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सब मनुष्यों का उद्धार - 1 तीमुथियुस 2:3-5
इसी को हमारा उद्धारकर्ता परमेश्वर अच्छा समझता और ग्रहण भी करता है। वह चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य को भली भाँति पहचान लें। क्योंकि परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है। - 1 तीमुथियुस 2:3-5।
जिन्हें परमेश्वर आदर देना चाहता है, यदि हम उन्हें तुच्छ जानें, तो यह मानो स्वयं उसी को तुच्छ जानना है; और यदि हम उन लोगों के उद्धार को कुछ भी न गिनें जिन्हें परमेश्वर अपनी ओर बुलाता है, तो भी यही बात ठहरती है। क्योंकि इससे ऐसा प्रतीत होता है कि हम उसे विनाश के मार्ग पर चलनेवाले बेचारे पापियों पर दया दिखाने से रोकना चाहते हैं। सन्त पौलुस यह तर्क इसलिए देता है कि परमेश्वर सारे संसार का उद्धार चाहता है, ताकि हम भी अपनी शक्ति भर उन लोगों के उद्धार की खोज करें जो परमेश्वर के राज्य से निष्कासित-से दिखाई देते हैं; विशेषकर जब तक वे अविश्वासी हैं।
हमें सदा ध्यान रखना चाहिए कि सन्त पौलुस के दिनों में संसार की दशा कैसी थी। उन दिनों संसार में सुसमाचार का प्रचार होना एक नई और अनोखी बात थी; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को चुन लिया है और शेष संसार उद्धार की सारी आशा से वंचित रखा जाएगा। और सचमुच हम देखते हैं कि पवित्र शास्त्र इस जाति के लेपालक होने का वर्णन किस प्रकार करता है; परन्तु सन्त पौलुस हमें आज्ञा देता है कि हम सारे संसार के लिए प्रार्थना करें; और यह निराधार नहीं है, क्योंकि वह इसका कारण भी जोड़ देता है, जिसका यहाँ उल्लेख है, अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो। मानो वह कह रहा हो, मेरे मित्रो, उचित है कि हम यह देखें कि परमेश्वर की इच्छा क्या है और उसका लक्ष्य क्या है; ताकि हम में से प्रत्येक जन ठीक रीति से उसकी सेवा करने में लग जाए।
इसलिए, जब परमेश्वर की इच्छा यही है कि सब मनुष्य उस उद्धार के सहभागी हों जिसे उसने अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में भेजा है, तो हमें चाहिए कि बेचारे, भोले और अज्ञानी प्राणियों को अपनी ओर खींचने का प्रयत्न करें, ताकि हम सब मिलकर स्वर्ग के राज्य की उस मीरास में आ पहुँचें जिसकी प्रतिज्ञा हमसे की गई है। परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सन्त पौलुस प्रत्येक व्यक्ति के विषय में नहीं, वरन् सब प्रकार के मनुष्यों और सब लोगों के विषय में कह रहा है। इसलिए जब वह कहता है कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो हमें यह नहीं समझना चाहिए कि वह उन्हें एक-एक करके गिनकर कह रहा है; उसका अर्थ यह है: कि जबकि बीते समयों में उसने एक विशेष जाति को अपने लिए चुन लिया था, अब वह सारे संसार पर दया दिखाना चाहता है; हाँ, उन पर भी जो उद्धार की आशा से बाहर किए हुए-से दिखाई देते थे।
वह एक और स्थान पर कहता है कि अन्यजाति लोग परमेश्वर से रहित थे और सब प्रतिज्ञाओं से शून्य थे; क्योंकि वे अब तक यहूदियों की संगति में नहीं लाए गए थे। यह एक विशेष अधिकार था जो परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों को दिया था। इसलिए सन्त पौलुस का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य को बचाएगा, परन्तु यह कि जो प्रतिज्ञाएँ केवल एक ही जाति को दी गई थीं वे अब सारे संसार में फैला दी गई हैं: क्योंकि जैसा वह इसी पत्री में कहता है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने पर बीच की दीवार गिरा दी गई। परमेश्वर ने यहूदियों को अन्य सब जातियों से अलग कर रखा था; परन्तु जब यीशु मसीह संसार के उद्धार के लिए प्रकट हुआ, तब वह भेद जो उनके और अन्यजातियों के बीच था, मिटा दिया गया।
इसलिए अब परमेश्वर हम सब को अपनाएगा: और यही हमारे उद्धार का प्रवेश-द्वार है। क्योंकि यदि वह बात सदा बनी रहती जिसे परमेश्वर ने केवल एक समय के लिए ठहराया था, तो हम सब श्रापित ही रहते; और सुसमाचार हमें सुनाया न जाता: हमारे पास परमेश्वर के प्रेम और भलाई का कोई चिह्न या निशान न होता। परन्तु अब हम उसकी सन्तान बन गए हैं; हम प्रतिज्ञाओं के लिए अब परदेशी नहीं रहे, जैसे हमारे पूर्वज थे: क्योंकि यीशु मसीह सब के लिए सामान्य रूप से उद्धारकर्ता होकर आया; उसने परमेश्वर पिता का अनुग्रह प्रस्तुत किया, ताकि सब उसे ग्रहण कर सकें।
