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पहले अध्याय पर तीसरा उपदेश - इफिसियों 1:4-6
तीसरा उपदेश
पहले अध्याय पर
परमेश्वर ने हमें मसीह में जगत की उत्पत्ति से पहले चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों; जिसने हमें पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों, अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार, कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसके द्वारा उसने हमें उस प्रिय में ग्रहणयोग्य ठहराया। - इफिसियों 1:4-6
मैंने पहले आपको यह दिखाना आरम्भ किया था कि हमारे लिए यह उचित नहीं कि हम इस बहाने से कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया है, उच्छृंखल जीवन में लिप्त हों, मानो हमें हर प्रकार की बुराई में पड़ जाने की छूट हो, क्योंकि हम नाश नहीं हो सकते, चूँकि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बना लिया है। क्योंकि जिन बातों को उसने जोड़ा है, उन्हें हमें अलग नहीं करना चाहिए। अतः जब उसने हमें इसलिए चुना है कि हम पवित्र हों और शुद्ध जीवन बिताएँ, तो हमारा चुनाव एक ऐसी जड़ के समान होना चाहिए जो अच्छे फल उत्पन्न करती है। क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें हमारी स्वाभाविक दशा में छोड़े रखता है, हम हर प्रकार की दुष्टता के सिवा कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि मनुष्य के स्वभाव में ऐसी भारी भ्रष्टता और विकृति है कि मनुष्य जो कुछ भी करने की सोचते हैं वह सब परमेश्वर की धार्मिकता के विरुद्ध होता है। इसलिए परमेश्वर के द्वारा बदले जाने के सिवा और कोई मार्ग नहीं है। और यह परिवर्तन उसी अनुग्रह के सिवा और कहाँ से आता है जिसकी हमने चर्चा की, अर्थात् इससे कि उसने हमारे संसार में जन्म लेने से पहले ही हमें अपनी सन्तान होने के लिए चुन लिया और ठहरा दिया।
फिर भी हमें यह और जान लेना चाहिए कि परमेश्वर अपने चुने हुओं को कुछ समय के लिए ऐसा जाने देता है कि वे भटके हुए और बिलकुल खोए हुए-से दिखाई देते हैं, तौभी जब उसे भाता है तब वह उन्हें अपने झुण्ड में वापस ले आता है। और इससे वे और अधिक दीन होते हैं और उसकी भलाई और दया सारे संसार पर और अच्छी तरह प्रकट होती है। यदि परमेश्वर अपने सब चुने हुओं को उनके बचपन से ही सिद्ध आचरण वाला बना देता, तो यह इतना स्पष्ट न दिखता कि ऐसा आचरण उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से होता है। परन्तु जब अभागे लोग, जो उच्छृंखल जीवन बिताते थे और कुछ समय तक हर प्रकार की बुराई में पड़े रहे, बदल जाते हैं, तो यह परमेश्वर के कार्य करने और अपना हाथ बढ़ाने के बिना नहीं हो सकता। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने चुने हुओं की बुलाहट में जो देर करता है, उसका कारण (मैं कहता हूँ) यह है कि वह उन्हें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा जीवन दे, कि वह उन्हें अपनी आज्ञाकारिता में चलाए। क्योंकि जब हम उन्हें मनुष्यों की सामान्य आशा और धारणा से परे अचानक सुधरते देखते हैं, तो इससे हम जान लेते हैं कि परमेश्वर ने उनमें अपनी सामर्थ्य प्रकट की है, जैसा कि मैंने पहले कहा। और फिर दूसरी ओर, हम में से हर एक अनुभव से इस बात का कायल है कि जो कुछ भलाई हम में है उसके लिए हम परमेश्वर के ऋणी हैं। क्योंकि जब हम स्वभाव से किसी बुराई की ओर झुके हों और बाद में वह सुधर जाए, तो हम भली-भाँति समझ लेते हैं कि परमेश्वर ने हम पर दया की दृष्टि की है।
तो हम देखते हैं कि हमारे पास और भी अधिक दीन होने का कारण है, क्योंकि जब तक उसने हमें उससे निकाल न लिया, हम विनाश के मार्ग पर थे। और इस बात को भली-भाँति ध्यान में रखना हमारे लिए आवश्यक है, क्योंकि कुछ कल्पनाशील लोग ऐसा मानते हैं कि परमेश्वर अपने चुने हुओं को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा ऐसे चलाता है कि वे पहले ही से, संसार में जन्म लेने के समय से, अपनी माँ के गर्भ से निकलते ही, पवित्र किए हुए होते हैं। परन्तु इसके विपरीत प्रकट होता है, और वास्तव में हम देखते हैं कि सन्त पौलुस एक और स्थान पर विश्वासियों से बात करते हुए कहता है, 'तुम में से कुछ लोग लोभ में डूबे हुए थे, कुछ क्रूरता में लगे थे, कुछ ठट्ठा करनेवाले थे, कुछ व्यभिचारी और उच्छृंखल जीवन जीनेवाले थे और कुछ पेटू और पियक्कड़ थे; और संक्षेप में तुम सब प्रकार की अशुद्धता से भरे थे; परन्तु परमेश्वर ने तुम्हें बदलकर और ऐसी गन्दगी और संक्रमण से शुद्ध करके अपने लिए समर्पित कर लिया है।' [1 कुरिन्थियों 6:10—11]। फिर वह रोमियों से कहता है, 'तुम्हें उस जीवन पर लज्जित होना चाहिए जो तुम उस समय बिताते थे जब तक परमेश्वर ने तुम्हें अपनी ओर नहीं खींचा।' इसलिए जब इस अंश में कहा गया है कि परमेश्वर ने अपने सेवकों को इसलिए चुना कि वे पवित्र जीवन में चलें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह उन्हें उनके बचपन ही से अपने पवित्र आत्मा के द्वारा चलाने के लिए बँधा हुआ है। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) अनुभव दिखाता है कि जब तक उन्हें बुलाने का उचित समय न आ जाए, वह उन्हें भटकने देता है।
परन्तु फिर भी हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर का हमें चुनना इसलिए था कि हमें पवित्र जीवन के लिए बुलाए। क्योंकि यदि वह हमें अब भी अभागे त्यागे हुओं की दशा में छोड़ देता, तो निश्चय ही हम अपने भीतर की भ्रष्टता के अनुसार हर प्रकार की दुष्टता के सिवा कुछ न कर सकते। अतः जो भलाई है, वह उसकी उस मुफ़्त दया से आती है जो उसने हमारे जन्म से पहले, वरन् जगत की सृष्टि से पहले ही हम पर प्रकट की। इस प्रकार हम वास्तव में देखते हैं कि हमें इस अंश से क्या सीखना है। और इस प्रकार उन लोगों की निन्दाएँ दबा दी जाती हैं जो परमेश्वर की स्तुति को धुँधला करना चाहते हैं, अर्थात् उनकी जो परमेश्वर के मुफ़्त चुनाव और भली रीति से जीने के प्रयत्न के बीच मानो एक संघर्ष और तलाक़ खड़ा कर देते हैं। वे कहते हैं, 'सचमुच? क्या परमेश्वर ने हमें चुन लिया है? तो फिर हम में से हर एक जो चाहे वह करे, क्योंकि हम नाश नहीं हो सकते! और इससे क्या अन्तर पड़ता है कि हम भला करें या बुरा, जब हमारा उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह पर आधारित है, हम में किसी गुण पर नहीं?'
