्यु में तेरा स्मरण नहीं होता। जब परमेश्वर ने सब कुछ हमें सेंतमेंत दे दिया है, तब वह बदले में अपने उपकारों के कृतज्ञ स्मरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं माँगता। इसी कृतज्ञता की ओर संकेत है जब दाऊद कहता है कि मृत्यु में परमेश्वर का कोई स्मरण न होगा, और न कब्र में उसकी स्तुति का कोई गुणगान। उसका अभिप्राय यह है कि यदि परमेश्वर के अनुग्रह से वह मृत्यु से छुड़ाया जाएगा, तो वह इसके लिए कृतज्ञ रहेगा और इसे स्मरण रखेगा। और वह विलाप करता है कि यदि वह संसार से उठा लिया गया, तो वह अपनी कृतज्ञता प्रकट करने की सामर्थ्य और अवसर से वंचित हो जाएगा, क्योंकि उस दशा में वह फिर मनुष्यों की संगति में सम्मिलित न होगा कि वहाँ परमेश्वर के नाम की प्रशंसा अथवा गुणगान करे। इस खण्ड से कुछ लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मरे हुओं में कोई अनुभूति नहीं होती, और वह उनमें पूर्णतः बुझ जाती है; परन्तु यह एक उतावला और निराधार अनुमान है, क्योंकि यहाँ परमेश्वर के अनुग्रह के उस पारस्परिक गुणगान के अतिरिक्त और किसी बात की चर्चा नहीं है, जिसमें मनुष्य तब तक लगे रहते हैं जब तक वे जीवितों की भूमि पर बने रहते हैं। हम जानते हैं कि हम पृथ्वी पर इसलिए रखे गए हैं कि एक मन और एक मुँह से परमेश्वर की स्तुति करें, और यही हमारे जीवन का उद्देश्य है। यह सच है कि मृत्यु ऐसी स्तुतियों का अन्त कर देती है; परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि विश्वासियों के प्राण, जब वे अपनी देहों से अलग हो जाते हैं, समझ से वंचित हो जाते हैं, अथवा परमेश्वर के प्रति किसी भी भाव से अछूते रहते हैं। यह भी विचार करना चाहिए कि इस अवसर पर दाऊद यह डरता था कि यदि उस पर मृत्यु आ पड़े तो परमेश्वर का न्याय उस पर आएगा, और इसी बात ने उसे परमेश्वर की स्तुति गाने के विषय में गूँगा कर दिया। केवल परमेश्वर की वह भलाई, जिसका हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, उसकी स्तुति का गुणगान करने के लिए हमारा मुँह खोलती है; और इसलिए जब कभी आनन्द और हर्ष छीन लिए जाते हैं, तब स्तुतियाँ भी अवश्य थम जाती हैं। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि परमेश्वर के क्रोध के विषय में, जो हमें अनन्त विनाश के भय से अभिभूत कर देता है, यह कहा जाए कि वह हममें परमेश्वर की स्तुतियों को बुझा देता है।

