अध्याय 36

वचन ही हमारा एकमात्र नियम - तीतुस 1:15-16

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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वचन ही हमारा एकमात्र नियम - तीतुस 1:15-16

वचन ही हमारा एकमात्र नियम

शुद्ध लोगों के लिए सब कुछ शुद्ध है, पर अशुद्ध और अविश्वासियों के लिए कुछ भी शुद्ध नहीं; वरन् उनकी बुद्धि और विवेक दोनों अशुद्ध हैं। वे कहते हैं कि हम परमेश्वर को जानते हैं, पर अपने कामों से उसका इनकार करते हैं; क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न माननेवाले हैं, और किसी भी भले काम के योग्य नहीं। - तीतुस 1:15-16

सन्त पौलुस ने हमें दिखाया है कि हमें परमेश्वर के वचन से शासित होना चाहिए, और मनुष्यों की आज्ञाओं को व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण मानना चाहिए; क्योंकि पवित्रता और जीवन की सिद्धता उनकी नहीं है। वह उनकी कुछ आज्ञाओं की निन्दा करता है, जैसे जब वे कुछ भोजन वर्जित करते हैं, और उस स्वतन्त्रता को बरतने नहीं देते जो परमेश्वर विश्वासियों को देता है। जिन्होंने सन्त पौलुस के समय में ऐसी रीतियाँ सामने रखकर कलीसिया को व्याकुल किया, उन्होंने व्यवस्था की आज्ञाओं को ढाल बनाया। ये केवल मनुष्यों की गढ़ी हुई बातें थीं: क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर मन्दिर को मिटा दिया जाना था। मसीह की कलीसिया में जो इस अन्धविश्वास को मानते हैं कि कुछ भोजन वर्जित हों, उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह उसके मन और अभिप्राय के विरुद्ध था कि मसीही ऐसी रीतियों के अधीन हो।

संक्षेप में, सन्त पौलुस इस स्थान पर हमें बताता है कि इन दिनों हमें बिना किसी अपवाद के सब प्रकार का मांस खाने की स्वतन्त्रता है। जहाँ तक देह के स्वास्थ्य की बात है, उसकी चर्चा यहाँ नहीं हो रही; परन्तु यहाँ जो विषय रखा गया है वह यह है कि मनुष्य अपने आपको स्वामी न बना बैठें कि परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हमारे लिए व्यवस्थाएँ बनाएँ। जब ऐसा है कि परमेश्वर भोजनों में कोई भेद नहीं रखता, तो हम उन्हें वैसा ही बरतें; और कभी यह न पूछें कि मनुष्यों को क्या भाता है, या वे क्या अच्छा समझते हैं। तो भी हमें उन उपकारों को, जो परमेश्वर ने हमें दिए हैं, संयम और मर्यादा से बरतना चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने हमारे लिए भोजन इसलिए नहीं बनाए कि हम सूअरों के समान अपना पेट भरें, वरन् इसलिए कि हम उन्हें जीवन के निर्वाह के लिए बरतें: इसलिए जिस मर्यादा को परमेश्वर ने अपने वचन से हमें दिखाया है, उसी में सन्तुष्ट रहें।

यदि हमारे पास उतना भोजन नहीं जितना हम चाहते, तो हम अपनी दरिद्रता को धीरज से सहें, और सन्त पौलुस की शिक्षा का पालन करें; और जैसे धन-सम्पन्नता में रहना, वैसे ही दरिद्रता को सहना भी जानें। यदि हमारा प्रभु हमें चाहने से अधिक दे, तो भी हमें अपनी भूख-प्यास पर लगाम रखनी चाहिए। दूसरी ओर, यदि उसे भाए कि हमारा कौर घटा दे, और हमें थोड़े में ही खिलाए, तो हम उसी में सन्तुष्ट रहें, और उससे प्रार्थना करें कि जब हमारे पास वह न हो जिसकी हमारी इच्छाएँ माँग करती हैं, तब वह हमें धीरज दे। संक्षेप में, हमें उस ओर लौटना चाहिए जो रोमियों 13 में कहा गया है: "वरन् प्रभु यीशु मसीह को पहिन लो, और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने की चिन्ता न करो।" हम इसी में सन्तुष्ट रहें कि जो हमें चाहिए, और जो परमेश्वर जानता है कि हमारे लिए उचित है, वही हमारे पास हो; इस प्रकार यदि हम इस रीति से शुद्ध किए गए हों, तो सब कुछ हमारे लिए शुद्ध होगा।