जैसे सन्त पौलुस सब जातियों की बात करता है, वैसे ही वह सब अवस्थाओं के लोगों की भी बात करता है; मानो वह कह रहा हो, परमेश्वर राजाओं और अधिकारियों का भी उद्धार करेगा, जैसे औरों का: हमें उसकी पितृवत् भलाई को केवल अपने ही तक, या किसी निश्चित संख्या के लोगों तक सीमित नहीं करना चाहिए। और ऐसा क्यों? क्योंकि वह दिखाता है कि वह सब पर कृपालु होगा: सन्त पौलुस का आशय यही है। इस बात को पक्का करने के लिए वह यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर की इच्छा है कि सब सत्य के ज्ञान तक पहुँचें। हमें भली-भाँति ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस यह तर्क क्यों देता है; क्योंकि हम परमेश्वर की इच्छा को तब तक नहीं जान सकते जब तक वह हम पर प्रकट न की जाए; जब तक हमारे पास कोई चिह्न या निशान न हो जिससे हम उसे पहचान सकें। यह जानना कि परमेश्वर की युक्ति क्या है, हमारे लिए बहुत ऊँची बात है; परन्तु जहाँ तक वह उसे हमें अपने कार्य के द्वारा दिखाता है, वहीं तक हम उसे समझ पाते हैं।
सुसमाचार को परमेश्वर की सामर्थ्य कहा गया है, और उन सब के लिए उद्धार जो विश्वास करते हैं: हाँ, यह स्वर्गलोक का द्वार है। तब इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि परमेश्वर की इच्छा से सुसमाचार सारे संसार में सुनाया जाता है, तो यह इस बात का चिह्न है कि उद्धार सब के लिए सामान्य है। इस प्रकार सन्त पौलुस प्रमाणित करता है कि परमेश्वर की इच्छा है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो। उसने अपने प्रेरितों को केवल यहूदियों में अपने नाम की घोषणा करने के लिए नियुक्त नहीं किया, क्योंकि हम जानते हैं कि उन्हें यह आदेश दिया गया था कि सारी सृष्टि को प्रचार करें; और यरूशलेम से लेकर सामरिया में और वहाँ से सारे संसार में यीशु मसीह के गवाह हों।
क्या प्रेरित इसलिए भेजे गए हैं कि सब लोगों और सब अवस्थाओं के मनुष्यों में परमेश्वर के सत्य का प्रचार करें? तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर अपने आप को सारे संसार के सामने प्रस्तुत करता है, कि प्रतिज्ञा क्या छोटे क्या बड़े सब की है, अब अन्यजातियों की भी उतनी ही जितनी पहले यहूदियों की थी। परन्तु आगे बढ़ने से पहले उन लोगों की मूर्खता को, बल्कि पशुता को, चूर करना आवश्यक है जो सन्त पौलुस के इस वचन का दुरुपयोग करते हैं; जो परमेश्वर के चुनाव को निष्फल ठहराने और उसे सर्वथा मिटा देने का यत्न करते हैं। वे कहते हैं, यदि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो इससे यह निकलता है कि उसने मनुष्यों में से एक निश्चित संख्या को नहीं चुना और शेष को त्याग नहीं दिया, वरन् उसकी इच्छा सब के प्रति एक-सी बनी रहती है।
वे दावा करते हैं कि यह मनुष्यों की पसन्द पर छोड़ा गया है कि वे अपना उद्धार करें या न करें; कि परमेश्वर हमें हमारे हाल पर छोड़ देता है, और देखता रहता है कि हम उसके पास आएँगे या नहीं; और इस प्रकार जो उसके पास आते हैं उन्हें ग्रहण करता है। परन्तु इस बीच वे हमारे उद्धार की नींव ही को नष्ट कर देते हैं; क्योंकि हम जानते हैं कि हम ऐसे श्रापित हैं कि उद्धार की मीरास हम से दूर है: यदि हम कहें कि यीशु मसीह इसका उपाय करने आया है, तो हमें मनुष्य के स्वभाव की जाँच करनी होगी। हम अपने स्वभाव में इतने विपरीत और परमेश्वर के ऐसे शत्रु हैं कि उसका विरोध किए बिना रह ही नहीं सकते: हम बुराई और दुष्टता की ओर ऐसे झुके हुए हैं कि एक भला विचार तक नहीं सोच सकते। तब यह कैसे हो सकता है कि हम उस उद्धार के भागी हों जो सुसमाचार में प्रस्तुत किया जाता है, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें उसकी ओर न खींचे? अब देखें कि परमेश्वर सारे संसार को उसकी ओर खींचता है या नहीं। नहीं, नहीं; नहीं तो हमारे प्रभु यीशु मसीह का यह कहना व्यर्थ होता, "कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक पिता जिसने मुझे भेजा है उसे खींच न ले" (यूहन्ना 6:44)। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना ही होगा कि यह एक विशेष अनुग्रह है जो परमेश्वर उन्हीं पर करता है जिन्हें वह चाहता है, कि उन्हें इस रीति से खींचे और सिखाए कि वे सुसमाचार पर विश्वास करें और सच्चे विश्वास के साथ उसे ग्रहण करें।
