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भजन 11
भजन 11.
यह भजन दो भागों से बना है। पहले भाग में दाऊद उन प्रबल परीक्षाओं के आक्रमणों का वर्णन करता है जिनका उसे सामना करना पड़ा था, और उस घोर व्याकुलता और चिन्ता की दशा का भी, जिसमें वह शाऊल के द्वारा सताए जाने के समय पहुँचा दिया गया था। दूसरे भाग में वह उस छुटकारे के लिए, जो परमेश्वर ने उसे प्रदान किया था, अपने को धन्य मानता है, और जगत के शासन में प्रकट होनेवाली परमेश्वर की धार्मिकता की महिमा करता है।
प्रधान बजानेवाले के लिये। दाऊद का भजन।
भजन 11:1-3
1. मैं यहोवा पर भरोसा रखता हूँ; फिर तुम मेरे प्राण से क्यों कहते हो, पक्षी की नाईं अपने पहाड़ पर भाग जाओ? 2. निश्चय, देखो! दुष्ट अपना धनुष चढ़ाएँगे, उन्होंने अपने तीर डोरी पर रखे हैं, कि सीधे मनवालों पर छिपकर चलाएँ। 3. सचमुच, नींवें ढा दी गई हैं: धर्मी ने क्या किया है?
"Ont tendu l'arc." — फ्रांसीसी. "उन्होंने अपना धनुष चढ़ाया है।"
"Mais que?" — फ्रांसीसी. "परन्तु क्या?"
1. मैं यहोवा पर भरोसा रखता हूँ। लगभग सभी व्याख्याकार यह समझते हैं कि यह वह शिकायत है जो दाऊद अपने देशवासियों के विरुद्ध करता है, कि जब वह हर ओर छिपने के स्थान ढूँढ़ता फिरता था, तब उसे कहीं साधारण मनुष्यता तक न मिली। और यह सचमुच सत्य है कि शाऊल की क्रूरता से बचने के लिए भाग निकलने के बाद अपने भटकने के सारे समय में उसे शरण का कोई सुरक्षित स्थान न मिल सका, कम से कम ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ वह कुछ समय तक भी निर्विघ्न रह सके। इसलिए वह अपने देशवासियों के विषय में उचित ही शिकायत कर सकता था कि जब वह भगोड़ा था, तब उनमें से किसी ने भी उसे आश्रय देना उचित न समझा। परन्तु मेरी समझ में वह किसी इससे ऊँची बात की ओर ध्यान दिला रहा है। जब सब मनुष्य मानो एक-दूसरे से होड़ करते हुए उसे निराशा में धकेलने का यत्न कर रहे थे, तब शरीर की दुर्बलता के अनुसार वह अवश्य ही मन की बड़ी और लगभग कुचल डालनेवाली वेदना से पीड़ित हुआ होगा; परन्तु विश्वास से दृढ़ किया जाकर वह निश्चिन्त भाव से और स्थिरता के साथ परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर टिका रहा, और इस प्रकार उन परीक्षाओं के आगे झुकने से बचा रहा जिनके सामने वह खड़ा था। इन्हीं आत्मिक संघर्षों का, जिनके द्वारा परमेश्वर ने उसके अत्यन्त संकटों के बीच उसका अभ्यास कराया, वह यहाँ वर्णन करता है। अतः, जैसा मैंने अभी कहा, इस भजन को दो भागों में बाँटना चाहिए। परमेश्वर की उस धार्मिकता का गुणगान करने से पहले, जिसे वह भक्तों की रक्षा में प्रकट करता है, भजनकार दिखाता है कि किस प्रकार उसने स्वयं मृत्यु तक का सामना किया था, और फिर भी विश्वास और सीधे विवेक के द्वारा विजय पाई थी। क्योंकि सब मनुष्य उसे यह सम्मति देते थे कि वह अपना देश छोड़कर निर्वासन के किसी ऐसे स्थान में चला जाए जहाँ वह छिपा रह सके, इस कारण कि जब तक वह उस राज्य को, जिसकी उससे प्रतिज्ञा की गई थी, त्याग न दे, तब तक उसके लिए जीवन की कोई आशा शेष न थी; इसलिए भजन के आरम्भ में वह इस कुटिल सम्मति के विरुद्ध परमेश्वर पर अपने भरोसे की ढाल खड़ी करता है।
परन्तु इस विषय में और आगे बढ़ने से पहले आइए, हम शब्दों की व्याख्या करें। शब्द נודnud, जिसका अनुवाद हमने भाग जाना किया है, बहुवचन में लिखा गया है, फिर भी वह एकवचन में पढ़ा जाता है; परन्तु मेरी सम्मति में यह एक बिगड़ा हुआ पाठ है। क्योंकि दाऊद हमें बताता है कि यह बात केवल उसी से कही गई थी, इसलिए यहूदी विद्वानों ने बहुवचन को अनुपयुक्त समझकर इस शब्द को एकवचन में पढ़ने का अधिकार अपने ऊपर ले लिया है। उनमें से कुछ, जो तथाकथित शाब्दिक अर्थ को बनाए रखना चाहते हैं, इस प्रश्न में उलझ जाते हैं कि "तुम भागो" क्यों कहा गया, "तू भाग" क्यों नहीं; और अन्त में वे एक अत्यन्त तुच्छ सूक्ष्मता का सहारा लेते हैं, मानो जिन्होंने उसे भाग जाने की सम्मति दी, उन्होंने उसके प्राण और उसकी देह दोनों को सम्बोधित किया हो। परन्तु जिस बात में कोई कठिनाई ही नहीं, उसमें इतना कष्ट