अध्याय 12

मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ने के विषय में - गलातियों 1:6-8

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ने के विषय में - गलातियों 1:6-8

मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिरकर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं; पर बात यह है कि कितने ऐसे हैं जो तुम्हें घबरा देते और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम्हें सुनाया, कोई और सुसमाचार सुनाए, तो शापित हो। - गलातियों 1:6-8

अब हम उस विषय में और गहराई से उतरेंगे जिसे मैंने आज प्रातःकाल छुआ था। मैंने कहा था कि यद्यपि पौलुस गलातियों को नहीं छोड़ता, तो भी वह उनके लिये उद्धार का द्वार पूरी तरह बन्द कर देना नहीं चाहता। वह उन्हें मन फिराव तक पहुँचाना चाहता है, और इसी कारण वह परमेश्वर के उस अनुग्रह की चर्चा करता है जिसमें वे सब बुलाए गए थे। फिर भी वह उनकी चापलूसी नहीं करता; वरन् उनके पापों के कारण उन्हें डाँटता है। विशेषकर वह उनकी चंचलता के लिये उन्हें डाँटता है, क्योंकि उन्होंने उन छलियों की बात सुन ली थी जो उनके बीच घुस आए थे और सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा को बिगाड़ रहे थे। उन्हें उनके विश्वासघात का और अच्छी तरह बोध कराने के लिये पौलुस कहता है कि उसे आश्चर्य होता है कि उन्होंने अपनी स्वर्गीय बुलाहट को इतनी जल्दी और इतनी सरलता से छोड़ दिया। वह अचम्भा करता है कि वे इतनी शीघ्रता से कैसे भटका दिए गए, और वे उसी दशा में कैसे बने रहे, जबकि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव और स्वाद चखा था। क्योंकि वह उन्हें फिर से सुधारना चाहता है, इसलिए आरम्भ ही में यह नहीं कहता कि वे सुसमाचार से पूरी तरह फिर गए हैं, वरन् यह कि वे भरमानेवालों के द्वारा परीक्षा में पड़ गए हैं, जो परमेश्वर के सत्य को बिगाड़ने से कम कुछ नहीं चाहते थे। शुद्ध सुसमाचार एक ही है, जैसे यीशु मसीह भी एक ही है जिस पर वह स्थापित है। हमारा काम सुसमाचार को नए सिरे से गढ़ना नहीं है; वरन् यदि हम उस शुद्ध बीज में, जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से मिला है, कुछ भी जोड़ने का यत्न करें, तो हम उसी को नष्ट कर रहे हैं जिसे परमेश्वर ने स्थापित किया है। संक्षेप में, पौलुस इस प्रथम पद में हमें यही सिखा रहा है।

ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पौलुस गलातियों की दुर्बलता को डाँटने में अत्यन्त कठोर और उग्र हो रहा है, क्योंकि उन्होंने तो कभी सुसमाचार को, या उस यीशु मसीह को जिसका उन्हें प्रचार सुनाया गया था, ठुकराने की बात सोची भी न थी। परन्तु पौलुस उनके देखने के ढंग पर ध्यान नहीं देता; वह वस्तुस्थिति को वैसी ही देखता है जैसी वह वास्तव में है, अर्थात् यह कि जब लोग परमेश्वर के सत्य से फिर जाते हैं, तो वे यीशु मसीह को ठुकरा देते हैं और अपने आप को उससे काट लेते हैं। कुछ लोगों को यह अनोखा लग सकता है, क्योंकि बहुत से लोग उजियाले को अन्धकार के साथ मिलाना चाहेंगे। निश्चय ही पोप-मत में जो गड़बड़ी है वह इसका एक प्रमुख उदाहरण है। वे इस आशय के बहुत से बड़े दावे करते हैं कि वे उस मसीही विश्वास को थामे हुए हैं जिसमें उन्होंने बपतिस्मा लिया है। परन्तु इतने पर भी यह प्रकट है कि उन्होंने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है। अन्धविश्वासों का राज्य है, और वे ऐसी खुली मूर्तिपूजा करते हैं जो उससे भी बुरी है जो अन्यजातियों में भी कभी देखी गई हो। परमेश्वर के प्रति सारी श्रद्धा नष्ट हो गई है, क्योंकि हर एक अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह के स्थान पर उद्धारकर्ता ठहराता है। अब पोप के अनुयायी यह उत्तर देंगे कि वे धर्मत्यागी नहीं हैं, और उन्होंने यीशु मसीह को नहीं छोड़ा है। परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह कोई भूत-प्रेत नहीं है; वह मनुष्यों की सनक के अनुसार बदल नहीं सकता। संक्षेप में, वह अपनी कलीसिया से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए पोप के अनुयायी चाहे जो दावा करें, वे यीशु मसीह को उसके सारे अधिकार से वंचित करते हैं। 'यदि मध्यस्थ केवल एक ही है,' [वे कहते हैं], 'तो फिर हमारे संरक्षक पुरुष सन्तों और हमारी वकील स्त्री सन्तों का क्या होगा?' यदि हम उनसे उस बलिदान की बात करें जिसके द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सब विश्वासियों के लिये एक ही बार सदा के लिये पूर्ण धार्मिकता प्राप्त कर ली है, तो [वे कहेंगे], 'क्या हमें प्रतिदिन मिस्सा नहीं करनी है और परमेश्वर का क्रोध शान्त करने के लिये यीशु मसीह को फिर से बलिदान के रूप में नहीं चढ़ाना है?' यदि हम उनसे पापों की सेंतमेंत क्षमा की बात करें, तो [वे कहेंगे], 'फिर अपने पापों के लिये हमने जो प्रायश्चित्त के उपाय किए हैं, और जिनसे हमने परमेश्वर की दया कमाई है, उनका क्या?' यदि हम कहें कि हम पवित्र आत्मा के नया जन्म देनेवाले कार्य से ही भले बनाए जा सकते हैं, और जब तक परमेश्वर हमें बदल न दे तब तक हम पाप और विद्रोह से भरे हैं, तो [वे कहेंगे], 'क्या कहा? और हमारी स्वतन्त्र इच्छा का क्या?' संक्षेप में, वे यीशु मसीह का नाम तो बहुत बार लेंगे, और उसे उद्धारकर्ता की उपाधि भी देते रहेंगे, परन्तु वे उसके पद को बाँट देंगे और उसे ऐसे बिक्री के लिये रख देंगे कि हर एक मनुष्य उसमें से अपना भाग अपने लिये ले सके। वे यह भी कल्पना करते हैं कि स्वर्ग में सन्त और स्वर्गदूत उनके संरक्षक हैं, और इसलिए परमेश्वर के सामने आने के उनके पास अनगिनत उपाय हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा ही लगता है। अब हम भली-भाँति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पवित्र आत्मा के पास उन्हें धर्मत्यागी कहने का उचित कारण है; क्योंकि उन्होंने यीशु मसीह को छोड़ दिया है और अपने आप को उससे काट लिया है। वे तो उसके नाम का दुरुपयोग भी करते हैं। परन्तु यीशु मसीह कभी नहीं बदलता; हम देख चुके हैं कि पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है कि हम उसमें 'हाँ और नहीं' दोनों न पाएँगे (2 कुरिन्थियों 1:19), क्योंकि वह स्थिर रहता है। इसलिए पोप के अनुयायी मसीही धर्म के विषय में चाहे जो बकवास करें, वह केवल कोरा पाखण्ड और झूठ है। वे परमेश्वर के पुत्र के नाम का झूठे और दुष्टतापूर्ण रीति से उपयोग करते हैं, कभी मुखौटे के रूप में और कभी मूरत के रूप में।

