अध्याय 23

इफिसियों के पहले अध्याय पर पहला प्रवचन - इफिसियों 1:1-3

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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इफिसियों के पहले अध्याय पर पहला प्रवचन - इफिसियों 1:1-3

पौलुस, परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह का प्रेरित, उन सब पवित्र और विश्वासी लोगों के नाम, जो यीशु मसीह में इफिसुस में हैं। हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे। धन्य है हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता, जिसने हमें मसीह में स्वर्गीय बातों में हर प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। - इफिसियों 1:1-3

जब हम उन पत्रियों को पढ़ते हैं जो सन्त पौलुस ने अनेक स्थानों को लिखीं, तो हमें सदा यह विचार करना चाहिए कि परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि वे केवल एक ही समय के लिए, या केवल कुछ लोगों के लिए नहीं, वरन् सदा के लिए और सामान्य रूप से सारी कलीसिया के काम आएँ। और सचमुच यदि कोई उनमें निहित शिक्षा पर भली-भाँति विचार करे, तो यह पहचानना सरल होगा कि परमेश्वर की मनसा यह थी कि जो बातें वहाँ कही गई हैं, उनमें वह जगत के अन्त तक सुना जाए; और यह भी कि उसे हमारी ऐसी चिन्ता है कि जो कुछ हमारे उद्धार को आगे बढ़ा सकता था, उसे उसने न तो छोड़ा और न भुलाया। इस पत्री का सार, जिसकी व्याख्या करने का काम मैंने अब हाथ में लिया है, यह है कि सन्त पौलुस उन लोगों को दृढ़ करता है जो सुसमाचार की शिक्षा पा चुके थे, ताकि वे जानें कि उन्हें उसी पर टिके रहना है, मानो वही सच्ची और सिद्ध बुद्धि है, और उसमें कुछ भी जोड़ना उचित नहीं।

पौलुस हमें बताता है कि वे लाभ जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें मिलते हैं, और जिनके हम उसके सुसमाचार के द्वारा भागी बनाए जाते हैं, ऐसे उत्तम हैं कि यदि हम उन लोगों के समान इधर-उधर भागते फिरें जिन्हें कभी चैन और सन्तोष नहीं मिलता, तो हम निश्चय ही अत्यन्त कृतघ्न ठहरेंगे। और फिर वह हमें यह भी दिखाता है कि मसीह में हमारे पास क्या है, ताकि हम उससे ऐसे लिपटे रहें कि कहीं और सहायता ढूँढ़ने का साहस न करें, वरन् निश्चय रखें कि उसने हमारे लिए सब कुछ प्राप्त कर लिया है।

फिर दूसरी ओर, वह हमें दिखाता है कि मसीह ने अपनी कलीसिया के लिए ऐसा उत्तम प्रबन्ध किया है कि यदि हम उन अनुग्रह के वरदानों का उपयोग करना जानें जो वह हमें देता है, तो हमें पूर्ण और सिद्ध सुख मिलेगा। इसके साथ ही, वह उन लोगों को जो सुसमाचार के सत्य की शिक्षा पा चुके हैं चिताता है कि वे पवित्र जीवन बिताएँ, और दिखाएँ कि उन्होंने परमेश्वर की पाठशाला में वैसा ही लाभ उठाया है जैसा उठाना चाहिए।

अब ये बातें केवल इफिसुस नगर के लिए, या किसी एक देश के लिए, या किसी एक युग या समय के लिए ही नहीं हैं, वरन् हमें अधिकाधिक उभारे जाने की आवश्यकता है, क्योंकि शैतान निरन्तर हमें बुराई की ओर फेरने का यत्न करता है। और जब वह हमें यीशु मसीह की शिक्षा से पूरी तरह दूर नहीं ले जा सकता, तो वह किसी न किसी रीति से उसे हमारे लिए अरुचिकर बनाने में लगा रहता है, और हमें नई-नई जिज्ञासाओं में उलझा देता है, केवल इसलिए कि हम उस विश्वास में जो हमने पाया है स्थिर न रहें, वरन् डगमगाने लगें। अब जब कभी हमारी कल्पनाएँ इस प्रकार चंचल हो उठती हैं, तो निश्चय है कि इससे वह सब कुछ जो हमने पहले सीखा था उसकी स्मृति मिटाने का और अनेक मूर्खताओं को, वरन् भ्रामक शिक्षाओं को भी, भीतर आने देने का मार्ग खुल जाता है, जो हमारे विश्वास की शुद्धता को बिगाड़ती और विकृत करती हैं।

तब हम देखते हैं कि इस पत्री में निहित शिक्षा आज के दिन हमारे ही लिए निर्देशित और समर्पित है, और परमेश्वर ने अपनी अद्भुत व्यवस्था से सब कुछ पहले से ऐसा ठहराया है कि हमारे पास न केवल सुसमाचार की वे नींवें रही हैं जिन पर हम स्थिर हों, वरन् वे साधन भी हैं जिनसे हमारा विश्वास दिन-दिन बढ़ता और बलवन्त होता जाए, ताकि हम तब तक आगे बढ़ते रहें जब तक सिद्धता तक न पहुँच जाएँ।

सबसे पहले, सन्त पौलुस वह अधिकार जताता है जो उसका था और जो परमेश्वर ने उसे दिया था, ताकि लोग उसके व्यक्तित्व पर अपना समय नष्ट न करें, मानो उसका वचन किसी नश्वर मनुष्य का कथन मात्र हो। क्योंकि वास्तव में हमारा प्रभु यीशु मसीह ही एकमात्र गुरु है जिससे हमें सीखना है, क्योंकि स्वर्ग से उसके विषय में यह साक्षी दी गई है कि वही है, और कोई नहीं, जिसकी हमें सुननी है [मत्ती 17:5]। परमेश्वर की यह इच्छा सदा से रही है कि अपनी कलीसिया का मार्गदर्शन वह अपने ही हाथ में रखे, और उसका वचन बिना किसी विरोध के ग्रहण किया जाए। यह विशेषाधिकार उसने किसी सृष्ट वस्तु को नहीं दिया। और जब यीशु मसीह अपने पिता परमेश्वर के स्थान पर ठहराया गया है, तो इसलिए कि वह शरीर में प्रगट हुआ परमेश्वर है, और स्वयं अचूक सत्य है, और उसकी बुद्धि सब समयों से पहले की है [1 तीमुथियुस 3:16]।

फिर, जब मनुष्य बोलें तो उन्हें अपने नाम से नहीं बोलना चाहिए, और न अपनी कल्पना और बुद्धि की कोई बात सामने रखनी चाहिए, वरन् जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी और सौंपा है उसे विश्वासयोग्यता से प्रस्तुत करना चाहिए। इसी कारण तुम देखते हो कि सन्त पौलुस मानो हर कहीं यह भूमिका बाँधता है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित है। इससे वह इसे एक स्थिर सिद्धान्त मानकर चलता है कि यदि कोई मनुष्य अपने ही नाम से बोलने के लिए आगे आए, तो उसमें दुस्साहस के सिवा कुछ नहीं, क्योंकि वह उस बात को अपने ऊपर ले लेता है जो केवल परमेश्वर की है।