उठाना व्यर्थ परिश्रम था; क्योंकि यह निश्चित है कि जिन्होंने दाऊद को सम्मति दी, उन्होंने यह नहीं कहा कि केवल वही भागे, वरन् यह कि वह अपने उन सब साथियों समेत भागे जो उसी के समान संकट में थे। इसलिए यद्यपि उन्होंने विशेष रूप से दाऊद को सम्बोधित किया, तौभी उन्होंने उसके साथियों को भी सम्मिलित किया, जिनका कारण उसके साथ एक ही था और जो वैसे ही संकट में पड़े थे। आगे आनेवाले शब्दों की व्याख्या में भी व्याख्याकारों में मतभेद है। बहुत-से लोग इसका अनुवाद तुम्हारे पहाड़ से करते हैं, मानो यह מהרכםmeharkem हो; और उनके अनुसार यहाँ पुरुष का परिवर्तन है, क्योंकि जो उससे बोल रहे थे, उन्होंने तो यह कहा होगा, हमारे पहाड़ से भाग जा। परन्तु यह कठोर और खींचतान का अर्थ है। और न मुझे यह प्रतीत होता है कि जब वे कहते हैं कि यहाँ यहूदिया को पहाड़ कहा गया है, तब उनके पक्ष में इससे अधिक कोई तर्क है। अन्य लोग समझते हैं कि हमें צפור כמו הרhar kemo tsippor पढ़ना चाहिए, अर्थात्, पक्षी की नाईं पहाड़ पर, बिना सर्वनाम के। परन्तु यदि हम उसका अनुसरण करें जो मैंने कहा है, तो इस प्रकार पढ़ना इस अंश के अभिप्राय से भली-भाँति मेल खाएगा, अपने पहाड़ पर भाग जाओ, क्योंकि तुम्हें अपने ही देश में रहने की अनुमति नहीं है। तौभी मैं यह नहीं समझता कि यहाँ किसी विशेष पहाड़ की ओर संकेत है, वरन् यह कि दाऊद को उजाड़ चट्टानों की ओर भेज दिया गया, जहाँ कहीं संयोग उसे ले जाए। जिन्होंने उसे यह सम्मति दी, उन्हें दोषी ठहराते हुए वह घोषणा करता है कि वह परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर निर्भर है, और इस प्रकार निर्वासन में चले जाने को वह तनिक भी इच्छुक नहीं। तो दाऊद की दशा ऐसी थी कि उसकी अत्यन्त आवश्यकता में सब मनुष्यों ने उसे ठुकराया और खदेड़कर दूर उजाड़ स्थानों में भगा दिया।
परन्तु क्योंकि वह यह संकेत करता प्रतीत होता है कि यदि वह अपनी सुरक्षा भागने में ढूँढ़ता तो यह अविश्वास का चिह्न होता, इसलिए यह पूछा जा सकता है कि क्या उसके लिए भागना उचित होता या नहीं; वरन् हम जानते हैं कि उसे बार-बार निर्वासन में जाने को विवश होना पड़ा, और वह एक स्थान से दूसरे स्थान को खदेड़ा गया, और कभी-कभी गुफाओं में भी छिपा रहा। मैं उत्तर देता हूँ, यह सच है कि वह एक बेचारे डरपोक पक्षी के समान अस्थिर था, जो एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता है, और अपने शत्रुओं के फन्दों से बचने के लिए उसे भिन्न-भिन्न पगडण्डियाँ ढूँढ़ने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकने को विवश होना पड़ा; तौभी उसका विश्वास ऐसा दृढ़ बना रहा कि उसने कभी अपने आप को परमेश्वर की प्रजा से अलग नहीं किया। दूसरे लोग उसे एक नष्ट हुआ मनुष्य समझते थे, ऐसा मनुष्य जिसकी दशा आशाहीन थी, और वे उसे सड़े हुए अंग से अधिक मूल्य न देते थे; तौभी उसने कभी अपने आप को कलीसिया की देह से अलग नहीं किया। और निश्चय ही ये शब्द, भाग जाओ, केवल इसी ओर ले जाते थे कि वह पूर्ण निराशा के आगे हार मान ले। परन्तु उसके लिए इन भयों के आगे झुक जाना, और मानो परिणाम के विषय में अनिश्चित होकर भाग खड़ा होना, अनुचित होता। इसलिए वह स्पष्ट रूप से कहता है कि यह उसके प्राण से कहा गया, जिसका अर्थ यह है कि ऐसे अपमानजनक तिरस्कार से उसका हृदय गहराई तक बिंध गया था, क्योंकि उसने देखा (जैसा मैं कह चुका हूँ) कि इसका एकमात्र परिणाम उसके विश्वास को डगमगाना और निर्बल करना था। संक्षेप में, यद्यपि वह परमेश्वर के सच्चे दास के योग्य सदा निर्दोष जीवन बिताता रहा था, तौभी ये द्वेषी मनुष्य उसे अपनी जन्मभूमि से सदा के लिए निर्वासित रहने का दण्ड दे देते। यह पद हमें सिखाता है कि संसार हम से चाहे कितना ही बैर करे और हमें कितना ही सताए, तौभी हमें अपने स्थान पर दृढ़ बने रहना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर दावा करने के अधिकार से अपने आप को वंचित न करें, और न वे हमारे हाथ से फिसल जाएँ; और यह भी कि हम चाहे कितना ही और कितने ही समय तक क्यों न सताए जाएँ, हमें इस विश्वास में कि परमेश्वर ने हमें बुलाया है, सदा स्थिर और अडिग बने रहना चाहिए।