तो भी यह सच है कि चाहे हम कितने ही अशुद्ध क्यों न हों, परमेश्वर के बनाए हुए भोजन अच्छे हैं; परन्तु जो बात हमें विचारनी है वह उनका उपयोग है। जब सन्त पौलुस कहता है कि सब कुछ शुद्ध है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि वे अपने आप में ऐसे हैं, वरन् उनके सम्बन्ध में जो उन्हें ग्रहण करते हैं; जैसा हम पहले देख चुके, जहाँ वह तीमुथियुस से कहता है कि सब कुछ विश्वास और धन्यवाद के द्वारा हमारे लिए पवित्र ठहरता है। परमेश्वर ने संसार को ऐसी बहुतायत से भर दिया है कि हम यह देखकर चकित हो सकते हैं कि उसे हमारी कैसी पितृवत् चिन्ता है: क्योंकि पृथ्वी पर के ये सब धन किस प्रयोजन के लिए हैं, केवल यह दिखाने के लिए कि वह मनुष्य के प्रति कितना उदार है!

यदि हम नहीं जानते कि वह हमारा पिता है, और हमारे प्रति धाय का काम करता है, यदि हम उसके हाथ से वह ग्रहण नहीं करते जो वह हमें देता है, यहाँ तक कि जब हम खाते हैं तो हमें दृढ़ प्रतीति हो कि हमें परमेश्वर ही पालता-पोसता है, तो वह उस रीति से महिमा नहीं पा सकता जिसका वह अधिकारी है; और न हम रोटी का एक कौर भी बिना मन्दिर-लूट के पाप के खा सकते हैं; जिसका हमें लेखा देना होगा। इन उपकारों का, जो हमें दिए गए हैं, उचित रीति से आनन्द लेने के लिए हमें इस बात पर दृढ़ निश्चय होना चाहिए (जैसा मैंने पहले कहा) कि परमेश्वर ही हमें पालता और खिलाता है।

यही वह शुद्धता है जिसकी चर्चा प्रेरित यहाँ करता है; जब वह कहता है कि सब कुछ शुद्ध है, विशेषकर तब जब हम में ऐसी खराई हो कि हम दूसरे को दिए गए उपकारों को तुच्छ न जानें, वरन् परमेश्वर के हाथ से अपनी दिन भर की रोटी माँगें, यह निश्चय रखकर कि उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं, उसे केवल परमेश्वर की दया के रूप में ग्रहण करें। अब आओ देखें कि यह शुद्धता कहाँ से आती है। हम इसे अपने भीतर नहीं पाएँगे, क्योंकि यह हमें विश्वास के द्वारा दी जाती है। सन्त पतरस कहता है कि पुराने पुरखाओं के हृदय इसी रीति से शुद्ध किए गए थे; अर्थात् जब परमेश्वर ने उन्हें विश्वास दिया (प्रेरितों के काम 15)।

यह सच है कि वह यहाँ अनन्त उद्धार का ध्यान रखता है; क्योंकि हम पूरी तरह अशुद्ध थे, जब तक परमेश्वर ने अपने आपको हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में हम पर प्रकट न किया; जिसने हमारा छुड़ानेवाला बनकर हमारे प्राणों का मूल्य और छुड़ौती चुकाई। परन्तु यह शिक्षा इस वर्तमान जीवन से सम्बन्ध रखनेवाली बातों पर भी लागू हो सकती है, और होनी चाहिए; क्योंकि जब तक हम न जानें कि यीशु मसीह में गोद लिए जाने के कारण हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और परिणामस्वरूप इस संसार की मीरास हमारी है, तब तक यदि हम मांस का एक कौर भी छूएँ, तो हम चोर हैं; क्योंकि आदम के पाप के कारण हम उन सब आशीषों से वंचित और निर्वासित हैं जो परमेश्वर ने बनाईं, जब तक कि हम उन्हें अपने प्रभु यीशु मसीह में प्राप्त न कर लें।

इसलिए विश्वास ही है जो हमें शुद्ध करे। तब सब भोजन हमारे लिए शुद्ध होंगे: अर्थात् हम उन्हें बिना डगमगाए स्वतन्त्रता से बरत सकते हैं। यदि मनुष्य हम पर आत्मिक व्यवस्थाएँ थोपें, तो हमें उन्हें मानने की आवश्यकता नहीं, यह निश्चय रखकर कि ऐसी आज्ञाकारिता परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने में हम अपने ऊपर शासक बैठाते हैं, और उन्हें परमेश्वर के बराबर ठहराते हैं, जो सारा अधिकार अपने ही पास रखता है। इस प्रकार प्राण का शासन परमेश्वर के हाथों में सुरक्षित और अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। इसलिए यदि हम मनुष्यों को इतनी श्रेष्ठता दें कि उन्हें अपने प्राणों को अपनी ही बेड़ियों में जकड़ने दें, तो हम उस सामर्थ्य और प्रभुता को, जो परमेश्वर की हम पर है, उतना ही घटा और कम कर देते हैं।

