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हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर पाँचवाँ उपदेश - मत्ती 27:11-26
यीशु हाकिम के सामने खड़ा था; और हाकिम ने उससे पूछा, “क्या तू यहूदियों का राजा है?” यीशु ने उससे कहा, “तू आप ही कह रहा है।” जब प्रधान याजक और प्राचीन उस पर दोष लगा रहे थे तो उसने कुछ उत्तर नहीं दिया। इस पर पिलातुस ने उससे कहा, “क्या तू नहीं सुनता कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियाँ दे रहे हैं?” परन्तु उसने उसे एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहाँ तक कि हाकिम को बहुत आश्चर्य हुआ। हाकिम की यह रीति थी कि उस पर्व में लोगों के लिये एक बन्दी, जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था। उस समय बरअब्बा नाम का उनके यहाँ एक नामी बन्दी था। अत: जब वे इकट्ठे हुए तो पिलातुस ने उनसे कहा, “तुम किसे चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ, बरअब्बा को या यीशु को जो मसीह कहलाता है?” क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है। जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उसकी पत्नी ने उसे कहला भेजा, “तू उस धर्मी पुरुष के मामले में हाथ न डालना, क्योंकि मैंने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुःख उठाया।” प्रधान याजकों और प्राचीनों ने लोगों को उभारा कि वे बरअब्बा को माँग लें और यीशु को नाश करवाएँ। हाकिम ने उनसे पूछा, “इन दोनों में से तुम किसे चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ?” उन्होंने कहा, “बरअब्बा को।” पिलातुस ने उनसे पूछा, “फिर जो यीशु मसीह कहलाता है, उसका मैं क्या करूँ?” सब ने उससे कहा, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।” हाकिम ने कहा, “क्यों, उसने क्या बुराई की है?” परन्तु वे और भी चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।” जब पिलातुस ने देखा कि मेरा कुछ वश नहीं चलता, परन्तु इसके विपरीत हुल्लड़ बढ़ता जा रहा है, तो उसने पानी लेकर भीड़ के सामने अपने हाथ धोए और कहा, “मैं इस धर्मी के लहू से निर्दोष हूँ; तुम ही जानो।” सब लोगों ने उत्तर दिया, “इसका लहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो!” तब उसने बरअब्बा को उनके लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया कि क्रूस पर चढ़ाया जाए। - मत्ती 27:11-26
हम पिछले पदों से देख चुके हैं कि हमारे प्रभु यीशु ने स्वेच्छा से अपने आप को बलिदान के रूप में इस प्रकार अर्पित किया कि अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा हमारे सब अधर्मों का प्रायश्चित करे, और वह उन्हें मिटाने के लिये दोषी ठहराया जाना भी स्वीकार करने को तैयार था। इसीलिये कहा गया है कि उस पर जो दोष लगाए गए, उनका उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। उसके पास उत्तर देने के लिये बहुत कुछ था, परन्तु वह चुप रहा, जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह ने भी बताया है। यह केवल अपना धीरज दिखाने के लिये नहीं था, परन्तु इसलिये कि वह हमारे लिये यह स्वतंत्रता प्राप्त करे कि हम आज परमेश्वर के सामने अपने आप को धर्मी और निर्दोष कहकर गर्व कर सकें (यद्यपि हमारा विवेक हम पर दोष लगाता और हमें दोषी ठहराता है), यह जानते हुए कि परमेश्वर ने हमें दया से ग्रहण कर लिया है, और हमारे सब दोष उस सिद्धता के द्वारा मिटा दिए गए हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में पाई गई। इस प्रकार परमेश्वर के पुत्र ने हमारे लिये यह स्वतंत्रता प्राप्त की कि हम निडर होकर घमण्ड कर सकें कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं और उसके सामने धर्मी गिने गए हैं; अर्थात् जब उसने अपनी निर्दोषता प्रकट करने के लिये कोई उत्तर देना न चाहा। फिर, पहले-पहल किसी को यह अनोखा लग सकता है कि वह इस प्रकार पकड़ा गया और फिर भी उत्तर देता है कि वह यहूदियों का राजा है। क्योंकि ये बातें परस्पर विरोधी जान पड़ती हैं; परन्तु सन्त यूहन्ना आगे और भी बताता है कि उसने घोषणा की कि उसका राज्य इस जगत का नहीं है, और तब उसने यह भी घोषणा की कि वह परमेश्वर का पुत्र है, वरन् उसने यहाँ तक कहा कि मैं जगत में इसलिये आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ। परन्तु यह सब सहज ही मेल खाता है। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु को अपने आप को यहूदियों का राजा अवश्य घोषित करना था, नहीं तो वह भविष्यद्वाणियों को ठुकरा देता। उसे परमेश्वर का पुत्र भी घोषित होना था। परन्तु इससे उसका छुटकारा नहीं हुआ। बात यह थी कि मुकद्दमा लम्बा न खिंचे, वरन् वह दोषी ठहराया जाए। इसलिये जब यीशु मसीह की चुप्पी की चर्चा हो, तो हम भली-भाँति ध्यान दें कि वह इस अर्थ में थी कि उसने कोई सफ़ाई देना नहीं चाहा। जहाँ तक उसकी अपनी बात थी, उसने अपना मुँह बन्द रखा। फिर भी जो अंगीकार उसे करना था, उसे करने से वह नहीं चूका। इसीलिये सन्त पौलुस कहता है कि उसने पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया (1 तीमुथियुस 6:13)। क्योंकि यदि यीशु मसीह को अपनी सफ़ाई देनी होती, तो न्यायी तो पहले ही उसकी निर्दोषता के विषय में आश्वस्त हो चुका था। इसलिये वह बोलकर सहज ही अपना मुकद्दमा जीत सकता था। पिलातुस इसी पर चकित होता है। तौभी हमारे प्रभु यीशु मसीह ने वह गवाही देना नहीं छोड़ा जो परमेश्वर ने उसे सौंपी थी — शिक्षा देने के लिये नहीं (क्योंकि यह उसका स्थान नहीं था), परन्तु उस शिक्षा की पुष्टि और अनुमोदन के लिये जिसकी गवाही वह पहले दे चुका था।
