भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 19

भजन 19

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भजन 19

भजन 19.

प्रधान बजानेवाले के लिये दाऊद का भजन। दाऊद विश्वासियों को परमेश्वर की महिमा पर मनन करने के लिए उत्साहित करने के उद्देश्य से, पहले तो आकाश की रचना में, और उसकी कारीगरी की उस उत्कृष्ट व्यवस्था में जिसे हम देखते हैं, उनके सामने उस महिमा का एक दर्पण रखता है; और दूसरे, वह हमारे विचारों को व्यवस्था की ओर फेर लाता है, जिसमें परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों पर अपने आप को और भी अधिक घनिष्ठ रीति से प्रगट किया। इसी से अवसर पाकर वह स्वर्ग के इस विशेष वरदान पर विस्तार से चर्चा करता चला जाता है, और व्यवस्था के उपयोग की सराहना और महिमा करता है। अन्त में वह एक प्रार्थना के साथ भजन को समाप्त करता है।

भजन 19:1-6

1. आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन करता है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट करता है। 2. दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान प्रगट करती है। 3. कोई बोली नहीं और कोई भाषा नहीं [जहाँ] उनका शब्द सुनाई न देता हो। 4. उनका लेख सारी पृथ्वी पर फैल गया है, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं: उसने उनमें सूर्य के लिये एक तम्बू खड़ा किया है। 5. और वह दूल्हे के समान अपने कक्ष से निकलता है; वह शूरवीर के समान अपनी दौड़ दौड़ने को हर्षित होता है। 6. उसका निकलना आकाश की एक छोर से होता है, और उसका चक्कर उसकी दूसरी छोर तक होता है, और उसकी गर्मी से कोई छिपा नहीं रहता।

1. आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन करता है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि यह भजन दो भागों से बना है: पहले भाग में दाऊद परमेश्वर की उस महिमा का गुणगान करता है जो उसके कार्यों में प्रगट होती है; और दूसरे भाग में वह परमेश्वर के उस ज्ञान की प्रशंसा और बड़ाई करता है जो उसके वचन में और भी अधिक स्पष्टता से चमकता है। वह केवल आकाश का ही उल्लेख करता है; परन्तु सृष्टि के इस भाग के अन्तर्गत, जो सबसे उत्तम है और जिसकी श्रेष्ठता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, वह निस्सन्देह अंश द्वारा पूर्ण को सूचित करने की रीति से जगत की सारी रचना को सम्मिलित कर लेता है। निश्चय ही पृथ्वी के छोटे-से-छोटे कोनों में भी कोई वस्तु इतनी अस्पष्ट या तुच्छ नहीं कि उसमें परमेश्वर की सामर्थ्य और बुद्धि के कुछ चिह्न दिखाई न दें; परन्तु क्योंकि आकाश पर उसकी प्रतिमा और भी स्पष्ट रूप से खुदी हुई है, इसलिए दाऊद ने विशेषकर उसी को मनन के लिए चुना है, ताकि उसका तेज हमें जगत के सब भागों पर मनन करने की ओर ले जाए। जब कोई मनुष्य आकाश को देखने और उस पर मनन करने के द्वारा परमेश्वर को मान लेने तक पहुँचा दिया जाता है, तब वह पृथ्वी के मुख पर प्रगट उसकी बुद्धि और सामर्थ्य पर भी विचार करना और उनकी प्रशंसा करना सीखेगा, न केवल सामान्य रूप में, वरन् सबसे छोटे पौधों में भी। पहले पद में भजनकार, अपनी सामान्य रीति के अनुसार, एक ही बात को दो बार दोहराता है। वह आकाश को परमेश्वर की महिमा के साक्षियों और प्रचारकों के रूप में प्रस्तुत करता है, और गूँगी सृष्टि पर एक ऐसा गुण आरोपित करता है जो ठीक-ठीक कहें तो उसका नहीं है, ताकि वह मनुष्यों को उनकी कृतघ्नता के लिए और भी कठोरता से धिक्कारे, यदि वे ऐसी स्पष्ट गवाही को अनसुने कानों से टाल दें। बोलने की यह रीति हमें उससे कहीं अधिक प्रबलता से प्रेरित और प्रभावित करती है, जितना यदि वह यह कहता कि आकाश परमेश्वर की महिमा को दिखाता या प्रगट करता है। यह सचमुच एक बड़ी बात है कि आकाश के तेज में परमेश्वर की एक जीवित प्रतिमा हमारी दृष्टि के सामने रखी गई है; परन्तु क्योंकि जीवित वाणी हमारा ध्यान आकर्षित करने में अधिक प्रभाव रखती है, या कम-से-कम केवल देखने की अपेक्षा, जिसके साथ कोई मौखिक शिक्षा न जुड़ी हो, हमें अधिक निश्चय से और अधिक लाभ के साथ सिखाती है, इसलिए हमें उस अलंकार के बल पर ध्यान देना चाहिए जिसका प्रयोग भजनकार करता है जब वह कहता है कि आकाश अपने प्रचार के द्वारा परमेश्वर की महिमा का वर्णन करता है। [“L'entour du ciel et de l'air.” — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। “अर्थात् आकाश और वायु का मण्डप या गुम्बद।” बिशप मैन्ट भी आकाशमण्डल (expanse) पढ़ते हैं, जिसे वे अन्तरिक्ष (firmament) से अधिक शुद्ध मानते हैं। वे कहते हैं, “दूसरा शब्द यूनानी अनुवाद से लिया गया है; परन्तु इब्रानी शब्द एक ऐसी क्रिया से बना है जिसका अर्थ है फैलाना, तानना, विस्तार करना, पसारना। इसलिए उचित अनुवाद ‘आकाशमण्डल’ (विस्तार) है, जो पवित्रशास्त्र के उन दूसरे स्थलों के अनुरूप है जो सृष्टिकर्ता के विषय में कहते हैं कि वह आकाश को पर्दे के समान तानता है, और उसे रहने के तम्बू के समान फैलाता है।” (देखिए भजन 104:2; यशायाह 40:22।) “आकाश का विस्तार मिल्टन का, और अन्य कवियों का भी, बहुधा प्रयुक्त वाक्यांश है।”]

“Un jour desgorge propos a l'autre jour, et la nuict declare science a l'autre nuict.” — फ्रांसीसी. “एक दिन दूसरे दिन से बातें करता है, और रात दूसरी रात को ज्ञान प्रगट करती है।”

डॉ. गेडीज़ ने इस भजन के सम्बन्ध में टिप्पणी की है कि “नास्तिकता के विरुद्ध इससे उत्तम तर्क किसी कविता में कभी नहीं रखा गया, और न किसी में इससे अच्छी रीति से व्यक्त किया गया।”

दूसरे वाक्यांश में जो दोहराव वह करता है, वह केवल पहले की व्याख्या है। दाऊद दिखाता है कि आकाश किस प्रकार हमारे सामने परमेश्वर की महिमा का प्रचार करता है, अर्थात् खुले रूप से यह गवाही देकर कि वह संयोग से जोड़कर नहीं बना, वरन् सर्वोच्च शिल्पकार के द्वारा अद्भुत रीति से सृजा गया है। जब हम आकाश को देखते हैं, तो उस पर मनन करने के द्वारा हम उसके महान सृष्टिकर्ता तक उठाए बिना नहीं रह सकते; और वह सुन्दर व्यवस्था और अद्भुत विविधता जो आकाशीय पिण्डों की गतियों और स्थितियों को विशिष्ट बनाती है, उस सौन्दर्य और तेज के साथ जो उनमें प्रगट है, हमें उसकी व्यवस्थापक कृपा (प्रोविडेन्स) का स्पष्ट प्रमाण दिए बिना नहीं रह सकती। पवित्रशास्त्र सचमुच हमें सृष्टि का समय और रीति बताता है; परन्तु आकाश स्वयं, चाहे परमेश्वर इस विषय में कुछ भी न कहे, पर्याप्त ऊँचे और स्पष्ट स्वर से घोषणा करता है कि वह उसके हाथों से गढ़ा गया है: और यह अपने आप में मनुष्यों के सामने उसकी महिमा की गवाही देने के लिए भरपूर पर्याप्त है। जैसे ही हम परमेश्वर को वह सर्वोच्च शिल्पकार मान लेते हैं जिसने विश्व की इस सुन्दर रचना को खड़ा किया है, हमारे मन अवश्य ही उसकी असीम भलाई, बुद्धि और सामर्थ्य पर आश्चर्य से मुग्ध हो जाएँगे।

2. दिन से दिन बातें करता है। दार्शनिक लोग, जिन्हें इन विषयों में दूसरों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है, यह समझते हैं कि तारे कैसी सुन्दर व्यवस्था में सजाए गए हैं कि उनकी असंख्य संख्या के होते हुए भी उनमें कोई गड़बड़ी नहीं; परन्तु अज्ञानी और अनपढ़ लोगों के लिए दिनों का निरन्तर क्रम परमेश्वर की व्यवस्थापक कृपा का और भी निस्सन्देह प्रमाण है। इसलिए दाऊद, आकाश के विषय में कह चुकने के बाद, यहाँ उससे उतरकर जगत के दूसरे भागों की ओर नहीं जाता; वरन् एक ऐसे प्रभाव से जो अधिक इन्द्रियगोचर और हमारी समझ के अधिक निकट है, वह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने अभी कही थी, अर्थात् यह कि परमेश्वर की महिमा आकाश में न केवल चमकती है, वरन् गूँजती भी है। इन शब्दों की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से की जा सकती है, परन्तु उनकी जो भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ दी गई हैं, उनसे अर्थ में बहुत कम अन्तर पड़ता है। कुछ लोग इनका यह अर्थ बताते हैं कि कोई दिन ऐसा नहीं बीतता जिसमें परमेश्वर अपनी सामर्थ्य का कोई विशेष प्रमाण न दिखाए। दूसरों का मत है कि ये शब्द शिक्षा और ज्ञान की वृद्धि को सूचित करते हैं,—कि हर आनेवाला दिन परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी सिद्धताओं के प्रमाण में कुछ नया जोड़ता है। अन्य लोग इनका यह अर्थ समझते हैं कि दिन और रातें आपस में बातचीत करती हैं, और अपने सृष्टिकर्ता की महिमा के विषय में तर्क-वितर्क करती हैं; परन्तु यह कुछ खींच-तानकर की गई व्याख्या है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि दाऊद यहाँ दिनों और रातों के स्थिर क्रम-परिवर्तन से यह सिखाता है कि सूर्य, चन्द्रमा और तारों की गति और परिक्रमाएँ परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि के द्वारा नियमित होती हैं। चाहे हम इन शब्दों का अनुवाद दिन के बाद दिन करें, या एक दिन से दूसरे दिन, इससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता; क्योंकि दाऊद का सारा आशय समय की उस सुन्दर व्यवस्था से है जो दिनों और रातों के क्रम से उत्पन्न होती है। यदि हम उतने ही ध्यानशील होते जितना हमें होना चाहिए, तो एक ही दिन हमें परमेश्वर की महिमा की गवाही देने के लिए पर्याप्त होता, और एक ही रात हमारे लिए वही काम करने के लिए पर्याप्त होती। परन्तु जब हम सूर्य और चन्द्रमा को अपनी दैनिक परिक्रमाएँ करते देखते हैं,—सूर्य दिन में हमारे सिरों के ऊपर प्रगट होता है, और चन्द्रमा अपनी बारी में उसके पीछे आता है,—सूर्य धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, और उसी समय हमारे और निकट आता है,—और फिर अपना मार्ग मोड़कर थोड़ा-थोड़ा करके हमसे दूर चला जाता है;—और जब हम देखते हैं कि इसी साधन से दिनों और रातों की लम्बाई नियमित होती है, और उनकी लम्बाई का घटना-बढ़ना ऐसे एकरूप नियम के अनुसार व्यवस्थित है कि वह हर आनेवाले वर्ष में ठीक उन्हीं समय-बिन्दुओं पर सदा लौट आता है, तब इसमें हमें परमेश्वर की महिमा की कहीं अधिक उज्ज्वल गवाही मिलती है। इसलिए दाऊद पूरे उचित कारण से यह घोषणा करता है कि चाहे परमेश्वर मनुष्यों से एक भी शब्द न बोले, तौभी दिनों और रातों का व्यवस्थित और उपयोगी क्रम परमेश्वर की महिमा का वाक्पटुता से प्रचार करता है, और अब मनुष्यों के लिए अज्ञानता का कोई बहाना नहीं बचा; क्योंकि जब दिन और रातें हमारे प्रति शिक्षकों का काम इतनी भली-भाँति और इतनी सावधानी से करती हैं, तो यदि हम उचित रूप से ध्यान दें, तो उनकी शिक्षा के अधीन हम पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