और इस प्रकार मनुष्यों की रीतियों को मानने में जो नम्रता हम दिखाएँ, वह संसार भर के सब विद्रोह से बुरी होगी; क्योंकि यह परमेश्वर से उसका आदर छीनकर उसे लूट के माल की नाईं नश्वर मनुष्यों को देना है। सन्त पौलुस कुछ यहूदियों के अन्धविश्वास की चर्चा करता है, जो चाहते थे कि मनुष्य अब भी व्यवस्था की छायाओं और प्रतीकों का पालन करें; परन्तु पवित्र आत्मा ने ऐसा निर्णय सुनाया है जिसका पालन संसार के अन्त तक होना है: कि परमेश्वर ने आज हमें उस बोझ से नहीं बाँधा जो पुराने पुरखाओं ने उठाया था; वरन् भोजनों से परहेज़ के विषय में जो आज्ञा उसने दी थी, उस भाग को काट दिया; क्योंकि वह केवल कुछ समय के लिए व्यवस्था थी।

जब परमेश्वर ने हमें इस प्रकार स्वतन्त्र कर दिया है, तो पृथ्वी के कीड़ों का नई व्यवस्थाएँ बनाना कैसा दुस्साहस है; मानो परमेश्वर काफ़ी बुद्धिमान नहीं था। जब हम पोप के अनुयायियों के सामने यह रखते हैं, तो वे उत्तर देते हैं कि सन्त पौलुस ने यहूदियों और उन भोजनों के विषय में कहा जो व्यवस्था में वर्जित थे। यह सच है, परन्तु आओ देखें कि यह उत्तर किसी काम का है भी या ग्रहण करने के योग्य। सन्त पौलुस केवल यह नहीं कहता कि जो वर्जित था उसे बरतना हमारे लिए उचित है, वरन् वह सामान्य शब्दों में कहता है कि सब कुछ शुद्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर ने यहाँ हमें भोजनों के बरतने के विषय में स्वतन्त्रता दी है; ताकि वह हमें अधीनता में न रखे, जैसे पुराने पुरखाओं को रखा था।

इसलिए, जब परमेश्वर ने उस व्यवस्था को, जो उसी की बनाई हुई थी, रद्द कर दिया है, और नहीं चाहता कि वह अब और प्रचलित रहे, तो जब हम मनुष्यों को अपनी ही रीतियाँ गढ़ते, और उसमें सन्तुष्ट न रहते देखें जो परमेश्वर ने उन्हें दिखाया है, तब हम क्या सोचें? पहले तो वे अब भी मसीह की कलीसिया को पुराने नियम की रोक-टोक के अधीन रखने का यत्न करते हैं। परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम पकी आयु और विवेक के मनुष्यों के समान शासित हों, जिन्हें बच्चों के योग्य शिक्षा की आवश्यकता नहीं। वे मनुष्य की युक्तियाँ खड़ी करते और कहते हैं कि हमें उन्हें प्राणघातक पाप के दण्ड के भय पर मानना चाहिए; जबकि परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी अपनी व्यवस्था आज हमारे बीच प्रतीकों और छायाओं के विषय में मानी जाए, क्योंकि वह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर समाप्त हो गई।

तो क्या यह उचित होगा कि जो कुछ मनुष्यों ने अपनी बुद्धि से रचा है उसका पालन किया जाए? क्या हम नहीं देखते कि यह सीधे परमेश्वर के विरुद्ध जाने की बात है? सन्त पौलुस ऐसे धोखेबाज़ों के विरुद्ध खड़ा होता है: उनके विरुद्ध जो मसीहियों को मांस से परहेज़ में बाँधना चाहते थे, जैसा परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में आज्ञा दी थी। यदि कोई कहे कि शुक्रवार को, या लेंट के दिनों में, मांस से परहेज़ करना छोटी बात है, तो हम विचार करें कि क्या परमेश्वर की उपासना को बिगाड़ना और उसे हरामी बनाना छोटी बात है! क्योंकि निश्चय ही जो मनुष्यों की रीति को आगे बढ़ाने और स्थापित करने का यत्न करते हैं, वे उसके विरुद्ध खड़े होते हैं जिसे परमेश्वर ने अपने वचन में ठहराया है, और इस प्रकार मन्दिर-लूट का पाप करते हैं।

