अध्याय 35

वचन का शुद्ध प्रचार - 2 तीमुथियुस 2:16-18

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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वचन का शुद्ध प्रचार - 2 तीमुथियुस 2:16-18

पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह, क्योंकि ऐसे लोग और भी अधिक अभक्ति में बढ़ते जाएँगे। और उनकी बात सड़े घाव की नाईं फैलती जाएगी: हुमिनयुस और फिलेतुस उन्हीं में से हैं, जो यह कहकर कि पुनरुत्थान हो चुका है, सत्य से भटक गए हैं, और कितनों के विश्वास को उलट-पलट कर देते हैं। - 2 तीमुथियुस 2:16-18

हम पहले ही दिखा चुके हैं कि सन्त पौलुस ने बिना कारण नहीं, वरन् बड़े यत्न से तीमुथियुस को उभारा कि वह परमेश्वर के वचन की शुद्ध सरलता का अनुसरण करे और उसे किसी आवरण से न ढाँके। जो शिक्षा परमेश्वर के नाम से हमारे सम्मुख रखी जाती है कि वह हमारे प्राणों का आहार बने, उसे शैतान, यदि उसके वश में हो, तो बिगाड़ डालेगा; और जब वह उसे नष्ट नहीं कर पाता, तब उसमें अन्य बातें मिला देता है, ताकि उसे तुच्छ ठहराए और परमेश्वर की इच्छा के हमारे ज्ञान को मिटा दे। आज बहुत-से लोग शिक्षक बनकर आगे बढ़ आते हैं; इसका कारण क्या है? महत्त्वाकांक्षा उन्हें बहा ले जाती है; वे परमेश्वर के वचन को आवरण पहनाते हैं, और इस प्रकार शैतान हमें आत्मिक जीवन से वंचित करने का प्रयत्न करता है।

परन्तु वह इसे सिद्ध नहीं कर सकता, जब तक किसी न किसी रीति से परमेश्वर की शिक्षा को बिगाड़ न दे। सन्त पौलुस अपनी उस चेतावनी को दोहराता है कि हमें सब निरर्थक बकवाद से बचना और सीधी, प्रभावशाली शिक्षा पर ठहरे रहना चाहिए। वह केवल प्रकट भूलों, अन्धविश्वास और झूठ की ही निन्दा नहीं करता, वरन् परमेश्वर के वचन को आवरण पहनाने की भी निन्दा करता है: जैसे जब मनुष्य लोगों के कान भरने के लिए चतुराई की बातें गढ़ते हैं, जिनसे प्राण को कोई सच्चा पोषण नहीं मिलता, और न सुननेवालों की विश्वास में उन्नति होती और न परमेश्वर के भय में।

जब सन्त पौलुस बकवाद की बात कहता है, तो उसका अर्थ वह है जो जिज्ञासु मनुष्यों को सन्तुष्ट करता है; जैसा कि हम बहुतों को देखते हैं जो व्यर्थ के प्रश्नों में बड़ा आनन्द लेते हैं, जिनसे वे मानो मोहित हो जाते हैं। वे खुलकर सत्य के विरुद्ध नहीं बोलते, परन्तु उसे बहुत साधारण और तुच्छ वस्तु जानकर, बच्चों और मूर्खों की वस्तु जानकर, तिरस्कार करते हैं; और स्वयं किसी ऊँची और गहरी बात को जानना चाहते हैं। इस प्रकार वे उसी बात से विरोध रखते हैं जो उनके लिए लाभदायक होती। इसलिए आओ, हम सन्त पौलुस के शब्दों को भली-भाँति तौलें: बकवाद; मानो वह कहता है कि यदि बोलनेवाले की साख जमाने और यह दिखाने के लिए कि वह बड़ा विद्वान है, केवल सुन्दर भाषण-कला और चुने हुए शब्द ही हों, तो इनमें से कुछ भी कलीसिया में ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए; सब कुछ निकाल बाहर करना चाहिए।

क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि उसके लोगों की उन्नति हो; और इसी उद्देश्य से उसने अपना वचन ठहराया है। इसलिए यदि हम लोगों के उद्धार का ध्यान नहीं रखते कि वे सिखाई गई शिक्षा से पोषण पाएँ, तो यह मन्दिर-लूट के समान घोर पाप है; क्योंकि हम परमेश्वर के वचन के शुद्ध उपयोग को बिगाड़ते हैं। यह शब्द "अशुद्ध" उसके विरुद्ध ठहराया गया है जो पवित्र और परमेश्वर के लिए समर्पित है। जो कुछ परमेश्वर की महिमा बढ़ाने से सम्बन्ध रखता है और उसकी महिमा के हमारे ज्ञान को बढ़ाता है, जिससे हम उसकी उपासना करें; जो कुछ हमें स्वर्ग के राज्य की ओर खींचता है, या हमारी लालसाओं को संसार से हटाकर यीशु मसीह की ओर ले जाता है, कि हम उसकी देह में कलम लगाए जाएँ, वही पवित्र कहलाता है।