3. कोई बोली नहीं और कोई भाषा नहीं [जहाँ] उनका शब्द सुनाई न देता हो। इस पद की दो लगभग परस्पर-विरोधी व्याख्याएँ की जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक में फिर भी सम्भाव्यता का आभास है। क्योंकि शब्दशः अनुवाद करने पर ये शब्द इस प्रकार पढ़े जाते हैं—कोई बोली नहीं, और कोई शब्द नहीं, उनका शब्द सुनाई नहीं देता—इसलिए कुछ लोग तीसरे और चौथे पदों को एक साथ जोड़ते हैं, मानो यह वाक्य उस वाक्यांश के बिना अधूरा हो जो चौथे पद के आरम्भ में आता है, उनका लेख सारी पृथ्वी पर फैल गया है, इत्यादि। उनके अनुसार अर्थ यह है:—आकाश, यह सच है, गूँगा है और उसे बोलने की शक्ति नहीं दी गई; तौभी वह पर्याप्त ऊँचे और स्पष्ट स्वर से परमेश्वर की महिमा का प्रचार करता है। परन्तु यदि दाऊद का यही आशय था, तो यह तीन बार दोहराने की क्या आवश्यकता थी कि उनके पास स्पष्ट उच्चरित वाणी नहीं है? ऐसी सर्वविदित बात पर इतना ज़ोर देना निश्चय ही निर्जीव और व्यर्थ होता। इसलिए दूसरी व्याख्या, जैसे वह अधिक व्यापक रूप से स्वीकार की गई है, वैसे ही अधिक उपयुक्त भी प्रतीत होती है। इब्रानी भाषा में, जो संक्षिप्त है, बहुधा कोई शब्द जोड़कर समझना आवश्यक होता है; और उस भाषा में यह विशेष रूप से एक सामान्य बात है कि सम्बन्धवाचक शब्द, अर्थात् जो, जिसमें, इत्यादि, छोड़ दिए जाते हैं, जैसे यहाँ: कोई बोली नहीं, कोई भाषा नहीं, [जहाँ] उनका शब्द सुनाई न देता हो।

इसके अतिरिक्त, तीसरा निषेध-वाचक शब्द, בלי beli, वाक्य के पूर्ववर्ती अंशों में कही गई बात के प्रति एक अपवाद को सूचित करता है, मानो यह कहा गया हो, भाषाओं का भेद और उनकी विविधता आकाश के प्रचार और उसकी भाषा को संसार के हर कोने में सुने और समझे जाने से नहीं रोकती। भाषाओं का भेद एक ऐसी बाधा है जो भिन्न-भिन्न जातियों को परस्पर व्यवहार बनाए रखने से रोकती है, और जो मनुष्य अपने देश में अपनी वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध है, उसे परदेश में आने पर या तो गूँगा बना देती है, या यदि वह बोलने का प्रयत्न करे तो बर्बर। और यदि कोई मनुष्य सब भाषाएँ बोल भी सकता, तौभी वह एक ही समय में एक यूनानी और एक रोमी से बात नहीं कर सकता था; क्योंकि जैसे ही वह अपनी बात एक की ओर करने लगता, दूसरा उसे समझना छोड़ देता। इसलिए दाऊद एक मौन तुलना करके उस गवाही की प्रभावशीलता को बढ़ाता है जो आकाश अपने सृष्टिकर्ता के विषय में देता है। उसकी बात का आशय यह है: भिन्न-भिन्न जातियाँ भाषा में एक-दूसरे से भिन्न हैं; परन्तु आकाश की एक सर्वसाधारण भाषा है जिससे वह बिना भेदभाव सब मनुष्यों को सिखाता है, और उनकी अपनी लापरवाही के सिवा और कुछ नहीं जो उन लोगों को भी, जो एक-दूसरे के लिए सबसे अधिक परदेशी हैं और जगत के सबसे दूर के भागों में रहते हैं, मानो एक ही शिक्षक के मुख से लाभ उठाने से रोके।

4. उनका लेख फैल गया है, इत्यादि। यहाँ प्रेरित लेखक घोषणा करता है कि आकाश किस प्रकार बिना भेदभाव सब जातियों में प्रचार करता है, अर्थात् इस कारण कि सब देशों के और पृथ्वी के सब भागों के मनुष्य समझ सकते हैं कि आकाश उनकी आँखों के सामने परमेश्वर की महिमा की गवाही देने के लिए साक्षी के रूप में रखा गया है। क्योंकि इब्रानी शब्द קו kav का अर्थ कभी रेखा (डोरी) और कभी भवन होता है, इसलिए कुछ लोग इससे यह अर्थ निकालते हैं कि आकाश की रचना, जो नियमित रीति से और मानो डोरी से नापकर बनाई गई है, जगत के सब भागों में परमेश्वर की महिमा का प्रचार करती है। परन्तु क्योंकि दाऊद यहाँ रूपक के रूप में आकाशीय पिण्डों के तेज और वैभव को ऐसे प्रस्तुत करता है मानो वे विद्यालय में एक शिक्षक के समान परमेश्वर की महिमा का प्रचार कर रहे हों, इसलिए यह कहना एक दुर्बल और अनुपयुक्त रीति होती कि आकाश की डोरी पृथ्वी की अन्तिम छोरों तक फैल गई है। इसके अतिरिक्त, वह तुरन्त अगले वाक्यांश में जोड़ता है कि उनके वचन हर स्थान में सुने जाते हैं; परन्तु वचनों और किसी भवन के सौन्दर्य में क्या सम्बन्ध है? परन्तु यदि हम קו kav का अनुवाद लेख करें, तो ये दोनों बातें भली-भाँति मेल खाएँगी: पहली, कि परमेश्वर की महिमा आकाश में लिखी और छापी गई है, मानो एक खुली पुस्तक में जिसे सब मनुष्य पढ़ सकते हैं; और दूसरी, कि साथ ही वे एक ऊँचा और स्पष्ट स्वर निकालते हैं, जो सब मनुष्यों के कानों तक पहुँचता है और सब स्थानों में अपने आप को सुनाई देता है। इस प्रकार हमें सिखाया जाता है कि जिस भाषा का उल्लेख पहले हुआ है, वह, यदि मैं ऐसा कहूँ, एक दृश्य भाषा है, अर्थात् ऐसी भाषा जो दृष्टि को सम्बोधित करती है; क्योंकि आकाश मनुष्यों की आँखों से बोलता है, उनके कानों से नहीं; और इस प्रकार दाऊद उचित ही उस सुन्दर व्यवस्था और क्रम की, जिससे आकाशीय पिण्ड सुशोभित हैं, तुलना एक लेख से करता है। कि इब्रानी शब्द קו kav का अर्थ लिखने में एक पंक्ति है, यह यशायाह 28:10 से पर्याप्त रूप से स्पष्ट है, जहाँ परमेश्वर यहूदियों की तुलना उन बालकों से करते हुए जो अभी इतनी आयु के नहीं हुए कि बड़ी उन्नति कर सकें, इस प्रकार कहता है: “आज्ञा पर आज्ञा, आज्ञा पर आज्ञा, नियम पर नियम, नियम पर नियम; थोड़ा यहाँ, थोड़ा वहाँ।”

कैल्विन और हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद के अनुवादकों, दोनों ने, ऐसा प्रतीत होता है, सेप्टुआजिंट और वल्गेट अनुवादों का अनुसरण करके जहाँ शब्द जोड़ा है, जो इब्रानी पाठ में नहीं है।

“C'est as avoir ces mots, Lequel, Laquelle, etc., comme yci Il n'y a langage, il n'y a paroles esquelles la voix de ceux ne soit ouye.” — फ्रांसीसी.

सामान्यतः इसका अर्थ नहीं होता है; परन्तु इसका प्रयोग बहुधा सब प्रकार के अपवाद-सूचक अव्ययों के लिए भी होता है, जैसे बिना, अतिरिक्त, जब तक न। इसलिए ग्रोशियस यहाँ इसका अनुवाद बिना करते हैं। क्योंकि בל bal का अर्थ अरबी में परन्तु होता है, और अरबी इब्रानी की केवल एक बोली है, इसलिए हैमण्ड यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यहूदियों में भी इसका यही अर्थ रहा होगा; और इसलिए वे इस पद का अनुवाद इस प्रकार करने का प्रस्ताव रखते हैं:—“न बोली, न शब्द, परन्तु, अथवा तौभी, [בלי beli] उनका शब्द सुनाई देता है, अथवा सुनाई दिया है।”