जब परमेश्वर चाहता है कि आज्ञाकारिता से उसकी सेवा की जाए, तो हम सावधान रहें और उन सीमाओं के भीतर बने रहें जो परमेश्वर ने बाँधी हैं; और मनुष्यों को उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ने न दें। इसमें इन सबसे बुरी बात और है: क्योंकि वे मांस खाने से परहेज़ को ऐसी सेवा समझते हैं जो परमेश्वर से कुछ पाने के योग्य है। वे इसे बड़ी पवित्रता समझते हैं: और इस प्रकार परमेश्वर की सेवा, जो आत्मिक होनी चाहिए, मानो निकाल दी जाती है, जबकि मनुष्य मूर्खतापूर्ण तुच्छ बातों में व्यस्त रहते हैं। जैसी लोकोक्ति है, वे सेब को छोड़कर छिलके को पकड़ लेते हैं।

हमें विश्वासयोग्य होना और अपनी स्वतन्त्रता में दृढ़ खड़े रहना चाहिए; हमें उस नियम का पालन करना चाहिए जो परमेश्वर के वचन में हमें दिया गया है, और मनुष्यों की गढ़ी हुई नई व्यवस्थाओं से अपने प्राणों को दासत्व में नहीं पड़ने देना चाहिए। क्योंकि यह नारकीय अत्याचार है, जो परमेश्वर के अधिकार को घटाता है और सुसमाचार के सत्य को व्यवस्था के प्रतीकों के साथ मिला देता है; और परमेश्वर की सच्ची सेवा को, जो आत्मिक होनी चाहिए, बिगाड़ता और भ्रष्ट करता है। इसलिए हम विचारें कि विवेक की शान्ति के साथ परमेश्वर का धन्यवाद करना कितना बहुमूल्य विशेषाधिकार है, यह निश्चय रखते हुए कि यही उसकी इच्छा और प्रसन्नता है कि हम उसकी आशीषों का आनन्द उठाएँ: और ऐसा कर सकने के लिए हम अपने आपको मनुष्यों के अन्धविश्वासों में न उलझाएँ, वरन् सुसमाचार की शुद्ध सरलता में जो कुछ है उसी में सन्तुष्ट रहें। तब, जैसा हमने अपने पाठ के पहले भाग के विषय में दिखाया, जो शुद्ध हैं उनके लिए सब कुछ शुद्ध होगा।

जब हमने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण कर लिया है, तो हम जानते हैं कि हम अपनी गन्दगी और दोषों से शुद्ध किए जाएँगे; क्योंकि उसके अनुग्रह से हम परमेश्वर के उपकारों के भागी बनाए जाते हैं, और सन्तान गिने जाते हैं, यद्यपि हम में व्यर्थता के सिवाय कुछ नहीं। "पर अशुद्ध और अविश्वासियों के लिए कुछ भी शुद्ध नहीं।" इससे सन्त पौलुस का अर्थ यह है कि जो कुछ अशुद्ध और अविश्वासियों से निकलता है, वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य नहीं, वरन् संक्रमण से भरा है। जब तक वे अविश्वासी हैं, वे मलिन और अशुद्ध हैं; और जब तक उनमें ऐसी मलिनता है, तब तक जो कुछ वे छूते हैं वह उनकी कलंकित अपकीर्ति से अशुद्ध हो जाता है।

इसलिए जितने नियम और व्यवस्थाएँ वे बना सकते हैं, वे सब व्यर्थता के सिवाय कुछ नहीं होंगी: क्योंकि जो कुछ वे करते हैं, परमेश्वर उसे नापसन्द करता है; वरन् उससे पूरी तरह घृणा करता है। यद्यपि मनुष्य रीतियों और बाहरी क्रियाओं से अपने आपको कष्ट दे सकते हैं, तो भी ये सब बातें तब तक व्यर्थ हैं जब तक वे मन में खरे न हो जाएँ: क्योंकि परमेश्वर की सच्ची सेवा इसी से आरम्भ होती है। इसलिए जब तक हम अविश्वासी हैं, तब तक हम परमेश्वर के सामने मलिन हैं। ये बातें हमें स्पष्ट होनी चाहिए; परन्तु कपट हमारे भीतर इतनी गहरी जड़ पकड़े है कि हम इन्हें अनदेखा कर देते हैं। यह तुरन्त मान लिया जाएगा कि जब तक हमारे हृदय दुष्टता से रहित न हों, हम उसकी सेवा करके परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।

