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पहले अध्याय पर सातवाँ उपदेश - इफिसियों 1:17-18
पहले अध्याय पर सातवाँ उपदेश
मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना करता हूँ कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, जो महिमा का पिता है, तुम्हें बुद्धि और प्रकाशन की आत्मा दे, कि तुम उसे जान सको। अर्थात् तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिससे तुम जान लो कि उसके बुलाए जाने से तुम्हें कैसी आशा रखनी चाहिए, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है। - इफिसियों 1:17-18
सब मनुष्यों में स्वभाव से कुछ न कुछ समझ होती है। ऐसा नहीं कि वह जन्म लेते ही प्रकट हो जाती है, परन्तु समय बीतते-बीतते सब में भले और बुरे का विवेक आ जाता है। इसी कारण वे विवेकशील प्राणी कहलाते हैं। परन्तु जो समझ हमें स्वभाव से मिली है, वह हमें स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। क्योंकि जब स्वर्गीय जीवन की बातें सामने आती हैं, तब हम बहुत पीछे रह जाते हैं। हम देखते हैं कि हर मनुष्य अपना मन संसार के कारोबार और कामकाज में लगाता है, और हर कोई अपने ही लाभ का विचार करता है। फिर, चाहे कुछ लोग मन ही मन चाहते हों कि उनका अपना विवेक मर जाए, तौभी परमेश्वर ने उनके हृदय में यह बोध अंकित कर रखा है कि हमारा जीवन किसी नियम के अधीन होना अवश्य है, और हम सब में जो सबसे दुष्ट और सबसे बुरे स्वभाव के हैं, वे भी अपने विवेक की कुछ चुभन सहने को विवश हैं, और चाहे वे मानें या न मानें, भले को सराहने और बुरे को दोषी ठहराने पर बाध्य हैं। यह सच है कि जब वे कोई अपराध कर बैठते हैं, तब व्यर्थ के बहानों से उसे ढाँपने का यत्न करते हैं। परन्तु यदि कोई उनसे पूछे कि हत्या, उगाही, लूटपाट, व्यभिचार, छल और झूठी शपथ सद्गुण हैं या नहीं, तो वे कहेंगे कि ये ऐसे दुर्गुण हैं जो दोषी ठहराए जाने के योग्य हैं। हर कोई यही कहेगा। क्योंकि परमेश्वर की यही इच्छा है कि मनुष्य के हृदय में ऐसा ज्ञान अंकित हो, ताकि सब बिना किसी बहाने के दोषी ठहरें, और अपने ही न्यायी होने को विवश हों।
परन्तु (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह हमें परमेश्वर तक पहुँचाने और हमारे लिए स्वर्ग का राज्य इस रीति से खोलने के लिए पर्याप्त नहीं है कि हम जान सकें कि उद्धार कैसे पाएँ, या परमेश्वर को कैसे पुकारें। इस विषय में तो हम सर्वथा अन्धे हैं, क्योंकि हमारी दृष्टि संसार से आगे नहीं पहुँचती। इसलिए परमेश्वर को हम में कार्य करना और हमें नई आँखें देनी पड़ती हैं, ताकि हम अपने उद्धार के लिए आवश्यक बातों को समझ सकें। और इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उन्हें ज्योतिर्मय आँखें दे; इससे वह यह मानकर चलता है कि मनुष्यों में पहले से कुछ थोड़ी-सी समझ है, इतनी नहीं कि वे उतनी ऊँचाई तक पहुँच सकें जितनी आवश्यक है, परन्तु इतनी कि उनमें धर्म का कुछ बीज है और वे जानते हैं कि परमेश्वर है।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को हमें और अधिक स्पष्टता देनी होगी, और ऐसी स्पष्टता जिससे हम आदम के पाप के कारण बिलकुल रिक्त हैं, क्योंकि हम ऐसे अन्धकार में डूबे हैं कि जब तक परमेश्वर हमारी ओर अपना हाथ नहीं बढ़ाता, हम भले मार्ग के सर्वथा विपरीत चलते रहते हैं। इसलिए तुम देखते हो कि यहाँ यही कहा गया है कि परमेश्वर ने हमें समझ की आँखें देकर हमारे लिए उससे अधिक किया है जितना हमें मनुष्य बनाकर और संसार में रखकर किया, क्योंकि इसी के द्वारा वह हमें सुधारता है और उन लोगों के विषय में, जिन्हें उसने चुना है, हमें स्पष्ट और निश्चित अन्तर्दृष्टि देता है। क्योंकि यह उसकी अपनी सन्तानों का विशेष अधिकार है, सब मनुष्यों का सामान्य अधिकार नहीं। और सचमुच हम देखते हैं कि जब परमेश्वर अपना सामर्थ्य प्रकट करता है, तो उसे केवल वे ही पहचानते हैं जिनकी आँखें ज्योतिर्मय हैं, जैसा मूसा के इस वचन के अनुसार है, “यहोवा ने तुम्हें आज तक न समझने का मन दिया, न देखने की आँखें।” [व्यवस्थाविवरण 29:4]
हम जानते हैं कि लोगों की आँखों के सामने चमत्कार किए गए, फिर भी लाल समुद्र को पार करने, चट्टान से जल निकलने, आकाश से मन्ना बरसने, दिन को घने बादल और रात को आग के खम्भे, उन्हें माँस की भरपूर आपूर्ति, और विद्रोहियों तथा अपनी ही अभिलाषाओं को खुली छूट देनेवालों पर परमेश्वर द्वारा भेजे गए भयंकर दण्डों के होते हुए भी, लोगों ने कुछ भी न समझा। मूसा ने उनसे कहा कि उन्हें परमेश्वर को खोजने में लग जाना चाहिए, ताकि उसका आत्मा उन्हें ज्योति दे; वह कहता है कि मैं देखता हूँ कि आज की घड़ी तक भी परमेश्वर के अनुग्रह के कार्य तुम्हारी कृतघ्नता के कारण तुम्हारे बीच दबे पड़े हैं। परन्तु यह इसलिए कि मनुष्य जड़बुद्धि हैं और जब तक परमेश्वर उनमें कार्य न करे, वे अपने उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली किसी भी बात को नहीं समझते।
इसलिए तुम्हें सब अभिमान त्याग देना चाहिए, और परमेश्वर के हाथ से समझ की याचना करनी चाहिए, यह मानते हुए कि जब तक वह तुम्हें स्वर्गीय आत्मिक अन्तर्दृष्टि न दे, तुम इतनी ऊँचाई तक पहुँचने में असमर्थ हो कि परमेश्वर के कार्यों का ठीक-ठीक न्याय कर सको और उनसे लाभ उठा सको। इस खण्ड में हमें जो ध्यान में रखना है, उसका सार यही है।
