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पहले अध्याय पर छठा उपदेश - इफिसियों 1:15-18
इफिसियों 1:15-18 पर उपदेश
इस कारण मैं भी, उस विश्वास का समाचार सुनकर जो तुम लोगों में प्रभु यीशु मसीह पर है, और उस प्रेम का जो तुम सब पवित्र लोगों से रखते हो, तुम्हारे लिये धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, और अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हारा स्मरण किया करता हूँ; कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, जो महिमा का पिता है, तुम्हें ज्ञान और प्रकाशन का आत्मा दे, कि तुम उसको पहचान सको, अर्थात् तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिससे तुम जान लो कि उसके बुलाए जाने से जो आशा तुम्हें रखनी चाहिए वह क्या है, और पवित्र लोगों में उसकी विरासत की महिमा का धन कैसा है। - इफिसियों 1:15-18
हम पहले देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने इफिसियों को उनके उद्धार के न केवल प्रमुख, वरन् एकमात्र कारण तक पहुँचाया, और दिखाया कि उन्हें उसका सारा श्रेय परमेश्वर को देना चाहिए, उसमें किसी मूर्खतापूर्ण अभिमान को मिलाए बिना, मानो उन्होंने अपनी ओर से, अपनी स्वतंत्र इच्छा से या अपने भीतर किसी भली मनसा से, उस अनुग्रह में कुछ योगदान दिया हो जो उन्हें मिला था। इस प्रकार पौलुस ने वस्तुतः यह दिखा दिया है कि न केवल इफिसियों को, जिनसे वह बोल रहा था, वरन् उन सबको भी जो पहले से परमेश्वर की कलीसिया थे, बिना किसी अपवाद के यह मानना चाहिए कि उनका सारा कल्याण केवल परमेश्वर की सेंतमेंत की भलाई से उत्पन्न हुआ; इसलिए ही नहीं कि वे सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा छुड़ाए गए, वरन् इसलिए भी कि संसार की सृष्टि से पहले उनके चुनाव के अनुसार उसने उन्हें सुसमाचार पर विश्वास करने के लिये बुलाया।
और अब वह इस सारी शिक्षा की पुष्टि उस गवाही से करता है जो वह परमेश्वर के सम्मुख देता है, क्योंकि वह परमेश्वर की भलाई की महिमा तब भी करता है जब वह मानो मनुष्य की आँख से और सब गवाहों की दृष्टि से अलग है। यह सच है कि सुसमाचार की शिक्षा जब सारे संसार के सामने खुले रूप से प्रचार और प्रकाशित की जाती है, तब उसका आदर कम नहीं होना चाहिए; फिर भी जो उसे सुनाता है उसके लिये उचित है कि वह उसे अपने हृदय में भली-भाँति अंकित कर ले और अपने आप से, तथा परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सामने, वही बात कहे जो वह मनुष्यों के सामने कहता है; नहीं तो वह केवल बकवाद होगी, वरन् परमेश्वर के वचन का अपमान होगा, यदि कोई मनुष्य पुलपिट में चढ़कर स्वर्गदूत की नाईं बोले, परन्तु साथ ही हृदय में प्रभावित न हो, और जो वह कहता है उसका उसे अपने भीतर विश्वास न हो। मनुष्य के लिये सौ बार डूब मरना इससे अच्छा है कि वह सब कहीं उद्धार और परमेश्वर के सत्य की उत्तम से उत्तम गवाही दे, और साथ ही जिस बात का वह प्रचार करता है उसका उसे अपने भीतर ऐसा निश्चय न हो कि परमेश्वर और उसके स्वर्गदूत जान सकें कि वही बात उसके हृदय में अंकित है।
इसलिए यह अकारण नहीं कि सन्त पौलुस, परमेश्वर की सेंतमेंत की भलाई का प्रचार करने के पश्चात्, कि उसने जिन्हें चाहा उन्हें चुना, और चुनने पर उन्हें अपने सुसमाचार के ज्ञान के लिये बुलाया, और अपने सामर्थी हाथ से उन्हें दृढ़ किया, और बुलाने पर उन्हें अजेय स्थिरता और अटलता दी, अब यह जोड़ता है कि परमेश्वर जानता है कि इस विषय में उसकी गवाही सच्ची और हृदय से है। क्योंकि वह यहाँ उन प्रार्थनाओं के विषय में गवाही देता है जो वह अकेले में करता है, जब कोई मनुष्य उसके विचार को, या जो कुछ वह अपने मुँह से कहता और उच्चारित करता है उसे, नहीं जान सकता, कि तब भी वह परमेश्वर के सामने उसी शिक्षा को मानता है, क्योंकि वह उससे बिनती करता है कि जो कार्य उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करने की कृपा करे।
इसलिए यहाँ हमें सबसे पहले यह ध्यान देना है कि जो लोग चाहते हैं कि उनका परिश्रम कलीसिया की उन्नति के लिये लाभदायक हो, और जिनमें सच्ची धुन है, उन्हें न केवल शिक्षा देने में लगना चाहिए, वरन् साथ ही परमेश्वर से प्रार्थना भी करनी चाहिए कि वह अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह से उनके साथ कार्य करे। क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि हम (चाहे हमारे पास स्वर्गदूतों की भाषाएँ हों) केवल हवा को पीटते रहते हैं [फ्रेंच में: battre l’eau (पानी पीटना)] क्योंकि हम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते कि जिस शिक्षा का हम प्रचार करते हैं उसे वह आगे बढ़ाए। क्योंकि हम अपने आप में तो निकम्मे साधन मात्र हैं, और जब उसने हमें बोलने की शक्ति दी है तब उसी को उसे प्रभावशाली भी बनाना है, उस कथन के अनुसार कि न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ानेवाला है। [1 कुरिन्थियों 3:7] जब ऐसा है तो जिन पर परमेश्वर की कलीसिया को शिक्षा देने का भार है वे भय और सावधानी से चलें, और न केवल मनुष्यों को परमेश्वर के लिये जीतने का यत्न करें, वरन् नम्रता से यह भी मानें कि वे अपने आप से कुछ नहीं कर सकते, और कि यदि परमेश्वर अपने आत्मा की गुप्त सामर्थ्य से उनके साथ कार्य न करे तो वे केवल हवा में शब्द करेंगे, जो शीघ्र ही विलीन हो जाएगा। इसलिए जो बातें सन्त पौलुस यहाँ कहता है, उनसे हमें यही स्मरण करना है।
परन्तु हम में से हर एक को इसे सामान्य रूप से अपने जीवन पर भी लागू करना चाहिए। इसलिए जब हम परमेश्वर के वचन की शिक्षा पाने आएँ, या जब हम में से कोई उसे अकेले पढ़े, तब हम यह न समझें कि हमारी बुद्धि इतनी विवेकी है कि जो कुछ पवित्रशास्त्र हमें बताता है उसे हम भली-भाँति समझ सकते हैं, वरन् हम अपनी समझ की कमी को मानें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपनी शिक्षा को हम में ऐसा प्रबल करे कि वह हम से छूट न जाए। परन्तु पौलुस जिस रीति को यहाँ अपनाता है उससे यह और भी अच्छी तरह समझ में आएगा, यदि हम उसके सब शब्दों को ध्यान से तौलें।