परमेश्वर ने प्राचीन काल के लोगों से इसी शिक्षा के विषय में वाद-विवाद किया; जैसा हम विशेषकर हाग्गै भविष्यद्वक्ता की पुस्तक के दूसरे अध्याय में देखते हैं: जहाँ वह याजकों से पूछता है कि यदि कोई मनुष्य किसी पवित्र वस्तु को छूए, तो क्या वह पवित्र ठहरेगा या नहीं, तो याजकों ने उत्तर दिया, नहीं। इसके विपरीत, यदि कोई अशुद्ध मनुष्य किसी वस्तु को छूए, तो क्या वह अशुद्ध हो जाएगी या नहीं, तो याजकों ने उत्तर दिया और कहा, वह अशुद्ध होगी: प्रभु कहता है, यही दशा इस जाति की है, और इनके हाथों के कामों की भी। अब आओ देखें कि व्यवस्था के प्रतीकों और छायाओं में क्या निहित है। यदि कोई अशुद्ध मनुष्य किसी वस्तु को छू लेता, तो वह अशुद्ध हो जाती, और इसलिए उसे शुद्ध किया जाना आवश्यक था। हमारा प्रभु कहता है, विचार करो कि तुम क्या हो: क्योंकि तुम में अशुद्धता और मलिनता के सिवाय कुछ नहीं; तो भी तुम अपनी बलियों, भेंटों और ऐसी ही वस्तुओं से मुझे सन्तुष्ट करना चाहते हो। परन्तु वह कहता है, जब तक तुम्हारे मन बुरी अभिलाषाओं में उलझे हैं, जब तक तुम में कुछ व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, निन्दक और झूठी शपथ खानेवाले हैं, जब तक तुम छल, क्रूरता और द्वेष से भरे हो, तब तक तुम्हारे जीवन सर्वथा अधर्मी और सब प्रकार की अशुद्धता से भरे हैं; मैं इसे सह नहीं सकता, चाहे वह मनुष्यों के सामने कितना ही सुन्दर क्यों न दिखे।

तब हम देखते हैं कि जब तक हम हृदय में सचमुच सुधारे न जाएँ, तब तक जितनी सेवाएँ हम कर सकते हैं वे सब उपहास मात्र हैं; और परमेश्वर उनमें से हर एक की निन्दा करता और उसे ठुकरा देता है। परन्तु कौन इन बातों को ऐसा मानता है? जब दुष्ट लोग, जो अपनी दुष्टता में पकड़े जाते हैं, विवेक में कुछ पछतावा अनुभव करते हैं, तो वे किसी न किसी रीति से कुछ रीतियाँ निभाकर परमेश्वर से समझौता करने का यत्न करते हैं: वे इसे मनुष्यों के मन को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त समझते हैं, और मानते हैं कि परमेश्वर को भी इसी से सन्तुष्ट होना चाहिए। यह एक ऐसी रीति है जो सब युगों में चलती आई है।

केवल हाग्गै भविष्यद्वक्ता के इसी पाठ में परमेश्वर मनुष्यों के कपट पर, और इस सोच पर कि वे तुच्छ बातों से उसका अनुग्रह पा सकते हैं, उन्हें नहीं डाँटता, वरन् यह वह निरन्तर संघर्ष था जो सब भविष्यद्वक्ताओं का यहूदियों के साथ रहा। यशायाह 1:13, 14, 15 में कहा गया है: "व्यर्थ भेंट मत लाओ; धूप से मुझे घृणा है; नये चाँद और सब्त और सभाओं का पुकारना, मुझ से सहा नहीं जाता: महासभा के साथ ही साथ अधर्म को मैं सह नहीं सकता। तुम्हारे नये चाँदों और नियत पर्वों से मेरा जी घिन करता है; वे मुझे बोझ से जान पड़ते हैं, मैं उनको सहते सहते थक गया हूँ। जब तुम अपने हाथ फैलाओगे, तब मैं तुम से अपनी आँखें फेर लूँगा; तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तौ भी मैं न सुनूँगा; क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं।"

