अध्याय 13

अनुग्रह ही से धर्मी ठहराया जाना - गलातियों 2:15-16

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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अनुग्रह ही से धर्मी ठहराया जाना - गलातियों 2:15-16

हम जो जन्म से यहूदी हैं, और पापी अन्यजातियों में से नहीं, यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हमने भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं, पर मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें; इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा। - गलातियों 2:15-16

अब तक हमने यह समझाया कि पौलुस प्रभु यीशु मसीह के आगमन से पहले जो रस्में, प्रतीक और छायाएँ चलती थीं, उनकी चर्चा करते हुए क्यों इस सामान्य निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जब तक मनुष्य सारी व्यवस्था का पालन न करे, तब तक वह परमेश्वर की दृष्टि में न धर्मी ठहर सकता है और न ग्रहणयोग्य। अब पहले-पहल हम इन्हें दो अलग-अलग विषय समझ सकते हैं; परन्तु जैसा हम कहते आए हैं, पौलुस को हमें मूल बात की ओर लौटाना पड़ता है, ताकि यह मूर्खता प्रकट हो कि हम अपनी ही योग्यता से परमेश्वर की दृष्टि में अनुग्रह पा सकते हैं। फिर, पौलुस ने "व्यवस्था" शब्द क्यों जोड़ा, इसका कारण हम पहले ही बता चुके हैं। क्योंकि चाहे सामान्यतः यह माना जाता हो कि भला मनुष्य परमेश्वर के यहाँ अनुग्रह और ग्रहणयोग्यता कमा सकता है, फिर भी ऐसी बातों में मनुष्य बहुत गम्भीर भूल में हैं। सच तो यह है कि हमने चाहे जो कुछ किया हो, हम परमेश्वर का अनुग्रह जीत नहीं सकते, क्योंकि वह हमारे सामर्थ्य की हर उत्तम वस्तु का अधिकारी है। इसलिये हमारी ओर से कोई पुण्य सम्भव नहीं (यदि उसे ऐसा कहा भी जा सके), जब तक कि हम उस वाचा की शर्तें पूरी न करें जो उसने हमसे बाँधी, जब उसने कहा कि जो कोई व्यवस्था का पालन करेगा वह जीवन और उद्धार पाएगा (लैव्यव्यवस्था 18:5)। जब परमेश्वर ने ये वचन कहे, तब वह हमारी सम्पूर्ण आज्ञाकारिता को उद्धार के योग्य मानकर ग्रहण करने को तैयार था; पर इसका वास्तव में यह अर्थ नहीं कि हम इस कारण अनुग्रह के योग्य ठहर सकते हैं, क्योंकि हममें से किसी ने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया (जैसा हम आगे देखेंगे)। अतः यह प्रतिज्ञा या तो व्यर्थ हो जाती, या कम से कम निष्फल रहती, क्योंकि वह कभी किसी पर लागू न होती, यदि परमेश्वर उपचार न भेजता — अर्थात् यदि वह हमारे अधर्म के होते हुए भी हमारे पाप क्षमा न करता और हमें धर्मी जानकर ग्रहण न करता। जब पौलुस कहता है कि हम व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहर सकते, तब उसका अर्थ यह है कि यदि हम इस आधार पर अनुग्रह और उद्धार के योग्य होने का दावा करें कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि व्यवस्था का पालन करनेवाले धर्मी गिने जाएँगे, तो हम पूरी तरह भूल में हैं; क्योंकि कोई भी व्यवस्था का पूर्ण पालन नहीं करता। हमें समझना चाहिए कि हम सब परमेश्वर के सम्मुख दोषी हैं और दण्ड की आज्ञा हमारे सिरों पर लटकी हुई है।

इस बात को और स्पष्ट रूप से कहने के लिये पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों की तुलना करता है। वह कहता है कि यद्यपि वे "जन्म से यहूदी थे और पापी अन्यजातियों में से नहीं", तथापि वे जानते थे कि वे केवल प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा ही परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो सकते हैं। क्योंकि यद्यपि सब मनुष्य आदम में गिर गए हैं और इसलिये किसी में अपना कोई पुण्य नहीं, फिर भी ऐसा प्रतीत हुआ कि यहूदियों को एक विशेष अधिकार प्राप्त था, इस अर्थ में कि परमेश्वर ने उन्हें अपनी सन्तान के रूप में अपनाया था और उन्हें अपने सेवक कहा था। परन्तु यहूदी यहीं भटक गए। क्योंकि जब पवित्रशास्त्र "खतनारहित" की चर्चा करता है, तो वह उस अशुद्धता की ओर संकेत करता है जो आदम से हममें बसी है और हम सबको माता के गर्भ ही से दण्ड के अधीन ठहराती है। पर यहूदी मानते थे कि परमेश्वर ने उन्हें मनुष्यजाति पर पड़े इस श्राप से छुड़ा दिया है, और इसलिये वे घमण्ड करते थे। यह सच है कि उन्हें बड़ा सम्मान दिया गया था, जिसे उन्हें पृथ्वी की हर भलाई से अधिक मूल्यवान समझना चाहिए था — क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपनी प्रजा और अपना निज भाग होने के लिये चुना था — फिर भी उन्हें दीन होकर मानना चाहिए था कि वे अपने आप में अयोग्य हैं। वास्तव में हम भी जब परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव करते हैं तो ऐसा ही अहंकारी भाव अपना लेते हैं; वैसे ही यहूदी भी अधिकतर यह समझ बैठे कि वे सब से श्रेष्ठ हैं। उन्होंने सोचा कि परमेश्वर ने उनमें कुछ ऐसा पाया जिसके कारण उसने उन्हें उनसे अधिक पसन्द किया जिन्हें उसने ठुकरा दिया। इस घमण्ड के साथ दुष्ट कृतघ्नता भी आई, क्योंकि उन्होंने उन सब अच्छी वस्तुओं का श्रेय, जो उन्हें उसके हाथ से मिली थीं, परमेश्वर को नहीं दिया, वरन् वे गर्व से फूल गए, मानो परमेश्वर उन्हें अन्यजातियों से अच्छा या अनन्त उद्धार के अधिक योग्य समझता हो।