इसका उत्तर सरल है, अर्थात् यदि परमेश्वर का चुनाव न होता, तो हम में जितने विचार और अभिलाषाएँ पाई जाएँ, ठीक उतने ही सब धार्मिकता के विरुद्ध विद्रोह होते। क्योंकि हम सब बुराई की ओर प्रवृत्त हैं, और हम केवल उसकी ओर झुके ही नहीं हैं, वरन् मानो उसके लिए उबल रहे हैं। हम उसकी ओर उन्मत्त वेग से दौड़ते हैं, क्योंकि शैतान उन सब पर अधिकार रखता है जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा सुधारे नहीं गए। इसलिए हमें अवश्य यह निष्कर्ष निकालना होगा कि हमारा भलाई करने में लग जाना इस कारण है कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें उसकी ओर चलाता और ले जाता है, और यह सब उसके चुनाव के कारण है। इसलिए (जैसा मैंने पहले कहा) जिन बातों को परमेश्वर ने जोड़ा है, उन्हें हमें अलग नहीं करना चाहिए। क्योंकि हम इसलिए नहीं चुने गए कि स्वेच्छाचार में पड़ जाएँ, वरन् इसलिए कि अपने कामों से दिखाएँ कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिए गोद लिया है और अपनी रखवाली में ले लिया है, कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में वास करे और हमें धार्मिकता की सब सिद्धता में अपने साथ एक कर ले।
इसके अतिरिक्त, हम यह भी ध्यान में रखें कि यद्यपि परमेश्वर ने हमें सुधारा है और हमें भले मार्ग पर लगाया है और हमें यह अनुभव कराया है कि वह हम में पहले ही कार्य कर चुका है कि हमें अपने वचन के अधीन करे और हम से सब बातों में आज्ञाकारिता से अपनी सेवा करवाए, तौभी इससे यह नहीं निकलता कि हम पहले ही दिन पूरी तरह सुधर जाते हैं, वरन् अपने सारे जीवनकाल में भी नहीं। सन्त पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर अपने चुने हुए और विश्वासी लोगों को सिद्धता की पूर्णता तक पहुँचा देता है, परन्तु यह कि वह उन्हें उसकी ओर खींचता है, और इसलिए हम अपनी मृत्यु तक केवल उस ओर के मार्ग में ही हैं। अतः जब तक हम इस संसार में जीवित हैं, हम सीखें कि उन्नति करें और अधिकाधिक आगे बढ़ें, और निश्चित रहें कि हम में अब भी सदा बहुत कुछ दोषपूर्ण है। क्योंकि जो लोग किसी सिद्धता की कल्पना करते हैं, वे कपट और घमण्ड के द्वारा मानो मोहित हो गए हैं, अथवा उनमें परमेश्वर की कोई अनुभूति या भय नहीं है, वरन् वे बहुत बढ़े हुए ठट्ठा करनेवाले हैं। क्योंकि जो अपने आप को जाँचता है, वह सदा अपने में दोषों का ऐसा भण्डार पाएगा कि यदि वह गम्भीरता से उन पर विचार करे तो उनसे लज्जित होगा।
इसलिए जो लोग कहते हैं कि इस नश्वर देह में रहते हुए हम किसी सिद्धता तक पहुँच सकते हैं, वे स्पष्ट दिखा देते हैं कि या तो वे शैतानी घमण्ड से बिलकुल अन्धे हो गए हैं, या वे ऐसे अधर्मी लोग हैं जो सब धर्म और भक्ति से रहित हैं। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम ध्यान दें (जो मैं पहले छू चुका हूँ) कि परमेश्वर ने हमें इसलिए चुना कि हम निर्दोष हों, परन्तु हम तब तक ऐसे नहीं हो सकते जब तक हम अपनी सब निर्बलताओं से पूरी तरह छूट न जाएँ और पाप के उस बन्दीगृह से निकल न जाएँ जिसमें हम अब जकड़े हुए हैं। [रोमियों 7:24] और इसलिए जब हम अपने में कोई दोष अनुभव करें, तो उनके विरुद्ध साहस से लड़ें, और इस कारण निराश न हों कि मानो हम परमेश्वर की सन्तान नहीं हैं, क्योंकि हम अभी उसके सामने निष्कलंक नहीं हुए हैं, और हमारे पाप, जो हमें दोषी ठहराते हैं, सदा हमारी आँखों के सामने रहते हैं।
इसलिए चाहे हम अपने में हमें मार्ग से हटा देनेवाले कितने ही दुःख क्यों न पाएँ, तौभी हम आगे बढ़ते जाएँ, और अपने को निश्चय दिलाते रहें कि जब तक हम यहाँ इस नीचे के संसार में जीवित हैं, हमें अपनी यात्रा पूरी करनी है। हमें सदा आगे बढ़ते रहना है और हम अभी मार्ग के अन्त तक नहीं पहुँचे हैं। देखिए, विश्वासियों को सिद्ध न होने पर भी किस प्रकार हियाव बाँधना और अपने को दृढ़ करना चाहिए; और यही बात हमें भी उस बोझ के नीचे कराहने और आहें भरने पर विवश करे जिसे हम अनुभव करने को बाध्य हैं। क्योंकि विश्वासियों और परमेश्वर की सन्तान की सिद्धता यह है कि वे अपनी निर्बलता को स्वीकार करें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह न केवल उनके सब अपराधों को सुधारे, वरन् अपनी असीम भलाई में उन्हें सहता भी रहे और उनसे अत्यन्त कठोरता से लेखा न माँगे। तो आप देखते हैं कि हमारा शरणस्थान और सहायता परमेश्वर की दया है जिससे वह हमारे सब पापों को ढाँपता और गाड़ देता है, क्योंकि हम अब तक उस लक्ष्य तक नहीं पहुँचे जिसके लिए वह हमें बुलाता है, अर्थात् पवित्र और निष्कलंक जीवन तक। परन्तु जो भी हो, हम फिर भी आगे बढ़ते जाएँ और भली-भाँति चौकस रहें कि हम सही मार्ग से बहकाए न जाएँ।
यदि यह शब्द 'प्रेम' मनुष्यों के विषय में है, तो सन्त पौलुस का अभिप्राय यह बताना था कि मसीहियों की सच्ची धार्मिकता क्या है, अर्थात् विश्वासयोग्यता और खराई में चलना। क्योंकि हम जानते हैं कि कपटी लोग सदा रीति-रिवाजों और तथाकथित धूमधाम से परमेश्वर को मनाना चाहते हैं; और फिर भी उनमें से कुछ लूट-पाट के कामों में लगे हैं, कुछ डाह, द्वेष, क्रूरता और विश्वासघात से भरे हैं; कुछ पियक्कड़ हैं और अन्य व्यभिचारी और उच्छृंखल जीवन जीनेवाले हैं जो सब प्रकार की दुष्टता को खुली छूट देते हैं। तौभी इस सब के होते हुए वे सोचते हैं कि यदि वे कुछ पवित्र-सा रूप धारण कर लें [agios (Fr.) अर्थात् धर्मात्मा-सा दिखावा] और इन रीतियों के द्वारा पवित्रता का कुछ दिखावा करें तो सब कुशल है। ऐसी सब बकवास का अन्त करने के लिए सन्त पौलुस कहता है कि यदि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो, तो हमें प्रेम में चलना चाहिए (जो सिद्धता का बन्धन और व्यवस्था की पूर्ति है)। और इस प्रकार आप देखते हैं कि हमें इस अंश से क्या सीखना है।