फिर भी, एक ओर हमें यह ध्यान देना है कि यहूदियों को सबसे अधिक खटकनेवाला अपराध यह था कि उसने उपद्रव खड़ा किया और उन्हें रोम के सम्राट को कर देने से रोका। यह उस हाकिम को भी भड़काने के लिये था, जो एक अन्यजाति पुरुष था और सम्राट की ओर से वहाँ भेजा गया था। अब यह बिलकुल निश्चित है कि हमारे प्रभु यीशु ने अपने आप को राजा घोषित किया था, परन्तु पृथ्वी का राजा नहीं। जैसा कि हम वास्तव में देखते हैं कि जब यहूदी उसे राजा बनाना चाहते हैं, तो वह अपने आप को हटा लेता है और पहाड़ पर छिप जाता है। इसके अतिरिक्त वह उस निन्दा की धार को भी कुन्द कर देता है, क्योंकि यदि वह जगत की व्यवस्था और शासन-विधान को बिगाड़ देता, तो यह सुसमाचार पर कलंक होता। क्योंकि वह, जो हम सब को स्वर्गीय राज्य में बुलाने और उसमें हमें सहभागी बनाने आया है, पृथ्वी के राज्यों को मिटाना नहीं चाहता था, क्योंकि वे भी उसी के द्वारा और उसी की सामर्थ्य में स्थिर रहते हैं। इसलिये सुसमाचार को इस बात का दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए कि यीशु मसीह किसी सामर्थ्य या सांसारिक अधिकार को हड़पने आया था। इसीलिये उसने पिलातुस से विशेष रूप से कहा कि उसका राज्य इस स्थान का नहीं है।
वास्तव में, यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य पृथ्वी का होता तो क्या होता? उस पर आशा रखने से हमें क्या मिलता, जबकि जगत में हमारी दशा इतनी दयनीय है? जिन क्लेशों को हमें सहना पड़ता है, उनके विषय में अविश्वासियों का भाग हमसे कहीं अच्छा है। यह सच है कि परमेश्वर की ताड़नाएँ सर्वत्र अपना प्रभाव रखती हैं, और जो लोग जितना हो सके उतना चाहते हैं, वे भी अनेक दुःखों और क्लेशों के अधीन रहने से नहीं चूकते। परन्तु तौभी हम सदा और कठोर अनुशासन के लिये तैयार रहें। क्योंकि परमेश्वर को अपनी ताड़नाएँ अपने घर और अपनी कलीसिया से आरम्भ करनी होती हैं। इसलिये यदि हमारा प्रभु यीशु पृथ्वी का राजा होता, तो ऐसा जान पड़ता कि हम उससे पूरी तरह अलग हो सकते हैं। फिर, मान लीजिए कि इस संसार में हमारे लिये सब कुछ सहज होता और परमेश्वर के पुत्र के द्वारा हमें यहीं मानो एक स्वर्ग मिल जाता, तौभी हमारा जीवन केवल एक छाया है। तब हमारा सुख बहुत अल्पकालिक और क्षणभंगुर होता। इसलिये हमें निश्चय ही जानना और पूरी तरह मानना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु का राज्य स्वर्गीय है, ताकि हम उस अनन्त जीवन तक पहुँचें जिसके लिये हम बुलाए गए हैं। इस प्रकार यीशु मसीह का राज्य सदा बना रहनेवाला है, क्योंकि वह किसी ऐसी वस्तु पर आधारित नहीं जो इस जगत की है, जहाँ सब कुछ नाशवान है।
इसलिये हम अपनी विपत्तियों को धीरज से सहना सीखें, यह जानते हुए कि वे उस अनुग्रह को न घटाती हैं, न बिगाड़ती हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिये प्राप्त किया गया। क्योंकि निश्चय ये हमारे उद्धार में सहायक हैं, जैसा कि सन्त पौलुस रोमियों 8:28 में दिखाता है। जब संसार हमें तुच्छ जाने और हमारा उपहास करे, जब हमें अनेक निन्दाएँ सहनी पड़ें, हम भूखे और प्यासे हों, हमारे पंख कतर दिए जाएँ, हमें चारों ओर से सताया जाए, तब हमें सोचना चाहिए, “परमेश्वर हमें इसी प्रकार ग्रहण करता है।” यह ऐसा है मानो वह हमसे कहता हो, “ऊपर देखो। अपना मन उन बातों पर न लगाओ जो इस संसार की हैं।” सारांश में, हमें यही ध्यान में रखना है। वास्तव में, यह अकारण नहीं कि हमारे प्रभु यीशु ने पुष्टि के रूप में यह भी जोड़ना चाहा कि वह सत्य की गवाही देने के लिये जन्मा और जगत में आया। जिसने इसे स्पष्ट सुना है, वह उसकी वाणी के शब्द पर ठहर जाता है। इससे हम देखते हैं कि यह जानना कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य इस जगत का नहीं है, एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा है। क्योंकि यदि यह कोई तुच्छ वाक्य होता तो वह उसे जल्दी से पार कर जाता। परन्तु जब उसने यह घोषणा की कि वह जगत में सत्य की गवाही देने आया है, तो मानो वह हमें ध्यान लगवाना चाहता था, और चाहता था कि हर एक अपने हृदय में मनन करे और इस शिक्षा में भली-भाँति मन लगाए। अर्थात् यह कि हम जगत से और सब सृजी हुई वस्तुओं से अलग किए जाएँ, ताकि इस स्वर्गीय राजा के पास आएँ, और उसमें वे आत्मिक आशीषें खोजें जो यहाँ हमें दी जाती हैं, कि हम उनका आनन्द उस सीमा तक उठाएँ जो वह हमारे उद्धार के लिये लाभदायक जानता है। वास्तव में सुसमाचार के सार में हम जो कुछ देखते हैं, उसमें विशेष रूप से इस वचन पर ध्यान दें: कि यीशु मसीह जगत में सत्य की गवाही देने आया, ताकि इससे हम इस दृढ़ विश्वास पर पहुँचें कि जब हम उसकी शिक्षा पर ध्यान लगाएँगे तो हम कभी निराश न होंगे, क्योंकि यह पूर्णतः निश्चित और अटल बात है कि जो उसने वचन दिया है, उसे वह पूरा करेगा। जब दाऊद सब परीक्षाओं के विरुद्ध निश्चिन्त होना चाहता है, तो वह कहता है कि परमेश्वर का वचन ऐसी चाँदी के समान है जो सात बार शुद्ध की गई हो और आग में भली-भाँति परखी गई हो। इसलिये जब-जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह की प्रतिज्ञाओं के विषय में सन्देह में पड़ें, और जब-जब हम व्याकुल और सताए जाएँ (क्योंकि शैतान भी हमारा साहस तोड़ने और हमें निराश करने के लिये ऐसी चतुराई काम में लाता है), तब-तब हम इस गवाही की ओर लौटें कि हर दशा में हमारा प्रभु यीशु जगत में इसलिये प्रकट हुआ कि हमारे लिये विश्वासयोग्य गवाह हो। हम आज उसकी बाट जोहें कि वह वास्तव में दिखाए कि उसने ये सब प्रतिज्ञाएँ हमें व्यर्थ नहीं दीं, क्योंकि वे अचूक हैं। सारांश में, हमें यही स्मरण रखना है।