और अब, परमेश्वर एक को क्यों चुनता है और दूसरे को क्यों छोड़ देता है? हम जानते हैं कि मनुष्य अपनी योग्यता से परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, और न ही चुने हुए लोग इसके योग्य हैं कि अपने साथियों से बढ़कर ठहराए जाएँ, मानो उनमें कोई योग्यता हो। तब इससे यह निकलता है कि जगत की सृष्टि से पहले (जैसा सन्त पौलुस इफिसियों के पहले अध्याय में कहता है) परमेश्वर ने उन्हें चुन लिया जिन्हें उसने चाहा: और हम नहीं जानते कि इस मनुष्य को उस मनुष्य की अपेक्षा क्यों चुना गया। फिर भी हमें मानना चाहिए कि परमेश्वर जो कुछ करता है वह न्यायपूर्वक किया जाता है, चाहे हम उसे समझ न सकें। इसलिए जिस बात का हमें पवित्र शास्त्र में इतना पक्का प्रमाण मिलता है, उसे हम ग्रहण करें; और उन मनुष्यों की निरर्थक युक्ति की आड़ में, जो परमेश्वर के वचन से अनजान हैं, अपने आप को भटकने न दें।
पहली दृष्टि में उनके तर्क में कुछ वज़न दिखाई देता है: परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो: इसलिए, वे कहते हैं, यह प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्र पसन्द पर छोड़ा गया है कि वह विश्वास में प्रकाशित हो और उद्धार का भागी बने। यदि कोई मनुष्य केवल तीन पंक्तियाँ भी पढ़े, तो सहज ही देख लेगा कि सन्त पौलुस यहाँ प्रत्येक व्यक्ति के विषय में नहीं कह रहा, जैसा हम पहले दिखा चुके हैं, परन्तु सब लोगों और सब अवस्थाओं के मनुष्यों के विषय में कह रहा है। वह दिखाता है कि अब वैसी बात नहीं रही जैसी मसीह के आने से पहले थी, जब केवल एक ही चुनी हुई जाति थी, परन्तु अब परमेश्वर अपने आप को सारे संसार का उद्धारकर्ता प्रकट करता है; जैसा लिखा है, तेरी मीरास पृथ्वी की छोर तक होगी।
इसके अतिरिक्त, ताकि कोई अपने आप को धोखा न दे, या उन लोगों की निरर्थक और मूर्खतापूर्ण बातों से भरमाया न जाए जो पवित्र शास्त्र को बिगाड़ते हैं, आइए हम जाँचें कि परमेश्वर और सारी भक्ति के इन शत्रुओं का सिद्धान्त कहाँ ठहरता है। परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; अर्थात् जैसा वे कल्पना करते हैं, प्रत्येक जन का। यदि अभी परमेश्वर की यही इच्छा है, तो निःसन्देह जगत के आरम्भ से भी यही थी: क्योंकि हम जानते हैं कि उसका मन बदलता नहीं। तो यदि आज परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो उसका मन सदा से ऐसा ही था; और यदि उसका मन सदा से ऐसा था, तो सन्त पौलुस के इस कथन का क्या करें? कि वह चाहता है कि सब मनुष्य सत्य के ज्ञान तक पहुँचें। उसने केवल एक ही जाति को अपने लिए चुना, जैसा लिखा है (प्रेरितों के काम 14) और बेचारे अन्यजातियों को उनके अपने अज्ञान में चलने दिया।
कुछ ऐसे देश भी थे जहाँ उसने सन्त पौलुस को प्रचार करने न दिया; जैसे बितूनिया और फ्रूगिया में (प्रेरितों के काम 16:7)। और इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर यह नहीं चाहता था कि सुसमाचार का ज्ञान आरम्भ ही में प्रत्येक जन तक पहुँचे। इस प्रकार हम उन लोगों की भूल सहज ही देख सकते हैं जो इस पद का दुरुपयोग करते हैं। सन्त पौलुस इस स्थान पर परमेश्वर की युक्ति की बात नहीं करता, और न वह हमें उसके सनातन चुनाव की ओर ले जाना चाहता है, जो जगत के आरम्भ से पहले का था: परन्तु केवल यह दिखाता है कि उसकी इच्छा और प्रसन्नता क्या है, जहाँ तक हमें उसे जानना चाहिए।