इसलिए मेरी समझ में अर्थ यह है कि परमेश्वर की महिमा छोटे और अस्पष्ट अक्षरों में नहीं लिखी गई, वरन् बड़े और चमकीले अक्षरों में भरपूर रीति से खुदी हुई है, जिन्हें सब मनुष्य पढ़ सकते हैं, और बड़ी सरलता से पढ़ सकते हैं। अब तक मैंने प्रेरित लेखक का सच्चा और उचित अर्थ समझाया है। कुछ लोगों ने भजन के इस भाग पर एक रूपकात्मक व्याख्या थोपकर इसे तोड़-मरोड़ दिया है; परन्तु मेरे पाठक सहज ही देख लेंगे कि यह बिना किसी कारण के किया गया है। मैंने आरम्भ में दिखाया है, और सारे कथन के उद्देश्य से भी यह स्पष्ट है, कि दाऊद व्यवस्था पर आने से पहले जगत की रचना को हमारे सामने रखता है, ताकि हम उसमें परमेश्वर की महिमा को देखें। अब यदि हम आकाश से प्रेरितों को और सूर्य से मसीह को समझें, तो उस विभाजन के लिए, जिसकी हमने चर्चा की है, कोई स्थान नहीं रहेगा; और इसके अतिरिक्त, सुसमाचार को पहले और व्यवस्था को बाद में रखना एक अनुचित क्रम होगा। यह बिलकुल स्पष्ट है कि प्रेरित कवि यहाँ परमेश्वर के उस ज्ञान का वर्णन करता है जो इस जगत में स्वाभाविक रूप से, मानो एक दर्पण में, सब मनुष्यों के सामने रखा गया है; और इसलिए मैं उस विषय पर और अधिक चर्चा करने से रुकता हूँ। तौभी, क्योंकि इन रूपकात्मक व्याख्याकारों ने अपने विचारों का समर्थन पौलुस के शब्दों से किया है, इसलिए इस कठिनाई को दूर करना आवश्यक है। पौलुस अन्यजातियों के बुलाए जाने पर चर्चा करते हुए इस बात को एक स्थापित सिद्धान्त के रूप में रखता है कि, “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा;” और फिर वह जोड़ता है कि जब तक कोई सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा उसे न जाने, तब तक उसका नाम लेना असम्भव है। परन्तु क्योंकि यहूदियों को यह एक प्रकार का अपवित्र कार्य प्रतीत होता था कि पौलुस अन्यजातियों में उद्धार की प्रतिज्ञा का प्रचार करे, इसलिए वह पूछता है कि क्या अन्यजातियों ने स्वयं नहीं सुना? और वह इस स्थल को उद्धृत करके उत्तर देता है कि उनके लिए एक खुली और सुलभ पाठशाला थी, जिसमें वे परमेश्वर का भय मानना और उसकी सेवा करना सीख सकते थे, क्योंकि “आकाश का लेख सारी पृथ्वी पर फैल गया है, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं” (रोमियों 10:18)। परन्तु पौलुस उस समय सच्चाई के साथ यह नहीं कह सकता था कि प्रेरितों के मुख से सुसमाचार का शब्द सारे जगत में सुना जा चुका है, क्योंकि वह तब तक मुश्किल से कुछ ही देशों तक पहुँचा था। दूसरे प्रेरितों का प्रचार निश्चय ही उस समय तक जगत के दूर-दूर के भागों तक नहीं फैला था, वरन् यहूदिया की सीमाओं के भीतर ही सीमित था। प्रेरित के अभिप्राय को समझना कठिन नहीं है। वह यह कहना चाहता था कि परमेश्वर ने प्राचीन समय से अन्यजातियों पर अपनी महिमा प्रगट की थी, और यह उस अधिक विस्तृत शिक्षा की भूमिका थी जो एक दिन उनमें प्रचारित की जानेवाली थी। और यद्यपि परमेश्वर के चुने हुए लोग कुछ समय तक अन्यजातियों से भिन्न और अलग दशा में रहे थे, तौभी इसे विचित्र नहीं समझना चाहिए कि अन्त में परमेश्वर ने बिना भेदभाव दोनों पर अपने आप को प्रगट किया, क्योंकि उसने अब तक उन्हें कुछ ऐसे साधनों के द्वारा अपने साथ जोड़ रखा था जो दोनों को समान रूप से सम्बोधित करते थे; जैसा पौलुस एक दूसरे स्थल में कहता है कि जब परमेश्वर ने “बीते समयों में सब जातियों को अपने-अपने मार्गों में चलने दिया, तौभी उसने अपने आप को बिना गवाह न छोड़ा” (प्रेरितों के काम 14:16, 17)। [“Et se fait ouir en totals endroits.” — फ्रांसीसी.]

अंग्रेज़ी जिनेवा बाइबल में पाठ यह है, “उनकी डोरी सारी पृथ्वी पर फैल गई है, और उनके वचन जगत की छोरों तक।” इसकी व्याख्या में हाशिये की टिप्पणी यह है, “आकाश बड़े-बड़े मोटे अक्षरों की एक पंक्ति के समान है, जो हमें परमेश्वर की महिमा दिखाती है।”

इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जिन लोगों ने यह कल्पना की है कि पौलुस दाऊद के शब्दों के वास्तविक और उचित अर्थ से हट गया, वे बड़ी भूल में हैं। पाठक संत पौलुस के उपर्युक्त स्थल पर मेरी टीका पढ़कर इसे और भी स्पष्ट रूप से समझ लेंगे।

उसने उनमें सूर्य के लिये एक तम्बू [अथवा मण्डप] खड़ा किया है। जैसे दाऊद ने जगत की सारी रचना में से विशेषकर आकाश को चुना है, जिसमें वह हमारी दृष्टि के सामने परमेश्वर की एक प्रतिमा प्रदर्शित कर सके, क्योंकि वहाँ वह अधिक स्पष्टता से देखी जा सकती है, जैसे कोई मनुष्य ऊँचे मंच पर खड़ा किए जाने पर अधिक अच्छी रीति से दिखाई देता है; वैसे ही अब वह हमें सूर्य को सर्वोच्च पद पर रखा हुआ दिखाता है, क्योंकि उसकी अद्भुत ज्योति में परमेश्वर का प्रताप शेष सब की अपेक्षा अधिक भव्यता से प्रगट होता है। यह सच है कि दूसरे ग्रहों की भी अपनी गतियाँ हैं, और मानो वे नियत स्थान हैं जिनके भीतर वे अपनी दौड़ दौड़ते हैं, और अन्तरिक्ष अपनी परिक्रमा के द्वारा सब स्थिर तारों को अपने साथ खींच ले जाता है; परन्तु दाऊद के लिए अनगढ़ और अनपढ़ लोगों को खगोल-विद्या के रहस्य सिखाने का प्रयत्न करना समय गँवाना होता; और इसलिए उसने सीधी-सादी शैली में बोलना पर्याप्त समझा, ताकि यदि सारा जगत सूर्य को देखकर परमेश्वर का भय और ज्ञान न सीखे, तो वह उसे उसकी कृतघ्नता के लिए धिक्कार सके। अतः यही कारण है कि वह कहता है कि सूर्य के लिए एक तम्बू या मण्डप खड़ा किया गया है, और यह भी कि वह आकाश की एक छोर से निकलता है और शीघ्र ही दूसरी और सामनेवाली छोर तक पहुँच जाता है। वह यहाँ सूर्य की सम्पूर्ण परिक्रमा के विषय में वैज्ञानिक रीति से चर्चा नहीं करता (जैसा वह कर सकता था, यदि वह दार्शनिकों के बीच बोल रहा होता), वरन् सबसे अनगढ़ और मन्दबुद्धि लोगों के अनुरूप अपने आप को ढालकर, वह अपने आप को आँखों के सामने प्रस्तुत होनेवाले सामान्य दृश्यों तक ही सीमित रखता है, और इसी कारण वह सूर्य के मार्ग के उस दूसरे आधे भाग की बात नहीं करता जो हमारे गोलार्द्ध में दिखाई नहीं देता। वह सूर्य में विचार करने के लिए हमारे सामने तीन बातें रखता है,—उसके रूप का तेज और श्रेष्ठता,—वह वेग जिससे वह अपनी दौड़ दौड़ता है,—और उसकी गर्मी की आश्चर्यजनक शक्ति। उसके अनुपम सौन्दर्य और मानो उसके भव्य परिधान को और भी प्रबलता से व्यक्त करने और बढ़ाने के लिए वह दूल्हे की उपमा का प्रयोग करता है। फिर वह एक दूसरी उपमा जोड़ता है, अर्थात् एक वीर पुरुष की, जो दौड़ का पुरस्कार जीतने के लिए धावक के रूप में अखाड़े में उतरता है। प्राचीन समय में जो लोग रथों पर या पैदल दौड़-मैदान में प्रतिस्पर्धा करते थे, उनका वेग अद्भुत होता था; और यद्यपि वह उस वेग की तुलना में कुछ भी नहीं था जिससे सूर्य अपनी कक्षा में चलता है, तौभी दाऊद को उन सब वस्तुओं में से, जिन्हें उसने मनुष्यों की सामान्य दृष्टि में आते देखा, कोई ऐसी वस्तु नहीं मिली जो उसके अधिक निकट पहुँचती हो। कुछ लोग सोचते हैं कि तीसरा वाक्यांश, जहाँ वह सूर्य की गर्मी की बात करता है, उसकी तथाकथित वनस्पति-पोषक गर्मी के विषय में समझा जाना चाहिए; दूसरे शब्दों में, वह गर्मी जिसके द्वारा पृथ्वी में उगनेवाली वस्तुएँ अपना बल, पोषण और बढ़वार पाती हैं। परन्तु मैं नहीं समझता कि यह अर्थ इस स्थल के अनुकूल है। यह सचमुच परमेश्वर का एक अद्भुत कार्य और उसकी भलाई का एक विशेष प्रमाण है कि सूर्य का प्रबल प्रभाव पृथ्वी में प्रवेश करके उसे फलवन्त बनाता है। परन्तु क्योंकि भजनकार कहता है कि कोई मनुष्य या कोई वस्तु उसकी गर्मी से छिपी नहीं रहती, इसलिए मैं इसे उस प्रचण्ड गर्मी के विषय में समझने की ओर अधिक झुकता हूँ जो मनुष्यों और दूसरे प्राणियों को, और पौधों और वृक्षों को भी झुलसा देती है। सूर्य की उस जीवनदायक गर्मी से, जिसके द्वारा हम अपने आप को स्फूर्ति पाते अनुभव करते हैं, कोई मनुष्य बचना नहीं चाहता। [पौलुस, सेप्टुआजिंट से, जो उस समय मुख्य रूप से प्रयुक्त पुराने नियम का अनुवाद था, उद्धृत करते हुए “उनका स्वर” पढ़ता है, और वह यहाँ φθόγγος शब्द का प्रयोग करता है।] [“Aucuns l'entendent de sa chaleur vegetative, qu'on appelle, c'est dire par laquelle ces choses basses ont vigueur, sont maintenues, et prenent accrossement.” — फ्रांसीसी.]

“Quasi stadia.” — लातीनी. “Comme des lieues ordonnees dedans les quelles elles font leurs courses.” — फ्रांसीसी.