तो पौलुस इसी कारण गलातियों पर आरोप लगाता है कि वे भटका दिए गए हैं। यदि हम पूछें कि उन्होंने क्या किया था, तो उत्तर यह है कि वे व्यवस्था की विधियों को ऐसे मानना चाहते थे मानो वे आवश्यक हों। हाँ, यह सच है कि ये विधियाँ परमेश्वर की ठहराई हुई थीं। निस्सन्देह; फिर भी वे प्राचीन लोगों के लिये एक अस्थायी दशा थीं, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने पर यह सब बन्द हो जाना था। क्योंकि गलाती लोग पुरानी प्रतिमाओं और व्यवस्था की छायाओं को सुसमाचार के शुद्ध उजियाले में मिला रहे थे, इसलिए पौलुस ने सहन न कर सकते हुए कहा कि उन्होंने विद्रोह किया है और परमेश्वर से फिर गए हैं। परन्तु इससे भी बुरी बात थी: अर्थात् वे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को बिलकुल व्यर्थ कर रहे थे, यह मानकर कि मनुष्य परमेश्वर के सामने अपनी धार्मिकता कमा और प्राप्त कर सकता है, और अपने आप को परमेश्वर की सेवा में ग्रहणयोग्य बना सकता है। जब उन छलियों ने 'पहली छायाओं' से चिपके रहने की यही विशेष भूल चलाई, तो इससे गलाती लोग यह मानने लगे कि वे परमेश्वर को योग्यता-भरी सेवा अर्पित कर रहे हैं। फिर भी हमारा उद्धार सेंतमेंत होना चाहिए, नहीं तो यीशु मसीह कुछ भी नहीं रहता। हम उसे सेंतमेंत उद्धार इसीलिये कहते हैं कि वह हमें परमेश्वर की ओर से दिया जाता है, और हम उसके पास इस रूप में आते हैं कि पोषण पाएँ, और जिस वस्तु की हमें घटी है उसकी भूखी लालसा के सिवा हमारे पास कुछ नहीं होता। यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम में धर्मी ठहराए जाना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के पास दीन भिखारियों की नाईं आना चाहिए। क्योंकि यदि हम अपने में योग्यता की एक बूँद भी मान लें, तो उसके पास आने की प्रेरणा हममें न रहेगी। प्राचीन विद्वानों में से एक ने बिना कारण नहीं कहा कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में जो उद्धार हमें दिया जाता है उसे हम तब तक ग्रहण नहीं कर सकते जब तक पहले अपनी सब योग्यताओं की स्मृति को मिटा न दें और यह न मान लें कि हम केवल दुर्दशा से भरे हैं। इसलिए पौलुस का यह कहना पूरी तरह उचित था कि गलाती लोग यीशु मसीह से और पिता परमेश्वर से गिर गए हैं।

परन्तु एक और समस्या थी: उन्हें भुलावे में डालकर वह विश्वास करा दिया गया था जो दूसरे चाहते थे कि वे करें। वे दासत्व के बन्धन के अधीन कर दिए गए थे, जिसने उनसे वह विवेक की शान्ति छीन ली जो उन्हें प्रभु यीशु मसीह में मिलनी चाहिए थी। वास्तव में उसकी बलिदानी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा जो मेल-मिलाप हमें मिला है, उसके साथ हमें व्यवस्था की कठोरताओं से भी छुड़ाया जाना आवश्यक है जिसके अधीन हम पहले बन्धन में थे। इसे समझाने के लिये (जैसा हम शीघ्र ही और स्पष्ट देखेंगे; क्योंकि यहाँ मैं इन बातों को छोड़ रहा हूँ, परन्तु हम इनके व्यापक अर्थ शीघ्र देखेंगे), तुम जानते हो कि व्यवस्था में लिखा है कि जो कोई परमेश्वर की आज्ञा को अक्षर-अक्षर पूरा नहीं करता वह शापित है (व्यवस्थाविवरण 27:26)। फिर भी हमारे लिये ऐसी सिद्धता तक पहुँचना असम्भव है। इसलिए आवश्यक था कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी स्वतन्त्रता प्राप्त करे और हमें व्यवस्था के उस जूए से छुड़ाए जिसे हम उठा नहीं सकते, जैसा प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय में लिखा है (प्रेरितों के काम 15:10)।