फिर, जब पिलातुस कहता है, “सत्य क्या है?” तो हम ध्यान दें कि उसने यह प्रश्न मानो सीखने की इच्छा से नहीं पूछा, वरन् मानो द्वेष और उपहास में पूछा, जैसा कि आज यह दोष बहुतों में देखा जाता है। जब हम परमेश्वर के सत्य की बात करते हैं, तो हमारा अर्थ सुसमाचार की शिक्षा से होता है। सन्त पौलुस (इफिसियों 1 में) उसे यह उपाधि इसलिये देता है कि हम उसे अन्य सब ज्ञान से अलग पहचान सकें। निश्चय, यदि कोई हमें किसी घटी हुई बात का पूरा वृत्तान्त दे, तो वह सच है; परन्तु जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है और चाहता है कि हमें इस जगत से अलग करे ताकि हम स्वर्गीय जीवन तक पहुँचें, तो वह ऐसा सत्य है जिसे सर्वोपरि स्थान दिया जाना चाहिए और उसकी तुलना में शेष सब कुछ नगण्य होना चाहिए। अब हम देखें कि संसार सुसमाचार की शिक्षा का कैसा आदर करता है। संसार के सबसे बुद्धिमान लोग (जो ऐसे माने जाते हैं) अहंकार से इतने अन्धे हो गए हैं कि जब उनसे इसकी बात की जाती है तो वे कहते हैं, “अरे! क्या हम इतने लम्बे समय से संसार में नहीं जी रहे, और क्या हमें केवल सुसमाचार को ही जानना है, और कुछ नहीं जो है?” इसलिये जब उनसे कहा जाता है कि परमेश्वर का सत्य गाड़ दिया गया है और अब उसे अधिक सावधानी से सँभालना आवश्यक है, तो वे सब ठोकर खाते हैं। हम सुनते हैं कि वे इस विचार का कैसा उपहास करते हैं। पिलातुस का भी यही हाल था। क्योंकि वह सम्राट की ओर से यहूदिया देश में उसका प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया था, इसलिये उसे लगा कि उसके साथ बड़ा अन्याय हुआ है कि उससे ऐसे सत्य की बात की गई जो उसे ज्ञात नहीं था। “और यह कैसे? तो क्या हम मूर्खों के समान व्यवहार करें? क्या हम में झूठ के सिवा कुछ नहीं? क्या हम भले और बुरे में भेद नहीं कर सकते? और मैं, जो पद पर नियुक्त हूँ, जो सम्राट का स्थान लेता और उसके व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता हूँ, क्या तुम मुझे इसी बात पर दोष दोगे कि मैं नहीं जानता कि सत्य क्या है?” पिलातुस का आशय यही है। वह मेंढक के समान घमण्ड से फूला हुआ है और नहीं चाहता कि उसकी यह ख्याति हो कि वह भले और बुरे का भेद नहीं जानता। वास्तव में हम नहीं देखते कि वह हमारे प्रभु यीशु के उत्तर की प्रतीक्षा करता हो, परन्तु वह यह बात मानो द्वेष में फेंक देता है और वहाँ से चला जाता है। जब ऐसा है, तो हम चेतावनी पाएँ। यदि आज बहुत-से पिलातुस हैं जो परमेश्वर की पाठशाला में सिखाए जाने से इनकार करते हैं और सीखने योग्य नहीं बनते, मानो वे पहले ही यथेष्ट बुद्धिमान हों, तो हम विश्वास की आज्ञाकारिता के अधीन होने से न रुकें, ताकि जो कुछ हमारा प्रभु हमें दिखाता और सुझाता है उसे ग्रहण करें; अर्थात् यह जानते हुए कि सत्य हमारे मन में उगता नहीं, क्योंकि वहाँ केवल व्यर्थता और झूठ है और हम अन्धकार में डूबे हुए हैं, जब तक हमारा प्रभु हमें उसमें से बाहर न निकाले। इसलिये हम मानें कि सत्य हमारी सब इन्द्रियों और क्षमताओं से परे है, और हमें उसमें बनाए रखने के लिये परमेश्वर ही हमारा गुरु होना चाहिए; और यह भी कि जो कुछ वह हमें दिखाता है, उसे ग्रहण करने के लिये हम तुच्छ हैं। हम इस सत्य को इतना बहुमूल्य समझें कि जब हम आकाश और पृथ्वी का चक्कर लगा चुकें और ऐसा प्रतीत हो कि हमने सब कुछ सीख लिया है, तब भी हम जानें कि वह केवल धुआँ है और क्षणिक सिद्ध होगा, जब तक हम इस वचन पर स्थापित न हों, जो निश्चित और अटल है। सारांश में, हमें यही स्मरण रखना है।
अब कहा गया है, “जब पिलातुस बैठा था अपनी गद्दी पर, तो उसकी पत्नी ने उसे कहला भेजा कि यीशु मसीह को दोषी न ठहराना, क्योंकि उसने अनेक स्वप्नों से कष्ट उठाया था। इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने यीशु मसीह की निर्दोषता की गवाही कई प्रकार से दिलानी चाही; जैसे पिलातुस के मुँह से भी (जैसा हम पहले कह चुके हैं और आगे और भी पूरी तरह देखेंगे), इसलिये नहीं कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र के विषय में पहले ही न ठहरा लिया हो कि क्या होना चाहिए। इसलिये, चूँकि उसने चाहा कि वह जगत के पापों को मिटाने के लिये बलिदान हो, अतः पवित्रशास्त्र का पूरा होना आवश्यक था। फिर भी हमारे प्रभु यीशु का धर्मी और निर्दोष प्रमाणित होना भी आवश्यक था, ताकि हम और भी भली-भाँति जानें कि उसने वही दण्ड भोगा जो हमारे योग्य था और जिसके हम अधिकारी थे, और ताकि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के विषय में यहाँ जो कुछ बताया गया है, उस सब में सदा अपने दोषों और पापों की ओर दृष्टि रखें।