फिर, इसलिए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह विशेष रूप से हमारा अन्तिम गुरु होने के लिए भेजा गया था, ताकि हमें ऐसी बुद्धि मिले जो सिद्ध और सर्वथा निर्दोष हो, इसलिए सन्त पौलुस अपने आप को उसका भेजा हुआ प्रेरित कहता है। इसमें दो बातें मानी गई हैं; पहली, कि सन्त पौलुस को वह कार्यभार सौंपा गया था; दूसरी, कि उसने उस पद पर, जिसके लिए वह बुलाया गया था, विश्वासयोग्य सेवा करके उसे भली-भाँति निभाया। क्योंकि यदि कोई मनुष्य संसार में सबसे अधिक प्रतिभाशाली और सबसे उत्कृष्ट भी हो, फिर भी यदि वह अपनी ही प्रेरणा से आगे बढ़ आए, तो वह सारी व्यवस्था को भंग करता है। और हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारे बीच व्यवस्था चाहता है, अव्यवस्था नहीं, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री के चौदहवें अध्याय में कहता है।

इसलिए जो बोलता है, कम से कम शिक्षा देने के लिए, उसकी एक बुलाहट होनी चाहिए, अर्थात् उसे स्वीकार किया गया हो और उसे कार्यभार सौंपा गया हो, ताकि हर कोई बिना सोचे-समझे उत्साह के कारण अपने आप को आगे न बढ़ाए, जैसा मैंने पहले कहा। परन्तु सन्त पौलुस की बुलाहट के विषय में और अधिक कहना इस समय आवश्यक नहीं, क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर ने कैसे साक्षी दी कि उसने उसे अपना प्रेरित अभिषिक्त किया [प्रेरितों के काम 9:15]। और वास्तव में वह यहाँ इस पर अधिक वाद-विवाद नहीं करता, क्योंकि इफिसुस की कलीसिया में यह भली-भाँति ज्ञात था। परन्तु जब गलातिया के लोग धोखेबाजों से घबरा गए थे, यहाँ तक कि वहाँ सन्त पौलुस का अधिकार, वरन् स्वयं परमेश्वर का नाम भी अपमानित हुआ था, तो हम देखते हैं कि उसने अपनी स्थिति का कैसे समर्थन किया, और उन्हें बताया कि यीशु मसीह के प्रेरित को जो आदर देना उचित है, वह दैवी व्यवस्था को उलटे बिना उससे छीना नहीं जा सकता [गलातियों 1:13—16]। इसलिए यहाँ उसके लिए इतना कह देना ही बहुत है कि वह यीशु मसीह का प्रेरित है।

आइए, उस दूसरी बात पर आएँ जिसकी मैंने चर्चा की थी, अर्थात् यह कि किसी मनुष्य का बुलाया जाना ही पर्याप्त नहीं, जब तक कि वह शुद्ध विवेक से और अपने पद में खरेपन के साथ अपना कर्तव्य पूरा न करे; यह बात सन्त पौलुस ने निर्विवाद मानकर अपने ऊपर ली थी, और उसने इसका पर्याप्त प्रमाण भी दिया था। धोखेबाज तो बड़े मुँह से कह सकते हैं कि वे बुलाए गए हैं, जैसा हम देखते हैं कि वे करते भी हैं। क्योंकि वे सब जो परमेश्वर और उसके वचन से लड़ते हैं, और उसकी कलीसिया में उपद्रव और जंगली दाने बोते हैं, अपनी बुलाहट और अपने उत्साह की ढाल बनाना चाहेंगे, क्योंकि वे बार-बार अपने आप को मसीही कहलाने पर अड़े रहेंगे। परन्तु सन्त पौलुस ने भली-भाँति प्रमाणित कर दिया था कि वह अपने आप से नहीं आया था, और न कलीसिया के निर्माण में अपने आप को खपाने के सिवा उसने कुछ और चाहा। और चूँकि यह इफिसुस में भली-भाँति ज्ञात था (जैसा हम सन्त लूका के इतिहास से जान सकते हैं: प्रेरितों के काम 19), और उसने अनेक कठिन युद्ध लड़े थे, इसलिए वह यह कह देना ही पर्याप्त समझता है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित है।

यहाँ हमें पहले तो यह चेतावनी लेनी चाहिए कि हम उस शुद्ध शिक्षा पर टिके रहें जिसे हम जानते हैं कि वह परमेश्वर की ओर से आई है, क्योंकि यदि हम उस नियम पर चलें तो हम भटक नहीं सकते। और चूँकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें वह सब कुछ पूरा मिला है जो हमारी शिक्षा के लिए आवश्यक और अपेक्षित है, ताकि हमें इस सन्देह की आवश्यकता न रहे कि हमें सुसमाचार पर टिके रहना है या उसमें कुछ जोड़ना है, इसलिए आइए, परमेश्वर के पुत्र को अपना गुरु मानकर सन्तुष्ट रहें, विशेषकर इसलिए कि वह इतना झुकना स्वीकार करता है कि वह कार्यभार अपने ऊपर ले, और साक्षी भी देता है कि यदि हमने उसकी शिक्षा से भली-भाँति लाभ उठाया, तो हम उस सच्चे लक्ष्य तक पहुँचेंगे जिस ओर हमें अपना मार्ग बनाना चाहिए।

तो तुम देखते हो कि इस खण्ड से जो पहला पाठ हमें लेना है वह यह है कि हमारा विश्वास इधर-उधर डगमगाए नहीं, वरन् उसकी एक निश्चित और अटल नींव हो जिस पर वह टिके, अर्थात् परमेश्वर का सत्य, जैसा वह सुसमाचार में निहित है। और चूँकि सन्त पौलुस को हमने भली-भाँति मान लिया है, इसलिए हम सन्देह न करें कि परमेश्वर का आत्मा आज के दिन उसके मुख से हमसे बोलता है, और न इस शिक्षा को ऐसे सुनें मानो वह हमारे निर्णय के अधीन हो। वरन् हम अपनी समझ और मन को अधीन करें और उसे बिना प्रश्न उठाए ग्रहण करें, जब तक कि हम जान-बूझकर परमेश्वर से युद्ध करना और अपने आप को उससे ऊँचा उठाना न चाहें। तो यह उन बातों में से एक है जो हमें इस खण्ड से ध्यान में रखनी हैं।