238 कैल्विन का अभिप्राय यह है कि इब्रानी अक्षरों के अनुसार यह क्रिया बहुवचन में है; परन्तु इब्रानी विराम-चिह्नों के अनुसार, जो पढ़ने का नियमन करते हैं, यह एकवचन में है। पिस्काटर इस अंश पर अपनी टीका में कहता है, ",נודוnudi, स्वर-चिह्नों के अनुसार, एकवचन और स्त्रीलिंग है, और दाऊद के प्राण की ओर संकेत करता है; अक्षरों के अनुसार यह बहुवचन ,נודוnudu है, और दाऊद तथा उसके साथियों की ओर संकेत करता है। यह अन्तिम पाठ मुझे सबसे अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि एक तो इसके बाद बहुवचन का सम्बन्धवाचक आता है, और दूसरे, किसी दूसरे के प्राण को सम्बोधित करनेवाले व्यक्तियों की बात कहना कोई उचित या स्वाभाविक कथन-शैली नहीं जान पड़ती।" तौभी मेरे प्राण से इस वाक्यांश का अर्थ केवल मुझ से भी हो सकता है, जिस अर्थ में यह पवित्रशास्त्र में प्रायः प्रयुक्त होता है। 239 यही पाठ कसदी, सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट अनुवादों ने अपनाया है। हैमण्ड कहता है कि "जहाँ इब्रानी में अब ,צפור הרכםhar kemo tsippor, तुम्हारे पहाड़ पर एक गौरैया, पढ़ा जाता है, वहाँ सब प्राचीन अनुवादक एक स्वर से गौरैया की नाईं पहाड़ पर पढ़ते हैं।" हॉर्सली इन शब्दों का अनुवाद करता है, "हे गौरैयो, अपनी पहाड़ी पर भाग जाओ," और इस कथन को "एक कहावत के रूप में देखता है, जो असहायता और संकट की ऐसी दशा को सूचित करती है, जिसमें भागने के सिवा बचने की कोई आशा न थी।" संज्ञा ,צפורtsippor, जिसका अनुवाद वह गौरैये करता है, एकवचन है, और यहाँ उसका अन्वय बहुवचन क्रिया और बहुवचन सर्वनाम के साथ हुआ है। परन्तु वह टिप्पणी करता है कि क्योंकि यह शब्द, इब्रानी भाषा में पशुओं के अधिकांश नामों की भाँति, या तो एक प्राणी को या पूरी जाति को सूचित करता है, इसलिए यहाँ यह अनेक प्राणियों के लिए एकवचन में प्रयुक्त हो सकता है, और बहुवचन क्रियाओं, विशेषणों और सर्वनामों के साथ इसका अन्वय हो सकता है। 240 "Sans specifier a qui est ceste montagne. — फ्रांसीसी. "यह बताए बिना कि यह पहाड़ किसका है।"
241 "Je response que combien qu'il n'ait non plus este arrestd qu'un poure oiselet craintif qui saute de branche en branche." — फ्रांसीसी.
2. निश्चय, देखो! दुष्ट। कुछ लोग समझते हैं कि यह उन लोगों के बहाने के रूप में जोड़ा गया है जो चाहते थे कि दाऊद भागकर अपनी जान बचाए। दूसरों के अनुसार दाऊद अपने देशवासियों से विवाद करता है, जिन्होंने देखा कि मृत्यु चारों ओर से उसे धमका रही है, फिर भी उसे आश्रय देने से इनकार किया। परन्तु मेरे विचार में वह यहाँ उन कठिन परिस्थितियों का वर्णन जारी रखता है जिनमें वह पड़ा हुआ था। उसका अभिप्राय केवल उन संकटों को हमारी आँखों के सामने रखना नहीं है जिनसे वह घिरा था, वरन् हमें यह दिखाना है कि वह स्वयं मृत्यु तक के सम्मुख खड़ा था। इसलिए वह कहता है कि वह जहाँ कहीं छिपता, अपने शत्रुओं के हाथों से बच निकलना उसके लिए असम्भव था। अब ऐसी दयनीय दशा का वर्णन उस छुटकारे में, जो परमेश्वर ने बाद में उसे प्रदान किया, परमेश्वर के अनुग्रह को और भी स्पष्टता से उजागर करता है। शब्दों के विषय में, उन्होंने अपने तीर डोरी पर रखे हैं, कि छिपकर, या अन्धकार में, चलाएँ, कुछ लोग इन्हें लाक्षणिक रूप से उन प्रयत्नों के विषय में समझते हैं जो दाऊद के शत्रुओं ने छल और फन्दों के द्वारा उसे अचानक पकड़ने के लिए किए। तौभी मैं इस व्याख्या को अधिक सरल होने के कारण पसन्द करता हूँ, कि कोई स्थान इतना छिपा न था जिसमें उसके शत्रुओं के बाण न पहुँचते हों, और इसलिए वह छिपने और आश्रय पाने के लिए चाहे जिन गुफाओं में चला जाता, मृत्यु उसकी अविभाज्य संगिनी के समान उसके पीछे-पीछे चलती।
242 "Combien que les autres le tenissent pour un homme perdu et duquel les affaires estoyent bors d'espoir et qu'ils n'en felssent non plus de casque d'un membre pourri." — फ्रांसीसी.
243 "Nous deteste et poursuyve." — फ्रांसीसी.