अब हमने वास्तव में देख लिया कि पौलुस गलातियों पर विद्रोह का आरोप क्यों लगाता है, और उन्हें परमेश्वर का और हमारे प्रभु यीशु मसीह का विश्वासघाती क्यों कहता है: उन्होंने उससे वह निष्ठा छीन ली थी जिसकी उन्होंने प्रतिज्ञा की थी। इससे हमें भी चेतावनी मिलती है कि हम सुसमाचार की शुद्ध और सीधी शिक्षा पर बने रहें, और इधर-उधर न भटकें। क्योंकि मसीही नाम और उपाधि का होना, या बपतिस्मे का चिह्न धारण करना ही पर्याप्त नहीं है: हमें सुसमाचार की शिक्षा में दृढ़ बने रहना है। जैसा हम पहले कह चुके हैं, हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने आप का इनकार नहीं कर सकता। उसे केवल उसी रीति से जाना जा सकता है जिस रीति से पिता परमेश्वर ने उसे हम पर प्रकट किया है; उसके विषय में हमारी अपनी अनेक धारणाओं का कोई महत्त्व नहीं। सुसमाचार हमें दिखाता है कि वह क्यों आया, उसका पद क्या है, हम उससे कौन से लाभ पाते हैं और वह हमें कौन सा बल देता है। यदि हमारे पास वह शुद्ध और सीधी शिक्षा नहीं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने प्रकट की है, तो हमारे पास कुछ भी नहीं; परन्तु यदि हमें वह सिखाई गई है, तो आओ उसे अन्त तक थामे रहें। यदि हम थोड़ा सा भी पीछे हटें, तो वह विश्वासघात से कम नहीं। वास्तव में हमें वह भयानक पतन स्मरण रखना चाहिए, जिसमें हम औरों के साथ गिरे और शैतान की इतनी भूलों, झूठों और छलों में उलझ गए कि यीशु मसीह हमारे लिये बिलकुल अज्ञात हो गया था। अब जब परमेश्वर ने अपनी भलाई से हमें ऐसे गड्ढे से निकाल लिया है, तो आओ हम दृढ़ और स्थिर विश्वास रखने का निश्चय करें, कि हम फिर हवा से हिलते सरकण्डों की नाईं न डोलें। आओ हम सुसमाचार में दृढ़ता से जड़ पकड़े रहें, और अपने प्रभु यीशु मसीह की अजेय सामर्थ्य पर स्थिर रहें। उसमें परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ 'हाँ और आमीन' हैं (2 कुरिन्थियों 1:20); उनकी सच्चाई और उनकी पूर्ति उसी में है। इसलिए हमारा विश्वास इन बातों पर दृढ़ता से टिका रहे। इस अंश में पौलुस की शिक्षा से हमें यही अपने मन में रखना है।

गलातियों को और अधिक लज्जित करने के लिये वह उनसे अनुग्रह की बुलाहट की बात करता है। 'जिसने तुम्हें बुलाया' इन शब्दों को हम जितना यीशु मसीह से जोड़ सकते हैं उतना ही पिता परमेश्वर से, क्योंकि इसमें कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। फिर भी हम समझ सकते हैं कि पौलुस क्या कह रहा है। वह गलातियों को उनके नीच आचरण के लिये दोषी ठहरा रहा है; क्योंकि भटक जाने के लिये उनके पास और भी कम बहाना था, जबकि उन्होंने परमेश्वर की भलाई का अनुभव किया था। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें बुलाता है, चाहे वह हमें लज्जित करने के लिये ही बुलाए, तो भी हम उसकी सृष्टि हैं, और इसलिए उसके प्रति आज्ञाकारिता के ऋणी हैं। हमें सदा उसके अधिकार के अधीन रहना चाहिए, चाहे वह हमारे साथ जैसा भी करना ठहराए। हमारा कर्तव्य है कि उससे कहें: 'मैं उपस्थित हूँ। तू मुझसे क्या चाहता है?' परन्तु यदि हम परमेश्वर के बुलाने पर बहाने बनाएँ, तो हम बातों के उचित क्रम को बिगाड़ रहे हैं। परन्तु परमेश्वर केवल हमें अपने पास नहीं बुलाता, वह हमें अपनी भलाई के सब भण्डार हमारे प्रभु यीशु मसीह में दे देता है। वह अपने आप को स्वेच्छा से हमें देता है, और हमसे केवल यही माँगता है कि हम उसके अपने हों। जब परमेश्वर हमारे साथ ऐसी कृपा का व्यवहार करता है, और अपने प्रति आश्चर्य से हमारी सारी शक्तियों को मोह लेता है, तो इससे हमें पीछे हटने के लिये अत्यन्त अनिच्छुक होना चाहिए। तथापि यदि उसके पास आ जाने के बाद भी हम इधर-उधर भटकें, तो हमारे पास बहुत कम बहाना होगा, और इसलिए हमें कहीं अधिक कठोर और भयानक दण्ड भोगना होगा, जैसा मैं पहले संकेत कर चुका हूँ।