अब, इस विषय में यह समझना सहज है कि मनुष्यों के मन में डाली गई स्वतन्त्र इच्छा की धारणा से बेचारा संसार कैसे भरमाया गया है। क्योंकि पोपवादी यह तो सहज ही मान लेते हैं कि परमेश्वर के अनुग्रह के बिना हम वैसे नहीं चल सकते जैसे हमें चलना चाहिए; परन्तु साथ ही वे कहते हैं कि हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा से परमेश्वर के अनुग्रह को भली-भाँति आगे बढ़ा सकते हैं, और इस प्रकार वे दोनों को मिला देते हैं। जब वे स्वतन्त्र इच्छा की परिभाषा देने बैठते हैं तो कहते हैं कि वह एक मिश्रित वस्तु है, क्योंकि हमारे पास भले को चुनने और बुरे को ठुकराने के लिए बुद्धि और विवेक है, और साथ ही जो ठाना है उसे पूरा करने और निभाने की शक्ति और सामर्थ्य भी है। परन्तु हम देखते हैं कि सन्त पौलुस यहाँ मनुष्य की बुद्धि के विषय में कैसे कहता है, जिसे वे रानी कहते हैं जो हमारे सब विचारों और कार्यों पर शासन और नियन्त्रण करती है। वह दिखाता है कि वह पूरी तरह अन्धी है, जब तक परमेश्वर उसे नया न बना दे, और ऐसा नहीं है कि हम में सामर्थ्य का कोई चिह्न बचा हो, जिससे परमेश्वर को केवल हमारी कमियों की पूर्ति ही करनी पड़े। यदि ऐसा होता तो सन्त पौलुस कहता कि परमेश्वर हमारे पास जो ज्योति है उसकी सहायता करता है, या उसे बढ़ाता है, या जिस बात की उसे आवश्यकता है वह उसमें जोड़ देता है। परन्तु वह ऐसा नहीं कहता, वरन् कहता है, “परमेश्वर तुम्हें ज्योतिर्मय आँखें दे,” और इस प्रकार दिखाता है कि यह एक मुफ़्त दान है, और केवल यही नहीं कि हमारा प्रभु हमारी निर्बलताओं को सह ले और उनमें कुछ जोड़ दे। वह यह भी कहता है कि हम अन्धे होने के कारण तब तक कुछ भी नहीं देख सकते जब तक वह हमारी आँखें न खोले, और हम अपने पवित्र आत्मा के इसी प्रकाशन के द्वारा, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, चलाए और संचालित किए जाते हैं।
और अब, क्योंकि मनुष्य सदा चरम सीमाओं की ओर दौड़ पड़ते हैं और बहुत-सी निष्फल बातों में अपना सिर खपाते हैं, इसलिए सन्त पौलुस हमें वह दिखाता है जिसमें हमें अपना सारा मन और हृदय लगाना चाहिए, अर्थात् यह जानने की खोज में कि हमारे बुलाए जाने की आशा क्या है। मैं तुम से कह चुका हूँ कि मनुष्य, एक प्रकार से, जिज्ञासा के लिए ही जन्म लेते हैं, और वे भटकते और घूमते फिरते हैं और बहुत-सी बुरी कल्पनाएँ गढ़ते हैं, और इसी कारण बहुत-से लोग अपने आप को सीमा से बढ़कर सताते हैं, सदा सीखते रहते हैं और सत्य की पहचान तक कभी नहीं पहुँचते, [2 तीमुथियुस 3:7] जैसा सन्त पौलुस कहता है। इसलिए हम ध्यान से समझ लें कि जिस सच्चे ज्ञान को हमें खोजना है, वह यही है कि हम उस आशा को पाएँ जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बुलाया है। क्योंकि पवित्रशास्त्र का उद्देश्य हमें व्यर्थ और अनावश्यक बातों से पोषित करना नहीं, वरन् हमारे कल्याण के लिए हमारी उन्नति करना है, अर्थात् हमें परमेश्वर की भलाई का बोध कराना कि हम उससे जुड़ें, और यही हमारा सच्चा सुख हो।
और इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि जब तक हमारा प्रभु अपने पवित्र आत्मा से हमें ज्योति नहीं देता, तब तक हमें स्वर्गीय जीवन के निकट आने का न कोई मार्ग मिल सकता है, न कोई पगडण्डी, यहाँ तक कि यह अनुमान लगाना भी सम्भव नहीं कि वह है क्या। इसलिए हमें इसकी आवश्यकता है कि हमारा प्रभु अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हमें हमारे उद्धार का अधिकारी बनाए। मैंने तुम से पहले कहा था कि विश्वास स्वर्ग के राज्य में और उस मीरास में, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली है, हमें प्रवेश दिलाने का काम करता है, और यह आवश्यक है कि परमेश्वर उसे हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा दे। तो जब ऐसा है, तब हम ध्यान दें कि हमें केवल यही आवश्यक नहीं कि सुसमाचार हमें सुनाया जाए, वरन् यह भी कि परमेश्वर हमारे कान बेधे, ताकि हम उसमें जो कुछ कहा गया है उस पर ध्यान दें; और वह हमारी आँखें खोले कि जो कुछ वह हमें दिखाता है उसे हम देख सकें। संक्षेप में, यह कि वह ही सब कुछ आरम्भ करे और वह ही सब कुछ पूरा करे।
तौभी (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) चूँकि मनुष्य अपनी व्यर्थ कल्पनाओं के कारण अपने ऊपर उससे अधिक ले लेते हैं जितना उन्हें लेना चाहिए, और दूसरी ओर परमेश्वर के दानों को तुच्छ जानते हैं, इसलिए सन्त पौलुस यहाँ उस आशा को, जिसका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं, महान ठहराता है, और कहता है, “पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।” यह सच है कि जब परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह की चर्चा होती है, तब हम उन्हें ऊँची बातें कह देते हैं। फिर भी वह केवल इसलिए कि हम स्वयं उनसे छूट जाएँ, यदि बच निकल सकें, ताकि धर्म से सम्बन्ध रखनेवाली बातों से सर्वथा अनजान बने रहने में ही हम सन्तुष्ट रहें। जब कोई हमें व्यर्थ और झूठी बातें खिलाता है, तब हम अतृप्त रहते हैं; परन्तु यदि परमेश्वर हमें अपनी पाठशाला में बुलाता है, तो जितना हो सके हम पीछे हट जाते हैं, और यहाँ तक कि इसे ढाल के रूप में अपने आगे रख लेते हैं कि हम सीधे-सादे हैं, हमारी समझ छोटी और कुछ मन्द है, और परमेश्वर के वचन के भेद हमारे लिए बहुत गहरे और अगम हैं। हम इतना कहना तो भली-भाँति जानते हैं, फिर भी यह सब कपट और ढोंग है।