इसके अतिरिक्त, हम ध्यान दें कि इस स्थान पर सन्त पौलुस हमें उपदेश देता है कि जो कुछ गुण और भलाई हम में है, उसके लिए हम अपने को परमेश्वर का ऋणी मानें। उदाहरण के लिए, यदि हम में कोई भली धुन है, यदि हम अपने ही दोषों से लड़ते हैं, या परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलते हैं, तो यह कैसे होता है? इसी स्रोत से, कि उसने ऐसा ठहराया, अर्थात् परमेश्वर ने हमें पहले से चुन लिया। तो हम विचार करें कि इसकी स्तुति उसी की है, और हम उसे उसके अधिकार से वंचित न करें। क्योंकि यदि हम स्वर्गदूतों के समान सिद्ध रीति से भी जीवन बिताएँ, फिर भी यदि हम इतने मूर्ख हों कि सोचें कि ऐसा जीवन हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपने ही प्रयत्न से आता है, तो हम सबसे मुख्य बात चूक जाते हैं। क्योंकि हमारे सब भले कामों का और क्या प्रयोजन है सिवाय इसके कि परमेश्वर की महिमा हो? और यदि हम अपने आप को उनका कर्ता मानें, तो हम देखते हैं कि इससे वे बिगड़ जाते हैं और दोषों में बदल जाते हैं, यहाँ तक कि महत्त्वाकांक्षा के सिवा और कुछ नहीं रहते। तो हम देखते हैं कि इस वाक्य में सन्त पौलुस का लक्ष्य यह है कि हमें सदा परमेश्वर के मुफ़्त चुनाव की ओर लौटा लाए, कि हम जान लें कि सारी भलाई उसी स्रोत से निकलती है।
वह तुरन्त जोड़ता है कि 'हम यीशु मसीह के द्वारा अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार लेपालकपन के लिए पहले से ठहराए गए हैं।' जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें लेपालकपन के लिए पहले से ठहराया, तो यह दिखाने के लिए है कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं तो यह स्वभाव से नहीं वरन् उसके शुद्ध अनुग्रह से है। अब यह शुद्ध अनुग्रह किसी ऐसी बात के कारण नहीं जो परमेश्वर ने हम में पहले से देखी (जैसा मैंने पहले बताया), वरन् इसलिए है कि उसने हमें पहले से चिह्नित किया और ऐसे लेपालकपन के लिए ठहराया, और ऐसी रीति से कि इसका कारण उसके अपने सिवा और कहीं ढूँढ़ा न जाए। और यही कारण है कि सन्त पौलुस जोड़ता है कि उसने यह 'अपने में और अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार' किया। वह वही बात भी दोहराता है जो मैंने पहले समझाई थी, अर्थात् कि सब कुछ यीशु मसीह में किया गया। तो आप देखते हैं कि इस अंश में हमें यही ध्यान में रखना है कि हमें परमेश्वर की सन्तान बनानेवाला और कोई कारण नहीं, केवल उसका अपने में हमें चुन लेना है। क्योंकि हमें यह पद जन्म या मीरास से नहीं मिला, और न यह मांस और लहू से आता है, जैसा यूहन्ना के पहले अध्याय में कहा गया है, यहाँ तक कि वह सब कुछ जो हमारे अपने आप में ढूँढ़ा जा सकता है, बहिष्कृत और बिलकुल मिटा दिया गया है। और यह हमें दिखाने के लिए है कि यदि मनुष्य अपनी पहली दशा में छोड़ दिए जाएँ, तो उनकी परमेश्वर से कोई सहभागिता नहीं, वरन् वे उसके राज्य से बिलकुल कटे हुए हैं।
यह सच है कि हमारा पिता आदम परमेश्वर के स्वरूप में सृजा गया [उत्पत्ति 1:26] और वह अपनी पहली दशा में उत्तम था, परन्तु पाप के आने के बाद हम सब बिलकुल असहाय हो गए, यहाँ तक कि स्वयं आदम में भी अपने में कोई बल न रहा, और उसकी जो स्वतंत्र इच्छा उसे दी गई थी वह उसे और अधिक निरुत्तर बनाने के सिवा और किसी काम न आई। क्योंकि वह अपनी इच्छा से और अपनी ही दुष्टता से गिरा। परन्तु इससे हम देखते हैं कि उसमें किस प्रकार की स्थिरता थी, क्योंकि अत्यन्त सावधानी से रचा जाकर [grand' peine (Fr.)] वह गिर गया, और अपना और अपने साथ हमारा भी नाश कर बैठा। अब हम सब क्रोध की सन्तान और परमेश्वर के श्रापित होकर जन्म लेते हैं। [इफिसियों 2:3]
और इसलिए जब तक हम अपनी पहली दशा और स्थिति में बने रहते हैं, हम में अनन्त मृत्यु के सिवा कुछ नहीं। इसलिए परमेश्वर को हमें मुफ़्त में अपने पास बुलाना पड़ा, क्योंकि क्या हम ऐसी ऊँची बुलाहट मोल ले सकते हैं? उसे मोल लेने के लिए सोना या चाँदी कहाँ है? इतने बड़े और उत्कृष्ट विशेषाधिकार के बदले परमेश्वर को देने के लिए गुण कहाँ हैं? संक्षेप में, (जैसा इस विषय पर पहले कहा जा चुका है) यह न मांस से आता है, न लहू से, अर्थात् यह किसी ऐसी बात से नहीं आता जो हम इस संसार में पा सकें, वरन् केवल परमेश्वर के लेपालकपन से। [यूहन्ना 1:13] क्योंकि जो शब्द सन्त पौलुस प्रयोग करता है उसका अर्थ यह है कि परमेश्वर हमें सन्तान ठहराता है। जब कोई मनुष्य किसी बालक को गोद लेता है तो उसे अपना वारिस होने के लिए चुनता है, और जो कुछ उसके पास है वह सब बाद में उसी पद के अधीन उसे दिया जाता है। हमारा भी यही हाल है जो स्वर्गीय जीवन के वारिस हैं, क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिए गोद लिया और चुन लिया। और आगे, सन्त पौलुस परमेश्वर के अनुग्रह को इतना बढ़ा चुकने से ही सन्तुष्ट नहीं, वरन् वह यह भी कहता है कि परमेश्वर ने हमें पहले से ठहराया भी है और यह बात पहले से निश्चित कर दी है।