ऐसे सब अहंकार को बुझाने के लिये पौलुस अपना तर्क यों आरम्भ करता है: "हम जो जन्म से यहूदी हैं..." ऐसा प्रतीत होता है कि वह कह रहा है, "हाँ, यह सच है कि हम पर अन्यजातियों की अपेक्षा अधिक अनुग्रह दिखाया गया, जिन्हें परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ग्रहण नहीं किया।" परन्तु जब वह ऐसा बोलता है तो वास्तव में यहूदियों को घमण्ड का अवसर देना उसका उद्देश्य नहीं है; वरन् वह उनके सामने वे बातें फैलाकर रख रहा है जो उन्हें परमेश्वर से सेंत-मेंत मिली हैं, ताकि उन्हें सिखाए कि उनके पास घमण्ड करने का कोई आधार नहीं। रोमियों की पत्री में पौलुस दो कथन करता है जो पहली दृष्टि में परस्पर विरोधी लगते हैं, फिर भी पूर्ण सामंजस्य में हैं। एक ओर वह पूछता है, "क्या हमें अन्यजातियों से अधिक विशेषाधिकार नहीं?", और उत्तर देता है, "हाँ। क्योंकि हम उसकी प्रजा होने को चुने गए; उसने खतना हमें इस बात के चिह्न और मुहर के रूप में दिया कि हम उसकी सन्तान हैं; उसने हमसे वाचा बाँधी; उसने प्रतिज्ञा की कि वह हमारे पास जगत का छुड़ानेवाला भेजेगा। इस प्रकार, यदि हम उन दयाओं पर विचार करें जो परमेश्वर ने हम पर बरसाई हैं, तो हम सचमुच धन्य हैं और अन्य सब जातियों से बहुत ऊँचे उठाए गए हैं।" यहाँ पौलुस उनके प्रति परमेश्वर की भलाई को बड़ा करके दिखाता है (रोमियों 3:1-2)। परन्तु आगे चलकर वह वही प्रश्न पूछता है (यहूदी को क्या बड़ाई?), पर उत्तर देता है, "कुछ भी नहीं" (रोमियों 3:9-10)। "क्योंकि हम सब परमेश्वर के श्राप के अधीन हैं। यदि अन्यजाति दोषी ठहरें, तो हम दुगुने दोषी ठहरेंगे, क्योंकि उनके पास अज्ञानता का बहाना है। तौभी वे परमेश्वर से बच नहीं सकते, वरन् नाश होंगे, यद्यपि उन्हें कभी कोई शिक्षा या सिद्धान्त का ज्ञान नहीं मिला। इसलिये यह निष्कर्ष निकलता है कि हम व्यवस्था से दोषी ठहरेंगे, क्योंकि परमेश्वर ने हमें सिखाया है, फिर भी हम पाप करने और उसकी धर्ममय व्यवस्थाओं का उल्लंघन करने से नहीं रुके, यहाँ तक कि अब हम अन्यजातियों और अविश्वासियों से भी अधिक गहरे और भारी दण्ड में डूबे हुए हैं," वह कहता है। इस प्रकार यहूदी अन्यजातियों से अलग थे — इसलिये नहीं कि वे अधिक योग्य या अधिक धर्मी थे, वरन् केवल इसलिये कि परमेश्वर ने अपनी सेंत-मेंत की उदारता से उन्हें चुन लिया था।

इसी प्रकार, विश्वासियों के घर जन्मे बच्चे अपने स्वभाव के विषय में अन्य अन्यजातियों के, यहाँ तक कि तुर्कों के बच्चों से भी अच्छे नहीं हैं। क्योंकि हम सब उस भ्रष्ट और श्रापित पिण्ड का भाग हैं जिसे परमेश्वर ने दोषी ठहराया है, ताकि हममें से कोई अपने आप को ऊँचा न उठाए और अपने मित्रों से अधिक मूल्यवान न समझे। फिर भी पौलुस घोषित करता है कि हमारे बच्चे पवित्र हैं, कि वे अविश्वासियों या मूर्तिपूजकों के घर जन्मे बच्चों के समान कलंकित नहीं हैं (1 कुरिन्थियों 7:14)। ऐसा प्रतीत होगा कि यहाँ कुछ विरोधाभास हैं। फिर भी सब कुछ बहुत भली-भाँति मेल खाता है, क्योंकि जहाँ तक हमारे स्वभाव का प्रश्न है, हम सब दूषित और भ्रष्ट हैं, केवल एक अपवाद [मसीह] को छोड़कर। फिर भी एक अलौकिक दान जैसी भी कोई वस्तु है, अर्थात् एक ऐसा विशेषाधिकार जो परमेश्वर इसलिये देता है कि विश्वासियों के बच्चे उसी को समर्पित हों, और वह उन्हें अपना जानकर ग्रहण करे। इसीलिये आज कलीसिया के बच्चे परमेश्वर की प्रजा और चुने हुओं की गिनती में माने जाते हैं, जैसे व्यवस्था के अधीन यहूदी शेष जगत से अलग किए गए थे। इसी से समझ में आता है कि पौलुस क्यों कहता है, "हम यहूदी हैं और पापी अन्यजातियों में से नहीं।" "पापी" से उसका अर्थ उन से है जो अपनी गन्दगी में पड़े रहते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह से धोए नहीं गए। वास्तव में खतना स्वयं इस बात का चिह्न और गवाही था कि परमेश्वर ने अब्राहम के घराने और उससे उत्पन्न वंश को अपने निज और विशेष लोगों के रूप में ग्रहण किया था। पुराने समय में यही यहूदियों को अविश्वासियों से अलग करता था; क्योंकि यद्यपि वे आदम की सन्तान होने के नाते समान स्थिति में थे, फिर भी परमेश्वर ने कुछ को चुन लिया और दूसरों को अपने घराने से परायों के समान छोड़ दिया। यदि हम पूछें कि ऐसा क्यों हुआ, तो उत्तर केवल यही हो सकता है कि यह निरे परमेश्वर के अनुग्रह के कारण था, क्योंकि यहूदी स्वयं किसी बात में उत्कृष्ट न थे।

