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हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर तीसरा उपदेश - मत्ती 26:51-66
हमारे प्रभु यीशु मसीह के
और देखो, यीशु के साथियों में से एक ने हाथ बढ़ाकर अपनी तलवार खींची, और महायाजक के दास पर चलाकर उसका कान उड़ा दिया। तब यीशु ने उससे कहा, अपनी तलवार काठी में रख ले, क्योंकि जो तलवार चलाते हैं, वे सब तलवार से नाश किए जाएँगे। क्या तू नहीं समझता कि मैं अपने पिता से बिनती कर सकता हूँ, और वह स्वर्गदूतों की बारह पलटन से अधिक मेरे पास अभी उपस्थित कर देगा? परन्तु पवित्र शास्त्र की वे बातें कि ऐसा ही होना अवश्य है, कैसे पूरी होंगी? उसी घड़ी यीशु ने भीड़ से कहा, क्या तुम तलवारें और लाठियाँ लेकर मुझे डाकू के समान पकड़ने के लिये निकले हो? मैं हर दिन मन्दिर में बैठकर उपदेश दिया करता था, और तुम ने मुझे नहीं पकड़ा। परन्तु यह सब इसलिये हुआ कि भविष्यद्वक्ताओं के वचन पूरे हों। तब सब चेले उसे छोड़कर भाग गए। और जिन्होंने यीशु को पकड़ा था, वे उसे महायाजक कैफा के पास ले गए, जहाँ शास्त्री और पुरनिये इकट्ठे हुए थे। पतरस दूर से उसके पीछे-पीछे महायाजक के आँगन तक गया, और भीतर जाकर अन्त देखने को सेवकों के साथ बैठ गया। प्रधान याजक और पुरनिये और सारी महासभा यीशु को मार डालने के लिये उसके विरोध में झूठी गवाही की खोज में थे; परन्तु न पाई; यद्यपि बहुत से झूठे गवाह आए तौभी न पाई। अन्त में दो जन आए, और कहा, इसने कहा था कि मैं परमेश्वर के मन्दिर को ढा सकता हूँ और उसे तीन दिन में बना सकता हूँ। तब महायाजक ने खड़े होकर उससे कहा, क्या तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं? परन्तु यीशु चुप रहा। तब महायाजक ने उससे कहा, मैं तुझे जीवते परमेश्वर की शपथ देता हूँ कि हम से कह, तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है कि नहीं। यीशु ने उससे कहा, तू ने आप ही कह दिया; तौभी मैं तुम से कहता हूँ कि इसके बाद तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठे, और आकाश के बादलों पर आते देखोगे। तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा, इसने परमेश्वर की निन्दा की है; अब हमें गवाहों की और क्या आवश्यकता है? देखो, अभी तुम ने उसकी निन्दा सुनी है। तुम क्या समझते हो? उन्होंने उत्तर दिया, यह वध के योग्य है। - मत्ती 26:51-66।
यदि हम अपने स्वाभाविक ज्ञानेन्द्रियों के अनुसार हमारे प्रभु यीशु मसीह के पकड़े जाने का ऊपरी तौर पर न्याय करना चाहें, तो हमें इस बात से ठोकर लगेगी कि उसने कोई विरोध नहीं किया। यह उसकी महिमा के अनुकूल नहीं जान पड़ेगा कि उसने ऐसी लज्जा और अपमान को बिना रोके सह लिया। दूसरी ओर, हम पतरस के उत्साह की सराहना करेंगे, क्योंकि उसने अपने आप को मृत्यु के जोखिम में डाला। क्योंकि उसने शत्रुओं की बड़ी भीड़ देखी थी। वह अकेला था, और ऐसा मनुष्य था जो शस्त्र चलाने में निपुण नहीं था। तौभी वह अपने स्वामी के प्रति अपने प्रेम के कारण तलवार खींचता है, और यह स्वीकार करने के बजाय कि उसके साथ ऐसा अन्याय हो, रणभूमि में मर जाना अच्छा समझता है। परन्तु इससे हम देखते हैं कि हमें पूरी दीनता और नम्रता के साथ यह जानने के लिये आना चाहिए कि परमेश्वर के पुत्र ने जो कुछ किया और सहा, वह किस ओर ले जा रहा था; और यह कि जो हमें अच्छा लगता है उसका कोई मूल्य नहीं, परन्तु हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह अपने वचन के द्वारा हमें चलाए और मार्ग दिखाए, और हम केवल उसी के अनुसार निर्णय करें जो वह हम पर प्रगट करेगा। क्योंकि इसी रीति से सुसमाचार बहुतों के लिये ठोकर का कारण बन जाता है। कुछ लोग उसका उपहास करते हैं, और यह सब उनके विनाश के लिये होता है। कारण यह है कि वे अहंकार से फूले हुए हैं और उतावले न्यायी हैं। परन्तु धोखा न खाने के लिये हमें सबसे पहले सदा उसी की ओर लौटना चाहिए जो हमारा प्रभु यीशु घोषित करता है। यह उसके पिता परमेश्वर की इच्छा है। यह एक बात हुई। फिर हमें उसके अन्त पर विचार करना है जो हमें अजीब लग सकता है। जब हम इन दोनों बातों पर विचार कर लेंगे, तब परमेश्वर की आराधना करने और यह जानने का अवसर मिलेगा कि जो मनुष्यों के अनुसार मूर्खता जान पड़ता है, वह स्वर्गदूतों के लिये भी अद्भुत बुद्धि है।
परन्तु इस तक पहुँचने के लिये, आओ हम देखें कि यहाँ पतरस के विषय में क्या बताया गया है। कहा गया है, “उसने तलवार खींचकर कैफा के दास मलखुस का कान काट दिया।” यहाँ हम देखते हैं कि जब मनुष्य अपनी मूर्खतापूर्ण धारणा के पीछे चलते हैं, तब वे कितने दुःसाहसी हो जाते हैं। तब वे ऐसे अन्धे हो जाते हैं कि किसी भी दशा में अपने आप को नहीं बख्शते। परन्तु जब उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए, तब वे ऐसे कायर हो जाते हैं कि दया आती है। वे अपने आप को इस प्रकार भूल जाते हैं कि उन्हें डिगाने में कुछ भी नहीं लगता। इसी कारण हम में अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं के पीछे चलने के लिये सौ गुना अधिक साहस सदा रहेगा, बजाय इसके कि हम वह करें जिसकी आज्ञा परमेश्वर हमें देता है और वह करें जो हमारी बुलाहट का तकाज़ा है। पतरस के उदाहरण में हम इसे बहुत अधिक देखते हैं। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु के विषय में अंगीकार और गवाही देने के बाद, वह अपने विनाश के लिये निन्दा करता है। फिर भी वह मरने को तैयार है, तब भी जब उसे इसकी आज्ञा नहीं दी गई। उसे तलवार खींचने के लिये किस बात ने उभारा? वह मानो हठ में आकर ऐसा करता है। क्योंकि उसे अपने स्वामी से ऐसा कोई निर्देश नहीं मिला था। और जब वह यीशु मसीह का इन्कार करता है, तो क्या वह पहले से यह वचन नहीं जानता था, “जो कोई मनुष्यों के सामने मेरा इन्कार करेगा, उसका इन्कार मैं अपने स्वर्गीय पिता परमेश्वर के सामने करूँगा”? परन्तु (जैसा मैं कह चुका हूँ) वह उतावले स्वभाव का है। हमारे प्रभु यीशु को अपने ही ढंग से और अपनी ही इच्छा के अनुसार सम्भालने की यह मूर्खतापूर्ण लालसा उसे बहा ले जाती है। अब उसके उदाहरण से हम सीखें कि जहाँ परमेश्वर हमें बुलाता है वहाँ चलने का यत्न करें। जो कुछ वह हमें आज्ञा दे, उसमें से कुछ भी हमारे लिये अति कठिन न हो। परन्तु हम कुछ भी करने का प्रयास न करें, अपनी छोटी उँगली तक न हिलाएँ, जब तक परमेश्वर उसे स्वीकार न करे और हमारे पास इसकी गवाही न हो कि वही हमें चला रहा है। यह एक बात हुई।
वास्तव में, सबसे पहले हमारे प्रभु यीशु उसे दिखाते हैं कि उसने बहुत बड़ा अपराध किया है, क्योंकि वह उस व्यवस्था से अनजान नहीं था, जहाँ कहा गया है, “जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा, उसका लहू बहाया जाएगा।” सन्त पतरस को यह शिक्षा भली भाँति स्मरण रखनी चाहिए थी कि परमेश्वर नहीं चाहता कि बल या हिंसा का प्रयोग किया जाए। और (इससे बढ़कर) वह तीन वर्ष से अधिक समय तक किस पाठशाला में पाला गया था? क्या हमारे प्रभु यीशु ने जहाँ तक मानवीय रीति से सम्भव था, कोमलता और सौम्यता के साथ अपने आप को रोके नहीं रखा था? तो फिर वह अपने दुःसाहस के लिये स्वीकृति कहाँ से पाने की आशा रखता है? हमें आगे वह भी ध्यान में रखना चाहिए जो हम पहले कह चुके हैं। अर्थात्, यदि हमारे उत्साह की मनुष्यों में सराहना होती है और हमारी वाहवाही की जाती है, तो उतना ही हम परमेश्वर के सामने दोषी ठहरते रहेंगे, यदि हम उसके वचन का थोड़ा-सा भी उल्लंघन करें। इसलिये प्रशंसा तो केवल उसी में है कि हम उसी मार्ग पर चलें जो परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें दिखाता है। क्योंकि जैसे ही मनुष्य इस सीमा से आगे बढ़ता है, उसके सारे गुण केवल दुर्गन्ध देते हैं। हमारी सारी भक्ति का यही हाल है। जैसे ही हम ने वह करने का परिश्रम किया जो हम ने अपने मन में गढ़ा है, परमेश्वर सब कुछ दोषी ठहराएगा, जब तक कि हम ने उसका वचन न सुना हो। क्योंकि उससे अलग कोई ऐसा सत्य नहीं जिसे वह स्वीकार करे और जो उसके सामने वैध हो।
परन्तु जिस वृत्तान्त पर हम अभी विचार कर रहे हैं, उसके विषय में दूसरा कारण जो हमारे प्रभु यीशु बताते हैं, वह अधिक ध्यान देने योग्य है। जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं वह सामान्य बात है। परन्तु यहाँ एक वाक्य है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के लिये विशेष है, जब वह कहता है, “क्या तू नहीं समझता कि मैं अभी अपने पिता से बिनती कर सकता हूँ, और वह मेरे पास बारह पलटन से अधिक स्वर्गदूत भेज देगा?” अब उस समय एक पलटन में प्रायः चार या पाँच हज़ार पुरुष होते थे। “तो फिर मेरे पास स्वर्ग की सेना है जो मैं पा सकता हूँ,” वह कहता है, “फिर भी मैं उसके बिना रहता हूँ। तो फिर तुम यहाँ क्यों आए हो कि उससे अधिक हड़प लो जो परमेश्वर चाहता या होने देता है?” अब निश्चय ही परमेश्वर को पुकारना और उससे प्रार्थना करना उचित है कि वह हमारे प्राण को थामे रखना चाहे; और चूँकि वह उसे बहुमूल्य समझता है, इसलिये उसे अपनी सुरक्षा में रखे। हमारे प्रभु यीशु घोषणा करते हैं कि वह अब ऐसा नहीं चाहता और उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। तो फिर पतरस हिंसा का प्रयोग कैसे करेगा, जबकि वह उस व्यवस्था से बाहर है जिसकी परमेश्वर ने अनुमति दी और अपने वचन से स्थापित की है? यदि अपने आप में उचित साधन भी प्रयोग में नहीं आना चाहिए, तो उसे कैसे पहचानें जिसे परमेश्वर ने वर्जित किया है और जिसे उसने दण्ड के योग्य घोषित किया है? यहाँ (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हम देखते हैं कि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को ऐसी लज्जाओं के अधीन किया, और यह कि उसने अपने आप को कुकर्मी और अपराधी के समान बँधने और जकड़े जाने देना चुना, बजाय इसके कि वह चमत्कार से धोखेबाज़ ठहरे और परमेश्वर अपनी भुजा से उसकी रक्षा करे। इससे हमें पहचानना है कि उसने हमारे उद्धार को कितना मूल्यवान जाना। यहाँ एक बात है जो मैं पहले ही कह चुका हूँ: अर्थात् वह हमें अपने पिता परमेश्वर की इच्छा और आज्ञा की ओर संकेत करता है। क्योंकि उसके बिना यह अजीब लगता कि वह उसकी सहायता माँगना नहीं चाहता था, जबकि वह भली भाँति जान सकता था कि उसे वह मिल सकती थी। ऐसा लगता है कि जब वह उससे बिलकुल प्रार्थना नहीं करता, तब वह परमेश्वर की परीक्षा करता है। हमारे पास प्रतिज्ञा है कि स्वर्गदूत परमेश्वर का भय माननेवालों को घेरे रहेंगे, यहाँ तक कि उनके साथ-साथ चलेंगे कि वे स्वयं को हानि न पहुँचाएँ, और मार्ग में उन्हें कोई बुराई न मिले। अब जब परमेश्वर ने हमसे कुछ प्रतिज्ञा की है, तो वह चाहता है कि वह हमें प्रार्थना के लिये न्योता देनेवाली हो। फिर भी जब हम आवश्यकता में हों, तो हमें उसी की ओर दौड़ना चाहिए कि वह अपने स्वर्गदूतों को हमारी अगुवाई के लिये काम में लाए, जिसके लिये उसने उन्हें यह कार्य सौंपा है। हम यह भी देखते हैं कि पवित्र कुलपतियों और पूर्वजों में इसका अभ्यास था। “यहोवा का दूत, जिसने मुझे कभी निराश नहीं किया, तेरे साथ तेरे मार्ग में रहेगा और तुझे सफल करेगा,” अब्राहम ने कहा। इस प्रकार तब पवित्र पूर्वजों ने इसका प्रयोग किया। तो फिर यीशु मसीह ने स्वर्गदूतों को क्यों नहीं चाहा? क्योंकि वह पहले ही (जैसा सन्त लूका बताता है) शान्ति पा चुका था और स्वर्गदूतों ने उसकी सेवा की थी कि जिस वेदना में वह था उसे मधुर करें।
तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह परमेश्वर की ओर से मिलनेवाली एक आवश्यक सहायता को तुच्छ जानता है। परन्तु वह इसे ध्यान में रखता है जब वह यह जोड़ता है, “तो पवित्र शास्त्र की बातें कैसे पूरी होंगी?” मानो वह कहता है, “यदि हमें किसी बात में सन्देह हो, तो हम परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं, और हमें करनी भी चाहिए, कि वह हम पर दया की दृष्टि करे और किसी भी रीति से हमें अपनी सामर्थ्य का अनुभव कराए। परन्तु जब हमें निश्चय हो जाए कि उसे किसी आवश्यकता को अनदेखा करके आगे बढ़ना है, और परमेश्वर की इच्छा हम पर प्रगट हो चुकी है, तब उससे कोई और बिनती करने का प्रश्न ही नहीं रहता, सिवाय इसके कि वह हमें सामर्थ्य और अजेय धीरज में दृढ़ करे, कि हम कोई शिकायत न करें, या अपनी भावनाओं में बह न जाएँ; परन्तु हम तत्पर साहस के साथ उन सब बातों में से होकर चलें जिनके लिये वह हमें बुलाता है।” उदाहरण के लिये, यदि हम अपने शत्रुओं से सताए जाएँ, और हम न जानते हों कि परमेश्वर ने हमारे लिये क्या ठहराया है, या परिणाम क्या होना चाहिए, तो हमें उससे प्रार्थना करनी है मानो हमारा जीवन उसके लिये बहुमूल्य है और चूँकि वह उसे अपनी रक्षा में रखता है, वह परिणाम के द्वारा यह प्रमाणित करे और हमें छुड़ाए। परन्तु जब हमें विश्वास हो जाए कि परमेश्वर हमें अपने पास बुलाना चाहता है और अब कोई उपाय शेष नहीं है, तब हमें हर विवाद को छोड़ देना चाहिए और अपने आप को पूरी रीति से सौंप देना चाहिए, क्योंकि अब परमेश्वर की उस आज्ञा का पालन करने के सिवाय कुछ नहीं बचा जो अटल है।
तो यही हमारे प्रभु यीशु का अभिप्राय है। क्योंकि उसने निश्चय ही अपने सारे जीवन भर प्रार्थना की, और इससे पहले भी उस बड़े संघर्ष में, जिसे उसने सहा, वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि यदि सम्भव हो तो यह कटोरा उससे टल जाए। परन्तु अब उसने अपना निर्णय ले लिया है, क्योंकि उसके पिता परमेश्वर ने उसे यही ठहराया था और उसने देखा कि उसे उस कार्य से अपने आप को मुक्त करना है जो उसे सौंपा गया था, अर्थात् जगत के पापों को मिटाने के लिये सनातन बलिदान चढ़ाना। चूँकि उसने देखा कि वह इसी स्थान के लिये बुलाया गया है, और बात पूरी हो चुकी है, इसलिये वह परमेश्वर से इसके विपरीत करने की प्रार्थना से रुका रहता है। इसलिये वह चाहता है कि न स्वर्गदूत उसकी सहायता करें, न मनुष्य। वह नहीं चाहता कि परमेश्वर उसे अपनी सामर्थ्य का अनुभव कराके उसे मृत्यु से बचाए। परन्तु उसके लिये इतना ही पर्याप्त था कि उसमें धीरज की यह आत्मा हो, कि वह अपनी स्वेच्छा से जाकर अपना कार्य पूरा कर सके। यही उसे सन्तुष्ट करता है।
अब हम सबसे पहले यह देखते हैं कि परमेश्वर की इच्छा हमें रोके और बाँधे रखे, कि जब बातें हमें निर्दय और सब तर्क के विरुद्ध दिखाई दें, तब हम अपने मस्तिष्क की समझ से अधिक उसे महत्त्व दें जो परमेश्वर ने ठहराया है। हमारी कल्पनाओं को पैरों तले कुचल दिया जाना चाहिए जब हम अनुभव करें कि परमेश्वर ने कुछ और ही प्रमाणित किया है। यह हमारे विश्वास की आज्ञाकारिता का अंग है कि हम परमेश्वर को बुद्धिमान जानें, कि उसे वह सब करने का अधिकार हो जो उसे भाए। यदि हमारे पास इसके विपरीत करने के कारण हों, तो जान लें कि वे केवल धुआँ और व्यर्थता हैं, और यह कि परमेश्वर सब कुछ जानता है और उससे कुछ छिपा नहीं, और यह भी कि उसकी इच्छा ही सारी बुद्धि और सारी खराई की कसौटी है। इसके अतिरिक्त, हमारी आत्मा जो इसके विपरीत तर्क करती है, वह हमारी अशिष्टता से आता है। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर की बुद्धि अपरम्पार है, और हमारे पास समझ की मुश्किल से तीन बूँदें हैं। इसलिये यदि मनुष्य तब घबरा जाते हैं जब परमेश्वर उनकी अभिलाषा के अनुसार अपना शासन नहीं चलाता, तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। और क्यों नहीं? क्योंकि हम बेचारे मूर्ख हैं। वास्तव में, हम में चाहे हमारी समझ और तर्क कितना ही राज्य करें, पशुता के सिवाय कुछ नहीं है। परन्तु चूँकि हम परमेश्वर के न्यायों की गहरी थाह को नहीं समझते, इसलिये आओ हम सीखें कि जो गुप्त है उसकी आराधना करें, मैं कहता हूँ, दीनता और श्रद्धा के साथ आराधना करें, यह मानते हुए कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह न्यायपूर्ण और खरा है, चाहे हम अभी यह न समझ पाएँ कि कैसे। यह एक बात हुई।