3. सचमुच, नींवें ढा दी गई हैं। कुछ लोग शब्द השתות hashathoth का अनुवाद जाल करते हैं, जिस अर्थ में पवित्रशास्त्र अन्य स्थानों पर प्रायः इस शब्द का प्रयोग करता है; और उनके अनुसार इन शब्दों का अर्थ यह है कि दुष्टों ने दाऊद के विरुद्ध जो दुष्ट और कपटपूर्ण युक्तियाँ चलाईं, वे विफल कर दी गईं। यदि हम यह व्याख्या मान लें, तो जो वह तुरन्त बाद जोड़ता है, धर्मी ने क्या किया है? उसका अर्थ यह होगा कि उसका सुरक्षित बच निकलना न तो उसके अपने परिश्रम का फल था, न उसकी अपनी चतुराई का, वरन् बिना कोई प्रयत्न किए, और मानो जब वह सो रहा था, परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा वह अपने शत्रुओं के जालों और फन्दों से छुड़ाया गया था। परन्तु नींवें शब्द इस अंश के अभिप्राय से अधिक मेल खाता है, क्योंकि स्पष्ट है कि वह आगे यह बताता है कि वह किन सँकरी दशाओं में पहुँचा दिया गया और घेर लिया गया था, यहाँ तक कि अब देखने में उसके बचने की कोई आशा न रही थी। तौभी जो व्याख्याकार मानते हैं कि इस शब्द का उचित अनुवाद नींवें है, वे अर्थ के विषय में एकमत नहीं हैं। कुछ इसका यह अर्थ बताते हैं कि उसके पास पाँव टिकाने के लिए एक भी स्थान न था; दूसरे यह, कि जिन वाचाओं को विश्वासयोग्यता से पालन किए जाने के द्वारा स्थिर रहना चाहिए था, उन्हें शाऊल ने बार-बार लज्जाजनक रीति से तोड़ा था। कुछ लोग इसे रूपक के रूप में भी समझते हैं, इस अर्थ में कि परमेश्वर के धर्मी याजक, जो देश के खम्भे थे, मार डाले गए थे। परन्तु मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह भवनों से लिया गया एक रूपक है, जो अपनी नींवें खोखली हो जाने पर अवश्य ही गिरकर खण्डहरों का ढेर बन जाते हैं; और इस प्रकार दाऊद शिकायत करता है कि संसार की दृष्टि में वह पूरी तरह उलट दिया गया था, क्योंकि जो कुछ उसके पास था वह सब पूर्णतः नष्ट हो गया था। अन्तिम उपवाक्य में वह फिर दोहराता है कि इतनी क्रूरता से सताया जाना उसके योग्य न था: धर्मी ने क्या किया है? और वह अपनी निर्दोषता को प्रकट करता है, कुछ तो इसलिए कि अपनी विपत्तियों में शुद्ध विवेक की गवाही से अपने आप को शान्ति दे, और कुछ इसलिए कि छुटकारा पाने की आशा में अपने आप को प्रोत्साहित करे। जिस बात ने उसे परमेश्वर पर भरोसा रखने का साहस दिया, वह यह विश्वास था जो वह रखता था कि उसके कारण के न्यायसंगत होने के कारण परमेश्वर उसकी ओर है, और उस पर कृपालु होगा।
भजन 11:4-5
4. यहोवा अपनी पवित्रता के महल में है: यहोवा का सिंहासन स्वर्ग में है; उसकी आँखें देखती हैं, और उसकी पलकें मनुष्य की सन्तान को जाँचती हैं। 5. यहोवा धर्मी को स्वीकार करता है; परन्तु दुष्ट से, और उपद्रव से प्रीति रखनेवाले से, उसका जी घृणा करता है।
244 सेप्टुआजिन्ट में यहाँ Εις τον πενητα, "दीन-दुखी को," जोड़ा गया है। "उसकी आँखें दीन-दुखी को देखती हैं।" 245 "De prendre et par maniere de dire, emprunter lumiere du ciel." — फ्रांसीसी.
4. यहोवा अपनी पवित्रता के महल में है। आगे भजनकार परमेश्वर की कृपा के उस निश्चय पर, जिसकी चर्चा मैं कर चुका हूँ, गर्व करता है। मनुष्यों की सहायता से वंचित होकर वह परमेश्वर के विधान की शरण लेता है। जैसा मैं अन्यत्र कह चुका हूँ, यह विश्वास का एक उल्लेखनीय प्रमाण है कि जब हम इस संसार में चारों ओर अन्धकार से घिरे हों, तब उद्धार की आशा तक मार्ग दिखाने के लिए स्वर्ग से ज्योति लें, और, यों कहें, उधार लें। सब मनुष्य मानते हैं कि संसार परमेश्वर के विधान से शासित होता है; परन्तु जब बातों में कोई दुःखद गड़बड़ी आ जाती है, जो उनके चैन को भंग कर देती है और उन्हें कठिनाई में उलझा देती है, तब थोड़े ही लोग ऐसे होते हैं जो अपने मन में इस सत्य का दृढ़ निश्चय बनाए रखते हैं। परन्तु दाऊद के उदाहरण से हमें परमेश्वर के विधान का ऐसा आदर करना चाहिए कि जब परिस्थितियाँ अत्यन्त निराशाजनक दशा में हों, तब भी हम उसके न्याय से उपचार की आशा रखें। इन शब्दों में स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक अन्तर्निहित विषमता है; क्योंकि यदि दाऊद का ध्यान इस संसार की उस दशा पर टिका होता जैसी वह इन्द्रियों और बुद्धि की आँखों को दिखाई देती थी, तो उसे अपनी वर्तमान संकटपूर्ण परिस्थितियों से छुटकारे की कोई सम्भावना न दिखाई देती। परन्तु दाऊद का अभ्यास यह न था; इसके