वह कहता है कि वह इफिसुस की कलीसिया में सुने गए विश्वास के लिये ‘परमेश्वर का धन्यवाद निरन्तर, बिना रुके करता है’, ‘और पवित्र लोगों के प्रति उनके प्रेम के लिये’; फिर भी वह परमेश्वर से अपनी प्रार्थना जारी रखता है कि वह उन्हें और अधिक प्रकाशित करे और उस सिद्धता तक पहुँचाए जिसे पाने का यत्न सब विश्वासियों को करना चाहिए, जब तक परमेश्वर उन्हें इस संसार से उठा न ले। अब जब वह कहता है कि वह परमेश्वर का धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, तो हम उसके उदाहरण से देखते हैं कि विश्वासियों को अपना समय कैसे बिताना चाहिए। क्योंकि सचमुच परमेश्वर जो प्रमुख बलिदान चाहता और ग्रहण करता है वह यह है कि हम उसके सब उपकारों के लिये उसका आदर करें, और उनके लिये उसे उसकी योग्य स्तुति चढ़ाएँ। और यह न सोचा जाए कि यह रुक-रुककर (जैसा आप कहेंगे) किया जा सकता है; परन्तु जैसे परमेश्वर अपनी ओर से अपने उपकार अनवरत उंडेलता रहता है, वैसे ही हम में से हर एक के लिये भी उचित है कि वह निरन्तर उसे धन्य कहने और उसकी स्तुति करने का यत्न करे। क्योंकि सन्त पौलुस यहाँ बिना दिखावे के बोलता है, और जब उसने इफिसियों के लिये परमेश्वर को धन्य कहा, तो उसका आशय अन्य सब कलीसियाओं के लिये भी उतना ही था। तब यदि कोई मनुष्य परमेश्वर के हाथ से पाए हुए उपकारों को कुछ भी न गिने, तो यह कैसी कृतघ्नता होगी! हम सब अपने पड़ोसियों के लिये परमेश्वर की स्तुति करने के ऋणी हैं। यदि हम सुनें कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को समृद्ध किया है, या तीन सौ कोस दूर अपने लोगों पर दया दिखाई है, और संक्षेप में, यदि हम ऐसी कोई बात सुनें जिससे हमें आनन्दित होना चाहिए, तो आवश्यक है कि हमारे मुँह उसके लिये परमेश्वर की स्तुति करने को खुले हों।
अब यदि हम उन उपकारों के लिये भी ऐसा करने को बाध्य हैं जिन्हें हम नहीं देखते, परन्तु जिन्हें हमारे पड़ोसी, यद्यपि वे हम से दूर देशों में हैं, अनुभव करते हैं, तो हमारे विषय में क्या सोचा जाए जब परमेश्वर हमारे मुँह भर देता है (जैसा भजनों में कहा गया है [भजन संहिता 145:16]) और फिर भी हमारा उसका धन्यवाद करने का कोई विचार ही नहीं होता? और हमें यह भी ध्यान देना है कि यदि हम अपने खाने-पीने और इस क्षणभंगुर जीवन की सब वस्तुओं के लिये परमेश्वर की स्तुति करने को बाध्य हैं, तो वह हमें अपने साथ अतुलनीय रूप से और अधिक बाँध लेता है जब वह हमें स्वर्गीय विरासत के लिये बुलाता है, और आत्मिक अनुग्रह-दानों से हमें आशीष देता और धनी बनाता है, जो हमें इस संसार से बहुत आगे ले जाने का काम करते हैं। इसलिए जब परमेश्वर हमारे प्रति ऐसी उदारता दिखाता है, तो यदि हम उस उदाहरण पर न चलें जो सन्त पौलुस यहाँ हमारे सामने रखता है, अर्थात् कि हम अपना सारा जीवन परमेश्वर के नाम की स्तुति में निरन्तर लगे रहें, तो हमारे पास क्या बहाना रह जाएगा?
अब इस सब के साथ वह दिखाता है कि विश्वास और प्रेम स्वयं परमेश्वर के दान हैं और हम से उत्पन्न नहीं होते, जैसा कि मनुष्य शैतानी घमण्ड के कारण सदा कल्पना करते हैं । मैं तुम से पहले कह चुका हूँ कि सन्त पौलुस इफिसियों के विश्वास और प्रेम के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करने में कपटी नहीं बन रहा था। यदि हर मनुष्य अपनी ही इच्छा से विश्वास कर सकता और विश्वास रख सकता, या उसे अपनी किसी सामर्थ्य से पा सकता, तो उसकी स्तुति परमेश्वर को नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि जो हमने उससे नहीं, वरन् कहीं और से पाया है, उसके लिये अपने आप को उसका ऋणी मानना केवल उपहास होगा। परन्तु यहाँ सन्त पौलुस परमेश्वर के नाम को धन्य कहता है कि उसने इफिसियों को विश्वास में प्रकाशित किया और उनके हृदयों को ऐसा गढ़ा कि वे प्रेम करनेवाले बन जाएँ। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि सब कुछ परमेश्वर की ओर से है।
अन्यजातियाँ अपनी स्वतंत्र इच्छा को बीच में लाकर यह समझती थीं कि वे परमेश्वर के प्रति किसी बात में बाध्य नहीं हैं, सिवाय अपने सौभाग्य के, जैसा वे उसे कहते थे; क्योंकि वे कल्पना करते थे कि उनके पास सब कुछ उनकी अपनी सामर्थ्य और कुशलता से है। पोप-मतवादी भी सहज ही मान लेंगे कि परमेश्वर का अनुग्रह अंशतः हमारी सहायता करे यह आवश्यक है, फिर भी वे मनुष्य को ऊँचा ही रखना चाहेंगे, और यह कि वह अपने ही कर्मों से विश्वास तक पहुँचे। यहाँ सन्त पौलुस इन सब शैतानी मतों को निकाल देता है और दिखाता है (जैसा हम पहले देख चुके हैं) कि जब कभी संसार में कोई कलीसिया हो, या कोई लोग उसे पुकारनेवाले हों जो सुसमाचार के विश्वासों पर स्थिर और दृढ़ हों, तो उसकी सारी महिमा का अधिकारी परमेश्वर है। और क्यों? क्योंकि उस दशा में उसका हाथ अवश्य कार्य करता रहा होगा, क्योंकि मनुष्य कभी किसी भलाई की ओर झुकाव नहीं रखते यदि पवित्र आत्मा उनका मार्गदर्शन और संचालन न करता, वरन् बलपूर्वक उन्हें उसकी ओर न खींचता। क्योंकि हम में इतना विद्रोह है कि हम केवल निर्बल और दुर्बल ही नहीं हैं, जैसा पोप-मतवादी कल्पना करते हैं, वरन् जब तक वह हमें शुद्ध न करे तब तक परमेश्वर के सर्वथा विरुद्ध हैं। और यही उसका आशय है, जब वह अपने भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा कहता है कि जो हृदय पहले पत्थर के थे वे माँस के हृदयों में बदल दिए जाएँगे, जिसका अर्थ है कि वह उन्हें कोमल करेगा और अपने आगे झुकाकर आज्ञाकारी बनाएगा।
इसके अतिरिक्त, इन दो शब्दों, विश्वास और प्रेम, के अन्तर्गत सन्त पौलुस ने मसीहियों की सारी सिद्धता को समेट लिया है। क्योंकि व्यवस्था की पहली पटिया का लक्ष्य यह है कि हम केवल एक ही परमेश्वर की उपासना करें और सब बातों में उसी से लिपटे रहें, यह मानते हुए कि हम उसके ऐसे ऋणी हैं कि हमें हर शरण के लिये केवल उसी की ओर भागना और अपना सारा जीवन उसकी सेवा में बिताने का यत्न करना चाहिए। यही व्यवस्था की पहली पटिया का सार है। दूसरी की विषय-वस्तु इसके सिवा और कुछ नहीं कि हम आपस में न्याय और सच्चाई से रहें, और अपने पड़ोसियों से ऐसा व्यवहार करें कि किसी को हानि पहुँचाए बिना सब की सहायता करने का यत्न करें। और हमें निश्चय है कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में भले जीवन का ऐसा उत्तम और सिद्ध नियम रखा है कि उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता।