इस पर कहा गया है, “पिलातुस हमारे प्रभु यीशु को छोड़ देना चाहता था।” क्योंकि यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार था जिसकी कोई अपील नहीं हो सकती थी, तौभी वह एक पराए देश में और एक विद्रोही जाति के बीच था; और यद्यपि नगर में उसकी सैनिक टुकड़ी थी, तौभी उपद्रव उसे व्याकुल करता था। इसीलिये वह चतुर और मिलनसार उपायों से काम लेना चाहता था, ताकि लोग शान्त हो जाएँ। फिर कहा गया है कि वह अपनी रीति के अनुसार सामने रखता है, “पर्व में वह एक बन्दी को, जिसे लोग चाहते थे, छोड़ देता था।” वह उन्हें यह चुनने देता है कि यीशु मसीह को या बरअब्बा को, जो (जैसा सन्त यूहन्ना कहता है) एक डाकू था। अन्य सुसमाचार-लेखक कहते हैं कि वह एक नामी अपराधी था, जो हत्यारा भी रह चुका था और नगर में उपद्रव और बलवा खड़ा कर चुका था। वह एक विपत्ति है जो सब की घृणा का पात्र होना चाहिए। फिर भी लोग चिल्लाते हैं, “हमें बरअब्बा चाहिए, उसे क्षमा किया जाए, और यीशु मसीह क्रूस पर चढ़ाया जाए।”
फसह के पर्व पर एक बन्दी को छोड़ देने की इस रीति के विषय में हम देखते हैं कि मनुष्य अपनी मूर्खतापूर्ण भक्ति में कहाँ तक बहक जाते हैं। क्योंकि निश्चय ऐसा प्रतीत होता था कि पर्व एक बन्दी को छोड़ने से कहीं अच्छी रीति से मनाया जाता है, और यह परमेश्वर की सेवा है। तौभी यह सब केवल घृणित बात थी। क्योंकि कहा गया है कि जो अपराधी को निर्दोष ठहराता है, वह परमेश्वर के सामने उतना ही दोषी है जितना वह जो निर्दोष को दण्ड देता है। इसलिये जिन्हें परमेश्वर ने भेजा और न्याय के सिंहासन पर बैठाया है, उनमें न्याय की समझ होनी चाहिए। क्योंकि उन्हें अपनी तलवार से सज्जित करते हुए उसने उनसे यह नहीं कहा, “जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो।” वह निश्चय चाहता है कि वे प्रजा के प्रति पिता के समान चिन्ता रखें और इस बात से सावधान रहें कि अपने प्रभाव और अधिकार का दुरुपयोग करके दूसरों पर अत्याचार करने में क्रूर न बन जाएँ, परन्तु दयालु और करुणामय हों। तौभी कुकर्मियों को दण्ड मिलना चाहिए, और परमेश्वर यही आज्ञा देता है। परन्तु मनुष्य क्या करते हैं? वे कल्पना करते हैं कि वे फसह का पर्व मना रहे हैं, जबकि वे परमेश्वर को अप्रसन्न कर रहे हैं और उसके वचन का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। इससे हमें चेतावनी मिलनी चाहिए कि जब परमेश्वर का आदर करने की बात हो, तो अपनी कल्पनाओं के पीछे न चलें, वरन् हर बात में और हर बात के द्वारा उसकी इच्छा को प्रसन्न करें। इसलिये हम अपने भले लगने के अनुसार कोई भक्ति न गढ़ें, परन्तु इसी में सन्तुष्ट रहें कि जो परमेश्वर हमें करने की आज्ञा देता है और जिसे वह स्वीकार करता है, वही करें। हम यह भी देखते हैं कि यह कैसी रीति है जिसे आज मनुष्य व्यवस्था बना लेते हैं कि जो कुछ सर्वसाधारण नियम के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है वह वैध ठहरता है। चाहे ऐसा हो, परमेश्वर उसे दोषी ठहराने से नहीं चूकता। हम उस दुरुपयोग को देखते हैं जो हुआ, जो इस बिगाड़ का परिणाम था — कि बरअब्बा को परमेश्वर के पुत्र पर प्राथमिकता दी गई।
फिर पहले-पहल किसी को यह अनोखा लग सकता है कि हमारे प्रभु यीशु की इस प्रकार निन्दा की जाए और एक डाकू और हत्यारे को उससे अधिक विशेषाधिकार मिले, कि वह मनुष्यों में उससे अधिक कृपा पाए, और यीशु मसीह को ऐसी लज्जा और अपमान सहना पड़े। क्योंकि क्या यह पर्याप्त नहीं था कि परमेश्वर का पुत्र क्रूस पर चढ़ाया जाए और ऐसी मृत्यु सहे जो निन्दा से भरी थी और उसके अतिरिक्त भारी यातनाएँ भी थीं? क्योंकि क्रूस की मृत्यु मानो डाकुओं का दण्ड थी। वह केवल आज की फाँसी के समान नहीं थी, परन्तु चक्के पर चढ़ाए जाने के समान थी। तो क्या यह पर्याप्त नहीं था कि यीशु मसीह को कोड़े मारे जाने और उसके मुँह पर थूके जाने के बाद गहरे गड्ढे में डुबो दिया जाए, और फिर उसकी तुलना में उसे सारे संसार की दृष्टि में घृणित दिखाना भी आवश्यक हो? क्योंकि यदि हम अपनी इन्द्रियों से न्याय करें और जो दिखाई देता है उससे आगे न देखें, तो निश्चय हम घबरा जाएँगे; परन्तु हमें विश्वास के द्वारा अपनी आँखें और ऊपर उठानी चाहिए और उसी बात पर आना चाहिए जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं: अर्थात् यह कि परमेश्वर यह सब अपनी युक्ति से चलाता है। इसलिये हम इस पर न ठहरें कि लोगों ने पिलातुस के साथ क्या किया, परन्तु परमेश्वर की इस अटल आज्ञा पर मनन करें: कि हमें और अच्छी रीति से दीन करने के लिये उसने चाहा कि उसका पुत्र पूरी लज्जा में डुबोया जाए और संसार के सब अपराधियों से भी नीचे रखा जाए, जैसा कि वह दो डाकुओं के बीच क्रूस पर चढ़ाया गया, जैसा हम आगे देखेंगे। इसलिये जब यहाँ कहा जाता है कि बरअब्बा को छोड़ा जाना था और यीशु मसीह को मानो संसार के सबसे घृणित मनुष्य के स्थान पर रखा जाना था, तब हमें यही ध्यान में रखना है।
इस सब के बाद भी पिलातुस हमारे प्रभु यीशु को बचाने का प्रयत्न करता है, परन्तु शैतानी उपाय से: अर्थात् वह उसे कोड़े लगवाता है (जिसे तब “ताड़ना देना” कहते थे) और उसे इस प्रकार ताड़ना देकर छोड़ देना चाहता था, मानो उसने कोई अपराध किया हो। क्योंकि इसके द्वारा वह लोगों को शान्त करने का बहाना करता था। अब यदि हमारा प्रभु यीशु इस प्रकार बच निकलता, तो सुसमाचार का क्या होता, जगत के उद्धार का क्या होता? क्योंकि यह “ताड़ना”, जैसा पिलातुस ने इसे कहा, सदा के लिये लज्जा का चिह्न बन सकती थी, मानो सुसमाचार कोई दुष्ट शिक्षा हो, क्योंकि देश के न्यायी ने उसे दोषी ठहराया, और हमारा प्रभु यीशु अपने व्यक्तित्व में पूरी तरह तिरस्कृत हो जाता। इस बीच हम नाश हो जाते, क्योंकि हमें परमेश्वर से मेल कराने