आओ, अब उस तर्क का अनुसरण करें जो पौलुस यहाँ गढ़ रहा है। वह कहता है, "यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरता है।" यह कहकर पौलुस दिखाता है कि परमेश्वर से उन्हें जो भी अनुग्रह मिला था, उसके कारण उन्हें यह स्वतन्त्रता न थी कि वे मनुष्य पर या अपने आप पर भरोसा करें, मानो वे परमेश्वर से इसके योग्य थे। नहीं, उन्हें तो उसकी सेंत-मेंत की उदारता में शरण लेनी थी, यह पहचानते हुए कि उद्धार केवल यीशु मसीह में है, जो उन्हें जो पहले ही खो चुके थे, विनाश से बचाने आया। इसकी पुष्टि उस दूसरे स्थान में होती है जहाँ लिखा है कि उसने "आकर तुम्हें जो दूर थे, और उन्हें जो निकट थे, मेल-मिलाप का सुसमाचार सुनाया" (इफिसियों 2:17)। यीशु मसीह ही वह मेल-मिलाप है, क्योंकि उसी के द्वारा परमेश्वर हमसे प्रेम कर सकता है और दया करके हमें ग्रहण कर सकता है। यह केवल उनके लिये सच नहीं जो पहले अन्यजातियों के समान दूर थे, वरन् अब्राहम की सन्तान के लिये भी है, उस मर्यादा और कुलीनता के होते हुए भी जो उन्हें पहले ही प्राप्त थी (क्योंकि यह उनके स्वभाव से न थी)। पौलुस कहता है कि जो यहूदी मसीही बन गए थे, वे जानते थे कि वे व्यवस्था के कामों से नहीं, वरन् केवल प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास से धर्मी ठहर सकते हैं; और वह दोनों की तुलना इसलिये करता है कि दिखाए कि जब तक हम सब निजी पुण्य को सचमुच त्याग न दें, तब तक हम अनुग्रह से धर्मी नहीं ठहराए जा सकते।

यह बात ध्यान देने योग्य है। क्योंकि पोप के अनुयायी भी मानते हैं कि वे विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, पर यह केवल आधा सत्य है, और शेष चित्र ही सब कुछ बिगाड़ देता है। निश्चय ही उन्हें इस बात का कायल किया गया है कि जब तक यीशु मध्यस्थ न हो और जब तक मनुष्य उद्धार के लिये उस पर भरोसा न रखे, तब तक वह परमेश्वर के सम्मुख धर्मी नहीं गिना जा सकता। पोप के अनुयायी यह बात बहुत भली-भाँति जानते हैं, फिर भी वे प्रायः कहते हैं, "हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, पर केवल विश्वास से नहीं।" इसी बात पर वे विवाद करते हैं, और यही प्रमुख विषय है जिस पर हम में मतभेद है। परन्तु पौलुस "पर विश्वास के द्वारा" कहकर उनकी मूर्खता प्रकट कर देता है, क्योंकि इस वाक्यांश का अर्थ यह है कि जो कुछ मनुष्य परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिये उसके पास लाते हैं, वह सब ठुकरा दिया जाता है। इसलिये पुण्य के लिये द्वार कसकर बन्द है, क्योंकि पौलुस घोषित करता है कि परमेश्वर के पास आने का एकमात्र मार्ग विश्वास है। हम शीघ्र ही और स्पष्ट देखेंगे कि पौलुस व्यवस्था से तुलना ऐसे क्यों करता है, मानो ये दो विपरीत बातें हों। व्यवस्था यह मानकर चलती है कि यदि हम वह पूरा करें जो परमेश्वर हमसे चाहता है, तो हम भले सेवक पाए जाएँगे और वह हमें अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार प्रतिफल देगा; दूसरी ओर, विश्वास यह मानकर चलता है कि हम कंगाल, खोए हुए, दोषी ठहराए हुए प्राणी हैं और हमें यीशु मसीह में वह पाना है जिसकी हमें अत्यन्त आवश्यकता है।

इसे एक उदाहरण के रूप में लीजिए: दो पुरुष भोजन और ठौर ढूँढ रहे हैं। एक के पास धन है और वह चाहता है कि उसके साधनों के अनुसार उसका सत्कार किया जाए। दोनों खाने को कुछ माँगते हैं, परन्तु दूसरा मनुष्य कंगाल है और उसके पास एक पैसा भी नहीं, इसलिये वह भीख माँगता है। दोनों में कुछ बात एक सी है, क्योंकि दोनों भोजन चाहते हैं, परन्तु पहले के पास धन है जिससे वह अपने मेज़बान को सन्तुष्ट कर सके। इस प्रकार, भली-भाँति खा-पीकर और शिष्टता से आतिथ्य पाकर मेज़बान अपनी ओर से अपना दाम पाकर प्रसन्न होगा, और अब वह यह नहीं सोचेगा कि उसका अतिथि किसी भी रीति से उसका ऋणी है। क्यों? क्योंकि वह सन्तुष्ट हो गया है और उसे लाभ भी हुआ है। परन्तु उस कंगाल का जीवन, जो भीख माँगता है, उसी पर निर्भर है जो उसे भोजन और ठौर दे सकता है, क्योंकि वह बदले में उसे कुछ नहीं दे सकता। ठीक इसी प्रकार, यदि हम व्यवस्था से धर्मी ठहरना चाहें तो हमें उस धर्मी ठहरने के योग्य होना होगा; क्योंकि तब परमेश्वर हमसे और हम उससे परस्पर लेन-देन के रूप में पाएँगे। क्या ऐसा सम्भव है? बिलकुल नहीं, जैसा हम आगे और विस्तार से जाँचेंगे। इसलिये हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हम व्यवस्था से धार्मिकता प्राप्त नहीं कर सकते, और यदि हम यह मानें कि परमेश्वर को अपना देनदार बना सकते हैं, तो केवल उसके क्रोध को भड़काएँगे। एकमात्र उपाय यही है कि हम कंगाल भिखारियों की भाँति आएँ, ताकि विश्वास से धर्मी ठहराए जाएँ। इसलिये नहीं कि विश्वास हमसे उत्पन्न कोई गुण है, परन्तु हमें दीनता से आना है, यह मानते हुए कि हम उद्धार को सेंत-मेंत के दान के सिवा पा नहीं सकते। इसीलिये व्यवस्था को विश्वास के विपरीत रखा गया है। पौलुस हमें दिखा रहा है कि जो अपने पुण्यों के कारण परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होने का दावा करते हैं, वे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से मुँह फेर रहे हैं। इसका अध्ययन हम आगे और विस्तार से करेंगे।