इसके विपरीत, जब हम परमेश्वर की महिमा का अनुभव नहीं करते, जब हम अपने आपको उसके अधीन करने का भाव नहीं रखते, जब हम स्वर्ग के राज्य के धन को नहीं जानते, जब हम शुद्ध विवेक के साथ जीने के लिए उसकी सेवा में नहीं खिंचते, जब हम नहीं जानते कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मोल लिए गए उद्धार का क्या अर्थ है, तब हम संसार के हैं, और अशुद्ध हैं। जो शिक्षा हमें ऐसी बातों में भटकाने का काम करती है, वह भी अशुद्ध कहलाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का आशय क्या है: अर्थात् जब हम परमेश्वर के नाम से इकट्ठे होते हैं, तो वह मनबहलाव के गीत सुनने और हवा से, अर्थात् व्यर्थ और निरर्थक जिज्ञासा से, पेट भरने के लिए नहीं, वरन् आत्मिक पोषण पाने के लिए है। क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि उसके नाम से कुछ भी प्रचार न किया जाए, सिवाय उसके जो सुननेवालों को लाभ और उन्नति पहुँचाए, सिवाय उसके जिसमें उत्तम सार हो।

परन्तु यह सच है कि हमारा स्वभाव ऐसा है कि हम नवीनता में, और उन अटकलों में जो सूक्ष्म जान पड़ती हैं, बड़ा आनन्द लेते हैं। इसलिए हम सावधान रहें और जैसा चाहिए वैसा सोचें, कि हम परमेश्वर के पवित्र वचन को अशुद्ध न ठहराएँ। हम वही खोजें जो उन्नति करता है, और जिसमें कुछ सार नहीं उसे ग्रहण करके अपने आपको धोखा न दें। मनुष्यों को ऐसी व्यर्थता से खींच निकालना कठिन है, क्योंकि वे उसमें भाग लेने की ओर झुके रहते हैं। परन्तु सन्त पौलुस दिखाता है कि ऐसी व्यर्थ जिज्ञासा से बढ़कर दयनीय कुछ नहीं: "क्योंकि ऐसे लोग और भी अधिक अभक्ति में बढ़ते जाएँगे।" मानो वह कहता है: मेरे मित्रो, तुम पहली दृष्टि में नहीं जानते कि इन धोखेबाजों से कैसी हानि पहुँचती है; जो तुम्हारे बीच साख और प्रतिष्ठा पाने का यत्न करते हैं, और मनोहर खिलौनों से तुम्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं; परन्तु मेरा विश्वास करो, वे शैतान के औज़ार हैं और किसी रीति से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, वरन् और भी अधिक दुष्टता में बढ़ते जाते हैं; अर्थात् यदि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए, तो वे मसीही धर्म को बिगाड़ डालेंगे; वे एक बिन्दु भी सही-सलामत नहीं छोड़ेंगे। इसलिए ध्यान रखो कि तुम उनसे महामारियों के समान भागो, चाहे पहली दृष्टि में उनका लाया हुआ विष दिखाई न दे।

जब हमें इस शिक्षा का न्याय करना हो, तब हम में से हर एक को अपने ऊपर सन्देह करना चाहिए। और क्यों? क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) हम सब निर्बल हैं; हमारे मन बदलते और डगमगाते रहते हैं, और इसके अतिरिक्त हम में एक मूर्खतापूर्ण अभिलाषा है जो हमें निरर्थक वस्तुओं की ओर खींचती है। इसलिए सावधान रहें कि हम अपनी ही अभिलाषाओं को तृप्त न करें। यद्यपि यह शिक्षा हमें पहली दृष्टि में बुरी न लगे, तो भी यदि उसकी प्रवृत्ति हमें परमेश्वर की ओर ले जाने, उसकी सेवा में हमें दृढ़ करने, और हमें दिए गए अनन्त जीवन के विश्वास और आशा में हमें स्थिर करने की नहीं है, तो अन्त में वह हमें धोखा देगी; और केवल एक ऐसा मिश्रण सिद्ध होगी जो उस भलाई को छीन लेने के सिवाय किसी काम का नहीं, जो हमने पहले पाई थी।