जब ऐसा है, तो यह अकारण नहीं कि इस स्थान पर सन्त पौलुस यीशु मसीह पर विश्वास और प्रेम को सारे मसीही जीवन के सार के रूप में रखता है, यह दिखाते हुए कि हमें किसके अनुरूप होना है और हमारा मानक क्या है। परन्तु साथ ही हमें यह भी ध्यान देना है कि ‘विश्वास’ शब्द के अन्तर्गत वह परमेश्वर की सारी सेवा को समेटता है। क्योंकि यह असम्भव है कि जब हमने उसकी भलाई को जान लिया, जैसी उसने अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमें दिखाई है, तो हम अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम में पूरी तरह मोहित न हो जाएँ। देखो, परमेश्वर हमें घबराहट और मृत्यु के गड्ढे से निकालता है, और हमारे लिये स्वर्गीय राज्य का द्वार खोलता है, और हम से कहता है कि वह हमें अपने बच्चों के रूप में अपनाएगा। इसे सुनकर और इस पर विश्वास करके कैसे हो सकता है कि हम पूरी तरह उसके न हो जाएँ, संसार को छोड़ दें, और अपने भीतर की उस बुराई से घृणा करें जो हमें उससे अलग करती है? इसलिए तुम देखते हो कि ‘विश्वास’ शब्द का अर्थ अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को सौंप देना है।
फिर, विश्वास निष्क्रिय वस्तु नहीं है। उसका अर्थ यह है कि हम परमेश्वर की शरण में जाएँ, और जब कभी हम किसी दाग से मैले हों, तो उससे प्रार्थना करें कि वह उसका उपाय करे, क्योंकि जो भी आवश्यकता हम पर आती है वह परमेश्वर की ओर से हमें दी गई ऐसी चुभन के समान है जिससे हम उसके पास आएँ।
इसलिए विश्वास में प्रार्थना और बिनती निहित है। वास्तव में, उसका अर्थ यह है कि हम परमेश्वर के नाम को पवित्र ठहराए बिना नहीं रह सकते, उस पर टिके रहकर और उसे वह सारी महिमा देकर जो उसकी है, जब हम जानते हैं कि वह अपनी उदारता से हमें सब कुछ देता है, और हमारे हाथों से धन्यवाद के बलिदान के सिवा कुछ नहीं चाहता। इस प्रकार तुम देखते हो कि विश्वास में वह सब निहित है जो व्यवस्था की पहली पटिया में है।
यह सच है कि अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखा गया है। फिर भी स्मरण रखना चाहिए कि जिन बातों की हमने चर्चा की है, वे एक दूसरे से अलग नहीं की जा सकतीं। अब हमें अपने पड़ोसियों के साथ खरेपन और धार्मिकता से रहना है, जैसा पन्द्रहवें भजन में कहा गया है [पद 2, 3], कि हम परमेश्वर के सब बातों में ऋणी हैं, और बदले में उसे कोई प्रतिफल नहीं दे सकते। वास्तव में जब हमने उसे कुछ देने का भरसक यत्न कर लिया, तब भी हम जो कुछ कर सकते हैं वह उसके लिये न इधर का है न उधर का [फ्रेंच में: ni chaud ni froid (न गर्म न ठण्डा)]। तब वह क्या चाहता है? यह कि हम उसके दीन विश्वासी लोगों की भलाई करने में लगे रहें, जैसा सन्त पौलुस भी इस पाठ में पवित्र लोगों का स्पष्ट उल्लेख करता है।
यह सच है कि हमें बिना किसी अपवाद के सब मनुष्यों से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि हम परमेश्वर की सन्तान नहीं हो सकते, जो अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है, जब तक हम अपने शत्रुओं से प्रेम न करें और उनकी सहायता और राहत का यत्न न करें। इसलिए यही वह लक्ष्य है जिस पर हमें दृष्टि रखनी है। फिर भी यह हमें परमेश्वर की सब सन्तानों से भाईचारे के प्रेम से प्रेम करने से नहीं रोकता, क्योंकि वे हम से अधिक निकट के बन्धन में बँधे हैं। इसी कारण जिस अंश का मैंने सोलहवें भजन से उल्लेख किया, उसमें भी और सन्त पौलुस के इस वर्तमान अंश में भी कहा गया है कि हमें सब विश्वासियों से प्रेम रखना चाहिए। एक और स्थान पर वह यहाँ दिखाई देनेवाली कठिनाई की भली-भाँति चर्चा करता है। क्योंकि वह हमें आज्ञा देता है कि हम सब मनुष्यों से सामान्य रूप से, और विशेष करके विश्वास के घराने के लोगों से प्रेम रखें [गलातियों 6:10]। इसलिए परमेश्वर चाहता है कि हम उसके समान बनें और सब मनुष्यों की भलाई करने में उसके उदाहरण पर चलें, उनकी भी जो उसके योग्य नहीं, यहाँ तक कि हम अपनी पूरी सामर्थ्य से उनके कल्याण का प्रबन्ध करें जो हमारी आँखें फोड़ डालने के सिवा और कुछ नहीं चाहते।
इसके अतिरिक्त, चूँकि परमेश्वर ने अपना स्वरूप सब विश्वासियों पर अंकित किया है और उन्हें हमें सौंपा है, वह चाहता है कि हम उनके प्रति एक विशेष भाईचारे का प्रेम रखें। क्योंकि परमेश्वर के दानों का आदर जहाँ कहीं वे दिखाई दें वहाँ करना चाहिए, पन्द्रहवें भजन के अनुसार [पद 4], जहाँ कहा गया है कि जो परमेश्वर का भय माननेवाले हैं उनसे हमें प्रेम और जो दुष्ट हैं उनसे घृणा करनी चाहिए। फिर, यदि हम वे चिह्न देखें जो परमेश्वर ने अपने विश्वासी लोगों में रखे हैं, जिनसे वह उनके निकट आता है, तो क्या उचित नहीं कि हम भी अपनी ओर से उनसे प्रेम करने को उभारे जाएँ? संक्षेप में, हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ने यहाँ भले और पवित्र जीवन का सारा नियम समेट लिया है, अर्थात् पहले हमें अपने आप को पूरी तरह अपने परमेश्वर को सौंप देना है कि हम दृढ़ता से उसी से लिपटे रहें; और दूसरे, अपने पड़ोसियों के साथ सच्चाई और खरेपन से रहें, सब बुरे कामों से दूर रहें और अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार सब मनुष्यों की भलाई करने का यत्न करें। और यह कैसे हो सकता है? अपने स्वर्गीय पिता को जानने से, और उस असीम भलाई को मानने से जो उसने की है, और जिसमें वह प्रतिदिन हमें भागी बनाने की कृपा करता है, क्योंकि हमारा सारा जीवन उसी पर निर्भर है और वही एक है जिससे हम अनन्त उद्धार की आशा रखते हैं, जीवन भर उसे पुकारते और उसका धन्यवाद करते हुए। पहली बात के विषय में इतना ही।