इसके बाद, चूँकि परमेश्वर ने चाहा कि उसका पुत्र इस प्रकार मृत्यु के लिये सौंपा जाए, इसलिये हम उसके सहे हुए से लज्जित न हों। हम यह न सोचें कि दुष्ट मनुष्यों का वश चल रहा था और परमेश्वर के पुत्र के पास अपनी रक्षा करने का कोई उपाय न था। क्योंकि सब कुछ परमेश्वर की इच्छा से, और उस अटल आज्ञा से हुआ जो उसने ठहराई थी। इसी कारण हमारे प्रभु यीशु सन्त लूका में कहते हैं, “अब तो तुम्हारी घड़ी है, और अन्धकार का अधिकार है,” मानो वह कहता है, “जो तुम कर रहे हो उस में कोई घमण्ड न करो; क्योंकि शैतान तुम्हारा स्वामी है।” तौभी वह दिखाता है कि यह उस अनुमति के द्वारा है जो परमेश्वर ने उन्हें दी। यद्यपि शैतान ने उन्हें वश में कर रखा था, तौभी न वे और न वह कुछ भी करने का प्रयत्न कर सकते थे जब तक परमेश्वर उनके लिये लगाम ढीली न कर दे। तो संक्षेप में, हमें अपनी आँखें और अपनी सारी इन्द्रियाँ परमेश्वर की इच्छा पर, और उसकी सनातन योजना पर लगाए रखनी चाहिए, जब हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग की चर्चा हमारे सामने की जाती है। अब वह घोषणा करता है कि परमेश्वर की इच्छा ऐसी ही है, क्योंकि ऐसा लिखा है। क्योंकि यदि यीशु मसीह के पास उसकी गवाही न होती जो उसके पिता परमेश्वर ने ठहराया था, तो वह अब भी दुविधा में रह सकता था। परन्तु वह अपना कार्य जानता था। परमेश्वर ने उसे यहाँ नीचे इसलिये नहीं भेजा कि वह उसे अपने स्पष्ट आदेश के लिये पूर्ण रीति से न सौंपे। यह सच है कि जहाँ तक हमारा प्रभु यीशु सनातन परमेश्वर है, उसे किसी पवित्र शास्त्र से सिखाए जाने की आवश्यकता न थी; परन्तु जहाँ तक वह हमारा छुड़ानेवाला है और उसने हमारा स्वभाव धारण किया कि हमारे साथ सच्चा भाईचारा रखे, उसे पवित्र शास्त्र से सिखाया जाना आवश्यक था, जैसा कि हम विशेष रूप से देखते हैं कि उसने ऐसी शिक्षा को अस्वीकार नहीं किया।
तो फिर, चूँकि परमेश्वर ने उसे दिखा दिया कि वह किस कार्य के लिये बुलाया गया है, यही वह आधार है जिस पर वह टिका है। इसी कारण वह बन्दी के रूप में पकड़ा जाता है, कि जब वह जानता था कि उसे वह कार्य पूरा करना है जो उसे सौंपा गया था, अर्थात् हम सब के छुटकारे के लिये अपने आप को बलिदान चढ़ाना, तब वह पीछे न हटे। तो हमें सीखना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर की इच्छा उसी में गुप्त और समझ से परे है, इसलिये हमें पवित्र शास्त्र की शरण लेनी चाहिए। यह सच है कि परमेश्वर उन बातों के द्वारा भी, जिन्हें हम संयोग से हुआ मानते हैं, अपनी युक्ति को पूरा करना नहीं छोड़ता। परन्तु यह हम पर प्रगट नहीं किया गया। हमारे पास सदा कोई विशेष प्रकाशन न होगा जो कहे कि परमेश्वर ने यह या वह ठहराया है। इसलिये हमें निर्णय रोक रखना चाहिए। इसी कारण हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें किसी रोग से चंगा करे, या जब हम किसी और दुःख में पड़ें तो हमें उससे छुड़ाए। और क्यों? हम नहीं जानते कि वह क्या करना चाहता है। निश्चय ही हमें उस पर कोई नियम नहीं थोपना चाहिए। यह शर्त सदा जोड़ी जानी चाहिए: कि उसकी इच्छा पूरी हो। परन्तु हमारी सारी प्रार्थनाओं का लक्ष्य यही होना चाहिए: कि हम उससे माँगें कि वह हमें आवश्यक और उपयोगी जाने, और हम इस बीच सब कुछ उसकी गुप्त युक्ति में उसी को सौंप दें, कि वह वही करे जो उसे ठीक लगे। परन्तु जब पवित्र शास्त्र के द्वारा हमारे पास इसकी गवाही हो कि परमेश्वर कोई बात चाहता है, तब कोई उत्तर देना उचित नहीं, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ।
यहाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में हमें और भी अधिक निश्चय होता है कि उसे निर्दयता से सताया गया और ऐसी लज्जा और अभिमानपूर्ण, तिरस्कारी दुर्व्यवहार से उसके साथ व्यवहार किया गया, केवल दुष्ट और अधर्मी मनुष्यों की इच्छा के अनुसार ही नहीं, परन्तु इसलिये कि परमेश्वर ने ऐसा ठहराया था। और हम कैसे जानते हैं? पवित्र शास्त्र से। क्या यीशु मसीह के जन्म से दो हज़ार वर्ष पहले व्यवस्था में बलिदान नियुक्त नहीं किए गए थे? और व्यवस्था के दिए या लिखे जाने से पहले, क्या परमेश्वर ने प्राचीन पूर्वजों को बलिदान चढ़ाने के लिये प्रेरित और शिक्षित नहीं किया था? और क्या पशुओं का लहू पापों की क्षमा दिला सकता था? क्या वह मनुष्यों को परमेश्वर के योग्य ठहरा सकता था? कदापि नहीं, परन्तु वह यह दिखाने के लिये था कि परमेश्वर उस छुड़ानेवाले के लहू से मेल करेगा जिसे उसने ठहराया है। तब वह पवित्र शास्त्र के द्वारा स्पष्ट गवाही और घोषणा देता है। हम सचमुच देखते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं ने उसके विषय में कहा है, और वह भी विशेष रूप से उन्हीं का उल्लेख करता है। जब यशायाह ने कहा कि जो छुड़ानेवाला होनेवाला था, वह कुरूप किया जाएगा, तुच्छ समझा जाएगा, उसका कोई रूप या सुन्दरता साँप से अधिक न होगी, वह परमेश्वर के हाथ से पीटा और मारा जाएगा, वह देखने में भयानक होगा, संक्षेप में, कि वे उसका प्राण ले लेंगे, तो उसने किस सामर्थ्य से यह भविष्यद्वाणी की? क्या परमेश्वर शैतान या सब दुष्ट मनुष्यों का सामना नहीं कर सकता? ऐसा नहीं, परन्तु उसने यशायाह के मुँह से वह प्रगट किया जो उसने पहले से ठहराया था। दानिय्येल में इससे भी स्पष्ट वर्णन है। तो चूँकि परमेश्वर ने घोषणा कर दी थी कि उसके एकलौते पुत्र को हमारे छुटकारे और उद्धार के लिये बलिदान होना है, अब हम उस बात के विषय में