अध्याय 3

हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर प्रथम उपदेश - मत्ती 26:36-39

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर प्रथम उपदेश - मत्ती 26:36-39

हमारे प्रभु यीशु मसीह के

तब यीशु अपने चेलों के साथ गतसमनी नाम एक स्थान में आया, और अपने चेलों से कहने लगा, कि यहीं बैठे रहना, जब तक कि मैं वहाँ जाकर प्रार्थना करूँ। और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा। तब उसने उनसे कहा, मेरा जी बहुत उदास है, यहाँ तक कि मेरे प्राण निकलने पर हैं; तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो। फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुँह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो। — मत्ती 26:36-39

जब पवित्रशास्त्र हमसे हमारे उद्धार की बात करता है, तो वह हमारे सामने तीन उद्देश्य रखता है। पहला यह कि हम उस अथाह प्रेम को पहचानें जो परमेश्वर ने हम पर प्रकट किया है, ताकि हमारे द्वारा उसकी वैसी महिमा हो जैसी उसके योग्य है। दूसरा यह कि हम अपने पाप से वैसी ही घृणा करें जैसी उचित है, और इतना लज्जित हों कि अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन बन जाएँ। तीसरा यह कि हम अपने उद्धार को इस प्रकार मूल्यवान समझें कि वह हमें संसार को और इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुओं को छोड़ने पर विवश कर दे, और हम उस मीरास से अत्यन्त आनन्दित हों जो हमारे लिये इतने बड़े मूल्य पर प्राप्त की गई है। जब हमें बताया जाता है कि परमेश्वर के पुत्र ने हमें अनन्त मृत्यु से छुड़ाया और हमारे लिये स्वर्गीय जीवन प्राप्त किया, तब हमें इन्हीं बातों पर ध्यान लगाना और अपना मन लगाना चाहिए। अतः सबसे पहले हमें सीखना चाहिए कि परमेश्वर को वह स्तुति दें जिसके वह योग्य है। वह तो हमें मृत्यु की अथाह गहराइयों से किसी और रीति से भी छुड़ा सकता था, परन्तु उसने अपनी अनन्त भलाई के भण्डार तब प्रकट करना चाहा जब उसने अपने एकलौते पुत्र को भी न बख्शा। और इस विषय में हमारे प्रभु यीशु ने हमें अपनी उस चिन्ता का पक्का बयाना देना चाहा जो वह हमारे लिये रखता था, जब उसने स्वेच्छा से अपने आप को मृत्यु के लिये सौंप दिया। क्योंकि जब तक हम दूसरी ओर अपनी दशा की जाँच न करें, और यह न देखें कि हम मानो नरक में डूबे हुए हैं, और यह न जानें कि परमेश्वर के क्रोध को भड़काना और उसे अपना प्राणघातक शत्रु तथा ऐसा भयानक और डरावना न्यायी पाना क्या होता है, कि जब तक वह हमारे विरुद्ध है तब तक उसकी महिमा के निकट जाने की अपेक्षा यही कहीं अच्छा होता कि आकाश, पृथ्वी और सारी सृष्टि हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रचती, तब तक हम अपने परमेश्वर की स्तुति करने के लिये कभी गहराई से प्रभावित नहीं होंगे और न ही हमारे भीतर आग लगेगी। इसलिये अत्यन्त आवश्यक है कि पापी अपने अपराधों के बोध और समझ से टूटे हुए मनवाले हों, और अपने आप को अभागे से भी बदतर जानें, ताकि उन्हें अपनी दशा से भय लगे, और इस प्रकार वे जानें कि वे परमेश्वर के कितने ऋणी और उपकृत हैं कि उसने उन पर तरस खाया, कि उसने उन्हें निराशा में पड़े देखा, और उसने कृपा करके उनकी सहायता की; इसलिये नहीं कि उसे उनमें कोई योग्यता दिखाई दी, परन्तु केवल इसलिये कि उसने उनकी दुर्दशा पर दृष्टि की। फिर यह बात भी है (जैसा हम कह चुके हैं) कि हम यहाँ नीचे बहुत सी बातों से घिरे हुए हैं, और जब परमेश्वर ने हमें अपने पास बुलाया है तब हमारा मोह और लालच हमें रोक रखता है; इसलिये आवश्यक है कि हम स्वर्गीय जीवन का वैसा ही मूल्य समझें जैसा उसके योग्य है, ताकि हम जानें कि वह हमारे लिये कितने बड़े मूल्य पर मोल लिया गया।

और इसीलिये यहाँ हमें बताया गया है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने न केवल मृत्यु सहना चाहा और अपने पिता परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने के लिये अपने आप को बलिदान के रूप में चढ़ाया, परन्तु इसलिये भी कि वह सचमुच और पूर्ण रूप से हमारा बयाना ठहरे, उसने उन वेदनाओं को सहने से इनकार नहीं किया जो उन सब के लिये तैयार की गई हैं जिनके विवेक उन्हें धिक्कारते हैं और जो परमेश्वर के सामने अपने आप को अनन्त मृत्यु और दण्ड के दोषी अनुभव करते हैं। इसलिये भली-भाँति ध्यान दें कि परमेश्वर का पुत्र केवल अपना शरीर और लहू चढ़ाने और उन्हें मृत्यु के अधीन करने से सन्तुष्ट नहीं हुआ, परन्तु उसने पूरी रीति से अपने पिता परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने सब पापियों के नाम से और उनके स्थान पर खड़ा होना चाहा, और तब वह दोषी ठहराए जाने को तैयार हो गया, क्योंकि उसने हमारा बोझ उठाया था। और अब हमें लज्जित होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को ऐसे अपमान के अधीन कर दिया। यह निष्कारण नहीं कि सन्त पौलुस अपने उदाहरण से हमें प्रोत्साहित करता है कि हम क्रूस के प्रचार से लज्जित न हों; चाहे वह कितना ही कुछ लोगों को मूर्खता और बहुतों के लिये ठोकर का कारण क्यों न हो। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु ने अपने आप को जितना अधिक दीन किया, उतना ही हम देखते हैं कि जिन अपराधों के कारण हम परमेश्वर के ऋणी हैं, वे तब तक मिटाए नहीं जा सकते थे जब तक वह अन्तिम सीमा तक दीन न किया जाता। और वास्तव में हम जानते हैं कि वह निर्बल किया गया ताकि हम उसके सामर्थ्य से बलवन्त किए जाएँ, और पाप को छोड़ हमारे सब दुःखों को सहना उसने स्वीकार किया, ताकि आज वह हमारी सहायता के लिये तत्पर रहे। क्योंकि यदि उसने अपने ही व्यक्तित्व में उन भयों, सन्देहों और पीड़ाओं का अनुभव न किया होता जो हम सहते हैं, तो वह हम पर दया करने की ओर इतना झुका हुआ न होता जितना वह है। कहा जाता है कि जो मनुष्य न भूख जानता है न प्यास, वह उन्हें सहनेवालों पर तरस या करुणा नहीं करेगा, क्योंकि वह सदा सुख-चैन में रहा और अपने भोग-विलास में जिया है। अब यह सच है कि परमेश्वर यद्यपि अपने स्वभाव में हमारी किसी भी वासना को नहीं सहता, तौभी वह हमारे प्रति करुणामय बने रहने से नहीं चूकता, क्योंकि वह सारी भलाई और दया का सोता है। फिर भी इसलिये कि हमें निश्चय हो कि हमारा प्रभु यीशु हमारी निर्बलताओं को इसलिये जानता है कि हमें उनसे छुड़ाए, और हम और भी निडर होकर उसके पास आएँ और उससे और अधिक अपनेपन से बात करें, प्रेरित कहता है कि इसी कारण उसने हमारे समान परखा जाना स्वीकार किया।