कोई यह आपत्ति उठा सकता है: व्यवस्था तो परमेश्वर की दी हुई है, इसलिये उसे उस विश्वास के विरोध में नहीं रखा जा सकता जो स्वयं भी परमेश्वर ही से आता है। इसका उत्तर सरल है। परमेश्वर ने दिन और रात, जल और अग्नि, शीत और ऊष्मा दोनों बनाए। निश्चय ही दिन रात का विरोधी नहीं है; वरन् परमेश्वर ने अपनी भलाई और बुद्धि से ठहराया है कि वे उचित क्रम से आएँ; मनुष्य के पास दिन में अपना काम करने के लिये सूर्य का उजियाला है, और रात को सूर्य छिप जाता है कि मनुष्य विश्राम करे। इसलिये यद्यपि दिन रात से भिन्न है, फिर भी उनमें कोई असंगति नहीं। अग्नि और जल पर भी यही बात लागू होती है। हर सृजी हुई वस्तु का अपना कार्य है — और अग्नि और जल एक दूसरे के बहुत पूरक हैं; परन्तु यदि हम उन्हें मिला दें, तो वे निश्चय ही टकराएँगे! व्यवस्था और सुसमाचार के विषय में भी यही सच है। जो यह मानते हैं कि हम सुसमाचार के साथ-साथ व्यवस्था से भी धर्मी ठहरते हैं, वे सब कुछ गड्डमड्ड कर रहे हैं; मानो वे आकाश और पृथ्वी को आपस में टकरा रहे हों! संक्षेप में, अग्नि और जल को मिलाना इससे सरल होगा कि हम यह कहें: कि हम परमेश्वर के अनुग्रह का कुछ अंश कमा सकते हैं और फिर भी हमें प्रभु यीशु मसीह की सहायता की आवश्यकता है। यदि हम विचार करें कि व्यवस्था क्या है और क्यों दी गई, तो हम पाएँगे कि सुसमाचार से या विश्वास से उसकी कोई असंगति नहीं, वरन् उनमें पूर्ण सामंजस्य है। इस प्रकार इस आपत्ति का समाधान हो गया। यदि हम कहें कि विश्वास और व्यवस्था दोनों परमेश्वर से आते हैं, तो हम ठीक कहते हैं; परन्तु हमें इस पर विचार करना चाहिए (जैसा हम शीघ्र ही करेंगे) कि परमेश्वर ने आरम्भ में दोनों को क्यों ठहराया।

आओ, पौलुस के शब्दों की ओर लौटें — वह कहता है कि हम केवल प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा ही धर्मी ठहर सकते हैं। जब वह धर्मी ठहराए जाने की बात करता है, तो उसका अर्थ है परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी गिना जाना। इस अभिव्यक्ति को समझना आवश्यक है क्योंकि यह इसी पूरे विषय से सम्बन्ध रखती है कि हम कैसे उद्धार पाते हैं। यदि इस संसार में लम्बा जीवन बिताने के बाद कोई हमसे उद्धार का मार्ग पूछे और हम न जानें कि क्या उत्तर दें, तो हम सचमुच अभागे प्राणी होंगे! बहुत से मूर्खों ने परमेश्वर की रोटी खाई है, पर यह न जाना कि उसे कैसे ग्रहणयोग्य होना है। इसीलिये हमें और भी अधिक ध्यान देना चाहिए कि पौलुस यहाँ हमसे क्या कह रहा है। वह कहता है कि हम धर्मी ठहराए जाते हैं। कैसे? क्या हम पहले ही धर्मी हैं — क्या हम निर्दोष हैं? बिलकुल नहीं, पर परमेश्वर हमें ग्रहण करता है। "धर्मी ठहराया जाना" शब्द हमें उस कृपा की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर हम पर तब करता है जब हम उसकी सन्तान और वह हमारा पिता बन जाता है। आप पूछ सकते हैं कि जब "धर्मी ठहराना" शब्द अनुपयुक्त प्रतीत होता है, तब भी पवित्रशास्त्र इसका प्रयोग क्यों करता है? हम यह भी तो कह सकते थे कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, हम पर तरस खाता है, हमारा पिता और उद्धारकर्ता होना चाहता है — धर्मी ठहराए जाने की बात करने के स्थान पर इन्हीं अभिव्यक्तियों का प्रयोग क्यों नहीं करते? पवित्रशास्त्र बिना उचित कारण के इसका उल्लेख नहीं करता।

यदि हम उद्धार को उसके सबसे मूल अर्थ में खोलकर देखें, तो हम कहेंगे कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से उद्धार पाते हैं। परन्तु इसमें यह ज्ञान शामिल नहीं कि स्वभाव से हमारी दशा कितनी दयनीय है, या जो उपचार हमें लगाना है वह क्या है। क्योंकि प्रभु यीशु मसीह पर भरोसा रखने के लिये हमें यह स्वीकार करना होगा कि आदम के पाप से, और अपने ही अधर्मों से भी, हम पूरी तरह खो गए हैं। हमें यह बात पहले ही अपने आप में जान लेनी चाहिए थी। जब तक हम यह न जानें कि हमें उसके साथ ठीक किए जाने की आवश्यकता है, हम कभी न समझेंगे कि हमारे पाप परमेश्वर की दृष्टि में हमें दोषी ठहराते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि हम केवल इतना कहें कि "हम अनुग्रह और विश्वास से उद्धार पाते हैं," तो हमें परमेश्वर की धार्मिकता का बोध नहीं होगा। क्योंकि परमेश्वर एक बार भी अपने आप का इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें सर्वोच्च न्याय सन्निहित है; वह सर्वथा शुद्ध और सिद्ध है, इसलिये वह बुराई से घृणा करता है। फिर भी हम पूरी तरह भ्रष्ट हैं और हममें केवल दुष्टता ही है; इसलिये यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर को हमसे घृणा करनी ही होगी। परन्तु यदि वह हमसे घृणा करता है, तो हाय हम पर, क्योंकि हम नरक के भागी हैं। इसीलिये परमेश्वर को प्रसन्न करने से पहले हमें धर्मी ठहराया जाना आवश्यक है। इसका अर्थ है कि हम अपने पापों और अपराधों से शुद्ध किए जाएँ; अन्यथा हम परमेश्वर की दया को कभी न समझ सकेंगे (जैसा मैंने कहा है)। यदि हम मानें कि हम पापी हैं, तो हम समझेंगे कि परमेश्वर पाप से घृणा करता है, और फिर भी घृणा करते हुए भी उसने हमें बचाने का एक मार्ग ठहराया है — हमारे पापों को क्षमा करके, और प्रभु यीशु मसीह के लहू के द्वारा, जो हमें आत्मिक शुद्धि देता है, हमें उनसे धोकर शुद्ध करके। परमेश्वर हमें इसलिये धो देता है कि वह हमें ग्रहण करे, ताकि उसके प्रेम में सहभागी होकर हम अपने उद्धार का निश्चय रख सकें। इसीलिये पवित्रशास्त्र "धर्मी ठहराए जाने" शब्द का प्रयोग करता है।

