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हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर चौथा उपदेश - मत्ती 26:67-27:10
तब उन्होंने उसके मुँह पर थूका और उसे घूँसे मारे; और दूसरों ने थप्पड़ मारकर कहा, हे मसीह, हमें भविष्यद्वाणी करके बता, किस ने तुझे मारा? पतरस बाहर आँगन में बैठा हुआ था; और एक दासी ने उसके पास आकर कहा, तू भी यीशु गलीली के साथ था। उसने सब के सामने इन्कार किया, और कहा, मैं नहीं जानता तू क्या कह रही है। जब वह बाहर डेवढ़ी में गया, तो दूसरी दासी ने उसे देखकर उनसे जो वहाँ थे कहा, यह भी उस यीशु नासरी के साथ था। उसने शपथ खाकर फिर इन्कार किया कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता। थोड़ी देर बाद जो वहाँ खड़े थे उन्होंने पतरस के पास आकर कहा, सचमुच तू भी उन में से एक है, क्योंकि तेरी बोली तेरा भेद खोल देती है। तब वह धिक्कार देने और शपथ खाने लगा कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता। और तुरन्त मुर्गे ने बाँग दी। तब पतरस को यीशु की वह बात स्मरण आई जो उसने कही थी, कि मुर्गे के बाँग देने से पहले तू तीन बार मेरा इन्कार करेगा। और वह बाहर जाकर फूट फूटकर रोया। जब भोर हुई तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के विरोध में सम्मति की कि उसे मरवा डालें। और उन्होंने उसे बाँधा और ले जाकर पुन्तियुस पीलातुस हाकिम के हाथ सौंप दिया। जब उसके पकड़वानेवाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है, तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया, और कहा, मैं ने निर्दोष को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है। उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान। तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी। और महायाजकों ने उन सिक्कों को लेकर कहा, इन्हें भण्डार में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लहू का दाम है। सो उन्होंने सम्मति करके उन सिक्कों से कुम्हार का खेत परदेशियों के गाड़ने के लिये मोल लिया। इस कारण आज तक वह खेत लहू का खेत कहलाता है। तब जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था वह पूरा हुआ, कि उन्होंने वे तीस चाँदी के सिक्के, अर्थात् उस ठहराए हुए मूल्य को, जिसे इस्राएल की सन्तान में से कितनों ने ठहराया था, ले लिया; और जैसा प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी वैसे ही उन्हें कुम्हार के खेत के लिये दे दिया। - मत्ती 26:67-27:10
जैसा सन्त पौलुस कहता है कि सुसमाचार का प्रचार उनके लिये जिन्हें परमेश्वर उद्धार के लिये बुलाता है जीवन की सुगन्ध है, और उन सब त्यागे हुओं के लिये जो नाश होते हैं मृत्यु की गन्ध है, वैसे ही हमारे सामने यहाँ दो उल्लेखनीय उदाहरण रखे गए हैं, जो दिखाते हैं कि परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग एक के लिये उद्धार का कारण बना और दूसरे को दण्ड-दशा में धकेल गया। क्योंकि पतरस के गिरने में यह दिखाई देता है कि जिस गड्ढे में वह फँसा था उससे निकाले जाने की उसे कितनी आवश्यकता थी। जब तक वह वहाँ था, वह स्वर्ग के राज्य से निकाला हुआ था, उद्धार की सारी आशा से पराया था, और सड़े हुए अंग के समान कलीसिया से कटा हुआ था। तौभी हमारे प्रभु यीशु की मृत्यु उसे लाभ पहुँचाने से न चूकी, यद्यपि वह उसके योग्य न रहा हो। जहाँ तक यहूदा का सम्बन्ध है, कहा गया है कि यीशु मसीह को दोषी ठहराया गया देखकर वह निराशा से भर गया। अब हमारे प्रभु यीशु की इस दोषसिद्धि में (जैसा हम कह चुके हैं) हमें परमेश्वर पर आशा रखने का साहस करना चाहिए। क्योंकि इसी कारण कि हमारा प्रभु यीशु दोषी ठहराया गया, हम निर्दोष ठहराए जाते हैं। परन्तु यह आवश्यक था कि हमारे सामने ये दो दर्पण हों, ताकि हम और भी अच्छी तरह जान सकें कि जब तक हम विशेष अनुग्रह से परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग के फल में भागी होने के लिये बुलाए न जाएँ, तब तक वह हमारे किसी काम की नहीं। इसलिये यही पर्याप्त नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दुःख उठाया, परन्तु जो भलाई उसने हमारे लिये प्राप्त की उसका हमें दिया जाना और हमें उसका अधिकारी बनाया जाना आवश्यक है। यह तब होता है जब हम विश्वास के द्वारा उसकी ओर खींचे जाते हैं।