का उसके एकलौते पुत्र की मृत्यु को छोड़ और कोई उपाय नहीं था। इसलिये हमारे प्रभु यीशु की मृत्यु ही जीवन का प्रवेश-द्वार है। इसलिये हम देखते हैं कि शैतान ने बहुत ज़ोर लगाया कि हमारा प्रभु यीशु किसी प्रकार न मरे। फिर भी याजकों और उनके साथियों को यीशु मसीह का प्राणदण्ड कराने के पीछे किसने लगाया, शैतान के सिवा? यह सच है, क्योंकि वह मानो पागल के समान काम करता है। जैसा हम देखते हैं कि परमेश्वर सब दुष्ट मनुष्यों पर उथल-पुथल और उन्माद की आत्मा भेजता है कि वे अपने ही विरोध में बोलते हैं और समुद्र की उन लहरों के समान हैं जो एक-दूसरी से टकराती हैं, वैसे ही शैतान बह गया, जब उसने एक ओर हमारे प्रभु यीशु का स्मरण मिटाना चाहा, और फिर भी दूसरी ओर मनुष्यजाति के छुटकारे को रोकना चाहा। परन्तु परमेश्वर ने ऐसा किया कि उसने चाहा कि उसके पुत्र की निर्दोषता की गवाही स्वयं न्यायी के मुँह से मिले; तौभी उसने यह भी चाहा कि वह हमारे उद्धार और छुटकारे के लिये बलिदान करने को मरे। परमेश्वर की केवल एक ही और सरल इच्छा है, परन्तु वह हमारे लिये अद्भुत है, और उसके कार्य करने के ढंग ऐसे विचित्र हैं कि हमें भय से सिर झुकाना चाहिए, और फिर भी यह मानना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु ने कष्ट मनुष्यों की इच्छा के अनुसार नहीं उठाया, परन्तु इसलिये कि हमें हमारे परमेश्वर के अपार प्रेम का ऐसा बन्धक चाहिए था, और यीशु मसीह को हमें यह दिखाना था कि हमारे प्राण उसकी दृष्टि में कितने मूल्यवान हैं और उनका उद्धार उसे कितना प्रिय है। इसलिये हम इन सब बातों पर विचार करें।
फिर, अन्त में सन्त यूहन्ना कहता है कि यद्यपि यीशु मसीह को कोड़े मारे जा चुके थे, लोग और भी ज़ोर से चिल्लाकर माँग करते हैं कि वह मार डाला जाए। तब पिलातुस उससे फिर पूछताछ करता है; वास्तव में इसलिये कि उसने सुना कि यीशु अपने आप को परमेश्वर का पुत्र कहता था, और यह बात उसे छू जाती है, और वह इससे पहले से अधिक भयभीत हो जाता है। इसीलिये वह उससे पूछता है, “तू कहाँ का है?” जब यीशु मसीह कुछ भी उत्तर नहीं देता, तो वह कहता है, “क्या तू नहीं जानता कि तुझे छोड़ देने का अधिकार भी मुझे है और तुझे दोषी ठहराने का अधिकार भी?” अब यहाँ हम देखते हैं कि यहूदी हमारे प्रभु यीशु मसीह पर ऐसा दोष क्यों लगाते हैं। यह सच है कि जो अपराध देश के हाकिम को अधिक उभार सकता था, वह था अपने आप को राज्य और प्रभुता का अधिकारी ठहराना; परन्तु जब वे देखते हैं कि उनकी दुष्टता प्रकट हो गई है, और पिलातुस भली-भाँति समझता है कि ये केवल गढ़े हुए झूठ हैं, तब वे कहते हैं, “हमारी एक व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार उसे मरना चाहिए।” क्योंकि यह विशेषाधिकार उनके लिये सुरक्षित रखा गया था, ताकि उनमें धर्म को लेकर कोई विवाद न हो। क्योंकि रोमी, जो अपवित्र लोग थे और केवल रीति के रूप में अपनी मूर्तियों की सेवा करते थे, हर एक को अपने धर्म के अनुसार चलने देकर अपना साम्राज्य बनाए रखना चाहते थे।
इस पर वे कहते हैं, “उसने अपने आप को परमेश्वर का पुत्र बनाया और इस प्रकार निन्दा की।” यह सच है कि यदि हमारा प्रभु यीशु जगत का छुड़ानेवाला न होता, तो अपने आप को परमेश्वर का एकलौता पुत्र बनाना उसे प्राणदण्ड के योग्य ठहराता। क्योंकि जब परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह से गोद ले लेता है, तब हम सब परमेश्वर की सन्तान हैं। पवित्रशास्त्र में इसे कहने की सामान्य रीति यही है। जिन्हें कोई विशेष अनुग्रह मिला है, वे एक और ही रीति से “परमेश्वर के पुत्र” कहलाते हैं, जैसे राजा और अधिकारी। तब उससे भी बढ़कर यीशु मसीह को, जो पवित्र आत्मा के द्वारा अनुग्रहों और सामर्थ्य से सर्वोच्च रीति से अभिषिक्त था, भली-भाँति “परमेश्वर का पुत्र” कहा जा सकता था। परन्तु यदि वह जगत का छुड़ानेवाला बिलकुल न होता और अपने आप को सर्वोत्तम रीति से “परमेश्वर का एकलौता पुत्र” कहता, तो यह सचमुच प्राणघातक अपराध होता। परन्तु यहूदी उस पर यह दोष क्यों लगाते हैं? पहले तो पवित्रशास्त्र की अज्ञानता के कारण, क्योंकि वे नहीं जानते कि जो छुड़ानेवाला होगा, वह प्रकट हुआ जीवित परमेश्वर होगा। इसलिये, चूँकि उन्हें पवित्रशास्त्र की सच्ची समझ नहीं थी, और वे उसमें प्रशिक्षित नहीं थे, परन्तु अपनी उदासीनता से पशु-समान हो गए थे, इसीलिये वे यीशु मसीह को दोषी ठहराने का ऐसा साहस करते हैं। अब हम सब अज्ञानी लोगों में ऐसा ही दुस्साहस देखते हैं। आज जब वे “विधर्मी” चिल्लाते हैं तो ऐसा नहीं कि प्रमाण उनके हाथ में हों, परन्तु सबसे मोटी बुद्धिवाले लोग ऐसे क्रोध से भरे हुए होते हैं कि वे परमेश्वर का आदर करने के लिये उत्साही बनना चाहते हैं, और वे नहीं जानते कि क्यों और कैसे। फिर, यह जाँचना आवश्यक था कि यीशु मसीह अर्थात् मसीहा है या नहीं। परन्तु यहूदियों ने बिना कोई जाँच किए उसे ठुकरा दिया। इससे हम सीखें, कि यदि हम ऐसा उत्साह रखना चाहते हैं जिसे परमेश्वर स्वीकार करे, तो हमें सच्चे ज्ञान से चलाया जाना और उसके वचन से सिखाया जाना चाहिए। क्योंकि हम ऊपर-ऊपर से भले ही देख लें, परन्तु यदि हम परमेश्वर के सत्य के शिष्यों के रूप में न बोलें, तो वह केवल शैतान के उन्मत्त तर्कों से होगा; क्योंकि वही एकमात्र योग्य न्यायी है, और यह कार्य वह अपने ही पास रखता है कि हमें दिखाए कि उसकी इच्छा क्या है। इसलिये जब ऐसा है, तो हम सरलता से परमेश्वर के वचन के पीछे चलें और शान्तिप्रिय भी रहें। तब हमारा उत्साह उसी से नियन्त्रित हो। पहली बात हमें यही ध्यान में रखनी है।