संक्षेप में, जिनके सामने यह लक्ष्य नहीं है कि संसार को परमेश्वर की ओर खींचें, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को बनाएँ कि वह हमारे बीच राज्य करे, वे सब कुछ बिगाड़ देते हैं। उनका सारा परिश्रम और कष्ट केवल उनकी दुष्टता को बढ़ाता है; और यदि उन्हें इसी रीति से आगे बढ़ने दिया जाए, तो शैतान के लिए एक द्वार खुल जाता है, जिससे वह परमेश्वर की हर वस्तु को मिट्टी में मिला दे। यद्यपि यह पहले ही प्रहार में नहीं होता, तो भी हम देखते हैं कि अन्त ऐसा ही होता है। इसे और भली-भाँति प्रकट करने के लिए सन्त पौलुस जोड़ता है, "उनकी बात सड़े घाव की नाईं फैलती जाएगी।"

यहाँ जो "फैलना" (खाते जाना) शब्द आया है, वह सामान्यतः समझा नहीं जाता; यह वह है जिसे शल्य-चिकित्सक खानेवाला घाव कहते हैं, जिसे सन्त एंथनी की आग भी कहा जाता है: अर्थात् जब शरीर के किसी अंग में ऐसी सूजन-जलन होती है कि घाव न केवल मांस और नसों को, वरन् हड्डियों को भी खा जाता है। संक्षेप में, यह एक ऐसी आग है जो सब कुछ भस्म कर देती है: हाथ के कारण बाँह जाती रहेगी, और पैर के कारण टाँग, जब तक आरम्भ में ही प्रभावित अंग को काट न दिया जाए; इस प्रकार मनुष्य को अपने अंग खोने का भय रहता है, जब तक कि उसके लिए उचित उपचार न किए जाएँ; ऐसी दशा में हमें कोई कष्ट उठाने से पीछे नहीं हटना चाहिए, वरन् प्रभावित अंग को काट देना चाहिए, ताकि शेष पूरी तरह नष्ट न हो जाए।

इसी प्रकार हम इसे यहाँ आत्मिक रीति से देखते हैं: क्योंकि सन्त पौलुस हमें दिखाता है कि यद्यपि हमें खरी शिक्षा की अच्छी सीख मिली हो, तो भी सब कुछ बिगड़ जाएगा, यदि हम इन निरर्थक प्रश्नों को स्थान दें, और केवल सुननेवालों को प्रसन्न करने और उनकी अभिलाषाओं को पोसने का यत्न करें। जब हम समझ गए कि सन्त पौलुस का आशय क्या है, तो आओ, इस चेतावनी को व्यवहार में लाने का प्रयत्न करें। जब हम देखें कि मनुष्य हमें सच्ची शिक्षा से भटकाने का यत्न कर रहे हैं, तो हम उनसे बचें और उनके लिए द्वार बन्द कर दें। यदि हम पहले ही आरम्भ में इसे हाथ में न लें और पूरी तरह काट न डालें, तो उस रोग के समान, जिसकी हमने चर्चा की, इसे वश में करना कठिन हो सकता है।

इसलिए हम सोते न रहें; क्योंकि यह गम्भीर बात है; यदि समय पर इसकी सुध न ली जाए, तो यह घातक रोग सिद्ध होगा। यदि इस चेतावनी का पालन किया गया होता, तो आज मसीही जगत् में स्थिति कहीं अच्छी होती। क्योंकि पोप-मत की यह जड़ता वही व्यर्थ बकवाद है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस ने की है। उनमें जो सबसे बड़े विद्वान गिने जाना चाहते हैं, जो बहुत वर्षों से इसमें लगे हैं, वरन् जिन्होंने अपना सारा जीवन इसी में बिताया है, वे भी मूर्खतापूर्ण बड़बड़ाहट के सिवाय किसी बात का विचार नहीं करते; जो मनुष्यों को भटकाने के सिवाय और किसी काम की नहीं, क्योंकि कोई नहीं जानता कि उनका अर्थ क्या है। ऐसा जान पड़ता है कि शैतान ने इस भाषा को किसी अद्भुत चतुराई से गढ़ा है, ताकि वह सारी शिक्षा को गड़बड़ा दे।

यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उन्होंने उसके विपरीत करने का षड्यन्त्र रचा है जिसे सन्त पौलुस ने परमेश्वर के नाम से मना किया है। क्योंकि जिन्होंने परमेश्वर के वचन को इस प्रकार बर्बर और अनजाने शब्दों की अशुद्ध भाषा में बदल दिया है, वे अपने आपको निर्दोष ठहराने में और भी कम समर्थ होंगे। बहुतेरे हैं जो चाहते हैं कि उन्हें मनभावनी बातें सिखाई जाएँ; वे परमेश्वर के वचन को मनोरंजन का साधन बनाएँगे और उसी से अपना जी बहलाएँगे; इस प्रकार वे व्यर्थ और निरर्थक शिक्षा खोजते हैं। वे कलीसिया में भूल, झगड़ा और विवाद ले आएँगे, और हमारे माने हुए धर्म को सन्देह में डालने तथा परमेश्वर के वचन को धुँधला करने का यत्न करेंगे।

इसलिए हमें और भी अधिक उत्साह से परमेश्वर की सेवा करनी और सुसमाचार की शुद्धता में दृढ़ता से बने रहना चाहिए। यदि हम में अपने परमेश्वर की आज्ञा वैसे मानने की इच्छा है जैसी चाहिए, तो हमें वही करना चाहिए जिसकी हमें आज्ञा दी गई है, और उससे प्रार्थना करनी चाहिए कि वह कलीसिया को इन महामारियों से शुद्ध करे, क्योंकि वे शैतान के औज़ार हैं। यह बात शैतान द्वारा गढ़े गए सब बिगाड़ों और ठोकरों पर लागू की जा सकती है; परन्तु यहाँ उस शिक्षा के विषय में कहा गया है जिससे हम जिलाए जाते हैं, जो प्राण का सच्चा आहार है।

अब हम विषय के उस भाग पर आएँ जिसमें सन्त पौलुस हमें बताता है कि इनमें कौन गिने जाते हैं। वह कहता है, "हुमिनयुस और फिलेतुस उन्हीं में से हैं, जो यह कहकर कि पुनरुत्थान हो चुका है, सत्य से भटक गए हैं, और कितनों के विश्वास को उलट-पलट कर देते हैं।" जब वह हुमिनयुस और फिलेतुस का नाम लेता है, तो वह दिखाता है कि हमें उन्हें नहीं छोड़ना चाहिए, जो खुजलीवाली भेड़ों के समान झुण्ड को रोगी कर सकते हैं, वरन् हमें हर एक को बताना चाहिए कि वे किस प्रकार के मनुष्य हैं, ताकि वे उनसे सावधान रहें। क्या हम अपने पड़ोसियों के प्रति विश्वासघाती नहीं हैं, जब हम उन्हें परमेश्वर से फिरा दिए जाने के संकट में देखते हैं और उन्हें इसकी सूचना नहीं देते? जो दुष्ट मनुष्य टेढ़ी शिक्षा स्थापित करने और कलीसिया में ठोकरें उत्पन्न करने का यत्न करता है, वह धोखेबाज़ के सिवाय और क्या है? यदि मैं उसे देखकर भी बात छिपाऊँ, तो क्या यह ऐसा नहीं है मानो मैं अपने पड़ोसी को संकट में देखूँ और उसे सावधान न करूँ?

यदि देह का जीवन हमारे लिए इतना बहुमूल्य होना चाहिए कि हम उसे बचाने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दें, तो प्राण का जीवन कितना अधिक महत्त्वपूर्ण है! जो सब कुछ उलट-पुलट करने का यत्न करते हैं, वे आकर लोगों के बीच अपनी झूठी शिक्षा बोएँगे, ताकि उन्हें परमेश्वर के तिरस्कार में खींच लें। ये भौंकनेवाले कुत्ते, ये नीच बकरे, ये फाड़ खानेवाले भेड़िए, यही हैं जो भटक गए हैं और कलीसिया के विश्वास को उलटने का यत्न करते हैं; और फिर भी हम उन्हें सहते हैं। मनुष्य प्रायः कहेंगे, क्या हम उनसे बैर रखें? क्या हम उन्हें त्याग दें कि वे निराशा में पड़ जाएँ? यह वे कहते हैं जो समझते हैं कि हमें कोमलता बरतनी चाहिए; परन्तु यह कैसी दया है कि एक मनुष्य को बचाया जाए, और इस बीच हज़ारों प्राणों को चेतावनी देने के बदले उन्हें फेंक दिया जाए? हमें अपने बीच बुरे पौधों को बढ़ने नहीं देना चाहिए - ऐसा न हो कि वे प्रबल होकर जो कुछ अच्छा बीज है उसे दबा दें, या पूरी तरह नष्ट कर दें।