अब हम देखते हैं कि पौलुस उस अनुग्रह का उल्लेख क्यों करता है जिसमें गलाती बुलाए गए थे। वास्तव में यदि हम सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा में बने न रहें, और उससे न डिगें, तो आज हम व्यवस्था के अधीन अपने पूर्वजों से अधिक दोषी हैं। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने हमारे पूर्वजों को व्यवस्था के अधीन उद्धार की ओर चलाया, फिर भी वह बुलाहट अपनी दया के धन के ऐसे खुले और भरपूर प्रकाशनों के साथ न थी जैसे अब हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमारे पास हैं। आओ हम अपने आप को जाँचें। यदि परमेश्वर ने हम पर अपना अनुग्रह पहले ही प्रकट कर दिया है, तो यह हमें और भी अधिक साहस और अजेय बल के लिये उभारे और प्रोत्साहित करे, कि हम अपनी बुलाहट में तब तक बने रहें जब तक उस स्थान तक न पहुँचें जहाँ वह हमें बुला रहा है। जब हम अपनी तुलना दुखी, अज्ञानी अविश्वासियों से करते हैं, तो हमारी कृतघ्नता और भी प्रकट होती है, क्योंकि हम पर और भरपूर तथा उत्तम अनुग्रह दिखाया गया है। हम जानते हैं कि बहुत से बेचारे प्राणी दूर-दूर भटकते हैं। तो भी वे दण्ड के अधीन हैं: 'क्योंकि जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नष्ट भी होंगे' (रोमियों 2:12)। अब जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, परमेश्वर ने अपनी इच्छा हमें ऐसे परिचित शब्दों में बताई है, और हमें सुसमाचार की शिक्षाओं को सीखने का अवसर दिया है (यदि हम उनमें मन लगाएँ); इसलिए यदि हम अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित करने का हर प्रयत्न न करें, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, तो हमारा दण्ड उनसे भी बड़ा होगा। इससे हमारा उत्तरदायित्व और भी बढ़ जाता है।

पौलुस यहाँ एक और बात जोड़ता है: कि यह सब इतनी जल्दी हो गया। वास्तव में यह भयानक है कि गलाती, जिन्हें प्रेरित के मुँह से सिखाया गया था, उसके जीवनकाल ही में अपने आप को अशुद्ध कर बैठे। इससे वे और भी अधिक दोषी ठहरते हैं, क्योंकि सुसमाचार पाने के केवल तीन दिन बाद [मानो], उन्होंने झूठी शिक्षाओं को परमेश्वर के सत्य में मिलाकर उसे छोड़ दिया। यदि वे पौलुस की मृत्यु के बहुत समय बाद तक विश्वास पर बने रहते, तो भी यह नहीं निकलता कि यदि वे बाद में गिर जाते तो परमेश्वर की दृष्टि में उनका बहाना सुना जाता। क्योंकि जैसे वह सत्य जिस पर हमारा विश्वास स्थापित है सदा बना रहनेवाला है, चाहे आकाश और पृथ्वी जाते रहें, वैसे ही हमारा विश्वास भी अन्त तक बना रहना चाहिए (लूका 21:33)। हमारा विश्वास मनुष्यों के जीवन या मृत्यु पर निर्भर न हो; वह स्वर्ग में लंगर डाले हुए हो। इसलिए यदि हम एक दिन से दूसरे दिन बदल जाएँ, तो हमें और अधिक उत्तर देना होगा, और हमारी कृतघ्नता और भी प्रकट होगी। वस्तुतः पौलुस यहाँ गलातियों के विषय में जो कहता है, वह आज बहुत अधिक दिखाई देता है। जिन्हें सुसमाचार सिखाया गया है, वे तीन वर्ष [या उसके लगभग] के बाद असन्तुष्ट हो जाते हैं यदि उन्हें कोई न कोई नई बात न मिले, क्योंकि उनके कान 'खुजलाते' हैं। बहुत से व्यर्थ लोग पीछे हट जाते हैं क्योंकि वे सुसमाचार के सत्य से सन्तुष्ट नहीं होते। वे सदा मानो घर बदलते रहना चाहते हैं, क्योंकि अपनी मूर्ख कल्पनाओं को खिलाने के लिये उन्हें कोई नई वस्तु चाहिए। कुछ और लोग तब असन्तुष्ट हो जाते हैं जब देखते हैं कि सुसमाचार से उन्हें इस संसार की कोई भलाई नहीं मिली। कुछ तो ऐसे भी हैं जो यह जानकर फिर जाते हैं कि उन्हें सताया जा सकता है और उनके बहुत से शत्रु होंगे। उन्हें दुःख उठाना होगा जबकि दूसरे फलते-फूलते हैं (या ऐसा वे सोचते हैं)। इस प्रकार तुम देख सकते हो कि कितने लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह को छोड़ देते हैं, न केवल जब एक पीढ़ी के बाद दूसरी आती है, वरन् तब भी जब जो उसके अनुयायी दिखाई देते हैं वे तीन, या शायद दस वर्ष के बाद फिरकर विद्रोह कर बैठते हैं।

तो हमें इस शिक्षा को कितनी दृढ़ता से थामे रहना चाहिए, क्योंकि यह हम पर लागू होती है। आओ हम उस शिकायत पर विचार करें जो यिर्मयाह को यहूदियों के विरुद्ध थी। वह मानो कहता है, 'दूर देशों में जाओ, द्वीपों तक दौड़ जाओ, देखो कि और लोग क्या करते हैं। हर एक अपनी मूरतों से लगा रहता है,' और आगे कहता है, 'जो ईश्वर हैं ही नहीं' (यिर्मयाह 2:10-11)। शैतान ने इसे उपासना कहकर उन्हें धोखा दिया था, और वे अपनी रीतियों में ऐसे जमे थे कि हिलाए न जा सकते थे। (मुझे आशा है कि तुम उनके समान ही दृढ़ हो, क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को तुम पर प्रकट किया है, और तुम्हें उसकी इच्छा का पूरा और निश्चित ज्ञान है।) तो भी आजकल हमारे विषय में भी वही कहा जा सकता है: क्योंकि हमने देखा है कि तुर्क [यहाँ मुसलमानों को "तुर्क" कहा गया है - सम्पादक] कितने अटल हैं! और यद्यपि बेचारे यहूदी अशुद्ध कुत्तों से बढ़कर नहीं हैं, फिर भी वे अपनी व्यवस्था के अधिकार को बनाए रखने में बहुत हठी हैं। जहाँ तक पोप के अनुयायियों का सम्बन्ध है, उनकी मूर्खता इतनी प्रकट है कि वे घिनौने लगते हैं; बच्चे भी उन्हें परख सकते हैं। फिर भी इस सब के बावजूद वे अपनी निन्दनीय प्रथाओं को बनाए रखने के लिये ऐसे पागल उत्साह से जलते हैं। जहाँ तक हमारा प्रश्न है, ज्योंही शैतान अपनी उँगली से इशारा करता है, हम बहका लिये जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो हममें से हर एक इस ताक में है कि कुछ नया मिले; ज़रा सी बात हमें तुरन्त कमज़ोर करके भटका देती है। यहाँ इतना पाप है कि आगे जाने की आवश्यकता नहीं। इसलिए हमें उस आरोप पर ध्यान देना चाहिए जो यहाँ पौलुस के मुँह से उन लोगों की चंचलता के विरुद्ध लगाया गया है जो परमेश्वर से फिर जाते हैं, जबकि उसने उन्हें अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में बुलाया ही अभी था।