परन्तु यह सब और अच्छी तरह समझने के लिये आओ, हम उस वृत्तान्त के सूत्र का अनुसरण करें जो यहाँ हमें सुनाया गया है। कहा गया है कि हमारे प्रभु यीशु के साथ कैफा के घर में हर प्रकार की लज्जाजनक व्यवहार किया गया, कि उन्होंने उसके मुँह पर थूका, कि उसे “भविष्यद्वक्ता” कहकर उसका अपमान और उपहास किया गया, वरन् अनादर किया गया। यह इसलिये हुआ कि हम जानें कि उसने अपनी देह में जो कुछ सहा वह हमें परमेश्वर के सामने और उसके स्वर्गदूतों के सामने छुड़ाने के लिये था। क्योंकि हमारे मुँह पर थूकने की कोई आवश्यकता नहीं कि हम परमेश्वर के सामने अनेक दाग और कलंक लिये हुए हों। हम सब अपने पापों से केवल कुरूप ही नहीं, वरन् सड़ाहट से भरे और घृणित हैं। फिर भी यहाँ परमेश्वर का पुत्र है, जो उसकी जीवित प्रतिमा है, जिसमें उसकी महिमा और प्रताप चमकता है, उसने ऐसी लज्जाएँ सहीं, कि अब हम उसके नाम से परमेश्वर के सामने आकर अनुग्रह पा सकें, और वह हमें जाने और अपनी सन्तान करके अपनाए, और हमारे सब दाग और कलंक धो दिए जाएँ। यही (मैं कहता हूँ) हमें सबसे पहले विचार करना है।
अब हम पतरस के गिरने पर आते हैं। कहा गया है, “एक दासी ने उसे देखकर उस पर दोष लगाया कि वह यीशु का चेला है। वह इन्कार करता है।” दूसरी दासी फिर आती है। वह फिर इन्कार करता है। तब और लोग उस पर दबाव डालते हैं और बहुत बात बढ़ाते हैं। तब वह शपथ खाने लगता है, वरन् धिक्कार देने और शाप की रीति काम में लाने लगता है। मानो वह कहता, “यदि मैं उसे जानता होऊँ तो मैं शापित ठहरूँ, मैं नाश हो जाऊँ, पृथ्वी मुझे निगल जाए।” देखो, यह सन्त पतरस का गिरना है, और एक नहीं, वरन् तीन बार, जो इतने भारी और इतने भयंकर हैं कि इस वृत्तान्त को पढ़कर हमें अवश्य भयभीत होना चाहिए। अब हम उस उत्साह को जानते हैं जो उसमें था। फिर उसकी हमारे प्रभु यीशु मसीह ने प्रशंसा की थी, और उसका नाम पतरस इसलिये रखा गया था कि उसके विश्वास की दृढ़ता और स्थिरता प्रकट हो; उसे ऐसी उत्तम पाठशाला में शिक्षा मिली थी। उसने यह शिक्षा सुनी थी: “जो कोई मनुष्यों के सामने मेरा इन्कार करेगा, उसका मैं भी अपने पिता परमेश्वर के सामने इन्कार करूँगा, कि उसे अपना न कहूँ।” तौभी हम देखते हैं कि वह कैसे ठोकर खाता है। इसलिये हर एक को यहाँ अवश्य थरथराने का कारण मिलना चाहिए। क्योंकि यदि हम ऊपर से सम्भाले न जाएँ, तो पतरस की निर्बलता हमारी निर्बलता से अधिक न थी। सो पहली बात हम यह देखते हैं कि जैसे ही परमेश्वर अपना हाथ छोड़ देता है, मनुष्य कैसे निर्बल हैं। क्योंकि यह किसी ठट्ठा करनेवाले, किसी अपवित्र मनुष्य, किसी ऐसे जन के विषय में नहीं कहा जा रहा जिसने सुसमाचार का एक कण भी कभी नहीं सुना था, जिसमें परमेश्वर का भय न था, और जिसने हमारे प्रभु यीशु मसीह का कोई आदर नहीं किया था। बात इसके बिलकुल विपरीत है। क्योंकि पतरस में पहले ही कुछ उत्कृष्ट वरदान थे। परमेश्वर के पुत्र के मुँह से उससे कहा गया था, “मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने ये बातें तुझ पर प्रकट की हैं।” इसलिये यह परमेश्वर का आत्मा है जो पतरस में वास करता है। फिर भी वह हमारे प्रभु यीशु का इन्कार करने से कितना कम रोक सका! एक दासी! यदि कोई पुरुष उस पर चढ़ आता, या कोई सम्मानित व्यक्ति उस पर चढ़ आता, तो कोई बहाना हो सकता था। परन्तु हम देखते हैं कि उसे जीवन और उद्धार की आशा छुड़वाने के लिये केवल एक दासी ही बहुत थी।
इसलिये आओ, हम पतरस के व्यक्तित्व में यह विचार करें कि परमेश्वर का हमें हर क्षण दृढ़ करते रहना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि अन्यथा स्थिर बने रहना असम्भव है। यद्यपि हमने परमेश्वर के निकट आने का यत्न किया हो, और बहुत से सद्गुण के काम किए हों, तौभी हाथ के तनिक से फिरने पर हम पूरी तरह बदल जाएँगे, जब तक परमेश्वर हमें अजेय स्थिरता देता न रहे। इसलिये आओ, हम सन्त पौलुस की चेतावनी पर चलना सीखें, “जो समझता है, मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।” यह सच है कि हम अपने आप को थामे नहीं रख सकते। परन्तु आओ, हम उसकी शरण लें जिसके पास साधन है। तौभी आओ, हम पूरी दीनता से चलें। जैसा सन्त पौलुस दूसरे स्थान में कहता है।
“क्योंकि परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा
से तुम्हारे मन में इच्छा और काम,
दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है, इसलिये चौकस रहो
(वह कहता है) कि डरते और काँपते हुए अपने उद्धार
का कार्य पूरा करते जाओ।” (फिलिप्पियों 2:13, 12ब।)
मानो वह कहता है कि सब घमण्ड अवश्य ही चूर किया जाना चाहिए, और सब उदासीनता भी। जब हम देखते हैं कि हमें परमेश्वर की सहायता की कितनी आवश्यकता है, और कितने प्रकार से, तो क्या उचित नहीं कि हम चौकस रहें, वरन् अपनी शक्ति पर तनिक भी भरोसा न रखें, परन्तु सन्ध्या और भोर परमेश्वर को पुकारने के लिये तत्पर रहें, और अपने आप को उसकी रखवाली और अगुवाई में सौंप दें?