यह सच है कि परमेश्वर बदलता नहीं; न उसकी दो इच्छाएँ हैं; न वह कोई कपटपूर्ण व्यवहार करता है: तो भी पवित्र शास्त्र उसकी इच्छा के विषय में हम से दो प्रकार से बोलता है। और यह कैसे हो सकता है? ऐसा कैसे होता है कि उसकी इच्छा का वर्णन दो भिन्न रीतियों से किया जाता है? यह हमारी स्थूलता और समझ की कमी के कारण है। वह अपने आप को आँखों, कानों और नाक से युक्त क्यों बताता है? वह मनुष्यों की भावनाएँ अपने ऊपर क्यों लेता है? वह क्यों कहता है कि वह क्रोधित है, वह खेदित है? क्या इसलिए नहीं कि हम उसे उसकी अगम्य महिमा में समझ नहीं सकते? इसलिए यह अनुचित नहीं कि पवित्र शास्त्र परमेश्वर की इच्छा के विषय में हम से दो प्रकार से बोले: इसलिए नहीं कि उसकी इच्छा दोहरी है, परन्तु इसलिए कि वह अपने आप को हमारी निर्बलता के अनुकूल बना ले, यह जानते हुए कि हमारी समझ स्थूल और मन्द है।
जब पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले उन्हें चुन लिया जिन्हें उसने चाहा, तब हम एक ऐसी युक्ति को देखते हैं जिसमें हम प्रवेश नहीं कर सकते। तो फिर पवित्र शास्त्र हमें क्यों बताता है कि परमेश्वर का यह चुनाव और पसन्द सनातन है? यह बिना कारण नहीं है; क्योंकि यदि इस शिक्षा को जैसा चाहिए वैसा ग्रहण किया जाए, तो यह बहुत लाभदायक है। क्योंकि इसके द्वारा हमें स्मरण दिलाया जाता है कि हम अपनी योग्यता के कारण सुसमाचार के ज्ञान के लिए नहीं बुलाए गए। हम औरों से अच्छे नहीं, क्योंकि हम सब आदम की श्रापित जड़ से उपजे हैं; हम सब एक ही दण्ड के आधीन हैं; और हम सब पाप और मृत्यु की दासता के अधीन बन्द किए गए हैं।
जब परमेश्वर को यह भाया कि हमें अविश्वास के अन्धकार से निकाले और हमें सुसमाचार का प्रकाश दे, तब उसने किसी ऐसी सेवा पर दृष्टि नहीं की जो हम ने की हो, या किसी ऐसे गुण पर जो हम में रहा हो: परन्तु उसने हमें बुलाया, क्योंकि उसने हमें पहले से चुन रखा था। सन्त पौलुस रोमियों 8 में इसी क्रम का उल्लेख करता है: कि परमेश्वर को जानकर हमें महिमा अपने लिए नहीं लेनी चाहिए। इस प्रकार विश्वासियों की बुलाहट परमेश्वर की इसी युक्ति पर टिकी है; और हम देखते हैं कि प्रभु ने जो कुछ हमारे जन्म से पहले ठहराया था, उसमें से कितना हम पर प्रकट किया है। वह अपने पवित्र आत्मा से हमें छूता है, और हम मानो हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में कलम की भाँति लगाए जाते हैं। यही हमारे लेपालकपन का सच्चा बयाना है: यही वह प्रतिज्ञा-चिह्न है जो हमें दिया गया है कि हम निःसन्देह हो जाएँ कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान ठहराता और रखता है, जब विश्वास के द्वारा हम यीशु मसीह के साथ एक हो जाते हैं, जो परमेश्वर का एकलौता पुत्र है, और जिसका जीवन की मीरास पर अधिकार है।
परमेश्वर हमें अपनी इच्छा की ऐसी पक्की गवाही देता है कि हमारे अज्ञान के होते हुए भी वह हमें अपने चुनाव के विषय में निःसन्देह कर देता है; वह हमें ऐसी आशा देता है जिससे हम सर्वथा रिक्त रहते, यदि यीशु मसीह हमें अपनी देह के अंग होने के लिए न बुलाता। इस प्रकार हम देखते हैं कि चुनाव की यह शिक्षा हमारे लिए कितनी लाभदायक है: यह हमें दीन बनाती है, यह जानते हुए कि हमारा उद्धार न हमारी योग्यता पर, न उस गुण पर जो परमेश्वर ने हम में पाया हो, टिका है: परन्तु उस चुनाव पर जो हमारे जन्म से पहले, हमारे भला या बुरा कुछ भी करने से पहले किया गया था।
जब हम जानते हैं कि इसी अटल चुनाव के अनुसार परमेश्वर ने हमें अपनी ओर बुलाया है, तब हम अपने उद्धार के विषय में और भी अधिक निःसन्देह हो जाते हैं। यीशु मसीह कहता है, जो कुछ पिता ने मुझे दिया है उसे मुझ से कोई छीन नहीं सकता (यूहन्ना 10)। पिता ने यीशु मसीह को क्या दिया है? उन्हें जिन्हें उसने चुना है, और जिन्हें वह जानता है कि वे उसके हैं। जब बात ऐसी है कि परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र को दिया है कि वह हमें सम्भाले और हमारी रक्षा करे, और कि यीशु मसीह प्रतिज्ञा करता है कि हम में से कोई नाश न होगा, वरन् वह ईश्वरत्व की सारी शक्ति और सामर्थ्य हमें बचाने और हमारी रक्षा करने में लगाएगा, तो क्या यह ऐसी शान्ति नहीं जो जगत के सब धनों से बढ़कर है? क्या यही वह सच्ची नींव नहीं जिस पर हमारे उद्धार की सारी निश्चयता और पक्कापन स्थिर है?