और अधिक निश्चित हैं जो मैंने कही, अर्थात् यह कि जब हम देखें कि हमारा प्रभु यीशु मनुष्यों के हाथों ऐसी लज्जाजनक बातों के अधीन किया गया, तब हमें सदा परमेश्वर के उस हाथ को देखना चाहिए जो शासन करता है। इसी कारण सन्त पतरस प्रेरितों के काम 4:27 में कहता है कि यहूदा और सब यहूदियों और पहरेदारों और पिलातुस ने वही किया जो परमेश्वर की युक्ति और हाथ ने ठहराया था, जैसा कि और अधिक विस्तार से बताया जाएगा। तो यही वह स्थान है जहाँ हमें देखना चाहिए, यदि हम नहीं चाहते कि अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं से घबराएँ। वह यह है कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को यहाँ नीचे इसलिये भेजा कि उस आज्ञाकारिता को स्वीकार करे जो वह अपनी मृत्यु और दुःखभोग में उसे चढ़ाएगा, कि हमारे सब दोष और अधर्म मिटा दे।
अब दूसरी बात जिसका मैंने उल्लेख किया वह उस लाभ की है जो हमारे प्रभु यीशु के सहने से हमें मिलता है। क्योंकि यदि हम न जानें कि क्यों, तो यहाँ जो हमें सुनाया जा रहा है उसका स्वाद जाता रहेगा। परन्तु जब कहा जाता है कि वह हमारे छुटकारे के लिये बाँधा और जकड़ा गया, तब हम सचमुच अपनी स्वाभाविक दशा देखते हैं, अर्थात् यह कि शैतान हमें पाप और मृत्यु के अत्याचार में रखता है, कि हम दास हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के स्वरूप में सृजे जाने के बजाय हम में केवल पूर्ण भ्रष्टता है, कि हम शापित हैं, और हम बेचारे पशुओं के समान इस शापित बन्धुआई में घसीटे जाते हैं। जब हम यह जान लें और दूसरी ओर यह देखें कि परमेश्वर के पुत्र ने लज्जाजनक रीति से बँधना अस्वीकार नहीं किया, कि पाप और मृत्यु के वे आत्मिक बन्धन टूट जाएँ जो हमें शैतान की दासता में रखते हैं, तब हमें परमेश्वर की महिमा करनी है, हमें पूरे स्वर से हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग में, और यहाँ उल्लिखित पकड़े जाने में जयजयकार करना है। तो इस खण्ड से हमें यही स्मरण रखना चाहिए।
इस पर सुसमाचार का लेखक कहता है कि हमारे प्रभु यीशु ने उस दास को चंगा किया जो पतरस से घायल हुआ था। इसलिये नहीं कि वह इसके योग्य था, परन्तु इसलिये कि ठोकर दूर हो जाए। क्योंकि यदि यह घाव वैसा ही रह जाता तो सुसमाचार की शिक्षा और हमारे प्रभु यीशु मसीह के छुटकारे की निन्दा होती (मैं “हमारे प्रभु यीशु मसीह का छुटकारा” उसे कहता हूँ जो उसने हमारे लिये प्राप्त किया), क्योंकि तब यह कहा जा सकता था कि उसने देश के हाकिम और सब याजकों का सामना किया और मानो इस सुनसान स्थान में डाका डाला। तब इससे परमेश्वर के पुत्र की सारी महिमा धुँधली हो सकती थी और सुसमाचार को सदा के लिये लज्जित करना होता। साथ ही हम देखें कि पतरस का यह कार्य शैतान की धुन से हुआ था। क्योंकि शैतान ने यह युक्ति रची थी कि यीशु मसीह अपनी सारी शिक्षा समेत कुख्यात ठहराया जाए। हमारी सारी सुन्दर भक्तियों की भी यही प्रवृत्ति है, जब हम परमेश्वर की सेवा अपनी इच्छा के अनुसार करना चाहते हैं और हर एक को छूट दी जाती है कि जो उसे अच्छा लगे वही करे। इसलिये यीशु मसीह ने ऐसी ठोकर को मिटाना चाहा, कि उसकी शिक्षा की किसी रीति से निन्दा न हो।
तौभी हम यहाँ उन लोगों में घृणित कृतघ्नता देखते हैं जो ऐसे चमत्कार से प्रभावित न हुए। ये पहरेदार हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह को बाँधने आए हैं। वे देखते हैं कि परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य उसमें कितनी रीतियों से काम कर रही है। उसने उन्हें एक ही वचन से पीछे हटा दिया था। अब वह उस मनुष्य को चंगा करता है जिसका कान कट गया था। यह सब उनके लिये कुछ भी नहीं। तो हम देखते हैं कि जब शैतान एक बार मनुष्यों को मोहित कर लेता है और उनकी आँखें चौंधिया देता है, तब न परमेश्वर के अनुग्रह और न उसकी सारी सामर्थ्य उन्हें छू पाती है कि वे अपने कामों में सदा चलते न रहें, और उनके पास मानो सूअर का थूथन है जो हर कहीं घुसता फिरता है। परमेश्वर जो कुछ करे, जो कुछ कहे, वे सदा अपने हठ में बने रहते हैं, जो भयानक बात है। फिर भी हमें निश्चय ही परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें विवेक दे कि उसके सब अनुग्रहों से लाभ उठाएँ, कि उसके प्रेम से खिंचें, और जब वह अपना हाथ उठाकर हमें दिखाए कि वही हमारा न्यायी है, तब हमें इस प्रकार छुए कि हम भयभीत होकर सच्चे पश्चाताप के साथ उसकी ओर लौट आएँ। तो संक्षेप में यही हमें स्मरण रखना है।
जो भी हो, जब यीशु मसीह ने कैफा के दास को चंगा किया, तब दुष्ट मनुष्यों के मुँह बन्द हो गए। इस पर कहा गया है, “यीशु कैफा के घर ले जाया जाता है, जहाँ उससे पूछताछ की जाती है,” इत्यादि। क्योंकि संक्षेप के लिये हम उसे छोड़ देते हैं जो सन्त यूहन्ना हन्ना के विषय में बताता है, जो कैफा का ससुर था, और सम्भव है कि यीशु मसीह वहाँ आदर के कारण ले जाया गया, या हो सकता है कि यह मार्ग में उस समय हुआ जब वे सबके इकट्ठे होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तो यीशु कैफा के घर तक ले जाया जाता है और वहाँ उससे पूछताछ की जाती है। विशेष रूप से कहा गया है, “याजक हर कहीं झूठे गवाह ढूँढ़ते रहे, पर न पाया। अन्त में दो झूठे गवाह उठे और बोले, ‘उसने कहा था कि वह तीन दिन में मन्दिर को फिर बना देगा।’” यहाँ हम