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भजन 31
भजन 31.
दाऊद, किसी बड़े संकट से, वरन् अनेक संकटों से छुड़ाए जाने के पश्चात्, पहले उन प्रार्थनाओं का वर्णन करता है जो उसने मृत्यु के आतंकों के बीच परमेश्वर से की थीं। तत्पश्चात् वह अपना धन्यवाद जोड़ता है, जो कोई साधारण धन्यवाद नहीं है; क्योंकि वह अपने छुटकारे का बड़े विस्तार से गुणगान करता है, और सब पवित्र लोगों को उत्साहित करता है कि वे शुभ आशा रखें, क्योंकि उनके सामने उसमें परमेश्वर की भलाई का एक अत्यन्त उत्तम और स्मरणीय उदाहरण विद्यमान था।
प्रधान बजानेवाले के लिये। दाऊद का भजन।
भजन 31:1-4
1. हे यहोवा, मैंने तुझ पर भरोसा रखा है; मुझे कभी लज्जित न होने दे; अपने धर्म के अनुसार मुझे छुड़ा ले। 2. अपना कान मेरी ओर लगा, शीघ्र मुझे छुड़ा ले; मेरे लिये दृढ़ चट्टान, और मेरे बचाव के लिये रक्षा का भवन बन। 3. क्योंकि तू ही मेरी चट्टान और मेरा गढ़ है; और अपने नाम के निमित्त तू मेरी अगुवाई करेगा और मुझे मार्ग दिखाएगा। 4. जो जाल उन्होंने मेरे लिये छिपाकर लगाया है, उससे मुझे निकाल ले; क्योंकि तू ही मेरा बल है।
1. हे यहोवा, मैंने तुझ पर भरोसा रखा है। कुछ लोगों का मत है कि यह भजन दाऊद ने उस समय रचा जब वह माओन के जंगल से अत्यन्त अप्रत्याशित रीति से बच निकला था; इस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं, यद्यपि यह केवल एक संदिग्ध अनुमान है। निश्चय ही वह अपने सबसे बड़े संकटों में से एक या अधिक का गुणगान करता है। आरम्भ में वह हमें बताता है कि अपनी व्यथा और क्लेश में उसने किस प्रकार की प्रार्थना की थी; और उसकी भाषा से अत्यन्त प्रबल भावना की साँस निकलती है। वह इस बात को अपनी आशा का आधार बनाता है कि उसने प्रभु पर भरोसा रखा, अथवा उस पर भरोसा रखता चला आया; क्योंकि भूतकाल की क्रिया एक निरन्तर कार्य को सूचित करती प्रतीत होती है। उसने इसे एक सिद्धान्त के रूप में थामे रखा कि जो आशा परमेश्वर पर टिकी है, वह किसी भी प्रकार निष्फल नहीं हो सकती। इस बीच, हम देखते हैं कि वह केवल विश्वास के अतिरिक्त और कुछ भी सामने नहीं रखता; वह अपने आप से छुटकारे की प्रतिज्ञा केवल इसलिए करता है कि उसे निश्चय है कि वह परमेश्वर की सहायता और अनुग्रह के द्वारा बचाया जाएगा। परन्तु चूँकि इस शिक्षा की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है, और यह आगे भी एक से अधिक बार आएगी, इसलिए अभी इसकी ओर संकेत मात्र कर देना पर्याप्त है। काश, हम सब इसका ऐसा अभ्यास करें कि जब कभी हम परमेश्वर के निकट आएँ, तो दाऊद के साथ यह घोषित कर सकें कि हमारी प्रार्थनाएँ इसी स्रोत से निकलती हैं, अर्थात् इस दृढ़ निश्चय से कि हमारी सुरक्षा परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर है। सदा का अर्थ देनेवाले अव्यय की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है। चूँकि परमेश्वर कभी-कभी अपना अनुग्रह हटा लेता है, इसलिए इसका यह अर्थ लेना अनुचित न होगा: यद्यपि मैं अभी तेरी सहायता से वंचित हूँ, तौभी मुझे पूरी रीति से, अथवा सदा के लिये, त्याग न दे। इस प्रकार दाऊद, अपनी परीक्षाओं के विरुद्ध अपने आप को धीरज से सुसज्जित करने की इच्छा से, इन दो बातों में विरोध दिखाएगा,—कुछ समय के लिये संकट में होना, और लज्जा की दशा में बने रहना। परन्तु यदि कोई उसके शब्दों को इस प्रकार समझना अधिक पसन्द करे, "मुझ पर चाहे जो भी क्लेश आएँ, परमेश्वर मेरी सहायता के लिये तत्पर रहे, और जैसी आवश्यकता हो, बार-बार अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाए," तो मैं इस अर्थ को भी दूसरे से अधिक अस्वीकार नहीं करूँगा। दाऊद चाहता है कि वह परमेश्वर के धर्म में छुड़ाया जाए, क्योंकि परमेश्वर अपने दासों से की गई प्रतिज्ञा को पूरा करने में अपना धर्म प्रकट करता है। यह कहना तर्क की अति-सूक्ष्मता है कि दाऊद यहाँ उस धार्मिकता की शरण लेता है जिसे परमेश्वर अपने लोगों को सेंत-मेंत प्रदान करता है, क्योंकि कर्मों के द्वारा उसकी अपनी धार्मिकता किसी काम की न थी। उन लोगों का मत तो और भी अधिक अनुचित है जो सोचते हैं कि परमेश्वर पवित्र लोगों की रक्षा अपने न्याय के अनुसार करता है; अर्थात् इसलिए कि उन्होंने ऐसे पुण्य के काम किए हैं कि न्याय यह माँग करता है कि उन्हें उनका प्रतिफल मिले। भजन संहिता में इस शब्द के बार-बार प्रयोग से यह देखना सरल है कि परमेश्वर के धर्म का अर्थ उसकी विश्वासयोग्यता है, जिसके प्रयोग में वह अपने उन सब लोगों की रक्षा करता है जो अपने आप को उसकी देख-रेख और संरक्षण में सौंप देते हैं। इसलिए दाऊद परमेश्वर के स्वभाव पर विचार करके अपनी आशा को दृढ़ करता है, जो अपने आप का इनकार नहीं कर सकता, और जो सदा अपने ही समान बना रहता है। "Ou, adresse moy et conduy." — फ्रांसीसी हाशिया. "अथवा, तू मुझे मार्ग दिखा और मेरी अगुवाई कर।"
2. अपना कान मेरी ओर लगा। ये शब्द प्रकट करते हैं कि दाऊद का प्राण प्रार्थना करने के लिये कितनी उत्कटता से उभारा गया था। वह, जैसा अलंकार-शास्त्रियों का स्वभाव होता है, किसी भड़कीली या सजी-धजी भाषा का दिखावा नहीं करता; परन्तु केवल उपयुक्त उपमाओं में अपनी लालसा की प्रचण्डता का वर्णन करता है। इस प्रार्थना में कि वह शीघ्र छुड़ाया जाए, उसके संकट की विशालता प्रकट होती है, मानो वह कहता हो, यदि परमेश्वर मेरी सहायता करने में शीघ्रता न करे, तो मेरे जीवन का शीघ्र ही अन्त हो जाएगा। रक्षा का भवन, गढ़ और चट्टान, इन शब्दों के द्वारा वह संकेत करता है कि अपने शत्रुओं का सामना करने में असमर्थ होने के कारण उसकी आशा केवल परमेश्वर के संरक्षण पर टिकी है। "Feroit une antithese entre ces deux choses, Estre en destresse pour un temps, et demeurer confus." — फ्रांसीसी. (इन दो बातों में विरोध दिखाएगा, कुछ समय के लिये संकट में होना, और लज्जित बने रहना।)
3. क्योंकि तू ही मेरी चट्टान है। यह पद एक ही वाक्य के रूप में इस प्रकार पढ़ा जा सकता है: जैसे तू मेरे बचाव के लिये एक गुम्मट के समान है, वैसे ही अपने नाम के निमित्त मेरे सम्पूर्ण जीवन भर मुझे मार्ग दिखा और मेरी अगुवाई कर। और इस प्रकार संयोजक, जैसा कि बहुत से ऐसे ही स्थलों में होता है, अनावश्यक ठहरेगा। परन्तु मैं एक भिन्न अर्थ को अधिक पसन्द करता हूँ, अर्थात् यह कि दाऊद बीच में यह विचार रखकर अपने आप को न केवल प्रार्थना में उत्सुकता के लिये, वरन् अपनी विनतियों को प्राप्त करने की भरोसे-भरी आशा के लिये भी उत्साहित करता है। हम जानते ही हैं कि उसकी यह रीति है कि वह अपनी प्रार्थनाओं में ऐसी बातें मिला देता है जो उसके सन्देहों को दूर करने और उसके निश्चय को दृढ़ करने में सहायक हों। इसलिए अपनी आवश्यकता को प्रकट करने के बाद, वह अपने आप को उत्साहित और सजीव करने के लिये यह निश्चय कर लेता है कि उसकी प्रार्थना का निश्चय ही शुभ उत्तर मिलेगा। उसने पहले कहा था, तू मेरे लिये दृढ़ चट्टान और गढ़ बन; और अब वह जोड़ता है, निश्चय ही तू मेरी चट्टान और मेरा गढ़ है: इससे वह संकेत करता है कि उसने ये शब्द अविश्वासियों के समान बिना सोचे-समझे नहीं कह डाले, जो यद्यपि परमेश्वर से बहुत कुछ माँगने के आदी होते हैं, तौभी अनिश्चित घटनाओं के भय से