विपरीत, जब संसार में सारा न्याय पाँवों तले रौंदा पड़ा है और विश्वासयोग्यता नष्ट हो गई है, तब वह विचार करता है कि परमेश्वर स्वर्ग में सिद्ध और अपरिवर्तनीय होकर विराजमान है, और उचित था कि इस दयनीय गड़बड़ी की दशा से व्यवस्था के पुनःस्थापन की आशा वह उसी से रखे। वह केवल यह नहीं कहता कि परमेश्वर स्वर्ग में वास करता है; वरन् यह कि वह वहाँ मानो एक राजमहल में राज्य करता है, और उसका न्याय-सिंहासन वहीं है। और सचमुच हम उसे वह आदर नहीं देते जो उसका अधिकार है, जब तक हमें पूरा निश्चय न हो कि उसका न्यायासन उन सब के लिए एक पवित्र शरणस्थान है जो दुःख में हैं और अन्याय से सताए जाते हैं। इसलिए जब संसार में छल, धूर्तता, विश्वासघात, क्रूरता, हिंसा और लूट-खसोट का राज्य हो; संक्षेप में, जब अन्याय और दुष्टता से सब कुछ अव्यवस्था और अन्धकार में डाल दिया गया हो, तब विश्वास हमारे लिए एक दीपक का काम करे, जिससे हम परमेश्वर के स्वर्गीय सिंहासन को देख सकें, और वह दर्शन हमें धीरज के साथ बातों के उत्तम दशा में पुनःस्थापित होने की बाट जोहने के लिए पर्याप्त हो। उसकी पवित्रता का मन्दिर, या उसका पवित्र मन्दिर, जिसे सामान्यतः सिय्योन समझा जाता है, निःसन्देह यहाँ स्वर्ग को सूचित करता है; और ऐसा ही है, यह अगले उपवाक्य की पुनरावृत्ति से स्पष्ट दिखाई देता है, यहोवा का सिंहासन स्वर्ग में है; क्योंकि यह निश्चित है कि दाऊद एक ही बात को दो बार व्यक्त करता है।
उसकी आँखें देखती हैं। यहाँ वह पूर्ववर्ती वाक्य से यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है, और इसलिए मनुष्यों को अपने किए हुए सब कामों का लेखा उसे देना पड़ेगा। यदि परमेश्वर स्वर्ग में राज्य करता है, और यदि उसका सिंहासन वहाँ स्थापित है, तो इससे यह निकलता है कि वह अवश्य ही मनुष्यों के कामों पर ध्यान देता है, ताकि एक दिन उनका न्याय करने के लिए बैठे। एपिक्यूरस, और उसके समान वे लोग जो अपने आप को यह मनवाना चाहते हैं कि परमेश्वर निष्क्रिय है और स्वर्ग में विश्राम का आनन्द लेता है, उसके लिए न्याय का सिंहासन खड़ा करने के बदले मानो सोने के लिए एक बिछौना बिछाते हैं। परन्तु हमारे विश्वास की महिमा यह है कि परमेश्वर, जो जगत का सृष्टिकर्ता है, उस व्यवस्था की उपेक्षा नहीं करता और न उसे त्यागता है जिसे उसने स्वयं आरम्भ में स्थापित किया। और जब वह कुछ समय के लिए अपने न्याय-दण्डों को रोक रखता है, तब हमें इसी एक सत्य पर टिके रहना उचित है कि वह स्वर्ग से देखता है; ठीक जैसे हम अब दाऊद को केवल इसी सान्त्वनादायक विचार से सन्तुष्ट होते देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्यजाति पर शासन करता है और संसार में होनेवाली हर बात को देखता है, यद्यपि उसका ज्ञान और उसके न्याय-अधिकार का प्रयोग पहली दृष्टि में प्रकट नहीं होते। यह सत्य उस बात में और भी स्पष्टता से समझाया गया है जो पाँचवें पद में तुरन्त जोड़ी गई है, कि परमेश्वर धर्मी और अधर्मी के बीच भेद करता है, और इस रीति से करता है जिससे प्रकट होता है कि वह निष्क्रिय दर्शक नहीं है; क्योंकि कहा गया है कि वह धर्मी को स्वीकार करता है, और दुष्ट से घृणा करता है। इब्रानी शब्द בחןbachan, जिसका अनुवाद हमने स्वीकार करना किया है, प्रायः जाँचना या परखना का अर्थ देता है। परन्तु इस अंश में मैं इसका केवल यह अर्थ समझाता हूँ कि परमेश्वर हर मनुष्य के मामले की ऐसी जाँच करता है कि धर्मी को दुष्ट से अलग करे। आगे यह घोषित किया गया है कि परमेश्वर उनसे घृणा करता है जो हानि पहुँचाने और बुराई करने पर तुले रहते हैं। जैसे उसने मनुष्यों के बीच परस्पर व्यवहार ठहराया है, वैसे ही वह चाहता है कि हम उसे अखण्ड बनाए रखें। इसलिए अपनी इस पवित्र और ठहराई हुई व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, उसका दुष्टों का बैरी होना आवश्यक है, जो दूसरों पर अन्याय करते और उन्हें कष्ट देते हैं। यहाँ परमेश्वर की दुष्टों से घृणा और दुष्ट मनुष्यों के अधर्म से प्रेम के बीच भी विषमता दिखाई गई है, ताकि हमें सिखाया जाए कि जो लोग अपने हानिकारक कामों में अपने आप को प्रसन्न करते और अपनी चापलूसी करते हैं, वे ऐसी चापलूसी से कुछ नहीं पाते, और केवल अपने आप को धोखा देते हैं।
भजन 11:6-7
6. वह दुष्टों पर फन्दे, आग और गन्धक, और बवण्डरों की आँधी बरसाएगा: यही उनके कटोरे का भाग है। 7. क्योंकि धर्मी यहोवा धार्मिकता से प्रीति रखता है; उसका मुख सीधे लोगों को स्वीकार करता है।