पोप के अनुयायी मूर्ख पशुओं की भाँति इसके अर्थ पर वाद-विवाद करते रहें। वे कहते हैं, "क्या! विश्वास से धर्मी ठहरना? विश्वास मनुष्य को सिद्ध तो नहीं बनाता — फिर वह हमें धर्मी कैसे ठहरा सकता है?" वे नहीं समझते कि पवित्रशास्त्र में जिस धर्मी ठहराए जाने की बात है, उसका अर्थ यह है कि परमेश्वर हमारे पापों को ढाँप देता है (जैसा मैं कहता आया हूँ) और अपने दुःख उठाने और मृत्यु के कारण उन्हें प्रभु यीशु मसीह के नाम में और उसी के द्वारा मिटा देता है। दूसरे चाहे जो कहें, लिखा है कि जब परमेश्वर हमारे पाप क्षमा और मोचन करता है, तब हम उसकी दृष्टि में धर्मी गिने जाते हैं। वास्तव में पौलुस रोमियों के चौथे अध्याय में इसी की चर्चा करता है, जहाँ वह कहता है: "जैसे दाऊद भी उस मनुष्य के धन्य होने का वर्णन करता है, जिसके लिये परमेश्वर बिना कर्मों के धार्मिकता गिनता है, कि धन्य वे हैं जिनके अधर्म क्षमा हुए, और जिनके पाप ढाँपे गए" (रोमियों 4:6-7; भजन संहिता 32:1)। फिर एक और स्थान में वह कहता है, "जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिये पाप ठहराया" (इसका अर्थ है कि उसने हमारे पापों के कारण हम पर आनेवाला सारा दण्ड अपने ऊपर ले लिया), "कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ" (2 कुरिन्थियों 5:21)। इस प्रकार हम, उसके व्यक्तित्व और उसकी देह से जुड़कर और एक होकर, धर्मी गिने जाते हैं, क्योंकि उसकी आज्ञाकारिता इतनी सिद्ध थी कि वह हमारे पापों को शुद्ध करने और मिटाने के लिये पर्याप्त थी। अब हम "धर्मी ठहराए जाने" शब्द के अर्थ पर विचार कर चुके।

अब "विश्वास" की अभिव्यक्ति की ओर ध्यान दें। पौलुस यहाँ कहता है कि उन्होंने यीशु मसीह पर "विश्वास किया"। यदि हम किसी मूर्ख से पूछें कि वह विश्वास किसे समझता है, तो वह शायद कहे "मान लेना", परन्तु स्पष्ट है कि वह दोनों में से किसी शब्द का अर्थ नहीं समझेगा। क्या हम ऐसे मूर्खों के समान अज्ञानी रहकर सन्तुष्ट हैं? पहले यह बता दें कि प्रभु यीशु ही हमारे विश्वास और भरोसे का विषय है। क्या उद्धार विश्वास से है? हाँ, यदि हम प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करें। आइए थोड़ी देर विचार करें कि प्रभु यीशु मसीह को हमारे सामने वह क्यों ठहराया गया है जिस पर हमें अपना सारा विश्वास टिकाना है। केवल इसलिये कि हम उसमें अपने धर्मी ठहराए जाने के लिये जो कुछ चाहिए, वह सब पाते हैं। हम कह चुके हैं कि जब परमेश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है और उन्हें फिर लेखे में नहीं लाता, तब हम उसकी दृष्टि में धर्मी गिने जाते हैं। और यह कैसे होता है, यदि प्रभु यीशु मसीह के उस लहू से नहीं जो हमारी शुद्धि के लिये बहाया गया? अपने दुःखों और मृत्यु के द्वारा उसने हमारे पापों का प्रायश्चित किया और हमारे विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को शान्त किया। हमें परमेश्वर के एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह के किए बलिदान के अतिरिक्त भुगतान का कोई और उपाय नहीं ढूँढना चाहिए। वही परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहलाता है (मत्ती 3:17), ताकि हम उसमें प्रिय ठहरें; वह धर्मी जन कहलाता है (यशायाह 53:11), ताकि हम उसकी धार्मिकता के भागी हों; और वह पवित्र जन कहलाता है (लूका 1:35), ताकि हम उसमें पवित्र किए जाएँ। इसीलिये जब हम "विश्वास" पर विचार करते हैं, तो हमारा ध्यान प्रभु यीशु मसीह की ओर खींचा जाता है।