इस स्थान पर पौलुस कहता है कि इस सब के पीछे कारण यह है कि 'कितने ऐसे हैं जो तुम्हें घबरा देते हैं और हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं।' यहाँ पौलुस यह प्रतिपादित करता है कि जो कुछ हम सुसमाचार में जोड़ें वह केवल धुआँ है। अन्त में हम पाएँगे कि यह शैतान ही है जिसने ऐसी निरर्थक बात इसलिए रची कि उन अभागे मूर्खों को धोखा दे जो परमेश्वर के सत्य पर बिलकुल टिक नहीं पाते। वह कहता है, 'यह और कुछ नहीं, केवल कुछ लोग तुम्हें घबरा रहे हैं।' यह सच है कि 'और कुछ नहीं' यह अभिव्यक्ति [1611 का प्रामाणिक संस्करण इसे 'दूसरा [सुसमाचार] है ही नहीं' अनूदित करता है, इस प्रकार वह उस दृष्टिकोण से भिन्न दृष्टिकोण झलकाता है जो कालविन के फ्रांसीसी अनुवाद में दिया गया है। - अनु.] यह जताती प्रतीत होती है कि पूरा मामला महत्त्वहीन है। परन्तु पौलुस यह कह रहा है कि गलातियों का यरूशलेम और यहूदिया से आए उन लोगों से घबरा जाना ग़लत था, जिन्होंने उनसे कहा कि उन्हें व्यवस्था को सुसमाचार से अलग नहीं करना चाहिए। वह कहता है, 'नहीं, नहीं, यीशु मसीह केवल एक ही है। केवल एक ही शिक्षा है जो हमें उस तक ले जाएगी और हमें विश्वास देगी, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकते हैं। यदि हम सुसमाचार का शुद्ध ज्ञान रखना और बनाए रखना चाहते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि सिद्धता यहीं पाई जाती है; जो इससे आगे जाते हैं वे केवल उपद्रवी हैं जो सब कुछ उलट-पुलट कर देते हैं।' यह पाठ भली-भाँति ध्यान देने योग्य है। हम इससे सीखते हैं कि यदि हमारे प्रभु ने हमें अपने विद्यालय में सिखाए जाने का सौभाग्य दिया है, तो अब हमारा विश्वास निर्बल नहीं होना चाहिए कि इधर-उधर उड़ाया जा सके। हममें दृढ़ संकल्प होना चाहिए, कि हम कह सकें, 'यही वह विश्वास है जिससे हम जीएँगे और मरेंगे।' हमें बहुत से ऐसे लोग मिलते हैं जो सुसमाचार की शिक्षा का खुला विरोध नहीं करते, और हमें प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का प्रचार करने भी देते हैं। वास्तव में यदि हम ऐसे लोगों से पूछें कि सुसमाचार में उन्हें किस बात से असहमति है, तो [उनका उत्तर होगा] 'किसी से नहीं!' परन्तु फिर, यदि वे विकृत मूर्तियों से सजी वेदी देखें, तो निश्चय ही वे वहाँ उमड़ पड़ेंगे! वे जाकर मिस्सा सुनेंगे और पोप के अनुयायियों की सब अन्य अति की बातें करेंगे; उनके लिये सब एक ही है। और यदि यह सब उनके सामने भूल के रूप में रखा जाए, तो भी उन्हें कोई अन्तर दिखाई नहीं देता। भली-भाँति ध्यान दो — ऐसा नीच आचरण प्रकट करता है कि उनमें विश्वास नहीं है। कैसे? हम यह इस प्रकार जान सकते हैं, वरन् अनुभव भी कर सकते हैं, कि हम स्वयं विश्वासी हैं या नहीं: जब हममें सुसमाचार के विषय में विवेक होता है, और हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह परमेश्वर का अचूक सत्य है, और कि यदि हम उसका अनुसरण करें तो वह हमें भटका नहीं सकता। परन्तु पोप के अनुयायियों ने एक विश्वास गढ़ लिया है (जैसा वे उसे कहते हैं) जो ढका हुआ है; यह उन्हें खूब भाता है (यद्यपि बेचारे कुछ नहीं जानते), जब तक वे कहते रहें, 'मैं अपनी पवित्र माता कलीसिया पर भरोसा रखता हूँ; जो वह मानती है मैं वही थामे हूँ।' ये लोग खुले रूप से दिखाते हैं कि उनमें कोई विश्वास नहीं है, और वे नहीं जानते कि उद्धार कैसे पाया जाए। लिखा है कि हम धर्मी ठहराए जाना और उद्धार केवल विश्वास ही से पा सकते हैं, जब हम यीशु मसीह को सब आशीषें पहुँचानेवाले के रूप में ग्रहण करते हैं। इसलिए यदि प्रभु यीशु मसीह अज्ञात है, तो विश्वास हो ही नहीं सकता। पोप-मत के अगुवे और शिक्षक शैतान के एक अत्यन्त भयानक धोखे से मोहित होकर वैसा बोलते हैं जैसा वे बोलते हैं, जो हमें प्रमाणित करता है कि उन्हें परमेश्वर का ज्ञान नहीं है; वरन् वे निकम्मों के मार्ग पर चल रहे हैं।