और इसके प्रमाण में, मनुष्य सदा अपने ही विचारों के अनुसार न्याय करेंगे, इसलिए यदि परमेश्वर के वचन में से कोई बात उनके सामने रखी जाए, तो वे कहते हैं, क्या ऐसा है? और यह कैसे हो सकता है? वे तर्क करते हैं, वे उसे प्रश्न बना देते हैं: क्या ऐसा है? सचमुच, परमेश्वर ही बोलता है, फिर भी जो कुछ परमेश्वर के नाम से उनके सामने रखा जाता है, उसे वे बिना विरोध किए ग्रहण नहीं करते। तब हम देखते हैं कि जब वे कहते हैं कि वे मन्द और धीमी बुद्धि के हैं, तो वे सरासर झूठ बोलते हैं, क्योंकि वे सोचते तो इसके बिलकुल विपरीत हैं। मैं कहता हूँ, सबसे निरे मूर्ख और उन में सबसे बड़े जड़बुद्धि भी अपने आप को ऐसी बुद्धि का स्वामी समझते हैं जो परमेश्वर की बुद्धि से बढ़कर है।
फिर, दूसरी ओर, सुसमाचार के तिरस्कार का कारण यह है कि बहुत-से घमण्डी और कल्पनाशील लोग समझते हैं कि यह केवल एक साधारण शिक्षा है, और उनके लिए इसमें पर्याप्त सूक्ष्मता नहीं है। इसलिए हमें और भी अधिक इस पर विचार करना चाहिए जो सन्त पौलुस यहाँ हमें दिखाता है, अर्थात् यह कि वह महिमामय मीरास जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बुलाया है, उसमें अनन्त धन है। क्योंकि इसके अतिरिक्त कि हम कीचड़ और सड़ाहट के सिवा और कुछ नहीं हैं, पाप हमें उद्धार की सारी आशा से बाहर कर देता है। और जब तक हम परमेश्वर के बैरी हैं, तब तक उसके हाथ से सर्वनाश के सिवा हम और क्या आशा कर सकते हैं? तौभी उसे यह भाया कि हमें स्वर्ग के स्वर्गदूतों का सहभागी बनाए, वरन् उनसे भी बढ़कर। क्योंकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अंग बनाए गए हैं, ताकि हम उसके जीवन और महिमा के भागी हों। ये कैसे उत्तम धन हैं! जब हम अपना सारा मन इन पर लगा चुके हों, तब क्या हमें पूरी तरह लज्जित नहीं होना चाहिए, यह देखते हुए कि परमेश्वर ने हमारे प्रति ऐसी अनमोल भलाई दिखाई है? इसलिए सन्त पौलुस मनुष्यों को उनकी ऊँघ से जगाने, और उनकी कृतघ्नता को डाँटने और सुधारने के लिए, क्योंकि वे परमेश्वर के अनुग्रह की सौवाँ भाग भी वैसी सराहना नहीं करते जैसी उन्हें करनी चाहिए, हमें बताता है कि यदि हम इस पर भली-भाँति विचार करें तो पाएँगे कि उसका इस रीति से बोलना हमें इस बात के लिए उभारना है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें ज्योति दे, क्योंकि उसके बिना हम विश्वास के, या किसी भी ज्ञान के, निकट तक नहीं पहुँच सकते।
इस प्रकार अब हम सन्त पौलुस का अभिप्राय देखते हैं, जिसे वह आगे और भी अधिक खोलकर बताता है जब वह यह जोड़ता है, “हम विश्वास करनेवालों के लिए उसके सामर्थ्य की महानता कैसी है।” और फिर, “उसकी शक्ति के सामर्थ्य के प्रभावशाली कार्य के अनुसार।” वह यहाँ बहुत-से शब्द इकट्ठे करता और ढेर लगाता है जो सब एक ही बात का अर्थ रखते हैं। परन्तु यह मानो मनुष्यों की दुष्टता का सुधार है, जो परमेश्वर की भलाई को जितना हो सके धुँधला करने का यत्न करते हैं, यहाँ तक कि चूँकि वे उसे पूरी तरह धुँधला नहीं कर पाते, वे उसे इस प्रकार घटा देते हैं कि वह दिखाई ही न दे; मानो उसमें केवल एक चिंगारी हो, जबकि उसे पूरी चमक के साथ प्रकाशित होना चाहिए। परन्तु प्रसंगवश हम ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस यहाँ पवित्र लोगों और विश्वासियों का उल्लेख करता है, तो उसका अर्थ उन विश्वासियों से है जिन्हें परमेश्वर पहले ही अपने पास बुला चुका है। और इससे वह दिखाता है कि जब हमें विश्वास प्राप्त हो चुका है तब भी हमारी सारी पवित्रता परमेश्वर की दया से ही निकलती है, और मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं लाते। यह सच है कि ‘पवित्र लोग’ की यह उपाधि बहुत आदरयोग्य है, परन्तु फिर भी हमें पवित्रता के स्रोत तक जाना चाहिए, क्योंकि अपने आप में हम में अशुद्धता के सिवा और कुछ नहीं है। परमेश्वर की सन्तानों को पवित्र होना है, फिर भी उन्हें सोचना चाहिए कि यह उन्हें कहाँ से मिली, अपनी निपुणता से या परमेश्वर के दान से। सन्त पौलुस यहाँ दिखाता है कि इसकी स्तुति केवल परमेश्वर को ही दी जानी चाहिए। क्योंकि परमेश्वर बार-बार यह जो कहता है, “मैं पवित्र हूँ,” [लैव्यव्यवस्था 11:44; 19:2; 1 पतरस 1:15] वह बिना कारण नहीं। और फिर, हम जानते हैं कि यीशु मसीह ने हमारे लिए अपने आप को पवित्र ठहराया, ताकि हम धोए जाएँ और अपनी सब अशुद्धताओं से शुद्ध किए जाएँ। पहली बात के विषय में इतना ही।