हम डालियों पर बैठी चिड़ियों के समान हैं, और शैतान का शिकार बनने को रखे गए हैं। तब कल के विषय में, और अपने सारे जीवन के विषय में, हाँ, और मृत्यु के बाद के विषय में भी हमें क्या निश्चय हो सकता, यदि यह न होता कि परमेश्वर, जिसने हमें बुलाया है, अपने काम को वैसे ही पूरा करेगा जैसे उसने आरम्भ किया है? उसने हमें अपने सुसमाचार के विश्वास में कैसे इकट्ठा किया? क्या यह हम पर आधारित है? नहीं, सर्वथा इसके विपरीत; यह उसके स्वतन्त्र चुनाव से निकलता है। इसलिए हम और भी अधिक सन्देह से मुक्त हो सकते हैं। हमें परमेश्वर की युक्ति के विषय में उससे अधिक जानने का यत्न नहीं करना चाहिए जितना पवित्र शास्त्र में प्रकट किया गया है।
परमेश्वर की इच्छा हम पर तब-तब खोली जाती है जब-जब हम उसका वचन प्रचार होते सुनते हैं, जिसके द्वारा वह हम सब को पश्चाताप के लिए बुलाता और समझाता है। जब वह एक बार हमें दिखा चुका कि हम उसकी दृष्टि में सब दोषी ठहरे हैं, और हम में दण्ड के सिवा और कुछ नहीं, तब वह हमें दिखाता है कि हमें अपने आप का इनकार करके इस अथाह गड्ढे से बाहर निकलना है। इस बात से कि परमेश्वर सब मनुष्यों को समझाता है, हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उसकी इच्छा है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो: जैसा वह भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा कहता है, "क्या मुझे दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्नता होती है? प्रभु यहोवा की यह वाणी है; क्या इससे नहीं कि वह अपने मार्ग से लौटकर जीवित रहे?" (18:23)। "उनसे कह, प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की शपथ, मुझे दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्नता नहीं होती, परन्तु इससे कि दुष्ट अपने मार्ग से लौटकर जीवित रहे" (33:11)।
परमेश्वर कैसे चाहता है कि पापी फिरें? और हम यह कैसे जानें? जबकि वह चाहता है कि सारे संसार में मन फिराव का प्रचार किया जाए। जब कहा जाता है कि परमेश्वर उन पापियों पर दया करेगा जो उसके पास आएँगे और मसीह के नाम से क्षमा माँगेंगे, तो यह एक सामान्य शिक्षा है। इसलिए जब कहा जाता है कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो हमारी कल्पना या अनुमान का विचार नहीं किया जाता, अर्थात् जहाँ तक हमारा ज्ञान उसे समझ सकता है। जब पवित्र शास्त्र परमेश्वर के प्रेम और इच्छा की बात करता है, तो देखें कि मनुष्य अपने ही कामों से, स्वयं सीखकर, मन फिरा सकते हैं, या यह परमेश्वर है जो उसे देता है।
परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है, मैं चाहता हूँ कि सब मनुष्य फिरें और जीवित रहें। क्या मनुष्य अपने कामों से अपने आप को फेर सकता है? नहीं: क्योंकि यदि यह हमारे वश में होता, तो यह हमें बनाने से भी बड़ी बात होती। सारे पवित्र शास्त्र में यह एक निर्विवाद शिक्षा है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें फेरने की प्रशंसा स्वयं अपने लिए लेता है। वह कहता है, "मैं तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा: और मैं उनकी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर उन्हें माँस का हृदय दूँगा" (यहेजकेल 11:19)। संक्षेप में, विश्वासियों को जितना परमेश्वर की महिमा करना चाहिए उतना और कुछ नहीं, यह मानते हुए कि केवल वही हमें फेर सकता है; और कि उसने हमें इस रीति से लेपालक लिया है कि उसे अपने आत्मा के अनुग्रह से हमें खींचना ही पड़ता है।
क्या मनुष्यों में ऐसा ज्ञान है कि वे इस विश्वास तक, इस अद्भुत बुद्धि तक पहुँच सकें जो सुसमाचार में निहित है, जिसके सामने स्वयं स्वर्गदूत भी श्रद्धा से झुकते हैं? आइए ध्यान दें कि परमेश्वर अपने वचन में हम से क्या कहता है: कि वह हमारी आँखें खोलेगा और हमारे कान खोल देगा; क्योंकि स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के रहस्यों का कोई अंश नहीं समझता; क्योंकि पवित्र आत्मा ही है जो उन्हें हम पर प्रकट करता है। पवित्र शास्त्र का एक भी अंश पढ़ना कठिन है जिसमें कोई ऐसा वाक्य न मिले जो हमें बताए कि मनुष्य स्वभाव से सर्वथा अन्धे हैं जब तक परमेश्वर उनकी आँखें न खोले। वे किसी रीति से उसके पास नहीं आ सकते, जब तक वह उन्हें न खींचे, और अपने पवित्र आत्मा से उन्हें प्रकाश न दे।