तो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस वह सब कुछ एक साथ इकट्ठा कर देता है जो उन मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को कुचल सके जो हम परमेश्वर के सामने कुछ लाने की, या उसके योग्य ठहरने के लिए अपने आप को उसकी ओर बढ़ाने की मन में बैठा सकते हैं। इसलिए सब कुछ शून्य कर देना चाहिए ताकि इस विषय में केवल परमेश्वर का अनुग्रह ही स्वीकार किया जाए। और यही कारण है कि वह 'यीशु मसीह के द्वारा' को दोहराता है। तो यदि पूछा जाए कि हम परमेश्वर की सन्तान होने के लिए क्यों और कैसे पहले से ठहराए गए हैं, तो यह इसलिए कि उसे भाया कि हमें मसीह में देखे। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह मानो वह बही है जिसमें हम जीवन और उद्धार की मीरास पाने के लिए लिखे गए हैं। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने हमारे दुःखों पर तरस खाया था, तौभी यदि यीशु मसीह उसके सामने न आता तो हम सदा उसकी दृष्टि में मानो घृणित ही रहते, क्योंकि हम सब आदम से उत्पन्न होकर एक ही माप के हैं, सब के सब समान और बराबर। अब कुछ लोग ठुकराए हुए गिने जाते हैं: और यह इसके सिवा और क्यों है कि परमेश्वर उन्हें उनके अपने आप में देखकर उन्हें छोड़ देता है। परन्तु वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह में चुनता है और हमें वहाँ ऐसे देखता है जैसे किसी ऐसे दर्पण में जो उसे भाता है। और इस प्रकार आप देखते हैं कि अन्तर कैसे आता है। तौभी, बात को और भी अच्छी तरह कहने के लिए, वह कहता है कि परमेश्वर का हमें चुनना 'अपने में' था। यह सच है कि परमेश्वर सब भलाई आप ही करता है, परन्तु यहाँ सन्त पौलुस वह दिखाना चाहता था जो परमेश्वर के सब साधारण कामों में नहीं दिखता, अर्थात् कि हमें चुनने के लिए उसे अपनी इच्छा के सिवा किसी और कारण ने प्रेरित नहीं किया। इसलिए जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें अपने में चुना, तो सन्त पौलुस सब पक्षपात को दूर कर देता है। यदि उसने हम में कोई पुण्य या योग्यता पाई होती, यदि उसने कोई प्रवृत्ति या भलाई या गुण पाया होता, या (संक्षेप में) यदि उसने कोई एक बूँद भी ऐसी पाई होती जो उसे भाती और जिसे वह स्वीकार करता, तो उसने हमें अपने में न चुना होता, वरन् हमारी भी उसके साथ कुछ साझेदारी होती।
तो चूँकि सन्त पौलुस हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातों को परमेश्वर की युक्ति में बन्द कर देता है, और कहता है कि हमारा चुनाव भी उसी अभिप्राय में बन्द है, तो मानो वह यह कह रहा है कि जब मनुष्य यह समझ बैठते हैं कि वे कुछ मूल्य रखते हैं, या उन्होंने ऐसे अनुग्रह को पाने के लिए अपने आप को आगे बढ़ाया या तैयार किया है, तो वे अपने आप को बुरी तरह धोखा देते हैं। इसलिए यदि हम यह जानना चाहें कि हमारा उद्धार किस पर आधारित है और उसका सच्चा मूल और आरम्भ और उसका सर्वोपरि और एकमात्र कारण क्या है, तो हमें ऊँचे उठाए जाना होगा। और इस प्रकार आप देखते हैं कि इस कथन का क्या अर्थ है कि परमेश्वर ने यह अपने में किया।
परन्तु सन्त पौलुस इससे भी आगे जोड़ता है, 'अपनी ही इच्छा की सुमति के अनुसार'। यदि वह केवल 'इच्छा' शब्द ही लिखता, तो वह पर्याप्त होता, जैसा हम पहले देख और कह चुके हैं, कि सन्त पौलुस परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चुना गया था। और कैसे? क्योंकि वह न तो ऐसे पद के योग्य था न उसके लायक, सिवाय इसके कि परमेश्वर को उसे चुनना भाया। इसलिए सन्त पौलुस इस पर घमण्ड नहीं करता कि उसने प्रेरिताई पाई, वरन् पूरी नम्रता से उसे परमेश्वर का मुफ़्त दान मानता है। इस प्रकार आप देखते हैं कि 'इच्छा' शब्द का क्या अर्थ है, किसी एक ही स्थान में नहीं वरन् सारे पवित्रशास्त्र में। इसलिए जब कभी परमेश्वर की इच्छा का उल्लेख होता है, तो यह दिखाने के लिए है कि मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं बढ़ा सकते। तौभी सन्त पौलुस यहाँ अधिकता का एक शब्द रखता है और कहता है, 'सुमति के अनुसार'; मानो वह कह रहा हो, 'यह सच है कि परमेश्वर की इच्छा हमारे उद्धार का कारण है; हमें उसके लिए और कारण या साधन ढूँढ़ते हुए इधर-उधर भटकना नहीं चाहिए। तौभी, चूँकि मनुष्य ऐसे कृतघ्न और दुष्ट हैं कि वे परमेश्वर की महिमा को सदा धुँधला करते रहेंगे, और अपने लिए उससे अधिक लेते रहेंगे जितना उनका है, इसलिए यदि वे परमेश्वर की इच्छा से पूरी तरह आश्वस्त न हों, तो वे समझ लें कि यह उसकी इच्छा की सुमति से आता है, अर्थात् ऐसी स्वतंत्र इच्छा से जो अपने सिवा किसी और बात पर निर्भर नहीं करती, न इधर या उधर कोई पक्षपात रखती है, वरन् हमें मुफ़्त में इसलिए चुनने की कृपा करती है कि ऐसा करना उसे भाता है।'