इस खण्ड से हमें एक और प्रश्न का समाधान भी मिलता है, कि दाऊद मृत्यु से इतना अधिक क्यों डरता था, मानो इस संसार से परे आशा करने के लिए कुछ भी न हो। विद्वान लोग तीन कारण गिनाते हैं कि व्यवस्था के अधीन पूर्वज मृत्यु के भय से इतने अधिक बन्धन में क्यों रहते थे। पहला यह, कि उस समय परमेश्वर का अनुग्रह मसीह के आगमन के द्वारा प्रकट न होने के कारण, प्रतिज्ञाएँ, जो अस्पष्ट थीं, उन्हें आनेवाले जीवन का केवल थोड़ा-सा परिचय देती थीं। दूसरा यह, कि वर्तमान जीवन, जिसमें परमेश्वर हमारे साथ पिता के समान व्यवहार करता है, अपने आप में वांछनीय है। और तीसरा यह, कि वे डरते थे कि कहीं उनकी मृत्यु के पश्चात् धर्म में कोई बिगाड़ की ओर परिवर्तन न हो जाए। परन्तु मुझे ये कारण पर्याप्त ठोस प्रतीत नहीं होते। दाऊद का मन सदा उस भय से घिरा नहीं रहता था जिसे वह अब अनुभव कर रहा था; और जब उसके मरने का समय आया, तब वह दिनों से तृप्त और इस जीवन से थका हुआ, शान्तिपूर्वक अपना प्राण परमेश्वर की गोद में सौंप गया। दूसरा कारण आज हम पर भी उतना ही लागू होता है जितना प्राचीन पूर्वजों पर होता था, क्योंकि परमेश्वर का पितृवत् प्रेम इस जीवन में भी हमारी ओर चमकता है, और पहले प्रबन्ध की अपेक्षा कहीं अधिक प्रकाशमान प्रमाणों के साथ। परन्तु, जैसा मैंने अभी कहा, मैं दाऊद की इस शिकायत में कुछ भिन्न बात सम्मिलित समझता हूँ, अर्थात् यह कि परमेश्वर के हाथ को अपने विरुद्ध अनुभव करते हुए, और पाप के प्रति उसकी घृणा को जानते हुए, वह भय से अभिभूत है और गहरे से गहरे संकट में फँसा है। हिजकिय्याह के विषय में भी यही कहा जा सकता है, क्योंकि उसने केवल मृत्यु से छुटकारे के लिए नहीं, वरन् परमेश्वर के उस क्रोध से छुटकारे के लिए प्रार्थना की जिसे वह अत्यन्त भयानक अनुभव कर रहा था (यशायाह 38:3)।

भजन 6:6-7

6. मैं कराहते कराहते थक गया हूँ; मैं हर रात अपनी खाट को तैराता हूँ; अपने आँसुओं से मैं अपना बिछौना भिगोता हूँ। 7. मेरी आँख शोक के मारे धुंधली हो गई है; वह मेरे सब सतानेवालों के बीच पुरानी हो गई है।

ये कथन-शैलियाँ अतिशयोक्तिपूर्ण हैं, परन्तु यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि दाऊद कवियों की रीति पर अपने शोक को बढ़ा-चढ़ाकर कहता है; वरन् वह सच्चाई और सरलता से घोषित करता है कि वह शोक कितना तीव्र और कड़वा रहा था। यह बात सदा ध्यान में रखनी चाहिए कि उसका क्लेश इतना इस कारण नहीं था कि वह शारीरिक पीड़ा से गहरा घायल हुआ था; वरन् परमेश्वर को अपने से अत्यन्त अप्रसन्न समझकर उसने मानो नरक को अपने लिए मुँह खोले हुए देखा; और इससे जो मानसिक वेदना उत्पन्न होती है, वह अन्य सब दुःखों से बढ़कर है। सचमुच, जो मनुष्य जितनी अधिक सच्चाई से परमेश्वर के प्रति समर्पित होता है, वह उसके क्रोध के बोध से उतना ही अधिक व्याकुल होता है; और यही कारण है कि पवित्र जनों ने, जो अन्यथा असाधारण साहस से सम्पन्न थे, इस विषय में अत्यन्त कोमलता और दृढ़ता का अभाव दिखाया है। और आज हमें अपने भीतर उस बात का अनुभव करने से, जिसका वर्णन दाऊद अपने विषय में करता है, हमारे शरीर की जड़ता के अतिरिक्त और कुछ नहीं रोकता। जिन्होंने थोड़ी मात्रा में भी यह अनुभव किया है कि अनन्त मृत्यु के भय से जूझना क्या होता है, वे सन्तुष्ट होंगे कि इन शब्दों में कुछ भी अतिरंजित नहीं है। इसलिए आइए हम जान लें कि यहाँ दाऊद हमारे सामने ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अपने विवेक के आतंकों से पीड़ित है, और अपने भीतर किसी साधारण प्रकार की नहीं, वरन् ऐसी यातना अनुभव कर रहा है जिसने उसे लगभग मूर्च्छित कर दिया और मरे हुए के समान पड़ा रहने दिया। शब्दों के विषय में, वह कहता है, मेरी आँख धुंधली हो गई है; क्योंकि मन का शोक सहज ही आँखों तक अपना मार्ग बना लेता है, और उनमें बहुत स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। क्योंकि עתק athak शब्द, जिसका अनुवाद मैंने “वह पुरानी हो गई है” किया है, कभी-कभी अपने स्थान से हट जाने का अर्थ देता है, इसलिए कुछ लोग इसकी व्याख्या यह करते हैं कि उसकी आँखों की दृष्टि की उत्तमता जाती रही, और उसकी दृष्टि मानो लुप्त हो गई। दूसरे इससे यह समझते हैं कि रोने से उत्पन्न सूजन के कारण उसकी आँखें छिप गई थीं। तौभी पहला मत, जिसके अनुसार दाऊद शिकायत करता है कि उसकी आँखें मानो बुढ़ापे के कारण उसका साथ छोड़ रही हैं, मुझे अधिक सरल प्रतीत होता है। जो वह आगे जोड़ता है, हर रात, उससे हम सीखते हैं कि वह लम्बे शोक से लगभग पूरी रीति से क्षीण हो गया था, और तौभी इस सारे समय में उसने परमेश्वर से प्रार्थना करना कभी नहीं छोड़ा।