फिर, इसलिए कि यह शिक्षा हमारे बीच केवल आदर के योग्य ही न ठहरे, वरन् हमें प्रिय भी लगे, आइए, ध्यान दें कि सन्त पौलुस मसीह के नाम से बोलता है, जो हमारे पास उसके पिता परमेश्वर की ओर से शान्ति का शुभ समाचार देने के लिए भेजा गया था। और यह भी स्मरण रखें कि वह एक और स्थान पर कैसे कहता है कि वह मेल-मिलाप का सन्देश सुनाने के लिए ठहराया गया था, और परमेश्वर के नाम से मनुष्यों से विनती करता है कि वे परमेश्वर से मेल-मिलाप कर लें [2 कुरिन्थियों 5:20]। अब मैंने तुमसे कहा कि यह इसलिए किया गया कि सुसमाचार की शिक्षा मधुर लगे, ताकि हम उसकी अभिलाषा करें और अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप दें। क्योंकि जब कभी हमें बताया जाता है कि परमेश्वर हमसे बोलता है, तो निश्चय यह उसकी हर बात को अधिकार देने के लिए पर्याप्त है। फिर भी हम उसकी वाणी से काँप सकते हैं और साथ ही उससे व्याकुल हो सकते हैं, जैसा हम देखते हैं कि बहुत से लोग भली-भाँति मानते हैं कि परमेश्वर इस योग्य है कि उसकी आज्ञा मानी जाए और सब मनुष्य उसके अधीन हों, परन्तु इस बीच वे उससे मुँह फेर लेते हैं और जहाँ तक हो सके उससे कतराते हैं, क्योंकि उसकी वाणी उन्हें डराती है।

परन्तु जब यीशु मसीह हमसे परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ के रूप में बोलता है, तो हम निडर होकर उसके पास जा सकते हैं, क्योंकि (जैसा इब्रानियों की पत्री में कहा गया है) हम अब मानो सीनै पर्वत पर नहीं हैं, जहाँ व्यवस्था सुनाए जाने के समय आकाश में बिजलियाँ चमकती थीं, यहाँ तक कि यदि कोई पशु उसके निकट आता तो उसे मरना पड़ता। उस समय परमेश्वर ने जो वाणी सुनाई वह भयानक थी [इब्रानियों 12:18—20; निर्गमन 19:12]। परन्तु आजकल, जब वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें उभारता है कि जो अनुग्रह वह हमें देता है उसे ग्रहण करें, और हमारे पापों की स्मृति मिटा देना चाहता है, तो आइए, हम अपने आप को उसके सेंतमेंत अनुग्रह से धर्मी ठहराए जाने दें, और उसके प्रति शान्त और आज्ञाकारी बनें। क्योंकि सचमुच यह हमें इस बात के लिए प्रेरित करे कि हम भूखे दीन प्राणियों के समान उसके पास आएँ कि वह जो स्वर्गीय भोजन हमें देगा उससे हम तृप्त किए जाएँ। इस प्रकार हम वास्तव में देखते हैं कि जब सन्त पौलुस अपने आप को यीशु मसीह का प्रेरित कहता है तो हमें क्या स्मरण रखना है।

पौलुस आगे कहता है कि वह परमेश्वर की इच्छा से प्रेरित है। यह इसलिए है कि इस बात को सन्देह से परे रखा जाए, ताकि लोग उस पर दुस्साहस का दोष न लगाएँ, मानो वह अपने आप को दूसरों से अधिक प्रतिष्ठित समझता हो। वह घोषणा करता है कि यह उसकी अपनी किसी योग्यता के कारण नहीं, वरन् इसलिए था कि परमेश्वर को यह भाया कि उसे उस पद के लिए चुने। और निश्चय यह कोई दिखावटी दीनता नहीं है जब वह कहता है कि वह उस स्थान पर परमेश्वर के केवल अनुग्रह और चुनाव से रखा गया [1 कुरिन्थियों 15:9; 1 तीमुथियुस 1:13—16]। क्योंकि हम देखते हैं कि दूसरे स्थानों में वह कैसे मानता है कि वह ऐसे आदर के योग्य नहीं, वरन् पूरे दण्ड के योग्य था, और इसलिए परमेश्वर की असीम भलाई का दर्पण समझा जाना चाहिए, क्योंकि उसने उसे इतना ऊँचा उठाया, उसे जो मसीहियों का हत्यारा था, जिसने शहीदों का लहू बहाया, और जिसने परमेश्वर और उसके वचन की निन्दा की, जैसा वह स्वयं बताता है।

तो हम देखते हैं कि उसके इस अंगीकार में कोई बनावट नहीं थी, जहाँ वह कहता है कि वह परमेश्वर की इच्छा से ही उस दशा और पद पर रखा गया। और यह अब भी बड़े काम की बात है, ताकि हम परमेश्वर के वचन को उन लोगों की योग्यता के अनुसार न आँकें जो उसे हमारे पास लाते हैं। क्योंकि परमेश्वर के वचन के प्रति आदर घटाने के लिए शैतान जो सामान्य चालें चलता है, उनमें से एक यह है कि वह उसे लानेवाले व्यक्तियों को हमारी आँखों के सामने रखे। अब निश्चय है कि हम निर्बल पात्र हैं और किसी मूल्य के नहीं, वरन् टूटे हुए बर्तनों से अधिक मोल के नहीं। उन लोगों में क्या है जिन्हें परमेश्वर ने अपने वचन के सेवक ठहराया है? परन्तु पात्रों की तुच्छता के होते हुए भी वह धन सब समयों में अनमोल है [2 कुरिन्थियों 4:7]।

तो ध्यान दें कि जब मनुष्य हमारे पापों की क्षमा और उस उद्धार की, जिसकी आशा हमें रखनी चाहिए, साक्षी देने आएँ, तब हमारा विश्वास और ऊपर उठे, और यह प्रश्न न उठाए कि ऐसा मनुष्य सुने जाने के योग्य है या नहीं, और न यह पूछे कि वह कैसा व्यक्ति है। हम इस विचार से सन्तुष्ट रहें कि परमेश्वर उस साधन से हमें अपनी ओर खींचना चाहता है। यही वह मार्ग है जिस पर हमें चलना है, और यदि हम इससे हट जाएँ तो शीघ्र ही भटक जाते हैं और विनाश के मार्ग पर होते हैं।

तो इसे भली-भाँति ध्यान में रखें कि हमें अपने आप को परमेश्वर की इच्छा और विधान के अधीन करना है और जो शिक्षा नश्वर मनुष्यों के मुखों से हमें सुनाई जाती है उसे बिना रोक-टोक के ग्रहण करना है। क्योंकि हमें वैसा बुद्धिमान नहीं होना है जैसे बहुत से लोग हैं, जो पूछते हैं कि क्या परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों को स्वर्ग से नहीं भेज सकता था कि वे प्रकाशनों के द्वारा हमें सिखाते; और न उन कुछ दखलन्दाज़ों के समान जो यह दिखावा करते हैं कि पवित्र आत्मा उनके इशारे पर है, [en leur manche (फ्रेंच) (अर्थात् उनकी आस्तीन में)], जिसके कारण वे उन वरदानों को ग्रहण करने से घृणा करते हैं जो परमेश्वर की ओर से बाँटे जाते हैं। ताकि हम शैतान के द्वारा इस रीति से मोहित न हों, आइए, ध्यान दें कि यहाँ कैसे कहा गया है कि परमेश्वर की इच्छा यही है कि सुसमाचार मनुष्यों के मुखों से सुनाया जाए, और वे मानो हमारे लिए साक्षी हैं। जो कोई अपने आप को इस विधान से छूट देता है, वह ऐसा करता है मानो परमेश्वर का हाथ पीछे हटा रहा हो जब वह उसे उसके उद्धार की निश्चित और अचूक साक्षी देता है। तो तुम देखते हो कि इस खण्ड से हमें अब भी किस बात पर ध्यान देना है।