अब हम देखते हैं कि जो लोग हमारे विषय में परमेश्वर के चुनाव का कारण स्थापित करना चाहते हैं, वे (यदि उनके हाथ में होता) उसकी अनन्त युक्ति को उलट देते, क्योंकि एक दूसरे से अलग नहीं हो सकता। यदि परमेश्वर ने हमें चुना है, जैसा यहाँ दिखाया गया है, तो कुछ भी हमारे योग्य कामों पर या उस किसी बात पर जो हम आगे रख सकें निर्भर नहीं हो सकता, वरन् परमेश्वर ने यह अपनी ही स्वतंत्र इच्छा के अनुसार किया और अपनी भली इच्छा के सिवा कोई और कारण नहीं पाया। यदि किसी को यह अनोखा लगे, तो इसका कारण यह है कि वे परमेश्वर से अत्यधिक घनिष्ठता का व्यवहार करना चाहते हैं। [comme un petit compagnon (Fr.)] और इसी में उनका शैतानी दुस्साहस दिखता है कि वे परमेश्वर को शुद्ध स्वतंत्रता में राज्य करने नहीं दे सकते कि जो उसे भाता है वह बिना विरोध के भला, न्यायसंगत और उचित माना जाए। परन्तु ऐसे लोग चाहे जितना कुत्तों की तरह भौंकें, तौभी यह आज्ञा अटल है जो पवित्र आत्मा ने यहाँ सन्त पौलुस के मुँह से कही है, अर्थात् कि हमारे चुनाव का परमेश्वर की भली इच्छा से आगे कोई और कारण खोजना हमारा काम नहीं, अर्थात् उसकी उस अपनी स्वतंत्र इच्छा से आगे जिससे उसने हमें चुना, यद्यपि हम योग्य न थे। ऐसा करने में उसका एकमात्र उद्देश्य इन शब्दों में है, 'ऐसा मुझे भाया'। और इस प्रकार हम वास्तव में देखते हैं कि सन्त पौलुस के इन शब्दों से हमें क्या ग्रहण करना है।
अब सन्त पौलुस तुरन्त कहता है कि यह 'उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति के लिए' है। यहाँ वह वह अन्तिम कारण दिखाता है जिसने परमेश्वर को हमें चुनने के लिए प्रेरित किया, अर्थात् कि इससे उसके अनुग्रह की स्तुति हो, हाँ, साधारण और मामूली रीति से नहीं, वरन् एक विशेष महिमा के साथ। क्योंकि उसने उन दोनों बातों को इसलिए साथ जोड़ा कि जब हम देखें कि परमेश्वर ने हमें नरक की तह से कैसे निकाला कि हमारे लिए अपने राज्य का द्वार खोले और हमें उद्धार की मीरास के लिए बुलाए, तो हम मोहित हो जाएँ। यहाँ हम फिर वही बात देखते हैं जिसकी मैंने पहले चर्चा की थी, अर्थात् कि जो सब परमेश्वर की पूर्वनियति को मिटा देना चाहते हैं या उसकी चर्चा सुनने से कतराते हैं, वे इससे अपने आप को परमेश्वर की स्तुति के प्राणघातक शत्रु प्रकट करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे वह जाती रहती और मिट जाती है। हाँ, परन्तु इसका योग्य न्यायी कौन है? क्या वे अपने आप को उस परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान समझते हैं जिसने उनके दावे के बिलकुल विपरीत कहा है? हाय (वे कहते हैं), यह तो बहुत मनुष्यों का मुँह परमेश्वर की निन्दा करने के लिए खोलने का मार्ग होगा। अब रही दुष्टों की बात, तो निश्चित है कि उन्हें सदा निन्दा करने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा, और उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता। परन्तु इस सब के होते हुए भी परमेश्वर के पास अपने आप को निर्दोष ठहराने के लिए पर्याप्त होगा, [रोमियों 3:4] और जो सब उसे और उसकी धार्मिकता को ललकारते हैं वे लज्जित किए जाएँगे। [भजन संहिता 51:4]
जो भी हो, यहाँ यह बिना कारण नहीं कहा गया कि परमेश्वर की उचित रीति से महिमा होती है और उसकी ऊँची स्तुति बनी रहती है, जब हम स्वीकार करते हैं कि उसने जिसे चाहा उसे मुफ़्त में चुन लिया, और मनुष्य और मनुष्य के बीच अन्तर का और कोई कारण नहीं है, ताकि जिन्हें उसने ठुकराया वे इसलिए नाश हों कि वे उसके योग्य हैं, और जिन्हें वह उद्धार के लिए बुलाता है वे उसका कारण इस मुफ़्त लेपालकपन के सिवा और कहीं न खोजें।
इसके अतिरिक्त, इन दो शब्दों से सन्त पौलुस हमें परमेश्वर की स्तुति करने में और अधिक उत्साह और जोश के लिए उभारना भी चाहता था। क्योंकि हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं कि हम ठण्डे मन से मान लें कि हमारा उद्धार परमेश्वर की शुद्ध स्वतंत्रता से उपजा है, वरन् हमें मानो ऐसा उत्तेजित होना चाहिए कि हम अपने आप को पूरी तरह उसकी स्तुति में लगा दें, मानो हम पूरी रीति से उसी के लिए समर्पित हों, जैसा सन्त पतरस दिखाता है कि चूँकि हम मृत्यु के अन्धकार से निकाले गए हैं, इसलिए हमारे पास परमेश्वर की अवर्णनीय स्तुतियों का वर्णन करने का भरपूर कारण है। [1 पतरस 2:9] और इससे वह हमें समझाता है कि जब विश्वासी परमेश्वर की भलाई की स्तुति करने में अपना कर्तव्य निभाने के लिए पूरा ज़ोर लगा चुके हों, तब भी वे उसे कभी पूरी रीति से पूरा न कर सकेंगे, क्योंकि वह अथाह बात है। [लूका 17:10] इसलिए भली-भाँति ध्यान दीजिए कि हमें क्या स्मरण रखना है। और इसलिए, इस भलाई या अनुग्रह से जिसकी वह बात करता है, हमें सीखना चाहिए कि मनुष्य परमेश्वर को उसकी यथोचित महिमा तब तक कभी न देंगे जब तक वे बिलकुल शून्य न कर दिए जाएँ, यहाँ तक कि उनमें एक बूँद भी न बचे जिस पर वे घमण्ड कर सकें। मान लीजिए कि परमेश्वर के चुनाव का विचार कभी किया ही न गया होता, तो क्या इसलिए उसकी स्तुति बन्द हो जाती? नहीं! नहीं! क्योंकि वह तो उसकी स्तुति का केवल एक अंश है। क्योंकि यदि मनुष्य इससे अधिक कुछ न कहें कि परमेश्वर अपना सूर्य उन पर चमकाता है, तो वह भी उसकी स्तुति करने का कारण होता। [मत्ती 5:45] और जब हम आँखें खोलकर ऊपर और नीचे उन आश्चर्यकर्मों को देखते हैं जो वह हमें दिखाता है, तो सचमुच जीवन भर उसकी स्तुति में लगे रहने का पर्याप्त कारण है। फिर जब हमें उसका सुसमाचार सुनाया जाता है, तब भी उसके चुनाव का कोई उल्लेख न होने पर भी हमारे पास उसकी स्तुति करने का कारण है। मैं कहता हूँ कि हमारी ओर से तो पर्याप्त है, परन्तु तब उसे उसकी मुख्य स्तुति से वंचित किया जाता और हम उसे उसके योग्य अंश का केवल एक भाग देते। और क्यों? क्योंकि विश्वासी सोचते कि उन्होंने विश्वास अपनी ही प्रेरणा और