शैतान अपने विष और महामारियाँ लेकर आता है कि सब कुछ नष्ट कर दे। हम देखते हैं कि परमेश्वर का झुण्ड फाड़ खानेवाले भेड़ियों से व्याकुल और पीड़ित किया जाता है, जो जो कुछ पा सकते हैं उसे खा जाते और नष्ट कर देते हैं। क्या हम भेड़िए पर दया से द्रवित हों: और इस बीच उन बेचारी भेड़ों और मेमनों को, जिनकी हमारे प्रभु को विशेष चिन्ता है, नष्ट होने दें? मैं कहता हूँ, जब हम किसी दुष्ट मनुष्य को कलीसिया को ठोकरों या झूठी शिक्षा से सताते देखें, तो जहाँ तक हमारे वश में है, हमें उसे रोकना चाहिए: हमें सीधे-सादे लोगों को चेताना चाहिए कि वे भटकाए और बहकाए न जाएँ; मैं कहता हूँ, यही हमारा कर्तव्य है।

प्रभु चाहता है कि दुष्ट पहचाने जाएँ, कि संसार उन्हें जान ले, और उनकी अभक्ति सब पर प्रकट हो जाए। सन्त पौलुस कुछ लोगों की चर्चा करता है जो दूसरों के काम में हाथ डालनेवाले, आलसी आदि हैं: इन्हें भी बताया जाना चाहिए, ताकि उनसे बचा जाए। उनका क्या किया जाए जिनके हाथ में तलवार है; जो पूरे शैतान बन गए हैं; जो किसी रीति से मेल और एकता से नहीं रह सकते, वरन् सब कुछ मिट्टी में मिलाने के लिए आगे धँसे चले आते हैं? जब हम उन्हें ऐसा देखें, तो क्या हम चुप रहें? हम उन्हें पहचानना सीखें जो परमेश्वर की कलीसिया को सताते हैं, और उन्हें रोकें, और उन्हें हानि पहुँचाने से रोकने का यत्न करें। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया के लिए जलन रखनेवाले कितने थोड़े हैं।

हम केवल प्रकट शत्रुओं की बात नहीं करते (क्योंकि हम मानते हैं कि हमें पोप के अनुयायियों का नाम लेना चाहिए, ताकि हम उनकी भूल और अन्धविश्वास में न फँसें), परन्तु हम औरों को देखते हैं जो हमें सुसमाचार की सरलता से फेर देना चाहते हैं: वे सब वस्तुओं में उपद्रव फैलाने का यत्न करते हैं; वे जंगली बीज बोते हैं, ताकि इस शिक्षा को घृणित बना दें, और लोगों को इससे खिन्न कर दें; कुछ और हैं जो चाहते हैं कि उन्हें स्वच्छन्दता की ऐसी छूट मिले कि जो चाहें दुष्टता करें, और इस प्रकार हमारे प्रभु यीशु मसीह का जूआ उतार फेंकें। हम औरों को देखते हैं जो संसार को दुष्टता, निन्दा और नीचता से भर देने के सिवाय कुछ नहीं चाहते, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति श्रद्धा को पैरों तले रौंदने का यत्न करते हैं। हम घोर पियक्कड़ों और शराबियों को भी देखते हैं, जो सब मनुष्यों को गड़बड़ी में डालने का यत्न करते हैं।

और फिर भी हम में कौन है जो इन बातों के विरुद्ध खड़ा होता है? कौन है जो कहता है, आओ हम सावधान और जागरूक रहें? इसके विपरीत, जिन्हें ऐसी दुष्टता को कड़ाई से डाँटना चाहिए, वे न केवल उस पर आँख मूँद लेते और उसे जाने देते हैं, वरन् उसका पक्ष लेते और उसे सहारा देते हैं। हम देखते हैं कि देश में दुष्टता फैल रही है; हम देखते हैं कि कुछ लोग हमारे उद्धार को बिगाड़ने और मिटा देने तथा परमेश्वर की कलीसिया को सन्देह में डालने का यत्न करते हैं; और क्या हम बात छिपाएँ, और ऐसा दिखाएँ मानो हमें इनमें से कुछ दिखाई ही नहीं देता? हम जितना चाहें मसीही होने का घमण्ड कर लें, तो भी यदि हम ऐसी बातों का समर्थन करते हैं, तो हमारे बीच मसीहियों से अधिक शैतान हैं।