फिर, जो लोग परमेश्वर का वचन सुनाने के लिए बुलाए गए हैं, उन्हें सन्त पौलुस के उदाहरण से चेतावनी लेनी चाहिए कि दीनता से चलें। क्योंकि यदि हम अपनी तुलना उससे करें तो हम क्या हैं? वह हमें दिखाता है कि वह किसी जन्मजात योग्यता या सामर्थ्य के कारण नहीं चुना गया, वरन् इसलिए कि परमेश्वर की यही इच्छा थी। इसलिए आइए, हम निश्चय रखें कि हमारे पास जो कुछ है वह परमेश्वर और उसके केवल अनुग्रह से है, और हम अपने आप को कुछ नहीं ठहरा सकते, जब तक कि हम उसका अधिकार छीनना न चाहें। और हम जानते हैं कि ऐसी कृतघ्नता सहने योग्य नहीं।

इसके बाद प्रेरित कहता है, 'इफिसुस में जो पवित्र लोग हैं और मसीह यीशु में विश्वासी हैं, उन सबके नाम।' यह सच है कि यहाँ नगर का नाम बताया गया है, फिर भी (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) यह शिक्षा हम सबके लिए सामान्य है, और परमेश्वर ने इसे आज के दिन हमारे उपयोग के लिए दिया है, और हमें इसे ऐसे ग्रहण करना चाहिए मानो सन्त पौलुस अब भी जीवित और हमारे बीच हो। हाँ, और हमें केवल उसी की ओर नहीं, वरन् उस व्यक्ति की ओर भी दृष्टि रखनी चाहिए जिसके द्वारा वह भेजा गया है। क्योंकि यद्यपि वह अपनी दौड़ पूरी करके मर गया, फिर भी परमेश्वर का आत्मा अमर है। जो भी हो, हमें अपनी शिक्षा के लिए यह बात स्मरण रखनी है जो सन्त पौलुस यहाँ कहता है जब वह मसीह यीशु में पवित्र और विश्वासी लोगों से बोलता है।

तो यद्यपि हम उस समय के नहीं हैं, और न एशिया के देश और लोगों में से हैं, फिर भी चूँकि परमेश्वर को यह भाया कि हमें उन लोगों के साथ जोड़े जिन्हें सन्त पौलुस ने अपने समय में लिखा, इसलिए आइए, हम निश्चय रखें कि हमारे लिए उचित है कि हम उस विश्वास में दृढ़ किए जाएँ जो हमने सुसमाचार के द्वारा पाया है, क्योंकि पवित्र आत्मा का अभिप्राय और उद्देश्य यह था कि उन सब को जिन्हें सुसमाचार की आरम्भिक बातें मिली हैं, और जो अब भी निर्बल हैं और अधिक दृढ़ पुष्टि की आवश्यकता में हैं, स्थिर बने रहने के लिए उभारे।

परन्तु आइए, इन शब्दों को भली-भाँति मन में रखें जहाँ कहा गया है, 'यीशु मसीह में पवित्र और विश्वासी लोग।' क्योंकि सन्त पौलुस दिखाता है कि मनुष्यों की सारी पवित्रता दिखावे के सिवा और कुछ नहीं, जब तक परमेश्वर उन्हें अपनी सेवा में न ले आए और विश्वास के द्वारा उसके लिए समर्पित और अलग न कर दे। क्योंकि हम सब स्वभाव से अशुद्ध हैं, और हम से संक्रमण के सिवा और कुछ नहीं निकल सकता। यह सच है कि यदि मनुष्य बाहर से कोई सुन्दर दिखावा और रूप धारण कर लें, तो वे जितने हो सकें उतने धर्मी गिने जाएँगे, और उनके गुणों की प्रशंसा हर कहीं होगी, जैसे हम देखते हैं कि कोई मनुष्य यदि कुछ अच्छे गुण रखता हो तो बड़ी सिद्धता की ख्याति पा सकता है। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है कि परमेश्वर विश्वास के द्वारा मनुष्यों के हृदय शुद्ध करता है [15:9]। और ऐसा करने का उसके पास बड़ा कारण था, क्योंकि (जैसा यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता कहता है) मनुष्य का हृदय भयानक गड़बड़ी का गड्ढा है [17:9]। हम स्वयं इसे नहीं जानते, परन्तु परमेश्वर की आँखें मुझसे अधिक स्पष्ट हैं। जो भी हो, आइए, इस बात का निश्चय रखें कि वह सारी पवित्रता जो मनुष्य अपने पास होने की कल्पना करते हैं, परमेश्वर के सामने भ्रष्टता और घृणित है, जब तक कि वे सुसमाचार के विश्वास के द्वारा एक न किए जाएँ। इसलिए इसे एक स्थिर बात जानकर याद रखें कि परमेश्वर के हाथ से विश्वासियों की पवित्रता के सिवा और कोई पवित्रता स्वीकार और मान्य नहीं की जाती। क्योंकि जब तक हम पहले मसीही न बनें, हम अन्धे हैं और परमेश्वर को उसका हक़ कभी नहीं दे सकते।

यदि इसके सिवा और कोई अपवित्र कर्म न होता, तो क्या यही उन सब गुणों को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त न होता जो हमारे पास और हो सकते थे? फिर, चूँकि सिद्धता का आत्मा, परमेश्वर के भय का आत्मा, धार्मिकता का आत्मा और पवित्रता का आत्मा यीशु मसीह में बसे और ठहरे हैं, इसलिए निश्चय है कि वे सब जो उससे अलग हैं, उनमें चाहे संसार उनकी कितनी ही सराहना करे, दुर्गुण और हर प्रकार की अशुद्धता के सिवा और कुछ नहीं है।

दूसरी ओर, आइए, यह भी ध्यान दें कि वे सब जो सुसमाचार में विश्वास रखने का घमण्ड करते हैं, और परमेश्वर के द्वारा पवित्र नहीं किए गए हैं, वे अपने ही कपट और झूठ को प्रगट करते हैं, और अपने ही जीवन से अपने आप को झुठलाते हैं, चाहे वे जो कुछ गाएँ या कहें, जैसे हम आजकल बहुतों को देखते हैं जो विश्वास के इस नाम को, जो पवित्र होना चाहिए, अशुद्ध और अपवित्र करते हैं। क्योंकि हर मनुष्य कहेगा कि वह विश्वासी है, और जिनमें सबसे कम विश्वास है वे ही सबसे निडर होकर कहते हैं कि विश्वास केवल उन्हीं में है। और परमेश्वर करे कि यह केवल आधा ही सच होता! परन्तु हम देखते हैं कि मसीही नाम धारण करनेवाले सब लोगों में भी उनका सारा जीवन अव्यवस्थित और ढीला है, यहाँ तक कि वे परमेश्वर का पूरा उपहास करते हैं और सारे धर्म को तुच्छ जानते हैं, और फिर भी इस बीच सोचते हैं (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि यदि उन्हें भले और कैथोलिक मसीही न माना जाए तो उनके साथ बड़ा अन्याय होगा।