भजन 19:7-9

7. प्रभु की व्यवस्था सिद्ध है, वह प्राण को बहाल कर देती है; यहोवा की साक्षी विश्वासयोग्य [अथवा सच्ची] है, वह बालकों को बुद्धि की शिक्षा देती है। 8. यहोवा के उपदेश सीधे हैं, वे हृदय को आनन्दित कर देते हैं; प्रभु की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है। 9. यहोवा का भय पवित्र है, वह सदा स्थिर रहता है; यहोवा के नियम सत्य हैं, और सब के सब धर्ममय ठहरते हैं।

7. प्रभु की व्यवस्था। यहाँ भजन का दूसरा भाग आरम्भ होता है। यह दिखाने के बाद कि सृष्ट वस्तुएँ, यद्यपि वे बोलती नहीं, तौभी सारी मानवजाति के लिए शिक्षकों का काम करती हैं, और सब मनुष्यों को इतनी स्पष्टता से सिखाती हैं कि एक परमेश्वर है, कि वे उन्हें निरुत्तर ठहराती हैं, भजनकार अब यहूदियों की ओर मुड़ता है, जिन पर परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा अपना और भी पूर्ण ज्ञान प्रगट किया था। यद्यपि आकाश परमेश्वर के विषय में गवाही देता है, तौभी उसकी गवाही मनुष्यों को इतनी दूर तक नहीं ले जाती कि उसके द्वारा वे सचमुच उसका भय मानना सीखें और उसका सुदृढ़ आधार वाला ज्ञान प्राप्त करें; वह केवल उन्हें निरुत्तर ठहराने का काम करती है। निस्सन्देह यह सच है कि यदि हम बहुत मन्द और जड़ न होते, तो ईश्वरत्व के वे चिह्न और प्रमाण जो जगत की रंगभूमि पर पाए जाते हैं, हमें परमेश्वर को मानने और उसका आदर करने के लिए उकसाने को भरपूर पर्याप्त हैं; परन्तु क्योंकि ऐसे स्पष्ट प्रकाश से घिरे रहकर भी हम अन्धे हैं, इसलिए परमेश्वर की महिमा का यह शानदार चित्रण, वचन की सहायता के बिना, हमें कुछ भी लाभ न देता, चाहे वह हमारे कानों में गूँजनेवाली ऊँची और स्पष्ट घोषणा के समान ही क्यों न होता। तदनुसार, परमेश्वर उन लोगों को, जिन्हें उसने उद्धार के लिए बुलाने का निश्चय किया है, विशेष अनुग्रह प्रदान करता है, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन समय में, जब उसने सब मनुष्यों को बिना किसी अपवाद के अपने कार्यों में अपने अस्तित्व के प्रमाण दिए, तब उसने केवल इब्राहीम की सन्तान को अपनी व्यवस्था दी, ताकि उसके द्वारा उन्हें अपने प्रताप का अधिक निश्चित और घनिष्ठ ज्ञान प्रदान करे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यहूदी परमेश्वर की सेवा करने के लिए दोहरे बन्धन से बँधे हैं। जब अन्यजातियों के पास, जिनसे परमेश्वर ने केवल गूँगी सृष्टि के द्वारा बात की है, अपनी अज्ञानता के लिए कोई बहाना नहीं, तो उन लोगों की जड़ता कितनी कम सहन की जा सकती है जो उस वाणी को सुनने की उपेक्षा करते हैं जो उसके अपने पवित्र मुख से निकलती है? इसलिए दाऊद का यहाँ यह उद्देश्य है कि वह यहूदियों को, जिन्हें परमेश्वर ने और भी पवित्र बन्धन से अपने साथ बाँधा था, और भी तत्पर और प्रसन्न भाव से उसकी आज्ञा मानने के लिए उत्साहित करे। आगे, व्यवस्था शब्द के अन्तर्गत वह केवल धार्मिकता से जीने के नियम को, या दस आज्ञाओं को ही नहीं समझता, वरन् उस वाचा को भी सम्मिलित करता है जिसके द्वारा परमेश्वर ने उस जाति को शेष जगत से अलग किया था, और मूसा की सारी शिक्षा को भी, जिसके अंगों को वह आगे चितौनियाँ, उपदेश और अन्य नामों से गिनाता है। ये उपाधियाँ और प्रशंसाएँ जिनसे वह व्यवस्था की गरिमा और श्रेष्ठता को ऊँचा उठाता है, केवल दस आज्ञाओं पर ठीक नहीं बैठतीं, जब तक कि उनके साथ उसी समय सेंतमेंत का लेपालकपन और उस पर निर्भर प्रतिज्ञाएँ न जुड़ी हों; और संक्षेप में, शिक्षा का वह सम्पूर्ण भाग जिससे सच्चा धर्म और भक्ति बनती है। यहाँ प्रयुक्त इब्रानी शब्दों के विषय में मैं उनमें से प्रत्येक का विशिष्ट अर्थ बहुत सूक्ष्मता से बताने के प्रयत्न में अधिक समय नहीं लगाऊँगा, क्योंकि दूसरे स्थलों से यह समझना सहज है कि वे कभी-कभी आपस में मिला दिए जाते हैं या बिना भेद प्रयुक्त होते हैं। עדות eduth, जिसका अनुवाद हम साक्षी करते हैं, सामान्यतः उस वाचा के लिए लिया जाता है जिसमें परमेश्वर ने एक ओर तो इब्राहीम की सन्तान से प्रतिज्ञा की कि वह उनका परमेश्वर होगा, और दूसरी ओर उनसे विश्वास और आज्ञाकारिता की माँग की। इसलिए यह उस पारस्परिक वाचा को सूचित करता है जो परमेश्वर और उसकी प्राचीन प्रजा के बीच बाँधी गई थी। פקודים pikkudim शब्द, जिसका अनुवाद मैंने दूसरों का अनुसरण करते हुए उपदेश (विधियाँ) किया है, कुछ लोगों द्वारा केवल विधि-संस्कारों तक सीमित किया जाता है, परन्तु मेरी समझ में अनुचित रूप से: क्योंकि मैं पाता हूँ कि यह हर स्थान पर सामान्य रूप से नियमों और आदेशों के लिए लिया जाता है। מצוה mitsvah शब्द, जो तुरन्त इसके बाद आता है, और जिसका अनुवाद हम आज्ञा करते हैं, लगभग वही अर्थ रखता है। दूसरे शब्दों पर हम उनके अपने-अपने स्थानों में विचार करेंगे। [यहाँ हमारे लेखक ने Dominus (प्रभु) का प्रयोग किया है, परन्तु इब्रानी पाठ में यह יהוה Yehovah है।]

टिण्डेल की बाइबल में पाठ यह है, “और बालकों को भी बुद्धि देती है।” अधिकांश अनुवादों में बालक शब्द का ही प्रयोग हुआ है।

इब्रानी पाठ में यह יהוה Yehovah है।

परमेश्वर की व्यवस्था की पहली प्रशंसा यह है कि वह सिद्ध है। इस शब्द से दाऊद का अभिप्राय यह है कि यदि कोई मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था में उचित रूप से शिक्षित हो, तो उसे किसी ऐसी वस्तु की घटी नहीं जो सिद्ध बुद्धि के लिए आवश्यक है। अन्यजाति लेखकों की रचनाओं में निस्सन्देह यहाँ-वहाँ बिखरे हुए सच्चे और उपयोगी वचन मिलते हैं; और यह भी सच है कि परमेश्वर ने मनुष्यों के मन में न्याय और खराई का कुछ ज्ञान डाला है; परन्तु हमारे स्वभाव की भ्रष्टता के कारण, जहाँ प्रकाशन उपलब्ध नहीं, वहाँ मनुष्यों में सत्य की सच्ची ज्योति नहीं पाई जाती, वरन् केवल कुछ खण्डित सिद्धान्त जो बहुत अस्पष्टता और सन्देह में लिपटे हुए हैं। इसलिए दाऊद उचित ही परमेश्वर की व्यवस्था के लिए यह प्रशंसा माँगता है कि उसमें सिद्ध और पूर्ण बुद्धि निहित है। क्योंकि प्राण के फेरे जाने को, जिसका वह तुरन्त बाद उल्लेख करता है, निस्सन्देह उसकी पुनःस्थापना के अर्थ में समझना चाहिए, इसलिए मुझे इसका अनुवाद इसी प्रकार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। कुछ लोग ऐसे हैं जो इस अभिव्यक्ति पर अत्यधिक सूक्ष्मता से तर्क करते हैं, और इसे मनुष्य के पश्चात्ताप और नये जन्म से सम्बन्धित बताते हैं। मैं मानता हूँ कि परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा प्राण तब तक बहाल नहीं किया जा सकता जब तक कि वह उसी समय धार्मिकता के लिए नया न किया जाए; परन्तु हमें विचार करना चाहिए कि दाऊद का उचित अभिप्राय क्या है, और वह यह है कि जैसे प्राण शरीर को बल और शक्ति देता है, वैसे ही व्यवस्था प्राण का जीवन है। यह कहने में कि प्राण बहाल किया जाता है, वह उस दयनीय दशा की ओर संकेत करता है जिसमें हम सब जन्म लेते हैं। निस्सन्देह हममें पहली सृष्टि के कुछ छोटे-छोटे अवशेष अब भी बचे हुए हैं; परन्तु क्योंकि हमारी बनावट का कोई भी भाग अशुद्धता और मलिनता से मुक्त नहीं है, इसलिए इस प्रकार भ्रष्ट और बिगड़े हुए प्राण की दशा मृत्यु से बहुत कम भिन्न है, और पूरी तरह मृत्यु की ओर ही बढ़ती है। इसलिए यह आवश्यक है कि परमेश्वर हमें शुद्धता में बहाल करने के लिए व्यवस्था को एक औषधि के रूप में प्रयोग करे; इसलिए नहीं कि व्यवस्था का अक्षर अपने आप में ऐसा कर सकता है, जैसा आगे और विस्तार से दिखाया जाएगा, वरन् इसलिए कि परमेश्वर हमारे प्राणों को बहाल करने के लिए अपने वचन को एक साधन के रूप में प्रयोग करता है।

जब भजनकार घोषणा करता है, यहोवा की साक्षी विश्वासयोग्य है, तो यह पूर्ववर्ती वाक्य का दोहराव है, जिससे व्यवस्था की खराई या सिद्धता और उसकी साक्षी की विश्वासयोग्यता या सच्चाई एक ही बात को सूचित करती हैं; अर्थात् यह कि जब हम अपने आप को परमेश्वर के वचन के द्वारा मार्गदर्शित और संचालित होने के लिए सौंप देते हैं, तब हमारे भटक जाने का कोई भय नहीं, क्योंकि यही वह मार्ग है जिससे वह अपने लोगों को सुरक्षित रूप से उद्धार तक ले जाता है। बुद्धि की शिक्षा यहाँ प्राण की पुनःस्थापना के आरम्भ के रूप में जोड़ी गई प्रतीत होती है। समझ प्राण का सबसे उत्तम गुण है; और दाऊद हमें सिखाता है कि वह व्यवस्था से प्राप्त की जानी चाहिए, क्योंकि स्वभाव से हम उससे रहित हैं। बालक शब्द से यह नहीं समझना चाहिए कि उसका अभिप्राय मनुष्यों के किसी विशेष वर्ग से है, मानो दूसरे लोग अपने आप में पर्याप्त बुद्धिमान हों; वरन् इसके द्वारा वह हमें पहले तो यह सिखाता है कि जब तक लोग व्यवस्था के अध्ययन में उन्नति न कर लें, तब तक कोई भी सही समझ से सम्पन्न नहीं होता। दूसरे, वह इसके द्वारा दिखाता है कि परमेश्वर किस प्रकार के शिष्य चाहता है, अर्थात् वे जो अपनी दृष्टि में मूर्ख हैं (1 कुरिन्थियों 3:18), और जो बालकों की श्रेणी तक नीचे उतर आते हैं, ताकि उनकी अपनी समझ का घमण्ड उन्हें पूर्ण सीखने योग्य आत्मा के साथ अपने आप को परमेश्वर के वचन की शिक्षा के प्रति सौंप देने से न रोके।