तो यही वह बात है जो हमें सबसे पहले देखनी है। यह मान लेना भी हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है कि परीक्षाएँ, चाहे वे बड़ी न हों, शीघ्र ही हमें दबोच लेंगी, जब तक परमेश्वर अपने अनुग्रह से उसमें कार्य न करे और उसका उपाय न करे। और जो अपने आप को सबसे साहसी समझते हैं, वे जब तक प्रहारों से दूर हैं, तब तक तो ठीक है, परन्तु थोड़ी सी भी हवा चले तो अपने आप को मानो खोया हुआ पाते हैं। यह सच है कि यदि परमेश्वर हमारी सहायता करे, तो चाहे कितनी ही बड़ी आँधियाँ उठें, हम स्थिर बने रहेंगे। क्योंकि हम उस दृष्टान्त को जानते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दिया: कि जो घर अच्छी नींव पर और अच्छी सामग्री से बना हो, वह बड़ी बाढ़ आने पर भी सदा साबुत रहता है; परन्तु जो रेत पर बना है वह शीघ्र ही ढह जाता है। सो जब हम अपने परमेश्वर पर आधारित होंगे और वह हम पर अपना सामर्थी हाथ बढ़ाएगा, तब हम निश्चय ही बड़े और अति कठोर आतंकों को सह सकेंगे। परन्तु चाहे कोई शत्रु हमसे न भी लड़े, तौभी जब परमेश्वर हमसे अलग हो जाएगा या हमारा हाथ छोड़ देगा तब हम तुरन्त हार जाएँगे, जैसा हम पतरस में देखते हैं।
परन्तु इससे भी बुरी बात यह है कि उसने प्रभु यीशु का इन्कार केवल एक ही बार नहीं किया। वरन् जितनी बार उससे पूछा गया उतनी बार उसने उसे दोहराया। हम देखते हैं कि उसे इस बात की तनिक भी चिन्ता न थी कि वह बुरे से और बुरे की ओर बढ़ता जा रहा है, यहाँ तक कि वह धिक्कार भी जोड़ देता है, मानो परमेश्वर से माँग रहा हो कि वह उसे शाप दे और निगल जाए। जब हम यह देखें, तो जान लें कि जो गिर पड़ा है, वह शीघ्र उठाए जाने की इच्छा करने के बदले अपने आप को और भी गहरे विनाश में डुबोता जाएगा, जब तक वह उसमें पूरी तरह नाश न हो जाए, यदि परमेश्वर उपाय न करे। मनुष्यों की यही दशा है। आरम्भ से वे अपने आप को विश्वास दिला लेते हैं कि वे अपने सामर्थ्य में आश्चर्य हैं। तौभी हमारा प्रभु अनुभव से दिखाता है कि वह कुछ भी नहीं है, और केवल थोड़ी सी हवा चलती है और वे गिरा दिए जाते हैं। फिर भी उन्हें विश्वास है कि वे फिर खड़े हो सकते हैं। परन्तु इसके विपरीत वे केवल अपनी बुराई बढ़ाते हैं, दोष पर दोष जोड़ते हैं, और भी अधिक उलटे-सीधे कामों से उमड़ते जाते हैं। यदि सन्त पतरस की दिन में सौ बार परीक्षा होती, तो वह यीशु मसीह का सौ बार इन्कार करता, और इसके अतिरिक्त हज़ार बार। यदि परमेश्वर उस पर दया न करता तो वह वहीं पहुँचता। परन्तु उसने उसे बचा लिया, और उसे और आगे परखना न चाहा। फिर भी यहाँ उल्लिखित तीन बार का गिरना एक भयानक उदाहरण दिखाने के लिये पर्याप्त है, और यह देखकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए कि तीसरी बार पतरस अपने आप को ऐसा भूल गया और पशु के समान ऐसा बुद्धिहीन हो गया कि अपने उद्धार का इन्कार कर बैठा। इसके अतिरिक्त हमें सदा यह देखना चाहिए कि यदि उस पर और परीक्षाएँ भी आतीं, तो वह उनका भी इससे अच्छा सामना न कर पाता और गहरे से गहरे गड्ढों में डाल दिया जाता, जब तक परमेश्वर उसे इतना न बचाए रखता।
तो इस शिक्षा से हमें इसी प्रकार लाभ उठाना है। अब हम ये बातें इसलिये नहीं सुनते कि पतरस पर दोष लगाएँ और उसकी कायरता को दोषी ठहराएँ। निश्चय हम इसे न्यायपूर्वक कर भी नहीं सकते, परन्तु यदि सबसे पहले शिक्षा पाना आवश्यक है, तो आओ हम अपनी निर्बलता को जानें, यह भी जानें कि हम कुछ भी नहीं कर सकते, और अभिमान से फूल न जाएँ, मूर्खतापूर्ण विचार से अपने में कोई गुण मान न लें। फिर भी हम यह भी जानें कि शैतान के पास हमारे विनाश का षड्यन्त्र रचने के इतने साधन हैं, कि वह शीघ्र ही हमारा अन्त कर देता, क्योंकि सन्त पतरस बिना किसी दिखावे के गिर गया। फिर अन्त में हम यह जानें कि हमारा प्रभु यीशु हम पर तरस खाता है, जब वह हमें असीम रीति से परखे जाने नहीं देता। क्योंकि यह निश्चय है कि सदा इतनी अधिक बुराई प्रकट होती, और उसका कोई अन्त न होता, यदि हम उसकी भलाई से रोके न जाते। ये सब बातें हैं जो हमें यहाँ देखनी हैं।
तौभी कहा गया है, “पतरस ने मुर्गे की बाँग सुनकर (जैसा सन्त लूका बताता है) और यीशु मसीह के उसकी ओर देखने के बाद, बाहर जाकर फूट फूटकर रोया।” इस समाप्ति से हमें (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) दिखाया जाता है कि हमारे प्रभु यीशु की मृत्यु और दुःखभोग ने अपना प्रभाव और सामर्थ्य पहले ही दिखा दिया, क्योंकि पतरस ऐसे भयानक पतन से उठाया गया। क्योंकि क्या यह आश्चर्यकर्म नहीं कि परमेश्वर ने उस पर तरस खाया और ऐसा घृणित अपराध करने के बाद भी उसने दया पाई? हम कह चुके हैं कि उसके पास अज्ञानता का बहाना न था, मानो यीशु मसीह का इन्कार करने का उसका दोष छोटा हो। क्योंकि उससे कहा और घोषित किया गया था कि यदि वह अपने विश्वास का अंगीकार न करे और मनुष्यों के सामने गवाही न दे, तो वह परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने पूरी तरह काट डाले जाने के योग्य ठहरेगा और उसका नाम जीवन की पुस्तक से मिटा दिया जाएगा। तौभी उसे कुछ चिन्ता नहीं कि वह इस तुच्छ और नाशमान जीवन को ऐसे नीच और अनोखे इन्कार से बेच डालता है। वरन् वह अभी न्यायियों के सामने भी नहीं लाया गया है। उससे पूरी पूछताछ भी नहीं की गई है। केवल एक दासी उससे बात करती है। जब वे उसके साथ पहले ही रूखाई कर सकते थे, और अच्छी तरह कर सकते थे, तब वह एक अभागे प्राणी की नाईं ही लड़ा। तौभी वह परमेश्वर का सारा भय नहीं भूला। इसलिये जब हम यह देखें, तो सोचें कि हमारे लिये यह कितना और आवश्यक था कि परमेश्वर अपनी भलाई के असीम भण्डार प्रदर्शित करे, जब उसने पतरस को भी अपने पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग के फल में भागी बनाया।