फिर भी इस सब के होते हुए हम देखते हैं कि सन्त पौलुस इन दोनों बातों को कैसे एक अटूट बन्धन में बाँधता है, अर्थात् यह कि यदि हमारे पास सुसमाचार का विश्वास है, तो इसके परिणामस्वरूप हमें अपने आप को पूरी तरह अपने परमेश्वर को सौंप देना और संसार की भ्रष्टताओं से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए, जैसा हमने देखा कि गलातियों की पत्री में [1:4; 4:5—7] वह कहता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का जगत में आना इसलिए है कि हम उसके लहू से पवित्र किए जाएँ, ताकि आगे को पूरी शुद्धता से परमेश्वर पिता की आज्ञा मानें। और जैसा वह एक और स्थान में कहता है [1 थिस्सलुनीकियों 4:7] हम अशुद्धता के लिए नहीं, वरन् धार्मिकता के लिए बुलाए गए हैं, ताकि परमेश्वर का नाम हमारे द्वारा आदरित और महिमान्वित हो।

तो तुम देखते हो कि इस भूमिका से हमें क्या स्मरण रखना है, ताकि हम इस पत्री में निहित शिक्षा को ग्रहण करने के लिए और अच्छी तरह तैयार हों, और वह हमारे बीच वैसा ही अधिकार रखे जैसा उसे मिलना चाहिए, और इसके अतिरिक्त हमें प्रिय भी लगे, ताकि हम समझें कि पौलुस के हाथ से सीखना हमारे विशेष लाभ के लिए है। क्योंकि प्रेरित हमारे सामने हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह की साक्षी देता है और हमें परमेश्वर के पास ले जाता है कि हम उससे मेल-मिलाप करें, जबकि हम स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं। और इसके अतिरिक्त वह दिखाता है कि हम परमेश्वर की कृपा में कैसे ठहर सकते हैं, ताकि हम निडर होकर उसे अपना पिता कहकर पुकारें और निश्चय रखें कि वह भी हमें अपनी सन्तान गिनता है।

इसके बाद पौलुस धन्यवाद के द्वारा सब मनुष्यों के हृदयों को उठाता है कि वे जानें कि वे परमेश्वर के कितने ऋणी और बँधे हुए हैं, विशेषकर यह देखते हुए कि वह उनके प्रति इतना उदार रहा है कि उसने सब प्रकार से अपने आप को उन्हें दे दिया है। 'धन्य है (वह कहता है) हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता, जिसने हमें मसीह में स्वर्गीय बातों में (या स्वर्गीय स्थानों में) हर प्रकार की आत्मिक आशीष दी है।' चूँकि वह प्रमुख बलिदान जो परमेश्वर मनुष्यों के हाथ से माँगता है यह है कि वे उसके उपकारों को मानें और उनके लिए उसके कृतज्ञ हों, इसलिए सन्त पौलुस सबसे पहले यह विचार करता है कि यही बात उन्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए कैसे उभारे, क्योंकि हम इतने सुस्त हैं कि इसे देखकर भय लगता है। हम भली-भाँति मान सकते हैं कि हमारा प्रमुख अध्ययन और प्रयत्न एक सुव्यवस्थित जीवन बिताना होना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर की स्तुति करना। क्योंकि यदि कोई हमसे पूछे कि हम इस संसार में क्यों पाए जाते हैं, परमेश्वर को हमारी ऐसी चिन्ता क्यों है, उसकी भलाई हमें क्यों खिलाती और पालती है, और अन्त में वह मानो हमें अपने दिए हुए उपकारों की बहुतायत से चकाचौंध क्यों कर देता है, तो इसलिए कि हम उसके प्रति कुछ कृतज्ञता प्रगट करें। क्योंकि (जैसा भजन में कहा गया है) हम अपनी ओर से उसे कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकते, और न वह बदले में हमसे धन्यवाद के सिवा और कुछ चाहता है, जैसा भजन संहिता 116 में कहा गया है, 'यहोवा के सारे उपकारों का मैं उसे क्या प्रतिफल दूँ? मैं उद्धार का कटोरा उठाकर यहोवा से प्रार्थना करूँगा।

तो तुम देखते हो कि जो कुछ हम परमेश्वर के पास ला सकते हैं वह इसके सिवा और कुछ नहीं कि हम सब बातों के लिए अपने आप को उसका ऋणी मानें। और फिर भी, इस सब के होते हुए, इस विषय में कोई मनुष्य अपना कर्तव्य पूरा नहीं करता, उसका सौवाँ अंश भी नहीं, वरन् हम सब, बड़े से छोटे तक, उसे उसके इस हक़ से वंचित करते हैं, क्योंकि हम अपनी नीचता से उसकी वह स्तुति दबाने से नहीं रुकते जो हमारे मुखों में गूँजनी चाहिए। इसी कारण हमारा प्रभु हमारी लापरवाही पर हमें डाँटता है, क्योंकि जब पवित्र शास्त्र हमें परमेश्वर की स्तुति करने के लिए उभारता है और इस उद्देश्य से बहुत शब्द प्रयोग करता है, तो हम यह न सोचें कि वे अनावश्यक हैं, वरन् उन्हें हमारे द्वेष और दुष्टता की उतनी ही फटकारें मानें कि हम उस बात में चूकते हैं जो इतनी आवश्यक है और (जैसा तुम कहोगे) जीवन की प्रमुख बात है।

यह सच है कि पवित्र आत्मा प्रायः परमेश्वर के नाम की बड़ाई करने के और कारण भी बताता है, जैसे (उदाहरण के लिए) प्रकृति की व्यवस्था, वे फल जो पृथ्वी देती है, वह सहायता और मदद जो परमेश्वर हमें देता है, और ऐसी ही अन्य बातें। और परमेश्वर की स्तुति करने के लिए ये पर्याप्त विषय हैं। परन्तु सन्त पौलुस हमें यहाँ और ऊँचे ले जाता है, और चाहता है कि हम सब बातों से बढ़कर परमेश्वर की महिमा करें। वह इतना ही मान लेना पर्याप्त नहीं समझता कि परमेश्वर ने हमें संसार में रखा है और यहाँ हमारा पालन-पोषण करता है, और इस क्षणभंगुर जीवन के बीतने के दिनों में सब आवश्यक वस्तुएँ देता है, वरन् वह यह भी कहता है कि परमेश्वर ने हमें अपने राज्य और स्वर्गीय जीवन का उत्तराधिकारी होने के लिए चुना है।

तो हम परमेश्वर के प्रति दोहरे बँधे हैं, और अज्ञानी और अविश्वासी अभागों की अपेक्षा कहीं अधिक निकटता से। क्योंकि यद्यपि वे पहले ही पर्याप्त ऋणी हैं, फिर भी जो भलाई उसने हमारे साथ यीशु मसीह में की है वह तुलना से परे कहीं अधिक उत्कृष्ट और श्रेष्ठ है, क्योंकि उसने हमें अपनी सन्तान होने के लिए गोद लिया है। यह सच है कि चूँकि हम मनुष्य हैं, इसलिए हम उसके उन प्राणियों में से हैं जिन्हें उसने अपने ही स्वरूप में रचा। परन्तु इससे क्या? यह स्वरूप हम में पाप से और उस भ्रष्टता से बिगड़ गया है जिससे हम आदम की अवज्ञा के कारण दूषित हुए हैं। और अब उसके क्रोध और अनन्त मृत्यु के सिवा हमारा और कौन सा उत्तराधिकार है?