8. यहोवा के उपदेश सीधे हैं। पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि भजनकार जब प्रभु के उपदेशों को सीधे कहता है, तब वह केवल एक साधारण-सी बात कह रहा है। परन्तु यदि हम उस विरोध पर अधिक ध्यान से विचार करें जो वह निस्सन्देह व्यवस्था की सीधाई और उन टेढ़े मार्गों के बीच दिखाता है जिनमें मनुष्य अपनी ही समझ के पीछे चलकर अपने आप को उलझा लेते हैं, तो हमें निश्चय हो जाएगा कि इस प्रशंसा में उससे कहीं अधिक निहित है जितना पहली दृष्टि में दिखाई देता है। हम जानते हैं कि हर मनुष्य अपने आप से कितना बँधा हुआ है, और अपनी बुद्धि के व्यर्थ भरोसे को हमारे मनों से उखाड़ फेंकना कितना कठिन है। इसलिए इस सत्य का भली-भाँति निश्चय होना बड़े महत्त्व की बात है कि मनुष्य का जीवन तब तक ठीक रीति से व्यवस्थित नहीं हो सकता जब तक वह परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार न ढाला जाए, और इसके बिना वह केवल भूल-भुलैयों और टेढ़ी पगडण्डियों में भटक सकता है। दूसरे, दाऊद जोड़ता है कि परमेश्वर के उपदेश हृदय को आनन्दित करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उस आनन्द को छोड़ और कोई आनन्द सच्चा और ठोस नहीं जो शुद्ध विवेक से उत्पन्न होता है; और इसके भागी हम तब होते हैं जब हमें निश्चित रूप से भरोसा हो कि हमारा जीवन परमेश्वर को भाता और ग्रहणयोग्य है। निस्सन्देह विवेक की सच्ची शान्ति जिस स्रोत से निकलती है वह विश्वास है, जो हमें सेंतमेंत परमेश्वर से मेल कराता है। परन्तु जो पवित्र लोग हृदय के सच्चे प्रेम से परमेश्वर की सेवा करते हैं, उनके लिए इस ज्ञान से भी अकथनीय आनन्द उत्पन्न होता है कि वे उसकी सेवा में व्यर्थ, या प्रतिफल की आशा के बिना परिश्रम नहीं करते, क्योंकि परमेश्वर उनके जीवन का न्यायी और अनुमोदन करनेवाला है। संक्षेप में, यह आनन्द जगत के उन सब भ्रष्ट प्रलोभनों और सुखों के विरोध में रखा गया है, जो एक घातक चारा हैं और अभागे प्राणों को उनके अनन्त विनाश की ओर लुभा ले जाते हैं। भजनकार की बात का आशय यह है: जो लोग पाप करने में आनन्द लेते हैं, वे अपने लिए दुःख की भरपूर सामग्री जुटा लेते हैं; परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर की व्यवस्था का पालन मनुष्य को सच्चा आनन्द देता है। पद के अन्त में भजनकार सिखाता है कि परमेश्वर की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है। इसके द्वारा वह हमें मौन रूप से यह समझाता है कि केवल परमेश्वर की आज्ञाओं में ही हमें भले और बुरे का भेद स्थापित मिलता है, और उसे कहीं और खोजना व्यर्थ है, क्योंकि जो कुछ मनुष्य अपनी ओर से गढ़ते हैं वह केवल मैल और कूड़ा है, जो जीवन की शुद्धता को बिगाड़ देता है। वह आगे यह संकेत करता है कि मनुष्य अपनी सारी तीक्ष्णता के साथ अन्धे हैं, और जब तक वे स्वर्गीय शिक्षा की ज्योति की ओर अपनी आँखें न फेरें, तब तक सदा अन्धकार में भटकते रहते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सचमुच बुद्धिमान केवल वे ही हैं जो परमेश्वर को अपना अगुवा और मार्गदर्शक मानते हैं, उस मार्ग पर चलते हैं जो वह उन्हें दिखाता है, और उस शान्ति को यत्न से खोजते हैं जो वह अपने वचन के द्वारा प्रदान करता और सामने रखता है।

परन्तु यहाँ एक बड़ी कठिनाई का प्रश्न उठता है; क्योंकि पौलुस व्यवस्था की उन प्रशंसाओं को, जिन्हें दाऊद यहाँ गिनाता है, पूरी रीति से उलट देता हुआ प्रतीत होता है। ये बातें आपस में कैसे मेल खा सकती हैं: कि व्यवस्था मनुष्यों के प्राणों को फेर ले आती है, और फिर भी वह मरा हुआ और मार डालनेवाला अक्षर है? कि वह मनुष्यों के हृदयों को आनन्दित करती है, और फिर भी दासत्व की आत्मा को लाकर उन्हें भय से मार देती है? कि वह आँखों में ज्योति लाती है, और फिर भी हमारे मनों के सामने परदा डालकर उस ज्योति को रोक देती है जिसे भीतर तक पहुँचना चाहिए? परन्तु पहले तो हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो मैंने आरम्भ में तुम्हें दिखाई थी, कि दाऊद केवल नैतिक व्यवस्था की आज्ञाओं की ही चर्चा नहीं करता, वरन् उस सम्पूर्ण वाचा को सम्मिलित करता है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों को अपनी निज प्रजा होने के लिए लेपालक बनाया था; और इसलिए वह नैतिक व्यवस्था के साथ — जो भली रीति से जीवन बिताने का नियम है — उद्धार की सेंतमेंत प्रतिज्ञाओं को, वरन् स्वयं मसीह को जोड़ देता है, जिसमें और जिस पर यह लेपालकपन आधारित था। परन्तु पौलुस, जिसका काम ऐसे लोगों से था जो व्यवस्था को बिगाड़ते और उसका दुरुपयोग करते थे, और उसे मसीह के अनुग्रह और आत्मा से अलग कर देते थे, मूसा की सेवकाई को केवल उसी के रूप में, और अक्षर के अनुसार देखकर उसकी बात करता है। यह निश्चित है कि यदि मसीह का आत्मा व्यवस्था को जीवन न दे, तो व्यवस्था न केवल निष्फल है, वरन् अपने शिष्यों के लिए घातक भी है। मसीह के बिना व्यवस्था में कठोर और अटल कड़ाई के सिवाय और कुछ नहीं, जो सारी मनुष्यजाति को परमेश्वर के क्रोध और शाप के योग्य ठहराती है। और फिर, मसीह के बिना हमारे भीतर शरीर का ऐसा विद्रोह बना रहता है जो हमारे हृदयों में परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के प्रति बैर भड़काता है, और इसी से वह दुःखदायी दासत्व और भयानक त्रास उत्पन्न होता है जिसकी चर्चा प्रेरित करता है। व्यवस्था को देखने की ये भिन्न-भिन्न रीतियाँ हमें सहज ही दिखा देती हैं कि पौलुस और दाऊद के इन वचनों में, जो पहली दृष्टि में परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं, किस प्रकार मेल बैठाया जाए। पौलुस का अभिप्राय यह दिखाना है कि व्यवस्था, केवल अपने आप में लिए जाने पर, हमारे लिए क्या कर सकती है; अर्थात् जब वह अनुग्रह की प्रतिज्ञा के बिना हमसे उस कर्तव्य की, जो हम परमेश्वर के प्रति रखते हैं, कड़ाई और कठोरता से माँग करती है, तब वह हमारे लिए क्या कर सकती है; परन्तु दाऊद, जब वह यहाँ उसकी इस प्रकार प्रशंसा करता है, तो व्यवस्था की सम्पूर्ण शिक्षा की चर्चा करता है, जिसमें सुसमाचार भी सम्मिलित है, और इसलिए व्यवस्था के अन्तर्गत वह मसीह को भी सम्मिलित करता है।

9. यहोवा का भय पवित्र है। परमेश्वर के भय से हमें यहाँ वह रीति समझनी चाहिए जिससे परमेश्वर की सेवा की जानी चाहिए; और इसलिए यह शब्द सक्रिय अर्थ में उस शिक्षा के लिए लिया गया है जो हमें यह बताती है कि हमें किस प्रकार परमेश्वर का भय मानना चाहिए। मनुष्य साधारणतः परमेश्वर के प्रति अपना भय इस रीति से प्रकट करते हैं कि वे झूठे धर्म और भ्रष्ट उपासना गढ़ लेते हैं; और ऐसा करके वे उसके क्रोध को और भी अधिक भड़काते हैं। इसलिए दाऊद यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से इन भ्रष्ट आविष्कारों को दोषी ठहराता है, जिनके पीछे मनुष्य व्यर्थ ही अपने आप को सताते हैं, और जो प्रायः अशुद्धता को मान्यता देते हैं; और उनके विरोध में वह उचित ही दृढ़ता से कहता है कि व्यवस्था के पालन में हर उस वस्तु से छुटकारा है जो अशुद्ध करती है। वह आगे कहता है कि वह सदा तक बना रहता है; मानो वह यह कहता हो, यही अनन्त सुख का भण्डार है। हम देखते हैं कि मनुष्यजाति, भली भाँति विचार किए बिना कि वह क्या कर रही है, किस प्रकार प्रचण्ड और उत्कट लालसाओं के साथ इस संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं के पीछे दौड़ती है; परन्तु इस प्रकार सुखी जीवन की खोखली छाया को पकड़ने में वे स्वयं सच्चे सुख को खो देते हैं। दूसरे वाक्यांश में परमेश्वर की आज्ञाओं को सत्य कहकर दाऊद यह दिखाता है कि जो कुछ मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था को नियम मानकर उसका ध्यान रखे बिना, केवल अपने मन की प्रेरणा से करने का बीड़ा उठाते हैं, वह भ्रम और झूठ है। और सचमुच, वह हमें व्यवस्था से प्रेम करने और उत्साह के साथ उसके अनुसार जीवन बिताने के लिए इससे अधिक प्रभावशाली रीति से नहीं उभार सकता था कि वह हमें यह चेतावनी दे कि जो लोग परमेश्वर की व्यवस्था का कुछ भी ध्यान रखे बिना अपना जीवन चलाते हैं, वे सब अपने आप को धोखा देते हैं और निरे भ्रमों के पीछे चलते हैं। जो लोग नियम शब्द को केवल दूसरी पटिया की आज्ञाओं से सम्बन्धित बताते हैं, वे मेरी समझ में भूल करते हैं: क्योंकि दाऊद का उद्देश्य यह था कि वह भिन्न-भिन्न शब्दों के द्वारा उन लाभों की प्रशंसा करे जो विश्वासी परमेश्वर की व्यवस्था से पाते हैं। जब वह कहता है, वे सब के सब धर्ममय हैं, तो उसका अर्थ यह है कि वे बड़े से लेकर छोटे तक सब के सब, बिना एक भी अपवाद के, धर्ममय हैं। इस प्रशंसा के द्वारा वह परमेश्वर की व्यवस्था को मनुष्यों की सब शिक्षाओं से अलग करता है, क्योंकि उसमें कोई दाग या दोष नहीं पाया जा सकता, वरन् वह सब बातों में पूर्ण रीति से सिद्ध है।

भजन 19:10-11 "Apres lesquelles les hommes se tourmentent en vain." — फ्रांसीसी.

457 "Et ce qui distille des rais de miel." — फ्रांसीसी.