परन्तु जब कहा जाता है कि पिलातुस परमेश्वर के पुत्र की चर्चा सुनकर पहले से भी अधिक डर गया, तो यहाँ हम एक अभागे अन्यजाति पुरुष में धर्म की कुछ झलक देखते हैं जो उसे हिलाती और चुभती है और उसके विवेक से बातें करती है, ऐसे कि उसे नहीं सूझता कि किधर मुड़े। वहाँ यीशु मसीह पूरी तरह विकृत और कोड़ों के चिह्नों के साथ खड़ा है। इससे पहले उसने इतनी निन्दा और अपमान सहा, थूक की इतनी बूँदें, सिर पर इतने घूँसे जो कैफा के घर में उस पर पड़े थे। संक्षेप में, यहाँ एक मनुष्य है जो सब के द्वारा तुच्छ जाना और ठुकराया गया है। तौभी परमेश्वर का नाम पुन्तियुस पिलातुस को हिला देता है और उसमें भय और विस्मय जगाता है। तो फिर हमारा क्या, जब हम जंगली पशुओं के समान व्यवहार करते हैं? और जब कोई हमसे परमेश्वर की बात करना चाहता है, यदि हम बिलकुल रोके नहीं जाते, तो क्या पिलातुस का उदाहरण अन्तिम दिन तक हमें दोषी न ठहराएगा? आज हम ठट्ठा करनेवाले, शैतान से भरे हुए लोग देखते हैं। यदि उनके सामने रखा जाए, “देखो परमेश्वर हमें क्या दिखाता है,” यदि उन्हें उसका वचन सुनाया जाए, यदि वे जिसे ठुकराते हैं उसे प्रमाणित करना चाहा जाए; तो उनके लिये सब बातें बराबर हैं। वे अपने कान बन्द कर लेते हैं, अपनी आँखें बाँध लेते हैं, वे पूरी तरह अपनी स्वाभाविक इन्द्रियों में लीन हैं, और इतने घमण्डी हैं कि सुनने का विचार तक नहीं करेंगे। क्योंकि वे जैसे हैं उसी में सन्तुष्ट हैं। “हमने यह ठहरा लिया है,” वे कहते हैं, “इसलिये ऐसा ही होना चाहिए।” सचमुच? परन्तु यहाँ पिलातुस है जिसने परमेश्वर की शिक्षा का एक भी शब्द कभी नहीं सुना था, व्यवस्था तक उसके लिये घृणा की वस्तु थी, यहाँ तक कि यहूदी जो कुछ भी करते हैं उसे वह गढ़ी हुई बात समझता है, और वह अपनी मूर्तियों को पूजता है। तौभी “परमेश्वर” का नाम उसे प्रभावित करता है, और जब इसकी चर्चा होती है तो वह रुक जाता है। क्या यह इसलिये कि उसे यीशु मसीह में कोई प्रताप या कोई ठाठ दिखाई देता है? बिलकुल नहीं। केवल “परमेश्वर” का नाम ही उसे आदर की ओर खींचता है। तब कितने ही लोग पिलातुस के इस भय के द्वारा दोषी ठहरेंगे, जब वे अपनी बँधी हुई लीक पर चलते रहते हैं और उनके बीच कोई उन्नति नहीं हो सकती, यद्यपि उनसे “परमेश्वर” के नाम की चर्चा की जाती है, और केवल चलते-चलते कही गई बात के रूप में नहीं, वरन् उन्हें सिखाने और पवित्रशास्त्र की गवाहियाँ उँगली रखकर दिखाने का प्रस्ताव करके! यदि वे न तो विचार करने और न किसी परिश्रम से मन लगाने की कृपा करें, तो क्या शैतान उन पर पूरी तरह अधिकार नहीं जमाए हुए है? क्या उन्हें नहीं जानना चाहिए कि वे मानो राक्षस हैं, जिन्होंने धर्म का हर बीज नष्ट कर दिया है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को हठीला बना लिया है, मानो समस्त प्रकृति को चुनौती देते हुए? इसलिये हमें यही स्मरण रखना है।
चाहे ऐसा हो, इसके विपरीत हम यह भी देखते हैं कि वे सब भय जो मनुष्यों को होते हैं, और परमेश्वर का आदर करने की जो भी भावना और आशंका उनमें होती है, वह मानो बिजली की एक चमक है जो उनकी आँखों के सामने से निकलती है और तुरन्त लोप हो जाती है। क्योंकि पिलातुस ने परमेश्वर का भय कैसे माना? हम देखते हैं कि वह उसे बिलकुल नहीं पकड़ता, वह केवल इतना बड़ा घमण्ड दिखाता है कि उसे लगता है कि परमेश्वर अब कुछ भी नहीं। इस प्रकार वे सब जो परमेश्वर के आत्मा से चलाए नहीं जाते, एक ओर कुछ भय अनुभव करेंगे जिनसे वे जकड़े जाएँगे, ताकि कुछ समय परमेश्वर के सामने दीन हो जाएँ, परन्तु वे अपने सींग उठाने से नहीं चूकते, फिर भूल जाते और बुराई करने के लिये अपने विवेक को सुन्न कर देते हैं। जैसा हम फिरौन में देखते हैं कि कभी-कभी वह बहुत चकित होता है। “और मेरे लिये परमेश्वर से प्रार्थना करो,” वह कहता है। और जब वह परमेश्वर की सामर्थ्य को इतना प्रकट देखता है, तो कहता है, “अरे, यह तो परमेश्वर की उँगली है, उसके अधीन होना चाहिए।” परन्तु शीघ्र ही वह पहले से भी बुरा हो जाता है। पिलातुस का हाल भी ऐसा ही था। यह हमें चेतावनी देता है कि हम परमेश्वर का भय हवा के झोंकों के समान न रखें, परन्तु अच्छी जड़ रखें जो हमारे हृदयों में दृढ़ बनी रहे। क्योंकि पिलातुस ने परमेश्वर का भय कैसे माना? केवल उसे और अधिक निरुत्तर करने के लिये। इसीलिये परमेश्वर सोए हुए विवेकों को जगाता है, जो हर जूए को ठुकराना चाहते हैं, और उन्हें लौटा लाता और उकसाता है कि वे अपने विषय में और निकटता से सोचें, ताकि वे अनिच्छा से भी अपनी दीनता को पहचानें और अपने दोषों का अनुभव करें, यद्यपि वे उनमें सोए रहना चाहते हैं। इसलिये वे सब सन्देह जो परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों और सब दुष्टों को होते हैं — इन्हें ऐसे समन के रूप में देखा जाना चाहिए जो परमेश्वर जारी करता है कि उनसे अज्ञानता का हर बहाना छीन ले। परन्तु तब वे लगाम ढीली कर देते हैं, वे बेधड़क अपने आप को छोड़ देते हैं, और इस प्रकार वे बिलकुल नहीं रुकते — जैसा हम पिलातुस में देखते हैं। आरम्भ में वह बहुत चकित होता है, परन्तु शीघ्र ही अपने स्वभाव पर लौट आता है। “और क्या तू नहीं जानता,” वह यीशु मसीह से कहता है, “कि तुझे छोड़ देने का अधिकार भी मुझे है और तुझे दोषी