6. वह दुष्टों पर बरसाएगा। अब अन्त में दाऊद इसे एक निश्चित सत्य के रूप में स्थापित करता है कि यद्यपि परमेश्वर कुछ समय तक चुप रहे और अपने न्याय-दण्डों में विलम्ब करे, तौभी पलटा लेने की घड़ी निश्चय आएगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि वह किस प्रकार धीरे-धीरे अपने वर्तमान क्लेश के सुखद परिणाम की आशा तक ऊपर उठता है, और इसे पाने के लिए वह यत्न करता है, कि जो सामाजिक और नैतिक अव्यवस्था उसने अपने चारों ओर फैली देखी, वह उसके विश्वास को निर्बल न कर दे। क्योंकि परमेश्वर का न्यायासन दृढ़ और अटल बना रहता है, इसलिए पहले तो वह इस विचार से अपने आप को सँभालता और शान्ति देता है कि परमेश्वर ऊपर से वह सब देखता है जो यहाँ नीचे किया जाता है। दूसरे, वह विचार करता है कि न्यायी का पद क्या माँगता है, और इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि मनुष्यों के कार्य परमेश्वर की सर्वज्ञ आँख के निरीक्षण से बच नहीं सकते, और यद्यपि वह उनके बुरे कामों का तुरन्त दण्ड नहीं देता, तौभी वह सब दुष्टों से घृणा करता है। अन्त में वह जोड़ता है कि क्योंकि परमेश्वर सामर्थ्य से सुसज्जित है, इसलिए यह घृणा व्यर्थ या निष्फल न होगी। इस प्रकार जब तक परमेश्वर दण्ड देने में विलम्ब करता है, तब तक उसके न्याय का ज्ञान हमारे विश्वास को बनाए रखने में प्रबल प्रभाव डालेगा, जब तक कि वह वास्तव में यह न दिखा दे कि वह अपने उस पहरे के गुम्मट से कभी हटा नहीं, जहाँ से वह मनुष्यों के कामों को देखता है। वह परमेश्वर के दिए हुए दण्डों की तुलना उचित ही वर्षा से करता है। जैसे वर्षा निरन्तर नहीं होती, वरन् प्रभु जब चाहता है तब उसे भेजता है, और जब मौसम अत्यन्त शान्त और निर्मल होता है, तब अचानक ओलों की आँधी या मूसलाधार वर्षा उठा देता है; वैसे ही यहाँ संकेत किया गया है कि जो पलटा दुष्टों से लिया जाएगा वह अचानक आएगा, यहाँ तक कि जब वे आमोद-प्रमोद में मग्न और अपने सुख-विलासों में मतवाले होंगे, और "जब वे कहते होंगे, कि कुशल है, और कुछ भय नहीं, तो उन पर एकाएक विनाश आ पड़ेगा।" साथ ही, स्पष्ट है कि दाऊद यहाँ सदोम और अमोरा के विनाश की ओर संकेत करता है। जैसे भविष्यद्वक्ता, जब चुने हुए लोगों से परमेश्वर के अनुग्रह की प्रतिज्ञा करना चाहते हैं, तब उन्हें मिस्र से उस छुटकारे का स्मरण दिलाते हैं जो परमेश्वर ने अपनी प्राचीन प्रजा के लिए किया था, वैसे ही जब वे दुष्टों को डराना चाहते हैं, तब उन्हें सदोम और अमोरा पर पड़े विनाश के समान विनाश की धमकी देते हैं, और वे ऐसा उचित आधार पर करते हैं; क्योंकि यहूदा अपनी पत्री में हमें बताता है कि ये नगर "अनन्त आग के दण्ड में पड़कर दृष्टान्त ठहरे हैं," (यहूदा 1:7)। भजनकार बड़ी सुन्दरता और उपयुक्तता के साथ फन्दों को आग और गन्धक से पहले रखता है। हम देखते हैं कि दुष्ट, जब तक परमेश्वर उन्हें छोड़े रहता है, किसी बात से नहीं डरते, वरन् खुले मैदान में छोड़े गए घोड़ों के समान अपने हठीले मार्गों में अपने आप को पूरी छूट दे देते हैं; और फिर यदि वे अपने ऊपर कोई विपत्ति मँडराती देखते हैं, तो अपने लिए बच निकलने के मार्ग गढ़ लेते हैं; संक्षेप में, वे निरन्तर परमेश्वर का उपहास करते हैं, मानो वे पकड़े ही नहीं जा सकते, जब तक कि वह पहले उन्हें अपने फन्दों में उलझाकर कसकर पकड़ न ले। इसलिए परमेश्वर अपना पलटा फन्दों से आरम्भ करता है, और दुष्टों के लिए बच निकलने का हर मार्ग बन्द कर देता है; और जब वह उन्हें उलझा और बाँध लेता है, तब उन पर भयानक और भयंकर रीति से गरजता है, जैसे उसने सदोम और आसपास के नगरों को स्वर्ग से आग बरसाकर भस्म कर दिया था। शब्द זלעפותzilaphoth, जिसका अनुवाद हमने बवण्डर किया है, कुछ लोगों द्वारा सुलगना या जलना अनुवादित किया जाता है; और अन्य लोगों द्वारा हलचल या आतंक।
246 "Car le Seigneur est juste, et aime justice." — फ्रांसीसी. "क्योंकि प्रभु धर्मी है, और धार्मिकता से प्रीति रखता है।" 247 "La droiture." फ्रांसीसी. "सीधाई।" "Ou, le droiturier." — फ्रांसीसी हाशिया. "अथवा, सीधा मनुष्य।"
248 "De la quelle il contemple les faits des hommes." — फ्रांसीसी. 249 "Et qu'ils diront paix et asseurance mort soudaine leur advient h'a." — फ्रांसीसी.