तो जो पाठ हमने पढ़ा है उसमें हमें यह ध्यान देना है कि जब हमारे प्रभु यीशु गतसमनी के इस गाँव में, और जैतून के पहाड़ पर भी आए, तो वह अपने आप को स्वेच्छा से बलिदान के रूप में चढ़ाने के लिये था। और इसमें उसने उस कार्य और उस दायित्व को पूरा करना चाहा जो उसे सौंपा गया था। क्योंकि उसने हमारा शरीर और स्वभाव क्यों धारण किया, यदि इसलिये नहीं कि अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा हमारी सारी अवज्ञा की क्षतिपूर्ति करे और हमारे लिये अपने पिता परमेश्वर के सामने पूरी और सिद्ध धार्मिकता प्राप्त करे? और फिर भी वह मृत्यु के लिये अपने आप को प्रस्तुत करने आया, क्योंकि हम उसकी आज्ञाकारिता को छोड़ और किसी रीति से मेल-मिलाप नहीं पा सकते, और न पाप से भड़के हुए परमेश्वर के क्रोध को शान्त कर सकते हैं।

इसीलिये परमेश्वर का पुत्र निडर होकर उस स्थान पर आया जहाँ वह जानता था कि यहूदा उसे पाएगा। और इस प्रकार हम जानते हैं कि यह आवश्यक था, क्योंकि हमारे पिता आदम ने अपनी अवज्ञा से हम सब को नाश कर दिया था, कि परमेश्वर का पुत्र, जो सारी सृष्टि पर सर्वोच्च अधिकार रखता है, अपने आप को दीन करे और दास का स्वरूप धारण करे, जैसा कि वह परमेश्वर का भी और अपने सब लोगों का भी दास कहलाता है। और इसीलिये सन्त पौलुस, यह दिखाते हुए कि हमारे पास कोई आधार होना चाहिए ताकि हम पूरे भरोसे के साथ उसे पुकारें कि सन्तान होने के नाते हमारी सुनी जाएगी, कहता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता से हम धर्मी ठहराए जाते हैं। क्योंकि वह मानो एक चादर है जो हमारे सब पापों और अपराधों को ढाँप लेती है, ताकि जो बात हमें अनुग्रह पाने से रोक सकती थी उसकी परमेश्वर के सामने गिनती न हो। परन्तु दूसरी ओर हम देखते हैं कि हमारे छुटकारे का मूल्य बहुत भारी रहा है, जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ऐसी पीड़ा में हैं कि वह मृत्यु के भयों से होकर जाते हैं, यहाँ तक कि उनका पसीना लहू की बूँदों के समान हो गया, जिससे वह मानो अपने आपे में नहीं रहे, और प्रार्थना करते हैं कि यदि हो सके तो वह ऐसे कष्ट से बच जाएँ। जब हम यह देखते हैं, तो यही हमें अपने पापों का ज्ञान कराने के लिये पर्याप्त है। यहाँ चापलूसी से हमें सुला देने की कोई सम्भावना नहीं, जब हम देखते हैं कि परमेश्वर का पुत्र ऐसी चरम दशा में डूबा है कि लगता है वह अथाह कुण्ड की तह में है। यदि यह केवल किसी धर्मी मनुष्य पर बीता होता, तो हम अवश्य द्रवित होते, क्योंकि यह आवश्यक था कि एक निर्दोष बेचारा हमारे छुड़ौती-मूल्य के लिये वह सहे जो परमेश्वर के पुत्र पर बीता। परन्तु यहाँ वह है जो जीवन का सोता है, जो अपने आप को मृत्यु के अधीन करता है। यहाँ वह है जो अपने सामर्थ्य से सारे जगत को थामे हुए है, जो इस सीमा तक निर्बल किया गया है। यहाँ वह है जो सृष्टि को सब भय से छुड़ाता है, जिसे ऐसा आतंक सहना पड़ता है। जब यह हमें बताया जाता है, तो यदि हममें से हर एक इस पर मनन न करे, और अपने दोषों और अधर्म से घिन खाकर परमेश्वर के सामने लज्जित न हो, हाँफता और कराहता न हो, और यदि इसी रीति से हम सच्चे पश्चाताप के साथ परमेश्वर की ओर न लाए जाएँ, तो हम अत्यन्त मूर्ख ठहरेंगे।