जब परमेश्वर ही अकेला मनुष्यों को उनकी दुष्टता से फेरता है, तब अनुभव हमें सिखाता है, और पवित्र शास्त्र भी, कि वह अपना अनुग्रह सब मनुष्यों को नहीं देता। लिखा है, "यहोवा ने तुम्हें आज के दिन तक न समझनेवाला मन, न देखनेवाली आँखें, और न सुननेवाले कान दिए हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:4)। स्पष्ट दिखाया गया है कि परमेश्वर अपना अनुग्रह बिना दिशा के नहीं बिखेरता, परन्तु यह केवल उन्हीं के लिए है जिन्हें उसने चुना है, जो उसकी कलीसिया की देह के, और उसके झुण्ड के हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि जब सन्त पौलुस कहता है, परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो उसका क्या अर्थ है: अर्थात् वह सब जातियों और सब अवस्थाओं में से कुछ को चाहता है।
कहा जाता है कि वह अपना सुसमाचार सब को देता है, जो हमें उद्धार की ओर खींचने का साधन है। और क्या यह सब मनुष्यों को लाभ पहुँचाता है? नहीं; इसके साक्षी हमारी अपनी आँखें हैं। क्योंकि जब हम परमेश्वर का सत्य सुनते हैं, यदि हम उसके विरुद्ध बलवा करें, तो यह हमारे लिए बड़े दण्ड का कारण बनता है। फिर भी ऐसा ही है कि बहुत से लोग हैं जो सुसमाचार से लाभ नहीं उठाते, वरन् और बिगड़ जाते हैं, वे भी जिन्हें वह सुनाया जाता है; इसलिए वे सब बचाए नहीं जाते। परमेश्वर को हमें उद्धार तक पहुँचाने के लिए और आगे जाना होगा; उसे केवल मनुष्यों को ठहराना और उन्हें भेजना ही नहीं कि हमें विश्वासयोग्य रीति से सिखाएँ, परन्तु हमारे हृदयों में कार्य करना होगा। उसे हमें मर्म तक छूना होगा, उसे हमें अपनी ओर खींचना होगा, उसे अपने काम को हमारे लिए लाभदायक बनाना होगा, और उसे हमारे हृदयों में जड़ पकड़वानी होगी।
यह प्रकट है कि हमें परमेश्वर की इच्छा को दो रीतियों से देखना है: इसलिए नहीं कि वह स्वयं में दोहरी है (जैसा हम पहले कह चुके), परन्तु हमें उसे अपनी निर्बलता के अनुकूल ठहराया हुआ मानना चाहिए। वह अपने वचन में हम से अपनी बात हमारी क्षमता के अनुसार कहता है। यदि परमेश्वर अपनी महिमा के अनुसार बोलता, तो उसकी वाणी हमारी समझ से परे होती; वह हमें सर्वथा घबरा देती! क्योंकि यदि हमारी आँखें सूर्य के तेज को सह नहीं सकतीं, तो क्या हमारे मन परमेश्वर की अनन्त महिमा को समझ सकेंगे? ये भोले मनुष्य जो परमेश्वर के चुनाव को नष्ट करना चाहते हैं, उन्हें इस पद का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए; न यह कहना चाहिए कि हम परमेश्वर की दो इच्छाएँ ठहराते हैं; क्योंकि ऐसा कहकर वे निर्लज्जता से हमारी बात को बिगाड़ते हैं। हम कहते हैं, जहाँ तक हम देख सकते हैं, परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, जब कभी और जितनी बार भी वह हमारे बीच अपने सुसमाचार का प्रचार ठहराता है।
जैसा हम पहले कह चुके, स्वर्गलोक का द्वार हमारे लिए तब खुलता है जब हम उस छुटकारे के सहभागी होने के लिए बुलाए जाते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा हमारे लिए मोल लिया गया। और जहाँ तक हम समझ सकते हैं, परमेश्वर की इच्छा यही है: कि जब वह हमें पश्चाताप के लिए समझाता है, तब वह हमें ग्रहण करने को तैयार है, यदि हम उसके पास आएँ। यद्यपि हम ने उन सन्देहों का उत्तर दे दिया है जो इस विषय में उठाए जा सकते थे, तथापि इस शिक्षा को और सरल बनाने के लिए हम एक उपमा देंगे। (उपमा से मेरा तात्पर्य उस मेल और समानता से है जो परमेश्वर ने इस्राएलियों और हमारे बीच ठहराई है।) परमेश्वर कहता है कि उसने अब्राहम की सन्तान को अपनी मीरास के लिए चुना और उन्हें अपने लिए समर्पित किया: उसने उनसे प्रेम किया और उन्हें अपने घराने के लोग बना लिया (व्यवस्थाविवरण 7)।
यह सच है; क्योंकि उसने उन सब से अपनी वाचा बाँधी जिनका खतना हुआ था। क्या खतना एक व्यर्थ चिह्न और तुच्छ बात थी? नहीं, यह एक पक्का और निर्विवाद चिह्न था कि परमेश्वर ने उस जाति को अपनी निज प्रजा के रूप में चुन लिया है, और उस वंश के सब लोगों को अपने झुण्ड में गिनता है। फिर भी, क्या उस जाति के कुछ लोगों पर विशेष अनुग्रह न था?