और फिर कहा गया है, "चाहे तुम मुझे होमबलि और अन्नबलि चढ़ाओ, तौ भी मैं उन्हें ग्रहण न करूँगा; और तुम्हारे मोटे पशुओं के मेलबलियों की ओर मैं ध्यान भी न दूँगा" (आमोस 5:22)। परमेश्वर यहाँ हमें दिखाता है कि जिन बातों की आज्ञा उसने स्वयं दी थी, वे भी जब कपटियों द्वारा निभाई और उनका दुरुपयोग की गईं, तो मलिन और अशुद्ध ठहरीं। इसलिए हम सीखें कि जब मनुष्य अपनी ही रीति से परमेश्वर की सेवा करते हैं, तब वे अपने आपको छलते और धोखा देते हैं। यशायाह के एक और पाठ में कहा गया है, "तुम से यह कौन चाहता है?" जिससे प्रकट होता है कि यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे कामों को ग्रहण करे, तो वे उसके ईश्वरीय वचन के अनुसार होने चाहिए।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जब सन्त पौलुस कहता है कि अशुद्धों के लिए कुछ भी शुद्ध नहीं, तो उसका अर्थ क्या है। और क्यों? क्योंकि उनकी बुद्धि और विवेक भी अशुद्ध हैं। इससे वह दिखाता है (जैसा मैंने पहले कहा) कि जब तक हम परमेश्वर की सेवा ठीक रीति से, उचित प्रकार से करना न सीख लें, तब तक हम अपने कामों से कुछ भी भला नहीं करेंगे; चाहे हम अपने आपको यह कहकर फुसलाएँ कि वे बड़े महत्त्व के हैं, और इस प्रकार अपने आपको थपकी देकर सुला दें।

अब आओ देखें कि पोप-मत की रीतियाँ क्या हैं। उनका मुख्य उद्देश्य अपने अतिरिक्त कामों के द्वारा, जैसा वे उन्हें कहते हैं, परमेश्वर से समझौता करना है; अर्थात् उनके अधिशेष काम; जो तब होते हैं जब वे उससे अधिक करते हैं जितना परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी है।

अपनी ही धारणाओं के अनुसार वे उसके प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर देते हैं, और अपने कामों से जो भुगतान वे करते हैं उससे उसे सन्तुष्ट कर देते हैं, और उसी का लेखा बना लेते हैं। जब वे सन्तों की पूर्व-सन्ध्याओं पर उपवास कर चुके, जब वे शुक्रवार को मांस खाने से बचे रहे, जब वे श्रद्धा से मिस्सा में उपस्थित हुए, जब उन्होंने पवित्र जल ले लिया, तब वे समझते हैं कि परमेश्वर को उनसे और कुछ माँगना नहीं चाहिए और उनमें कुछ भी चूक नहीं है।

परन्तु इस बीच वे अपने आपको लुचपन, व्यभिचार, झूठी शपथ, निन्दा आदि में लिप्त करने से नहीं रुकते: उनमें से हर एक इन्हीं दोषों में लगा रहता है; तो भी वे समझते हैं कि परमेश्वर को उन कामों से, जो वे उसे चढ़ाते हैं, अपने आपको भली-भाँति चुकाया हुआ मानना चाहिए; जैसे, उदाहरण के लिए, जब वे पवित्र जल ले चुके, मूर्तियों की पूजा कर चुके, एक वेदी से दूसरी वेदी तक भटक चुके, और ऐसी ही अन्य बातें कर चुके, तो वे कल्पना करते हैं कि उन्होंने अपने पापों का पर्याप्त भुगतान और प्रायश्चित्त कर दिया है। परन्तु हम पवित्र आत्मा की उस शिक्षा को सुनते हैं जो ऐसे लोगों के विषय में है जो अशुद्ध हैं; वह यह है कि उनके सारे कामों में कुछ भी शुद्ध या निर्मल नहीं।

परन्तु हम मान लें, कि पोप के अनुयायियों के सब घृणित काम अपने स्वभाव में बुरे नहीं थे; तो भी सन्त पौलुस की इसी शिक्षा के अनुसार उनमें अशुद्धता के सिवाय कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे स्वयं पापी और अशुद्ध हैं। इन मनुष्यों की पवित्रता चमक-दमक और तुच्छ बातों में है। वे उन बातों में परमेश्वर की सेवा करने का यत्न करते हैं जिनकी वह माँग नहीं करता, और साथ ही उन बातों को अधूरा छोड़ देते हैं जिनकी उसने अपनी व्यवस्था में आज्ञा दी है।