86 “Car il n'est fait nulle mention de toy en la mort: qui est-ce qui to louera au sepulcher?” — फ्रांसीसी. “क्योंकि मृत्यु में तेरा कोई उल्लेख नहीं होता; और कब्र में कौन तेरी स्तुति करेगा?” 87 “Ascavoir que sentant la main de Dieu contraire, veu qu'il l'advertissoit de sa vengence contre le peche.” — फ्रांसीसी. 88 “Je baigne ma couche.” — फ्रांसीसी. “मैं अपना बिछौना भिगोता हूँ।” “Ou, je fay nager.” — फ्रांसीसी हाशिया. “अथवा, मैं तैराता हूँ।”

“II ne taut pas penser toutesfois que David amplifie sa tristesse a la facon des Poetes.” — फ्रांसीसी.

भजन 6:8-10

8. हे सब अनर्थकारियो, मेरे पास से दूर हो जाओ; क्योंकि प्रभु ने मेरे रोने का शब्द सुन लिया है। 9. प्रभु ने मेरा गिड़गिड़ाना सुन लिया है; प्रभु मेरी प्रार्थना को ग्रहण करेगा। 10. मेरे सब शत्रु लज्जित हों और अत्यन्त घबरा जाएँ; वे पीछे हटें, और एकाएक लज्जित हों।