इसलिए जो शिक्षा यहाँ हमें दी गई है, उस पर भली-भाँति ध्यान दें; और यदि हम दुष्ट जनों को परमेश्वर की कलीसिया को रोगी करने, भली शिक्षा को धुँधला करने या नष्ट करने का यत्न करते देखें, तो उनके कामों को प्रकाश में लाने का प्रयत्न करें, कि हर एक उन्हें देख ले, और इस प्रकार उनसे बचने में समर्थ हो। यदि हम इन बातों पर ध्यान नहीं देते, तो हम परमेश्वर के प्रति विश्वासघाती हैं, और न उसके आदर के लिए, न कलीसिया के उद्धार के लिए हम में कोई जलन है। यदि हम परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं, तो हमें दुष्टता के प्रकट शत्रु होना चाहिए। हमारे लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम पाप करने से बचें, वरन् जहाँ तक हो सके उसकी निन्दा करें, ताकि उसका हम पर कोई प्रभुत्व न रहे, और वह हम पर प्रबल न हो जाए।

जब सन्त पौलुस इन दो व्यक्तियों का नाम ले चुका, तब वह हमें बताता है कि वे विश्वास से फिर गए, यहाँ तक कि उन्होंने कहा कि पुनरुत्थान हो चुका है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उनका पतन भयानक था। हुमिनयुस और फिलेतुस अनजान मनुष्य नहीं थे; क्योंकि सन्त पौलुस उनका उल्लेख करता है, यद्यपि वे दूर थे, तीमुथियुस इस समय इफिसुस में था। इसलिए यह प्रकट है कि वे प्रसिद्ध मनुष्य थे। वे कुछ समय से कलीसिया के मुख्य स्तम्भों के रूप में बड़ी प्रतिष्ठा में रहे थे। परन्तु हम देखते हैं कि वे कितना गिरे; यहाँ तक कि उस अनन्त उद्धार को ही त्याग बैठे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिया। यदि हम पुनरुत्थान की बाट नहीं जोहते, तो हमारे लिए यह सिखाने का क्या लाभ कि एक छुड़ानेवाला है जिसने हमें मृत्यु की दासता से बचाया है? हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग हमारे किस काम के होंगे, यदि हम अन्तिम दिन में, उसके आगमन पर, उस फल की बाट न जोहें जिसकी हमसे प्रतिज्ञा की गई है?

तो भी ये लोग कुछ समय तक विश्वासियों की गिनती में रहे थे, फिर भी वे मानो नरक के अथाह गर्त में जा गिरे। इस प्रकार परमेश्वर उन पर अपना प्रतिशोध प्रकट करता है जो उसके सुसमाचार का दुरुपयोग करते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि ये मनुष्य मूर्खतापूर्ण महत्त्वाकांक्षा के मद में चूर थे: वे यश के सिवाय कुछ नहीं चाहते थे; उन्होंने परमेश्वर के वचन की सरलता को ढाँक दिया, और अपने आपको औरों से बड़ा दिखाने का यत्न किया। परन्तु परमेश्वर अपने वचन को मनुष्य से कहीं ऊँचा मानता है; क्योंकि यदि मनुष्य उसे गिराएँ और उसका उपहास करें, तो वह उन्हें निर्दोष न ठहराएगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो स्वर्गदूतों के समान थे, वे पूरे शैतान बन गए हैं: वे अन्धे हो गए हैं, और फिर भी बड़े विद्वान बनना चाहते हैं।

जिन व्यक्तियों की चर्चा सन्त पौलुस करता है, उनकी योग्यता साधारण कोटि की नहीं थी; वे अनपढ़ नहीं थे, वरन् सब कलीसियाओं में ऊँचे पद के थे; और फिर भी वे ऐसे अन्धेपन में गिर गए कि मृतकों के पुनरुत्थान का इनकार करते हैं: अर्थात् वे हमारे धर्म के सबसे प्रमुख सिद्धान्त को त्याग देते हैं और अपने आपको उद्धार की सारी आशा से वंचित कर लेते हैं। यह कैसे सम्भव है! यह विचित्र जान पड़ता है कि जो मनुष्य औरों को सिखाने में समर्थ थे, वे ऐसी घोर और पशुओं जैसी अज्ञानता में पहुँच जाएँ। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर उन ठट्ठा करनेवालों और तिरस्कार करनेवालों से कैसा बदला लेता है जो उसके वचन का दुरुपयोग करते हैं। यह हो ही नहीं सकता कि वह उन्हें निकम्मे ठहराए जाने की दशा में न डाल दे; कि वे फिर कभी कुछ पहचानने योग्य न रहें, और सब बुद्धि से सर्वथा रहित हो जाएँ।