दुविधा में लटके रहते हैं। इससे वह एक और प्रोत्साहन भी निकालता है, कि अपने जीवन के सम्पूर्ण मार्ग में परमेश्वर उसका अगुवा और शासक होगा। वह एक ही बात को प्रकट करने के लिये दो शब्दों का प्रयोग करता है, अगुवाई करना और मार्ग दिखाना, और वह ऐसा (कम से कम मैं तो इसकी यही व्याख्या करता हूँ) उन विविध दुर्घटनाओं और असमान उलट-फेरों के कारण करता है जिनसे मनुष्यों के जीवन की परीक्षा होती है: मानो वह कहता हो, चाहे मुझे खड़े पहाड़ पर चढ़ना पड़े, या ऊबड़-खाबड़ स्थानों में से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना पड़े, या काँटों के बीच चलना पड़े, मुझे भरोसा है कि तू मेरा निरन्तर अगुवा रहेगा। इसके अतिरिक्त, चूँकि मनुष्य यदि अपनी योग्यताओं की ओर देखें तो उन्हें अपने भीतर सदा सन्देह का कारण मिलेगा, इसलिए दाऊद स्पष्ट रूप से यह माँगता है कि परमेश्वर अपने ही नाम के निमित्त, अथवा अपनी ही महिमा का ध्यान करके, उसकी सहायता करने को प्रेरित हो, क्योंकि ठीक-ठीक कहें तो और कोई वस्तु नहीं है जो उसे हमारी सहायता करने को प्रेरित कर सके। इसलिए स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर का नाम, जैसे वह हर प्रकार की योग्यता के विपरीत रखा गया है, हमारे उद्धार का एकमात्र कारण है। अगले पद में, जाल के रूपक के द्वारा, वह उन फन्दों और छल-युक्तियों को सूचित करता प्रतीत होता है जिनसे उसके शत्रुओं ने उसे घेर रखा था। हम जानते हैं कि उसके प्राण के विरुद्ध बार-बार षड्यन्त्र रचे गए, जो उसके बच निकलने के लिये कोई स्थान न छोड़ते; और चूँकि उसके शत्रु कूटनीति में बड़े निपुण थे, और उससे अकल्पनीय घृणा रखते हुए उसके विनाश पर उतारू थे, इसलिए किसी मानवीय सामर्थ के द्वारा उनसे बचाया जाना उसके लिये असम्भव था। इसी कारण वह परमेश्वर को अपना बल कहता है; मानो वह कहता हो, केवल वही उन सब फन्दों को तोड़ डालने में समर्थ है जिनमें वह अपने पीड़ित लोगों को उलझा हुआ देखता है।
"Si los hommes regardent a leur dignite." — फ्रांसीसी. (यदि मनुष्य अपनी योग्यता की ओर देखें।)
भजन 31:5-8
5. मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथ में सौंपता हूँ; क्योंकि हे यहोवा, हे सत्य के परमेश्वर, तू ने मुझे छुड़ा लिया है। 6. जो झूठी व्यर्थ वस्तुओं पर मन लगाते हैं, उन सब से मैं घृणा करता हूँ; परन्तु मैंने यहोवा पर भरोसा रखा है। 7. मैं तेरी करुणा से मगन और आनन्दित होऊँगा, क्योंकि तू ने मेरे दुःख पर दृष्टि की है; संकटों में तू ने मेरे प्राण को जाना है। 8. और तू ने मुझे मेरे शत्रु के हाथ में बन्द नहीं किया; तू ने मेरे पाँवों को चौड़े स्थान में खड़ा किया है।
5. मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथ में सौंपता हूँ। दाऊद फिर से परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास घोषित करता है, और दृढ़ता से कहता है कि उसके विधान के विषय में उसके विचार इतने ऊँचे थे कि उसने अपनी सारी चिन्ताएँ उसी पर डाल दीं। जो कोई अपने आप को परमेश्वर के हाथ में और उसकी देख-रेख में सौंप देता है, वह न केवल उसे अपने जीवन और मृत्यु का निर्णायक ठहराता है, वरन् अपने सब संकटों के बीच संरक्षण के लिये शान्त मन से उस पर निर्भर भी रहता है। क्रिया भविष्यकाल में है, "मैं सौंपूँगा," और निःसन्देह यह एक निरन्तर कार्य को सूचित करती है, और इसलिए इसका वर्तमानकाल में अनुवाद करना उचित है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई भी मनुष्य सच्चे मन से अपना जीवन परमेश्वर को कदापि नहीं सौंप सकता, सिवाय उसके जो अपने आप को हज़ार मृत्युओं के सामने खुला हुआ समझता है, और यह कि उसका जीवन एक धागे पर लटका है, अथवा उस साँस से कुछ भी भिन्न नहीं जो अचानक उड़ जाती है। इस प्रकार निराशा के छोर पर खड़ा दाऊद अपने लिये करने को इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं छोड़ता,—कि वह परमेश्वर को अपने जीवन का रक्षक और शासक मानकर उस पर भरोसा रखते हुए अपने मार्ग पर चलता रहे। यह आश्चर्य की बात है कि यद्यपि बहुत सी बातें हम सब को व्याकुल करती हैं, तौभी सौ में से कठिनाई से एक भी इतना बुद्धिमान होता है कि अपना जीवन परमेश्वर के हाथ में सौंप दे। असंख्य लोग दिन-प्रतिदिन ऐसे मौज-मस्ती से और निश्चिन्त होकर जीते हैं मानो वे हर प्रकार की हलचल से मुक्त किसी शान्त घोंसले में हों; परन्तु ज्यों ही उनका सामना किसी डरावनी बात से होता है, वे व्यथा के मारे मरने को हो जाते हैं। इस प्रकार ऐसा होता है कि वे कभी परमेश्वर की शरण नहीं लेते, या तो इसलिए कि वे व्यर्थ भ्रमों से अपने आप को धोखा देते हैं, अपने आप को यह कहकर फुसलाते हैं कि सब कुछ अब भी ठीक हो जाएगा, या इसलिए कि वे भय से ऐसे मारे हुए और विस्मय से ऐसे जड़ हो जाते हैं कि उन्हें उसकी पितृवत् देख-रेख की कोई अभिलाषा नहीं रहती। इसके अतिरिक्त, चूँकि शोक की विविध आँधियाँ हमें व्याकुल करती हैं, और कभी-कभी तो हमें सिर के बल गिरा देती हैं, या कर्तव्य के सीधे मार्ग से हमें खींच ले जाती हैं, या कम से कम हमें हमारे स्थान से हटा देती हैं, इसलिए इन बातों को शान्त करने का एकमात्र उपाय यह विचार करना है कि परमेश्वर, जो हमारे जीवन का कर्ता है, उसका संरक्षक भी है।
डॉ. गेडेस टिप्पणी करता है कि यह इब्रानी शब्दों का शाब्दिक अनुवाद है; "परन्तु," वह कहता है, "चूँकि इब्रानी में नकारात्मक कथन अर्थ में प्रायः विपरीत सकारात्मक कथनों के तुल्य होते हैं, इसलिए मैंने एक समानार्थी रूप का प्रयोग करना उत्तम समझा, क्योंकि वह आगे-पीछे के प्रसंग के अधिक अनुकूल है।" उसका अनुवाद यह है, "मुझे मेरे शत्रु के हाथ से छुड़ा लिया।"
"Se faisans a croire que de leur faict ce ne sera que triomphe." — फ्रांसीसी. (अपने आप को यह विश्वास दिलाते हुए कि उनका काम विजय के सिवाय और कुछ न होगा।)
तो, यही हमारे सब बोझों को हल्का करने, और अत्यधिक शोक में डूब जाने से हमें बचाने का एकमात्र उपाय है। इसलिए, यह देखकर कि परमेश्वर हमारे जीवन की देख-रेख करने और उन्हें सम्भाले रखने का भार उठाने को झुकता है, यद्यपि वे प्रायः विविध प्रकार की मृत्युओं के सामने खुले रहते हैं, आओ हम सीखें कि सदा इसी शरणस्थान की ओर भागें; वरन् कोई जितना अधिक संकटों के सामने खुला हो, उतनी ही अधिक सावधानी से वह इस पर मनन करने में अपने आप को लगाए। संक्षेप में, सब खतरनाक आक्रमणों के विरुद्ध यही हमारी ढाल हो,—सब थपेड़ों और आँधियों के बीच यही हमारा बन्दरगाह हो,—कि यद्यपि हमारी सुरक्षा सारी मानवीय आशा से परे हो, तौभी परमेश्वर उसका विश्वासयोग्य रक्षक है; और यही फिर हमें प्रार्थना के लिये जगाए, कि वह हमारी रक्षा करे, और हमारे छुटकारे को निश्चित करे। यह भरोसा प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्य को तत्परता से पूरा करने, और निरन्तर और निर्भय होकर अपनी दौड़ के अन्त तक संघर्ष करते हुए आगे बढ़ने के लिये भी उद्यत करेगा। ऐसा क्यों होता है कि इतने लोग आलसी और उदासीन हैं, और दूसरे विश्वासघात करके अपना कर्तव्य छोड़ देते हैं, सिवाय इसके कि वे चिन्ता से दबकर संकटों और असुविधाओं से भयभीत हो जाते हैं, और परमेश्वर के विधान के कार्य करने के लिये कोई स्थान नहीं छोड़ते?