निश्चय था, जैसा सन्त पौलुस बताता है, "क्योंकि जो इस्राएल के वंश के हैं, वे सब इस्राएली नहीं; और न अब्राहम के वंश होने के कारण सब उसकी सन्तान ठहरे" (रोमियों 9:6, 7), क्योंकि परमेश्वर ने कुछ को इस लाभ से वंचित रखा, ताकि उन पर जिन्हें उसने अपनी ओर बुलाया, उसकी कृपा और भलाई और भी बड़ी दिखाई दे। देखो, इसलिए, परमेश्वर की जो इच्छा इस्राएलियों पर प्रकट हुई थी, वही आज हम पर प्रकट की गई है।
आमोस 4:7 में कहा गया है, "मैं ने एक नगर में जल बरसाया, और दूसरे नगर में न बरसाया।" इसी प्रकार प्रभु अपना सुसमाचार जहाँ चाहता है वहाँ भेजता है: उसका अनुग्रह सारे संसार पर उण्डेला जाता है; फिर भी यह हो नहीं सकता कि वह उनके साथ, जिन्हें वह अपनी ओर खींचता है, भिन्न रीति से कार्य न करे, क्योंकि हम सब के कान बन्द हैं, और आँखों पर पट्टी बँधी है। जब तक वह हमें अपना वचन ग्रहण करने के योग्य न बनाए, हम बहरे और अन्धे हैं। जब सुसमाचार हमें सुनाया जाता है, तो यह मानो परमेश्वर का अपना हाथ बढ़ाना है (जैसा वह यशायाह 65:2 में कहता है) और हम से यह कहना है, मेरे पास आओ। यह ऐसी बात है जो हमारे हृदय को छू जानी चाहिए जब हम देखते हैं कि परमेश्वर हमें ढूँढ़ने आता है। वह इसकी प्रतीक्षा नहीं करता कि हम उसके पास आएँ, परन्तु हमें दिखाता है कि वह हमें ग्रहण करने को तैयार है, चाहे हम उसके प्राणघातक शत्रु ही क्यों न रहे हों। वह हमारे सब दोष मिटा देता है, और हमें उस उद्धार का सहभागी बनाता है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा हमारे लिए मोल लिया गया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सुसमाचार कितना आदर के योग्य है, और यह कैसा धन है! जैसा सन्त पौलुस रोमियों से कहता है, "वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है": यह स्वर्ग का राज्य है; और परमेश्वर द्वार खोलता है, ताकि हम उस अथाह गड्ढे से निकाले जाकर, जिसमें हम स्वभाव से डूबे हुए थे, उसकी महिमा में प्रवेश करें। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारे लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम उस वचन को ग्रहण कर लें जो मनुष्य के मुँह से हमें सुनाया जाता है, परन्तु उसे सुन लेने के बाद परमेश्वर को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम से भीतर में बोलना होगा; क्योंकि हमें सत्य के ज्ञान तक पहुँचाने का यही एकमात्र उपाय है। इसलिए जब परमेश्वर ने हम पर ऐसी दया की है कि हमें विश्वास का प्रकाश दिया, तो आइए हम उसे दृढ़ता से थामे रहें, और उससे प्रार्थना करें कि वह उसे बनाए रखे और अपने काम को सिद्ध करे।
हम अपने आप को औरों से घमण्ड के साथ ऊँचा न करें, मानो हम उनसे अधिक योग्य हों, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा परमेश्वर ही है जिसने हमें चुना है, और अपनी निरी भलाई और स्वतन्त्र दया से हमें औरों से अलग ठहराया है। हमें यह भी जानना चाहिए कि जब परमेश्वर मनुष्यों को अपना वचन देता है और वे उसे ग्रहण नहीं करते, तब वे बहुत दोषी हैं। यह इसलिए कहा गया है कि अविश्वासियों और विद्रोहियों के मुँह बन्द किए जाएँ, ताकि वे परमेश्वर के नाम की निन्दा न करें, मानो उसकी ओर से कोई कमी रही हो; और इसलिए भी कि सब विश्वासी दीन हृदय से परमेश्वर की महिमा करें, उसके उस अनुग्रह और दया के लिए जो उसने उन पर की है: क्योंकि हम देखते हैं कि वह उन सब को जिन्हें उसका वचन सुनाया जाता है, उद्धार के लिए बुलाता है।
यदि मनुष्य यह उत्तर दें कि वे परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, तो हम यहाँ उनकी पैरवी करने को खड़े नहीं रह सकते, क्योंकि दोष सदा अपने ही में पाएँगे। यदि कोई कहे, यह केवल परमेश्वर के हाथ में है, और यदि वह मुझे पश्चाताप देना चाहता तो क्या नहीं दे सकता था! यदि मैं अपनी कठोरता और द्वेष में हठीला बना रहूँ, तो इस दशा में मैं क्या कर सकता हूँ, जब परमेश्वर मुझे पश्चाताप नहीं देता कि मैं उसकी ओर फिरूँ? यह किसी भी रीति से मानने योग्य नहीं; क्योंकि परमेश्वर हमें अपनी ओर पर्याप्त रूप से बुलाता है, और हम उस पर निर्दयता का दोष नहीं लगा सकते; चाहे हमारे पास उसका वचन न भी होता, तो भी हमें मानना ही पड़ता कि वह धर्मी है, यद्यपि हम उस कारण को नहीं जानते जिसने उसे हमें उससे वंचित करने को प्रेरित किया।