इसलिए यदि आज हम देखें कि मनुष्य परमेश्वर के सत्य को जानने के बाद पशु-समान हो गए हैं, और बुद्धि से रहित हो गए हैं, तो हमें जान लेना चाहिए कि परमेश्वर इसके द्वारा अपने वचन को महिमा देगा, और हमें उसकी महिमा का अनुभव कराएगा। और क्यों? क्योंकि उसने उसके तिरस्कार का दण्ड ऐसे लोगों को शैतान के हाथ सौंपकर, और उस पर उनके ऊपर पूरी छूट देकर दिया। इसलिए जब हम उन्हें देखें जिन्होंने सुसमाचार का स्वाद चखा है, कि वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता से विद्रोह करते हैं, तो हमें ठोकर नहीं खानी चाहिए; वरन् यह हमारे विश्वास की पुष्टि का कारण बने: क्योंकि परमेश्वर हमें स्पष्ट दिखाता है कि उसका वचन इतना महत्त्वपूर्ण है कि वह किसी रीति से यह सहन नहीं कर सकता कि मनुष्य उसका दुरुपयोग करें, या उसे व्यर्थ ठहराएँ, या उसे ढाँकें, या उसे अशुद्ध करें।

हमें चौकस रहना, और भय और सावधानी से चलना सीखना चाहिए। हम इन बातों को अपनी आँखों के सामने रखे दर्पण के समान देखें, ताकि हम उन्हें देखें जो अच्छे मसीही गिने जाते थे, पर गिर गए; जिनमें अपने भीतर दुष्टता के सिवाय कुछ नहीं, जो घृणित बातें बोलते हैं, जिनके सारे जीवन में गन्दगी के सिवाय कुछ नहीं। जब परमेश्वर ने ये बातें हमारे सामने रखी हैं, तो हम इनसे चेतावनी लें, और जाग उठें, और सुसमाचार की सरलता में चलें, ताकि हम शैतान का आहार न बनें।

यह सच है कि इन मनुष्यों का एक काल्पनिक पुनरुत्थान था, जैसा आज भी कुछ लोगों का है; जो हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि मसीही बनना ही फिर जी उठना है: परन्तु पवित्र शास्त्र हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन की ओर बुलाता है कि हम सदा तैयार और सन्नद्ध रहें, ताकि वह प्रकट हो जाए; और तब तक हमारा जीवन छिपा हुआ है, और हम मानो मृत्यु की छाया में हैं। जब पवित्र शास्त्र हमें हमारे प्रभु यीशु की ओर बुलाता है, तब ये कट्टरपन्थी कहते हैं कि हमें उस पुनरुत्थान के सिवाय, जो सुसमाचार में प्रकाश पाने के समय होता है, और किसी पुनरुत्थान की बाट नहीं जोहनी चाहिए।

यहाँ हम यह देखें कि यदि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की महिमा में भागी होना और उसके साथ फिर जी उठना है, तो हमारे पुराने मनुष्यत्व को क्रूस पर चढ़ाया जाना अवश्य है। सन्त पौलुस ने हमें दिखाया है कि यदि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के राज्य के होना है, तो हमें उसके क्रूस में भागी होना होगा; जीवन में पहुँचने से पहले हमें मृत्यु में चलना होगा। यह मृत्यु कब तक बनी रहेगी? जब तक हम इस संसार में हैं। इसलिए सन्त पतरस कहता है कि बपतिस्मा मानो नूह के जहाज़ का प्रतीक है (1 पतरस 3:21)। क्योंकि यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की छाप से जिलाए जाना चाहते हैं, तो हमें मानो कब्र में बन्द होना, और संसार के लिए मरा हुआ होना है।

जो बीच ही में पुनरुत्थान चाहते हैं, क्या वे बपतिस्मा के स्वभाव को, और परिणामस्वरूप उस सारी व्यवस्था को जो परमेश्वर ने हमारे बीच ठहराई है, नहीं बिगाड़ते? हम सीखें कि जब तक परमेश्वर हमें इस संसार से न उठा ले, तब तक हमें परदेश में यात्रियों के समान रहना है: और हमारा उद्धार हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक प्रकट नहीं किया जाएगा: क्योंकि वह उनमें जो सो गए हैं पहला फल हुआ है (1 कुरिन्थियों 15)। और इसी प्रकार, "वही देह, अर्थात् कलीसिया का सिर है; वही आदि है, और मरे हुओं में से जी उठनेवालों में पहलौठा, कि सब बातों में वही प्रधान ठहरे" (कुलुस्सियों 1:18)। यह सच है कि यीशु मसीह जी उठा है; परन्तु अवश्य है कि वह हमारे सामने प्रकट हो, और उसके पास पहुँचने से पहले उसका जीवन और महिमा हमें दिखाई जाए।