अब यह असम्भव है कि मनुष्य सही रीति से परमेश्वर की ओर फिरें जब तक वे अपने आप में दोषी न ठहरें और उस श्राप के आतंक और वेदना को स्वीकार न करें जो उनके लिये तैयार है, जब तक कि वे परमेश्वर के अनुग्रह में फिर बहाल न किए जाएँ। परन्तु पूरी बात को और अच्छी तरह समझने के लिये फिर यह कहा गया है कि हमारे प्रभु यीशु ने अपने चेलों में से केवल तीन को लिया और शेष मण्डली को काफी दूर छोड़ दिया, और उन तीनों को भी वह अपने साथ अन्त तक नहीं ले गया, परन्तु उसने अपने पिता परमेश्वर से एकान्त में प्रार्थना की। जब हम यह देखते हैं, तो हमें ध्यान देना चाहिए कि जब हमारे प्रभु यीशु ने अपने आप को हमारे लिये बलिदान के रूप में चढ़ाया तब उसका कोई साथी न था, परन्तु जो कुछ हमारे उद्धार के लिये आवश्यक था उसे उसने अकेले ही पूरा और सम्पन्न किया। और यह बात और भी अच्छी तरह हमें तब दिखाई जाती है जब चेले सो जाते हैं और जगाए भी नहीं जा सकते, यद्यपि उन्हें इतनी बार चेतावनी दी जा चुकी थी कि वह घड़ी निकट आ रही है जिसमें हमारे प्रभु यीशु को मनुष्यजाति के छुटकारे के लिये दुःख उठाना होगा, और उसने तीन-चार घण्टे तक उन्हें समझाया था, उन्हें यह बताने से कभी न थमते हुए कि उसकी मृत्यु निकट है। यह सब चाहे जितना सच हो, फिर भी वे सोना नहीं छोड़ते। इसमें मानो एक जीवित चित्र के रूप में हमें दिखाया गया है कि यह अत्यन्त आवश्यक था कि परमेश्वर का पुत्र हमारे सारे बोझ उठाए, क्योंकि वह और किसी से कुछ आशा नहीं रख सकता था। और यह इसलिये है कि हमारा ध्यान ठहरा रहे और विचारों में भटके नहीं, जैसा हम उन बेचारे अविश्वासियों में देखते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह पर अपना ध्यान टिका नहीं सकते, वरन् सोचते हैं कि उन्हें संरक्षक और वकील चाहिए, मानो बहुत से छुड़ानेवाले हों। और हम उन निन्दाओं को भी देखते हैं जो इस दुष्ट पोपशाही में चलन बन गई हैं, कि सन्तों के पुण्य हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग में सहायक होते हैं, ताकि इस रीति से हम परमेश्वर के सामने छुड़ाए जाएँ और निर्दोष ठहरें। वे कहते हैं कि चाहे मूल पाप के दोष तथा वास्तविक पापों के दोष की सामान्य क्षमा हो चुकी हो, तौभी कुछ मिलावट अवश्य होनी चाहिए, और यीशु मसीह का लहू तब तक पर्याप्त नहीं जब तक शहीदों के लहू से उसकी पूर्ति न की जाए, और परमेश्वर की कृपा पाने के लिये हमें उन्हीं की शरण लेनी चाहिए। जब शैतान इस प्रकार खुल खेल रहा है तो हमें और भी चौकस रहना चाहिए कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह को दृढ़ता से थामे रहें, यह जानते हुए कि उसी में हमें उद्धार की पूर्ण सिद्धता मिलनी है। और इसीलिये भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा विशेष रूप से कहा गया है कि परमेश्वर ने अचम्भा किया, यह देखकर कि कहीं और से कोई सहायता नहीं थी।

अब यह सच है कि परमेश्वर भली-भाँति जानता था कि हमारे उद्धार को सिद्ध करना केवल उसी का काम है, परन्तु यह इसलिये है कि हम लज्जित हों और कपटी न बनें, मानो हमने अपने पापों की क्षमा में और परमेश्वर से अपने आप को अनुग्रह और प्रेम में ग्रहण कराने में कुछ सहायता पहुँचाई हो, ताकि हम मध्यस्थ ढूँढ़ने के लिये इधर-उधर न दौड़ें। ऐसे किसी भी विचार को दूर करने के लिये कहा गया है कि परमेश्वर ने अपनी ही भुजा का उपयोग किया, और सब कुछ अपनी धार्मिकता से पूरा किया, और उसे सहायता देनेवाला कोई न मिला। और यह हमें अत्यन्त स्पष्टता से बताया गया है जब कहा जाता है कि तीन चेले, जो सब में श्रेष्ठ थे, वहाँ बेचारे पशुओं के समान सो रहे थे, और उनमें पाशविक जड़ता के सिवा कुछ न था, यह प्रकृति के विरुद्ध एक विचित्र बात है कि वे ऐसे घातक क्षण में सो गए। फिर इसलिये कि हमारा भरोसा सारी सृष्टि से हटा लिया जाए और पूरी तरह हमारे प्रभु यीशु मसीह ही में बन्द रहे, इसी कारण कहा गया है कि वह संघर्ष के लिये आगे बढ़ा। इसके अतिरिक्त अपने पिता परमेश्वर को सम्बोधित करने में वह हमें अपनी सब पीड़ाओं से राहत पाने, अपने दुःखों को हल्का करने, और उनसे ऊपर उठने का उपाय भली-भाँति दिखाता है, चाहे हम मानो उनके नीचे दबे हुए ही क्यों न हों। क्योंकि यदि हम व्याकुल और पीड़ा में हैं तो जानते हैं कि परमेश्वर व्यर्थ ही शान्ति का पिता नहीं कहलाता। यदि हम उससे अलग हों, तो उसे छोड़ हमें बल कहाँ मिलेगा? परन्तु हम देखते हैं कि जब हमें उसकी आवश्यकता थी तब उसने अपने आप को बचाना नहीं चाहा। इस प्रकार परमेश्वर का पुत्र ही है जो अपने उदाहरण से हमें दुःख और पीड़ा के समय सच्चे शरणस्थान की ओर ले चलता है।