ठहराने का अधिकार भी।” यहाँ हम सबसे पहले ध्यान दें कि यदि वह डाकू भी होता, तो भी वह उँगली तक न हिला सकता यदि परमेश्वर ने उसे अधिकार न दिया होता। तो फिर पिलातुस इतनी असीम स्वेच्छाचारिता क्यों ग्रहण करने का साहस करता है कि अपनी इच्छा से और अपने पद के बल पर दोषी ठहराए और छोड़ दे? क्योंकि इससे अच्छा तो यह होता कि रोक सब डाकुओं के लिये हटा दी जाती और उन्हें वनों में अपनी क्रूरता चलाने की स्वतंत्रता होती, बजाय इसके कि ऐसे प्रतिष्ठित सिंहासन पर ऐसे लोग बैठें — ऐसे लोग जो अपने विवेक का विचार किए बिना सत्ता में आनन्द लेते हैं और इस बीच संसार को पूरी अव्यवस्था में डालते हैं। यहाँ हम देखते हैं (जैसा मैंने दिखाया है) कि पिलातुस में कोई जीवित जड़ नहीं थी, केवल हवा का झोंका था। इसलिये हम परमेश्वर का भय इस प्रकार मानना सीखें कि हम में उसकी आज्ञाकारिता में चलने की दृढ़ स्थिरता हो, और हम उस हर बात के विरुद्ध वीरता से लड़ें जो हमें भटका सकती है, और यह रोक सदा हमें थामे रखे: कि उसका क्रोध भड़काना उचित नहीं जिसका हम पर पूरा अधिकार है। सारांश में, हमें यही स्मरण रखना है।
फिर यह भी विचार करना है कि जो महिमा पिलातुस अपने लिये मानता है, वह उस पर बड़ी लज्जा ही है। क्योंकि उसके शत्रु उस पर इससे बुरा दोष नहीं लगा सकते थे: अर्थात् यह कि वह चाहता है कि लोग उसे भले और बुरे में भेद न करनेवाला समझें और माने। तौभी वह इस पर घमण्ड करता है। इसलिये हम देखते हैं कि परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले जितना अपने आप को ऊँचा उठा हुआ समझते हैं, उन्हें उतना ही अपने आप को लज्जा में और नीचे गिरा हुआ अनुभव करना पड़ता है। परमेश्वर उनमें ऐसी अस्वीकृति की भावना रखता है कि वे अपने अधर्मों पर घमण्ड करते हैं, ताकि आकाश में और पृथ्वी पर दोनों जगह अपने आप को घृणित बना लें। तो क्या करना चाहिए? हम भलाई पर गर्व करना सीखें, और विचार करें कि हमारे लिये क्या उचित है। क्योंकि जो अपनी बड़ाई पर गर्व करते हैं, यह निश्चित है कि वे परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी धन-सम्पत्ति और प्रतिष्ठा प्रायः अनुचित उपायों से, अति से, क्रूरता से और हर प्रकार की उगाही से पाई है। इसलिये जब वे इस पर गर्व करते हैं, तो वह मानो परमेश्वर को चुनौती देते हुए है। जिसने सब ओर से लूटा है, वह कहेगा, “मैंने अच्छा किया।” और वहाँ ग़रीब लोगों का लहू है जो उसने चूसा है। वह कहेगा, “मैंने इसे कमाया है।” और कैसे? छल से, दुष्ट कार्यों से, एक को लूटकर, दूसरे को निगलकर, और सारी व्यवस्था को बिगाड़कर। दूसरा महत्त्वाकांक्षा और अनुचित साधनों से किसी पद पर पहुँच गया होगा। इस पर वह चाहता है कि लोग उससे भय मानें। यह प्रकट रूप से परमेश्वर को चुनौती देना है।
इसलिये हम सीखें (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि उसी पर गर्व करें जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है। यह सच है कि यद्यपि हम में कुछ भलाई हो भी, तो उस प्रशंसा को हड़प लेना उचित नहीं जो परमेश्वर अपने लिये सुरक्षित रखता है, और जिसके कारण हमें उसे श्रद्धांजलि देनी है, क्योंकि उसी ने हमें सब कुछ दिया है। इसलिये यहाँ अपने आप पर इस प्रकार गर्व करना उचित नहीं कि जो परमेश्वर हमें देता है वह मानो हमारा ही हो। परन्तु मैं कहता हूँ कि हमें केवल इसी पर गर्व करना चाहिए कि परमेश्वर की यह इच्छा हुई कि हमें अपनी सन्तान होने के लिये गोद ले, और इस पर कि वह हमें अपने भय में चलने का अनुग्रह देता है, इस पर कि वह हमें बुराई से दूर रहने की सामर्थ्य देता है। इसी पर हमें गर्व करना चाहिए। फिर, यदि हम संसार की दृष्टि में छोटे और तुच्छ हैं, तो हम प्रार्थना करें कि वह हमें धीरज दे, और हम ऊँचे उठाए जाने और इस बीच सांसारिक लोगों की तरह आनन्द मनाने की अपेक्षा ऐसी दशा में रहना अधिक पसन्द करें, जो ऐसे रंगरलियाँ मनाते हैं कि कुछ उन्हें रोक नहीं सकता। सारांश में, हमें इसी प्रकार गर्व करना है, अर्थात् हम उससे अधिक होना न चाहें जितना परमेश्वर हमें होने देता है, और उस हर बात को तुच्छ जानें जिसे वह अस्वीकार करता है, चाहे संसार उन्हें सराहे जो अत्याचार करते हैं और हर बुराई को अति तक करते हैं। इसलिये हम ऐसी सब बड़ाइयों को सहज और स्वेच्छा से छोड़ दें, और इसके सिवा और कुछ न चाहें कि परमेश्वर के सामने उसकी सन्तान के रूप में पहचाने और स्वीकार किए जाएँ। सारांश में, हमें अब भी यही स्मरण रखना है।
अन्त में कहा गया है, “पिलातुस यह देखकर कि कुछ बन नहीं रहा और लोगों में हुल्लड़ बढ़ता जा रहा है, अपने हाथ धोता है और कहता है, ‘मैं इस मनुष्य के लहू से निर्दोष हूँ।’” हम पहले ही कह चुके हैं कि हमारे प्रभु यीशु की निर्दोषता प्रमाणित होनी थी और वह स्वयं न्यायी के मुँह से प्रमाणित की गई। क्योंकि जब कहा जाता है कि यीशु मसीह ने पुन्तियुस पिलातुस के अधीन दुःख उठाया और वह दोषी ठहराया गया, तो केवल वृत्तान्त सुन लेना पर्याप्त नहीं, परन्तु हमें पूरी तरह जानना चाहिए कि यीशु मसीह केवल निर्दोष ही नहीं, वरन् सब पवित्रता और सिद्धता का सोता है। तो फिर वह दोषी क्यों ठहराया जाता है? यहाँ प्रतीत होता है कि दो भिन्न बातें हैं। कहा गया है कि वह परमेश्वर का निष्कलंक मेम्ना है। चूँकि वह परमेश्वर का मेम्ना है, इसलिये उसे बलिदान के लिये दोषी ठहराया जाना आवश्यक है। “मेम्ना” शब्द का अर्थ है कि उसे