निष्कर्ष यह है कि जो कोई परमेश्वर के विधान पर ऐसा भरोसा नहीं रखता कि अपना जीवन उसकी विश्वासयोग्य देख-रेख में सौंप दे, उसने अब तक ठीक-ठीक नहीं सीखा कि जीना क्या है। दूसरी ओर, जो अपने जीवन की रखवाली परमेश्वर की देख-रेख को सौंप देगा, वह मृत्यु के बीच में भी उसकी सुरक्षा के विषय में सन्देह नहीं करेगा। इसलिए हमें अपना जीवन परमेश्वर के हाथ में रख देना चाहिए, न केवल इसलिए कि वह इस संसार में उसे सुरक्षित रखे, वरन् इसलिए भी कि वह मृत्यु में भी उसे विनाश से बचाए रखे, जैसा कि मसीह के अपने उदाहरण ने हमें सिखाया है। जैसे दाऊद चाहता था कि मृत्यु के संकटों के बीच उसका जीवन बढ़ाया जाए, वैसे ही मसीह इस नश्वर जीवन से निकल गया ताकि मृत्यु में उसका प्राण बचाया जाए। इसलिए यह एक सामान्य प्रार्थना है, जिसमें विश्वासी अपने जीवन परमेश्वर को सौंपते हैं, पहले तो इसलिए कि जब तक वे इस संसार के संकटों के सामने खुले हैं तब तक वह अपनी सामर्थ से उनकी रक्षा करे; और दूसरे, इसलिए कि वह उन्हें कब्र में सुरक्षित रखे, जहाँ विनाश के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता। हमें आगे यह भी निश्चय कर लेना चाहिए कि न जीवन में और न मृत्यु में हम परमेश्वर के द्वारा त्यागे जाते हैं; क्योंकि जिन्हें परमेश्वर अपनी सामर्थ से उनकी दौड़ के अन्त तक सुरक्षित पहुँचाता है, उन्हें वह अन्त में उनकी मृत्यु के समय अपने पास ग्रहण कर लेता है। यह पवित्रशास्त्र के उन प्रमुख स्थलों में से एक है जो अविश्वास को सुधारने के लिये सबसे अधिक उपयुक्त हैं। यह हमें सिखाता है, पहले, कि विश्वासियों को दुःखद चिन्ताओं और व्याकुलताओं से अपने आप को अत्यधिक सताना नहीं चाहिए; और दूसरे, कि उन्हें भय से ऐसा विचलित नहीं होना चाहिए कि वे अपना कर्तव्य करना छोड़ दें, न इस प्रकार पीछे हटें और मूर्छित हों कि व्यर्थ आशाओं और धोखा देनेवाली सहायताओं को पकड़ने लगें, न भयों और आतंकों के आगे झुक जाएँ; और अन्त में, कि उन्हें मृत्यु से नहीं डरना चाहिए, जो यद्यपि देह को नष्ट करती है, तौभी आत्मा को बुझा नहीं सकती। वास्तव में, सब परीक्षाओं पर जय पाने के लिये यही हमारा प्रमुख तर्क होना चाहिए, कि मसीह ने, जब उसने अपनी आत्मा को अपने पिता को सौंपा, तब अपने सब लोगों की आत्माओं की रखवाली का भार अपने ऊपर ले लिया। इसलिए स्तिफनुस उसे अपना रक्षक होने के लिये पुकारता है, यह कहते हुए, "हे प्रभु यीशु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर," (प्रेरितों के काम 7:59)। चूँकि आत्मा जीवन का आसन है, इसलिए, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है, इसी कारण उसका प्रयोग जीवन को सूचित करने के लिये होता है।
तू ने मुझे छुड़ा लिया है। कुछ लोग यहाँ भूतकाल का अनुवाद भविष्यकाल में करते हैं; परन्तु, मेरी समझ में, बिना किसी कारण के। क्योंकि मुझे यह स्पष्ट है कि दाऊद यहाँ अपने ऊपर हुए परमेश्वर के अनुग्रह के उन प्रमाणों को स्मरण करके, जिनका अनुभव वह पहले ही कर चुका था, अपने आप को परमेश्वर पर निरन्तर भरोसा रखने के लिये उत्साहित कर रहा है।
भविष्य के लिये यह हमारे लिये कोई छोटा प्रोत्साहन नहीं है कि हमें दृढ़ निश्चय हो कि परमेश्वर हमारे जीवन की चौकसी करेगा, क्योंकि वह पहले ही हमारा छुड़ानेवाला रहा है। इसी से वह विशेषण आता है जिसके द्वारा दाऊद परमेश्वर को पहचानता है। वह उसे सत्य या विश्वासयोग्य कहता है, क्योंकि वह विश्वास करता है कि वह सदा उसके प्रति वैसा ही बना रहेगा जैसा वह पहले रह चुका है। तदनुसार, यह मानो एक बन्धन है जिसके द्वारा वह परमेश्वर के उन पूर्व उपकारों के साथ, जो उसने उस पर किए थे, प्रार्थना में भरोसे को, और आनेवाले समय के लिये सहायता की आशा को जोड़ता है: मानो वह कहता हो, हे प्रभु, तू जो सदा एक-सा रहता है, और मनुष्यों के समान अपना मन नहीं बदलता, पहले ही वास्तविक कार्य के द्वारा यह प्रमाणित कर चुका है कि तू मेरे जीवन का रक्षक है: इसलिए अब मैं अपना जीवन, जिसका तू संरक्षक रहा है, तेरे हाथों में सौंपता हूँ। जो बात दाऊद यहाँ अपने लौकिक जीवन के विषय में घोषित करता है, उसे पौलुस अनन्त उद्धार पर लागू करता है।
"मैं जानता हूँ," वह कहता है, "कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि जो कुछ मैंने उसे सौंपा है, उसकी वह रखवाली करने में समर्थ है," (2 तीमुथियुस 1:12)।
और निश्चय ही, यदि दाऊद ने एक लौकिक छुटकारे से इतना भरोसा प्राप्त किया, तो यदि मसीह के लहू से मोल ली गई छुटकारे की व्यवस्था हमें शैतान की सब युक्तियों के विरुद्ध अजेय साहस प्रदान न करे, तो यह हमारी ओर से दुष्टता और कृतघ्नता से भी बढ़कर है।
6. जो झूठी व्यर्थ वस्तुओं पर मन लगाते हैं, उन सब से मैं घृणा करता हूँ। यह और भी अच्छी रीति से प्रकट करने के लिये कि उसका विश्वास दृढ़ता से परमेश्वर पर टिका था, वह दृढ़ता से कहता है कि वह उन नीच अभिलाषाओं से मुक्त था जो सामान्यतः हमारे मन को परमेश्वर से फेर देती हैं, और जिनके अधीन अविश्वासी अधिकतर पिसते रहते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि परस्पर विरोधी बातों की तुलना करने से किसी विषय को अधिक स्पष्ट किया जाता है। इब्रानी शब्द הבל हेबेल को, जिसका अनुवाद हमने व्यर्थ वस्तुएँ किया है, कुछ व्याख्याकारों के समान जादू-टोने की विद्याओं तक सीमित कर देना बेतुका है। मैं मानता हूँ कि पूर्वी लोग इन छलों में इतने लिप्त थे कि यह उनके बीच एक सामान्य बुराई थी। परन्तु चूँकि वे युक्तियाँ जिनके द्वारा शैतान मनुष्यों के मन को फँसाता है, और वे प्रलोभन जिनके द्वारा वह उन्हें परमेश्वर से दूर खींच ले जाता है, असंख्य हैं, इसलिए यह बिल्कुल भी सम्भव नहीं जान पड़ता कि भविष्यद्वक्ता केवल एक ही प्रकार का उल्लेख करता है। इसलिए जो भी व्यर्थ आशाएँ हम अपने लिये गढ़ लेते हैं, जो हमें परमेश्वर पर अपने भरोसे से हटा ले जा सकती हैं, उन सब को दाऊद सामान्य रूप से व्यर्थ वस्तुएँ, हाँ, झूठी या मिथ्या व्यर्थ वस्तुएँ कहता है, क्योंकि यद्यपि वे कुछ समय तक भव्य प्रतिज्ञाओं से हमारा पेट भरती हैं, तौभी अन्त में वे हमें छलती और निराश करती हैं। इसलिए वह दृढ़ता से कहता है कि उन व्यर्थ वस्तुओं को, जिन्हें मनुष्य सामान्यतः अपनी आशाओं को सहारा देने के लिये गढ़ते हैं, फेंककर वह केवल परमेश्वर पर निर्भर रहता है। और चूँकि मनुष्य न केवल व्यक्तिगत रूप से संसार के छलपूर्ण प्रलोभनों से अपने आप को मतवाला कर लेते हैं, वरन् इस विषय में एक-दूसरे को भी धोखा देते हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से घोषित करता है, इस उद्देश्य से कि हम उनसे सावधानी से बचें, यदि हम जान-बूझकर उनके घातक जालों में उलझना नहीं चाहते, कि वह उन सब से घृणा करता था जो अपने आप को ऐसे झूठों में फँसाते थे। दूसरा वाक्यांश, मैंने यहोवा पर भरोसा रखा है, पहले के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि यह झूठी व्यर्थ वस्तुओं से उसकी घृणा का कारण भी बताता है, और यह भी दिखाता है कि जब तक मनुष्य उन सब बातों से घृणा न करें जो उन्हें परमेश्वर से दूर खींच ले जाएँगी, तब तक उनके लिये परमेश्वर में कोई सच्चा विश्वास रखना असम्भव है।
हॉर्सली, यद्यपि उसका अनुवाद कैल्विन के अनुवाद के समान है, "तू ने मुझे छुड़ा लिया है," तौभी अर्थ के विषय में कुछ भिन्न दृष्टिकोण रखता है। "तू ने किया है, अर्थात्, तू निश्चय ही करेगा।—बात ऐसी निश्चित है मानो वह हो चुकी हो।"
हैमण्ड "व्यर्थ वस्तुओं" को सलाह और मार्गदर्शन के लिये अन्धविश्वासपूर्वक शकुनों और भविष्य-कथनों का सहारा लेने की उस प्रथा से सम्बन्धित मानता है, जो अन्यजातियों में प्रचलित थी, जब वे किसी कठिनाई या संकट का सामना करते थे। शकुन-विद्या के उत्तरों का वे अत्यधिक आदर करते थे; यद्यपि जो भरोसा उन्होंने उन पर रखा उसमें वे धोखा खाते और निराश होते थे। दाऊद घोषित करता है कि वह ऐसी सब प्रथाओं से घृणा करता था, और सहायता के लिये केवल परमेश्वर पर भरोसा रखता था। फ्रेंच और स्किनर झूठी व्यर्थ वस्तुओं से मूर्तियाँ समझते हैं। "मूर्तियाँ," वॉलफ़र्ड कहता है, "प्रायः इसी नाम से पुकारी जाती हैं; यद्यपि इस शब्द को इसी अर्थ तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अधर्म के सब कार्य उचित रूप से इसके अन्तर्गत सम्मिलित किए जा सकते हैं।—देखिए व्यवस्थाविवरण 32:21; योना 2:8।"
7. मैं तेरी करुणा से मगन और आनन्दित होऊँगा। यहाँ एक धन्यवाद बीच में रखा गया है, यद्यपि बहुतों का यह मत है कि दाऊद की प्रार्थना रुक जाती है, और वह मन्नत मानता है कि जब वह वर्तमान संकट से छुड़ाया जाएगा तब ऐसा करेगा। परन्तु चूँकि इसके साथ कोई शर्त नहीं जोड़ी गई है, इसलिए मैं यह सोचने की ओर अधिक झुकता हूँ कि अपनी प्रार्थना के बीच में एकाएक रुककर वह अपने आप से एक ऐसे छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है, जिसके लिये उसके पास धन्यवाद देने का भरपूर कारण होगा। और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि उन भजनों में भिन्न-भिन्न भावनाएँ मिली हुई हैं जिनमें दाऊद ने अपनी परीक्षाओं का, और साथ ही उस प्रतिरोध का भी जो उसके विश्वास ने उनका किया, वर्णन किया है; यह भी ध्यान में रखते हुए कि जब उसने परमेश्वर से छुटकारा पा लेने के बाद उसका गुणगान किया, तब वह अपने गीत में भिन्न-भिन्न समयों को समेट लेता है, जैसा कि वह यहाँ कहता है कि परमेश्वर ने उसके दुःख पर दृष्टि की थी, और इसके द्वारा वह उस सहायता के परिणाम का संकेत करता है जो परमेश्वर ने उसे प्रदान की थी। और इस बात को और भी दृढ़ करने के लिये वह जोड़ता है कि वह अपने शत्रुओं के हाथ में नहीं सौंपा गया था: इन शब्दों में एक निहित विरोध है, अर्थात् यह कि जब वह चारों ओर से कठोर क्लेशों से घिरा हुआ था, तब परमेश्वर ने उसे अद्भुत रीति से छुड़ाया। यही बात आगे के इस वाक्य से भी सूचित होती है, तू ने मेरे पाँवों को चौड़े स्थान में खड़ा किया है, जो एक अचानक और अप्रत्याशित परिवर्तन को सूचित करता है।
भजन 31:9-13 "इस अभिव्यक्ति में उन सकेतों के, जिनमें वह बन्द रहा था, और उस स्वतन्त्रता के बीच, जो अब उसे प्रदान की गई थी, एक विरोध है।"—वॉलफ़र्ड.