संक्षेप में, यदि हम उसी दशा में बने रहें जो हमारी स्वभाव से है, तो हम पशुओं की गिनती में भी गिने जाने के योग्य नहीं। अब जब परमेश्वर हमें अपने एकलौते पुत्र के अंग बनाता है, और हमें स्वर्गदूतों के बीच गिनता है, और हमें अपने ही स्वभाव और महिमा के भागी होने के लिए तैयार करता है (जैसा सन्त पतरस अपनी पहली पत्री में, 1:12 में कहता है), तो क्या हमें उसमें ऐसा ऊँचा और श्रेष्ठ अनुग्रह नहीं दिखना चाहिए जो हमें पूरी तरह मोहित कर ले?

तो तुम देखते हो कि जो बातें सन्त पौलुस इस पाठ में कहना चाहता था, उनमें पहली यह है कि हमें यहाँ उभारा गया है कि हम पूरे मन से परमेश्वर की स्तुति के कार्य में लगें, इसलिए कि इस विषय में हम बहुत ठण्डे और उदासीन हैं, यदि हमें उसके लिए धकेला और विवश न किया जाए। इसके अतिरिक्त सन्त पौलुस का एक और अभिप्राय भी था, अर्थात् यह कि हमें उस अनुग्रह से जो हमें सुसमाचार के द्वारा मिला है इस प्रकार तृप्त करे कि हम अपनी रीति के अनुसार अब यह और वह वस्तु न चाहें। हम देखते हैं कि हम स्वभाव से कितने चंचल हैं, और जब परमेश्वर इतना भला है कि अपना वचन हमारे सामने रखता है, तो हम उसके सिवा कुछ और वस्तुएँ भी पाने पर अड़ जाते हैं, और कोई वस्तु हमें सन्तुष्ट नहीं कर सकती। और क्यों नहीं? क्योंकि हम मन्दबुद्धि हैं और परमेश्वर अपने वचन के द्वारा जो हमें दिखाता है उसे हमने कभी न तो समझा और न जाना [इफिसियों 3:18]। क्योंकि हम आगे देखेंगे कि जो उस प्रेम को जानते हैं जो परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह में हम पर दिखाता है, उनके पास वह सब कुछ है जो वे चाह सकते हैं, ऊँचा और नीचा, दूर और चौड़ा। साथ ही सन्त पौलुस अब हमें परमेश्वर को धन्य कहने के लिए इस उद्देश्य से बुलाता है कि हमें उस शिक्षा में बनाए रखे जिसमें सारे सुख की परिपूर्णता है, कम से कम यदि हम उसे अपने लाभ के लिए प्रयोग करना जानें।

फिर, आइए, यह भी ध्यान दें कि वह 'आत्मिक आशीषों' की चर्चा बिना कारण नहीं करता। क्योंकि यद्यपि हम रोटी का एक टुकड़ा खा नहीं सकते या पानी की एक बूँद पी नहीं सकते, जब तक कि हम परमेश्वर के लुटेरे न ठहरें, यदि हम यह न मानें और न अंगीकार करें कि उसमें वह हमारे लिए सच्चा पिता सिद्ध होता है, फिर भी वे बातें जो इस देह और हमारे इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्ध रखती हैं, उन बातों की तुलना में कुछ नहीं जो हमारे प्राणों के अनन्त कल्याण के काम आती हैं। और वास्तव में सन्त पौलुस का यहाँ हमें स्वर्गीय आशीषों के लिए परमेश्वर की स्तुति करने को उभारना ऐसी रीति से किया गया है कि साथ ही वह हमें यह समझा देता है कि यदि हम शरीर के विषय में दुःख पाएँ, और हमारी इच्छा के अनुसार सब कुछ न हो, और परमेश्वर हमारा भोजन घटा दे और हमारे साथ उतनी कोमलता से व्यवहार न करे जितनी हम चाह सकते हैं, तो हमें धीरज रखना चाहिए।

इसलिए यहाँ दो बातें निहित हैं। एक यह कि हम जानना सीखें कि हमारा सच्चा और सिद्ध सुख किसमें है, अर्थात् उस जीवन में जिसकी हम आशा रखते हैं और जो अभी हम से छिपा है, ताकि हम संसार से बँधे न रहें। इसे एक बात के रूप में ध्यान रखें। दूसरी यह कि यदि यह संसार हमें ठुकराए और तुच्छ जाने, और हमें हँसी का पात्र बनाए, तो हमें धीरज से अपने आप को स्थिर करना चाहिए; और जब परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले ठाठ-बाट और दिखावे के साथ अपनी बड़ाई करें और उनकी तुलना में हम अभागे प्रतीत हों, यहाँ तक कि हम में से कुछ भूख और प्यास सहें, और कुछ व्याकुल हों और अन्याय से सताए जाएँ, तो हमें और आगे देखना चाहिए। और क्यों? इसी कारण कि हमें उन स्वर्गीय आशीषों से सन्तुष्ट रहना चाहिए जो परमेश्वर ने हमें दी हैं। तब यह इतनी बड़ी, इतनी ऊँची और इतनी अनमोल आशीष हमें उन सब बाधाओं की ओर से आँख मूँद लेने पर विवश करे जिनकी हम कल्पना कर सकते हैं, जब कभी परमेश्वर इस संसार में अनेक क्लेशों के द्वारा हमें परखता और जाँचता है, और चाहता है कि हम अभाव और अनेक वस्तुओं की कमी जानें। यही उन बातों का सार है जो हमें इस खण्ड से ध्यान में रखनी हैं।

अब शेष पर आने से पहले, आइए, ध्यान दें कि 'आशीष' शब्द भिन्न-भिन्न अर्थों में लिया जाता है जब सन्त पौलुस इसे परमेश्वर पर या अपने ऊपर लागू करता है। कहा गया है कि हम परमेश्वर को धन्य कहते हैं। और कैसे? जैसे वह हमें आशीष देता है। वह हमें किस रीति से आशीष देता है? हम उसे उस रीति से आशीष नहीं देते जैसे वह हमें आशीष देता है। हम उससे बहुत पीछे रह जाते हैं। क्योंकि (जैसा मैं सोलहवें भजन से पहले दिखा चुका हूँ) हमारी सारी सेवाएँ उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकतीं। फिर, हमें यह निष्कर्ष निकालना है (जैसा मैं एक सौ सोलहवें भजन से भी दिखा चुका हूँ) कि जो कुछ हम परमेश्वर के पास ला सकते हैं वह इस स्वीकारोक्ति के सिवा और कुछ नहीं कि जितनी भली वस्तुएँ हमारे पास हैं उन सब के लिए हम उसके ऋणी हैं। तो तुम देखते हो कि हमारी सारी आशीष केवल यह है कि हम परमेश्वर को स्तुति का बलिदान चढ़ाएँ। यह एक बात रहे।