देखते हैं कि यीशु मसीह पर कैसे दोष लगाया गया। इसलिये नहीं कि याजक किसी पवित्र धुन से प्रेरित थे। निर्दोषों को सतानेवाले प्रायः यह समझते हैं कि वे ऐसी सेवा कर रहे हैं जो परमेश्वर को भाती है, जैसा कि वास्तव में हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ऐसे क्रोध से ग्रस्त था कि मानो डाकू बनकर (उसे ऐसा ही कहा गया है) उसने और भी अधिक उजाड़ा और नष्ट किया। उस समय भी वह अपने आप को एक भला उत्साही समझता था। परन्तु कैफा और उसके सारे गुट के विषय में यह बात न थी। क्योंकि वे और क्या चाहते थे सिवाय इसके कि यीशु मसीह पर अन्याय से अत्याचार हो? तो हम देखते हैं कि उनकी महत्त्वाकांक्षा उन्हें परमेश्वर से खुला युद्ध करने तक ले गई, जो भयानक बात है। क्योंकि जहाँ तक कैफा और उसके सारे गुट का सम्बन्ध है, वे लेवी के पुत्र हैं, उस पवित्र वंश के जिसे परमेश्वर ने चुना था। वे मनुष्यों के द्वारा नहीं चुने गए थे, परन्तु परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था से ऐसा ठहराया था। यह सच है कि उसमें एक नीच और घोर भ्रष्टता आ गई थी, क्योंकि उस समय याजक का पद बिकता था, और आजीवन बँधे रहने के बजाय (जैसा परमेश्वर ने ठहराया था) हर एक अपने साथी को हटा देता और जो सबसे अधिक धन देता वह उस प्रतिष्ठा को ले जाता। इसलिये यह नीच और घृणित भ्रष्टता थी कि इतने पवित्र और आदरणीय पद में षड्यन्त्र और छल-कपट का प्रयोग किया जाता था। तौभी याजक सदा लेवी के उसी वंश में बना रहा जिसे परमेश्वर ने अपनी सेवा के लिये समर्पित किया था। फिर भी, उन्हें देखो! परमेश्वर के सब शत्रु, उन्हें देखो! सब शैतान के मद में चूर, वरन् जगत के उस छुड़ानेवाले के विरुद्ध क्रोध से भरे हुए, जो व्यवस्था का अन्तिम उद्देश्य था।
तो हम ध्यान दें कि जो उच्च पद और प्रतिष्ठा में हैं, वे सदा इतनी विश्वासयोग्यता से अपना कार्य नहीं निभाएँगे कि उन पर निगरानी रखना आवश्यक न हो, जैसे उन पर जो परमेश्वर के शत्रु हो सकते हैं। इससे पोपवादियों की अति मन्द-बुद्धि मूर्खता देखी जा सकती है, जब वे याजक की उपाधि और पद को अपनाते हैं। मान लीजिए कि परमेश्वर ने आज्ञा दी होती कि एक पोप हो (जो उसने कभी नहीं दी)। मान लीजिए कि उसका सिंहासन रोम में होना चाहिए (इससे भी कम)।
चाहे यह सब सच भी हो, फिर भी कैफा और उसकी जाति के लोगों के व्यक्तित्व में यह दिखाई देता है कि जो सब सम्मान तक उठाए गए हैं, वे अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर सकते हैं। इसलिये हम ऐसे मूर्ख न बनें कि मुखौटों से मन बहलाएँ। और जब कोई आदरणीय उपाधि हो, तो परमेश्वर उस पर से अपना अधिकार न खो दे, जैसा कि हम देखते हैं कि पोपवादी सारे पवित्र शास्त्र को त्याग देते हैं और अपनी मूरतों की वन्दना करते हैं। इसलिये हम सीखें कि किसी मानवीय प्रतिष्ठा की आड़ में परमेश्वर को घटाया नहीं जाना चाहिए, परन्तु उसे अपना सर्वोच्च प्रभुत्व बनाए रखना चाहिए। यह एक बात हुई। जहाँ तक उस ठोकर का सम्बन्ध है जो हम यहाँ अपनी कल्पना के अनुसार मान सकते हैं, हम उस पर ध्यान दें जो भजन संहिता 118 में कहा गया है (जैसा हमारे प्रभु यीशु ने भी पहले उद्धृत किया था) कि वह वही पत्थर है जिसे राजमिस्त्रियों ने निकम्मा ठहराया। और परमेश्वर के भवन और उसकी कलीसिया के राजमिस्त्री कौन थे? याजक। कम से कम उन्हें तो यह कार्य निभाना चाहिए था। फिर भी उन्होंने उस पत्थर को ठुकरा दिया जिसे परमेश्वर ने कोने के सिरे का पत्थर ठहराया था। और यह पत्थर, यद्यपि ठुकराया गया था, तौभी भवन के प्रमुख स्थान पर बैठाया गया, अर्थात् परमेश्वर ने उसे पूरा करना न छोड़ा जो उसने अपनी युक्ति से ठहराया था, जब उसने अपने एकलौते पुत्र को मरे हुओं में से जिलाया और उसे उससे भी ऊँचा उठाया जैसा वह अपने आप को शून्य करने से पहले था। क्योंकि हर एक घुटना उसके सामने झुकेगा।
जब यहाँ कहा जाता है कि याजकों ने झूठी गवाही ढूँढ़ी, तो यह केवल कोई अपराध गढ़ने के लिये नहीं था, परन्तु इसलिये कि प्रभु यीशु को दबाने और कुचलने के लिये कोई बहाना और आड़ मिल जाए। सच तो यह है कि उसने ये शब्द कहे थे, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।” तो ये हमारे प्रभु यीशु के वचन हैं, ठीक वैसे ही जैसे उसके मुँह से निकले थे। जो गवाह प्रस्तुत किए गए, वे उन्हें दोहराते हैं। कोई कह सकता है कि वे भले और विश्वासयोग्य गवाह हैं। फिर भी पवित्र आत्मा उन्हें झूठा कहता है, क्योंकि उन्होंने इस बात को दुष्टता से बिगाड़ दिया। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु ने अपनी देह के विषय में कहा था, जो ईश्वरीय महिमा का सच्चा मन्दिर है। यरूशलेम में जो भौतिक मन्दिर बना था वह केवल एक चित्र था। वह केवल छाया था, जैसा हम जानते हैं। परन्तु हमारे प्रभु यीशु में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता ने अपना निवास बनाया, जैसा सन्त पौलुस कहता है, वरन् देह में और सच्चे सार में। तो हम ध्यान दें कि हमें केवल गवाह के शब्दों को नहीं, परन्तु बोलनेवाले के अभिप्राय को देखना चाहिए। यह हमारे लिये अच्छी और उपयोगी शिक्षा है, क्योंकि हम देखते हैं कि मनुष्य अपने बुरे कामों और झूठ में इतने डूबे हैं कि जब उनके पास कोई आड़ हो तो वही उनके लिये काफ़ी है, और उन्हें लगता है कि जब उन्होंने इस प्रकार किसी मनुष्य पर झूठा दोष लगा दिया तो वे परमेश्वर के सामने निर्दोष हो गए। इसलिये हम केवल शब्दों या औपचारिकता या रीति पर न अटकें, परन्तु मामले के सच्चे स्वरूप को देखें। क्योंकि जो सदा यह दावा कर सकते थे कि उन्होंने उसके सिवाय कोई गवाही नहीं दी जो वहाँ था, वे परमेश्वर के सामने झूठे गवाह ही गिने जाते रहेंगे, जैसा हम देखते हैं।