250 हॉर्सली "दहकते अंगारे" पढ़ता है। लाउथ इस शब्द का अनुवाद "जलते कोयले" करता है, और टिप्पणी करता है कि ,פתיםpachim का अर्थ आग के गोले, या केवल बिजली है। वह कहता है, "यह निश्चय ही फन्दों की अपेक्षा प्रसंग से अधिक मेल खाता है। इसका धातु puach है, जिसका अर्थ यद्यपि कभी-कभी फँसाना होता है, तौभी अधिकतर इसका अर्थ फूँककर निकालना, या बाहर छोड़ना होता है, उदाहरण के लिए, आग। यहेजकेल 21:31, 'मैं अपने क्रोध की आग तुझ पर फूँकूँगा।' अम्मोनियों के विषय में कहा गया है कि वे ईश्वरीय क्रोध की भट्ठी में डाले गए: यहेजकेल 22:21 से तुलना कीजिए, जहाँ लगभग वही शब्द आते हैं, केवल इतना अन्तर है कि वहाँ उसकी समानार्थी (और इस स्थान में पर्यायवाची) क्रिया apach का प्रयोग किया गया है, जिससे mapnach, धौंकनी, बना है, यिर्मयाह 6:29। इसी अर्थ में क्रिया puach नीतिवचन 29:8 में आई है, 'ठट्ठा करनेवाले नगर को फूँक देते हैं।' धातु puach की इस व्याख्या से शब्द pach, अर्थात् फूँककर दहकाया हुआ कोयला, ठीक ही व्युत्पन्न है।" — Sacred Poetry of the Hebrews, खण्ड 1, पृ. 194, 195। लाउथ यह भी बताता है कि पूर्वी देशों के लोग कभी-कभी बिजली को फन्दे या जंजीरें कहते हैं, सम्भवतः वायु में से होकर जाते समय बिजली की उन निरन्तर कौंधों के कारण, जो जंजीर की कड़ियों के समान एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। तौभी हेंगस्टेनबर्ग इस व्याख्या का विरोध करता है, और उसे अपनाता और उसका समर्थन करता है जो कैल्विन ने दी है। वह कहता है, ",פחים यहाँ अधिकांश व्याख्याकारों के अनुसार बिजली का एक आलंकारिक नाम समझा जाना चाहिए, जिसे, कहा जाता है, अरबी लोग भी गद्य और पद्य में जंजीरों के नाम से पुकारते हैं। परन्तु इस अर्थ के विरुद्ध यह आपत्ति पर्याप्त है कि פח का अर्थ सामान्य रूप से रस्सी नहीं, वरन् विशेष रूप से फन्दा, जाल, पिंजड़ा है।" इसके प्रमाण में वह भजन 9:15; अय्यूब 18:9; 22:10; यशायाह 24:17, 18; नीतिवचन 22:5 उद्धृत करता है। वह कहता है, "वह बरसाएगा, इस कथन में कोई वास्तविक कठिनाई नहीं हो सकती, क्योंकि यह केवल परमेश्वर के प्रतिफल देनेवाले न्याय-दण्डों की परिपूर्णता की ओर संकेत करता है, जिस पर लूथर ने भी पहले ही ध्यान दिया था, जब वह कहता है कि इसके द्वारा भविष्यद्वक्ता धमकाई गई विपत्तियों की बड़ी विविधता और बहुलता को सूचित करता है।"
251 "Ainsi que des chevaux desbridez." — फ्रांसीसी.