परन्तु अब, जब परमेश्वर हमें आशीष देता है, तो क्या केवल शब्दों में? नहीं! नहीं! वरन् यह हमें तृप्त करना और जितनी वस्तुओं की हमें घटी है, जहाँ तक आवश्यक है, वे सब हमें प्रदान करना है। और यह 'आशीष' शब्द उसके लिए क्यों कहा जाता है? इसलिए कि उसे अपने सेवकों की सहायता करने और उन्हें वह देने के लिए, जो वह जानता है कि उनके लिए हितकर है, परिश्रम करने और बड़ा कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं। यदि वह केवल वचन कह दे, अर्थात् यदि वह केवल अपनी इच्छा प्रगट करे, तो काम हो जाता है।

तो चूँकि परमेश्वर ने जगत को केवल अपने वचन से रचा, इसलिए केवल आज्ञा देकर भी हमारा भला करने की सामर्थ्य उसमें है, इसी कारण कहा गया है कि हम केवल उसकी आशीष से धनी होते हैं, अर्थात् इससे कि वह हमारे प्रति प्रेममय और कृपालु ठहरता है। अब देखें कि क्या हम क्षमा के योग्य ठहरेंगे, जब हम परमेश्वर को उसका हक़ देने से वंचित करते हैं, और उसके हाथ से इतने उपकार पाने के बाद यह मानने के लिए कि हम उसके कितने बँधे और ऋणी हैं, अपने होंठ खोलना भी तुच्छ समझते हैं। संसार के सब मनुष्य परमेश्वर को जितनी आशीषें दे सकते हैं वे सब उस आशीष के विरुद्ध तराजू में रखी जाएँ जिससे वह उन्हें धनी करता है; तो किसका मोल अधिक है? वे जो कुछ आगे रख सकते हैं वह इतना ही है कि उन्हें मानना आवश्यक है कि वे न तो कुछ कह सकते हैं और न कुछ कर सकते हैं जो किसी मूल्य का हो, जबकि साथ ही परमेश्वर हमें दिखाता है कि हमारे सुख के लिए जो कुछ आवश्यक है वह सब उसके पास है। इसलिए सन्त पौलुस का यहाँ यह कहना बिना कारण नहीं कि विश्वासियों को चाहिए कि परमेश्वर के नाम को धन्य कहने में अपने मन और प्रयत्न पूरी तरह लगा दें, क्योंकि वह उन्हें इतना बड़ा कारण देता है; नहीं तो वे कृतघ्न और रूखे ठहरेंगे। इसलिए वह दो बातें कहता है, 'हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता, जिसने हमें मसीह में आशीष दी है।'

जब वह कहता है 'हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता', तो इसे इस प्रकार समझाना चाहिए कि वह परमेश्वर जिसे हम अपने प्रति इतना कृपालु अनुभव करते हैं, हमारे प्रभु मसीह का पिता है। यह परिस्थिति भली-भाँति ध्यान देने के योग्य है। क्योंकि इससे सन्त पौलुस हमें समझाता है कि परमेश्वर के उपकार, विशेषकर वे जो स्वर्गीय जीवन और हमारे प्राणों के अनन्त उद्धार से सम्बन्ध रखते हैं, हम तक नहीं आ सकते, जब तक यीशु मसीह मानो उनकी नाली न हो, ताकि हम उसके नाम के कारण उनके भागी बनें। इसलिए आइए, भली-भाँति ध्यान दें कि जब तक यीशु मसीह हमारा मार्ग न बने, हम परमेश्वर के सब उपकारों से और उन सब बातों से जो हमारे प्राणों के उद्धार से सम्बन्ध रखती हैं, बाहर रखे गए हैं।

यह सच है कि अविश्वासी खाते-पीते हैं और छककर तृप्त होते हैं, और सूर्य उन पर चमकता है। परन्तु जो भी हो, ठीक कहें तो वे उन सब वस्तुओं का आनन्द नहीं उठाते जो परमेश्वर उन्हें देता है, क्योंकि वे बिना किसी वैध अधिकार के उन पर हथिया लेते हैं। क्योंकि जगत परमेश्वर की सन्तान के लिए रचा गया, और उनके सिर के सम्बन्ध में भी, जो हमारा प्रभु यीशु मसीह है। संक्षेप में, सन्त पौलुस का यह कहना बिना कारण नहीं, जब वह दिखाता है कि परमेश्वर ने अपने आप को हमें कैसे दिया है, कि यह इसलिए है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है। परन्तु (जैसा मैं तुमसे कह चुका हूँ) यह खाने-पीने की बात नहीं, वरन् कहीं अधिक बड़ी और अनमोल बातों की है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिए गोद लिया है। और इस प्रकार तुम वास्तव में देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है।

तो भी, ताकि हम इस खण्ड से अच्छी तरह लाभ उठा सकें, आइए, ध्यान दें कि हमें अपने आप को रोके रखना है कि कहीं हम अनेक अटकलों में न भटक जाएँ, जब हम परमेश्वर को, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता को, जानते हैं। और क्यों? पोपवादी लोग 'परमेश्वर' शब्द को तो प्रायः अपने मुँह में रखते हैं, और 'यीशु मसीह' शब्द को भी, परन्तु साथ ही उन्होंने यीशु मसीह को बिगाड़ दिया है और उसके सुसमाचार की शिक्षा को, जिसमें वह देखा जाना चाहिए, पूरी तरह झूठा कर दिया है। इसलिए उनके पास एक परमेश्वर है, चाहे केवल उलझी हुई कल्पनाओं में ही, और फिर भी वे उसे नहीं जानते। और सचमुच, वे यह बता नहीं सकते कि वे किस परमेश्वर की सेवा और आराधना करते हैं, तुर्कों से कुछ अधिक नहीं। हम जानते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह (यूहन्ना के चौथे अध्याय में) कहता है कि जिनके पास वह शिक्षा नहीं जिससे वे अपने आप को भली-भाँति चला सकें, वे नहीं जानते कि किसकी आराधना करते हैं, वरन् निरन्तर अपने लिए मूरतें गढ़ते रहते हैं। इसलिए परमेश्वर तक भली और अचूक पहुँच पाने का एक ही मार्ग है, और वह यह कि उसे उसके जीवित स्वरूप में देखें, क्योंकि उसकी महिमा हमारे लिए बहुत ऊँची, बहुत गुप्त और बहुत गहरी है। परन्तु यीशु मसीह ने अपने आप को हम पर प्रगट किया, और हमारी निर्बलता के अनुसार अपने आप को ढाला, और जो कुछ जानना आवश्यक था वह हमें सिखाया, ताकि हम उसके पिता परमेश्वर के पास आ सकें।