इसके पश्चात् हमारे विश्वास का कारण आता है, अर्थात् यह कि मनुष्य उसे तब तक नहीं पाते जब तक किसी गुप्त प्रेरणा से खींचे न जाएँ, जैसा कहा गया है कि हमें परमेश्वर से सीखना है [मत्ती 2:29], केवल इसलिए नहीं कि उसके वचन में सारी बुद्धि है और परमेश्वर उसके द्वारा हमें विश्वासयोग्यता से वह सिखाता है जो हमारे लिए लाभदायक है, वरन् इसलिए भी कि हमारे प्रभु ने इसे बहुत स्पष्ट रूप से कहा, “जिसने पिता से सुना है।” [यूहन्ना 6:45] जो स्वयं परमेश्वर की बुद्धि था, उसी ने यह कहा, फिर भी उसने दिखाया कि जो वह अपने मुख से कहता था वह तब तक प्रभावी नहीं हो सकता था, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य के भीतर न बोले। अब यदि यीशु मसीह भी अपनी शिक्षा से मनुष्यों को तब तक लाभ नहीं पहुँचा सकता था जब तक परमेश्वर का आत्मा उनके हृदयों में कार्य न करे, तो उस प्रचार से क्या होगा जो हम नश्वर मनुष्यों के मुख से सुनते हैं, जो कुछ भी नहीं हैं? इसलिए मनुष्यों को रोपना और सींचना है, परन्तु बढ़ानेवाला परमेश्वर है, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों के नाम पहली पत्री के तीसरे अध्याय में कहता है [पद 6]।
इसके अतिरिक्त, जैसा मैंने तुम से कहा कि हमें अपनी सारी पवित्रता यीशु मसीह से लेनी है, जिसमें हम उसकी सारी परिपूर्णता पाएँगे, वैसे ही हम यह भी समझ लें कि इसी वचन के द्वारा हमें चेतावनी दी जाती है कि हम अशुद्धता के लिए नहीं बुलाए गए कि बुराई करने की छूट ले लें, वरन् मानो परमेश्वर की सेवा के लिए अलग किए जाने को बुलाए गए हैं। बहुत-से लोग यह डींग तो भली-भाँति मारेंगे कि वे विश्वासी हैं — और यह शब्द हर किसी की जीभ पर सहज ही आ जाता है, — परन्तु विश्वास उससे कहीं अधिक बहुमूल्य वस्तु है जितना हम समझते हैं, क्योंकि वह हमारे हृदयों को शुद्ध करता है (जैसा प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय [पद 9] में कहा गया है) ताकि हम मानो अलग और पृथक् किए जाकर अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में समर्पित करें। परन्तु इससे यह अर्थ निकलता है कि मनुष्य मानो एक बिगड़े और संक्रमित पिण्ड के समान हैं, जब तक परमेश्वर एक प्रकार के लोगों को शेष से अलग न निकाल ले। तब हम उनसे जो सब प्रकार की बुराई और दुष्टता में जितना हो सके उतने गहरे डूबे हैं, बिलकुल भिन्न नहीं हैं। मैं कहता हूँ, जहाँ तक हमारे स्वभाव का सम्बन्ध है, हम सब एक समान हैं। परन्तु जो हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, उन्हें इस संसार में से मानो बाहर खींच लिया जाना चाहिए, जैसा सन्त पतरस भी अपनी पहली पत्री में कहता है।
फिर, हम पहले ही देख चुके हैं कि हम यीशु मसीह के लोहू से शुद्ध किए जाते हैं ताकि हम इस संसार में से बाहर निकाले जाएँ, जैसा वह यूहन्ना के सुसमाचार में भी कहता है, जहाँ वह अपने पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह हमें इस संसार और इस क्षणभंगुर जीवन से न उठा ले, वरन् संसार की बुराई को हम में प्रबल होने से रोके और हमें उससे बचा रखे। [यूहन्ना 17:15] तुम देखते हो कि हमें यह स्मरण रखना है कि पवित्रता हमारे विश्वास का सच्चा प्रमाण है। और इसलिए जो कोई मसीही कहलाता है उसे परमेश्वर के लिए समर्पित होना चाहिए, और संसार की अशुद्धता और मलिनता में न उलझना चाहिए, न अपने आप को अशुद्ध करना चाहिए। यह सच है कि जब तक हम इस संसार में हैं, हमारी पवित्रता कभी सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि हम सदा अपनी निर्बलताएँ साथ लिए चलते हैं, और यद्यपि पाप हम पर प्रबल न हो, तौभी वह हम में बसता है, और हम निरन्तर उससे लड़ते रहते हैं कि ऊपर हो जाएँ। परन्तु जो भी हो, जब परमेश्वर ने एक बार हमें पवित्र ठहरा दिया है, तो हमें उसकी सेवा में लगना चाहिए, हमें अपने आप को सब दुर्गुणों से और अधिक शुद्ध करने का यत्न करना चाहिए, और अपने आप को पूरी तरह उसे दे देना चाहिए ताकि हम फिर संसारी लोगों के समान न रहें, जो जो चाहें वही करने की छूट ले लेते हैं। सन्त पौलुस वास्तव में यही कहना चाहता था।
इसके अतिरिक्त, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस अंश में वह उनके बीच तुलना करता है जो पूर्ण अज्ञान में डूबे हैं, या यों कहें कि इतने कठोर हो गए हैं कि सुसमाचार की आज्ञाकारिता में अपने आप को झुकाने की उनमें कोई प्रवृत्ति ही नहीं, वरन् वे उससे क्रोध में लड़ते हैं, और उन विश्वासियों के बीच जो अच्छे चरवाहे की आवाज़ पर कान लगानेवाली बेचारी भेड़ों के समान हैं। सन्त पौलुस तब यहाँ उन सब उपहास करनेवालों को दोषी ठहराता है जो परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं और कुत्तों या बिना धर्म-बोध के पशुओं के समान हैं। जब हम उन्हें देखते हैं, तो वे सब हमारे लिए दर्पण हैं, जिन्हें देखकर हमारे सिर के बाल खड़े हो जाएँ, क्योंकि वे हमें जता देते हैं कि यदि परमेश्वर ने हम पर तरस न खाया होता तो हम कैसे होते। और इसलिए जब हम लोगों को परमेश्वर का ऐसा खुला तिरस्कार करते देखते हैं कि वे सब प्रकार की बुराई में अन्धाधुन्ध दौड़ पड़ते हैं, तो हम अपने परमेश्वर की अनन्त भलाई को स्वीकार करें कि उसने हमें उस मण्डली से अलग किया है। इसलिए जब हम एक प्रकार के लोगों को अपने अविश्वास में जड़ और दूसरे प्रकार के लोगों को सुसमाचार के विरुद्ध अभिमान, कड़वाहट और हठ से भरा देखते हैं, तो हम समझ लें कि यदि परमेश्वर ने हमारी ओर अपनी भुजा न बढ़ाई होती तो हम स्वयं भी उन्हीं के समान होते।