अर्पित किया जाना है। और व्यवस्था बलिदानों के विषय में क्या कहती है? कि वे पापों और श्रापों के प्रतीक हैं। इसीलिये कहा गया है कि हमारा प्रभु यीशु हमारे लिये श्रापित ठहरा, अर्थात् उसने वह श्राप ग्रहण किया जो हमारे पापों के कारण हम पर आना था। इसलिये यही उसके दोषी ठहराए जाने की स्थिति और शर्त है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे ऐसे मेम्ने के रूप में ठहराया जिसे बलिदान में चढ़ाया जाना था। परन्तु यह भी आवश्यक था कि वह निष्कलंक जाना जाए, और उसकी पवित्रता हमारी आँखों के सामने आए, ताकि हम अपने पापों को समझें, जहाँ तक हमने जाना है कि यीशु मसीह सब सिद्धता का दर्पण है; और ताकि हम अपने दोषों की जाँच में प्रवेश करें कि उनसे अप्रसन्न हों और उस दण्ड-आज्ञा को स्वीकार करें जो हमारे लिये तैयार थी, यदि हम उसके द्वारा छुड़ाए न गए होते। अब जब पिलातुस ने हाथ धोने के लिये बर्तन और पानी लिया, तो यह बहुत ही हल्की रीति थी, मानो वह इससे परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहर सकता हो। परन्तु जब वह लोगों के क्रोध को शान्त करना चाहता था, तो यह परमेश्वर के सामने अपनी सफ़ाई देने के लिये नहीं था। क्योंकि उसने परमेश्वर के सामने यह घोषणा नहीं की कि वह निर्दोष है, वरन् केवल लोगों से कहा, “तुम ही जानो। जहाँ तक मेरी बात है, मैं निर्दोष हूँ।” मानो वह कहता हो, “तुम मुझे इसके लिये विवश करते हो।” परन्तु यह सब (जैसा मैंने कहा है) उसे निर्दोष ठहराने के लिये नहीं है। न वह न्यायी का कर्तव्य ही निभा रहा है। क्योंकि उसे सौ बार मर जाना चाहिए था, पर अपने पद से न डिगना चाहिए था। जब उसने संसार के सब उपद्रव देखे, तो उसमें यह उदारता होनी चाहिए थी कि जो भला और उचित जानता था वही करे। परन्तु जब वह लोगों को इतना भड़का हुआ देखता है, तो अपने आप को बह जाने देता है। फिर भी, चाहे वह शापित ही था, यह होना ही था कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह की निर्दोषता की गवाही दे और अपने ही मुँह से उसे धर्मी ठहराए। तौभी यह उसे दण्ड से छुड़ाता नहीं, परन्तु इसी में हमारी शान्ति है। क्योंकि हम जानते हैं कि यदि हम आज परमेश्वर के सामने उसके सिंहासन के आगे उपस्थित होने के लिये लाए जाएँ, तो वह दोषी ठहराए जाने के लिये न होगा; परन्तु इसलिये कि हमारे प्रभु यीशु का लहू बहाया जाना हमारे प्राणों की सच्ची शुद्धि है, वह हमें शुद्ध और निर्मल जानकर ग्रहण करता है।
इसलिये हमें यहीं शरण लेनी चाहिए। फिर भी हम वह वचन देखते हैं जो यहूदियों ने कहा। क्योंकि वे शैतान द्वारा इस प्रकार सिर के बल गिराए गए हैं कि वे कहते हैं, “इसका लहू हम पर और हमारी सारी सन्तान पर हो।” अब वे परमेश्वर की विरासत थे, पृथ्वी की सब जातियों में से चुनी और ठहराई हुई प्रजा।
तौभी वे इस प्रतिष्ठा को, और उद्धार की सब प्रतिज्ञाओं को, उस पवित्र वाचा को जो परमेश्वर ने उनके वंश के साथ बाँधी थी, त्याग देते हैं। इसलिये वे उन सब आशीषों से वंचित हो गए जो परमेश्वर ने पहले उन्हें बाँटी थीं, क्योंकि वे अब्राहम के वंश से उतरे थे। और हमारे प्रभु यीशु का लहू उन पर पड़ना ही था, वरन् उन्हें और उनके सब वंशजों को लज्जित करने के लिये। जैसा उसने पहले भी उनसे कहा था,
“तुम्हारा अधर्म पूरा होना ही है, और शहीदों का लहू, धर्मी हाबिल से लेकर बिरिकयाह के पुत्र जकरयाह तक, जो हाल ही में मार डाला गया, तुम पर लाया जाना ही है, और तुम्हें देखना ही है कि तुम सदा भविष्यद्वक्ताओं के हत्यारे रहे हो, और इस रीति से तुमने परमेश्वर से और उसके वचन से लड़ाई की है।” (मत्ती 23:34-36, लूका 11:49-51, 2 इतिहास 36:15-16।)
इस प्रकार हमारे प्रभु यीशु का लहू, जो सारे जगत का, और विशेषकर यहूदियों का उद्धार होना चाहिए था, क्योंकि पहिलौठे का अधिकार उन्हीं का था, उनके विरुद्ध बदला लेने की दुहाई देता रहा। परन्तु अब हम अपने भीतर गहराई से देखना सीखें, और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हम पर एक और रीति से आए, हम पर भी और विशेषकर हमारी सन्तान पर भी; अर्थात् हम धोए और शुद्ध किए जाएँ, क्योंकि जब तक हम धोए न जाएँ और इसे सहन न करें कि वह लहू जो एक बार हमारे छुटकारे के लिये बहाया गया था हम पर आए, और उसके द्वारा हम पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से छिड़के जाएँ (1 पतरस 1:2) (सन्त पतरस अपनी सामान्य पत्री में यही कहता है), तब तक हम परमेश्वर के सामने अपने पापों के कारण घृणित हैं; और हम इस बात में सावधान रहें कि उस अनुग्रह को न ठुकराएँ जो परमेश्वर हमें देता है, जिससे यहूदी अपनी कृतघ्नता के कारण वंचित हो गए, और उन्होंने उसके बदले को और अधिक भड़काने के सिवा कुछ नहीं किया। इसलिये हम आज अपने प्रभु यीशु मसीह की उस शुद्धि को ग्रहण करने के लिये तत्पर हों, जो विश्वास के बिना ग्रहण नहीं की जा सकती। हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि हमने यह धोना व्यर्थ ग्रहण न किया हो, परन्तु दिन-प्रतिदिन हम अपने सब दागों से शुद्ध होते जाएँ। हमारे परमेश्वर को यह भाया हो कि वह उस पवित्रता से, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा प्राप्त की गई, पूरा लाभ दिलाए, जब तक हम उसके राज्य में न पहुँच जाएँ, जहाँ हम अपने पापों की सब भ्रष्टताओं से छूट जाएँगे।
अब हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन श्रद्धा से झुकेंगे।