252 डॉ. एडम क्लार्क शब्दों זלעפות רוהruach zilaphoth का अनुवाद "आतंकों की आत्मा" करते हैं, और बताते हैं कि "यह उस भयंकर रूप से दम घोंटनेवाली अरबी वायु की ओर संकेत कर सकता है जिसे सिमूम कहते हैं।" बिशप लाउथ इन शब्दों का अनुवाद "एक दहकती आँधी" करते हैं, जिस पर मिखाएलिस टिप्पणी करता है, "यह एक अद्भुत चित्र है, और प्रकृति की पाठशाला से लिया गया है। zilgaphoth वायु, जो पूर्व से बहती है, अत्यन्त महामारी-जनक है, और इसलिए पूर्वी देशों के लोगों में लगभग कहावत बन गई है। अरबी लोग इसके प्रभावों की अनेक आश्चर्यजनक कहानियाँ सुनाते हैं, और उनके कवि कल्पना करते हैं कि दुष्ट अपनी अनन्त यातना के स्थान में इसी महामारी-भरी वायु को अपनी प्राण-वायु के रूप में साँस में लेंगे।" — लाउथ, Sacred Poetry, खण्ड 1, पृ. 193। हेंगस्टेनबर्ग इन शब्दों का अनुवाद क्रोध-वायु करता है, और इनका अर्थ केवल वह ईश्वरीय क्रोध बताता है जो आँधी के समान फूट पड़ता है; और टिप्पणी करता है कि क्रोध की प्रचण्डता बहुवचन के द्वारा सूचित की गई है। दहकती वायु अनुवाद के विरोध में, और इस मत के विरोध में कि यहाँ अरबी समूम की ओर संकेत है, वह कहता है, "इब्रानी में धातु ,זעפ का अर्थ क्रोधित होना है, और कोई नहीं; और गर्म होने का अर्थ सम्बन्धित बोलियों में एक बार भी नहीं मिलता।"
परन्तु प्रसंग उसी व्याख्या की माँग करता है जो मैंने प्रस्तुत की है; क्योंकि आँधी तूफ़ानी हवाओं से उठती है, और तब गर्जन और बिजली आते हैं।
उनके कटोरे का भाग। इस कथन के द्वारा वह साक्षी देता है कि परमेश्वर के न्याय-दण्ड निश्चय पूरे होंगे, यद्यपि दुष्ट मनुष्य छलपूर्ण आत्म-चापलूसी से अपने आप को धोखा दें। यह रूपक पवित्रशास्त्र में बार-बार मिलता है। क्योंकि शारीरिक मन किसी बात पर इतनी कठिनाई से विश्वास नहीं करता जितना इस पर कि जो विपत्तियाँ और दुःख संयोग से आए प्रतीत होते हैं, वे परमेश्वर के न्यायपूर्ण वितरण के अनुसार घटते हैं, इसलिए वह अपने आप को एक गृहस्वामी के रूप में प्रस्तुत करता है, जो घर के हर सदस्य को उसका भाग या उसका अंश बाँटता है। इसलिए दाऊद यहाँ संकेत करता है कि दुष्टों के लिए निश्चय ही प्रतिफल रखा हुआ है; कि जब प्रभु उन्हें अपने क्रोध का कटोरा पीने को देगा, तब उनका विरोध करना व्यर्थ होगा; और कि उनके लिए तैयार किया गया कटोरा ऐसा नहीं जिसे वे बूँद-बूँद करके चुस्कियों में पीएँ, वरन् ऐसा कटोरा है जिसे उन्हें पूरा का पूरा पीने को विवश किया जाएगा, जैसा भविष्यद्वक्ता धमकी देता है, (यहेजकेल 23:34) "तू उसे तलछट तक पी जाएगी।" 7. क्योंकि धर्मी यहोवा धार्मिकता से प्रीति रखता है। भजनकार ने अभी-अभी परमेश्वर के पद से यह तर्क दिया है कि वह दुष्टों को दण्ड देगा, और अब परमेश्वर के स्वभाव से वह यह निष्कर्ष निकालता है कि वह भलों और सीधे लोगों का रक्षक होगा। क्योंकि वह धर्मी है, इसलिए दाऊद दिखाता है कि इसके परिणामस्वरूप उसे अवश्य धार्मिकता से प्रीति रखनी है, अन्यथा वह अपने आप का इनकार करेगा। इसके अतिरिक्त, धार्मिकता को परमेश्वर में अन्तर्निहित मानना एक ठण्डा चिन्तन मात्र होगा, जब तक कि साथ ही हम इस दृढ़ निष्कर्ष पर न पहुँचें कि जो कुछ उसका अपना है, परमेश्वर उसे अनुग्रहपूर्वक अपनाता है, और जगत के शासन में इसका प्रमाण देता है। कुछ लोग समझते हैं कि अमूर्त शब्द धार्मिकता धर्मी व्यक्तियों के लिए रखा गया है। परन्तु मेरी सम्मति में यहाँ शाब्दिक अर्थ अधिक उपयुक्त है, अर्थात् यह कि धार्मिकता परमेश्वर को भली लगती है, और इसलिए वह न्यायसंगत कारणों का पक्ष लेता है। इससे भजनकार यह निष्कर्ष निकालता है कि सीधे लोग उसकी कृपादृष्टि के पात्र हैं: उसका मुख सीधे लोगों को स्वीकार करता है। उसने कुछ पहले एक भिन्न अर्थ में कहा था कि परमेश्वर मनुष्य की सन्तान को देखता है, जिसका अर्थ यह था कि वह हर मनुष्य के जीवन का न्याय करेगा; परन्तु यहाँ उसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर सीधे और निष्कपट लोगों की अनुग्रहपूर्वक विशेष चिन्ता करता है, उन्हें अपनी सुरक्षा में ले लेता है, और उन्हें पूर्ण सुरक्षा में रखता है। भजन का यह उपसंहार पर्याप्त रूप से दिखाता है कि पूरे भजन का अभिप्राय यह प्रकट करना था कि वे सब, जो परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होकर सच्चाई से धार्मिकता के पीछे चलते हैं, उसकी सुरक्षा में सुरक्षित रहेंगे। भजनकार स्वयं इन्हीं में से एक था, और वास्तव में इनमें सबसे प्रमुख। इस अन्तिम उपवाक्य, उसका मुख सीधे लोगों को स्वीकार करता है, की व्याख्या वास्तव में अनेक प्रकार से की जाती है; परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि इसका सच्चा अर्थ यह है कि परमेश्वर सीधे लोगों पर सदा ध्यान रखता है, और कभी उनसे अपनी आँखें नहीं फेरता। इन शब्दों का यह अर्थ लगाना कि सीधे लोग परमेश्वर का मुख देखेंगे, खींचतान की व्याख्या है। परन्तु मैं दूसरों के मतों का खण्डन करने के लिए नहीं रुकूँगा।