परन्तु पोप के अनुयायी इस विषय में अपनी ही धारणाएँ बनाते हैं, और अपने कथन से प्रकट करते हैं कि उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि विश्वास करना क्या है। वे कहते हैं, "क्या! क्या मनुष्य केवल विश्वास से धर्मी ठहर सकता है, जबकि दुष्टात्मा भी विश्वास करते हैं?" यह सच है, और याकूब यही तर्क देता है (याकूब 2:20); परन्तु हम यह भी देखते हैं कि वह उन लोगों को धिक्कारता है जो व्यर्थ और हल्केपन से कहते थे कि हम मसीही हैं और हममें विश्वास है, फिर भी कोई फल नहीं दिखाते थे। पोप के अनुयायी और भी दूर भटक गए हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि विश्वास का अर्थ परमेश्वर में विश्वास करना है, और हमारे विश्वास का विषय परमेश्वर है, जबकि विश्वास से उनका अर्थ केवल यह कल्पना करना है कि कहीं कोई परमेश्वर है जिसने जगत को बनाया और अब उसे चलाता है। वे इसी बिन्दु पर अपनी अज्ञानता में सोए पड़े रहते हैं, फिर भी अपने आप को अच्छा मसीही और अच्छा कैथोलिक कहने में नहीं हिचकिचाते, जैसा वे कहते हैं, यद्यपि वे सर्वथा अज्ञानी हैं। इसलिये यदि वे विवेक और समझ से रहित होकर पवित्रशास्त्र में निहित शिक्षा से लड़ते हैं, या अडिग हठ के साथ इस बात का इनकार करते हैं कि मनुष्य केवल विश्वास से उद्धार पाता है, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वे तो यह भी नहीं जानते कि विश्वास क्या है। इसलिये हमें पौलुस के उन शब्दों पर कितना ध्यान देना चाहिए जो हमें बताते हैं कि यदि हम यीशु मसीह की ओर न देखें, तो हम जान ही नहीं सकते कि विश्वास वास्तव में क्या है। उसके बिना हम पापों की क्षमा, परमेश्वर के निकट आने, उस पर भरोसा रखने या उसे पुकारने का मार्ग नहीं जान सकते। न ही हम जानेंगे कि विवेक की शान्ति या अनन्त जीवन की आशा क्या है। यह सब हमारी पहुँच से बाहर है जब तक कि हमारा परिचय यीशु मसीह से न कराया जाए और जब तक हम उसकी ओर न देखें और अपने आप को उस पर न डाल दें। ऐसा विश्वास अनुग्रह लाता है: जब हम पहचानते हैं कि हम दीन प्राणी हैं और परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं, और प्रभु यीशु मसीह में उपचार ढूँढते हैं। हमें यह मानना होगा कि उसने हमें उस श्राप से छुड़ाने के लिये, जिसके अधीन हम जी रहे थे, अपने आप को हमारे लिये अर्पित किया, और उसने हमें अपने लहू से धोया है। अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा उसने हमारे सब अपराध मिटा दिए हैं, ताकि हम निश्चय रख सकें कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करता और अपनाता है। इसी प्रकार हम इस खण्ड को समझ सकते हैं।

यह कह चुकने के बाद कि वह और वे सब यहूदी जो मसीही बन गए थे, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास से उद्धार पा चुके थे, पौलुस आगे जोड़ता है: "इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा।" इसे हम पहले अपने ही जाति-भाइयों के सम्बन्ध में सुन चुके हैं, परन्तु यहाँ वह इसे अधिक सामान्य अर्थ में सारे संसार के लिये घोषित करता है। जब वह "कोई प्राणी नहीं" कहता है, तो मुख्यतः उसका आशय यह है कि उद्धार के मार्ग के विषय में यहूदियों और अन्यजातियों में कोई भेद नहीं। यद्यपि यहूदियों का खतना हुआ था, वे परमेश्वर के निज भाग होने को चुने गए थे और उसके द्वारा पवित्र ठहराए गए थे, तौभी परमेश्वर के निरे अनुग्रह के सिवा उन्हें उद्धार की कोई आशा न थी। देखिए, वे किस प्रकार अन्यजातियों के समान स्तर पर रखे गए हैं, और उनकी स्थिति वही है। पौलुस मनुष्यों के मन में अपने गुणों के विषय में जो भी घमण्ड है, उसे दूर करना चाहता है। वास्तव में हममें से बहुत से लोग अपने आप को इतना बिगड़ा हुआ जानते हैं कि हम अपने आप को कोई आदर नहीं दे सकते, मानो हम परमेश्वर के हाथ से कुछ पाने के योग्य हों। जो मतवाले या लम्पट हैं, या जिन्होंने अपने आप को हर प्रकार की बुराई में सौंप दिया है, वे अपने आप को ऊँचा उठाने, या यह डींग मारने में कि वे अपने पुण्यों या भले कामों से परमेश्वर को अपना उद्धार करने के लिये मना सकते हैं, लज्जा अनुभव करते हैं। वास्तव में वे अपनी नीचता से लज्जित होकर दूसरे लोगों से भी अपने आप को छिपाते हैं। परन्तु हठधर्मी लोग, जो मनुष्यों के सामने अपनी "पवित्रता" का दिखावा करते हैं, इतने कठोर हो गए हैं कि वे अपने आप को यह धोखा देते हैं कि वे स्वर्ग के योग्य हैं — मानो परमेश्वर उनका ऋणी हो! ये कपटी, यद्यपि पूरी तरह बिगड़े हुए हैं और महत्त्वाकांक्षा, लोभ, दुष्टता और ऐसी ही बातों से भरे हैं, अपनी सब चालबाज़ियों और बहानों के कारण मानते हैं कि परमेश्वर को उनके भ्रष्ट आचरण में कुछ बुरा नहीं दिखता, और यहाँ तक कि अपने आप को समझा लेते हैं कि वह उनके पुण्यों के कारण उन्हें ग्रहण करेगा! जो नियमित रूप से मिस्सा में जाते हैं, मदिरालय से भागकर प्रार्थनालय पहुँचते हैं, क्षमा-पत्र खरीदते हैं और ऐसी ही अन्य बातें करते हैं, उपवास और पर्व मनाते हैं — वे व्यर्थ के घमण्ड से फूले रहते हैं और मानते हैं कि परमेश्वर पर उनका कुछ बकाया है। "कोई प्राणी नहीं" कहकर पौलुस घोषित करता है कि यहाँ नीचे एक दूसरे से अपने आप को अलग करना, मानो एक धर्मी हो और दूसरा अधर्मी, व्यर्थ है। हम सबको दीन होना चाहिए और अपने आप को परखना चाहिए, यह जानते हुए कि हमारे सब गुण, यहाँ तक कि हमारे सर्वोत्तम कार्य भी, परमेश्वर की दृष्टि में मैले चीथड़ों के समान हैं। क्योंकि यदि कोई मनुष्य हमारी दृष्टि में पूर्ण धर्मी हो, इसलिये कि उसने कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाई, या इसलिये कि वह हर प्रकार की बुराई का सामना कर सकता था और पवित्र और संयमी था — संक्षेप में, चाहे वह स्वर्गदूत माना जाता हो — फिर भी भीतर भ्रष्टता के सिवा कुछ न होगा। यह कैसे सम्भव है? क्योंकि हमें कभी बाहरी रूप से न्याय नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो कुछ चमकता है वह (कहावत के अनुसार) सोना नहीं होता। हम भीतर देखे बिना यह नहीं जाँच सकते कि क्या पाप है और क्या पुण्य। क्योंकि यदि मनुष्य परमेश्वर को वह नहीं देता जो उसका उचित अधिकार है, तो वह मनुष्यों का नहीं, परमेश्वर का आदर छीन रहा है। इसलिये मनुष्य उसकी चाहे जितनी प्रशंसा और सराहना करें, वह घमण्ड और महत्त्वाकांक्षा से भरा है, और प्रभु यीशु मसीह को जानने के सिवा कोई बात उसे दीन नहीं करेगी।