परन्तु उस प्रार्थना के रूप पर भी ध्यान दें जो वह करता है: “हे पिता, यदि हो सके तो यह प्याला मुझ से टल जाए,” या यह पेय, क्योंकि यह अलंकार है, चाहे वह कटोरे की बात करे या गिलास की या प्याले की; और इसलिये भी कि पवित्रशास्त्र क्लेशों को कड़वे पेय कहता है, ताकि हम जानें कि कुछ भी संयोग से नहीं होता, परन्तु जैसे घराने का स्वामी अपनी सन्तानों में से हर एक को उसका भाग बाँटता है, या जैसे मालिक अपने सेवकों को, वैसे ही परमेश्वर दिखाता है कि उन्हें जो मार पड़ती और क्लेश होता है वह उसी की ओर से और उसी के हाथ से है, और जब हम भली वस्तुएँ पाते हैं तब भी वे उसकी अनुपार्जित कृपा से आती हैं, और वह हमें उतना ही देता है जितना वह देना चाहता है। अब इसी रीति के अनुसार हमारा प्रभु यीशु कहता है कि मृत्यु उसके लिये ऐसा कड़वा पेय है कि वह चाहता कि वह उससे हटा ली जाए, अर्थात् “यदि हो सके।” यह सच है कि यहाँ बहुत से प्रश्न उठाए जा सकते हैं, क्योंकि ऐसा प्रतीत होगा कि क्षण भर के लिये यीशु मसीह हमारा उद्धार भूल गया, या इससे भी बुरा, कि संघर्ष से भागते हुए उसने उस भय के कारण जो उसने अनुभव किया, हमें नष्ट दशा में छोड़ना चाहा।

परन्तु यह उस बात से मेल नहीं खाएगा जो हम कह चुके हैं। और जो प्रेम उसने हम पर दिखाया है वह भी बहुत धुँधला पड़ जाएगा। परन्तु हमें इतने सूक्ष्म विवाद में पड़ने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम जानते हैं कि पीड़ा कभी-कभी मनुष्य के मन को इस प्रकार मोहित कर लेती है कि वह किसी और बात का विचार नहीं करता; वरन् वह वर्तमान पीड़ा से इतना दबा होता है कि उसे अपने ऊपर हावी होने देता है और अपने आप को सँभालने के साधनों का ध्यान नहीं रखता। अतः जब हम इस प्रकार कुछ समय के लिये अपने आपे से बाहर हों, तो इसका अर्थ यह नहीं कि और सब कुछ हमारे हृदयों से बिलकुल मिट गया है और हममें कोई भावना नहीं रही। उदाहरण के लिये, जो कोई कलीसिया के किसी क्लेश के विषय में सोचेगा, विशेषकर किसी विशेष क्लेश के विषय में, वह परमेश्वर से ऐसे प्रार्थना करेगा मानो शेष जगत उसके लिये कुछ है ही नहीं। तो क्या इसका अर्थ यह है कि वह निर्दयी हो गया है और उसे अपने भाइयों की चिन्ता नहीं जिन्हें भी इसकी आवश्यकता है कि वह उनके लिये प्रार्थना करे? बिलकुल नहीं, परन्तु यह भावना उसे ऐसे आवेग से प्रेरित करती है कि और सब कुछ कुछ समय के लिये उससे कट जाता है। मूसा प्रार्थना करता है कि उसका नाम जीवन की पुस्तक में से मिटा दिया जाए। यदि हम इसमें बाल की खाल निकालना चाहें तो कहेंगे कि मूसा ने परमेश्वर की निन्दा की, मानो वह परिवर्तनशील हो, ऐसा बोलकर। क्योंकि जिन्हें परमेश्वर ने अनन्त जीवन के लिये चुना है वे कभी नाश नहीं हो सकते। तो ऐसा प्रतीत होता है कि मूसा यहाँ परमेश्वर से लड़ता है और उसे हमारे समान बनाना चाहता है जिनकी सम्मति और बात प्रायः बदलती रहती है। और फिर जब वह जानता है कि वह उसके चुने हुओं में से है, और जानता है कि परमेश्वर ने उसे बचपन ही से अपने लोगों का अगुवा होने जैसे इतने उत्तम दायित्व के लिये ठहराया था, तब भी वह माँगता है कि वह मानो परमेश्वर की ओर से त्यागा और मिटाया जाए, तो वह परमेश्वर का क्या आदर करता है? और इसका परिणाम क्या होगा? तब कोई बहुत तर्क-वितर्क कर सकता है। परन्तु समाधान सरल है कि मूसा, अपने लोगों के उद्धार के लिये ऐसी तीव्र धुन रखते हुए, और परमेश्वर ने अपने मुँह से जो भयानक धमकी कही थी उसे भी देखते हुए, थोड़े समय और एक क्षण के लिये अपने आप को भूल जाता है, और केवल यही माँगता है कि वह अपने लोगों की सहायता कर सके। हमारा प्रभु यीशु ऐसी ही मनःस्थिति में पहुँचा था। क्योंकि यदि उसे सौ मृत्युएँ, यहाँ तक कि दस लाख मृत्युएँ भी सहनी पड़तीं, तो निश्चय है कि वह पहले से तैयार होता। परन्तु उसने जैसा देखते हैं वैसी वेदनाएँ, जो उसे उस सीमा तक डुबा देती हैं, अपने लिये इतनी नहीं जितनी हमारे लिये सहना चाहा। पहले मुद्दे के विषय में इतना ही।