इस पर कहा गया है कि कैफा यीशु मसीह से कहता है, “क्या बात है? तू कोई उत्तर नहीं देता? क्या तू नहीं देखता कि ये तेरे विरुद्ध गवाही दे रहे हैं?” फिर भी यीशु बिलकुल चुप रहता है और उन सब निन्दा भरी बातों को मौन में ग्रहण करता है। कोई इसे अजीब पा सकता है कि यीशु मसीह, जिसके पास ऐसे झूठ को खण्डन करने का पर्याप्त उचित अवसर था, उसका विरोध नहीं करता। परन्तु (जैसा हम पहले कह चुके हैं, और आगे और पूर्णता से देखेंगे) यीशु मसीह वहाँ अपनी शिक्षा का पहले के समान समर्थन करने के लिये नहीं था। इसलिये हमें सब परिस्थितियों में सावधानी से भेद करना चाहिए। क्योंकि यीशु मसीह को जंगल में उपवास करने के बाद उसके पिता परमेश्वर ने सुसमाचार की शिक्षा का प्रचार करने के लिये भेजा। उस सारे समय में हम देखते हैं कि जिस शिक्षा का वह सेवक था उसकी उसने कितनी उदारता से सदा रक्षा की। हम देखते हैं कि वह सब विरोधों के सामने कैसे खड़ा रहा। इसी प्रकार उसने अपना कार्य निभाया, क्योंकि वह वचन के सेवक के रूप में भेजा गया था। परन्तु यहाँ एक विशेष बात पर ध्यान है। वह यह कि उसे जगत का छुड़ानेवाला होना है। उसे दोषी ठहराया जाना है, सचमुच इसलिये नहीं कि उसने सुसमाचार का प्रचार किया, परन्तु हमारे लिये उसे मानो अथाह गहराइयों तक कुचला जाना है और हमारा मुक़द्दमा सहना है, क्योंकि वह वहाँ मानो सब शापितों और सब अपराधियों के, और उनके स्थान पर था जो अनन्त मृत्यु के योग्य ठहरे थे। तो चूँकि यीशु मसीह का यही कार्य है, और वह उन सब का बोझ उठाता है जिन्होंने परमेश्वर को घोर अपराध से ठेस पहुँचाई, इसी कारण वह चुप रहता है। इसलिये हम भली भाँति ध्यान दें कि जब आवश्यकता थी कि यीशु मसीह सुसमाचार की शिक्षा का समर्थन करे, और उसका कार्य और उसकी बुलाहट इसकी माँग करती थी, तब उसने विश्वासयोग्यता से उसे निभाया। परन्तु जब उसने चुप रहकर छुड़ानेवाले का कार्य किया, मानो स्वेच्छा से दण्ड ग्रहण करता हो, तब अपने लिये चिन्ता के कारण उसने अपना मुँह बन्द नहीं रखा, क्योंकि वह वहाँ (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारे नाम से था। यह सच है कि वह बोलता है (जैसा हम अभी देखेंगे) परन्तु वह अपने बचाव के लिये नहीं है; वह दुष्ट मनुष्यों के क्रोध और रोष को और अधिक अपने विरुद्ध भड़काए बिना नहीं है। तो इसका कारण यह है कि वह मृत्यु से बचना नहीं चाहता था, परन्तु अपने आप को स्वेच्छा से कुचले जाने दिया, कि दिखाए कि उसने अपने आप को भुला दिया कि हमें अपने पिता परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहराए। तो उसे अपनी कोई चिन्ता न थी, न अपने प्राण की, और न अपने सम्मान की भी। उसके लिये सब एक ही था कि जगत की लज्जा और अपमान सहे, बशर्ते हमारे पाप मिटा दिए जाएँ और हम अपने दण्ड से मुक्त ठहराए जाएँ।
इस पर कहा गया है, “महायाजक उसे जीवते परमेश्वर की शपथ देता है कि वह उन्हें बताए कि क्या वह मसीह है, क्या वह धन्य का पुत्र है। वह उत्तर देता है कि हाँ, वही है, परन्तु वे उसकी महिमा तब देखेंगे जब बहुत देर हो चुकी होगी,” अर्थात् उनके लिये, क्योंकि वह उनकी लज्जा का कारण होगा। यहाँ हमारा प्रभु यीशु बोलता है, परन्तु यह इसलिये नहीं कि एक मनुष्य के रूप में महान याजक और उसके सारे गुट के आगे झुके। वरन् वह धमकियों का प्रयोग करके उसे और अधिक चुभाता है। यदि पहले वह द्वेष और क्रूरता से भरा था, तो यह और अधिक आग लगाने के लिये है। परन्तु हम पहले ही कह चुके हैं कि यीशु मसीह को अपनी कोई चिन्ता न थी, और वह तो उस कर्तव्य को निभाता है जिसका उसने भार उठाया था, अर्थात् हमारा छुड़ानेवाला होना।
इसके अतिरिक्त, यहाँ सबसे पहले हमारे सामने मानो परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले हैं, वे जो पूरी तरह शैतान के वश में हैं, फिर भी धर्म की किसी प्रकार की आड़ का दुरुपयोग करेंगे, क्योंकि कोई कह सकता है कि यह महान याजक अब भी अपना कार्य भली भाँति निभाता है, जब वह यीशु मसीह को जीवते परमेश्वर के नाम की शपथ देता है। परन्तु मनुष्य वहीं डूब जाते हैं जब एक बार शैतान उनकी आँखें बाँध देता है। वह उन्हें ऐसी निर्लज्जता में फेंक देता है कि उन्हें परमेश्वर का कोई आदर नहीं रहता, और मनुष्यों के सामने भी वे लज्जित नहीं होते। हमारे प्रभु यीशु के इस उत्तर में हमें यह ध्यान देना है कि वह कैफा और सब औरों के सामने यह घोषणा करना चाहता है कि यदि वह इस प्रकार थोड़े समय के लिये मानो कुचला जाता है, तो इससे उसकी महिमा कम नहीं होनी चाहिए, कि वह सदा परमेश्वर का एकलौता पुत्र माना और समझा जाए। परन्तु यहाँ उसके सामने एक और भी ऊँचा विचार है। वह यह है कि हमें निश्चय हो कि हमारे उद्धार के लिये इस प्रकार अपने आप को दीन करने से उसकी स्वर्गीय महिमा में कुछ भी घटी नहीं हुई, परन्तु वह मनुष्यों के सामने इसलिये इस प्रकार कुचला जाना चाहता था कि हम पूरी रीति से निश्चित हो जाएँ कि हम परमेश्वर के सामने आदर के योग्य पाए जाएँगे, क्योंकि वे सारी लज्जाएँ जिनके हम योग्य थे मिटा दी जाएँगी। तो चूँकि हमारे प्रभु यीशु ने चुप्पी साधी और अपने भले मुक़द्दमे में अपना बचाव नहीं किया, इसलिये अब हमारे मुँह खुले हैं कि हम परमेश्वर को पुकारें मानो हम धर्मी हैं। वह तो हमारा सहायक भी है, जो हमारे लिये बात करता है। तो जब हमारा प्रभु यीशु खड़ा रहा, तो इसलिये कि अब पूरी स्वतंत्रता से वह अपने पिता परमेश्वर के सामने हमारे लिये बिनती करे, यद्यपि हम बेचारे कीड़े-मकोड़ों के सिवाय कुछ नहीं। हम में केवल सारी दुर्दशा है। फिर भी हमें परमेश्वर तक पहुँच प्राप्त है कि उसे निजी रूप से पुकारें और खुले रूप से उसे अपना पिता कहें।