तो यह एक आश्चर्यकर्म है जो हमें मुग्ध कर दे कि पतरस ने ऐसे बड़े अपराध की क्षमा पाई, और जैसा प्रतीत होता है, अपने पश्चाताप के द्वारा पाई। क्योंकि यह निश्चय है कि यदि कोई मनुष्य चूकने के बाद मर्म तक छिद जाए, और वह परमेश्वर के सामने क्षमा पाने के लिये कराहे और विलाप करे, तो यह इस बात का चिह्न है कि परमेश्वर ने उसे पहले ही ग्रहण कर लिया और अपने साथ उसका मेल कर लिया है। क्योंकि पश्चाताप भी पवित्र आत्मा से निकला हुआ एक विशेष दान है, जो हमें दिखाता है कि परमेश्वर हम पर तरस खाता है और नहीं चाहता कि हम नाश हों। परन्तु वह हमें अपनी ओर खींचता है। अब हम यह पतरस में देखते हैं। इसलिये यह निकलता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग उसके लिये पहले ही लाभदायक हो चुका था, और अद्भुत रीति से, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। परन्तु पहले यह ध्यान दें कि सन्त पतरस सदा ऊँघता और जड़ बना रहा, जब तक उसे वह चिह्न न मिला जिसकी हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उसे चेतावनी दी थी, अर्थात् यह कि जब तक वह तीन बार उसका इन्कार न कर ले तब तक मुर्गा बाँग न देगा, या यों कहें कि जब तक पतरस अपने इन्कार पहले ही न कर चुका हो तब तक मुर्गा दूसरी बार बाँग न देगा। जब ऐसा है, कि यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उसे चिताया न होता तो वह अपने पाप में वहीं पड़ा रहता और सदा के लिये विनाश में डूब जाता, तो हम जानें कि कोई दोष करने के बाद हमें सचेत रहने की आवश्यकता है। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित किए जाते और वह हमें अपने पास लौटने के लिये न समझाता, तो यह निश्चय है कि शैतान हमें अपने वश में कर लेता और हमारी सारी इन्द्रियाँ ऐसी पशु-सी हो जातीं कि उद्धार के मार्ग पर लौटने के लिये न हम में कोई खटक रहती न कोई भली प्रेरणा।
तो पतरस के व्यक्तित्व में हमें आगे यही विचारना है। परन्तु जब सन्त लूका बताता है कि यीशु मसीह ने उसकी ओर देखा, तो इससे हमें और भी अच्छी तरह सिखाया जाता है कि केवल चुभाया जाना और किसी का हमारे कान खींचना कि हम परमेश्वर की ओर लौटें, पर्याप्त नहीं, परन्तु यीशु मसीह को अपनी दृष्टि और अपनी चितवन हम पर डालनी होगी। अब यह सच है कि यहाँ केवल आँखों की दृष्टि की बात कही गई है। तौभी हमारा प्रभु यीशु हमसे दिखाई देनेवाली रीति से बातचीत नहीं करता। फिर भी यह निश्चय है कि जब तक वह हम पर अपनी दृष्टि न डाले, तब तक हम अपने दोषों में सदा मोटी बुद्धि के जड़ बने रहेंगे और कभी कराहने और विलाप करने की न सोचेंगे, चाहे हमने परमेश्वर का क्रोध भड़काया हो। चाहे उसने अपना धनुष चढ़ा रखा हो और तलवार खींच रखी हो, तौभी हम अपनी उदासीनता में बने रहेंगे, जब तक हमारा प्रभु यीशु हमें यह अनुभव न करा दे कि उसने हमें भुलाया नहीं है और वह नहीं चाहता कि हम नाश हों, परन्तु हमें अपनी ओर लौटा लाना चाहता है। और ऐसा हो सके इसलिये हम प्रतिदिन उपदेश सुनते हैं, जिनसे हमें पश्चाताप के लिये समझाया जाता है। और हम उनसे कैसे प्रभावित होते हैं? चेतावनियाँ उतनी ही हैं जितनी हो सकती थीं। क्या सारी सृष्टि हमें परमेश्वर के पास आने के लिये नहीं उभारती? यदि हमारी इन्द्रियाँ ठीक से नियन्त्रित हों कि हम में विवेक का कोई अंश हो, तो जब भोर को सूर्य उदय होता है, क्या वह हमें अपने परमेश्वर की आराधना के लिये नहीं बुलाता? इसके बाद, यदि हम ध्यान दें कि पृथ्वी और सब तत्त्व, पशु और वृक्ष कैसे अपना अपना कार्य करते हैं, तो यह हमें दिखाता है कि हमें अपने परमेश्वर के पास खिंचना चाहिए, कि उसकी महिमा हम में हो, और हम किसी और रीति से करने की न सोचें। मुर्गे ने तो भली भाँति बाँग दी है, और केवल मुर्गे ने नहीं, परन्तु परमेश्वर अपनी सब सृष्टि को, ऊपर की और नीचे की, बाँग दिलवाता है कि हमें अपने पास आने के लिये समझाए। इससे बढ़कर, वह निश्चय अपना पवित्र मुँह व्यवस्था के द्वारा, अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और सुसमाचार के द्वारा खोलना स्वीकार करता है, यह कहने को, “मेरी ओर फिरो।” तौभी ऐसा दिखाई देता है कि हम मन्दबुद्धि हैं। हम में ऐसी जड़ता दिखाई देती है कि हम मानो राक्षस हैं। इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि हमारा प्रभु यीशु हम पर करुणा की दृष्टि डाले, जैसी उसने