तो तुम देखते हो कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को अपना मार्ग बनाना है, ताकि हम भटक न जाएँ। क्योंकि चूँकि परमेश्वर हमारे सिर का और उसका पिता है जो हमारे साथ एक किया गया है, इसलिए तुम देखते हो कि उसके पास स्वतन्त्रता से आने की पहुँच हमें कैसे मिल सकती है। और निश्चय उस मध्यस्थ के बिना हम उससे पूरी तरह बाहर रखे गए हैं, और परमेश्वर की महिमा हमारे सिर के बाल खड़े कर देने को बाध्य है। परन्तु जब हम विचार करते हैं कि वह उसका पिता कहलाता है जो हमारा सिर है, तो जान लें कि वह भी हमें अपनी सन्तान मानने को बाध्य है, क्योंकि उसने हमें छुड़ा लिया है।

फिर, यद्यपि सन्त पौलुस यहाँ एक ही शब्द में बता देता है कि हमारी आत्मिक आशीषें क्या हैं, फिर भी वह दिखाता है कि परमेश्वर हमारे प्रति एक से अधिक रीति से उदार ठहरा है। और इसकी वह आगे अधिक विस्तार से व्याख्या करेगा, उन उपकारों को विशेष रूप से रखकर जो हम सुसमाचार के द्वारा पाते हैं, क्योंकि यह सारा अध्याय उनसे भरा है। परन्तु जो भी हो, यहाँ वह हमें समझाता है कि परमेश्वर का हमें अपने अनुग्रह के दान देना कंजूसी से नहीं है, और उनका हमें चखाना उँगली चटाने के रूप में नहीं किया गया है, [faire goutée à leche doigt (फ्रेंच)] जैसा वे कहते हैं। परन्तु वह दिखाता है कि परमेश्वर ने उन्हें हमें ऐसी विविधता और भरपूरी से दिया है कि हमारे पास हर रीति से उसकी बड़ाई करने का कारण है। इसलिए आइए, समझें कि चूँकि यीशु मसीह हमें ऐसे दिया गया है, इसलिए उसमें हमें वह सब मिलता है जो हमारे उद्धार और हमारे सुख के लिए आवश्यक है, जैसा सन्त पौलुस रोमियों की पत्री के आठवें अध्याय में इसके विषय में कहता है। क्योंकि यदि एकलौता पुत्र हमें दिया गया है, तो वे सब उपकार जो उसके पास हैं, उसके साथ और उसके द्वारा हमें क्यों न दिए जाएँगे?

परन्तु जो भी हो, आइए, परमेश्वर के आत्मिक दानों को इस प्रकार चखना सीखें कि हमारी सारी मानसिक शक्तियाँ उनकी कद्र करने में लग जाएँ। और यह हो सके, इसके लिए आइए, इससे सावधान रहें कि हमारा मन संसार से अत्यधिक जुड़ा न हो। क्योंकि वही कारण जो हमें दूर खींचता है, और हमें उस भलाई का सौवाँ अंश भी देखने से और परमेश्वर के उपकारों को अपने लाभ के लिए प्रयोग करने से रोकता है, वह हमारा अपना घमण्ड है, क्योंकि हम में से हर एक अपनी ही मूर्ख और उच्छृंखल अभिलाषाओं से अपने आप को धोखा देता है। इसलिए आइए, उन बातों को झटक देना सीखें जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आने से रोकती हैं। और यद्यपि हमारा बुरा स्वभाव हमें इस संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं को ढूँढ़ने के लिए उकसाता है, फिर भी आइए, उनसे हटने का यत्न करें, ताकि हम मुक्त हृदय से अपने आप को परमेश्वर को सौंपें और उसकी आज्ञा मानने और अपने आप को पूरी तरह उसे देने के लिए उत्सुक मन रखें, क्योंकि उसकी इच्छा यही है कि हम उसके साथ जुड़े रहें।

सन्त पौलुस में हमें यही बात ध्यान देनी है कि जब वह आत्मिक आशीषों की चर्चा कर चुका, तो तुरन्त जोड़ता है, 'स्वर्गीय स्थानों में (या बातों में)', जिससे उसका अभिप्राय यह दिखाना था कि हम उन अनुग्रह के दानों को ग्रहण नहीं कर सकते जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिए जाते हैं, और जिन्हें परमेश्वर चाहता है कि हम पाएँ, जब तक हम यह न जान लें कि इस संसार में कुछ भी ऐसा नहीं जो हमें रोक रखे। इसलिए जब हम एक बार जान लें कि हम इस संसार में सदा बसने के लिए नहीं रचे गए, वरन् इसमें केवल यात्री बनकर रहना है, और हमारा स्थायी उत्तराधिकार और विश्राम ऊपर स्वर्ग में है, तो आइए, तब वहाँ का मार्ग लें, और उसकी ओर अधिकाधिक बढ़ें। और यद्यपि हम निर्बल हैं, फिर भी हम हियाव न छोड़ें, वरन् अच्छा साहस बाँधें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह उसे हमें दे। इसके अतिरिक्त तुम देखते हो कि सन्त पौलुस 'आशीषों' शब्द को इसलिए रखता है कि हम जानें कि जबकि शैतान हमें बहकाने और मार्ग से हटाने के लिए अनेक फंदे बिछाता है, परमेश्वर ने उस सब के लिए प्रबन्ध कर रखा है, क्योंकि उसके पास आशीषों का ऐसा भण्डार है कि वह उस सब को जो कभी हमारे उद्धार के विरुद्ध हो सकता है उलट और नष्ट कर सकता है।

परन्तु अब आइए, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिर पड़ें, अपने दोषों को मानते हुए, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनसे और अधिक परिचित कराए, ताकि हम सच्चे पश्चाताप तक पहुँचाए जाएँ। और आइए, अपने आप को दोषी ठहराएँ और अपने प्रभु यीशु मसीह में वह सब पाने का यत्न करें जिसकी हमें आवश्यकता है, और वह एक दिन के लिए, या केवल एक छोटे क्षण के लिए नहीं, वरन् निरन्तर और दृढ़ता से अपने जीवन के अन्त तक। और जो कुछ भी हम पर बीते, आइए, सदा निश्चय रखें कि हमारे पास अपने परमेश्वर की स्तुति करने का अच्छा कारण है, और यह कि यदि हम इस संसार में दीन और दुःखी भी हों, तो स्वर्ग का सुख हमें शान्त करने, हमारे सब क्लेशों और दुःखों को मधुर बनाने, और हमें ऐसा सन्तोष देने के लिए पर्याप्त है कि फिर भी हमारे मुँह परमेश्वर को धन्य कहने के लिए खुले रहें, कि उसने अपने आप को हमारे प्रति ऐसा दयालु और उदार दिखाया कि हमें अपनी सन्तान तक कर लिया, और हमें दिखाया कि वह उत्तराधिकार जो उसके एकलौते पुत्र के लहू से हमारे लिए मोल लिया गया है हमारे लिए तैयार है, और हम उसे चूक नहीं सकते, क्योंकि हम विश्वास की सच्ची और अजेय दृढ़ता के साथ उसकी ओर जा रहे हैं। उसे भाए कि यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् सब जातियों को भी दे।

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