अब दूसरे के विषय में। यदि कोई पूछे कि यीशु मसीह, जो सर्वथा धर्मी है, जो निर्दोष मेम्ना रहा है, और जो सारी धार्मिकता, पवित्रता और सिद्धता का नियम और दर्पण तक रहा है, उसकी इच्छा परमेश्वर की इच्छा के विपरीत कैसे हो सकती है; तो इसका उत्तर यह है कि परमेश्वर में तो उसकी खराई की सारी सिद्धता स्वयं है, जबकि स्वर्गदूत, चाहे वे परमेश्वर की इच्छा के कितने ही अनुरूप हों और पूरी तरह उसके आज्ञाकारी हों, तौभी उनकी अलग इच्छा होती है। क्योंकि सृजे हुए प्राणी होने के कारण उनमें ऐसी भावनाएँ हो सकती हैं जो अधिकारपूर्वक परमेश्वर की नहीं हैं। रही हमारी बात, जो पाप के इस ढेर से घिरे हैं, हम इतने बोझिल हैं कि परमेश्वर की इच्छा से बहुत दूर हैं, क्योंकि हमारी सब लालसाओं में कुछ न कुछ अति है, और प्रायः प्रकट विद्रोह भी है। परन्तु यदि हम मनुष्य को उसकी खराई में, अर्थात् पाप की इस भ्रष्टता के बिना देखें, तब भी निश्चय है कि उसकी भावनाएँ परमेश्वर से बहुत दूर होंगी, तौभी इस कारण वे दुष्ट न होंगी। जैसे जब आदम अभी बिगड़ा न था और उसी दशा और अवस्था में बना रहा जिसमें वह सृजा गया था, तब भी ऐसा होता था कि वह गरम भी होता था और ठण्डा भी, और उसे चिन्ताएँ और भय और ऐसी ही बातें सहनी पड़ती थीं।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ भी ऐसा ही था। हम जानते हैं कि अपनी सब भावनाओं में उसमें न कोई दाग था न कलंक, कि हर बात में वह परमेश्वर की आज्ञाकारिता से चलाया जाता था, तौभी (क्योंकि उसने हमारा स्वभाव धारण किया था) वह भय के, और उस आतंक के जिसकी अब बात हो रही है, और चिन्ताओं के, और ऐसी ही बातों के अधीन होने से रोका नहीं गया। हम इसे अपने भीतर नहीं समझ सकते, जैसे गँदले पानी में कुछ भी पहचाना नहीं जा सकता। इस प्रकार मनुष्य की भावनाएँ हमें इधर-उधर बहा ले जाती हैं और हममें ऐसे आवेग उत्पन्न करती हैं कि परमेश्वर को हमें रोकना पड़ता है। परन्तु मनुष्यों में, जो आदम के वंशज हैं, जो कुछ है वह कीचड़ के समान है जिसमें दिन-ब-दिन अधिक मिली-जुली गन्दगी है, ऐसी कि हम यह सोच भी नहीं सकते कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का यह दुःखभोग कैसा रहा होगा, यदि हम इसे अपने ही व्यक्तियों के अनुसार आँकें। क्योंकि चाहे हमारा लक्ष्य अच्छा हो और कोई भावना अपने आप में सीधी और परमेश्वर को स्वीकार्य हो, तौभी हममें सदा कुछ कमी रहती है। क्या यह भली और पवित्र बात नहीं कि पिता अपनी सन्तानों से प्रेम करे? और ठीक वहीं हम फिर पाप करते हैं। क्योंकि कभी वैसा नियम या संयम नहीं होता जैसा अपेक्षित है। हममें जो भी गुण हैं, उनमें परमेश्वर हमें दोष दिखाता है, ताकि सब अभिमान और भी नीचा हो और हमें सिर झुकाने का और भी अधिक कारण मिले, यहाँ तक कि लज्जा से घबरा जाएँ, यह देखकर कि भलाई भी उस पाप से बिगड़ गई है जो हममें बसा है और जिससे हम अत्यधिक भरे हैं।

इसके अतिरिक्त, जहाँ तक हमारे प्रभु यीशु मसीह का सम्बन्ध है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ), यदि उसकी इच्छा (जहाँ तक वह मनुष्य था) अपने पिता परमेश्वर की इच्छा से भिन्न थी तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, परन्तु इस कारण हमें यह न समझना चाहिए कि उसमें कोई दोष या अपराध था। और (जैसा हम पहले ध्यान दिला चुके हैं) इसी में हम उस अनमोल प्रेम को देखें जो उसने हमसे रखा, जब मृत्यु उसके लिये इतनी भयंकर थी और फिर भी उसने अपनी ही प्रसन्नता से उसे स्वीकार किया। और यदि उसे उससे कोई घृणा न होती, और यदि बिना हिचकिचाहट के वह उस प्याले को पी लेता और उसमें कोई कड़वाहट अनुभव न करता, तो वह कैसा छुटकारा होता? ऐसा लगता मानो वह केवल खेल था, परन्तु जब ऐसा हुआ कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने ऐसी वेदनाएँ सहीं, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसने हमसे इतना प्रेम किया कि अपने आप को भी भूल गया और सारी आँधी अपने ही सिर पर आने दी, ताकि हम परमेश्वर के क्रोध से छुड़ाए जाएँ।

अब यह भी ध्यान देना शेष है कि जब परमेश्वर का पुत्र इस प्रकार वेदना में पड़ा तो इसलिये नहीं कि उसे संसार को छोड़ना था। क्योंकि यदि केवल देह और आत्मा का अलग होना होता, और वे यातनाएँ जो उसे अपनी देह में सहनी थीं, तो वह उसे इतना न दबाता। परन्तु हमें उसकी मृत्यु के स्वरूप को देखना और उसके मूल तक पहुँचना चाहिए। क्योंकि मृत्यु केवल मनुष्य को विघटित करना नहीं, परन्तु उसे परमेश्वर के श्राप का अनुभव कराना है। इसके अतिरिक्त कि परमेश्वर हमें इस संसार से उठा लेता है और हम इस जीवन के सम्बन्ध में मानो मिट जाते हैं, मृत्यु हमारे लिये मानो नरक के गर्त में प्रवेश है। जब हमसे मृत्यु की बात की जाती है तो हम परमेश्वर से पराए और उद्धार की सारी आशा से रहित हो जाते, यदि हमारे पास यह उपाय न होता, कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने इसे हमारे लिये सहा, ताकि अब वह घाव जो वहाँ था प्राणघातक न रहे। क्योंकि उसके बिना हम मृत्यु से इतने भयभीत होते कि हमारे लिये उद्धार की आशा न रहती, परन्तु अब उसका डंक तोड़ दिया गया है। विष भी ऐसा शुद्ध हो गया है कि मृत्यु हमें दीन करती हुई आज हमारे लिये औषधि का काम करती है, और अब प्राणघातक नहीं रही, क्योंकि यीशु मसीह ने उसमें का सारा विष निगल लिया।