पतरस पर डाली, कि हम से सच्चे विलाप निकालकर हमारे पश्चाताप की गवाही दिलवाए। क्योंकि जब कहा जाता है कि पतरस फूट फूटकर रोया, तो यह उस शोक को चिह्नित करने के लिये है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में करता है, जब वह कहता है कि वह उद्धार के लिये कार्य करता है (2 कुरिन्थियों 7:9, 10) और कि हमें उससे भागना नहीं चाहिए वरन् उसे खोजना भी चाहिए। यद्यपि स्वभाव से हम आनन्द मनाना चाहते हैं और कोई कष्ट अनुभव करना नहीं चाहते, तौभी हम में कुछ उदासी होनी आवश्यक है। जब परमेश्वर हमें वेदना से छूता है, तो उसे अप्रसन्न करने के बाद हमारे हृदय में तड़प होनी चाहिए। क्योंकि ऐसी बेचैनी हमें सच्चे विश्राम तक पहुँचाने के लिये है और ऐसा शोक हमें परमेश्वर के सामने और स्वर्गदूतों के सामने आनन्दित करने के लिये है।
शीघ्र ही हम भली भाँति देखेंगे कि यहूदा भी पछताया, परन्तु दूसरी और भिन्न रीति से। परन्तु पतरस तो इसलिये रोया कि दिखाए कि वह अपने पाप से बहुत अप्रसन्न है और पूरी तरह यीशु मसीह की ओर लौट आया है। यह भी ध्यान दें कि “वह बाहर जाकर रोया।” यह सच है कि यह अब भी उसकी निर्बलता से निकला कि वह भीड़ के सामने अपना पश्चाताप दिखाने से डरा। परन्तु जो भी हो, जब वह अकेला रोता है, तो वह भली भाँति दिखाता है कि अपने दोष और अपराध से वह छिद गया है। क्योंकि वह अपने पश्चाताप के साक्षी होने के लिये मनुष्यों को नहीं खोजता, परन्तु अकेला होकर परमेश्वर के सामने रोता है। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। क्योंकि यदि हम केवल मनुष्यों के सामने रोएँ, तो इससे हम अपना कपट प्रकट करते हैं। परन्तु जब हर एक अपने विचारों को एकत्र करके अपने दोषों और पापों की जाँच करता है, तब यदि वह वेदना से छिद जाए, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसमें कोई बनावट नहीं, और कि वह अपने न्यायी को जान गया, और वह वहाँ क्षमा माँगने को है, और भली भाँति जानता है कि जो मानो पहले ही दण्डित और खोए हुए हैं उन्हें गहराइयों से खींच निकालना परमेश्वर का काम है। तो संक्षेप में, पतरस के गिरने के विषय में यहाँ दिए गए वृत्तान्त से, और उन तीन इन्कारों के विषय में, जिनके कारण वह परमेश्वर के राज्य से काट डाले जाने के योग्य ठहरा था, यदि यीशु मसीह ने उसे पश्चाताप की ओर खींचने के लिये अपनी मृत्यु और दुःखभोग का सामर्थ्य पहले ही प्रकट न कर दिया होता, जैसा हम देखते हैं कि हुआ, हमें यही स्मरण रखना है।
आगे कहा गया है, “याजकों और हाकिमों ने यीशु को दोषी ठहराने की सम्मति की।” परन्तु क्योंकि यह उनके अधिकार में न था, वे उसे बँधा हुआ और जकड़ा हुआ उस हाकिम के पास ले गए जिसे उस देश पर अधिकार था, अर्थात् पुन्तियुस पीलातुस के पास। उसके बाद सुसमाचार बताता है कि यहूदा ने यीशु मसीह को दोषी ठहराया गया देखकर पश्चाताप किया, और वह धन जो उसने अपने विश्वासघात के दाम और मूल्य के रूप में पाया था फेंक दिया और अपना दोष पूरी तरह मान लिया। तौभी याजक उस धन को लेना नहीं चाहते, परन्तु उससे कुम्हार का एक खेत मोल लिया जाता है, जहाँ खपरैल बनाई जाती थी, इस कारण खेत बेकार था और न जोता जा सकता था न बोया जा सकता था। सो वे इस खेत को आने-जानेवालों को गाड़ने के लिये मोल लेते हैं। वरन् वे यह किसी भक्ति के बहाने करते हैं। क्योंकि उन्होंने कहा कि इस धन को मन्दिर की भेंटों के साथ रखना उचित नहीं। इस पर सुसमाचार का लेखक कहता है कि जो भविष्यद्वक्ता ने कहा था वह पूरा हुआ, कि वे तीस दीनार, जिनसे इस्राएल के लोगों ने परमेश्वर का मूल्य आँका था, कुम्हार के काम में लाए जाएँगे। हमें यहाँ उस बात पर विचार करना है जो पहले ही आरम्भ हो चुकी, अर्थात् कि हमारे प्रभु यीशु की मृत्यु और दुःखभोग सब मनुष्यों में फल नहीं लाता, क्योंकि यह एक विशेष अनुग्रह है जो परमेश्वर अपने चुने हुओं को देता है जब वह उन्हें अपने पवित्र आत्मा से छूता है। चाहे वे गिर गए हों, वह उन्हें उठाता है। चाहे वे भटकी हुई भेड़ों की नाईं भटक गए हों, वह उन्हें सुधारता है और उन्हें अपने बाड़े में लौटा लाने के लिये उन पर अपना हाथ बढ़ाता है। क्योंकि यहूदा है जो परमेश्वर की सन्तानों की गिनती से पूरी तरह काट दिया गया है। यह भी आवश्यक है कि उसकी दण्डाज्ञा मनुष्यों के सामने प्रकट हो और बिलकुल स्पष्ट हो।