10. वे सोने से, वरन् बहुत से कुन्दन से भी बढ़कर मनोहर हैं; वे मधु से और छत्तों से टपकनेवाले मधु से भी अधिक मीठे हैं। 11. और उन्हीं के द्वारा तेरा दास सावधान किया जाता है; और उनके पालन करने में बड़ा प्रतिफल है।

10. वे सोने से भी बढ़कर मनोहर हैं। भजनकार अब परमेश्वर की व्यवस्था को उसके मूल्य और उसकी मिठास, दोनों के कारण ऊँचा उठाता है। यह प्रशंसा पिछले पदों में दी गई प्रशंसाओं पर आधारित है; क्योंकि जो बहुत से और बड़े लाभ उसने अभी-अभी गिनाए हैं, वे उचित ही हमें इस बात के लिए प्रेरित करें कि हम स्वर्गीय सत्य को सबसे ऊँचा और सबसे उत्तम भण्डार समझें, और उसकी तुलना में संसार के सारे सोने और चाँदी को तुच्छ जानें। कुन्दन शब्द के स्थान पर, जिसे लातीनी लोगों ने Aurum obryzum कहा है, कुछ लोग इब्रानी शब्द का अनुवाद मणि या बहुमूल्य रत्न करते हैं, परन्तु दूसरा अनुवाद, अर्थात् कुन्दन, अधिक सर्वमान्य है, अर्थात् वह सोना जो भट्ठी में शुद्ध किया और भली भाँति ताया गया हो; और पवित्रशास्त्र में बहुत से ऐसे स्थल हैं जिनसे इस अनुवाद की पुष्टि होती है। इब्रानी शब्द,פז paz, उस शब्द,פזהpazah, से निकला है जिसका अर्थ दृढ़ करना है; इससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि भजनकार किसी विशेष देश के सोने की बात नहीं करता, मानो कोई ओपीर के सोने की बात कहे, वरन् उस सोने की बात करता है जो कारीगरी से पूर्ण रीति से ताया और शुद्ध किया गया हो। ,פזpaz, किसी देश के नाम से निकलना तो दूर रहा, उलटे यिर्मयाह 10:9 से यह प्रकट होता है कि ऊफाज़ देश का नाम इसी इब्रानी शब्द से पड़ा, क्योंकि उसमें उत्तम से उत्तम सोने की खानें थीं। जहाँ तक obrizum शब्द की उत्पत्ति का प्रश्न है, जिसका प्रयोग लातीनी लोगों ने किया है, हम निश्चय के साथ कुछ नहीं कह सकते, सिवाय इसके कि जेरोम के अनुमान के अनुसार इसका अर्थ है ओपीर देश से लाया हुआ, मानो यह कहा गया हो, aurum Ophrizum। संक्षेप में, अर्थ यह है कि यदि हम व्यवस्था को संसार के सारे धन से बढ़कर न मानें, तो हम उसका उतना आदर नहीं करते जितने की वह योग्य है। यदि हम एक बार व्यवस्था को इतना बहुमूल्य समझने लगें, तो यह हमारे हृदयों को सोने और चाँदी की असीम लालसा से छुड़ाने में प्रभावशाली रीति से सहायक होगा। व्यवस्था के इस आदर के साथ उसके प्रति प्रेम और उसमें आनन्द भी जुड़ना चाहिए, ताकि वह न केवल हमें बलपूर्वक आज्ञाकारिता के अधीन करे, वरन् अपनी मिठास से हमें आकर्षित भी करे; और यह असम्भव है, जब तक कि साथ ही हम अपने भीतर शारीरिक सुखों के प्रेम को मार न डालें, जिनके द्वारा हमारा लुभाया और फँसाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जब तक हम बिगड़ी हुई रुचि के कारण परमेश्वर की धार्मिकता को ठुकराते रहते हैं। इससे हम फिर एक और प्रमाण निकाल सकते हैं कि दाऊद का कथन केवल आज्ञाओं और मरे हुए अक्षर के विषय में नहीं समझा जाना चाहिए, वरन् वह साथ ही उन प्रतिज्ञाओं को भी सम्मिलित करता है जिनके द्वारा परमेश्वर का अनुग्रह हमें दिया जाता है। यदि व्यवस्था हमें आज्ञा देने के सिवाय और कुछ न करती, तो उससे प्रेम कैसे किया जा सकता था, जबकि आज्ञा देते हुए वह हमें भयभीत करती है, क्योंकि हम सब उसके पालन में चूक जाते हैं? निश्चय ही, यदि हम व्यवस्था को क्षमा की आशा से और मसीह के आत्मा से अलग कर दें, तो उसे मधु के समान मीठा पाना तो दूर रहा, हम उलटे उसमें ऐसी कड़वाहट पाएँगे जो हमारे दुखी प्राणों को मार डालती है।

"Lequel les Latins ont nomm, Aurum obryzum." — फ्रांसीसी. सेप्तुआजिंत का अनुवाद है, λιθον τιμιον, बहुमूल्य पत्थर; और भजन संहिता 119:127 में वे इसी इब्रानी शब्द का अनुवाद τοπαζιον करते हैं, अर्थात् पुखराज, जो एक बहुमूल्य रत्न है। हेसिकियस के अनुसार यह अन्तिम यूनानी शब्द इब्रानी शब्द,פזpaz, से निकला है।

यह शब्द स्पष्टतः भजन संहिता 21:3 और अय्यूब 28:17 में कुन्दन के लिए प्रयुक्त हुआ है।

अथवा ठोस बनाना: और इसलिए,פזpaz, का अर्थ है ठोस सोना, या "भली भाँति शुद्ध किया हुआ" सोना; क्योंकि वह जितना अधिक शुद्ध किया जाता है, उतना ही अधिक ठोस होता है, और फलस्वरूप उतना ही अधिक भारी और मूल्यवान होता है। "Veu qu'en commandant elle nous espouante, a cause que nous deraillons tous en l'observation d'icelle?" — फ्रांसीसी.

11. और उन्हीं के द्वारा तेरा दास सावधान किया जाता है। ये शब्द साधारणतः परमेश्वर की सारी प्रजा पर लागू किए जा सकते हैं; परन्तु उचित रीति से इन्हें स्वयं दाऊद के विषय में समझना चाहिए, और इनके द्वारा वह गवाही देता है कि जो कुछ उसने पिछले पदों में व्यवस्था के विषय में कहा था, वह सब उसने अपने निज अनुभव से भली भाँति जान लिया था। कोई भी मनुष्य स्वर्गीय सत्य के विषय में सच्चाई और गम्भीरता से कभी नहीं बोलेगा, सिवाय उसके जिसके हृदय में वह गहराई से जमा हुआ हो। इसलिए दाऊद मान लेता है कि अपने जीवन को ठीक रीति से नियमित करने और ढालने के लिए जो कुछ भी विवेक उसमें था, उसके लिए वह परमेश्वर की व्यवस्था का ऋणी था। तौभी, यद्यपि वह उचित रीति से अपने ही विषय में बोलता है, फिर भी अपने उदाहरण के द्वारा वह एक सामान्य नियम प्रस्तुत करता है, अर्थात् यह कि यदि लोग जीवन को भली रीति से चलाने की उचित विधि पाना चाहते हैं, तो इस काम के लिए केवल परमेश्वर की व्यवस्था ही पूर्ण रूप से पर्याप्त है; परन्तु इसके विपरीत, ज्योंही लोग उससे हटते हैं, त्योंही वे अनेक भ्रमों और पापों में गिरने के जोखिम में पड़ जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि दाऊद एकाएक अपना कथन परमेश्वर की ओर मोड़कर, जो कुछ उसने कहा था उसके लिए उसे साक्षी ठहराता है, ताकि मनुष्यों को और भी प्रभावशाली रीति से यह निश्चय करा दे कि वह सच्चाई से और अपने हृदय की गहराई से बोलता है। इब्रानी शब्द,זהר zahar, जिसका अनुवाद मैंने सावधान किया जाता है किया है, सिखाने का भी अर्थ रखता है और चौकस रहने का भी, इसलिए कुछ लोग यहाँ इसका अनुवाद यों करते हैं, तेरा दास व्यवस्था की आज्ञाओं के द्वारा सिखाया जाता है, या चिताया जाता है। परन्तु जब इस वाक्य का अर्थ यह लिया जाए कि जो अपने आप को परमेश्वर के हाथ सौंप देता है कि वह उस पर शासन करे, वह सावधान और चौकस बनाया जाता है, तो उसमें कहीं अधिक अर्थ निहित होता है, और इसलिए यह अनुवाद मुझे अधिक उत्तम प्रतीत होता है। दूसरे वाक्यांश में भजनकार घोषणा करता है कि जो कोई अपने आप को परमेश्वर को सौंप देते हैं कि उसके ठहराए हुए धार्मिकता के नियम का पालन करें, उनका परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता, क्योंकि उसने उनके लिए बड़ा और भरपूर प्रतिफल रख छोड़ा है: उनके पालन करने में बड़ा प्रतिफल है। व्यवस्था की यह कोई छोटी प्रशंसा नहीं कि उसके विषय में यह कहा जाए कि उसमें परमेश्वर हमारे साथ वाचा बाँधता है, और, यों कहें, हमारी आज्ञाकारिता का प्रतिफल देने के लिए अपने आप को बाध्य कर लेता है। जो कुछ व्यवस्था में लिखा है वह सब हमसे माँगते हुए वह केवल वही माँगता है जिसका उसे अधिकार है; तौभी उसकी उदारता ऐसी सेंतमेंत और अनर्जित है कि वह अपने दासों को ऐसे प्रतिफल की प्रतिज्ञा करता है जो न्याय की दृष्टि से वह उनका ऋणी नहीं है। यह सच है कि व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ निष्फल कर दी गई हैं; परन्तु यह हमारे ही दोष से हुआ है: क्योंकि हममें से जो सबसे सिद्ध है, वह भी पूरी और सम्पूर्ण धार्मिकता से बहुत पीछे रह जाता है; और जब तक मनुष्य व्यवस्था की माँगों को पूर्ण रीति से और पूरी तरह से सन्तुष्ट न कर दें, तब तक वे अपने कामों के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं कर सकते। इस प्रकार ये दोनों शिक्षाएँ पूर्ण रूप से मेल खाती हैं: पहली, कि जो व्यवस्था को सब बातों में पूरा करता है, उसे कामों के प्रतिफल के रूप में अनन्त जीवन दिया जाएगा; और दूसरी, कि तौभी व्यवस्था सब मनुष्यों पर शाप सुनाती है, क्योंकि सारी मानवजाति कामों की धार्मिकता से रहित है। यह बात अगले पद से तुरन्त प्रकट हो जाएगी। दाऊद व्यवस्था के इस उपकार का गुणगान करने के बाद — कि वह परमेश्वर की सेवा करनेवालों को भरपूर प्रतिफल देती है — तुरन्त अपना कथन बदल देता है, और पुकार उठता है, अपनी भूलों को कौन समझ सकता है? इसके द्वारा वह सब मनुष्यों को अनन्त मृत्यु के योग्य ठहराता है, और इस प्रकार उस सारे भरोसे को जड़ से उलट देता है जो मनुष्य अपने कामों की योग्यता पर रखने को प्रवृत्त हो सकते हैं। यह आपत्ति उठाई जा सकती है कि यह प्रशंसा, तेरी आज्ञाओं के पालन करने में बड़ा प्रतिफल है, व्यवस्था को व्यर्थ ही दी गई है, क्योंकि उसका कोई फल नहीं होता। इसका उत्तर सरल है, अर्थात् यह कि लेपालकपन की वाचा में पापों की सेंतमेंत क्षमा सम्मिलित है, जिस पर धार्मिकता का गिना जाना निर्भर है, इसलिए परमेश्वर अपने लोगों के कामों का प्रतिफल देता है, यद्यपि न्याय की दृष्टि से वह उनका देय नहीं है। जो कुछ परमेश्वर व्यवस्था में उन लोगों से प्रतिज्ञा करता है जो उसकी पूर्ण रीति से आज्ञा मानते हैं, वह सच्चे विश्वासी उसकी अनुग्रहपूर्ण उदारता और पितृतुल्य भलाई के द्वारा पाते हैं, क्योंकि वह उनकी पवित्र अभिलाषाओं और आज्ञा मानने के उनके सच्चे प्रयत्नों को सिद्ध धार्मिकता के रूप में स्वीकार कर लेता है।