फिर, दूसरी बात के विषय में, यह सम्भव नहीं कि हम अपने पड़ोसियों से प्रेम करें, जब तक हम संयम से न रहें, कोई बुरा उदाहरण न दिखाएँ, और अपने आचरण पर ऐसा ध्यान न दें कि किसी को शिकायत का अवसर न मिले। क्योंकि उस व्यभिचारी में कैसा प्रेम जो दूसरे की पत्नी का अपमान करने का यत्न करता है, या उस चोर में जो दूसरे का माल चुराना चाहता है? फिर, चूँकि हमारे जीवन का संचालन पूरी सच्चाई से होना चाहिए, जब कभी कोई मनुष्य मतवालेपन, निन्दा, या ऐसी ही बातों में फूट पड़ता है, तो ऐसा करने में बेचारे लोगों का कुछ न कुछ सताया जाना, उनके माल का लुटना, या हर प्रकार की ज़बरदस्ती और अति में उन्मत्त होकर दौड़ पड़ना अवश्य होता है। इसलिए यदि हमारा अपने पड़ोसियों के प्रति प्रेम है, तो हम उनके साथ खरा और सीधा जीवन बिताएँगे और उसे ऐसे चलाएँगे कि हम व्यर्थ की कल्पनाओं में न उलझें, जैसा हम पोप-मतवादियों को करते देखते हैं; क्योंकि वे अपने रीति-रिवाजों में बहुत परिश्रम करते हैं, और बड़बड़ाने, यहाँ-वहाँ तीर्थयात्रा पर भटकने, और यह-वह करने को परमेश्वर की सेवा कहते हैं, और इस बीच वे अपनी ही कल्पनाओं में मूर्छित हो जाते हैं, और यह सब इसलिए कि वे नहीं जानते कि परमेश्वर उन्हें किस काम के लिये बुलाता है। इसलिए ताकि हम व्यर्थ परिश्रम न करें, आओ हम देखें कि परमेश्वर किस बात को ग्रहण करता है और उसी पर बने रहें। क्योंकि यदि हम उस मार्ग में निरन्तर बने रहें, जैसा वह अपने वचन के द्वारा हमें दिखाता है, तो हम भटक नहीं सकते, विशेषकर इसलिए कि वह हमें इतने संक्षेप में दिखाता है कि हमारे योग्य जीवन बिताने के लिये क्या आवश्यक है। क्योंकि यदि पोथियाँ लम्बी और अन्तहीन होतीं, तो हम यह कहकर अपने आप को निर्दोष ठहराते कि हम बड़े विद्वान नहीं हैं और इतनी बातें याद नहीं रख सकते। परन्तु अब, जब हम देखते हैं कि हमारा प्रभु अपनी सारी माँगें दो-तीन शब्दों में कह देता है, तो हमें मानना होगा कि यदि हम इतने छोटे, संक्षिप्त और सरल पाठ को याद नहीं रखते, तो हम अति चालाक और हठीले हैं, और जान-बूझकर अपने कान बन्द कर लेते हैं कि कहीं वह जो हम से कहता है उसे सुन न लें।
अन्त में, ‘विश्वास’ शब्द पर यह ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस अकारण नहीं कहता, ‘यीशु मसीह पर विश्वास’; क्योंकि हमें वहीं देखना है। प्राचीन पूर्वजों के आगे सदा परमेश्वर का स्वरूप रहता था, क्योंकि उन्हें केवल उसके दयासन के सामने बलिदान चढ़ाना होता था। उन्हें यह आशा रखने का कोई और कारण नहीं दिया गया था कि परमेश्वर उनकी सुनेगा, या किसी और रीति से उन पर दया करेगा। तब उनके पास वाचा के सन्दूक का दृश्य स्वरूप था, परन्तु अब हमारे पास यीशु मसीह है, जो परमेश्वर का स्वरूप है, जो अपने आप में अदृश्य है; [कुलुस्सियों 1:15; इब्रानियों 1:3] क्योंकि सन्त पौलुस अकारण नहीं कहता कि परमेश्वर तब तक अगम्य है जब तक वह अपने पुत्र के व्यक्तित्व में अपने आप को प्रकट न करे।
इसलिए, चूँकि हमारे पास यीशु मसीह है, जो परमेश्वर का हूबहू स्वरूप है, हमें अवश्य ही उसी की ओर देखना चाहिए। और अब तुम यह भी देखते हो कि क्यों कहा गया है कि वह अपने पिता परमेश्वर की सामर्थ्य का स्पष्ट चिह्न है। क्योंकि यद्यपि व्यक्ति भिन्न हैं, फिर भी वह हमारे सामने वह प्रस्तुत करता है जो हमारे उद्धार के लिये आवश्यक है, कि पुत्र को जानने से हम पिता को भी जानें, जैसा सन्त यूहन्ना कहता है। [यूहन्ना 5:23] और जिसके पास पुत्र नहीं, वह पिता का इनकार करता है, चाहे वह कितना ही कहे कि वह उसके पास आता है। इसलिए, जब यहाँ कहा गया है कि हमें यीशु मसीह पर विश्वास करना है, तो आओ हम उस चेतावनी पर ध्यान दें जो वह अपने चेलों को देता है। ‘तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो?’ वह कहता है, ‘मुझ पर भी विश्वास करो।’ [यूहन्ना 14:1] वहाँ वह दिखाता है कि प्राचीन पूर्वज जो व्यवस्था के अधीन जीए, उनके पास उस समय तक केवल धुँधली शिक्षा थी जब तक वह संसार पर प्रकट न हुआ। यह सच है कि वे जीवित परमेश्वर की उपासना करते थे, और यह भी कि उन्हें उस तक पहुँचने का मार्ग मध्यस्थ के बिना न था। फिर भी वह केवल छायाओं और प्रतीकों के अधीन था। न उनके पास वैसा प्रकाश था जैसा आज हमारे पास सुसमाचार के अधीन है। और इसी कारण मैंने तुम्हें बताया कि मसीह को परमेश्वर का स्वरूप कहा गया है, जो अपने स्वभाव से अदृश्य है, ताकि हम उसे जान न सकते यदि वह ऐसे साधन से अपने आप को प्रकट न करता।
संक्षेप में, आओ हम ध्यान दें कि जब तक हमारा विश्वास यीशु मसीह में स्थिर नहीं होता, तब तक हम भटकने के सिवा कुछ नहीं करते। और यह उन भूलों से और भी अच्छी तरह समझ में आएगा जिनमें संसार आज तक डूबा रहा है। क्योंकि पोप-मतवादी खूब दावा करेंगे कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; तुर्क और यहूदी भी इतना ही करते हैं। यह सच है कि पोप-मतवादी और यहूदी सत्य के सबसे निकट प्रतीत होते हैं, क्योंकि यहूदी दावा करते हैं कि वे जीवित परमेश्वर की उपासना करते हैं, उसी परमेश्वर की जिसने उन्हें मूसा के द्वारा अपनी व्यवस्था दी। परन्तु इससे क्या? साथ ही वे यीशु मसीह को ठुकराते हैं, जो व्यवस्था का अन्त और सार है। रही पोप-मतवादियों की बात, तो यद्यपि वे मसीहियत का अंगीकार करते और यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता मानते हैं, फिर भी यह प्रकट है कि वे उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की सेवा का एक ऐसा मार्ग अपने अनुकूल बना लिया है, कि उनके सब कामों में अव्यवस्था के सिवा कुछ नहीं है। रहे तुर्क, वे ‘सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता’ भली-भाँति कह सकते हैं, परन्तु क्या हम सोचेंगे कि परमेश्वर अपना इनकार करेगा या अपने कहे को वापस लेगा, जो यह है कि कोई मनुष्य उसके पास नहीं आ सकता सिवाय उसके प्रिय पुत्र के द्वारा, जिसे उसने अपने और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ ठहराया है? फिर, हम देखते हैं कि पोप-मतवादी खूब कहेंगे कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, परन्तु साथ ही वे इस पर अड़े रहते हैं कि उनके संरक्षक सन्त और पैरोकार हों जो उन्हें उसकी उपस्थिति में पहुँचाएँ। फिर, उनके लिये यह पर्याप्त नहीं कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं; आवश्यक है कि हम अपने पुण्य भी लाएँ, और अपने ही प्रायश्चित्तों से अपने आप को छुड़ाएँ; और जब हम परमेश्वर को अप्रसन्न कर दें तो फलाँ-फलाँ उपायों का सहारा लें। इसलिए यदि कोई पोप-मतवादियों के विश्वास की जाँच करना चाहे, तो अवश्य पाएगा कि वे अपने ही स्वप्नों पर विश्वास करते हैं और जो कुछ वे करते हैं वह केवल एक चकरा देनेवाली भूल-भुलैया है। क्योंकि जो कुछ उनके अपने सिर में आता है उसे वे यीशु मसीह के साथ मिला देते हैं, जबकि हम जानते हैं कि उसे सर्वथा अकेला रहना चाहिए।