इसलिये आओ, हम (जो मैं पहले कह चुका हूँ उसके अनुसार) हर बात में और हर बात के द्वारा अपने परमेश्वर की अथाह भलाई को जानना सीखें। क्योंकि जैसे उसने मनुष्यों के प्रति अपना प्रेम तब प्रकट किया जब उसने अपने एकलौते पुत्र को न छोड़ा परन्तु पापियों के लिये उसे मृत्यु के हाथ सौंप दिया, वैसे ही वह वह प्रेम भी प्रकट करता है जो वह विशेष रूप से हम से रखता है, जब अपने पवित्र आत्मा के द्वारा वह हमें हमारे पापों के ज्ञान से छूता है और हम से विलाप करवाता है और पश्चाताप के साथ हमें अपनी ओर खींचता है। इसलिये जो प्रवेश हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आने के लिये मिलता है वह हम से नहीं निकलता, परन्तु इसी से कि परमेश्वर हम पर शासन करता है और उसे अपना चुनाव प्रकट करना अच्छा लगा। और ये परिस्थितियाँ ध्यान देने योग्य हैं। देखो यहूदा, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह का चेला था। उसने उसके नाम से आश्चर्यकर्म किए थे। फिर भी इसका परिणाम क्या हुआ? इसलिये आओ, हम डरना और चौकसी से चलना सीखें, अपने आप को पूरी तरह अपने परमेश्वर पर डाल दें; और प्रार्थना करें कि वह हमें इस अभागे के समान ऐसी दुर्गति में गिरने न दे। और जब हम गिर भी जाएँ, तब वह अपने सामर्थ्य से हमें फिर उठाए, और हम उसके पास लौट आएँ; यहूदा के समान पश्चाताप से नहीं, परन्तु सच्चे और ठीक अंगीकार के साथ। क्योंकि दुष्ट लोग जितना हो सके परमेश्वर का उपहास करते हैं। वे अपने पापों में मगन रहते हैं। वे उनमें बड़ाई भी करते हैं, और अन्त में वे वेश्याओं के समान निर्लज्ज हो जाते हैं, जैसा भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह और यहेजकेल ने कहा है। इसके अतिरिक्त अन्त में परमेश्वर उन्हें उनके पाप अनुभव कराता है, और वे ऐसे भयभीत हो जाते हैं कि वे कुढ़ते और “हाय!” कहकर चिल्लाते हैं। परन्तु यह इसलिये नहीं कि वे कोई आशा बाँधें और अपने आप को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करें। वरन् यह एक उन्माद है जो उन्हें हाँकता है। वे जितनी दूर हो सके भागते हैं और चाहते हैं कि परमेश्वर को उसके सिंहासन से उतार लाएँ। यह केवल कुढ़ने और उसके विरुद्ध पूर्ण विद्रोह में दाँत पीसने की बात है।
अब हमें निश्चय ही दूसरे प्रकार के पश्चाताप पर आना चाहिए; अर्थात् यह नहीं कि हम डर जाएँ, यह देखकर कि हम परमेश्वर के न्याय और हाथ से बच नहीं सकते; परन्तु यह कि हम अपना पाप मानें और उससे घृणा करें; और फिर यह कि हम परमेश्वर के निकट आना न छोड़ें, वरन् उसके सामने बुलाए जाने पर भी बलपूर्वक खींचे बिना; परन्तु अपनी इच्छा से हम उसे दण्डवत् करने आएँ, और मानें कि हम नाश होने के योग्य हैं; तौभी इस बात का निश्चय रखें कि यद्यपि हम एक लाख मृत्युओं के योग्य हैं, तौभी वह हम पर तरस खाना न छोड़ेगा। पतरस का पश्चाताप यही था। परन्तु यहूदा का पश्चाताप हमें दिखाए कि अपने दोषों की कुछ अनुभूति और कुछ खटक होना पर्याप्त नहीं, परन्तु हमें पूरी तरह परमेश्वर की ओर फिरना चाहिए। यह बहुत ध्यान देने योग्य है, क्योंकि हम देखते हैं कि कितने, और लगभग सब, अपने आप को बहलाते हैं। जब वे अपने दोषों को, चाहे कितने ही गम्भीर हों, एक शब्द में मान लेते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे मुक्त और निर्मल हैं, मानो उन्हें केवल मुँह पोंछ लेना था। और यदि कोई उदाहरण उनके सामने रखा जाए, तो वे समझते हैं कि उनके साथ बड़ा अन्याय किया गया है। “क्यों?” वे कहते हैं, “क्या मैं ने अपना दोष नहीं माना? क्या मैं ने पश्चाताप नहीं किया?” उनका सारा भुगतान बस यही है, मानो परमेश्वर कोई छोटा बच्चा हो जो किसी हँसी से, वरन् कपट और झूठ से भरी हुई नकली हँसी से भी, मान जाता हो। परन्तु क्योंकि मनुष्यों में यह आम बात है कि वे परमेश्वर को मनाना चाहते हैं, मैं नहीं जानता कैसे सब के सब, इसलिये कहा गया है कि यहूदा ने पश्चाताप किया। इसलिये जब परमेश्वर हमें चिताता है और हमें हमारे दोष अनुभव कराता है तब हम डरें, परन्तु सब कुछ वहीं रोक न दें। क्योंकि यह ठीक रीति से पश्चाताप नहीं है। परन्तु यह वह कसौटी है जिससे हम जान सकते हैं कि हम सचमुच पश्चात्तापी हैं या नहीं। वह तब है जब हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा से परमेश्वर के साथ पूर्ण मेल खोजते हैं और उसके द्वारा न्याय किए जाने से नहीं भागते वरन् इस शर्त पर कि वह हमें दया से ग्रहण करे। वह ऐसा ही करेगा जब हम अपना दोष मान लेंगे। क्योंकि जो परमेश्वर के सामने, स्वर्गदूतों के सामने और मनुष्यों के सामने अपना दोष मानने के लिये अपना आप न्याय करेगा, वह धर्मी ठहराया और निर्दोष माना जाएगा, क्योंकि वह केवल यही माँगता है कि परमेश्वर उस पर प्रसन्न हो। तो संक्षेप में यही है जो हमें देखना है।
अब यहूदा का यह अंगीकार इसलिये होना आवश्यक था कि याजकों को और भी अधिक निरुत्तर कर दे। सुसमाचार का लेखक यह वृत्तान्त इसलिये भी देता है कि हम उस अन्धेपन पर और अच्छी तरह विचार करें जो शैतान ने इन सब त्यागे हुओं में डाल दिया था, और हर एक अपने विषय में सोचे। जब परमेश्वर हमारे सामने अपने क्रोध और अपने बदले के ऐसे उदाहरण रखता है और दिखाता है कि मनुष्य मानो पागल हैं, कि वे बुद्धि और विवेक से भ्रष्ट हैं, कि वे (संक्षेप में) पशु-समान हैं जो नारकीय उन्माद के साथ अपने आप को झोंक देते हैं; तो यह इसलिये है कि हम में से हर एक सिर झुकाए और हर एक जाने कि यदि हम अपने परमेश्वर की भलाई और अनुग्रह से बचाए न जाते तो हम प्रायः वहीं पहुँच सकते थे। तौभी आओ, हम चेतावनी लें कि याजकों के समान अपनी ही विवेक-शक्ति से न लड़ें। क्योंकि वे सब जो परमेश्वर के विरुद्ध इस प्रकार अपने आप को कठोर करते हैं, अन्त में ऐसी त्यागी हुई दशा में पड़ेंगे कि उनमें कोई विवेक न रहेगा। परमेश्वर के सामने इस प्रकार नष्ट हो जाने के बाद वे मनुष्यों के सामने भी बिलकुल लज्जित होना छोड़ देंगे। क्योंकि यह अच्छा है कि उनकी नीचता सब पर प्रकट की जाए और वे ऐसी अपकीर्ति में डाले जाएँ कि हर एक उनकी दुष्टता से काँप उठे।