भजन 19:12-14

12. अपनी भूलों को कौन समझ सकता है? तू मुझे मेरे गुप्त पापों से शुद्ध कर। 13. अपने दास को ढिठाई के पापों से भी रोके रख, कि वे मुझ पर प्रभुता न करने पाएँ; तब मैं सीधा और बहुत से अधर्म से निर्दोष ठहरूँगा। 14. हे यहोवा, मेरे बल और मेरे छुड़ानेवाले, मेरे मुँह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरी दृष्टि में ग्रहणयोग्य हों।

12. अपनी भूलों को कौन समझ सकता है? यह उद्गार हमें दिखाता है कि व्यवस्था की उन प्रतिज्ञाओं का, जिनके साथ एक शर्त जुड़ी हुई है, हमें क्या उपयोग करना चाहिए। वह यह है: ज्योंही वे सामने आएँ, हर एक मनुष्य को अपने जीवन की जाँच करनी चाहिए, और न केवल अपने कामों की, वरन् अपने विचारों की भी तुलना धार्मिकता के उस सिद्ध नियम से करनी चाहिए जो व्यवस्था में ठहराया गया है। इस प्रकार ऐसा होगा कि छोटे से लेकर बड़े तक सब, यह देखकर कि वे व्यवस्था से प्रतिफल पाने की हर आशा से कट गए हैं, विवश होकर शरण के लिए परमेश्वर की दया की ओर भागेंगे। यह विचार करना पर्याप्त नहीं कि व्यवस्था की शिक्षा में क्या है; हमें अपने भीतर भी झाँकना चाहिए, ताकि हम देख सकें कि व्यवस्था के प्रति अपनी आज्ञाकारिता में हम कितने पीछे रह गए हैं। जब कभी पोप के अनुयायी यह प्रतिज्ञा सुनते हैं, "जो मनुष्य इन बातों को माने वह इनके कारण जीवित रहेगा," (लैव्यव्यवस्था 18:5,) तो वे तुरन्त अनन्त जीवन को अपने कामों की योग्यता से जोड़ने में तनिक भी नहीं हिचकते, मानो उस व्यवस्था को पूरा करना उनके अपने वश में हो, जिसका हम सब उल्लंघन करनेवाले हैं, न केवल एक बात में, वरन् उसके सब भागों में। इसलिए दाऊद, मानो चारों ओर से एक भूलभुलैया में उलझा हुआ, विस्मय के साथ स्वीकार करता है कि वह अपने पापों की बहुतायत के बोध के नीचे दब गया है। तो हमें पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि चूँकि हम व्यक्तिगत रूप से उस धार्मिकता से रहित हैं जिसकी माँग व्यवस्था करती है, इस कारण हम उस प्रतिफल की आशा से वंचित हैं जिसकी प्रतिज्ञा व्यवस्था ने की है; और दूसरे यह, कि हम परमेश्वर के सामने एक या दो दोषों के नहीं, वरन् अनगिनत पापों के दोषी हैं, यहाँ तक कि हमें अत्यन्त कड़वे शोक के साथ अपनी भ्रष्टता पर विलाप करना चाहिए, जो न केवल हमें परमेश्वर की आशीष से वंचित करती है, वरन् हमारे लिए जीवन को भी मृत्यु में बदल देती है। दाऊद ने यही किया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब उसने यह कहने के बाद कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था का पालन करनेवाले सब लोगों को उदारता से प्रतिफल देता है, यह पुकारा, अपनी भूलों को कौन समझ सकता है? तो यह उस त्रास के कारण था जिससे वह अपने पापों के विषय में सोचते हुए मारा गया था। इब्रानी शब्द ,שגיאותshegioth, से, जिसका अनुवाद हमने भूलें किया है, कुछ लोग समझते हैं कि दाऊद छोटे दोषों की ओर संकेत करता है; परन्तु मेरी समझ में उसका अभिप्राय केवल यह कहना था कि शैतान के पास इतनी युक्तियाँ हैं जिनके द्वारा वह हमारे मनों को भरमाता और अन्धा कर देता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं जो अपने पापों का सौवाँ भाग भी जानता हो। यह सच है कि पवित्र लोग प्रायः अज्ञानता और असावधानी के कारण छोटी बातों में ठोकर खाते हैं; परन्तु ऐसा भी होता है कि शैतान के फन्दों में उलझकर वे उन बड़े दोषों को भी नहीं पहचानते जो उन्होंने किए हैं। इसलिए वे सब पाप, जिन्हें करने के लिए मनुष्य अपने आप को खुली लगाम दे देते हैं, क्योंकि वे उनमें निहित बुराई का ठीक-ठीक बोध नहीं रखते और शरीर के प्रलोभनों से धोखा खाते हैं, उचित ही उस इब्रानी शब्द के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं जिसका प्रयोग दाऊद ने यहाँ किया है, और जिसका अर्थ है दोष या अज्ञानताएँ। अपने आप को और दूसरों को परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने बुलाकर वह अपने आप को और उन्हें चिताता है कि यद्यपि उनके विवेक उन्हें दोषी नहीं ठहराते, तौभी इस कारण वे निर्दोष नहीं ठहर जाते; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों के विवेक से कहीं अधिक स्पष्ट देखता है, क्योंकि जो लोग अपने भीतर सबसे अधिक ध्यान से झाँकते हैं, वे भी उन पापों के बड़े भाग को नहीं पहचानते जिनके वे दोषी हैं।

"Ses fautes." — फ्रांसीसी. "उसके दोष।" "Erreurs ou ignorances." — फ्रांसीसी हाशिया. "भूलें या अज्ञानताएँ।" हमारे लेखक ने जिस शब्द का प्रयोग किया है उसका शाब्दिक अर्थ है अहंकार या घमण्ड; और यहाँ प्रयुक्त इब्रानी शब्द का शाब्दिक अनुवाद भी यही है। कैल्विन ने फ्रांसीसी संस्करण के हाशिये पर अहंकारों की व्याख्या करते हुए यह टिप्पणी दी है, "Pechez commis par contumace et rebellion." — फ्रांसीसी.

बहुत से अधर्म से। यह अनुवाद दाऊद के अभिप्राय का ठीक-ठीक अर्थ प्रकट करता है। वह संचित दोष का भागी होने से डरता था। हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद में यह "the great transgression" (वह बड़ा अपराध) है, जिस पर वॉलफ़र्ड टिप्पणी करता है, "निश्चयवाचक उपपद 'the' का जोड़ा जाना मूल से प्रमाणित नहीं है, और ऐसी धारणा की ओर ले जाता है जो गलत है, मानो कोई निश्चित अपराध, जैसे 'पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप', अभिप्रेत हो।"

यह अंगीकार करने के बाद दाऊद क्षमा के लिए प्रार्थना जोड़ता है, तू मुझे मेरे गुप्त पापों से शुद्ध कर। शुद्ध कर शब्द को नये जन्म की आशीष से नहीं, वरन् सेंतमेंत क्षमा से सम्बन्धित समझना चाहिए; क्योंकि यहाँ प्रयुक्त इब्रानी क्रिया ,נקהnakah, एक ऐसे शब्द से निकली है जिसका अर्थ निर्दोष होना है। भजनकार अब उन्हें गुप्त पाप कहकर और भी स्पष्ट करता है कि भूलें शब्द से उसका क्या अभिप्राय था; अर्थात् वे पाप जिनके विषय में मनुष्य यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि वे पाप ही नहीं हैं, और जो इस प्रकार अपने आप को केवल जान-बूझकर और प्रत्यक्ष रूप से ऐसा करने का लक्ष्य रखकर ही धोखा नहीं देते, वरन् इसलिए कि वे परमेश्वर के न्याय की महिमा पर उचित रीति से विचार नहीं करते। अज्ञानता के बहाने और आड़ में अपने आप को धर्मी ठहराने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। और अपने दोषों के प्रति अन्धे बने रहने से भी कुछ लाभ नहीं, क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने ही मुकद्दमे में योग्य न्यायी नहीं होता। इसलिए हमें अपने आप को तब तक कभी शुद्ध और निर्दोष नहीं समझना चाहिए जब तक परमेश्वर अपने छुटकारे या दोषमुक्ति के निर्णय के द्वारा हमें ऐसा घोषित न करे। जिन दोषों को हम नहीं पहचानते, वे अवश्य ही परमेश्वर के न्याय की जाँच के अधीन आएँगे और हम पर दण्ड की आज्ञा लाएँगे, जब तक कि वह उन्हें मिटा न दे और क्षमा न कर दे; और यदि ऐसा है, तो वह कैसे बचेगा और दण्ड से छूटा रहेगा जो इनके अतिरिक्त उन पापों का भी दोषी है जिनके विषय में वह जानता है कि वह दोषी है, और जिनके कारण उसका अपना विवेक उसे अपने आप को परखने और दोषी ठहराने के लिए विवश करता है? फिर, हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम केवल एक ही अपराध के दोषी नहीं हैं, वरन् अशुद्धताओं के एक विशाल ढेर से दबे हुए हैं। जो कोई जितनी अधिक लगन से अपने आप को जाँचता है, वह उतनी ही तत्परता से दाऊद के साथ स्वीकार करेगा कि यदि परमेश्वर हमारे गुप्त दोषों को प्रकट करे, तो हममें पापों की इतनी बड़ी अथाह गहराई पाई जाएगी कि, जैसा कहते हैं, उसका न तल होगा न किनारा; क्योंकि कोई भी मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि वह कितनी रीतियों से परमेश्वर के सामने दोषी है। इससे यह भी प्रकट होता है कि पोप के अनुयायी मोहित हो गए हैं और घोरतम कपट के दोषी हैं, जब वे यह दावा करते हैं कि वे वर्ष में एक बार अपने सब पापों को सहज ही और शीघ्रता से एक गट्ठर में बाँध सकते हैं। लैटरन परिषद् का आदेश हर एक को यह आज्ञा देता है कि वह हर वर्ष एक बार अपने सब पापों का अंगीकार करे, और साथ ही घोषित करता है कि उस आदेश का पालन करने के सिवाय क्षमा की कोई आशा नहीं। इसलिए अन्धा पोप-अनुयायी अंगीकार-कक्ष में जाकर, अपने पापों को याजक के कान में बुदबुदाकर, यह समझता है कि उसने वह सब कुछ कर दिया जो अपेक्षित है, मानो वह पूरे वर्ष भर में किए गए अपने सब पापों को अपनी उँगलियों पर गिन सकता हो; जबकि पवित्र लोग भी, अपने आप को कड़ाई से जाँचकर, अपने पापों के सौवें भाग का ज्ञान भी कठिनाई से प्राप्त कर पाते हैं, और इसलिए एक स्वर से दाऊद के साथ मिलकर कहते हैं, अपनी भूलों को कौन समझ सकता है? और यह तर्क देना भी काम नहीं आएगा कि इतना पर्याप्त है कि हर एक अपनी पूरी सामर्थ्य भर अपने पापों को गिनने का कर्तव्य पूरा करे। इससे इस प्रसिद्ध आदेश की मूर्खता किसी भी अंश में कम नहीं होती। चूँकि व्यवस्था जो माँगती है उसे करना हमारे लिए असम्भव है, इसलिए जिन सब के हृदय सचमुच और गहराई से परमेश्वर के भय के सिद्धान्त से भरे हुए हैं, वे तब तक अवश्य ही निराशा से दब जाएँगे जब तक वे यह सोचते रहें कि क्षमा पाने के लिए उन्हें अपने सब पापों को गिनाना आवश्यक है; और जो लोग यह कल्पना करते हैं कि वे इस रीति से अपने पापों का बोझ उतार सकते हैं, वे निपट मूढ़ लोग होंगे। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग इन शब्दों की व्याख्या भिन्न अर्थ में करते हैं, और इन्हें ऐसी प्रार्थना मानते हैं जिसमें दाऊद परमेश्वर से विनती करता है कि वह अपने पवित्र आत्मा की अगुवाई के द्वारा उसे उसकी सब भूलों से फेर ले आए। परन्तु मेरी समझ में इन्हें क्षमा के लिए प्रार्थना ही मानना अधिक उचित है, और अगले पद में जो आता है वह पवित्र आत्मा की सहायता के लिए, और परीक्षाओं पर जय पाने में सफलता के लिए प्रार्थना है।