स्वतंत्र इच्छा से पाया। मैंने आपको पहले बताया कि विश्वास चुनाव का फल है। क्योंकि हम में और अविश्वासियों में इसके सिवा और कोई अन्तर नहीं कि जब हम उससे पीठ फेरे हुए थे और अपने को उससे अजनबी बना रहे थे, तब परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाया और गुप्त रीति से हमें अपनी ओर खींच लिया। [रोमियों 5:10] संक्षेप में, सन्त पौलुस का यहाँ यह कहना बिना कारण नहीं कि परमेश्वर की स्तुति की उतनी महिमा कभी न होगी जितनी होनी चाहिए जब तक हम उसके चुनाव को उन सब लाभों का कारण न मानें जो वह हमें देता है, और यदि उसने अपनी अनन्त युक्ति के अनुसार अपनी असीम दया से हमें गोद न लिया होता, तो हम उस स्तुति का एक भाग अपने लिए ले लेते जो उसी की है। और इस प्रकार परमेश्वर उतना ही अपने अधिकार से घटा और वंचित किया जाता। संक्षेप में, हम भली-भाँति देखते हैं कि यहाँ क्या कहा गया है, कि मनुष्य बिलकुल दीन किए जाने चाहिए ताकि परमेश्वर को उसका अधिकार मिले और कोई मनुष्य उसका सहभागी न बनाया जाए, वरन् सब मनुष्य मान लें कि वही हमारे उद्धार का आरम्भ भी है और सिद्धि भी।
हमें यह भी ध्यानपूर्वक देखना चाहिए कि सन्त पौलुस कैसे जोड़ता है कि 'उसने अपने अनुग्रह से हमें उस प्रिय में ग्रहणयोग्य ठहराया'। इससे वह और भी स्पष्ट कर देता है कि हमारा उद्धार परमेश्वर के केवल चुनाव और मुफ़्त अनुग्रह पर क्यों आधारित है। क्योंकि मनुष्य अपनी मूर्खतापूर्ण धृष्टता तब तक न छोड़ेंगे जब तक वे इस प्रकार परास्त न हों कि उनके पास पलटकर उत्तर देने को एक शब्द भी न रहे। इसलिए सन्त पौलुस हमें ऐसी समझ पर लाने के लिए बताता है कि हम अपने आप में दोषी और खोए हुए हैं। अब जब ऐसा वज्र हमारे सिर पर गिरता है, तो अपनी ढिठाई दिखाना हमारे लिए उचित नहीं। यदि फिर भी मनुष्य इतने मूर्ख हों कि अब भी चारों ओर खोजते फिरें कि अकेले परमेश्वर के अनुग्रह से अलग उनके अपने लिए कुछ रखा या बचाया हुआ हो, तो उन्हें उससे फेरने के लिए इतना ही कथन काफ़ी है, कि जब तक हम यीशु मसीह में न थे तब तक हम परमेश्वर की कृपादृष्टि में न थे, क्योंकि हम अपने आप में बिलकुल दोषी और श्रापित हैं। यह बात पहले ही पर्याप्त रूप से समझाई जा चुकी होती, यदि हम उस बात को समझने में इतने मन्द न होते जो इतनी आवश्यक है और जो हमारे लिए स्पष्ट होनी चाहिए। और सच तो यह है कि अनुभव भी हमें इस विषय में सिखा दे। और वास्तव में, यदि कपट हमें बहुत अन्धा न कर देता, तो हम भली-भाँति देख लेते कि हम में दुष्टता के सिवा कुछ नहीं, और परमेश्वर का क्रोध हमें ऐसे भय से मारता कि हम हक्के-बक्के रह जाते। परन्तु परमेश्वर को हमें बलवन्त हाथ से आज्ञाकारिता के लिए विवश करना पड़ता है, नहीं तो हमारे मन में यह नहीं आता कि सारी स्तुति अपने से छोड़कर उसे दे दें। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि इस कथन का क्या अर्थ है जिसमें कहा गया है कि हम यीशु मसीह में कृपापात्र ठहराए गए, क्योंकि वही प्रिय है। और यीशु मसीह परमेश्वर का प्रिय क्यों कहलाता है, जैसा उसे मत्ती के सत्रहवें अध्याय [पद 5] में और अन्य स्थानों में कहा गया है, और भविष्यद्वक्ता यशायाह में भी दिखाया गया है? [यशायाह 43:4] इससे हमें दिखाया जाता है कि जब तक हम अपनी स्वाभाविक दशा में बने रहते हैं, परमेश्वर उचित रीति से हम से घृणा और अरुचि रखता है।
क्योंकि यदि वह उपाधि यीशु मसीह की विशेषता न होती, तो यह वचन व्यर्थ कहा गया होता, 'यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं प्रसन्न हूँ।' [लूका 3:22] परन्तु यदि यह यीशु मसीह की विशेषता है, तो कोई और सृष्टि इस पर दावा नहीं कर सकती, यहाँ तक कि यद्यपि परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों से प्रेम करता है, तौभी वे यीशु मसीह के द्वारा ही उसके प्रेम के सिद्ध पात्र हो सकते हैं। और जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, वहाँ वास्तव में एक और बात पर ध्यान देना है। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हम घृणित हैं, और यीशु मसीह वह मध्यस्थ है जो स्वर्गदूतों को परमेश्वर के साथ पूर्ण मेल में रखता है, यहाँ तक कि यदि वह उन्हें थामे न रहता तो उनमें कोई दृढ़ता या स्थिरता न होती। [कुलुस्सियों 1:17—20] और इसके सिवा, उनकी धार्मिकता तब तक सिद्ध न होती जब तक वे उसमें धन्य और चुने हुए न होते। एक बात तो यह हुई।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, चूँकि हम पाप के कारण परमेश्वर से दूर हो गए हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें अपने शत्रु मानना और हमारा विरोधी होना पड़ता है। इसलिए मनुष्यों में यीशु मसीह ही एकमात्र प्रिय है, और हम बाकी सब से परमेश्वर घृणा करता और नाता तोड़ लेता है, यहाँ तक कि यह कहता है कि उसे मनुष्य को बनाने का पछतावा हुआ; [उत्पत्ति 6:7] उसके इस वचन का अर्थ यह है कि हम गधों, कुत्तों और अन्य पशुओं में गिने जाने के योग्य भी नहीं। क्योंकि वे अब भी परमेश्वर की सृष्टि हैं और उसी दशा में हैं जिसमें उसने उन्हें रचा, परन्तु हम ऐसे अभागे और हठीले हैं कि हम काट डाले जाने के योग्य हैं और इस योग्य कि हमारा स्मरण परमेश्वर के सामने श्रापित और घृणित हो। अब हम घमण्ड और डींग मारते जाएँ, और अपने को कुलीन ठहराने के लिए अपने कुलचिह्न ढूँढ़ते रहें, क्योंकि हम देखते हैं कि पवित्र आत्मा उन सब को कैसे नीचा करता है जो अपने आप को कुछ समझते हैं। इसलिए हम विचार करें कि यदि हम परमेश्वर के शत्रु हैं, तो हम उस दशा से भी बुरी दशा में हैं जैसे यदि हम कभी रचे ही न गए होते।