जब दाऊद अपने दुःखों और संकटों को परमेश्वर की गोद में उँडेल चुका, तो अब वह मानो एक नया रूप धारण कर लेता है। और निस्सन्देह, अपने आप को सम्भालने और उस मात्रा के भरोसे तक पहुँचने से पहले, जैसा वह यहाँ दिखाता है, वह लम्बे समय तक आत्मा की निराशा से पीड़ित रहा था; क्योंकि हम देख चुके हैं कि उसने बहुत-सी रातें लगातार रोते हुए बिताई थीं। अब, अपने छुटकारे के लम्बे विलम्ब से वह जितना अधिक दुखी और थका हुआ था, उतनी ही अधिक तत्परता से वह विजय का गीत गाने के लिए अपने आप को उभारता है। अपने विरोधियों की ओर अपनी बात मोड़ते हुए, वह यह दिखाता है कि उसकी परीक्षाओं का कोई छोटा भाग यह नहीं था कि अभक्त मनुष्य उस पर विजय का आनन्द मनाते थे, और उसे नष्ट और आशाहीन दशा में पड़ा समझकर उसका उपहास करते थे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब वे परमेश्वर की सन्तानों को क्रूस के नीचे दबा हुआ देखते हैं, तब उनका घमण्ड और उनकी क्रूरता कितनी ढिठाई से उनके विरुद्ध अपने आप को बढ़ाती है। और शैतान उन्हें इसी के लिए उकसाता है, ताकि विश्वासी, जब अपनी आशा को ठट्ठे का विषय बना हुआ देखें, तो निराशा में धकेल दिए जाएँ। यह खण्ड हमें सिखाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह ही भक्तों के लिए जीवन की एकमात्र ज्योति है; और कि जैसे ही वह अपने क्रोध का कोई चिह्न प्रकट करता है, वे केवल अत्यन्त भयभीत ही नहीं होते, वरन् मानो मृत्यु के अन्धकार में डूब जाते हैं; जबकि दूसरी ओर, जैसे ही वे फिर से यह जान लेते हैं कि परमेश्वर उन पर दयालु है, वे तुरन्त जीवन में लौट आते हैं। ध्यान देने योग्य है कि दाऊद तीन बार दोहराता है कि उसकी प्रार्थनाएँ सुनी गईं, जिसके द्वारा वह यह साक्षी देता है कि वह अपने छुटकारे का श्रेय परमेश्वर को देता है, और अपने आप को इस भरोसे में दृढ़ करता है कि उसने व्यर्थ ही परमेश्वर का आश्रय नहीं लिया था। और यदि हम अपनी प्रार्थनाओं से कोई फल पाना चाहते हैं, तो हमें विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर के कान उनके लिए बन्द नहीं हुए हैं। रोने शब्द के द्वारा वह केवल प्रचण्डता और उत्कटता ही नहीं दर्शाता, वरन् यह भी संकेत करता है कि वह पूरी रीति से शोक और दुःखभरे विलाप में ही लगा रहा था। उस भरोसे और निश्चिन्तता पर भी ध्यान देना चाहिए जो दाऊद परमेश्वर की कृपा से अपने लिए ग्रहण करता है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि सारे संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं, चाहे वह कुछ भी हो, और चाहे वह हमारा कितना ही विरोध करे, जिसे हम तुच्छ न जान सकें, यदि हमें पूरा निश्चय हो कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है; और इसी से हम यह भी समझते हैं कि उसका पितृवत् प्रेम हमारे लिए क्या कुछ कर सकता है। एकाएक क्रियाविशेषण के द्वारा वह यह सूचित करता है कि जब प्रत्यक्ष रूप से विश्वासियों को क्लेश से छुड़ाने का कोई उपाय दिखाई नहीं देता, और जब सब कुछ निराशाजनक अथवा आशाहीन प्रतीत होता है, तब वे परमेश्वर की सामर्थ्य से सारी आशा के विपरीत छुड़ाए जाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्यों की दुःखभरी दशा को एकाएक आनन्द और सुख की दशा में बदल देता है, तब वह इसके द्वारा अपनी सामर्थ्य को और भी प्रकाशमान रीति से प्रकट करता है, और उसे और भी अद्भुत दिखाता है।

90 “Des frayeurs de la morte.” — फ्रांसीसी. “मृत्यु के आतंकों से।” 91 “A receu.” — फ्रांसीसी. “ग्रहण कर लिया है।” यही अनुवाद सब प्राचीन संस्करणों में अपनाया गया है, यद्यपि इब्रानी क्रिया भविष्यत् काल में है।

“En un moment.” — फ्रांसीसी. “एक क्षण में।”

“Avant que pouvoir se relever et venir a sentir telle asseurance qu'il monstre yci.” — फ्रांसीसी.

“मेरे रोने का शब्द, मेरा ऊँचे स्वर से रोना,” हेंगस्टेनबर्ग कहता है, और फिर वह रॉबर्ट्स की Orient. Illustr. of the Sacred Scrip. से उद्धृत करते हुए जोड़ता है, “पूर्व में मौन शोक बहुत कम जाना जाता है। इसलिए जब लोग विलाप की चर्चा करते हैं, तो वे कहते हैं, क्या मैंने उसके शोक का शब्द नहीं सुना?”

“Qu'il n'y a rien en tout le monde qui se dresse contre nous.” — फ्रांसीसी.

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