तो हमें यह स्मरण रखना है कि परमेश्वर का पुत्र जब पुकारता है “हे पिता, यदि हो सके तो यह पेय मुझ से हटा लिया जाए,” तो वह केवल उस पर विचार नहीं करता जो उसे अपनी देह में सहना था, न मनुष्यों की निन्दा पर, न पृथ्वी को छोड़ने पर (क्योंकि वह उसके लिये बहुत सरल था), परन्तु वह इस पर विचार करता है कि वह परमेश्वर के सामने और उसके न्याय-सिंहासन के आगे हमारे सब पापों का उत्तर देने को खड़ा है, और वहाँ परमेश्वर के वे सब श्राप देखता है जो हम पर पड़ने को तैयार हैं। क्योंकि यदि केवल एक ही पापी हो, तो परमेश्वर का क्रोध कैसा होगा? जब कहा जाता है कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध है, कि वह हमें नष्ट करने के लिये अपना सामर्थ्य दिखाना चाहता है, हाय! तब हम कहाँ ठहरते हैं? अब यीशु मसीह को न केवल ऐसे आतंक से, परन्तु उन सब क्रूरताओं से भी लड़ना आवश्यक था जो कोई कर सकता है। अतः जब हम देखते हैं कि परमेश्वर उन सब को बुलाता है जो अनन्त दण्ड के योग्य ठहरे हैं और जो पाप के दोषी हैं, और वह वहाँ उन्हें वैसा ही दण्ड सुनाने को है जिसके वे योग्य ठहरे, तो कौन उन सब मृत्युओं, सन्देहों और आतंकों की पूरी कल्पना न करेगा जो हर एक में हो सकते हैं? और उसमें कितनी गहराई होगी! अब यह आवश्यक था कि हमारा प्रभु यीशु मसीह अकेले, बिना सहायता के, ऐसा बोझ उठाए। तो आइए, हम परमेश्वर के पुत्र के शोक को उसके सच्चे कारण से आँकें। अब हम उस पर लौटें जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं, कि एक ओर हम जान लें कि हमारा उद्धार उसे कितना महँगा पड़ा और हमारे प्राण उसकी दृष्टि में कितने मूल्यवान थे कि वह हमारे लिये ऐसी चरम सीमा तक जाने को तैयार हुआ, और यह जानते हुए कि हम किसके योग्य थे, देखें कि हमारी दशा क्या होती, यदि हम उसके द्वारा छुड़ाए न गए होते। और फिर भी आनन्द करें कि मृत्यु का अब हम पर कोई ऐसा अधिकार नहीं रहा जो हमें हानि पहुँचा सके। यह सच है कि हम स्वभावतः सदा मृत्यु से डरते हैं और उससे भागते हैं, परन्तु यह इसलिये है कि हम उस अनमोल उपकार का विचार करें जो परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारे लिये प्राप्त हुआ है। यह इसलिये है कि हम सदा विचार करें कि मृत्यु अपने आप में क्या है, उसमें परमेश्वर का क्रोध कैसे सम्मिलित है, और वह मानो नरक का गड्ढा है। इसके अतिरिक्त, जब हमें ऐसे भय से लड़ना पड़े तो जान लें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उन सब भयों के लिये ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि मृत्यु के बीच भी हम सिर उठाकर परमेश्वर के सामने आ सकते हैं।

यह सच है कि हमें सब बातों के सामने दीन होना है, जैसा हम कह चुके हैं, कि अपने पापों से घृणा करने और अपने से अप्रसन्न होने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम परमेश्वर के न्याय से छुए जाएँ और उससे भयभीत हों। परन्तु फिर भी जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है तब हमें सिर उठाना चाहिए। और यही साहस सब विश्वासियों को दिया गया है! इसलिये हम देखते हैं कि सन्त पौलुस कहता है, यीशु मसीह ने उन सब के लिये मुकुट तैयार किया है जो उसके प्रकट होने की बाट जोहते हैं। यदि हमें स्वर्गीय न्यायी के सामने आने में जीवन की आशा नहीं रही, तो निश्चय है कि वह हमें ठुकरा देगा और हमें नहीं जानेगा, यहाँ तक कि हमें अस्वीकार कर देगा, चाहे हम मसीही होने का कितना ही दावा करें।

अब हम सचमुच अपने प्रभु यीशु मसीह की बाट तब तक नहीं जोह सकते जब तक हमने यह न समझ लिया हो और हमें इसका निश्चय न हो कि वह मृत्यु के आतंकों से इस प्रकार लड़ा है कि फिर भी हम उनसे मुक्त हैं और हमारे लिये विजय प्राप्त हो चुकी है। और यद्यपि हमें इसलिये लड़ना पड़ता है कि हम अपनी निर्बलता को अनुभव करें, परमेश्वर की शरण लें, और सदा अपने पापों की सच्ची स्वीकारोक्ति तक पहुँचें, ताकि परमेश्वर ही अकेला धर्मी ठहरे, तौभी यह सच है कि हमें निश्चय है कि यीशु मसीह इस प्रकार लड़ा कि उसने विजय अपने लिये नहीं परन्तु हमारे लिये पाई, और हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि उसी के द्वारा हम अब सब चिन्ताओं, सब भयों, सब घबराहटों पर विजय पा सकते हैं, और परमेश्वर को पुकार सकते हैं, यह निश्चय रखते हुए कि उसकी बाँहें सदा हमें अपने पास लेने के लिये फैली हुई हैं।

तो यही हमें विचारना है: कि हम जान लें कि यह कोई सैद्धान्तिक शिक्षा नहीं कि हमारे प्रभु यीशु ने मृत्यु के भयंकर आतंक सहे, क्योंकि उसने अनुभव किया कि वह हमारे न्यायी के सामने है और वह हमारा बयाना था, ताकि आज हम उसके संघर्ष के सामर्थ्य से अपनी सारी निर्बलता पर जय पाएँ और परमेश्वर के नाम को पुकारने में निरन्तर बने रहें, एक क्षण भी सन्देह न करते हुए कि वह हमारी सुनता है, और उसकी भलाई सदा हमें अपने पास ग्रहण करने को तैयार है, और इस रीति से हम जीवन और मृत्यु दोनों में से, जल और अग्नि में से होकर निकल जाएँगे, और अनुभव करेंगे कि हमारे प्रभु यीशु ने उन सब के लिये जो विश्वास के द्वारा उसके पास आए हैं ऐसी विजय पाने को जो संघर्ष किया वह व्यर्थ नहीं था। तो संक्षेप में यही हमें स्मरण रखना है।