परन्तु इस स्थान पर सन्त पौलुस हमें बताता है कि 'परमेश्वर ने हमें उस प्रिय में ग्रहणयोग्य ठहराया'। तो चूँकि हमारे प्रभु यीशु मसीह को परमेश्वर पिता ने प्रिय होने के लिए ग्रहण किया है, केवल अपने व्यक्तित्व में ही नहीं वरन् उस प्रेम के कारण भी जो उसकी देह के सब अंगों पर फैलाया जाता है, इस रीति से हम फिर इकट्ठे किए जाते हैं और परमेश्वर हमें अपनी सन्तान जानकर गले लगाता है, जबकि पहले हम उसके शत्रु और उसके लिए बिलकुल घृणित थे। परन्तु जो भी हो, हमें सदा उसी चुनाव की ओर लौटना चाहिए जिसकी हम पहले बात कर चुके हैं। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें जो अनुग्रह दिए जाते हैं वे भी उसी स्रोत से निकलते हैं।
इसके बाद, जिस विषय को मैं पहले छू चुका हूँ उसे जारी रखते हुए, वह हमें दिखाता है कि यीशु मसीह में प्रिय ठहरना हमारे लिए कितना आवश्यक है। क्योंकि यदि हम (परमेश्वर की ओर से) कायल न किए जाते, तो हम कभी न मानते (मेरा अर्थ है निष्कपट रीति से) कि हम परमेश्वर के ऋणी हैं। क्योंकि हम सदा किसी न किसी रीति से अपने आप को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, और हम में से हर एक यह ढूँढ़ता है कि वह अपने लिए कुछ बचाकर रखे चाहे वह एक पिन की नोक के बराबर ही क्यों न हो।
परन्तु इसके विपरीत, सन्त पौलुस हमें दिखाता है कि परमेश्वर को सचमुच हम से हमारे अपने आप से अलग प्रेम करना होगा, और यदि हम उसे भाते हैं तो यह हमारे अपने कारण नहीं होना चाहिए। और क्यों? क्योंकि हम पाप के बन्दी और दास हैं। हम शैतान के जूए और अत्याचार के नीचे दबे हैं। संक्षेप में, जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारा छुटकारा न हो, हम मृत्यु की दासता में बन्द हैं। अब हम देखते हैं कि इस शिक्षा का सार यह है कि मनुष्यों को चिताया जाता है कि वे अपने आप से बाहर निकलें और अपने उद्धार को परमेश्वर की शुद्ध भलाई में खोजें, अर्थात् उस साधन को अपनाकर जो हमारे सामने यहाँ रखा गया है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह की शरण लेना। क्योंकि दो बुरी अति हैं जिनसे हमें सावधान रहना है। एक यह कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आते हुए हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि हम में कोई योग्यता है जिसके कारण वह हमें अपने लाभों का भागी बनाए। [मत्ती 8:8] और इस दोष को कैसे सुधारा जाए? परमेश्वर के मुफ़्त चुनाव तक पहुँचाए जाने से ही। क्योंकि मनुष्य जो अपनी स्वतंत्र इच्छा पर इतना भरोसा करते हैं, और वही आधार भी जिस पर वे अपने पुण्य और योग्यता के विषय में अपनी धारणा बनाते हैं, यह है कि वे नहीं जानते कि वे किसी और बात में कुछ नहीं हैं सिवाय इसके कि परमेश्वर ने उन्हें अपनी शुद्ध भलाई और अनुग्रह से ग्रहण किया, क्योंकि उसने उन्हें अपनी अनन्त युक्ति में पहले ही चुन लिया था।
इसलिए हम उद्धार का आरम्भ परमेश्वर को किसी रीति से नहीं दे सकते, जब तक हम वह स्वीकार न करें जो यहाँ हमें दिखाया गया है, अर्थात् कि जब उसने हमें गोद लिया तब हम बिलकुल दोषी और श्रापित थे, और हमें गोद लेने का मूल यह है कि उसने जगत की सृष्टि से भी पहले हमें पहले से ठहरा दिया था। एक बात के रूप में इसे ध्यान में रखिए।
दूसरी बुरी अति जिससे हमें भली-भाँति सावधान रहना है, वह अटकलबाज़ी है। बहुत से कल्पनाशील लोग कहते हैं, 'अरे! मुझे तो कभी पता नहीं चलेगा कि परमेश्वर ने मुझे चुना है या नहीं, और इसलिए मुझे अब भी अपने विनाश में ही पड़े रहना होगा'। हाँ, परन्तु यह यीशु मसीह के पास न आने के कारण है। हम कैसे जानते हैं कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया? यीशु मसीह पर विश्वास करने से। मैंने पहले कहा था कि विश्वास चुनाव से निकलता है और उसका फल है, जिससे प्रकट होता है कि जड़ भीतर छिपी है। इसलिए जो कोई विश्वास करता है, उससे वह निश्चय पाता है कि परमेश्वर ने उसमें कार्य किया है, और विश्वास मानो वह प्रतिलिपि है जो परमेश्वर हमें हमारे लेपालकपन के मूल लेख की देता है। परमेश्वर की अपनी अनन्त युक्ति है, और वह मुख्य और मूल अभिलेख सदा अपने ही पास रखता है जिसकी प्रति वह हमें विश्वास के द्वारा देता है।
मैं यहाँ मनुष्यों की रीति पर बोल रहा हूँ, क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारे नाम लिखने के लिए न कागज़ का प्रयोग करता है न चर्मपत्र का, और मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि ठीक बोलें तो वह बही जिसमें हम लिखे गए हैं हमारे प्रभु यीशु मसीह हैं। तौभी परमेश्वर हमारे चुनाव का ज्ञान अपने पास रखता है, जैसे कोई राजा मुख्य और मूल बही को रखता है। परन्तु फिर भी वह हमें उसकी पर्याप्त प्रामाणिक प्रतियाँ या पत्र देता है, क्योंकि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में यह अंकित करता है कि हम उसकी सन्तान हैं।