इसलिये जो धर्म का बाहरी दिखावा अच्छा करते हैं, वे भी परमेश्वर के सामने दोषी ठहराए जाएँगे। अतः पौलुस मनुष्यों को अपने पुण्यों पर भरोसा करने से रोकना चाहता है। परन्तु इससे आगे भी बात है। क्योंकि जब वह "कोई प्राणी नहीं" कहता है, तो वह केवल उन मनुष्यों की ओर संकेत नहीं करता जिन्हें परमेश्वर ने छोड़ दिया है और जो उसके पवित्र आत्मा से नया नहीं किए गए, वरन् विश्वासियों को भी सम्मिलित करता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर का आत्मा हममें तब वास करता है जब वह हमें सुसमाचार के ज्ञान तक पहुँचा चुका और प्रभु यीशु मसीह की देह में हमें कलम की तरह जोड़ चुका हो — यद्यपि, मैं कहता हूँ, परमेश्वर का आत्मा हममें वास करता है, तौभी अपने स्वभाव के कारण हम सब इस शब्द "प्राणी" में सम्मिलित हैं। इसलिये जब पौलुस यहाँ घोषित करता है कि "कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा", तो उसका आशय है कि अविश्वासी आदम में दोषी ठहरे हैं और दोषी बने रहते हैं, और विश्वासी, क्योंकि वे सदा अपूर्ण रहेंगे और उनमें बहुत से दाग और धब्बे हैं, दूसरों के समान ही दोषी ठहरे हैं। वास्तव में यह दण्ड-आज्ञा सामान्य है, क्योंकि जो कोई व्यवस्था के कामों से धर्मी ठहरना चाहता है, वह सदा अपने आप को दोषी पाएगा — हाँ, उस सबसे पवित्र जन को भी जो कभी हुआ हो। आइए अब्राहम को सिद्धता के उदाहरण के रूप में लें, या दाऊद को, जो सब गुणों में भरपूर था, या नूह, अय्यूब और दानिय्येल को, जिन्हें यहेजकेल तीन धर्मी पुरुष कहता है (यहेजकेल 14:14)। वे सब एक ही श्रेणी में आते हैं, अर्थात् ऐसे मनुष्य जो परमेश्वर की दृष्टि में केवल अनुग्रह के द्वारा ही धर्मी ठहर सकते थे।

अब मैं आप सब से पूछता हूँ, हम कहाँ खड़े हैं? जो कहते हैं कि वे अपने पुण्यों से, या अपने "पुण्यदायी कामों" से, जैसा वे उन्हें कहते हैं, धर्मी ठहराए जाएँगे, क्या शैतान ने उन्हें अत्यधिक घमण्ड में नहीं धकेल दिया है? क्योंकि दाऊद, या नूह, या अब्राहम, या दानिय्येल की बराबरी कौन कर सकता है? निश्चय ही वे भी जिन्होंने परमेश्वर की पाठशाला में अच्छी उन्नति की है और जो अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को सौंप देने के सच्चे उत्साह से प्रज्वलित हैं, इस बात के कायल हैं कि वे अब भी उस स्तर से बहुत दूर हैं जो दाऊद, या नूह, या दानिय्येल ने भी पाया! इसे जानकर हम देख सकते हैं कि पवित्र आत्मा यहाँ उन्हें गिरा रहा है जो अपने आप को अत्यधिक ऊँचा उठाते हैं, ताकि हमें कायल करे कि हममें धार्मिकता की बूँद भर भी नहीं है, और हम अपने उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में ढूँढें। अब हम समझते हैं कि यह कथन कि "कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा" क्या अर्थ रखता है। मानो पौलुस कह रहा है कि जहाँ तक हमारे स्वभाव का प्रश्न है, बाहर से जैसा भी दिखाई दे, भीतर से हम केवल बुरे हैं। संसार हमारी बड़ी प्रशंसा और आदर कर सकता है; हम व्यर्थ चापलूसी से घिरे हो सकते हैं; परन्तु जब तक परमेश्वर हममें कार्य करके हमें बदल न दे, हम मैल से भरे हैं। वास्तव में जिन गुणों को मनुष्य ऊँचा ठहराते हैं, वे विनाश की ओर ले जानेवाले और नरक में डुबोनेवाले दोषों से कम नहीं। क्योंकि वे भी जो परमेश्वर के अनुग्रह से नए किए गए हैं और जिन्होंने उसकी आज्ञा मानना सीखा है, उन कामों को करके जिन्हें परमेश्वर चाहता और संजोता है, वे भी परमेश्वर के पास ऐसा कुछ नहीं ला सकते जिससे उसके साथ अपना हिसाब चुका सकें। वे सदा ऋणी रहेंगे क्योंकि उनके पास जितने अच्छे दान हैं, वे सब परमेश्वर से आते हैं; और ऐसे लोग भी पाप और दुर्बलता के कारण भ्रष्ट हैं। इसलिये हमें अपनी धार्मिकता पर से सारा भरोसा उतार देना होगा। क्योंकि हम बड़े से छोटे तक सब दोषी ठहरे हैं। यदि हम व्यवस्था से धर्मी ठहराए जाना चाहें, तो हम बहुत धोखे में हैं — हम उसे कभी न पाएँगे।