9. हे यहोवा, मुझ पर दया कर, क्योंकि मैं संकट में हूँ: मेरी आँख, मेरा प्राण और मेरा पेट क्रोध के कारण घुल गए हैं। 10. क्योंकि मेरा जीवन शोक के मारे, और मेरे वर्ष कराहते-कराहते क्षीण हो गए हैं; मेरे दुःख में मेरा बल घट गया है, और मेरी हड्डियाँ घुल गई हैं। 11. अपने सब शत्रुओं के कारण मैं निन्दा का पात्र बना, हाँ, अपने पड़ोसियों के लिये अत्यधिक, और अपने जान-पहचानवालों के लिये भय का कारण; और जिन्होंने मुझे बाहर देखा वे मुझ से दूर भाग गए। 12. मैं मृतक के समान भुला दिया गया हूँ, मैं टूटे हुए बर्तन के समान हो गया हूँ। 13. क्योंकि मैंने बहुतों की निन्दा सुनी है, और चारों ओर से भय मुझे घेरे हुए है, जब वे मेरे विरुद्ध आपस में सम्मति करते हैं, और मेरा प्राण लेने की युक्ति करते हैं।
9. हे यहोवा, मुझ पर दया कर। परमेश्वर को अपनी सहायता के लिये प्रेरित करने के लिये, वह अपनी शिकायतों की संख्या के द्वारा अपनी विपत्ति और शोक की विशालता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रकट करता है; इसलिए नहीं कि परमेश्वर को समझाने के लिये तर्कों की आवश्यकता है, परन्तु इसलिए कि वह विश्वासियों को अनुमति देता है कि वे उसके साथ आत्मीयता से व्यवहार करें, ताकि वे अपनी चिन्ताओं का बोझ उतार सकें। जितने अधिक क्लेशों से वे दबे होते हैं, परमेश्वर के सामने उन पर विलाप करते हुए उतना ही अधिक वे उसकी सहायता प्राप्त करने की आशा में अपने आप को उत्साहित करते हैं। ये अभिव्यक्तियाँ अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो सकती हैं, परन्तु यह स्पष्ट है कि दाऊद का उद्देश्य यह घोषित करना और प्रकट करना था कि उसने स्वयं क्या अनुभव किया था। पहले, वह कहता है कि उसकी आँखें, उसका प्राण और उसका पेट शोक से घुल गए थे। इससे प्रकट होता है कि वह इन विपत्तियों के द्वारा न तो हल्के रूप से और न थोड़े समय के लिये इस प्रकार सताया और व्याकुल किया गया था। वास्तव में, उसे आत्मा की ऐसी नम्रता प्रदान की गई थी कि वह अपने आप को सहज ही, और किसी छोटी-सी बात पर, उत्तेजित नहीं होने देता था, और न अत्यधिक शोक से व्याकुल होने देता था। वह बहुत समय से कष्टों को सहने का अभ्यस्त भी हो चुका था। इसलिए हमें मानना पड़ेगा कि उसके क्लेश अविश्वसनीय रूप से कठोर थे, जब वह आवेग की ऐसी सीमा तक झुक गया। क्रोध शब्द के द्वारा भी वह दिखाता है कि वह हर समय ऐसी लौह-सी दृढ़ता का नहीं था, अथवा पापमय आवेग से ऐसा मुक्त नहीं था कि उसका शोक कभी-कभी अत्यधिक उग्रता और तीव्रता में फूट न पड़ता। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि पवित्र लोगों को प्रायः अपने ही आवेगों के साथ कठोर और कठिन संघर्ष करना पड़ता है; और यद्यपि उनका धीरज सदा चिड़चिड़ेपन से मुक्त नहीं रहा, तौभी उसके विरुद्ध सावधानी से मल्लयुद्ध करके वे अन्त में इतना प्राप्त कर पाए हैं कि कष्टों का कोई भी ढेर उन्हें डुबो न सका। जीवन से कुछ लोग जीवन-इन्द्रियाँ समझते हैं, एक ऐसी व्याख्या जिसे मैं पूर्णतः अस्वीकार नहीं करता। परन्तु मैं इसकी व्याख्या केवल यह करना अधिक पसन्द करता हूँ कि शोक से घुलते हुए उसने अनुभव किया कि उसका जीवन और उसके वर्ष फिसलते और क्षीण होते जा रहे हैं। और इन शब्दों के द्वारा भी दाऊद अपने मन की कायरता पर उतना विलाप नहीं करता जितना अपनी विपत्तियों की गम्भीरता पर; यद्यपि वह अपनी दुर्बलता को स्वीकार करने में कदापि लज्जित नहीं था, जिसके लिये वह उत्सुकता से उपचार ढूँढ़ रहा था। जब वह कहता है कि उसके दुःख के नीचे उसका बल घट गया, तो कुछ व्याख्याकार उसके अधर्म के नीचे पढ़ना अधिक पसन्द करते हैं; और मैं मानता हूँ कि इब्रानी शब्द עון ओन दोनों अर्थ रखता है, वरन् अधिकतर इसका अर्थ अपराध या दोष होता है। परन्तु चूँकि इसका प्रयोग कभी-कभी दण्ड के लिये होता है, इसलिए मैंने वह अर्थ चुना है जो प्रसंग के सबसे अधिक अनुकूल प्रतीत होता है। और यद्यपि यह सच है कि दाऊद उन क्लेशों का, जो उसने किसी भी समय सहे, कारण अपने ही दोष को ठहराने का अभ्यस्त था, तौभी चूँकि वह यहाँ उनके कारण का उल्लेख किए बिना केवल अपनी विपत्तियों का वर्णन कर रहा है, इसलिए सम्भव है कि वह अपनी सामान्य रीति के अनुसार एक ही बात को भिन्न-भिन्न शब्दों में दो बार कहता है। "Ou, des grans." — फ्रांसीसी हाशिया. "अथवा, बड़ों की।"
11. अपने सब शत्रुओं के कारण मैं निन्दा का पात्र बना। अन्य लोग इस प्रकार अनुवाद करते हैं—मेरे शत्रुओं से बढ़कर, और चूँकि इब्रानी अक्षर מ मेम प्रायः तुलना के चिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है, वे इस वाक्यांश का अर्थ यह लगाते हैं कि दाऊद के मित्रों और जान-पहचानवालों ने उसके सब शत्रुओं से बढ़कर उसकी निन्दा की। परन्तु, मेरी समझ में, उसका अभिप्राय एक भिन्न विचार प्रकट करना था, अर्थात् यह कि चूँकि उससे सब ओर घृणा की जाती थी, और उसके शत्रुओं ने लगभग सारे राज्य को उसके विरुद्ध अपनी ओर कर लिया था, इसलिए उसके मित्रों और पड़ोसियों के बीच भी उसका बुरा नाम था; ठीक वैसे ही जैसे लोकमत, एक प्रचण्ड आँधी के समान, सामान्यतः सब कुछ अपने साथ बहा ले जाता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि इब्रानी संयोजक ו वाव यह दिखाने के लिये विस्तार के हेतु प्रयुक्त हुआ है कि दाऊद न केवल उन परदेशियों के लिये, जिनसे वह पहले अनजान था, वरन् अपने प्रमुख मित्रों के लिये भी घृणा का पात्र था। वह यह भी जोड़ता है कि जब उन्होंने उसे बाहर देखा तो वे उससे दूर भाग गए। बाहर क्रियाविशेषण के द्वारा उसका अभिप्राय यह कहना है कि वे उस अभागे मनुष्य को अपने निकट आने के योग्य भी नहीं समझते थे; वरन् वे उसके दर्शन मात्र से, चाहे वह कितनी भी दूरी पर हो, भाग जाते थे, कहीं ऐसा न हो कि उसकी विपत्ति की छूत उन तक पहुँच जाए, और इसलिए भी कि वे यह समझते थे कि उसके प्रति मित्रता का कोई भी चिह्न दिखाना उनके लिये हानिकारक और अपमानजनक होगा।
12. मैं मृतक के समान भुला दिया गया हूँ। भजनकार अब भी उसी विचार को आगे बढ़ाता है, और शिकायत करता है कि वह सब मनुष्यों की स्मृति से ऐसा पूरी रीति से मिट गया था मानो वह मर गया हो। कुछ मनुष्यों की स्मृति उनकी मृत्यु के बाद कुछ समय तक जीवितों के बीच हरी-भरी रहती है, परन्तु अधिकतर वह लुप्त हो जाती है; क्योंकि जीवितों और मृतकों के बीच फिर कोई सम्पर्क नहीं रहता, और न जीवित लोग मृतकों की आगे कोई सेवा कर सकते हैं। दाऊद इस विचार को टूटे हुए बर्तन के रूपक से स्पष्ट करता है, जो पूर्ण तिरस्कार और तुच्छता को सूचित करता है; मानो वह कहता हो कि अब वह किसी भी स्थान या आदर के योग्य नहीं समझा जाता था। अन्त में वह जोड़ता है कि भीड़ उसकी निन्दा करती थी, और वह आतंकों से व्याकुल था। तौभी मैं इब्रानी शब्द רבים रब्बीम का अनुवाद बहुतों की अपेक्षा बड़ों करना अधिक पसन्द करूँगा। जब बड़े लोग, जो प्रायः अधिकार के समान ही निर्णय में भी प्रभावशाली होते हैं, हमें दुष्ट मनुष्य कहकर हमारी निन्दा और बदनामी करते हैं, तो इससे हमारे साथ किए जानेवाले अपमान में वृद्धि होती है, क्योंकि जो कुछ वे हमारी निन्दा में कहते हैं उसका प्रभाव यह होता है कि साधारण लोग हमारे विरुद्ध पूर्वाग्रह से भर जाते हैं। इसलिए इन शब्दों को इस अर्थ में समझना बहुत उपयुक्त होगा कि सामन्तों की सारी श्रेणी ने दाऊद को अपमानपूर्वक दोषी ठहराया; और इस प्रकार इस पीड़ित मनुष्य की निर्दोषता उनकी महानता के कारण छाया में पड़ गई। इस व्याख्या की पुष्टि उससे होती है जो तुरन्त आगे आता है:—चारों ओर से भय मुझे घेरे हुए है, जब वे मेरे विरुद्ध आपस में सम्मति करते हैं। चूँकि वह अब भी उन्हीं व्यक्तियों के विषय में बोल रहा है, इसलिए यह निश्चित है कि यह भाषा साधारण लोगों की अपेक्षा सामन्तों पर अधिक उपयुक्त रूप से लागू होती है। इसके अतिरिक्त, हम देखते हैं कि उन छलपूर्ण युक्तियों में, जिनके द्वारा दुष्टों ने दाऊद को नष्ट करने का षड्यन्त्र रचा, उनका प्रमुख उद्देश्य यह था कि सारी प्रजा में उसके विरुद्ध, एक दुष्ट और त्यागे हुए मनुष्य के रूप में, घृणा उत्पन्न करें। हम यह भी देखते हैं कि जब वे उसकी प्रतिष्ठा को क्षत-विक्षत कर रहे थे, तब उन्होंने ऐसा इस रीति से किया कि अपनी दुष्टता को गम्भीर और सुविचारित कार्यवाही के आवरण में छिपा लिया, मानो वे आपस में यह सम्मति कर रहे हों कि उसे एक ऐसे मनुष्य के रूप में नष्ट कर दें जो अब पृथ्वी पर सहन किए जाने योग्य नहीं रहा। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि उसका मन, जैसा कि हमने अभी देखा, इतनी अधिक और इतनी तीक्ष्ण परीक्षाओं से घायल हो गया था। "शब्द עוך," हैमण्ड कहता है, "जैसे पाप का अर्थ रखता है, वैसे ही पाप के दण्ड का अर्थ भी रखता है, यशायाह 53:6, 11;" और इसी अन्तिम अर्थ में यह समीक्षक इसे यहाँ समझता है, ताकि इसका सम्बन्ध उस शोक और कराहने से जुड़ सके जिनका उल्लेख पिछले वाक्यांश में हुआ है, और यह उन विपत्तियों को प्रकट कर सके जो दाऊद के पापों ने उस पर ला दी थीं। "וזע," रॉजर्स टिप्पणी करता है, "यहाँ और कुछ अन्य स्थानों में क्लेश, अर्थात् पाप का दण्ड या परिणाम, का अर्थ देता है; देखिए उत्पत्ति 4:13; 1 शमूएल 28:10; 2 राजा 7:9," इत्यादि।—Book of Psalms in Hebrew, metrically arranged, खण्ड 2, पृ. 188. सेप्तुआजिन्त में दरिद्रता या क्लेश में पढ़ा जाता है, और इसमें सुरियानी और वुलगाता उसका अनुसरण करते हैं।