परन्तु अब हम उन शब्दों पर ध्यान से विचार करें जो सन्त पौलुस यहाँ कहते हुए प्रयोग करता है, “उसकी सामर्थ्य की उत्तम महानता, उसकी शक्ति के बल के प्रभावशाली कार्य के अनुसार।” ऐसा प्रतीत होता है कि पवित्र आत्मा ने इस शैतानी धारणा पर, जिससे संसार सब समयों में मूढ़ बना रहा है, अर्थात् स्वतन्त्र इच्छा पर, गरजना चाहा। क्योंकि अन्यजातियों ने यहाँ तक दुस्साहस किया कि कहा कि परमेश्वर ने उन्हें संसार में रहने के लिए बनाया है, और उन्हें सौभाग्य देना, जैसा वे कहते थे, उसके हाथ में है, परन्तु सद्गुण का अनुसरण करना और अपना आचरण ऐसा रखना कि उसमें कोई दोष न पाया जाए, यह हर मनुष्य के अपने ही अधिकार और स्वतन्त्र चुनाव में है। देखो अन्यजातियों ने परमेश्वर और अपने बीच बातों का बँटवारा कैसे किया। छोटी बात — हमें यहाँ नीचे मेंढकों की तरह रेंगने के लिए रख देना — उन्होंने परमेश्वर पर छोड़ दी, परन्तु स्वर्ग को पाना और अपने आप को सब सद्गुणों में चलाना, यह, उन्होंने कहा, मनुष्य की अपनी सामर्थ्य की सीमा के भीतर है।
यहूदी और पोपवादी पूरी तरह इस मत के नहीं रहे, क्योंकि (जैसा मैं पहले संकेत कर चुका हूँ) वे मानते हैं कि हमें परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता है। परन्तु फिर भी वे चाहते हैं कि हम अपनी पवित्रता का कुछ अंश परमेश्वर के अनुग्रह में मिला दें और उसके साथ सहयोग कर सकें, जैसा वे कहते हैं, ऐसा कि जब सब हिसाब लग जाए और हर छूट दे दी जाए, तब भी मुख्य भाग सदा हमारे ही भीतर पाया जाएगा।
परन्तु आओ देखें कि पवित्र आत्मा इसके विषय में कैसे कहता है। वह ये सब शब्द — ऊँचाई, सामर्थ्य, शक्ति, प्रभावशाली कार्य और बल — किस उद्देश्य से प्रयोग करता है? इन सबका ढेर वह इसके सिवा और किसलिए लगाता है कि दिखाए कि जब मनुष्य अपने ऊपर उससे अधिक ले लेते हैं जितना उन्हें शोभा देता है तो वे पागल हैं? यहाँ एक भी शब्द ऐसा नहीं जो हमारी बकबक को चुप न कराता हो, यदि हम भलाई की एक नन्ही बूँद पर भी घमण्ड करें। क्योंकि यदि मनुष्य कहें, मुझ में कुछ अच्छा स्वभाव है, मुझ में कुछ सद्गुण है, तो सन्त पौलुस इसी के विषय में कहता है, ‘ऊँचाई!’; मानो वह दिखाना चाहता हो कि जो भी भलाई हमारे पास है वह संसार से ऊपर की है और उसकी हम में कोई जड़ या उद्गम नहीं, वरन् वह ऊपर से आती है, जैसा सन्त याकूब कहता है। [याकूब 3:17] फिर, यदि मनुष्य कहें कि अपने दुर्गुणों का सामना करने और परीक्षाओं से लड़ने की कुछ सामर्थ्य हम में है, तो सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि हमारा बल, हमारी सामर्थ्य और हमारी शक्ति परमेश्वर से आती है, और वह उसे हमें दे और हम उससे पाएँ। यदि मनुष्य फिर भी कहें कि अपने प्रयत्न से वे न जाने क्या-क्या कर सकते हैं, तो सन्त पौलुस हमें बताता है कि कोई प्रभावशाली कार्य नहीं, कोई बात पूरी करवाना नहीं, जब तक परमेश्वर उसे न दे, जैसा वह फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में, [पद 13] यह कहते हुए बताता है कि हमें भय और सावधानी के साथ चलना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ही अपनी सुइच्छा के अनुसार हम में इच्छा और उस इच्छा को पूरा करने की सामर्थ्य, दोनों उत्पन्न करता है, अर्थात् वह काम आरम्भ करता और उसे पूरा करवाता है। संक्षेप में, हम ध्यान दें कि प्रेरित ने यहाँ जो शब्द प्रयोग किए हैं वे इतनी ही बज्रध्वनियाँ और बिजलियाँ हैं, जो मनुष्य के सारे घमण्ड को ढाने और दबाने के लिए हैं, ताकि हम अपने आप में लज्जित होकर परमेश्वर को वह महिमा दें जिसका वह अधिकारी है, और पूरी दीनता के साथ खुले और स्पष्ट रूप से अपने आप को दोषी मानें, यह स्वीकार करते हुए कि सारी भलाई उसी से आती है, और उसके लिए हम केवल उसी के ऋणी हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस अंश से हमें वास्तव में यही सीखना है कि हम इस रीति से दण्डवत् करें कि परमेश्वर के साथ हिस्सा बाँटने की हमारी कोई इच्छा न रहे, यह कहते हुए कि वह केवल हमारी सहायता करता है और हमारी स्वतन्त्र इच्छा में उसके अनुग्रह और पवित्र आत्मा का कुछ अंश है; वरन् हम अपने उद्धार की सारी स्तुति उसे शुद्ध और सीधे रूप से सौंप दें।
इसके अतिरिक्त, यह हमें संसार को तुच्छ जानना भी सिखाए, ताकि हम उस अनन्त जीवन की आशा से सन्तुष्ट रहें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली है। क्योंकि हम जानते हैं कि यद्यपि मनुष्य सामान्यतः बहुत-से क्लेशों के अधीन हैं, और हमारा यह जीवन अकारण नहीं विपत्ति की तराई कहलाता है, तौभी परमेश्वर अपनी सन्तानों को और सब लोगों से अधिक बहुतायत की विपत्तियों से परखता है, क्योंकि उन्हें भी सब समयों में संसार को त्यागने के लिए प्रेरित किए जाने की आवश्यकता है। यदि हम यहाँ बहुत अधिक सुख-चैन से रहें, तो हमारा क्या होगा, जबकि हम यहाँ सो जाने से नहीं चूकते, चाहे परमेश्वर हमें अनेक रीतियों से उकसाता और विनती करता है कि हम यहाँ नीचे देर न करके शीघ्रता करें। इसलिए तुम देखते हो, थोड़े शब्दों में, कि जब परमेश्वर ने हमें सुसमाचार के विश्वास के लिए बुला लिया है तब वह हमें कितनी रीतियों से परखेगा; क्योंकि नहीं तो हमें उसकी सेवा से अरुचि हो