जब हम परमेश्वर के पास आने के लिए बुलाए जाते हैं, और जानते हैं कि वह हमें ग्रहण करने को तैयार है, तो यदि हम न आएँ, तो क्या हम इनकार कर सकते हैं कि हम कृतघ्न हैं? हम उद्धार को सत्य के ज्ञान से अलग न करें; क्योंकि जब वह कहता है कि जब वे सत्य के ज्ञान तक पहुँचेंगे तो उनका उद्धार होगा, तब परमेश्वर का आशय झूठ बोलना या मनुष्यों को धोखा देना नहीं है। परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; पर कैसे? यदि वे सत्य के ज्ञान तक आना चाहें। प्रत्येक मनुष्य उद्धार पाना चाहेगा, परन्तु कोई मनुष्य परमेश्वर के निकट नहीं आना चाहता। पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि यदि हम उद्धार चाहते हैं, तो हमें उन साधनों पर ध्यान देना चाहिए जो परमेश्वर ने ठहराए हैं; अर्थात् हमें उसके वचन को आज्ञाकारिता और विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए।
पवित्र शास्त्र कहता है कि अनन्त जीवन यह है: अर्थात् परमेश्वर पिता को जानना, और मसीह को अपना एकमात्र उद्धारकर्ता मानकर ग्रहण करना। इसलिए आइए हम सीखें, जैसा यहाँ बताया गया है, कि अपने उद्धार की निश्चयता के विषय में सन्देह न करें; क्योंकि परमेश्वर का राज्य हमारे भीतर है। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें ग्रहण करे, तो हमें वह शिक्षा ग्रहण करनी होगी जो सन्त पौलुस ने हमें दी है। हम उद्धार की आशा के लिए कैसे बुलाए गए हैं? परमेश्वर के अनुग्रह के प्रभाव से, जो हम पर अपना प्रेम और कृपा प्रकट करता है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि जब सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर चाहता है कि उसका अनुग्रह सारे संसार पर प्रकट किया जाए, और उसका सुसमाचार सारी सृष्टि को सुनाया जाए, तो उसका अर्थ क्या है। इसलिए हमें जहाँ तक हो सके यत्न करना चाहिए कि जो विश्वास से अपरिचित हैं, और परमेश्वर की भलाई से सर्वथा वंचित-से दिखाई देते हैं, उन्हें उद्धार स्वीकार करने के लिए मनाएँ।
यीशु मसीह थोड़े ही लोगों का उद्धारकर्ता नहीं है, वरन् वह अपने आप को सब के सामने प्रस्तुत करता है। जितनी बार सुसमाचार हमें सुनाया जाता है, हमें विचार करना चाहिए कि परमेश्वर हमें अपनी ओर बुला रहा है: और यदि हम इस बुलाहट पर ध्यान दें, तो यह व्यर्थ न होगा, और न परिश्रम निष्फल जाएगा। परन्तु क्या हम बिना किसी सहायता के, उसके सिवा जो हमें अपने ही स्वभाव से मिलता है, उसके पास आ सकते हैं? हाय, हम नहीं आ सकते! "क्योंकि शारीरिक मन परमेश्वर से बैर रखता है; क्योंकि वह न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है" (रोमियों 8:7)। जब परमेश्वर हम पर ऐसी कृपा करता है कि अपने पवित्र आत्मा से हमारे हृदयों को छूता है, तब वह अपने सुसमाचार को हमारे उद्धार के लिए फलदायक बनाता है; तब वह उस सामर्थ्य को प्रकट करता है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस ने की है।
फिर, जब सुसमाचार हमें सुनाया जाता है, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह हमें और अधिक निरुत्तर करने के लिए है। जब परमेश्वर ने हमें पहले ही दिखा दिया है कि यदि हम उसके पास आएँ तो वह हम पर दया करने को तैयार है, तो यदि हम इतने दुष्ट हों कि पीछे हट जाएँ जबकि वह इतनी कोमलता और प्रेम से बुलाता है, तो निःसन्देह हमारा दण्ड और बढ़ जाएगा। तो भी, (जैसा हमें यहाँ समझाया गया है), आइए हम सब मनुष्यों के लिए सामान्य रूप से प्रार्थना करना न छोड़ें; क्योंकि सन्त पौलुस दिखाता है कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; अर्थात् सब लोगों और जातियों के मनुष्यों का।
यद्यपि हम मनुष्यों में बड़ी विविधता देखते हैं, तो भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि परमेश्वर ने हम सब को अपने ही स्वरूप और समानता में बनाया है, और कि हम उसके हाथ की कारीगरी हैं; इसलिए वह अपनी भलाई उन तक भी पहुँचाता है जो दूर हैं, जिसका हमें यथेष्ट प्रमाण मिल चुका है: क्योंकि जब उसने हमें अपनी ओर खींचा, तो क्या हम उसके शत्रु न थे? तो फिर यह कैसे हुआ कि अब हम विश्वास के घराने के, परमेश्वर की सन्तान, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं? क्या इसलिए नहीं कि उसने हमें अपने पास इकट्ठा कर लिया? और क्या वह हमारा ही नहीं, वरन् सारे जगत का उद्धारकर्ता नहीं है? क्या यीशु मसीह केवल दो या तीन मनुष्यों का मध्यस्थ होने आया? नहीं, नहीं; वह तो परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ है।
इसलिए हम और भी निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान ठहराता और रखता है, यदि हम उन्हें जो दूर हैं उसके पास लाने का यत्न करें। आइए हम अपने आप को शान्ति दें, और अपनी इस बुलाहट में साहस बाँधें: यद्यपि आज बड़ी बेसहारा दशा है, यद्यपि हम दुखी प्राणी, सर्वथा त्यागे हुए और दोषी ठहरे हुए दिखाई देते हैं, तो भी हमें जहाँ तक हो सके परिश्रम करना चाहिए कि जो दूर दिखाई देते हैं उन्हें उद्धार की ओर खींचें। और सब से बढ़कर, आइए हम उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें, धीरज से उस समय की प्रतीक्षा करते हुए जब उसे भाए कि उनके प्रति अपनी भली इच्छा प्रकट करे, जैसे उसने हमारे प्रति प्रकट की है।