इसलिए हम देखते हैं कि सन्त पौलुस हमें हमारे विश्वास की सच्ची कसौटी तक कैसे ले जाता है, जो यीशु मसीह पर टिकना है, ताकि हम अपने आप को सब भलाई से सर्वथा खाली अनुभव करें, और जानें कि हमें उसकी परिपूर्णता में से लेकर सब भली वस्तुओं से भरना है, नहीं तो हम पर हाय होगी। क्योंकि यदि (यदि सम्भव होता) स्वर्ग के सारे स्वर्गदूत हमारे पक्ष में होते, तब भी निश्चय है कि घबराहट के सिवा कुछ न होता, यदि हम सिर को न थामे रहते, जैसा सन्त पौलुस कुलुस्सियों की पत्री के पहले और दूसरे अध्याय में कहता है। [1:18; 2:10] इसलिए तुम देखते हो कि इस वाक्य से हमें क्या सीखना है।
अब, सन्त पौलुस ने यह कहने के पश्चात् कि वह उन बातों के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करता है जो उसने इफिसुस की कलीसिया में पहले से देखी थीं, वह जोड़ता है कि ‘वह उससे प्रार्थना भी करता है’। यह दिखाने के लिये है कि जब हम परमेश्वर को अपनी सन्तानों पर अपने उत्तम दान देते देखें, तो हमें उससे बिनती करनी चाहिए कि वह उन्हें बनाए रखे और बढ़ाए, और यह दो कारणों से। क्योंकि जो खड़ा है वह गिर भी सकता है; और फिर, परमेश्वर को अपना अनुग्रह अधिकाधिक बढ़ाना है। क्योंकि जो सबसे सिद्ध हैं उन्हें भी लज्जित होने का कारण होगा, यदि वे अपनी दीनता को भली-भाँति देखें। तुम देखते हो, तब, कि सन्त पौलुस हमें यहाँ यह सिखाता है कि जब हम परमेश्वर की स्तुति उन दानों के लिये करें जो उसने अपने चुने हुओं, अपनी सन्तानों पर उंडेले हैं, तो हमें अपने धन्यवाद के साथ प्रार्थना को जोड़ना चाहिए। और क्यों? क्योंकि जो उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करना उसे शोभा देता है, और हमें सदा यही आधार लेना है—हे प्रभु, तू अपने हाथों के कार्य को अधूरा न छोड़ेगा। [भजन संहिता 138:8]
और जो हमें दूसरों के लिये करना चाहिए वही हमारे अपने लिये भी आवश्यक है। संक्षेप में, हमें यहाँ यह उपदेश दिया जाता है कि हम परमेश्वर की भलाई और उन दानों के लिये जो हमारे पास पहले से हैं, उसे ऐसे बड़ा मानें कि हम यह भी देखें कि हम में अब भी बहुत कुछ घटी है, और हमारे लिये आवश्यक है कि वह हमें अन्त तक स्थिर रहना दे, और इसके अतिरिक्त हमारी शेष त्रुटियों को सुधारे और हम में अपना अनुग्रह तब तक बढ़ाए जब तक हम पूर्ण सिद्धता तक न पहुँच जाएँ, जो तभी होगी जब हम इस नश्वर देह से छूट जाएँगे।
फिर भी, इसके बावजूद, हम देखते हैं कि आज शैतान उन्हें कैसे वश में किए हुए है जो एक नारकीय सिद्धता की कल्पना करते हैं, और अपने पिता से केवल पहली तीन प्रार्थनाएँ करते हैं, यह कहकर कि इतना ही बहुत है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि उसका नाम पवित्र माना जाए, उसका राज्य आए, और उसकी इच्छा पूरी हो—और इस प्रकार वे प्रार्थना का शेष सारा भाग काट डालते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिये छोड़ा है। और इस विषय में मेरे पास उनके अपने हाथों के हस्ताक्षर हैं, और यह उनके चेले जानते हैं। इससे वे शैतान दिखाते हैं कि वे सर्वथा बुद्धिहीन होंगे, क्योंकि वे इतनी दूर बहक गए हैं कि परमेश्वर को यह महिमा देने से इनकार करते हैं कि हम अब भी अपनी दुर्बलताओं का बोझ ढो रहे हैं, अनेक भ्रष्टताओं से दबे हैं, और बहुत से दोषों से घिरे हैं, इसलिए परमेश्वर को हमें उनसे अधिकाधिक, दिन-प्रतिदिन शुद्ध करना है, जब तक वह हमें उस सिद्धता तक न पहुँचा दे जिसके लिये वह हमें बुलाता है।
और इस शिक्षा पर ध्यान देना हमारे लिये और भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि पोप-मतवादी अपने अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं की भूलों से उतने भरे नहीं हैं जितने ये अभागे हैं, जो आज अपनी सभा-भवनों और छिपने की जगहों में अपना विष फैलाते हैं। परन्तु जो भी हो, आओ हम भली-भाँति ध्यान दें कि पवित्र आत्मा यहाँ हमें क्या दिखाता है, जब सन्त पौलुस कहता है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है। और क्यों? मैं तुम से कह चुका हूँ कि इफिसी लोग उन्नति कर चुके थे और परमेश्वर तथा उसके पवित्र आत्मा के दान उन में बढ़ गए थे। उसने यह दिखा दिया है। अब, बात को पूरा करने के लिये, वह आगे कहता है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उन्हें वह दे जो उनके पास नहीं है, और जिसकी उन्हें अब भी आवश्यकता है। जब ऐसा है, तो आओ हम ध्यान दें कि हम जितनी उन्नति कर चुके हों, उतना ही अधिक हमारे पास अपने आप को दीन करने का कारण है, और सारी नम्रता से परमेश्वर से बिनती करने का कि जो उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करे और हम में अपने दान तब तक बढ़ाए जब तक हमें आगे बढ़ने की आवश्यकता न रहे, जो उस मिलन के समय होगा जिसकी चर्चा हम चौथे अध्याय में बहुत विस्तार से करेंगे।
परन्तु अब हमें उन शब्दों पर भली-भाँति ध्यान देना है जो सन्त पौलुस प्रयोग करता है। क्योंकि वह कहता है, हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, महिमा का पिता, अथवा महिमामय पिता (क्योंकि ‘महिमा का पिता’ यह अभिव्यक्ति इब्रानी भाषा में ‘महिमामय पिता’ के अर्थ में आती है) ‘तुम्हें उसकी पहचान के लिये आत्मिक प्रकाशन दे’। अब जब सन्त पौलुस हमें यहाँ यीशु मसीह की ओर भेजता है, यह कहकर कि जिस परमेश्वर को वह पुकारता है वह वही है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, वरन् उसका पिता भी है, तो यह उस भरोसे को दिखाने के लिये है जो उसे सुने जाने का था, और इसलिए कि इफिसियों को प्रोत्साहन मिले कि वे प्रार्थना करने की उसी रीति और नियम पर चलें, और जब कभी उन्हें परमेश्वर के पास आने का अवसर हो, तो वही मार्ग लें जो उसने लिया और हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आने के सीधे मार्ग पर बने रहें।