सब युगों में ऐसा ही होता आया है कि मनुष्यों ने अपनी ही रीतियों के कारण परमेश्वर की व्यवस्था को तुच्छ जाना है। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने फरीसियों को उलाहना दिया, जब उसने कहा, "तुम भी अपनी रीति के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो?" (मत्ती 15:3)। पहले समयों में, भविष्यद्वक्ताओं के दिनों में भी ऐसा ही था। यशायाह पुकारता है, "इस कारण प्रभु ने कहा, ये लोग जो मुँह से मेरे समीप आते और होंठों से मेरा आदर करते हैं, पर अपना मन मुझ से दूर रखते हैं, और जो मेरा भय मानते हैं, वह मनुष्यों की आज्ञा का केवल रटा हुआ पाठ है; इस कारण सुन, मैं इन लोगों के साथ फिर अद्भुत काम, हाँ, अति अद्भुत और आश्चर्य का काम करूँगा; तब इनके बुद्धिमानों की बुद्धि नष्ट होगी, और इनके प्रवीणों की प्रवीणता जाती रहेगी" (अध्याय 25:13)। जब तक मनुष्य रीतियों में लगे रहते हैं, वे उन बातों को छोड़ देते हैं जिनकी आज्ञा परमेश्वर ने अपने वचन में दी है।

इसी ने यशायाह को उनके विरुद्ध पुकारने पर विवश किया जो मनुष्यों की रीतियाँ आगे बढ़ाते थे; उसने उन्हें साफ़ बता दिया कि परमेश्वर ने उनमें के सबसे बुद्धिमानों को अन्धा कर देने की धमकी दी, क्योंकि वे उसके वचन के शुद्ध नियम से फिरकर अपनी ही मूर्खतापूर्ण गढ़न्तों के पीछे चलने लगे थे। सन्त पौलुस भी इसी बात की ओर संकेत करता है, जब वह कहता है कि उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं है। हम अपने आपको धोखा न दें; क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों से माँग करता है कि वे खराई से जीएँ, और सब हिंसा, क्रूरता, द्वेष और छल से दूर रहें; कि इनमें से कोई भी बात हमारे जीवन में दिखाई न दे। परन्तु जिनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं, यह प्रकट है कि वे बेकार हैं, और उनके सारे जीवन में अशुद्धता के सिवाय कुछ नहीं।

यदि हम जानना चाहते हैं कि हमारा जीवन कैसे नियमित किया जाना चाहिए, तो हम परमेश्वर के वचन की बातों की जाँच करें; क्योंकि हम बाहरी दिखावे और ठाठ-बाट से पवित्र नहीं ठहर सकते, चाहे वे मनुष्यों के बीच कितने ही आदर के क्यों न हों। हमें सच्चाई से परमेश्वर को पुकारना और अपना सारा भरोसा उसी पर रखना चाहिए; हमें गर्व और घमण्ड छोड़कर सच्ची दीनता के साथ उसकी शरण में आना चाहिए, ताकि हम शारीरिक अभिलाषाओं के वश में न हों। हमें यत्न करना चाहिए कि हम अपने आपको भय में रखें, परमेश्वर के अधीन रहें, और खादोदरता, व्यभिचार, अति, लूट, निन्दा और अन्य बुराइयों से भागें। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर हमसे क्या कराना चाहता है, ताकि हमारा जीवन भली-भाँति नियमित हो।

जब मनुष्य बाहरी कामों से अपने आपको धर्मी ठहराना चाहते हैं, तो यह गन्दगी के ढेर को साफ़ सूती कपड़े से ढाँकने के समान है। इसलिए जो मलिनता हमारे हृदयों में छिपी है, उसे दूर करें; मैं कहता हूँ, बुराई को अपने से निकाल फेंकें, तब प्रभु हमारे जीवन को ग्रहण करेगा: इस प्रकार हम देख सकते हैं कि परमेश्वर का सच्चा ज्ञान किसमें है! जब हम इसे ठीक रीति से समझ लेंगे, तो यह हमें उसकी इच्छा की आज्ञाकारिता में जीने की ओर ले जाएगा। मनुष्य इतने पशु-समान नहीं हो गए कि यह समझ ही न रखें कि कोई परमेश्वर है जिसने उन्हें रचा। परन्तु यह ज्ञान, यदि वे उसकी माँगों के आगे नहीं झुकते, तो उनके लिए दण्ड की आज्ञा का काम करता है: क्योंकि शैतान ने उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी है; यहाँ तक कि चाहे उन्हें सुसमाचार सुनाया भी जाए, तो भी वे उसे नहीं समझते; ऐसी दशा में हम आज बहुतों को देखते हैं। संसार में कितने ही हैं जिन्हें सुसमाचार की शिक्षा सिखाई गई, और फिर भी वे पशुवत् अज्ञानता में बने हैं!