तो आप देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में जो विश्वास हमें है वही हमें अपने चुनाव का निश्चय दिलाने के लिए काफ़ी है, और इसलिए हम और क्या माँगें? मैंने आपको बताया कि यीशु मसीह वह दर्पण है जिसमें परमेश्वर हमें तब देखता है जब वह हमें अपने लिए ग्रहणयोग्य पाना चाहता है। उसी प्रकार हमारी ओर से, वह वह दर्पण है जिस पर हमें अपनी आँखें लगाकर देखना चाहिए, जब हम अपने चुनाव का ज्ञान पाना चाहते हैं। क्योंकि जो कोई यीशु मसीह पर विश्वास करता है वह परमेश्वर की सन्तान है और परिणामस्वरूप उसका वारिस, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। [यूहन्ना 1:12; 1 यूहन्ना 5:1] इससे निष्कर्ष निकलता है कि यदि हम में विश्वास है, तो हम गोद भी लिए गए हैं। क्योंकि परमेश्वर हमें विश्वास क्यों देता है? इसीलिए कि उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया। इसलिए यह एक अटल क्रम है कि जहाँ तक विश्वासी परमेश्वर का अनुग्रह ग्रहण करते हैं और उसकी दया को अपनाते हैं, और यीशु मसीह को अपना सिर मानकर उसके मार्ग से उद्धार पाते हैं, वे निश्चय जानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें गोद ले लिया है।
यह सच है कि चुनाव अपने आप में गुप्त है। वह ऐसी गहरी और छिपी हुई युक्ति है कि हम केवल उस पर चकित ही हो सकते हैं। तौभी, इस सब के होते हुए, परमेश्वर उसे हमें उतना दिखाता है जितना आवश्यक है और जितना वह जानता है कि हमारे लाभ और उद्धार के लिए है। और वह यह तब करता है जब वह हमें सुसमाचार के विश्वास से प्रकाशित करता है। इस प्रकार आप देखते हैं कि सन्त पौलुस परमेश्वर के अनन्त चुनाव की बात कहने के बाद यीशु मसीह को उस व्यक्ति के रूप में क्यों प्रस्तुत करता है जिसकी शरण हमें इसका निश्चय पाने के लिए लेनी चाहिए कि परमेश्वर हम से प्रेम करता है और हमें अपनी सन्तान जानता है, और परिणामस्वरूप कि उसने हमें अपने जानने से पहले, वरन् जगत की सृष्टि से पहले ही गोद ले लिया था।
इसके अतिरिक्त, हमें इस अंश से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि पूर्वनियति की शिक्षा हमें उटपटाँग अटकलों में बहा ले जाने के लिए नहीं, वरन् हम में सब घमण्ड को और अपनी योग्यता और पुण्य के विषय में उस मूर्खतापूर्ण धारणा को जो हम सदा बना लेते हैं, चूर करने के लिए है, और यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर को हम पर ऐसी स्वतंत्र शक्ति, अधिकार और सर्वोपरि प्रभुता प्राप्त है कि वह जिसे चाहे ठुकराए और जिसे चाहे चुने; और इस प्रकार इस साधन से हम उसकी महिमा करने की ओर और आगे यह मानने की ओर ले जाए जाते हैं कि उसने हमें यीशु मसीह में चुना है, ताकि हम उसके सुसमाचार के विश्वास के अधीन दृढ़ता से थामे रहें। क्योंकि यदि हम उसके अंग हैं और उसे अपना सिर मानते हैं — क्योंकि उसने हमारे साथ एक पवित्र मेल जोड़ा है जो जब तक हम उसके सुसमाचार पर विश्वास करते हैं कभी टूट नहीं सकता — तो हमें अपने उद्धार का निश्चय पाने के लिए उसी के पास आना होगा। क्योंकि हम अनुभव से देखते और अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने हमें गोद लिया और चुना है और अब वह हमें बुलाता है और हम से कहता है कि जो निश्चय उसने हमें दिया है और प्रतिदिन अपने सुसमाचार के द्वारा देता है, अर्थात् कि वह हमारा पिता होगा, और विशेष रूप से उसका उसे अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में अंकित करना, कोई छलावा नहीं है। क्योंकि सुसमाचार सब मनुष्यों को, यहाँ तक कि ठुकराए हुओं को भी, सुनाया जा सकता है, परन्तु इस सब के होते हुए भी परमेश्वर उन पर यह विशेष अनुग्रह नहीं बढ़ाता कि उन्हें जिलाकर जीवन दे।
इसलिए जब हमारा लेपालकपन हमारे हृदयों में अंकित हो जाता है, तब (जैसा आगे और बताया जाएगा) हमारे पास एक भली और अटल गारंटी है कि परमेश्वर अन्त तक हमारी अगुवाई करेगा, और चूँकि उसने हमें उद्धार के मार्ग में चलाना आरम्भ किया है, वह हमें उस सिद्धता तक पहुँचाएगा जिसके लिए वह हमें बुलाता है, क्योंकि सच तो यह है कि उसके बिना हम एक दिन भी टिके नहीं रह सकते।
और अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को स्वीकार करते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिकाधिक समझाए, ताकि उनसे बिलकुल लज्जित होकर हम अपने दोषों से और अपने जीवन से, जहाँ-जहाँ वह बुरा और हठीला है, घृणा करें, और उसी की शरण लें जो अकेला उपाय दे सकता है, और उससे इधर या उधर न हटें, क्योंकि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में अपने आप को हम पर प्रकट करता है। आइए हम सीधे उसी की ओर बढ़ते रहें, यह मानते हुए कि हम उसी में चुने गए हैं, यह भी विश्वास करते हुए कि हम उसी के कारण थामे और बचाए रखे जाते हैं और कि वह हम में अपनी सामर्थ्य अधिकाधिक प्रकट करेगा जब तक हम अपनी दौड़ पूरी करके उस स्वर्गीय मीरास तक न पहुँच जाएँ जिसकी ओर हम जा रहे हैं; उससे विनती करते हुए कि यद्यपि हम अभी उससे बहुत दूर हैं, तौभी वह हमें ऐसा स्थिर और अजेय बल देने की कृपा करे कि हम तब तक लगातार टिके रहें जब तक हम संसार का पूरी तरह त्याग न कर दें। और अपने आप में पूरी तरह दीन होकर, आइए हम यह खोजें कि हम परमेश्वर के स्वरूप में ऐसे नए किए जाएँ कि वह हम में सिद्ध रीति से चमके, जब तक हम उस महिमामय अमरता के भागी न बना दिए जाएँ जिसे उसने हमारे लिए इतने मूल्य से मोल लिया है; और यह भी कि वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे।