अब हम उस बात की सच्चाई कहीं अधिक स्पष्ट देख सकते हैं जो मैं प्रभु यीशु मसीह के विषय में, उन लोगों के लिये शरणस्थान के रूप में कहता आया हूँ जो अपनी आत्मिक आवश्यकता के कायल हैं। इसका अर्थ है कि यीशु मसीह पर विश्वास की एकमात्र सच्ची तैयारी यह है कि हम अपने पापों के सच्चे, जीवित बोध और चेतना से छुए जाएँ। इसीलिये मसीह ने कहा: "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा... और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे" (मत्ती 11:28-29)। अन्यत्र पवित्रशास्त्र स्पष्ट कहता है कि वह इसलिये भेजा गया कि "दीनों को सुसमाचार सुनाए... बन्दियों के लिये स्वतन्त्रता का और जो बँधे हैं उनके लिये बन्दीगृह के खुलने का प्रचार करे" (यशायाह 61:1)। इसलिये जो अपने पापों में आनन्दित रहते हैं, वे कभी प्रभु यीशु मसीह के पास न आएँगे। वे डींग मार सकते हैं कि उनमें विश्वास है, क्योंकि परमेश्वर का उपहास करनेवाले बहुत से लोग इस पवित्र शब्द को अपवित्र करते हैं। हर कोई मसीही समझा जाना चाहता है, और चाहे वे कितने ही बिगड़े हुए हों, कहेंगे कि हम भी किसी दूसरे के समान विश्वास करते हैं। परन्तु जब कोई मनुष्य इस प्रकार बोलता है, तो यही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसमें विश्वास की एक बूँद भी नहीं। जब सच्चे विश्वासी कहते हैं, "मैं विश्वास करता हूँ," तो वे इसे बड़ी निर्बलता में कहते हैं, यह जानते हुए कि यदि परमेश्वर उन पर तरस न खाता, तो जो थोड़ा-सा उनके पास है वह भी उनसे छीन लिया जाता। जो ऊँचे स्वर में डींग मारते हैं कि उनमें पूरा विश्वास है, वे कुत्तों और सूअरों के सिवा कुछ नहीं, जिन्होंने कभी सच्चे धर्म या परमेश्वर के भय का स्वाद नहीं चखा। "विश्वास" शब्द इन कुत्तों के द्वारा सदा लज्जाजनक रीति से अशुद्ध किया जाता रहेगा, जो परमेश्वर का उपहास करने के सिवा कुछ नहीं करते। वे भले और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और इतने मूर्ख हैं कि अपने ही पापों में लोटते हैं। उदाहरण के लिये किसी पियक्कड़ को लीजिए, जो लज्जा की सीमा पार कर चुका है; अत्यधिक पीने के बाद वह अपने नशे की दशा में बना रहना चाहता है। फिर व्यभिचारी, झूठी शपथ खानेवाले, निन्दक और ऐसे ही लोग हैं — ये सब विश्वास का दावा करते हैं; पर फिर भी यह निश्चित है कि वे प्रभु यीशु मसीह से मिलने के लिये तैयार नहीं हैं। क्यों नहीं? क्योंकि वे नहीं समझते कि वे केवल अनुग्रह से ही धर्मी ठहराए जा सकते हैं। परन्तु स्मरण रखें कि इस बात का पूरा कायल होने के लिये कि हम व्यवस्था से धर्मी नहीं ठहर सकते, हमें परमेश्वर को उसके न्याय के सिंहासन पर अपने सामने रखना होगा और हर सुबह और शाम अपने आप को उसके सामने बुलाना होगा, यह जानते हुए कि हमें अपने सारे जीवन का लेखा देना है। और हमें यह भी समझना चाहिए कि यदि परमेश्वर हम पर तरस न खाता और अपनी असीम दया से हमें न उठाता, तो हम सौ हज़ार बार गड्ढे में भेजे जाते। तब हम जानेंगे कि हम व्यवस्था से धर्मी नहीं ठहर सकते, क्योंकि जब-जब हम अपनी तुलना परमेश्वर से करते हैं, हम सब दोषी ठहरते हैं। हमें ऐसा भय होना चाहिए कि जब तक प्रभु यीशु मसीह हमें बचा न ले, हमें चैन न मिले। इसलिये देखिए, बोझ से दबे होना हमारे लिये कितना भला है, अर्थात् अपने पापों से घृणा करना और उनके कारण ऐसी वेदना में होना कि हम अपने आप को मृत्यु की पीड़ाओं से घिरा पाएँ, ताकि हम परमेश्वर को ढूँढें कि वह हमारा बोझ हल्का करे। परन्तु हमें उसे इस ज्ञान के साथ ढूँढना है कि हम उद्धार को, पूरा या आंशिक, तब तक नहीं पा सकते जब तक वह हमें दान के रूप में न दिया जाए। पौलुस यह नहीं कह रहा कि जो कुछ हममें घटता है उसका कुछ भाग हम यीशु मसीह में पा लें और शेष स्वयं पूरा कर लें। वह कहता है कि हम अपने पुण्यों या कामों से नहीं, वरन् केवल विश्वास से धर्मी गिने जा सकते हैं।

इसलिये आओ, समझें कि यीशु मसीह से बाहर किसी प्रकार का उद्धार नहीं, क्योंकि वही विश्वास का आदि और अन्त है, और वही सब में सब है। आओ, हम दीनता में बने रहें, यह जानते हुए कि हम अपने ऊपर दण्ड ही ला सकते हैं; इसलिये हमें उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात परमेश्वर की निरी और सेंत-मेंत की दया में ढूँढनी चाहिए। हमें यह कह सकना चाहिए कि हम विश्वास के द्वारा उद्धार पाते हैं। पिता परमेश्वर ने अपने पुत्र प्रभु यीशु मसीह को ठहराया है कि वह हमारे उद्धार का कर्ता और सिद्ध करनेवाला दोनों हो। हमें अपने आप का इनकार करना है और अपने आप को पूरी तरह और सम्पूर्णता से उसे सौंप देना है, ताकि सारी स्तुति उसी की हो।

अब आओ, अपने महान परमेश्वर की महिमा के सम्मुख गिरें, अपने पापों को मानते हुए, और विनती करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए, ताकि हम उनसे और अधिक घृणा करें और पश्चाताप में बढ़ें (एक ऐसा अनुग्रह जिसका अभ्यास हमें जीवन भर करना चाहिए)। हम उसके अनुग्रह को, जैसा वह प्रभु यीशु मसीह में हम पर प्रकट हुआ है, इस प्रकार बड़ा मानना सीखें कि हम पूरी तरह उसी में लीन हो जाएँ; और हम केवल अपने होंठों से ही नहीं, वरन् अपना सम्पूर्ण भरोसा उस पर रखें। हम उस भरोसे में तब तक बढ़ते जाएँ जब तक हम अपने अनन्त घर में इकट्ठे न कर लिए जाएँ, जहाँ हम विश्वास का प्रतिफल पाएँगे। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब जातियों को भी दे, इत्यादि।

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