ऐसा इसलिए होता है कि शैतान ने मनुष्यों के मनों को बुरी लालसाओं से ऐसा पहले ही भर रखा है कि चाहे प्रकाश कितना ही तेज़ चमके, वे अन्धे ही बने रहते हैं, और कुछ भी नहीं देखते। इसलिए हम सीखें कि परमेश्वर का सच्चा ज्ञान ऐसा स्वभाव रखता है कि वह अपने आपको प्रकट करता है, और हमारे सारे जीवन में फल लाता है। इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए, जैसा सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, हमें उसके स्वरूप में बदल जाना होगा। क्योंकि यदि हम उसे जानने का दिखावा करें, और इस बीच हमारा जीवन ढीला और दुष्ट हो, तो हमें झूठा ठहराने के लिए किसी गवाह की आवश्यकता नहीं; हमारा अपना जीवन ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण देता है कि हम ठट्ठा करनेवाले और झूठे हैं, और परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते हैं।

सन्त पौलुस एक और स्थान पर कहता है, यदि तुम यीशु मसीह को जानते हो, तो तुम्हें पुराने मनुष्यत्व को उतार डालना होगा: मानो वह कहे कि हम यह नहीं कह सकते कि हम यीशु मसीह को जानते हैं, केवल इसी से कि हम उसे अपना सिर मानें, और वह हमें अपने अंग मानकर ग्रहण करे; जो तब तक नहीं हो सकता जब तक हम पुराने मनुष्यत्व को उतार न फेंकें और नई सृष्टि न बन जाएँ। संसार ने सब समयों में परमेश्वर के नाम का दुष्टता से दुरुपयोग किया है, जैसा वह आज भी करता है; इसलिए हम परमेश्वर के वचन के उस सच्चे ज्ञान पर दृष्टि रखें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस करता है।

अन्त में, हम अपने ही कामों को तराज़ू पर न रखें और न कहें कि वे अच्छे हैं और हम उनके विषय में अच्छा सोचते हैं; वरन् यह समझें कि अच्छे काम वे हैं जिनकी आज्ञा परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में दी है, और इनके सिवाय जो कुछ हम कर सकते हैं वह कुछ भी नहीं। इसलिए हम अपने जीवनों को उसके अनुसार ढालना सीखें जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी है: उस पर भरोसा रखना, उसे पुकारना, उसका धन्यवाद करना, जो कुछ वह भेजना चाहे उसे धीरज से सहना; अपने पड़ोसियों के साथ खराई से व्यवहार करना, और सब मनुष्यों के सामने भली रीति से जीवन बिताना। ये वे काम हैं जो परमेश्वर हमसे चाहता है।

यदि हमारा स्वभाव इतना टेढ़ा न होता, तो हम में कोई ऐसा न होता जो इन बातों को पहचान न सके: बच्चों में भी इन्हें पहचानने की काफ़ी समझ होती। जिन कामों की आज्ञा परमेश्वर ने नहीं दी, वे मूर्खता और घृणित वस्तु मात्र हैं: जिनसे परमेश्वर की शुद्ध सेवा बिगड़ जाती है। यदि हम जानना चाहते हैं कि सन्त पौलुस जिन भले कामों की चर्चा करता है उनमें क्या-क्या आता है, तो हमें मनुष्यों की सब गढ़न्तों को एक ओर रख देना चाहिए और परमेश्वर के वचन में दिए निर्देशों का सीधे-सीधे पालन करना चाहिए; क्योंकि हमारे पास उस नियम के सिवाय कोई और नियम नहीं जो उसी का दिया हुआ है; और वही ऐसा है जिसे वह ग्रहण करेगा, जब हम अन्तिम दिन अपना लेखा देंगे, जब वह अकेला सारी मनुष्य-जाति का न्यायी होगा।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर के सम्मुख गिर पड़ें, अपने दोषों को मानते हुए, और उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें और स्पष्टता से देखने दे: और हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में हमें ऐसा भरोसा दे कि हम उसके पास आएँ और अपने पापों की क्षमा के विषय में निश्चित हों; और वह हमें खरे विश्वास का भागी बनाए, जिससे हमारी सारी मलिनता धुल जाए।

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मोनरजिज़्म बुक्स

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