जाती, और हमें ऐसा लगता कि उसका प्रेम बहुत ही थोड़ी-सी वस्तु है, यदि हम अन्य सब वस्तुओं को निकम्मी या अल्प मूल्य की जानकर छोड़ना और यीशु मसीह को ग्रहण करना न सीखते। इसलिए हम सीखें कि यहाँ सन्त पौलुस का अभिप्राय हमें परमेश्वर की ओर इस प्रकार खींचना है कि कुछ भी हमें अपने बुलाए जाने में आगे बढ़ने से न रोक सके। यदि इस संसार में सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं मिलता, तो हम अपने परमेश्वर के अनमोल उपकारों का मूल्य पहले से बेहतर आँकना सीखें, ताकि हम दाऊद के साथ कह सकें (जैसा वह अपने सोलहवें भजन [पद 5] में कहता है), ‘मेरी मीरास से मैं सन्तुष्ट हूँ’; क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को मुझे दे दिया है, मेरी ऐसी उत्तम मीरास है कि संसार के सब क्लेशों से — निर्धनता, रोग, निन्दा, भय और धमकियों से — गुज़रने की मुझे चिन्ता नहीं; ये सब बातें मुझे मधुर लगेंगी, जब तक मेरा परमेश्वर मेरा है, और वह मुझे यह अनुभव कराता है कि उसने मुझे चुना है और मुझे अपने लिए सुरक्षित रखा है और अपनी सब उत्तम वस्तुओं का भागी बनाना चाहता है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि वास्तव में इस अंश के द्वारा हमें धीरज के लिए हियाव और बल मिलना है, कि संसार के सब क्लेशों और विपत्तियों को नम्रता से सहें, और न खिन्न हों, न झुँझलाएँ: और यद्यपि परमेश्वर हमें समय-समय पर कड़वे प्याले से पिलाता है और हमें आहें भरने और विलाप करने का कारण देता है, तौभी हम कुड़कुड़ाने और शिकायत करने न लगें, वरन् अपने को निश्चय दिलाएँ कि परमेश्वर ने हमें भली शान्ति दी है, क्योंकि उसने हमें अपने राज्य का भागी होने के लिए बुलाया है, और अपना सामर्थ्य हम में पहले ही इस प्रकार प्रकट किया है कि हमें मानो सब सांसारिक वस्तुओं से ऊपर उठ जाना और उन्हें अपने पैरों के नीचे जानकर नीचे देखना चाहिए।
और चूँकि हम परमेश्वर के अनुग्रह की ऐसी परिपूर्णता अभी नहीं देखते जैसी चाही जानी चाहिए, इसलिए सन्त पौलुस हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व की ओर भेजता है। और निश्चय यदि उसने यह न जोड़ा होता कि परमेश्वर ने अपना सामर्थ्य अपने एकलौते पुत्र में प्रकट किया है, जैसा हम पहले सुन चुके हैं, तो कैसी निराशा होती! क्योंकि हम उत्तर में यह दलील दे सकते थे, कैसे? परमेश्वर का यह धन कहाँ है? क्योंकि हम न केवल संसार की वस्तुओं से रहित हैं, वरन् परमेश्वर के पवित्र आत्मा के अनुग्रह के विषय में भी सूखी और बंजर भूमि के समान हैं। यदि उसका कुछ अंश हम में है भी, तो वह इतना थोड़ा है कि हमें उस पर लज्जित होना चाहिए, और फिर भी, इस सब के होते हुए, हम अपनी निर्बलताओं में डूबे हैं। यदि हम परमेश्वर के सामर्थ्य की बात करें, तो उसे हम में सब पाप पर जयवन्त होना चाहिए। परन्तु हम इतने निर्बल हैं कि लगभग पटके पड़े हैं। फिर, यह आवश्यक है कि परमेश्वर का स्वरूप हम में चमके, परन्तु हम अपने साथ इतनी मलिनता और ऐसे दोष लिए फिरते हैं कि देखकर तरस आता है। हमें पूरी तरह परमेश्वर के लिए समर्पित होना चाहिए, परन्तु संसार हमें रोके रखता है, और हम मानो उसमें उलझे हुए हैं।
देखो, जब परमेश्वर के अनुग्रह के विषय में कोई वचन सुनाया जाए, तब यदि विश्वासी वहीं ठहरे रहें और यीशु मसीह की ओर न ले जाए जाएँ, तो वे कैसे हताश हो सकते हैं। इसलिए सन्त पौलुस का यहाँ यह जोड़ना अकारण नहीं कि जब परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को मृतकों में से जिलाया, तब उसने अपने सामर्थ्य की उत्कृष्टता प्रकट की। और वह जान-बूझकर उसके पुनरुत्थान की चर्चा करता है, क्योंकि उसकी मृत्यु में हम केवल वही देखते हैं जो हमें हतोत्साह कर सकता है। क्योंकि वहाँ निर्बलता के सिवा कुछ दिखाई न दिया, परन्तु मृत्यु को जीतकर उसने अपने आप को परमेश्वर का पुत्र, अर्थात् महिमा और जीवन का प्रभु दिखाया, जिसमें सब सामर्थ्य थी। और इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने उसे अपने दाहिने हाथ बैठाया। क्योंकि यीशु मसीह का फिर जी उठना पर्याप्त न होता, यदि उसका शासन निरन्तर और स्थायी न होता। यह सच है कि उसके पुनरुत्थान में भी हमारे पास इसकी साक्षी है कि वह परमेश्वर का पुत्र है, परन्तु फिर भी हमें एक पग और आगे बढ़ना है, अर्थात् यह कि उसके पास कोई साधारण प्रकार की शक्ति और अधिकार नहीं था, वरन् अपने जी उठने से उसने ऐसी श्रेष्ठता पाई कि सारा संसार उसी से शासित होता है, और वह अब अपने पिता परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है कि अपने उन सेवकों को, जो उसे पुकारते और अपने आप को उसकी रखवाली में सौंपते हैं, थामे रखे और बचाए रखे, और शैतान को, सारे संसार को और हमारे सब शत्रुओं को पराजित करने की पर्याप्त शक्ति रखता है।