अब यह भी देखिए कि हमें अपनी भावनाओं के विरुद्ध कैसे लड़ना है, और यदि हम ऐसा न करें तो हमारे लिये एक उँगली भी हिलाना असम्भव है जिससे हम परमेश्वर के क्रोध को पूरी रीति से न भड़काएँ। क्योंकि देखिए हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो शुद्ध और सम्पूर्ण है, जैसा हम पहले कह चुके हैं। यदि कोई पूछे कि उसकी इच्छा कैसी थी, तो यह सच है कि वह मनुष्य की इच्छा के समान निर्बल थी, परन्तु उनकी इच्छा के समान दूषित न थी जो आदम में भ्रष्ट हुए हैं, क्योंकि उसमें पाप का एक भी धब्बा न था। देखिए, तब, एक ऐसा मनुष्य जो हर दोष से मुक्त है। परन्तु चाहे जो हो, फिर भी आवश्यक है कि वह अपने आप को मिटाए और पूरी शक्ति से प्रयत्न करे और अन्त में अपने आप का त्याग करे, और इस सब को पैरों तले रौंदे, ताकि अपने पिता परमेश्वर की आज्ञा माने। अब देखें कि हमारा क्या होगा। हमारी भावनाएँ क्या हैं? हमारे विचार क्या हैं? वे सब शत्रु हैं जो परमेश्वर से लड़ते हैं, जैसा सन्त पौलुस कहता है। यहाँ परमेश्वर घोषणा करता है कि हम सर्वथा टेढ़े हैं और जो कुछ मनुष्य कल्पना कर सकता है वह झूठ और व्यर्थता ही है। अपने शैशव ही से हम दिखाते हैं कि हम पाप के पूरे संक्रमण में डूबे हुए हैं। छोटे बच्चे जब संसार में आते हैं, तो चाहे उनमें द्वेष प्रकट नहीं होता, फिर भी वे सदा छोटे साँप ही होने से नहीं चूकते, विष, द्वेष और घृणा से भरे हुए। इसमें हम सचमुच देखते हैं कि आरम्भ ही से हमारे स्वभाव में क्या है। और जब हम बड़े हो जाते हैं, तब हमारा क्या हाल होता है? हम (जैसा मैंने कहा) इतने बुरे हैं कि हम एक भी ऐसा विचार करना नहीं जानते जो साथ ही परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह न हो, यहाँ तक कि हम नहीं जानते कि इसमें लगें या उसमें, क्योंकि हम सदा सच्चे आदर्श से भटकाए जाते हैं, चाहे हम परमेश्वर से उत्तेजक रीति से टकराने तक न पहुँचें। तो हमें भलाई की ओर खींच लाने के लिये कितनी लड़ाई आवश्यक है! जब हम देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु को, जिसमें खराई और सीधाई के सिवा कुछ न था, अपने पिता परमेश्वर के अधीन होना पड़ा, यहाँ तक कि अपने आप का त्याग करना पड़ा, तो क्या यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि हम अपने आप को पूरी तरह इसमें लगा दें?

तो आइए, हम और अधिक वीरता से लड़ना सीखें। परन्तु यह देखकर कि हम समर्थ नहीं हैं, वरन् हमारी सारी शक्तियाँ और क्षमताएँ बुराई की ओर झुकी हैं, और हमारे स्वभाव में भलाई का एक कण भी नहीं है, और ऐसी निर्बलता है कि हम प्रति मिनट सौ बार हारेंगे, हम उसके पास आते हैं जो निर्बल किया गया कि हम उसके सामर्थ्य से भर दिए जाएँ, जैसा सन्त पौलुस कहता है। फिर यह कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने इस प्रकार अपने आप का त्याग किया, कि यदि हम उसके चेले होना चाहें तो वैसा ही करना सीखें। यह देखकर कि हम अपने आप से इसमें सफल होने में समर्थ नहीं हैं, वरन् सदा गलत मार्ग की ओर झुकते हैं, आइए हम उससे प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा के सामर्थ्य से हममें शासन करे और हमें बलवन्त बनाए। जैसा कहा गया है, उसने शरीर की निर्बलता में दुःख उठाया, परन्तु अपने आत्मा के सामर्थ्य से वह मरे हुओं में से जिलाया गया, ताकि हम उस संघर्ष के भागीदार बनाए जाएँ जो उसने सहा, और हम अपने भीतर उसके सामर्थ्य का प्रभाव और श्रेष्ठता पहचानें। तो संक्षेप में यही हमें स्मरण रखना है जब कहा जाता है कि मसीह ने अपनी सारी इच्छा छोड़ दी ताकि पूरी रीति से अपने पिता परमेश्वर के अधीन हो जाए।

अब, फिर भी, हमें सदा स्मरण रखना है कि परमेश्वर का पुत्र यहाँ अपने आप को केवल एक उदाहरण और दर्पण के रूप में नहीं रखता, वरन् वह हमें दिखाना चाहता है कि हमारा उद्धार उसे कितना महँगा पड़ा। क्योंकि शैतान ने, परमेश्वर के उस अनन्त अनुग्रह को जो हमारे छुटकारे में हमें दिखाया गया धुँधला करने की इच्छा से, कहा है कि यीशु मसीह मानो केवल हर सद्गुण का आदर्श था। देखिए, सारे पोप-पीठ के वे रिरियाने वाले ढोंगी कैसे बकबक करते हैं। वे न केवल यह नहीं जानते कि आज्ञाकारिता क्या है और न यह कि आत्म-त्याग क्या है, परन्तु वे कहते हैं कि सुसमाचार-लेखक यीशु मसीह के विषय में जो वर्णन करता है वह इसलिये है कि हम उसके पीछे चलें और उसके अनुरूप बनें। अब यह निश्चय कुछ तो है, परन्तु यह सब कुछ नहीं और न मुख्य बात है। क्योंकि एक स्वर्गदूत भी भेजा जा सकता था कि हम उसके पीछे चलते, परन्तु जब यीशु मसीह जगत का छुड़ानेवाला हुआ तो उसने अपनी ही स्वतन्त्र इच्छा से अपने आप को उस ऐसी दयनीय दशा के अधीन किया, जैसा हम यहाँ देखते हैं। हमें सदा पहचानना चाहिए कि हम अपने में ऐसा कुछ नहीं पाते जो उद्धार की आशा दे सके। और इसलिये जिस वस्तु की हममें कमी है उसे हमें उसी में ढूँढ़ना चाहिए। क्योंकि हम परमेश्वर का अनुग्रह कभी पा नहीं सकते और न उसके निकट आ सकते हैं जब तक हम कंगाल भिखारियों के समान यीशु मसीह के पास न आएँ, जो तब तक नहीं हो सकता जब तक हमने अपनी दरिद्रता और अभाव को, संक्षेप में यह कि हममें हर वस्तु की कमी है, न पहचाना हो।