तो आओ हम ध्यान दें कि जब पौलुस हमें बताता है कि कोई दूसरा सुसमाचार नहीं है, तो वह चाहता है कि हम प्रभु यीशु मसीह में बने रहें और उसके प्रति विश्वासयोग्य रहें, अब जबकि हम जान गए हैं कि सुसमाचार उसी की ओर से आया है, और जो कुछ उसकी शिक्षा के विपरीत है उसे ठुकरा दें। यदि हममें ऐसी परिपक्वता है, तो हम शैतान से लड़ने और संसार में आज की सब अनेक मतों का सामना करने के लिये सुसज्जित होंगे। हम कभी न हिलेंगे, चाहे हम पर कैसी भी विपत्तियाँ आएँ; न हमें कभी विश्वास के पूर्ण भरोसे की घटी होगी। परन्तु यदि हम डगमगाएँ, तो हम ठीक छोटे बच्चों के समान होंगे: यदि उन्हें एक हाथ में सेब दिया जाए, तो निश्चय वे उसकी ओर दौड़ेंगे। फिर यदि दूसरे हाथ में कोई और अच्छी वस्तु दी जाए, तो वे उसी प्रकार उसकी ओर हाथ बढ़ाएँगे! पहली वस्तु को छोड़कर वे दूसरी के पास जुट जाएँगे। यदि, मैं कहता हूँ, हम इतने ही चंचल हैं, तो यह निश्चित चिह्न है कि हम बिलकुल विश्वासहीन हैं। इसलिए जान लो कि हमारे विश्वास और सुसमाचार में सामंजस्य होना अवश्य है। अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप देने पर हम कभी न फिरेंगे, क्योंकि हम अपना विश्वास उसी पर टिकाते हैं जो उसमें निहित है, जैसा हम पहले कह चुके हैं। ऐसा नहीं कि हम सब एक समान ज्ञानी हो सकते हैं; क्योंकि यह निश्चित है कि जो प्रभु यीशु मसीह के झुण्ड में हैं उनमें से अधिकांश पवित्रशास्त्र का दसवाँ भाग भी नहीं समझते!

तो भी, और जो कुछ हम न जानें, हममें ये विश्वास सामान्य रूप से होने चाहिए: कि (1) एक ही परमेश्वर पिता है, जिस पर हम सब विश्वास करते हैं, जिसने अपनी निरी दया से हमें गोद लिया है। (2) यीशु मसीह केवल एक ही है, जिसके द्वारा सब आशीषें हमें दी जाती हैं। (3) हम पवित्र आत्मा के द्वारा नया जन्म पाए हुए बनाए जाते हैं।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में हमें यह भी जानना चाहिए कि वह हमारा सहायक है, और उसके बिना हम परमेश्वर के निकट नहीं आ सकते। हम 'हे हमारे पिता' कहने का साहस न करते जब तक हम प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग न होते — जब तक वह हमारा बिनती करनेवाला और मित्र बनकर हमारी ओर से न बोलता, और मानो हाथ पकड़कर हमें पिता परमेश्वर के पास न पहुँचाता। यदि हम इन बातों को नहीं जानते, तो हम उद्धार नहीं पा सकते। पौलुस गलातियों पर आरोप लगाता है कि वे यह न पहचान सके कि सुसमाचार केवल एक ही है, जिसे बदला नहीं जा सकता। वह नहीं चाहता कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह को शोकित करें, जिसकी अकेले सुननी चाहिए। वह हमें भरमानेवालों से भी चेतावनी देता है, जो हमें परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार की शुद्ध सरलता से फेरना चाहते हैं। वह हमें सिखाता है कि उन्हें घृणित जानें, क्योंकि (जैसा हम शीघ्र ही और स्पष्ट देखेंगे) वे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ते हैं। कितनी भयानक बात है कि सुसमाचार, जो हमारे उद्धार की नींव और स्वर्ग के द्वार खोलनेवाली कुंजी है, बिगाड़ा जाए! वही हमारा एकमात्र धन है। हम स्वर्ग के राज्य से निकाले गए थे और उसके निकट नहीं आ सकते थे, जब तक परमेश्वर ने सुसमाचार के द्वारा यह मार्ग न बनाया कि हम उसकी प्रजा हों और वह हमारा राजा हो, ताकि हम उसके अधिकार से चलाए और शासित किए जाएँ। सुसमाचार में अनमोल निधियाँ समाई हैं। परमेश्वर का मनुष्य के साथ मेल हो गया है; स्वर्ग के द्वार हमारे लिये खोल दिए गए हैं; हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें हमारे निज भाग के रूप में दिया गया है; हम उन सब अच्छी वस्तुओं के सहभागी बनाए गए हैं जो उसने हम पर उँडेली हैं; और हमें अपने अनन्त उद्धार का निश्चय दिलाया गया है। यह अच्छा होगा कि सारा संसार नष्ट होकर मिट जाए, परन्तु यह सुसमाचार बिगाड़ा न जाए। जो लोग हमें इतनी विश्वासयोग्यता से सिखाए जाने के बाद हमें घबराने आते हैं, और जो हमारे पास छोटी-छोटी नई बातें लाते हैं और यहाँ-वहाँ अपनी गढ़ी हुई बातें मिलाते हैं, उन सब के विषय में पौलुस यही कहता है — ये लोग मनुष्यों को परमेश्वर के राज्य से और उसके राजसिंहासन से फेरते हैं, कि वे अब उसके शासन में न रहें, और इस प्रकार प्रभु यीशु मसीह का राजदण्ड उनके उद्धार के लिये उनकी ओर बढ़ाया नहीं जाता। यदि परमेश्वर की महिमा और हमारा अपना उद्धार हमें उतना प्रिय है जितना होना चाहिए, और यदि स्वर्ग की सब आशीषों में सहभागी होना हमें अनमोल है, तो जब भी ऐसे दुष्ट लोग हमारे पास आएँ और परमेश्वर की महिमा, प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह, वरन् हमारे उद्धार को भी घटाने का यत्न करें, तो क्या हमें उनसे वैसे ही दूर न रहना और उन्हें वैसे ही निकाल न देना चाहिए जैसे संसार की सबसे घातक महामारी को? संक्षेप में, हमें यही करना है: हमें प्रबल स्नेह से सुसमाचार से चिपके रहना है, और किसी को भी उसे किसी रीति से बिगाड़ने न देना है। हमें किसी को यह दावा करके कि वह हमारे लिये कोई और दृष्टिकोण ला रहा है, हमारे मन उलझाने न देना है। चाहे हमसे बोलनेवाले लोगों में बड़ा ज्ञान हो, और वे कुशल, तीक्ष्ण बुद्धि और अत्यन्त वाक्पटु हों, तो भी हमें उन्हें घृणित जानकर ठुकरा देना है, क्योंकि वे हमें सुसमाचार की शुद्धता से खींचने आए हैं। पौलुस हमें यहाँ यही सिखा रहा है।