"मैं टूटे हुए बर्तन के समान हो गया हूँ;" अर्थात्, निकम्मा समझकर पूरी रीति से उपेक्षित।
भजन 31:14-18
हॉर्सली (Horsley) भी यही मत रखता है। वह पढ़ता है, "बलवन्त लोग।"
"चारों ओर भय, या चारों ओर आतंक। इब्रानी में magor missabib, वह नाम जो यिर्मयाह ने पशहूर याजक को दिया, यह सूचित करते हुए कि वह अपने लिए और अपने सब मित्रों के लिए भय का कारण होगा; यिर्मयाह 20:3, 4।" — ऐन्सवर्थ (Ainsworth)। हॉर्सली पढ़ता है, "निश्चय मैंने बलवन्तों की क्रोध-भरी बड़बड़ाहट सुनी, उनकी जो सब के लिए भय का कारण हैं।"
इस पर उसकी यह टिप्पणी है: ",מגור מסביב मैं इसे उन बलवन्त लोगों का वर्णन करनेवाला वाक्यांश समझता हूँ, जिनकी अपने विरुद्ध द्वेषपूर्ण धमकियाँ उसने सुन ली थीं, ऐसे लोग जिनसे उनकी शक्ति और क्रूरता के कारण सब कोई डरते थे।"
14. परन्तु हे यहोवा, मैंने तो तुझी पर भरोसा रखा है! मैंने कहा, तू मेरा परमेश्वर है। 15. मेरे समय तेरे हाथ में हैं; मुझे मेरे शत्रुओं के हाथ से, और मेरे सतानेवालों से छुड़ा। 16. अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका; अपनी भलाई में मेरी रक्षा कर। 17. हे यहोवा, मुझे लज्जित न होने दे, क्योंकि मैंने तुझे पुकारा है; दुष्ट लज्जित हों, वे कब्र में चुप कर दिए जाएँ। 18. झूठ बोलनेवाले होंठ चुप कर दिए जाएँ, जो अहंकार और तिरस्कार के साथ धर्मी के विरुद्ध कठोर [या दुःखदायी] बातें बोलते हैं।
14. परन्तु हे यहोवा, मैंने तो तुझी पर भरोसा रखा है! इसका ठीक अनुवाद यह है, और मैंने तुझ पर भरोसा रखा है; परन्तु यहाँ इब्रानी संयोजक अव्यय ו vau, और, विरोधवाचक अव्यय परन्तु या तौभी के स्थान पर प्रयुक्त हुआ है। दाऊद अपने विश्वास की दृढ़ता को उन परीक्षाओं के आक्रमणों के विरोध में रखते हुए, जिनका उसने उल्लेख किया है, इस बात से इन्कार करता है कि वह कभी मूर्च्छित हुआ, वरन् इसके विपरीत यह दृढ़ता से कहता है कि वह परमेश्वर से छुटकारे की आशा में स्थिर खड़ा रहा। इसका यह अर्थ भी नहीं कि वह इस बात का घमण्ड करता था कि वह इतना उदारचित्त और साहसी है कि शरीर की निर्बलता के कारण गिराया ही नहीं जा सकता। यद्यपि ये बातें एक-दूसरे के कितनी ही विपरीत क्यों न दिखाई दें, तौभी वे प्रायः, और उचित रीति से, एक ही व्यक्ति में एक साथ पाई जाती हैं; अर्थात् जब वह शोक से घुलता जाता है, और उसका सारा बल जाता रहता है, तब भी वह ऐसी दृढ़ आशा से सम्भाला जाता है कि परमेश्वर को पुकारना नहीं छोड़ता। इसलिए दाऊद गहरे शोक और अन्य भयानक दुःखों में इतना डूबा हुआ न था कि विश्वास का गुप्त प्रकाश उसके हृदय के भीतर न चमक सके; और न वह अपनी परीक्षाओं के भारी बोझ के नीचे इतना कराहता था कि परमेश्वर को पुकारने के लिए अपने आप को जगा न सके। अनेक बाधाओं से संघर्ष करते हुए ही वह वह अंगीकार करने के योग्य हुआ जो वह यहाँ करता है। इसके बाद वह अपने विश्वास की रीति को स्पष्ट करता है, अर्थात् यह कि उसने अपने मन में यह विचार किया कि परमेश्वर उसे कभी न तो धोखा देगा और न त्यागेगा। आइए, हम उसके कहने की इस रीति पर ध्यान दें: मैंने कहा, तू मेरा परमेश्वर है। इन शब्दों के द्वारा वह यह सूचित करता है कि उसे इस सत्य का, कि परमेश्वर उसका परमेश्वर है, इतना पूर्ण निश्चय था कि वह इसके विपरीत किसी सुझाव को भी स्थान न देता था। और जब तक यह निश्चय प्रबल होकर हमारे मनों पर अधिकार न कर ले, तब तक हम सदा अनिश्चितता में डगमगाते रहेंगे। तौभी ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह घोषणा केवल भीतरी और गुप्त ही नहीं है, जो जीभ से अधिक हृदय में की गई हो, वरन् यह स्वयं परमेश्वर की ओर निर्देशित है, मानो उसी की ओर जो इसका एकमात्र साक्षी है। जब हम देखते हैं कि सारा संसार हमारे विश्वास का उपहास करता है, तब केवल परमेश्वर ही की ओर अपनी बात निर्देशित करना, और उस गवाही से सन्तुष्ट रहना जो हमारा विवेक हमें देता है कि वह हमारा परमेश्वर है, इससे कठिन और कुछ नहीं है। और निश्चय ही यह सच्चे विश्वास का निःसन्देह प्रमाण है कि जब हम पर टकरानेवाली लहरें कितनी ही प्रचण्ड क्यों न हों, और जिन आक्रमणों से हम हिलाए जाते हैं वे कितने ही कठोर क्यों न हों, तौभी हम इसे एक स्थिर सिद्धान्त के रूप में दृढ़ता से थामे रहें कि हम निरन्तर परमेश्वर की सुरक्षा में हैं, और उससे खुलकर कह सकें, तू हमारा परमेश्वर है।
15. मेरे समय तेरे हाथ में हैं। ताकि वह और भी अधिक प्रसन्नता से अपने प्राण की रक्षा परमेश्वर को सौंप सके, वह हमें निश्चय दिलाता है कि उसकी ईश्वरीय रखवाली पर भरोसा रखकर वह उन आकस्मिक और अनपेक्षित घटनाओं के विषय में व्याकुल नहीं होता था जिनसे मनुष्य साधारणतः डरते हैं। उसकी भाषा का अभिप्राय यह है, हे प्रभु, मेरे जीवन और मेरी मृत्यु दोनों का निपटारा करना तेरा ही विशेषाधिकार है, और केवल तुझी को इसकी सामर्थ्य है। मेरी समझ में वह बहुवचन का प्रयोग भी अकारण नहीं करता, वरन् उन विविध संकटों को सूचित करने के लिए करता है जिनसे मनुष्य का जीवन प्रायः सताया जाता है। मेरे समय वाक्यांश को उस समय तक सीमित कर देना जो उसे जीना था, मानो दाऊद का अभिप्राय इससे अधिक कुछ न था कि पृथ्वी पर उसका समय या उसके दिन परमेश्वर के हाथ में हैं, एक नीरस व्याख्या है। इसके विपरीत, मेरा मत यह है कि जब वह उन विविध उलट-फेरों और अनेक संकटों पर, जो निरन्तर हमारे ऊपर मँडराते रहते हैं, और उन अनेक अनपेक्षित घटनाओं पर, जो समय-समय पर घटती रहती हैं, मनन करता था, तब भी वह भरोसे के साथ परमेश्वर के विधान पर विश्राम करता था, जिसे वह, जैसा साधारण कहावत है, अच्छे और बुरे भाग्य दोनों का निर्णायक मानता था। पहले वाक्यांश में हम देखते हैं कि वह परमेश्वर को केवल सामान्य रूप से संसार का शासक ही नहीं कहता, वरन् यह भी दृढ़ता से कहता है कि उसका जीवन उसके हाथ में है; और इतना ही नहीं, वरन् यह भी कि उसका जीवन चाहे जिन उथल-पुथलों के अधीन किया जाए, और उस पर चाहे जो परीक्षाएँ और उलट-फेर आ पड़ें, वह उसकी सुरक्षा में निरापद था। इसी पर वह अपनी इस प्रार्थना की नींव रखता है कि परमेश्वर उसे उसके शत्रुओं के हाथ से बचाए और छुड़ाए।
16. अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका। हम पहले कह चुके हैं, और आगे बहुत से उदाहरणों में देखेंगे, कि कहने की यह रीति मनुष्यों की साधारण धारणा से ली गई है, जो यह समझते हैं कि जब तक परमेश्वर अपने कार्यों के द्वारा वास्तव में उनकी चिन्ता प्रकट न करे, तब तक वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता। इन्द्रियों के निर्णय के अनुसार क्लेश उसके मुख को वैसे ही छिपा देते हैं जैसे बादल सूर्य के तेज को ढाँप लेते हैं। इसलिए दाऊद यह विनती करता है कि परमेश्वर उसे तुरन्त सहायता देकर उस पर यह प्रकट करे कि उसे उसका अनुग्रह और कृपा प्राप्त है, जिसे क्लेशों के अन्धकार के बीच पहचानना बहुत सरल नहीं होता। अब परमेश्वर के विषय में दो प्रकार से कहा जाता है कि वह अपने मुख का प्रकाश हम पर उठाता है; या तो तब जब वह हमारे कामों की चिन्ता करने के लिए अपनी आँखें खोलता है, या तब जब वह हम पर अपनी कृपा प्रकट करता है। ये दोनों बातें वास्तव में अविभाज्य हैं, वरन् एक दूसरी पर निर्भर है। परन्तु कहने की पहली रीति के द्वारा हम अपनी शारीरिक धारणाओं के अनुसार परमेश्वर पर ऐसी परिवर्तनशीलता का आरोप करते हैं जो, ठीक-ठीक कहें तो, उसमें नहीं है; जबकि कहने की दूसरी रीति यह सूचित करती है कि जब वह हमारे क्लेशों की ओर कोई ध्यान देता हुआ नहीं दिखाई देता, तब परमेश्वर की आँखें नहीं, वरन् हमारी ही आँखें बन्द या भारी होती हैं। रक्षा कर शब्द के द्वारा दाऊद यह स्पष्ट करता है कि पहली अभिव्यक्ति से उसका क्या अभिप्राय था; परन्तु क्योंकि उस समय उसे बचाव का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता था, इसलिए वह परमेश्वर की भलाई को अपने सामने रखकर उसकी आशा करने के लिए अपने आप को उत्साहित करता है।