परन्तु अब यदि कोई पूछे कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के ऊपर कैसे है, तो प्रश्न सहज ही सुलझ जाता है यदि हम मध्यस्थ के व्यक्तित्व पर दृष्टि रखें, जिसने परमेश्वर और हमारे बीच मध्यस्थ होने के लिये हमारे स्थान और दशा में अपने आप को दीन किया। यह सच है कि यीशु मसीह अपने पिता के साथ एक है, [यूहन्ना 10:30] और जब हम जीवित परमेश्वर की बात करते हैं, तो आवश्यक है कि हम मानें कि ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता उसमें वास करती है। [कुलुस्सियों 2:9] इसलिए हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को अलग नहीं ठहराना चाहिए, मानो वह कोई नया परमेश्वर हो और उससे भिन्न कुछ और, जो आदि से पूर्वजों पर प्रकट हुआ था (जैसा आज कुछ शैतान कहते हैं, जिन्होंने वह दुर्गन्धयुक्त बुराई और घृणित बात भड़काई है), परन्तु वह वही परमेश्वर है, एकमात्र परमेश्वर, जिसने अपने आप को पिता के व्यक्तित्व में हम पर प्रकट किया—ताकि हम उसे यीशु मसीह में खोजें। क्योंकि यीशु मसीह में हमें मध्यस्थता के पद को देखना है [फ्रेंच में: moyenneur (बीच का पुरुष)], इस अर्थ में कि उसने अपने आप को ऐसा दीन किया। इसलिए नहीं कि उसने अपनी महिमा में से रत्ती भर भी त्याग दी, या किसी प्रकार उसकी अनन्त महिमा घटी या कम हुई। ऐसा कुछ नहीं हुआ। परन्तु हमारे लिये वह दीन हुआ, [फ्रेंच में: amoíndri (घटाया गया)] हाँ, और सर्वथा रिक्त हुआ।[फ्रेंच में: anéanti du tout (पूरी तरह मिटाया गया)] और हमें यह कहने में लज्जित नहीं होना चाहिए कि यीशु मसीह दीन हुआ, [फ्रेंच में: amoíndri (घटाया गया)] क्योंकि कहा गया है कि वह रिक्त हुआ, [फ्रेंच में: anéanti du tout (पूरी तरह मिटाया गया)] क्योंकि फिलिप्पियों को सन्त पौलुस यही शब्द प्रयोग करता है। [फिलिप्पियों 2:7] इसलिए जब हम यीशु मसीह की चर्चा इस रूप में करते हैं कि वह हमें अपने पिता तक पहुँचाने के लिये हम से जुड़ा, तो वह अपने पिता परमेश्वर के अधीन है, अर्थात् इस बात के सम्बन्ध में कि उसने हमारा स्वभाव अपने ऊपर ले लिया और अपने आप को हमारा साथी बना लिया।
और यही कारण भी है कि उसने अपने चेलों से कहा (जैसा सन्त यूहन्ना अपने बीसवें अध्याय में बताता है [पद 17]), ‘मेरे भाइयों के पास जाकर उनसे कह दो कि मैं अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर, अपने पिता और तुम्हारे पिता के पास जाता हूँ।’ कैसा आश्चर्य कि यीशु मसीह अपने विश्वासी लोगों से इस प्रकार जुड़ गया कि उसने कहा कि उनका और उसका परमेश्वर एक ही है। हाँ, परन्तु किस रीति से? क्या वह स्वयं परमेश्वर नहीं है? हाँ; परन्तु चूँकि उसने हमारा शरीर पहन लिया, और चूँकि उसने शरीरधारी होना स्वीकार किया कि हम उसकी देह के अंग हों, इसी कारण उसका परमेश्वर हमारे साथ एक है। और इसी कारण प्रेरित यशायाह के इस पाठ को उसी पर लागू करता है, ‘देख, मैं उन सेवकों के साथ यहाँ हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है’; [यशायाह 8:18; इब्रानियों 2:13] ताकि यीशु मसीह वहाँ एक सेनापति के रूप में दिखाई दे जो अपने राजा और स्वामी के सामने उपस्थित होकर कहता है, ‘देख, मैं यहाँ हूँ उन सन्तानों की मण्डली के साथ जो तूने मुझे दी हैं।’ जो भी हो, हम देखते हैं कि यीशु मसीह हमें अपने पिता परमेश्वर की ओर खींचता है कि हम पूरे भरोसे के साथ उसके पास जाएँ और वह हमें ग्रहण करे। क्योंकि अन्यथा वह कौन है जो अपने आप से यह प्रतिज्ञा करने का साहस करे कि उसकी बिनती सुनी जाएगी? हम कौन-सा अनुग्रह पा सकते थे, यदि यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिये द्वार न खोला जाता, और यदि वह वैसा प्रमाणित न होता जैसा उसने दावा किया, अर्थात् कि वह मार्ग है? [यूहन्ना 14:6]
तथापि, ताकि हम और अच्छी तरह जानें कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा चलाए जाने की कितनी आवश्यकता है, सन्त पौलुस यहाँ हमारे सामने परमेश्वर की असीम महिमा रखता है। तब हम कैसे इतना साहस करें कि परमेश्वर के सामने उपस्थित हों, जब तक हमारा कोई मध्यस्थ न हो जो हमारे लिये वहाँ पहुँचने का मार्ग निकाले? क्योंकि यदि सूर्य मनुष्यों की आँखें चौंधिया देता है, और उसकी गर्मी हमें जला देती है, यद्यपि हम उससे बहुत दूर हैं, तो हमारा क्या होगा जब हम परमेश्वर के निकट जाएँ? क्योंकि सूर्य के पास क्या है, सिवाय थोड़ी-सी शक्ति के जो उसमें फूँकी गई है? और क्या निश्चय ही हम मानो भस्म न हो जाएँगे जब हम उस अगम्य प्रताप के निकट आएँगे जो परमेश्वर में है? परन्तु फिर भी, यदि हमारे पास यीशु मसीह है, तो हमें समझना है कि परमेश्वर केवल महिमा का पिता ही नहीं, वरन् दया का पिता भी है, और कि वह उन पर तरस की दृष्टि करता है जो सबसे अधिक दुखी हैं और जिन्हें संसार निन्दा और तिरस्कार की दृष्टि से देखता है। परमेश्वर से प्रार्थना करते समय हमें इसी पर टिकना चाहिए।