इसलिये यही हमें स्मरण रखना है, कि यह सुनकर कि हमारे जीवन की सारी सिद्धता परमेश्वर के आज्ञाकारी होने में है और फिर उसके अनुरूप होने के लिये अपनी भावनाओं, विचारों और अपने सारे स्वभाव का त्याग करने में, और यह भी सुनकर कि जो हमारे पास नहीं है वह हमें परमेश्वर से माँगना है, हम जानें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें केवल उदाहरण ही के रूप में नहीं दिया गया, वरन् उसने हमें पूरी रीति से बता दिया है कि यदि हम उससे अलग हों तो हमारा जीवन अवश्य श्रापित होगा, और जब मृत्यु में हम दुर्दशा की गहराई देखेंगे तो परमेश्वर के क्रोध का गड्ढा हमें निगलने को तैयार देखेंगे, और हम एक ही आतंक से नहीं, वरन् दस लाख से जकड़े जाएँगे, और सारी सृष्टि हमारे विरुद्ध बदले की दुहाई देगी। इसलिये हमें यह सब अनुभव करना चाहिए, ताकि हम अपने पापों को पहचानें और कराहें और अपने आप में घबराएँ, और हमारी इच्छा और साहस हो कि सच्ची दीनता और पश्चाताप के साथ परमेश्वर के पास आएँ, और हम अपने परमेश्वर की भलाई और दया की कद्र करें जैसी वह यहाँ दिखाई देती है, और हमारे मुँह खुले हों कि उसे स्तुतिरूपी बलिदान चढ़ाएँ, और हम शैतान की चालों से फिर जाएँ, जिसने हमें संसार में रोके रखने के लिये अपने जाल बिछा रखे हैं, और हम अपने सुख-सुविधा और चैन को भी छोड़ दें ताकि उस मीरास की अभिलाषा करें जो हमारे लिये इतने बड़े मूल्य पर मोल ली गई।

और चूँकि अगले प्रभु-दिवस को हमें प्रभु-भोज लेना है, और क्योंकि परमेश्वर, स्वर्ग का राज्य हमारे लिये खोलने के बाद, वहाँ हमारे सामने एक आत्मिक भोज प्रस्तुत करता है, ताकि हम इस शिक्षा से और अधिक प्रभावित हों: वास्तव में जब हम अपनी शक्ति बहाल करने के लिये प्रतिदिन खाते-पीते हैं तब परमेश्वर हमें पर्याप्त रीति से जताता है कि वह हमारा पिता है और इन पार्थिव और नश्वर देहों की उसे चिन्ता है, यहाँ तक कि हम रोटी का एक टुकड़ा भी इस साक्षी के बिना नहीं खा सकते कि परमेश्वर को हमारी चिन्ता है; परन्तु प्रभु-भोज में एक विशेष कारण है। क्योंकि वहाँ परमेश्वर हमारे पेट नहीं भरता, परन्तु हमें स्वर्ग के राज्य में पहुँचा देता है। वह हमारे सामने अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु को खाने और पीने के लिये रखता है। यीशु मसीह हमें केवल अपनी मेज़ पर ग्रहण करके सन्तुष्ट नहीं, परन्तु वह हर प्रकार से हमारा भोजन होना चाहता है। वह हमें प्रभाव से अनुभव कराता है कि उसकी देह सचमुच हमारे लिये भोजन है और उसका लहू पेय। तब जब हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु हमें इतनी कोमलता से अपने पास बुलाता है, तो यदि हम उस बात से, जो हमें उससे दूर करती है, खिंचकर अलग न हों, तो क्या हम सब से बुरे दुष्ट न ठहरेंगे? और यदि हम घिसटते पैरों से भी आ रहे हों, तौभी हम अपने दोषों के लिये शोक करने से न चूकें, ताकि उसके निकट आएँ, और जहाँ तक हमसे हो सके अपने आप को इस संसार से अलग करें और स्वर्ग के राज्य की अभिलाषा करें।

तो हर एक देखे कि प्रभु-भोज से हमें क्या लाभ मिलना चाहिए। क्योंकि हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु हमें उसमें बुलाता है कि हम उसकी मृत्यु और दुःखभोग के भागीदार हों और उस लाभ का आनन्द लें जो उसने हमारे लिये प्राप्त किया, और इस रीति से हमें पूरा निश्चय हो कि परमेश्वर घोषणा करता है कि हम उसकी सन्तान हैं और हम खुले रूप से उसे अपना पिता कह सकते हैं। आइए हम सच्चा विश्वास लेकर आएँ, यह जानते हुए कि हमारा प्रभु यीशु हमारे पास उसके पिता परमेश्वर की ओर से क्यों भेजा गया, उसका कार्य क्या है, और वह आज भी कैसे हमारा मध्यस्थ है जैसा वह सदा रहा है। इसके अतिरिक्त, आइए हम उससे ऐसे जुड़ने का यत्न करें कि ऐसी बात केवल हम में से हर एक के लिये ही नहीं, परन्तु सब के लिये सामान्य रूप से कही जा सके। आइए हम आपस में मेल और भाईचारा रखें, क्योंकि उसने उस दण्ड-आज्ञा को सहा और उठाया जो हम सब पर उसके पिता परमेश्वर की ओर से सुनाई गई थी। तो आइए हम इसी का लक्ष्य रखें, और हर एक यहाँ केवल अपने लिये न आए (जैसा मैंने कहा), परन्तु अपने साथियों को भी इसमें खींचने का यत्न करे, और हम एक दूसरे को ऐसे उभारें कि दृढ़ता से चलते रहें, सदा यह ध्यान रखते हुए कि हमारा जीवन एक मार्ग के समान है जिस पर अन्त तक चलना है, और हमें यात्रा के बीच में थकना नहीं है, परन्तु दिन-ब-दिन इतनी उन्नति करें, और जो मार्ग से भटके हुए हैं उनके निकट पहुँचने का परिश्रम करें; यही हमारा सारा आनन्द, हमारा जीवन, हमारी महिमा और सन्तोष हो, और हम एक दूसरे की ऐसी सहायता करें जब तक परमेश्वर हमें पूरी रीति से अपने पास इकट्ठा न कर ले।

अब आइए हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन श्रद्धा से झुकें।

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