17. हे यहोवा, मुझे लज्जित न होने दे। इन शब्दों में भजनकार अपनी प्रार्थना जारी रखता है, और अपनी आशाओं को दृढ़ करने के लिए वह अपने आप की तुलना अपने शत्रुओं से करता है; क्योंकि यह अत्यन्त असंगत होता कि जो लोग अपनी दुष्टता के द्वारा इतने खुले रूप से परमेश्वर के क्रोध को भड़काते थे, उन्हें दण्ड से बच निकलने दिया जाए, और जो निर्दोष था और परमेश्वर पर भरोसा रखता था, वह निराश किया जाए और हँसी का पात्र बनाया जाए। अतः यहाँ हम समझते हैं कि भजनकार की इस तुलना में क्या निहित है। इसके अतिरिक्त, अपनी आशा या भरोसे की बात करने के स्थान पर वह अब परमेश्वर को पुकारने की बात करता है, और कहता है, मैंने तुझे पुकारा है; और वह ऐसा उचित कारण से करता है, क्योंकि जो परमेश्वर के विधान पर भरोसा रखता है, उसे प्रार्थनाओं और ऊँचे स्वर की दोहाई के साथ उसी की शरण में भागना चाहिए। कब्र में चुप कर दिए जाने का अर्थ यह है कि मृत्यु जब भक्तिहीनों पर आती है, तब उन्हें रोक देती है और आगे हानि पहुँचाने से बाधित कर देती है। यह चुप्पी उनकी छल-भरी और विश्वासघाती युक्तियों के और उनकी उग्र ढिठाई के, दोनों के विरोध में रखी गई है। इसलिए ठीक अगले पद में वह यह जोड़ता है, झूठ बोलनेवाले होंठ चुप कर दिए जाएँ, जिसमें, मेरी समझ में, उनकी धूर्तता, और वे झूठे बहाने और निन्दाएँ, जिनके द्वारा वे अपनी युक्तियों को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं, और वह व्यर्थ डींग भी जिसमें वे लिप्त रहते हैं, सब सम्मिलित हैं। क्योंकि वह हमें बताता है कि वे अहंकार और तिरस्कार के साथ धर्मी के विरुद्ध कठोरता और कड़ाई से बोलते हैं; क्योंकि उनका टेढ़ा अभिमान ही, जो प्रायः सदा तिरस्कार को जन्म देता है, दाऊद के शत्रुओं को झूठ बोलने में इतना ढीठ बनाता था। जो कोई अहंकार से अपने लिए उससे अधिक का दावा करता है जो उसका उचित भाग है, वह प्रायः अनिवार्य रूप से दूसरों से तिरस्कार का व्यवहार करेगा।
भजन 31:19-21
19. आहा, तेरी भलाई क्या ही बड़ी है जो तूने अपने डरवैयों के लिए छिपा रखी है! जिसे तूने मनुष्यों के सामने अपने शरणागतों के लिए कर दिखाया है! 20. तू उन्हें अपने मुख के गुप्त स्थान में [या, छिपने के स्थान में] मनुष्य के अहंकार से छिपा रखेगा; तू उन्हें मानो एक तम्बू में जीभों के झगड़े से छिपा रखेगा। 21. यहोवा धन्य है! क्योंकि उसने, मानो एक गढ़वाले नगर में, मुझ पर अपनी भलाई अद्भुत रीति से प्रकट की है।
19. आहा, तेरी भलाई क्या ही बड़ी है जो तूने अपने डरवैयों के लिए छिपा रखी है! इस पद में भजनकार ऊँचे स्वर से कहता है कि परमेश्वर अपने दासों के प्रति अगम्य रूप से भला और उपकारी है। यहाँ भलाई का अर्थ वे ईश्वरीय आशीषें हैं जो उसका फल हैं। वाक्य के प्रश्नवाचक रूप में एक विशेष बल है; क्योंकि दाऊद केवल यही दृढ़ता से नहीं कहता कि परमेश्वर भला है, वरन् वह उस भलाई की प्रशंसा में, जिसका उसने अनुभव किया था, आनन्द-विभोर हो जाता है। निःसन्देह यही अनुभव था जिसने उसे इस पद की आनन्द-विभोर भाषा में फूट पड़ने के लिए प्रेरित किया; क्योंकि वह अपनी विपत्तियों से अद्भुत रीति से और अनपेक्षित रूप से छुड़ाया गया था। इसलिए अपने उदाहरण के द्वारा वह विश्वासियों को यह आज्ञा देता है कि वे अपनी समझ की धारणा से ऊपर उठें, ताकि वे परमेश्वर के अनुग्रह से उससे कहीं अधिक की प्रतिज्ञा अपने आप को दें और उसकी आशा रखें जितनी मनुष्य की बुद्धि कल्पना कर सकती है। वह कहता है कि परमेश्वर की भलाई उसके दासों के लिए छिपा रखी गई है, क्योंकि यह वह निधि है जो विशेष रूप से उन्हीं की है। निःसन्देह वह विविध रीतियों से अधर्मियों और अयोग्यों तक भी पहुँचती है, और बिना भेदभाव के उनके सामने रखी जाती है; परन्तु वह विश्वासियों के प्रति कहीं अधिक भरपूरी और स्पष्टता से प्रकट होती है, क्योंकि केवल वे ही परमेश्वर के सब उपकारों का अपने उद्धार के लिए उपभोग करते हैं। परमेश्वर "भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है" (मत्ती 5:45), और अबुद्धि सृष्टि के प्रति भी अपने आप को उदार दिखाता है; परन्तु वह इस शब्द के सच्चे और पूर्ण अर्थ में केवल उन्हीं के लिए अपने आप को पिता घोषित करता है जो उसके दास हैं। इसलिए यह अकारण नहीं कहा गया कि परमेश्वर की भलाई विश्वासियों के लिए छिपा रखी गई है, जिन्हें ही वह अपनी कृपा का अत्यन्त घनिष्ठता और कोमलता से उपभोग करने के योग्य समझता है। कुछ लोग परमेश्वर की भलाई छिपी है वाक्यांश की अधिक सूक्ष्म व्याख्या करते हैं, और इसका यह अर्थ बताते हैं कि परमेश्वर अपनी सन्तान को बार-बार क्रूसों और क्लेशों से साधते हुए उनसे अपनी कृपा छिपा लेता है, यद्यपि साथ ही वह उन्हें भूलता नहीं। तौभी अधिक सम्भव यह है कि इसे उस निधि के विषय में समझा जाए जिसे परमेश्वर ने उनके लिए अलग करके संचित कर रखा है; जब तक कि कदाचित् हम इसे पवित्र लोगों के अनुभव पर लागू करना न चाहें, क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, केवल वे ही अपने प्राणों में ईश्वरीय भलाई के फल का अनुभव करते हैं; जबकि पशुतुल्य मूढ़ता दुष्टों को परमेश्वर को उपकारी पिता के रूप में पहचानने से रोकती है, उस समय भी जब वे उसकी अच्छी वस्तुओं को लालच से निगल रहे होते हैं। और इस प्रकार ऐसा होता है कि यद्यपि परमेश्वर की भलाई संसार के सब भागों को भरती और उन पर फैली रहती है, तौभी वह साधारणतः अनजानी ही रहती है। परन्तु पवित्र लेखक का अभिप्राय उस विषमता से अधिक स्पष्ट रूप से समझ में आएगा जो विश्वासियों और परमेश्वर के प्रेम से अपरिचित लोगों के बीच है। जैसे एक दूरदर्शी मनुष्य सब मनुष्यों के प्रति अपनी उदारता को इस रीति से नियमित करेगा कि न तो अपनी सन्तान या परिवार का हक़ मारे, और न दूसरों पर अपनी सम्पत्ति उड़ाकर अपने घर को कंगाल करे; वैसे ही परमेश्वर भी अपने परिवार से बाहर के लोगों पर उपकार करते हुए भली-भाँति जानता है कि अपनी सन्तान के लिए वह भाग कैसे सुरक्षित रखे जो मानो पैतृक अधिकार से उनका है; अर्थात् उनके लेपालकपन के कारण। अगस्तीन का इन शब्दों से यह सिद्ध करने का प्रयत्न कि जो लोग अविश्वास से परमेश्वर के न्याय से डरते हैं उन्हें उसकी भलाई का कोई अनुभव नहीं होता, अत्यन्त अनुपयुक्त है। इस स्थल के विषय में उसका भ्रामक दृष्टिकोण समझने के लिए अगले वाक्यांश को देखना ही पर्याप्त है, जिसमें दाऊद कहता है कि परमेश्वर संसार को यह अनुभव कराता है कि वह अपनी सेवा करनेवालों के प्रति, उनकी रक्षा करने और उनके कल्याण का प्रबन्ध करने में, अनमोल भलाई करता है। इससे हम सीखते हैं कि भजनकार यहाँ उस अनन्त धन्यता के विषय में नहीं बोलता जो स्वर्ग में भक्तों के लिए रखी गई है, वरन् उस रक्षा और उन अन्य आशीषों के विषय में बोलता है जो वर्तमान जीवन के संरक्षण से सम्बन्ध रखती हैं; और वह घोषित करता है कि वे इतनी प्रकट हैं कि स्वयं भक्तिहीन भी उनके प्रत्यक्षदर्शी बनने को विवश होते हैं। मैं मानता हूँ कि संसार परमेश्वर के सब कामों को आँखें मूँदकर अनदेखा कर देता है, और विशेषकर पवित्र लोगों के प्रति उसकी पितृतुल्य चिन्ता से अनजान रहता है; तौभी यह निश्चित है कि उसके ऐसे प्रतिदिन के प्रमाण चमकते रहते हैं कि त्यागे हुए लोग भी उन्हें देखे बिना नहीं रह सकते, सिवाय इसके कि वे जान-बूझकर प्रकाश की ओर से अपनी आँखें बन्द कर लें। इसलिए दाऊद सत्य के अनुसार बोलता है जब वह घोषित करता है कि परमेश्वर मनुष्यों के सामने अपने लोगों के प्रति अपनी भलाई के प्रमाण देता है, ताकि स्पष्ट रूप से देखा जा सके कि वे बिना सोचे-समझे या व्यर्थ उसकी सेवा नहीं करते। ["C'est, reservee." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "अर्थात्, संचित की हुई।"] ["C'est a dire, a cause de leur adoption." — फ्रांसीसी.]