13. अपने दास को ढिठाई के पापों से भी रोके रख। ढिठाई के पापों से उसका अभिप्राय जाने-बूझे और प्रत्यक्ष अपराधों से है, जिनके साथ अहंकारपूर्ण तिरस्कार और हठ जुड़ा होता है। रोके रख शब्द से वह संकेत करता है कि शरीर का पाप की ओर स्वाभाविक झुकाव ऐसा है कि यदि परमेश्वर अपनी रखवाली और सुरक्षा के द्वारा उन्हें रोके न रखे, तो पवित्र लोग भी तुरन्त उसमें फूट पड़ेंगे या सिर के बल उसमें जा गिरेंगे। ध्यान देने योग्य बात है कि यद्यपि वह अपने आप को परमेश्वर का दास कहता है, तौभी वह स्वीकार करता है कि उसे लगाम की आवश्यकता थी, कहीं ऐसा न हो कि वह घमण्ड और विद्रोह के साथ परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करने में फूट पड़े। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नया जन्म पाकर वह, यह सच है, अपने पापों के बोझ के नीचे कराहता था; परन्तु दूसरी ओर वह जानता था कि शरीर का विद्रोह कितना बड़ा है, और हम परमेश्वर को भूल जाने की ओर कितने झुके हुए हैं, जिससे उसकी महिमा का तिरस्कार और सब प्रकार की अभक्ति उत्पन्न होती है। अब, यदि दाऊद, जिसने परमेश्वर के भय में इतनी उन्नति की थी, उल्लंघन करने के जोखिम से परे न था, तो वह शारीरिक और नया न बना हुआ मनुष्य, जिसमें अनगिनत अभिलाषाएँ प्रभुता करती हैं, अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपने आप को कैसे रोक और वश में रख सकेगा? तो आओ, हम यह सीखें कि यद्यपि हमारे हठीले शरीर की उच्छृंखलता आत्म-इन्कार के द्वारा पहले ही वश में की जा चुकी हो, तौभी हम डरते और काँपते हुए चलें; क्योंकि यदि परमेश्वर हमें रोके न रखे, तो हमारे हृदय परमेश्वर के प्रति अहंकारपूर्ण और ढीठ तिरस्कार से प्रचण्ड रूप से उबल उठेंगे। इस अर्थ की पुष्टि उस कारण से होती है जो तुरन्त बाद जोड़ा गया है, कि वे मुझ पर प्रभुता न करने पाएँ। इन शब्दों के द्वारा वह स्पष्ट घोषणा करता है कि यदि परमेश्वर उसकी सहायता न करे, तो वह न केवल सामना करने में असमर्थ होगा, वरन् पूरी रीति से निकृष्टतम बुराइयों की प्रभुता के अधीन हो जाएगा। इसलिए यह स्थल हमें न केवल यह सिखाता है कि सारी मनुष्यजाति स्वभाव से पाप की दास है, वरन् यह भी कि यदि परमेश्वर विश्वासियों की निरन्तर चौकसी न करे कि उन्हें पवित्रता के मार्ग में ले चले, और उसमें स्थिर बने रहने के लिए उन्हें दृढ़ करे, तो वे स्वयं भी पाप के मोल लिए हुए दास बन जाएँगे। एक और उपयोगी शिक्षा भी है जिस पर हमें यहाँ ध्यान देना है, अर्थात् यह कि हमें कभी भी क्षमा के लिए प्रार्थना इसके बिना नहीं करनी चाहिए कि साथ ही हम आनेवाले समय के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य से दृढ़ और सुरक्षित किए जाने की भी विनती करें, ताकि आगे को परीक्षाएँ हम पर हावी न होने पाएँ। और यद्यपि हम अपने हृदयों में अभिलाषा की उत्तेजनाओं को हमें कोंचते और व्याकुल करते हुए अनुभव करें, तौभी इस कारण हमें निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। जिस उपाय का हमें सहारा लेना चाहिए वह यह है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें रोके रखे। निःसन्देह दाऊद चाहता कि उसके हृदय में भ्रष्टता की कोई हलचल न हो; परन्तु यह जानते हुए कि जब तक वह मृत्यु के समय इस भ्रष्ट स्वभाव को उतार न दे, तब तक वह पाप के अवशेषों से पूरी रीति से कभी मुक्त न होगा, वह प्रार्थना करता है कि संघर्ष के लिए वह पवित्र आत्मा के अनुग्रह से सुसज्जित किया जाए, ताकि अधर्म उस पर विजयी होकर राज्य न करने पाए। पद के अन्त में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहले, दाऊद यह दृढ़ता से कहकर कि तब वह सीधा और बहुत से अधर्म से निर्दोष ठहरेगा, उसे निर्दोष बनाए रखने का आदर परमेश्वर की आत्मिक सहायता को देता है; और उस पर निर्भर रहकर वह शैतान की सारी सेनाओं पर विजय का भरोसे के साथ अपने आप को निश्चय दिलाता है। दूसरे, वह स्वीकार करता है कि यदि परमेश्वर उसकी सहायता न करे, तो वह एक विशाल बोझ से दब जाएगा, और मानो अधर्म की एक अथाह गहराई में डुबो दिया जाएगा: क्योंकि वह कहता है कि परमेश्वर की सहायता पाकर वह एक या दो दोषों से नहीं, वरन् बहुतों से निर्दोष रहेगा। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्योंही परमेश्वर का अनुग्रह हमें छोड़ देता है, त्योंही कोई भी प्रकार का पाप ऐसा नहीं जिसमें शैतान हमें फँसा न सके। तो दाऊद का यह अंगीकार हमें प्रार्थना में उत्साही होने के लिए उभारे; क्योंकि इतने अधिक और भिन्न-भिन्न फन्दों के बीच हमें सो जाना या आलसी होना शोभा नहीं देता। फिर, भजनकार के अभ्यास का दूसरा भाग भी हमारे हृदयों में प्रबल रहे — हम उसके साथ यह घमण्ड करें कि यद्यपि शैतान बहुत सी और बलवन्त सेनाओं के द्वारा हम पर आक्रमण करे, तौभी, यदि परमेश्वर की सहायता हमारे साथ हो, तो हम अजेय रहेंगे, और हर शत्रुतापूर्ण प्रयत्न के होते हुए भी अपनी खराई को दृढ़ता से थामे रहेंगे।

"Dont a bon droict toutes pechez ausquels les hommes se laschent la bride, pource qu'ils ne sentent pas abon escient le real qui y est, et sont deceus par les allechemens de la chair, sont nommez du mot Hebrie a duquel David use yci qui signifie Fautes ou Ignorances." — फ्रांसीसी. "Il se trouvera en nous un tel abysme de pechez, qu'il n'y aura no fond ne rive, comme on dit." — फ्रांसीसी. "Cela ne diminue en rien l'absurdite de ce beau decret." — फ्रांसीसी.

अर्थात्, उन्हें करनेवाले व्यक्ति को वे ज्ञात और प्रत्यक्ष होते हैं। वह जानते-बूझते पाप करता है।

14. मेरे मुँह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान। दाऊद और भी स्पष्ट रूप से विनती करता है कि वह परमेश्वर के अनुग्रह से दृढ़ किया जाए, और इस प्रकार सीधा और पवित्र जीवन बिताने के योग्य बनाया जाए। इस पद का सार यह है: हे परमेश्वर, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू न केवल मुझे उल्लंघन के बाहरी कामों में फूट पड़ने से बचाए रख, वरन् मेरी जीभ और मेरे हृदय को भी अपनी व्यवस्था की आज्ञाकारिता के अनुसार ढाल दे। हम जानते हैं कि सबसे सिद्ध लोगों के लिए भी अपने वचनों और विचारों पर ऐसी लगाम लगाना कितना कठिन है कि उनके हृदय या मुँह से ऐसी कोई बात न निकले जो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध हो; और तौभी यही भीतरी पवित्रता वह है जिसकी माँग व्यवस्था मुख्य रूप से हमसे करती है। अब, यह सद्गुण जितना दुर्लभ है — हृदय और जीभ पर यह कड़ा नियन्त्रण जितना दुर्लभ है — उतना ही अधिक हम यह सीखें कि अपने जीवन को सीधाई और ईमानदारी से नियमित करने के लिए हमारा पवित्र आत्मा के द्वारा चलाया जाना कितना आवश्यक है। ग्रहणयोग्य शब्द के द्वारा भजनकार दिखाता है कि भली रीति से जीवन बिताने का एकमात्र नियम यह है कि मनुष्य परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसके द्वारा ग्रहणयोग्य ठहराए जाने का प्रयत्न करें। अन्तिम शब्द, जिनमें वह परमेश्वर को अपना बल और अपना छुड़ानेवाला कहता है, वह इसलिए प्रयोग करता है कि अपनी विनतियों के पूरा होने के दृढ़ भरोसे में अपने आप को स्थिर करे।

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