यह कहने के बाद पौलुस आगे जोड़ता है कि यदि वह स्वयं, या कोई स्वर्गदूत, उस सुसमाचार से भिन्न कोई सुसमाचार सुनाने आए जो गलाती पहले सुन चुके थे, तो वे उन्हें ठुकरा दें। उनके साथ शापित लोगों और शैतानों जैसा व्यवहार किया जाए, और उन्हें बहिष्कृत किया जाए। हम यहाँ देखते हैं कि पौलुस (एक प्रकार से) उत्तेजित हो जाता है, क्योंकि वह विश्वास में स्थिरता को बढ़ावा देना चाहता है कि हम हिलाए न जाएँ। फिर भी वह यह बिना उचित कारण के नहीं करता। क्योंकि हम जानते हैं कि हम कितने नाजुक हैं, और केवल नाजुक ही नहीं, वरन् इससे भी बुरे, हम व्यर्थ और विद्रोही हैं। जब हमें पहले-पहल परमेश्वर के वचन से सिखाया जाता है, तो यदि हम सचमुच प्रभावित न हों, तो हमें वह संसार की सबसे अनोखी पुस्तक लगती है; क्योंकि सुसमाचार की शिक्षा मानव मन के लिये सदा मूर्खता है, जैसा हम पहले अवसरों पर देख चुके हैं (1 कुरिन्थियों 2:14)। और इसका कारण? क्योंकि हम व्यर्थ हैं: हमारे हृदय भटक गए और बहक गए हैं, हमारा स्वभाव झूठ की ओर झुकता और प्रवृत्त होता है, और हम लगभग जान-बूझकर धोखा खाना चाहते हैं। क्योंकि हमारे मन इस प्रकार बिगड़े हुए हैं, इसलिए यदि हम परमेश्वर का वचन नहीं चाहते और वह हममें रच-बस नहीं जाता तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारी एकमात्र गतिविधि परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना है। यद्यपि हम समझते हैं कि हम ठीक कर रहे हैं, वास्तव में हम अन्धे हैं। संक्षेप में, पवित्रशास्त्र बिना कारण नहीं कहता कि सब मनुष्य 'व्यर्थ और झूठ' हैं (भजन संहिता 4:2)। हम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह में हैं, और जब वह हमें बुलाता है तो विपरीत दिशा में खिंचते हैं। परमेश्वर ने हमें यह सौभाग्य दिया है कि हम अपनी ओर खिंचे जाएँ, और यह पहचानें कि उसका सत्य ही है जिसे हमें थामना है। उसने हमें ऐसा वश में किया है कि हम अब छल से भरे नहीं रहे, वरन् पूरी तरह उसके अधीन होने को तैयार हैं। फिर भी शैतान हमें किसी भी क्षण भटका सकता है, क्योंकि हम इतने नाजुक और चंचल हैं! हमने यह उनके साथ होते देखा है जो मानो पवित्रता के प्रतिबिम्ब थे। हमें यह देखकर धक्का लगा है कि वे इतनी जल्दी बदल गए और सीधे मार्ग से भटक गए। इसका कारण क्या है? जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जब हम अच्छी दशा में भी हों, तब भी हम उस दशा में अधिक देर नहीं रह सकते और विपरीत दिशा में चल पड़ते हैं; अर्थात् जब तक परमेश्वर हममें कार्य न करे और हमारी दुर्बलता में हमें दृढ़ न करे।