सन्त पौलुस यहाँ स्पष्ट रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह इफिसियों को ज्ञान और प्रकाशन का आत्मा दे। यह निश्चय है कि परमेश्वर उन पर अपने सुसमाचार का सत्य पहले ही प्रकट कर चुका था, जैसा हम देख चुके हैं। और सचमुच यदि परमेश्वर ने हम में पहले से कार्य न किया होता, तो हम में विश्वास या प्रकाश की एक चिंगारी भी न होती, उस कथन के अनुसार जो पतरस से सन्त मत्ती के सोलहवें अध्याय में कहा गया है, [पद 17] ‘माँस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह तुझ पर प्रगट किया है।’ फिर भी इस सब के बावजूद पतरस ने बाद में दिखाया कि वह मसीह के आत्मिक राज्य के विषय में कुछ नहीं जानता था। इसलिए यद्यपि वह अपनी वर्णमाला सीखनेवाले किसी बेचारे नासमझ के समान था, तो भी उसके विषय में साक्षी है कि सुसमाचार का जो थोड़ा-सा स्वाद उसे मिला था वह स्वर्ग का दान था। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर को हम में अपना दान अधिकाधिक बढ़ाना होता है, और इसी सम्बन्ध में हमारे जीवन को ‘मार्ग’ कहा गया है, क्योंकि हमें सदा आगे बढ़ते रहना है जब तक हमारी दौड़ पूरी न हो। और जो कोई इस संसार में किसी सिद्धता की कल्पना करता है, उसे शैतान ने वश में कर रखा है, और वह परमेश्वर के अनुग्रह का सर्वथा इनकार करता है। तथापि हम यह न सोचें कि परमेश्वर अपना उद्देश्य बदलता है (क्योंकि वह परिवर्तनशील नहीं है), या अपने अनुग्रह को मनुष्यों की इच्छा से टुकड़े-टुकड़े किए जाने देता है, परन्तु उसने यह क्रम ठहराया है कि हम दिन-प्रतिदिन बढ़ें, और साथ ही पूर्ण संयम के साथ अपनी कमियों को पहचानना सीखें, उनके लिये कराहें, अपने आप को दुःखी करें और अपने आप को रोके रखें।
तुम देखते हो कि ये दोनों बातें बहुत अच्छी तरह मेल खाती हैं, अर्थात् कि इफिसियों ने प्रकाशन का आत्मा पहले ही पा लिया था, और फिर भी उन्हें परमेश्वर से उसे दिया जाना आवश्यक था। क्योंकि यद्यपि आत्मा एक ही है, फिर भी दान अनेक हैं, और वे हम में से हर एक को उसके माप के अनुसार, और जैसा देना उसे भाता है, बाँटे जाते हैं। केवल यीशु मसीह ने उन्हें पूर्ण रूप से पाया है। केवल वही वह सोता है जो कभी सूख नहीं सकता। वही है जिस पर परमेश्वर का आत्मा ठहरा, ताकि हम सब उसके भागी बनें। और अपनी ओर से हम मानें कि हम में जो सबसे बुद्धिमान हैं उन्हें भी सदा शिष्य बने रहना और मरने के दिन तक सीखते रहना आवश्यक है। अब ध्यान दें कि यह ‘प्रकाशन’ शब्द उस अन्धेपन को दोषी ठहराता है जो हम सब का है। क्योंकि हमारी आँखें खुली हैं कि हम सफेद और काले में भेद करें; हम सूर्य और चन्द्रमा को देखते हैं; हम इस संसार की वस्तुओं को देखते हैं और उनके विषय में निर्णय कर सकते हैं; इस प्रकार की बातों के लिये हमें किसी नए प्रकाशन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह हमारे पास स्वभाव से है। यह सच है कि हमारी आँखें परमेश्वर की सामर्थ्य और भलाई के साधन हैं जिनसे वह हमें ज्योति का आनन्द लेने देता है, परन्तु यह सब में समान है। परन्तु यहाँ सन्त पौलुस हमें दिखाता है कि हम अन्धे हैं और परमेश्वर के आत्मिक अनुग्रह की कुछ भी समझ नहीं रखते, जब तक वह हमारी आँखें न खोले और उनके आगे का पर्दा न हटाए, वरन् हमें वह नई दृष्टि न दे जो हमारे पास नहीं है। क्योंकि हमारी आँखें फूटी हुई से भी बदतर हैं जब तक वह अपने पवित्र आत्मा से उन्हें प्रकाशित न करे। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है।
और वह इसी की चर्चा आगे जारी रखता है, अर्थात् (वह कहता है) ‘कि तुम्हारी समझ की आँखें ज्योतिर्मय हों।’ परन्तु कोई उत्तर दे सकता है, यदि हमारे पास प्रकाशन का आत्मा पहले से है, तो हमें उसकी क्या आवश्यकता? देखो,—तुम ऐसे बोलते हो मानो तुम सब कुछ देखते हो। यह सच है कि तुम अंशतः देखते हो, परन्तु तुम्हारी आँखें अब भी बहुत धुँधली हैं। और यह सब मनुष्यों के विषय में सामान्य रूप से कहा जा सकता है, जैसा कहा गया है कि इस संसार में हम वस्तुओं को धुँधला-सा और मानो दर्पण में देखते हैं, [1 कुरिन्थियों 13:12] जब तक हम परमेश्वर को उसकी स्वर्गीय महिमा में देखने के योग्य न हो जाएँ, जब हम उसके समान बना दिए जाएँगे। फिर, सन्त पौलुस यह इसलिए लिखता है कि मनुष्य यह न कहें, क्या परमेश्वर को हम पर बातें इस प्रकार प्रकट करनी होंगी, मानो हम ऐसी दशा में हों कि कुछ भी नहीं देख सकते? और क्या मनुष्य विवेक और निर्णय से रहित पशु से कुछ अच्छा नहीं? इसके उत्तर में, यह सच है कि हमारे पास कुछ समझ है, परन्तु फिर भी हम अन्धे हैं, क्योंकि हम पाप से भ्रष्ट हैं। इसलिए परमेश्वर को हमें नई आँखें देनी होंगी, जैसा मैंने पहले कहा।
और प्रेरित ‘ज्ञान’ शब्द जोड़ता है, कि उस मूर्खतापूर्ण अभिमान को और अच्छी तरह दबाए जो मनुष्य अपने भीतर पालते हैं, जब वे बिना पंखों के उड़कर परमेश्वर तक पहुँचने का यत्न करते हैं। क्योंकि कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो बुद्धिमान न होना चाहे। यदि हम परमेश्वर के हाथ से खोजकर सच्चा ज्ञान चाहते, तो यह भली और व्यवस्थित इच्छा होती। परन्तु हम में दो दोष हैं, क्योंकि हम अपनी ही कल्पना के अनुसार बुद्धिमान होना चाहते हैं। क्या मैं अपने आप को चलाने के लिये यथेष्ट बुद्धिमान नहीं? मूर्ख कहेगा। और साथ ही हम परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते हैं, और हम में से हर एक चाहता है कि उसकी गर्दन पर लगाम न हो और जो उसे अच्छा लगे वह करने दिया जाए। परन्तु यह बहुत बड़ी अति है। दूसरा दोष यह है कि पवित्रशास्त्र पढ़ते समय भी हम कल्पना करते हैं कि जो कुछ उसमें है उसका ज्ञान हम अपने ही निर्णय से पा सकते हैं। परन्तु यहाँ सन्त पौलुस दोनों दोषों को निकाल देता है। क्योंकि जब वह परमेश्वर से बिनती करता है कि वह अपने विश्वासी लोगों को ज्ञान का आत्मा दे, तो वह दिखाता है कि स्वर्ग के राज्य तक पहुँचने के लिये उनमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के मार्गदर्शन के बिना पशुओं से अधिक कोई विवेक नहीं। क्योंकि नागरिक बातों और संसारी कामों में भी परमेश्वर विवेक केवल उन्हीं को देता है जिन्हें वह चाहता है।
अब, यदि परमेश्वर अपनी विशेष भलाई सदा अपने ही पास रखता है कि जिसे चाहे इस संसार की निचली बातों के संचालन के लिये बुद्धि दे, तो वही अविश्वासियों को बुद्धिमान बनाता है; और जब बात स्वर्गीय जीवन की हो, तो हम में बुद्धि के लिये कोई स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं। और इस प्रकार सन्त पौलुस उसे मानकर चलता है जो मैं कह चुका हूँ, अर्थात् कि हमें परमेश्वर से सिखाया जाना है कि हम उसे सत्य की शिक्षा के द्वारा, सुसमाचार की गवाही के द्वारा जानें; क्योंकि उसके बिना हम उन उन्मादियों के समान होंगे जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा के प्रकाशन के होने का बहाना करके भूल में पड़ते हैं। तथापि सन्त पौलुस ‘प्रकाशन’ शब्द को इस रीति से नहीं लेता, जब वह परमेश्वर से बिनती करता है कि वह उसे अपनी सन्तानों को दे। उदाहरण के लिये, जब यीशु मसीह अपने आत्मा की बात करता है, तो वह उसे उस शिक्षा से अलग नहीं करता जो उसने प्रचार की थी। ‘जब आत्मा आएगा (वह कहता है) तो तुम्हें सारा सत्य बताएगा।’ [यूहन्ना 14:26; 15:26] और यह कैसे? क्या प्रेरित उसे पहले से नहीं पा चुके थे? हाँ, परन्तु वह जोड़ता है, वह तुम्हें वह दिखाएगा जो तुम अब मेरे मुँह से सुनते हो। संक्षेप में, पवित्र आत्मा का विशेष कार्य यही है कि वह हमें ऐसे सिखाए कि जो वचन हम सुनते हैं उसे उसका स्थान और सच्चा मूल्य मिले, और हम उससे लाभ उठाएँ।