सन्त यूहन्ना कहता है कि हम निश्चित हैं कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं: कि हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, जब हम उसके समान बना दिए जाएँगे। यह सच है कि जब परमेश्वर हमें अपने स्वरूप में बदल देता है, तब वह हम पर प्रकट होता है; परन्तु जो हम विश्वास से ग्रहण करते हैं, वह अभी देखा नहीं गया है, हमें उसकी आशा अपने प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर रखनी है। इस भूल की घोर असंगति के होते हुए भी, सन्त पौलुस हमें बताता है कि जिन दो व्यक्तियों की यहाँ चर्चा है, उन्होंने कितनों के विश्वास को उलट दिया है। यह ऐसी बात है जिससे हमें काँप उठना चाहिए; यह सोचकर कि जो शिक्षा पहली दृष्टि में ही त्याग देने योग्य थी, उसने कितनों के विश्वास को उलट दिया।

हम देखते हैं कि परमेश्वर की सन्तान इस संसार में कैसे कष्ट उठाती है; वरन् उनकी दशा देखकर प्रायः तरस आता है; जबकि परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले अविश्वासी चैन से और सुख-विलास में रहते हैं। वे जयजयकार करते हैं, जबकि पवित्र लोग संसार की मैल के समान बना दिए जाते हैं (1 कुरिन्थियों 4:13)। मनुष्यों के लिए इस कुमत की कल्पना करना कैसे सम्भव है: यह कहना कि पुनरुत्थान हो चुका है? और फिर भी हम देखते हैं कि यह कुछ लोगों को भाया; वरन् आदि कलीसिया में प्रेरितों के समय में भी। जब वे, जिन्हें यीशु मसीह ने सारे संसार में अपने सत्य का प्रचार करने के लिए चुना था, अभी जीवित थे, तब कुछ विश्वास से गिर गए।

जब हम ऐसा उदाहरण देखते हैं, तो क्या हमारे पास चकित होने और भय से चलने का कारण नहीं? इसलिए नहीं कि हम इस पर सन्देह करें कि परमेश्वर हमारी सहायता और अगुवाई करेगा, पर हमारे लिए उचित है कि हम प्रार्थना से अपने आपको सज्जित करें, और अपने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखें। जब हम इस भूल की भयानकता का विचार करते हैं, तो हमारा चकित होना उचित ही है; कि परमेश्वर ने कितनों को पहले ही विश्वास से फिर जाने दिया है। यदि प्रेरित, जिन्होंने परमेश्वर के सत्य को बनाए रखने के लिए ऊपर से मिली सारी शक्ति लगाई, मनुष्यों को बहकने से रोक न सके, तो आज के दिनों में हमें क्या आशा रखनी चाहिए! हम प्रार्थना में लगे रहें, और परमेश्वर की शरण लें कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारी रक्षा करे। हम अहंकार से फूल न उठें, वरन् अपनी तुच्छता को विचारें, क्योंकि यदि परम सत्ता हमें थामे न रहे, तो हम तुरन्त उलट दिए जाएँगे।

ये शिक्षाएँ हमें बिना कारण नहीं दी गई हैं। यद्यपि हुमिनयुस और फिलेतुस आज जीवित नहीं हैं, तो भी उनके व्यक्तियों में पवित्र आत्मा का आशय उन दुष्टों को नीचा दिखाना था जो हमारे विश्वास को बिगाड़ने का यत्न करते हैं; कि जो कुछ भी घटित हो, उससे हम खिन्न न हों; कि हम भले मार्ग से न हटें, वरन् सब ठोकरों से सुरक्षित रहें। हमें गर्व से इतना फूलना नहीं चाहिए कि अपनी ही मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं के पीछे भटक जाएँ; वरन् सावधान रहें, और अपने आपको परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता में बनाए रखें। तब हम दिन-दिन और अधिक दृढ़ होते जाएँगे, जब तक हमारा भला परमेश्वर हमें अपने उस अनन्त विश्राम में न ले ले जिसके लिए हम बुलाए गए हैं।

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