इसी कारण पौलुस सुसमाचार की शिक्षा को ऐसे बलपूर्वक थामता है (इसका अवसर उसे गलातियों ने दिया, जो इसलिए भटक गए थे कि उन्हें व्यवस्था की विधियाँ मानना सिखाया गया था)। मनुष्य की बड़ी दुर्बलता और चंचलता का ऐसा उदाहरण और ऐसा चित्र देखकर पौलुस कहता है कि सुसमाचार का सत्य उस सब से ऊपर होना चाहिए जो हम गढ़ सकते हैं। वह यह भी जताता है कि हमें मनुष्यों के ज्ञान, कौशल या वाक्पटुता से धोखा न खाना चाहिए, क्योंकि यदि स्वर्ग के स्वर्गदूत भी हमारी पंक्तियों में आ जाएँ, तो भी हमें उन्हें शैतान ही गिनना चाहिए। परन्तु यह बात, और सब को छोड़ भी दें, तो बहुत अनोखी लगी होगी। क्या! स्वर्ग के स्वर्गदूत! परन्तु वह और किस ओर संकेत करता है? अपने ही प्रचार की ओर। वह केवल मसीह के सुसमाचार की बात नहीं करता, वरन् उस सुसमाचार की जो उसने उन्हें सुनाया था। और क्या वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों से बढ़कर हो सकता है? तो पहली बात, हम देखते हैं कि सुसमाचार की सामान्य और अस्पष्ट रूप से प्रशंसा करना कुछ भी नहीं; तुम्हें उसकी शिक्षा जाननी चाहिए। आखिरकार बहुत से लोग पोप के अनुयायियों की मूर्खता का उपहास करेंगे, परन्तु यदि तुम उनसे वे आरम्भिक बातें पूछो, जो नन्हे बच्चे भी भली-भाँति जानते हैं, तो वे नहीं जानते। यदि कोई एक बात कहे और दूसरा कुछ और कहे, तो उनके लिये सब एक ही बात है। कोई अन्तर नहीं; मानो वे किसी विधि में नमक, पानी, राई और कड़वा रस सब एक साथ फेंक रहे हों! वे सामान्य शब्दों में प्रायः कहेंगे कि हमें सुसमाचार का प्रचार कैसे करना चाहिए, और फिर भी वे नहीं जानते कि वह है क्या! ऐसे पाप को सुधारने के लिये पौलुस उस सुसमाचार की बात करता है जो उसने उन्हें सुनाया था। इससे (जैसा मैंने कहा) वह हमें दिखाता है कि हमें उस शिक्षा का सार जानना चाहिए जो परमेश्वर के नाम से हमारे पास लाई जाती है, ताकि हमारा विश्वास पूरी तरह उस पर स्थापित हो सके। तब हम हर बयार से इधर-उधर न उछाले जाएँगे, न दिशाहीन भटकेंगे, दिन में सौ बार अपने विचार बदलते हुए; हम अन्त तक इसी शिक्षा में बने रहेंगे। संक्षेप में, हमें यही स्मरण रखना है।

क्योंकि पौलुस अपनी शिक्षा के पक्ष में इतने साहसी शब्दों में बोलता है, इसलिए यह हमारे लिये उसे और भी सच्ची बना देना चाहिए। वह मानवीय घमण्ड या धृष्टता से नहीं, वरन् परमेश्वर के नाम से बोलता है। वास्तव में यहाँ अपने विषय में डींग मारने का कोई प्रश्न नहीं; वह यह 'यदि मैं' कहकर प्रमाणित करता है। वह अपने आप को पहले रखता है, मानो कह रहा हो: 'मैं स्वयं भी, यदि अपनी शिक्षा बदल दूँ, या तुम पाओ कि मैं किसी रीति से डिग गया हूँ, तो मुझे शैतान ही समझा जाए।' यहाँ पौलुस दिखा रहा है कि वह अपने लिये ख्याति पाना नहीं चाहता था, और न अपने पक्ष के लिये लड़ रहा था कि लोग कहें कि वह कितना बुद्धिमान, ज्ञानी और गुणी है। नहीं; वह अपने आप को सब विश्वासियों के स्तर पर रखता है और कहता है: 'आओ हम सब अपने स्वामी की पूरी शिक्षा को अपनाएँ, जो परमेश्वर ने हमें सौंपी है, और जिसके अधीन हमें अपना आचरण करना है। क्योंकि यद्यपि मैंने तुम्हें यह शिक्षा दी है, तो भी वह मेरी नहीं, वरन् परमेश्वर की है, जो कभी नहीं बदलता। यदि मैं बदल जाऊँ, तो न हिल जाना, और न इस पर चकित होना, वरन् मुझे शैतान जानना, मुझे शापित गिनना। तुम स्वयं उस सत्य में स्थापित रहो जिसे तुम सदा से जानते आए हो। मैं चाहूँगा कि तुम मुझे शापित और घृणित देखो, और स्वर्ग के स्वर्गदूतों को भी, परन्तु यह नहीं कि तुम परमेश्वर के पुत्र के विषय के सत्य को छोड़ दो और उससे फिर जाओ।' इससे हम देख सकते हैं कि पौलुस क्या चाहता था: कि परमेश्वर के सत्य का मनुष्यों के बीच वैसा ही आदर हो जैसा उसके योग्य है, और उसकी ऐसी प्रतिष्ठा हो कि हमारी सब इन्द्रियाँ, विचार, इच्छाएँ और भावनाएँ उसके अधीन करके बन्दी बनाई जाएँ। किसी भी जीवित प्राणी के लिये सुसमाचार में कुछ भी बदलना उचित नहीं, क्योंकि परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के मुख से बोल चुका है। वही सचमुच हमारा स्वामी हो, और हममें से हर एक बिना प्रश्न किए उसकी आज्ञा माने। पौलुस यही चाहता था। परन्तु क्योंकि अब हम शेष पर टीका-टिप्पणी पूरी नहीं कर सकते, इसलिए वह परमेश्वर की भली इच्छा से अगले रविवार के लिये रखा जाएगा।

अब आओ हम अपने महान परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने दोषों को मानते हुए, और यह प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका और भी अधिक बोध कराए। यह हमें सच्चे मन फिराव तक पहुँचाए, और हमें विश्वास में बढ़ाए और उन्नत करे, उसके लिये सच्चे बलिदानों के रूप में। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे छुटकारे के लिये अपने आप को दे दिया, इसलिए आओ हम भी अपने आप को पूरी तरह उसे समर्पित करने का यत्न करें। हम उसके द्वारा अन्त तक डटे रहने के लिये चलाए जाएँ, कि जीवन और मृत्यु दोनों में हम उसकी भली इच्छा के आगे झुक जाने के सिवा कोई और सन्तोष या विश्राम न खोजें। हम उस उद्धार के सिवा, जो उसने हमारे लिये मोल लिया है, किसी बात पर घमण्ड न करें। यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी की सब जातियों और राष्ट्रों को भी दिया जाए, इत्यादि।

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