और फिर, सन्त पौलुस यह भी दिखाता है कि हमारा सारा प्रकाश और ज्ञान किसमें है, अर्थात् परमेश्वर को उसके एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में जानने में। यही (मैं कहता हूँ) वह है जिससे हमें सन्तोष करना है। क्योंकि यदि हमारे मन ताक-झाँक करनेवाले हैं और हम अपनी सामर्थ्य से परे की बातों में जिज्ञासु हैं, तो आओ थोड़ा सोचें कि हमारी समझ कितनी निर्बल और कच्ची है। और यदि हमारे हृदय इतने स्थूल और भारी हैं, तो जब हम आकाश और पृथ्वी के ऊपर उठना चाहें तब हम क्या करेंगे? क्या हम इतने छोटे माप में वह सब समेट सकते हैं? फिर भी हम देखते हैं कि मनुष्य इस और उस के विषय में जिज्ञासु होने और परमेश्वर के विरुद्ध बहस और विवाद के रूप में प्रश्न उठाने की कितनी अनुचित छूट लेते हैं। इसी कारण सन्त पौलुस हमें यहाँ दिखाता है कि यदि हम बुद्धिमान होना चाहते हैं, तो हमें संयमी होना होगा, अर्थात् हमें समझना होगा कि बुद्धि परमेश्वर की और हमारे प्रभु यीशु मसीह की है, जैसा वह स्वयं आगे दिखाएगा, कि जब हम एक बार उस बिन्दु तक आ जाएँ, तो हमारे पास उतना हो जितना हमारे लिये पूरी तरह पर्याप्त होना चाहिए; और यदि हम और आगे जाने का दुस्साहस करें, तो वह जान-बूझकर अपने आप को नष्ट करना है।
तब सन्त पौलुस आगे चलकर उसे बहुत विस्तार से दिखाएगा, परन्तु हमारे लिये यही पर्याप्त होना चाहिए कि इस अंश में भी और सारे पवित्रशास्त्र में भी हम सीखें कि जिस परमेश्वर की हमें सेवा करनी है उसकी इच्छा क्या है, हम उस पर अपना भरोसा कैसे रख सकते हैं, उससे प्रार्थना करने के लिये हमें कैसी पहुँच है, और सब समयों में उसमें शरण पाना। हमें इसी में लगे रहना है। परन्तु यह तब तक नहीं हो सकता जब तक वह सब जिसकी हमें कभी आवश्यकता है और जो हमारे कल्याण के लिये काम आता है, यीशु मसीह में न मिले, जिसमें परमेश्वर ने अपने आप को प्रकट किया है। क्योंकि अपने आप में परमेश्वर का प्रताप बहुत ऊँची बात है, और हम उसके निकट आने से पहले सौ बार खो जाते, यदि यह न होता कि वह हमारे पास उतर आया है। परन्तु यदि हमारे पास एक बार यीशु मसीह है, तो वहाँ हमारे पास उसका जीवित स्वरूप है, जिसमें हम वह सब देख सकते हैं जो हमारे उद्धार के लिये आवश्यक है। क्योंकि वहाँ हम समझते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, और कि हम अपने सब पापों से शुद्ध किए गए हैं कि परमेश्वर की महिमा में बदल जाएँ। वहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर हमें कैसे धर्मी मानकर ग्रहण करता है, और हम परमेश्वर से कैसे मेल-मिलाप पाए हैं। वहाँ हम जानते हैं कि उसने हमें कैसे छुड़ाया है और कि हम उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से कभी वंचित न छोड़े जाएँगे, जब तक वह हमें हमारी विरासत के भोग तक न पहुँचा दे। इस प्रकार हम ये सब बातें अपने प्रभु यीशु मसीह में जानते हैं। और इसी कारण सन्त पौलुस एक और स्थान पर कहता है कि वह यीशु मसीह के सिवा और कुछ जानना नहीं चाहता था, [1 कुरिन्थियों 2:2] और कि केवल उसी पर वह घमण्ड करना चाहता था। जैसा हम पहले देख चुके हैं, उसने अपने प्रभु यीशु मसीह के क्रूस के नीचे बने रहने के लिये सब कुछ छोड़ दिया, और यद्यपि संसार के लिये इसमें लज्जा और निन्दा के सिवा कुछ नहीं, फिर भी वह दृढ़ता से कहता है कि जो कुछ वह पहले मूल्यवान समझता था उस सब को उसने त्याग दिया, और उन्हें केवल बाधा और हानि, वरन् कूड़ा और गोबर समझता है, ताकि हमारे प्रभु यीशु मसीह से लिपटा रहे और दिखाए कि जो अपने पुण्य की मूर्खतापूर्ण धारणा से ग्रस्त हैं वे अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग करते हैं; और कि यदि हमें उससे जुड़ना है, तो हमें वह सब छोड़ देना होगा जो हम अपना समझते हैं और अपने आप को सब भलाई से खाली होकर उसके सामने रखना होगा, कि उसके द्वारा भरे जाएँ। और अब तुम यह भी देखते हो कि सन्त पौलुस क्यों कहता है कि वह उद्धार के बन्दरगाह पर नंगे और कंगाल होकर पहुँचना कहीं अधिक पसन्द करेगा, बजाय इसके कि समुद्र के बीच जीए और वहाँ डूब जाए। क्योंकि यद्यपि उसे पवित्र पुरुष, और आधा स्वर्गदूत समझा जाता, तो भी उसने उसे कुछ न गिना, ताकि वह उस पापक्षमा का भागी हो जो उसे यीशु मसीह में दी गई, और उस अनुग्रह का जो उसने अपने सब अंगों को दिया है। इसलिए आओ हम परमेश्वर के अनुग्रह को ऐसे बड़ा मानना सीखें कि उन सब कल्पनाओं को पूरी तरह भूल जाएँ जिनसे शैतान अविश्वासियों को धोखा देता है, उन्हें न जाने कैसे घमण्ड से फुलाकर; और आओ हम पूरी तरह खाली होकर अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आएँ कि उसके अनुग्रह की भीख माँगें। क्योंकि हम उसकी एक बूँद भी नहीं पा सकते, जब तक यह न मानें कि हम उसके सर्वथा अयोग्य हैं।
और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिरें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक समझाए, और वही हमें ऐसा दीन करे कि हम उसके अनुग्रह में स्थिर हों और उसके और निकट आने का परिश्रम करें, कि अपने आप में पराजित होकर हम उसके द्वारा उसकी शुद्ध दया से उठाए जाएँ, और पूरी तरह उसी पर निर्भर होकर पिता के समान उसी की शरण लें, और इसी में तब तक बने रहें जब तक वह हमें पाप के बन्दीगृह से निकालकर अपने साथ पूरी तरह जोड़ न ले। वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् सब लोगों को देने की कृपा करे।