20. तू उन्हें अपने मुख के गुप्त स्थान में छिपा रखेगा। इस पद में भजनकार विशेष रूप से परमेश्वर के अनुग्रह की सराहना करता है, क्योंकि वह विश्वासियों को सब हानि से बचाता और उनकी रक्षा करता है। क्योंकि शैतान लगन से और असंख्य उपायों से उनके कल्याण का विरोध करता है, और संसार का अधिकांश भाग उनसे घातक युद्ध में लगा है, इसलिए उनका बहुत से संकटों के सामने खुला रहना अनिवार्य है। अतः यदि परमेश्वर अपनी सामर्थ्य से उनकी रक्षा न करता, और समय-समय पर उनकी सहायता को न आता, तो उनकी दशा अत्यन्त दयनीय होती। भजनकार उस छिपाने की ओर संकेत करता है जिसका उसने अभी उल्लेख किया था; और यद्यपि यह रूपक पहली दृष्टि में कुछ कठोर लग सकता है, तौभी यह बहुत उपयुक्त रीति से यह व्यक्त करता है कि यदि प्रभु उनकी चिन्ता करे, तो विश्वासी केवल उसी की सुरक्षा में पूर्णतः निरापद हैं। इसलिए इस स्तुति के द्वारा वह ईश्वरीय विधान की सामर्थ्य की उदात्त रीति से बड़ाई करता है, क्योंकि केवल वही हर प्रकार की बुराई को दूर करने के लिए पर्याप्त है, और जब वह भक्तों पर चमकता है, तब सब दुष्टों की आँखों को चौंधिया देता और उनके हाथों को निर्बल कर देता है। कुछ लोगों के मत में भजनकार जब परमेश्वर के मुख के गुप्त स्थान की बात करता है, तो पवित्रस्थान की ओर संकेत करता है; यह एक ऐसी व्याख्या है जिसे मैं पूर्णतः अस्वीकार नहीं करता, यद्यपि वह मुझे पर्याप्त ठोस नहीं जान पड़ती। फिर वह कहता है कि परमेश्वर विश्वासियों को मनुष्य के अहंकार और जीभों के झगड़े से छिपा रखता है; क्योंकि यदि परमेश्वर दुष्टों को न रोके, तो हम जानते हैं कि उनमें सच्चे भक्तों के विरुद्ध उग्र हिंसा के साथ टूट पड़ने का दुस्साहस है; परन्तु उनकी कामना और ढिठाई कितनी ही निरंकुश क्यों न हो, परमेश्वर अद्भुत रीति से अपने मुख के तेज से अपने लोगों को ढाँपकर उन्हें हानि से बचाए रखता है। कुछ लोग इब्रानी शब्द ריכסים rikasim का अनुवाद षड्यन्त्र, और अन्य कुटिलताएँ करते हैं, परन्तु बिना किसी कारण के; और न ही शब्द की व्युत्पत्ति इसकी अनुमति देती है, क्योंकि वह ऐसे धातु से निकला है जिसका अर्थ ऊपर उठाना या ऊँचा करना है। अहंकार के साथ जीभों का झगड़ा जोड़ा गया है, क्योंकि परमेश्वर की सन्तान के पास न केवल अपने शत्रुओं के अमानवीय कामों से, वरन् उनकी उससे भी अधिक दुष्ट और उग्र निन्दाओं से डरने का कारण है, जैसा स्वयं दाऊद ने आवश्यकता से अधिक अनुभव किया। और क्योंकि हमारी निर्दोषता हमें उचित रूप से अपने प्राण से भी अधिक प्रिय होनी चाहिए, इसलिए आइए हम खराई को इस रीति से अपनाना सीखें कि परमेश्वर की सुरक्षा पर भरोसा रखकर हर झूठी निन्दा की उपेक्षा कर सकें। और आइए हम सदा स्मरण रखें कि अपने लोगों को सब अन्यायपूर्ण अपमानों से निर्दोष ठहराना परमेश्वर का विशेष अधिकार है। ["मनुष्यों के सामने, अर्थात् खुले रूप से, कि संसार को यह मानना पड़े कि 'निश्चय धर्मी के लिए फल है।' भजन 58:11 से तुलना कीजिए।" — फ्रेंच (French) और स्किनर (Skinner)।]
"Et que quand elle luit sur les fideles, ses rayons sont pour esblouir les yeux de tous les iniques, et affoiblir leur mains.." — फ्रांसीसी.
यही पाठ वॉलफ़र्ड (Walford) ने अपनाया है। ",מרכסי, רכס colligavit: इसलिए 'बन्धन,' 'षड्यन्त्र।'"
21. यहोवा धन्य है! भजनकार यहाँ इन सामान्य सत्यों को अपनी परिस्थितियों पर लागू करने लगता है, और घोषित करता है कि उसके प्राण की रक्षा करने में परमेश्वर की भलाई अद्भुत रीति से प्रकट हुई। क्योंकि वह उस सहायता की बात करता है जो अत्यन्त निराशाजनक परिस्थितियों में उसे अचानक और अनपेक्षित रूप से दी गई थी, इसलिए वे व्याख्याकार ठीक निर्णय करते हैं जो यहाँ समानतावाचक चिह्न मानो को इस प्रकार जोड़ देते हैं, मानो एक गढ़वाले नगर में। दाऊद हर प्रहार के लिए खुला पड़ा था, और हर प्रकार की हानि के सामने रखा गया था; और वह गर्व से कहता है कि उसकी नग्नता और निराश्रयता में परमेश्वर की सहायता उसके लिए किसी भली-भाँति गढ़वाले नगर या अभेद्य गढ़ से भी अधिक उपयोगी सिद्ध हुई।
भजन 31:22-24
22. और मैंने अपनी घबराहट में कहा, मैं तेरी दृष्टि से दूर कर दिया गया हूँ; तौभी जब मैंने तेरी दोहाई दी, तब तूने निश्चय मेरी गिड़गिड़ाहट का शब्द सुन लिया। 23. हे यहोवा के सब नम्र भक्तो, उससे प्रेम रखो! यहोवा विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा करता है, और जो अहंकार का व्यवहार करता है उसे भरपूर बदला देता है। 24. हियाव बाँधो, और वह तुम्हारे हृदय को दृढ़ करेगा, हे यहोवा पर आशा रखनेवालो, तुम सब।
22. और मैंने अपनी घबराहट में कहा। दाऊद यहाँ अंगीकार करता है कि अपने अविश्वास के कारण वह इस योग्य था कि परमेश्वर उसे त्याग दे और नष्ट होने के लिए छोड़ दे। यह सच है कि मनुष्यों के सामने इसका अंगीकार करना उसे लज्जा की बात लगी; परन्तु ताकि वह अपने प्रति परमेश्वर के अनुग्रह को और भी पूर्ण रूप से प्रकट करे, वह अपने दोष की लज्जा को प्रकाशित करने में संकोच नहीं करता। वह लगभग यही अंगीकार भजन 116:11 में दोहराता है, "मैंने उतावली से कहा, सब मनुष्य झूठे हैं।" मैं जानता हूँ कि इब्रानी शब्द חפז chaphaz की व्याख्या कुछ लोग भागना करते हैं; मानो दाऊद, मृत्यु से भागते हुए, क्योंकि वह प्रतिरोध करने में असमर्थ था, इस भय से ग्रस्त हो गया था। परन्तु मैं इसे उसके मन की व्याकुलता पर ही लागू करता हूँ। इसलिए चाहे हम इसका अनुवाद उतावली करें या भय, इसका अर्थ यह है कि वह मानो सिर के बल इस विचार को मन में लाने के लिए बहा दिया गया था कि परमेश्वर ने उसकी उपेक्षा की है। और यह उतावली शान्त और सुविचारित मनन के विपरीत है; क्योंकि यद्यपि दाऊद भय से ग्रस्त हो गया था, तौभी वह परीक्षा में मूर्च्छित नहीं हुआ, और यह धारणा उसके मन में स्थायी रूप से नहीं टिकी रही। क्योंकि हम जानते हैं कि विश्वासी प्रायः भय और अधीरता की उष्णता से व्याकुल हो जाते हैं, या अपनी अत्यन्त उतावली या जल्दबाज़ इच्छाओं के द्वारा मानो सिर के बल धकेल दिए जाते हैं, परन्तु बाद में वे सँभल जाते हैं। कि दाऊद का विश्वास इस परीक्षा से कभी उलटा नहीं गया था, यह प्रसंग से प्रकट होता है; क्योंकि वह तुरन्त यह जोड़ता है कि परमेश्वर ने उसकी गिड़गिड़ाहट का शब्द सुन लिया था; परन्तु यदि उसका विश्वास बुझ गया होता, तो वह अपने मन को उत्कटता से प्रार्थना में नहीं लगा सकता था, और इसलिए यह शिकायत केवल उतावली में निकली जीभ की एक चूक थी। अब यदि विचारों की चिड़चिड़ी उतावली परमेश्वर के इस पवित्र भविष्यद्वक्ता को, जो इतने अधिक गुणों से विभूषित मनुष्य था, निराशा की ओर धकेल सकी, तो हमें इस बात से डरने का कितना अधिक कारण है कि कहीं हमारे मन मूर्च्छित होकर हमें घातक रूप से नष्ट न कर दें? दाऊद का यह अंगीकार, जैसा हम पहले कह चुके हैं, परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा बढ़ाने का काम करता है; परन्तु साथ ही वह पद के दूसरे वाक्यांश में पर्याप्त रूप से दिखाता है कि उसका विश्वास, यद्यपि बुरी तरह हिलाया गया, तौभी पूर्णतः उखाड़ा नहीं गया था, क्योंकि इस बीच उसने प्रार्थना करना नहीं छोड़ा। पवित्र लोग प्रायः इसी रीति से अपने अविश्वास से कुश्ती लड़ते हैं, कुछ तो इसलिए कि वे निराश न हों, और कुछ इसलिए कि वे साहस बटोरें और अपने आप को प्रार्थना के लिए उभारें। और न शरीर की निर्बलता, उस समय भी जब वे लगभग गिरा दिए गए हों, उन्हें यह दिखाने से रोकती है कि वे परमेश्वर के सामने न थकनेवाले और अजेय योद्धा हैं। परन्तु यद्यपि दाऊद ने परीक्षा का दृढ़ता से सामना किया, तौभी वह अपने आप को परमेश्वर के उस अनुग्रह के अयोग्य स्वीकार करता है जिससे उसने अपने सन्देह के द्वारा कुछ मात्रा में अपने आप को वंचित कर लिया था। क्योंकि इब्रानी अव्यय אכן aken को यहाँ विरोधवाचक अर्थ में समझना और उसका अनुवाद तौभी करना चाहिए, जो यह सूचित करता है कि दाऊद अपनी किसी योग्यता के बिना बचाया गया था, क्योंकि परमेश्वर की असीम भलाई ने उसके अविश्वास से संघर्ष किया। परन्तु क्योंकि इब्रानी में यह निश्चयवाचक चिह्न है, इसलिए मैंने इसका अनुवाद तौभी निश्चय करना उचित समझा है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह अपनी भाषा को उन विविध परीक्षाओं के विरोध में रखता है जिनके द्वारा, सम्भवतः, उसका मन इधर-उधर उछाला गया था। ["समानतावाचक अव्यय इब्रानी में नहीं है, जैसा प्रायः होता है। भजनकार का अभिप्राय स्पष्टतः एक रूपक के द्वारा अपने उल्लेखनीय छुटकारे का वर्णन करना है, मानो उसकी रक्षा अजेय गढ़बन्दियों के द्वारा की गई हो।" — वॉलफ़र्ड।]