अब तब हम सन्त पौलुस का अभिप्राय देखते हैं कि चूँकि हम गिरा दिए जा सकते थे और हमारा विश्वास कम से कम बुरी तरह हिल सकता था, यदि हम अपने से आगे न देखें, इसलिए वह यीशु मसीह को हमारे सामने सच्चे आदर्श के रूप में रखता है, जिसमें हम वह देख सकें जो अभी हम में अदृश्य है, अर्थात् परमेश्वर का अनमोल सामर्थ्य जो सारे संसार के सामर्थ्य से बड़ा है। क्योंकि पहले तो वह मृतकों में से जिलाया गया, और दूसरे अपने पिता के दाहिने हाथ बैठाया गया। अब परमेश्वर के दाहिने हाथ की बात करना मनुष्यों से ली गई एक उपमा है। यह निश्चित है कि परमेश्वर के न दाहिना हाथ है न बायाँ, क्योंकि वह अनन्त है और स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को भरता है; और फिर, उसकी कोई देह नहीं, वह आत्मिक सत्ता है। इसलिए जब परमेश्वर के दाहिने हाथ की बात होती है, तब हमें किसी विशेष स्थान की कल्पना नहीं करनी चाहिए। और जब कहा जाता है कि यीशु मसीह वहाँ बैठा है, तो यह दिखाने के लिए है कि वह अपने सामर्थ्य से सारे संसार को भरता है। यह सच है कि अपने मनुष्यत्व के विषय में वह स्वर्ग में है, और यह हमारे विश्वास के अनुच्छेदों में से एक है कि वह स्वर्ग पर चढ़ गया। परन्तु फिर भी, यद्यपि वह अपनी देह में हम से दूर है और हमारे बीच बड़ी दूरी है, यह उसे अपने पवित्र आत्मा से सब कुछ भरने, और स्वयं हम में बसने और अपने ही तत्व से हमें पोषित करने से नहीं रोकता, इस वचन के अनुसार कि उसकी देह हमारा भोजन और उसका लोहू हमारा पेय है। [यूहन्ना 6:55]
तुम देखते हो, तब, कि परमेश्वर का दाहिना हाथ कोई विशेष स्थान नहीं जहाँ मसीह बैठा है, वरन् वह प्रभुता है जो उसने सारे संसार पर शासन करने के लिए पाई है; और (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह मनुष्यों से ली गई अलंकारिक भाषा है, जैसे जब कोई राजकुमार किसी को अपना प्रतिनिधि बनाता है, तो उसे अपनी दाहिनी ओर बैठाता है, मानो कहता हो, देखो, यह मेरे राज्य का दूसरा पुरुष है जिसकी आज्ञा मैं चाहता हूँ कि लोग मानें। इसलिए परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में यह दिखाना चाहा कि वह हमारा पिता है। यह सच है कि ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता यीशु मसीह में है। [कुलुस्सियों 2:9] परन्तु क्योंकि हम मन्द और आलसी हैं और परमेश्वर की महिमा तक पहुँचने में असमर्थ, इसलिए कहा जाता है कि यीशु मसीह ने सारा अधिकार पाया है, ताकि हम निश्चित हों कि उसने हमें अपनी रक्षा में ले लिया है और उसके हाथ के नीचे हम सुरक्षित हैं, और नरक के सब शैतान हमारे विरुद्ध प्रबल नहीं हो सकते। क्योंकि सब सामर्थ्य किसके पास है? वह हमारा ही सिर है। इसलिए यद्यपि हम जो उसके अंग हैं निर्बल हैं, तौभी सिर में, जो देह का प्रधान भाग है, पर्याप्त बल है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि यह क्यों कहा गया है कि यीशु मसीह अपने पिता परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, अर्थात् हमें यह दिखाने के लिए कि हमें उसकी सहायता के लिए दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह ऊपर और नीचे सब कुछ पर शासन करता है, और हम यहाँ उसकी देखरेख में सौंपे गए हैं। और अब आओ, हम सार निकालें कि सन्त पौलुस यहाँ हमें क्या बता रहा है। वह कहता है कि परमेश्वर ने अपना ऊँचा और असीम सामर्थ्य हम में प्रकट किया है। फिर भी, चूँकि हमारी अनुभव की जानेवाली निर्बलताओं के कारण यह पर्याप्त नहीं, और क्योंकि हम में अब भी बहुत कुछ कमी है और हम अभी पूरे डील-डौल को नहीं पहुँचे, वरन् उसके सौवें भाग को भी नहीं, इसलिए, ताकि हम उन सब बातों के विषय में जिनकी हमें आवश्यकता है और अधिक निश्चित हों, हमें जानना चाहिए कि वे यीशु मसीह में पाई जाती हैं।
तो क्या हम अब भी मृत्यु के अधीन हैं? ध्यान दो कि यीशु मसीह अनन्त जीवन में ग्रहण किया गया है, क्योंकि उसके हमारे समान नश्वर मनुष्य बनने का कारण ही यह था कि जो जीवन उसके पास है वह हमारा हो जाए। क्या पाप अब भी हम में बसता है? जान लो कि यीशु मसीह में न कोई दाग है न कलंक। क्या हम निर्बल हैं? वह अपने पिता परमेश्वर का सामर्थ्य है, और अपने मनुष्यत्व में, जो उसने हम से लिया, उसने जो कुछ पाया वह हमारे लिए और हमारे लाभ के लिए था। संक्षेप में, हमें जिस चीज़ की भी घटी है, और जो कुछ हमें शान्ति या जीवन दे सकता है, वह हम अपने प्रभु यीशु मसीह में पाएँगे, ताकि हम चिन्ता और घबराहट में न रहें, मानो उन उपकारों से बाहर कर दिए गए हों जिनका उल्लेख सन्त पौलुस पहले कर चुका है। अन्ततः, हमें कभी कोई स्थिर भरोसा न होता, यदि हम न जानते कि हम में जो बातें घटती हैं वे हमारे सिर में हैं। क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रह के दान की मात्रा सबसे सिद्ध लोगों में भी, और उनमें भी जो सबसे आगे बढ़े हैं और जिन्होंने सबसे अधिक उन्नति की है, बहुत थोड़ी है। तो जब ऐसा है, तब हम सदा डगमगाते और सन्देह करते रहते। परन्तु जब हम जानते हैं कि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरा हो चुका है, और वह मानो पहला फल है, और हम उसमें पवित्र किए गए हैं, और उसके व्यक्तित्व में हम ने पहले से पा लिया है वह जो हमें पूर्णता में आगे दिया जाएगा जब वह हमें इस संसार से उठा लेगा, तब वहीं हमारी निश्चयता है, जिस पर हमें टिके रहना चाहिए ताकि कोई परीक्षा हमें दबा न सके। संक्षेप में, इस पाठ से हमें यह सिखाया जाता है कि यद्यपि हम में परमेश्वर का अनुग्रह निर्बल है, अर्थात् यद्यपि उसने हम में उसका केवल छोटा-सा आरम्भ रखा है, और उतनी बड़ी बहुतायत नहीं जितनी आवश्यक है या जितनी चाही जानी चाहिए, तौभी यह अनुग्रह हमें उस पर आशा रखने का स्वाद और रुचि देता है। क्योंकि हम में उसके पवित्र आत्मा का अनुग्रह इतना थोड़ा नहीं हो सकता कि हम न जानें (जैसा सन्त पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय में कहता है) कि वह उस जीवन का, जिसकी उसने हमें प्रतिज्ञा की है, बयाना और अग्रिम है। यह सच है कि पाप की यह देह अब भी हम में बसती है, परन्तु हमें इसी से सन्तुष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर कृपा करके अपने पवित्र आत्मा का थोड़ा-सा भी हमें देता है।