इसी कारण सुसमाचार के लेखक ने यहाँ हमें बताया है कि जब यहूदा धन लौटाने आया, तब याजक उससे बिलकुल प्रभावित न हुए। यह सच है कि वे कहते हैं कि इसे भण्डार की सन्दूक में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लहू का दाम है। कपटी लोग सदा ऐसे ही मैं नहीं जानता कौन-कौन से दिखावे अपनी अधर्मिता की छाया और आड़ के लिये भली भाँति सँभालकर रखते हैं। परन्तु यह केवल परमेश्वर का उपहास करना है। क्योंकि वे कभी खराई और खुलेपन से उसके पास नहीं आते।
क्योंकि कहने को क्या है? “अरे, हम इस धन को पवित्र भेंटों के साथ नहीं रखेंगे, क्योंकि यह लहू का दाम है।” तो क्या यह धन चुराया हुआ था? सब जानते हैं कि याजक मन्दिर की भेंटों पर जीते थे। जैसे आज पोपधर्म में जो प्रेलेट और कलीसिया के लोग कहलाते हैं, वे भेंटों को हड़प जाते हैं और इसकी चिन्ता नहीं करते कि उन्हें किस काम में लगाते हैं। यद्यपि याजकों ने जो धन यहूदा को दिया था वह मन्दिर की भेंटों में से निकाला था, तौभी उन्हें इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता; वे ध्यान नहीं देते। अब वे इस धन को भेंटों की सन्दूक में लौटाने की बात उठाते हैं। इसी युक्ति से वे यहूदा को मानो उपहास करके दूर करते हैं, मानो वे कहते हों, “सम्भव है इस दुष्ट ने अपने स्वामी को पकड़वाया हो। हमें तो केवल यह निश्चय करना है कि उसने भला किया या बुरा। फिर भी इसलिये कि हम अपनी ओर से उसके अपराध में भागी न हों, और अपने हाथ स्वच्छ रखने के लिये (क्योंकि उन्होंने इस धन को ऐसे काम में लगाया था) हम इससे परदेशियों के गाड़ने के लिये एक खेत मोल लेंगे।” वरन् यह कहना कि उन्होंने निश्चय परमेश्वर को सन्तुष्ट कर दिया, और वह इससे अधिक माँगना न जानता होगा, यद्यपि उनके कामों में कुछ दोष था।
कपटी लोग सदा ऐसे ही अपनी तसल्लियाँ पाते रहेंगे, यह सोचकर कि वे मोल देकर छूट जाएँगे, परन्तु यह केवल बच्चों का खेल है। फिर भी हम जानें कि यह हमें इसलिये सुनाया गया है कि जब हम गिर जाएँ तो सच्चाई से अपने दोषों को पहचानना सीखें, और इधर-उधर से चक्कर न काटें, परन्तु हर बात में और हर बात के द्वारा खुलकर दण्डाज्ञा को स्वीकार करें। यही हमें दिखाया गया है। इस बीच आओ, हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हम से वह पट्टी हटा दे जो शैतान बाँधने की चेष्टा कर रहा है, कि हम अपनी चापलूसियों पर टर्राते न रहें और बुराई का बहाना बनाने की इच्छा न करें, परन्तु और अधिक अपने सब दोषों की भली भाँति जाँच करने का परिश्रम करें कि उन्हें दोषी ठहराएँ और उनका सच्चा अंगीकार करें। इसके अतिरिक्त हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर कपटियों की धारणा को कैसे उलट देता है, कि अन्त में वे अपने ही बहाने से निराश रह जाते हैं। क्योंकि याजक निश्चय अपना दोष मिटा देना चाहते थे कि कोई उसकी कभी चर्चा न करे। इसी कारण वे परदेशियों के गाड़ने के लिये खेत मोल लेकर दिखावा करते हैं। परन्तु परमेश्वर उसे उनके अभिप्राय के बिलकुल विपरीत कर देता है। क्योंकि इस खेत को “लहू का खेत” या “हत्या का खेत” कहा जाना था। वह स्मारक सदा बना रहे और पुरुषों, स्त्रियों और छोटे बच्चों के मुँह पर सदा रहे, कि वह घृणित अपराध जो याजकों से इस प्रकार किया गया था प्रतिदिन जाना और प्रकट होता रहे, और वे कहें, “देखो, लहू का खेत, अर्थात् वह खेत जो विश्वासघात के दाम से मोल लिया गया। और यह किसने किया? याजकों और सब लोगों के प्रधानों ने।” सो हम देखते हैं कि जब कपटी लोग अपने अपराधों में छिपने और भेस बदलने का यत्न करते हैं, तब परमेश्वर उनकी दुष्टता को और भी अधिक उघाड़ देता है और उनकी लज्जा सब मनुष्यों को जनवा देता है और हर एक उन्हें घृणा से देखता है। इसी कारण मैं ने कहा है कि हमें और भी अधिक चेतावनी लेनी चाहिए कि परमेश्वर के पास आएँ और वहाँ अपने सब अपराध खोल दें, कि जब हम अपनी ओर से उन्हें इस प्रकार मान लें तो उसे यह अच्छा लगे कि अपने सामने, अपने स्वर्गदूतों के सामने और सारे संसार के सामने उन्हें गाड़ दे।