"Ou, perturbation; ou, hastivete." — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी। "या, व्याकुलता; या, उतावली।"
"Ou, par excellence." — "या, उत्कृष्ट रीति से।" — फ्रांसीसी हाशिये की टिप्पणी।
23. हे यहोवा के सब नम्र भक्तो, उससे प्रेम रखो! मेरी समझ में भजनकार यहाँ पवित्र लोगों को, जैसा बहुत से लोग समझते हैं, परमेश्वर का भय मानने और उसका आदर करने का उपदेश नहीं देता, वरन् उन्हें उस पर भरोसा रखने के लिए उत्साहित करता है; या दूसरे शब्दों में, अपने आप को पूर्णतः उसे समर्पित करने, अपनी सारी आशा उसी पर रखने, और किसी दूसरे की खोज किए बिना पूरी रीति से उसी पर निर्भर रहने के लिए। हमारी अपनी मूर्खतापूर्ण युक्तियाँ हमें क्यों भाती हैं, सिवाय इसके कि हम परमेश्वर में उतना आनन्द नहीं पाते जितना पाना चाहिए, और हमारे स्नेह उससे लिपटे नहीं रहते? इसलिए परमेश्वर के इस प्रेम में हृदय की सब अभिलाषाएँ सम्मिलित हैं। स्वभाव से सब मनुष्य समृद्ध या सुखी दशा में रहने की बड़ी अभिलाषा रखते हैं; परन्तु जबकि अधिकांश लोग संसार के प्रलोभनों से मोहित हो जाते हैं, और उसके झूठ और छल को अधिक पसन्द करते हैं, सौ में से कोई एक भी कठिनाई से अपना मन परमेश्वर पर लगाता है। तुरन्त आगे आनेवाला कारण इस व्याख्या की पुष्टि करता है; क्योंकि प्रेरित भजनकार नम्र लोगों को परमेश्वर से प्रेम रखने का उपदेश इसलिए देता है कि वह विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा करता है; मानो उसने उनसे यह चाहा हो कि वे उसकी रखवाली से सन्तुष्ट होकर विश्राम करें, और यह मानें कि उसमें उन्हें पर्याप्त सहायता मिलती है। साथ ही, वह उन्हें शुद्ध विवेक बनाए रखने और खराई को अपनाने की चेतावनी देता है, क्योंकि परमेश्वर केवल उन्हीं की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है जो खरे और विश्वासयोग्य हैं। दूसरी ओर, वह घोषित करता है कि वह अहंकारियों को भरपूर बदला देता है, ताकि जब हम उन्हें कुछ समय तक फलते-फूलते देखें, तो कोई अनुचित स्पर्धा हमें उनका अनुकरण करने के लिए न लुभाए, और उनका घमण्ड तथा उनके द्वारा किया गया उपद्रव, जबकि वे समझते हैं कि वे जो चाहें करने को स्वतन्त्र हैं, हमारी आत्माओं को कुचल और तोड़ न डाले। पूरी बात का सार यह है, यद्यपि भक्तिहीन, जब वे दण्ड पाए बिना अपनी दुष्टता में आगे बढ़ते हैं, अपने आप की चापलूसी करते हैं, और विश्वासी अनेक भयों और संकटों से सताए जाते हैं, तौभी तुम अपने आप को परमेश्वर को समर्पित करो, और उसके अनुग्रह पर निर्भर रहो, क्योंकि वह सदा विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा करेगा, और अहंकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार बदला देगा। इब्रानी शब्द על-,יתר al-yether के अर्थ के विषय में, जिसका अनुवाद हमने भरपूर किया है, व्याख्याकार एकमत नहीं हैं। कुछ इसका अनुवाद अहंकार करते हैं, जिसका अर्थ यह है कि जो अहंकार का व्यवहार करते हैं, उन्हें परमेश्वर उनके अहंकार के अनुसार बदला देगा; अन्य इसका अनुवाद उमड़ने तक, या सीमा से परे करते हैं, क्योंकि ,יתר yether का अर्थ इब्रानी में बचा हुआ भाग या शेष है; इसके स्थान पर मैंने इसका अनुवाद भरपूर किया है। कुछ इसे उनकी सन्तान और सन्तान की सन्तान तक फैला हुआ समझते हैं, जो उनके वंश के शेष भाग के रूप में बचे रहेंगे। इसके अतिरिक्त, क्योंकि यही शब्द बहुधा उत्कृष्टता के लिए प्रयुक्त होता है, इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता सुन्दर रीति से उन अहंकारियों को डाँटता है, जो यह कल्पना करते हैं कि उनकी कल्पित उत्कृष्टता उनके लिए केवल एक ढाल ही नहीं, वरन् परमेश्वर के विरुद्ध एक अजेय गढ़ है। क्योंकि उनका निराधार अधिकार और सामर्थ्य उन्हें अन्धा, वरन् मोहित कर देता है, यहाँ तक कि वे दीन और निर्बल लोगों के विरुद्ध असंयम से और बिना सीमा के अपने आप पर घमण्ड करते हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता सुन्दर रीति से कहता है कि उनके लिए उस घमण्ड के अनुपात में प्रतिफल संचित है जिससे वे फूले हुए हैं। ["Et recognoistre qu'en icelle ils ont assez de secours." — फ्रांसीसी.]
शाब्दिक रूप से, "भरपूरी के साथ।"
शब्द ,גאה gaäh, जिससे ,גאוה gaävah बना है, जिसका अनुवाद हमने अहंकार से किया है, का अर्थ elatus est, eminuit है; और ,גאוה gaävah "कभी-कभी बुरे अर्थ में अहंकार या घमण्ड के लिए लिया जाता है, जैसे भजन 10:2 में; और कभी-कभी अच्छे अर्थ में वैभव, प्रताप, बल, उत्कृष्टता के लिए। इस दूसरे अर्थ में यह परमेश्वर के लिए प्रयुक्त होता है, भजन 68:34, उसकी ऊँचाई, या उत्कृष्टता और सामर्थ्य आकाशमण्डल में है।" — हैमण्ड (Hammond)।
24. हियाव बाँधो। यह उपदेश भी उसी रीति से समझा जाना चाहिए जैसे पिछला; क्योंकि जिस दृढ़ता की आज्ञा भजनकार यहाँ देता है, उसकी नींव परमेश्वर के उस प्रेम पर रखी गई है जिसकी चर्चा वह कर चुका था, जब हम संसार के सब प्रलोभनों को त्यागकर अपने सम्पूर्ण हृदय से उस बचाव और सुरक्षा को अपना लेते हैं जिसकी वह हमसे प्रतिज्ञा करता है। और साहस और दृढ़ता के लिए उसका उपदेश अनावश्यक भी नहीं है; क्योंकि जब कोई परमेश्वर पर निर्भर रहना आरम्भ करता है, तो उसे शैतान के अनेक आक्रमणों को सहने का हिसाब लगा लेना और उसके लिए अपने आप को शस्त्रों से सुसज्जित कर लेना चाहिए। अतः पहले, हमें शान्ति से अपने आप को परमेश्वर की सुरक्षा और रखवाली में सौंप देना चाहिए, और यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी भलाई का अनुभव हमारे सम्पूर्ण मन में व्याप्त हो जाए। दूसरे, इस प्रकार स्थिर दृढ़ता और अचूक बल से सुसज्जित होकर, हमें प्रतिदिन नए संघर्षों को सहने के लिए तैयार खड़े रहना चाहिए। तौभी क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने आप से इन संघर्षों को सहने में समर्थ नहीं है, इसलिए दाऊद हमें परमेश्वर से धैर्य के आत्मा की आशा रखने और उसे माँगने के लिए प्रेरित करता है; यह बात हमारे ध्यान के विशेष योग्य है। क्योंकि इससे हमें सिखाया जाता है कि जब परमेश्वर का आत्मा हमें हमारे कर्तव्य का स्मरण दिलाता है, तब वह यह नहीं जाँचता कि हर एक मनुष्य की सामर्थ्य कितनी है, और न वह मनुष्यों की सेवाओं को उनके अपने बल से मापता है, वरन् हमें इसके बजाय यह प्रेरणा देता है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करें कि वह हमारी कमियों को सुधारे, क्योंकि केवल वही ऐसा कर सकता है।