इसके अतिरिक्त, चूँकि हमारी बुद्धि की अल्पता और हमारी निर्बलताओं और अभावों को देखते हुए हम इन सब बातों के विषय में निश्चित नहीं हो सकते, इसलिए हमें यीशु मसीह की ओर अपनी आँखें उठानी चाहिए। सचमुच, इससे हमें क्या लाभ कि सारी सिद्धता हम उसमें पा सकते हैं; क्योंकि हम उससे बहुत दूर हैं। हम स्थान की दूरी के विचार से उससे दूर हैं, और उसी अर्थ में सन्त पौलुस कहता है कि हम उससे अनुपस्थित हैं, क्योंकि हम केवल विश्वास से चलते हैं, खुली दृष्टि और प्रत्यक्ष देखने से नहीं। परन्तु फिर भी, इस सब के होते हुए, हम उसकी देह के अंग हैं। तो जब ऐसा है, तब जैसे जड़ वृक्ष से अलग नहीं की जा सकती, वरन् अपना रस उसकी सब डालियों और शाखाओं में पहुँचाती है, वैसे ही हम समझें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वर्गीय जीवन से सम्बन्ध रखनेवाले आत्मिक दान जो ऐसी परिपूर्णता में पाए हैं, उसका उद्देश्य यह है कि जितना आवश्यक हो, चरण-दर-चरण, जैसे-जैसे हम विश्वास में उन्नति करें, वह उन्हें हमें दे।
और इस सब के साथ, हम निरन्तर स्मरण रखें कि हमें झुकना और दीन होना है, और फिर भी इस बात से सन्तुष्ट रहना है कि हम अब भी उस सिद्धता से बहुत दूर हैं जिसकी आकांक्षा करना हमें शोभा देता है, और भूखे लोगों के समान रहना है, ताकि हम अपनी घटी और अभाव का अनुभव करते हुए अपने परमेश्वर के पास दौड़ें कि उसके हाथ से भीख माँगें, यह जानते हुए कि वह दिन-प्रतिदिन अपनी सहायता बढ़ाने में समर्थ है, और यदि ऐसा न होता तो हम पूरी तरह खो जाते, और सब कुछ खिसककर लुप्त हो जाता, यदि वह जो कुछ उसने आरम्भ किया है उसे जारी न रखता। तुम देखते हो, तब, कि हमारे लिए अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़ा रहना और यह जानना कितना आवश्यक है कि उसके और हमारे बीच अटूट बन्धन है। और चूँकि वह एक बार निर्धन बना कि हमें धनी करे (जैसा अन्यत्र कहा गया है), इसी के द्वारा उसमें के सब धन आज के दिन हमें दिए जाते हैं। इसलिए नहीं कि हम उनका पूरा आनन्द ले रहे हैं, जैसा मैंने पहले कहा, वरन् इसलिए कि हमारे लिए यह पर्याप्त है कि उनका थोड़ा-सा अंश हमारे पास है कि हम परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखें और जानें कि वह हमें किसी बात में निराश नहीं करेगा, वरन् चूँकि उसने हमें यह निश्चय दिया है कि वह हमारे निकट आ गया है और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में बसता है, जैसा हम ने कुरिन्थियों के नाम दूसरी पत्री में देखा है, इसलिए वह अन्त तक हमें भर भी देगा।
सन्त पौलुस का ‘धनी करना’ शब्द का प्रयोग यह दिखाने के लिए है कि हम में सदा घटी और कंगाली बनी रहेगी। फिर भी, हम इस प्रतिज्ञा पर साहस से भरोसा रखें कि जिसने हम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वह उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा। और यह इसलिए कहा गया है कि जब हमारा जीवन हमें बहुत लम्बा लगे, और हम चाहें कि वह सिद्धता हम में प्रकट हो चुकी होती और यीशु मसीह फिर आ चुका होता, तब हमें कुछ ताज़गी मिले। परन्तु कहा गया है कि उस दिन तक हमें सदा यात्रा करते रहना, और और आगे बढ़ते जाना, और परमेश्वर से विनती करते रहना है कि वह हमें लड़खड़ाने न दे। हम निश्चित हैं कि हम कभी अभाव और कमी का अनुभव करने से न चूकेंगे, फिर भी वह हमारी ऐसी सहायता करेगा कि हम देखेंगे कि यदि उसने एक बार अपनी दया की दृष्टि से हमें देखना स्वीकार किया है, तो वह इसलिए कि हमारे उद्धार का काम सब समयों में आगे बढ़ाए, और हमें जता दे कि उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ व्यर्थ नहीं जोड़ा, वरन् यह इसलिए किया कि हम में से हर एक अभी से, विश्वास के परिमाण के अनुसार, उन उत्तम वस्तुओं का स्वामी हो जो उसके लिए उचित हैं, जब तक कि वह हमें पूरी तरह भर न दे; जो तब होगा जब वह हमें अपने साथ सिद्धता से जोड़ लेगा।
पर अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को स्वीकार करते हुए दण्डवत् करें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि वह हमें उनसे खींच ले और हमारे जीवन को अपनी आज्ञाओं के अनुसार आज्ञाकारिता में चलाए, ताकि हम अपने कामों से दिखाएँ कि उसने हमें व्यर्थ इतने बड़े मोल से नहीं खरीदा, वरन् हम अपनी सब शारीरिक अभिलाषाएँ छोड़ दें और अपने आप को पूरी तरह उसकी सेवा में सौंप दें जिसने एक ही बार हमें अपनी मीरास के लिए गोद ले लिया है। और इसलिए, आओ हम कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता।