यही वह दिखाना चाहता है जब उसने कहा, “इसके बाद तुम मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर की सामर्थ्य की दाहिनी ओर बैठे देखोगे।” इसलिये हमें हर उस विचार से फिरना चाहिए जो हमें ठोकर दे सकता है, जब हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु इस प्रकार दीन किया गया। तो आओ हम देखें कि इसका अन्त क्या था। उसने चाहा कि बिना किसी विरोध के दोषी ठहराया जाए, कि हम परमेश्वर के न्यायासन के सामने उपस्थित हो सकें, और वहाँ बिना किसी भय के स्वतंत्रता से आएँ। तो संक्षेप में हम यह सीखें कि हर बार जब दुःखभोग का इतिहास हमें सुनाया जाए तो हम इस प्रकार कराहें और आहें भरें, यह देखकर कि परमेश्वर के पुत्र को हमारे लिये इस प्रकार दुःख उठाना पड़ा, कि जब तक वह हम पर प्रगट न हो, हम उसकी महिमा के आगे काँपते रहें। हम ऐसे दृढ़ निश्चयी हों कि जब वह आएगा, तो वह हमें व्यवहार में वह फल अनुभव कराएगा जो उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग से हमारे लिये प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त, हम उनमें गिने जाने से डरें जिन्हें वह इस प्रकार धमकाता है, यह कहकर, “अब से तुम देखोगे।” क्योंकि अवश्य है कि दुष्ट और त्यागे हुए लोग अनुभव करें कि परमेश्वर का न्यायासन कितना भयानक है और जब वह उनके विरुद्ध उठेगा तो उन्हें गिरा देने की उसकी सामर्थ्य कितनी बड़ी है। जब सन्त पौलुस भी उस दण्ड की चर्चा करना चाहता है जो दुष्ट और परमेश्वर के शापित लोग भोगेंगे, तो वह कहता है कि वे उसकी अपरम्पार महिमा के सामने काँपते और उसकी दृष्टि से भयभीत होंगे।
चूँकि ऐसा है, इसलिये आओ हम प्रभु यीशु के सामने दीन होना सीखें। हम उस महिमा को आँख से देखने की प्रतीक्षा न करें जो वह अपने दूसरे आगमन पर दिखाएगा, परन्तु विश्वास के द्वारा आज ही उसे अपना राजा, और स्वर्गदूतों और सब सृष्टि का सिर जानकर देखें, और उसे अपना सर्वोच्च अधिपति मानकर ग्रहण करें। जो आदर उसका है वह हम उसे दें, यह जानते हुए कि चूँकि वह हमें उसके पिता परमेश्वर की ओर से बुद्धि, छुटकारे, धार्मिकता और पवित्रता के लिये दिया गया है, इसलिये हमें हर प्रशंसा उसी को देनी चाहिए, और यह कि उसी की परिपूर्णता में से हमें लेना है कि तृप्त हों। इसलिये हम सावधान रहें कि अपने प्रभु यीशु मसीह का यह आदर करें, यद्यपि आज हम उसका न्यायासन तैयार हुआ अभी नहीं देखते। परन्तु हम उसे विश्वास की आँखों से देखें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें प्रकाश दे, संकट के समय उसे पुकारने के लिये हमें दृढ़ करे, और यह हमें जगत से ऊपर, हमारी सब इन्द्रियों और सब आशंकाओं से ऊपर उठा ले जाए, ऐसी रीति से कि हमारा प्रभु यीशु आज हम से वैसे बड़ाई पाए जैसी उसके योग्य है। तो संक्षेप में यही हमें स्मरण रखना है।
इस कथन के विषय में कि कैफा और याजकों ने उसे मृत्युदण्ड के योग्य ठहराया, हम सीखें कि दुष्टों और सत्य के शत्रुओं के हठ पर चकित न हों। आज यह शिक्षा हमारे लिये बहुत आवश्यक है। क्योंकि हम देखते हैं कि इस जगत के बड़े लोग खुलेआम सुसमाचार की निन्दा करते हैं। हम अपने बीच में भी देखते हैं कि जो सुसमाचार का अंगीकार करते हैं और सुधारे हुए लोग माने जाना चाहते हैं और जिनमें प्रतीत होता है कि केवल सुसमाचार ही है, वे भी सुसमाचार की शिक्षा को देहधारी शैतानों के समान, वरन् शैतान से ग्रस्त क्रोधित पशुओं के समान दोषी ठहराते हैं। इन सब बातों को देखने के लिये दूर जाने की आवश्यकता नहीं। इसलिये हम ऐसी ठोकरों के विरुद्ध निश्चिन्त रहें और सदा अपने परमेश्वर की महिमा करना सीखें। चाहे कैफा और उसकी जाति के सब लोग जितनी चाहें अपनी निन्दा उगलें, और चाहे वे कहें कि यीशु मसीह मृत्यु के योग्य है, ऐसे वचन पर चुप रहना आवश्यक है, चाहे वह बुरा हो। चाहे वे अपनी नीच और घृणित निन्दाओं से वायु को इस प्रकार दूषित करें, तौभी हम अपने प्रभु यीशु मसीह की इस वाणी से चिपके रहें। यदि आज उसके सत्य को मनुष्य इस प्रकार झूठा दोषी ठहराते हैं, और उस पर सन्देह किया जाता है, उसे विकृत किया जाता है, बिगाड़ा जाता है, और लोग जान-बूझकर उससे मुँह फेर लेते हैं, तौभी वह अपने आप को बनाए रखने के लिये पर्याप्त बलवन्त और सामर्थी है। आओ हम धीरज से प्रतीक्षा करें जब तक वह हमारे छुटकारे के लिये प्रगट न हो। फिर भी हम सब दीन होना और उसे सारी महिमा देना सीखें, क्योंकि वह हमारे उद्धार के लिये इतना झुकने को तैयार था, वरन् अपने आप को सब कुछ से शून्य कर दिया।
अब हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन श्रद्धा से झुकेंगे।