अन्त में सुसमाचार का लेखक भविष्यद्वक्ता का एक अंश उद्धृत करता है कि दिखाए कि यह केवल यहूदा के पाप के कारण, या याजकों के शैतानी हठ के कारण नहीं सुनाया गया, परन्तु सब लोगों की सामान्य दण्डाज्ञा के कारण। इसलिये वह कहता है, “जो वचन भविष्यद्वक्ता के द्वारा लिखा गया था वह पूरा हुआ, कि परमेश्वर का मूल्य तीस दीनार आँका गया और वह कुम्हार के खेत में लगाया गया।” अब जकर्याह, जिससे यह अंश लिया गया है, हमारे प्रभु यीशु मसीह की तुलना एक चरवाहे से करता है, और कहता है कि यहूदी लोगों पर शासन करने की इच्छा से उसने अपनी लाठी, या अपना चरवाहे का डण्डा लिया, जो “शोभा” कहलाता था, यह कहने के लिये कि उसकी दशा ऐसी भली भाँति सुव्यवस्थित थी कि उन लोगों में यह सम्भव था, वरन् यह कि उसे परमेश्वर के हाथ से चलाए जाने की अनुमति मिले। क्योंकि इससे बढ़कर और क्या चाहने योग्य है? और ऐसा हो इसलिये, हमारा परम आनन्द और सुख कहाँ है, यदि परमेश्वर हमारे उद्धार की चिन्ता न करे और हमारे बीच चरवाहे का काम न करे? तो वह उन लोगों में परमेश्वर का शासन था, जब इस छड़ी की बात कही जाती है, ऐसी लाठी की नहीं जो मारे और सब कुछ तोड़ दे, परन्तु भेड़ों को, जो आज्ञाकारी हो जाती हैं, चलाने और शान्ति से सँभालने की। अब कहा गया है कि उसने फिर दूसरी छड़ी ली। जैसा वास्तव में हुआ, जब लोग बाबुल की बँधुआई से लौटाए गए, तब परमेश्वर अपने चरवाहे के पद पर लौट गया। पहले जैसी भयंकर तितर-बितरता के बाद वह लोगों को इकट्ठा करता है कि अपने हाथ के नीचे शान्ति से उन पर शासन करे। परन्तु अन्त में ऐसी दुष्टतापूर्ण कृतघ्नता हुई कि परमेश्वर को सब कुछ छोड़ना पड़ा। इसलिये वह कहता है, “अरे, मैं समझ गया कि बात क्या है; मुझे तुम पर अपना समय और परिश्रम नहीं खोना।” वह यहाँ मनुष्यों की सामान्य बोलचाल में कहता है। “चलो अभी चल पड़ें। मुझे भुगतान कर दो कि मैं चला जाऊँ।” इस पर वे उसके पास तीस दीनार लाए। “क्या?” वह कहता है, “क्या यही वह प्रतिफल और भुगतान है जो मुझे तुम से मिलता है?” क्योंकि जब वह तीस दीनार की बात करता है, तो वह उन भेंटों को ध्यान में रखता है जो वे मन्दिर में चढ़ाते थे। वे (क्योंकि वे उन्हें बिना विश्वास और बिना पश्चाताप के कपट में काम में लाते थे) केवल व्यर्थ रीतियाँ थीं, जिन्हें तौभी याजक और यहूदी बहुत मूल्यवान समझते थे। जैसे आज पोप के अनुयायी, जब वे बहुत से “पवित्र काम” और अपनी सारी सुन्दर भक्तियाँ कर चुके होते हैं, तो उन्हें लगता है कि परमेश्वर मानो उनका कर्जदार है। अब परमेश्वर कहता है कि यह सब कूड़ा है। “कैसे,” वह कहता है, “तुम्हारे इसे निभा लेने से मुझे क्या लाभ हुआ? सम्भव है यह एक चरवाहे का वेतन हो, मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ। अरे नहीं! मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं। जाओ, इसे कुम्हारखाने में फेंक दो, और इससे अपने बरतनों के मुँह और कान सजाओ! जाओ! मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ। इसे अपनी खपरैल में लगाओ।” मानो वह कहता, “यदि तुम्हारे मन्दिर में पानी टपके तो उसे आप ही ठीक करो। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, अब तुम्हारे साथ मेरा कोई भाग या अंश नहीं। मैं चाहता हूँ कि तुम चले जाओ। और यह न सोचो कि यहाँ मुझे, मानो किसी लुच्चे का भुगतान लाकर, मना लोगे। मैं इसमें से किसी बात का अनुमोदन नहीं करता।” तो संक्षेप में भविष्यद्वक्ता का यही अभिप्राय रहा है।
अब हम जानते हैं कि उस समय हमारे परमेश्वर के विषय में जो पहले से कहा गया था, वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में पूरा हुआ, जो देह में प्रकट हमारा सच्चा परमेश्वर है। इसलिये आवश्यक था कि दृश्य रीति से यह अंश सत्य ठहरे, और यीशु मसीह का मूल्य केवल तीस दीनार आँका जाए, अर्थात् लोग उसके प्रति ऐसी दुष्ट कृतघ्नता दिखाएँ, जो सनातन चरवाहा था, जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों पर ठहराया था। यह निश्चय है कि जब लोगों ने परमेश्वर के शासन में रहना छोड़ दिया, तब भी हमारा प्रभु यीशु सदा मध्यस्थ का काम करता रहा, यद्यपि वह अभी मनुष्य की देह में प्रकट नहीं हुआ था। हमें यह भली भाँति स्मरण रखना चाहिए, कि हम अपनी ओर से सीखें, यदि परमेश्वर ने हमें मानो अपने हाथ के नीचे ग्रहण करने का अनुग्रह किया है, और हम उसकी भेड़ें हैं, और वह हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को चरवाहे के रूप में देता है, तो हम उसे चुभाएँ नहीं कि उसका आत्मा हमारे विद्रोह और कृतघ्नता के कामों से उदास और थका हुआ हो। और हम उसे फूलों के गुलदस्ते भी न फेंकें (जैसा सामान्य कहावत में कहते हैं), परन्तु क्योंकि वह अपने आप को हमें देता है, हम उससे अपने परमेश्वर और राजा के रूप में लिपटे रहें, अपना सारा जीवन उसे समर्पित करें, और उसके पास ऐसा भुगतान न लाएँ जिसे वह ठुकराता है; परन्तु अपनी आत्माएँ और अपनी देहें दोनों उसे चढ़ाएँ। क्योंकि यह भी बहुत उचित है कि हम पर उसी की सर्वोच्चता हो और वह हम पर पूरा अधिकार रखे, जब हम देखते हैं कि वह केवल हमारा उद्धार चाहता है।
अब इसे समाप्त करने और निष्कर्ष पर आने के लिये कहा गया है, “हमारे प्रभु यीशु को पीलातुस के सामने लाया गया तो उसने कुछ उत्तर न दिया। पीलातुस ने उससे पूछा, ‘क्या तू कुछ नहीं बोलता? क्या तू नहीं देखता कि ये तेरे विरुद्ध कितनी गवाहियाँ लाए हैं?’ और वह चुप रहा, यहाँ तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।” पहले तो हमें स्मरण रखना है कि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह का न्याय एक पार्थिव न्यायी के सामने हुआ, तो यह इसलिये था कि हम उस दण्डाज्ञा से मुक्त और निर्दोष ठहराए जाएँ जिसके हम स्वर्गीय न्यायी के सामने योग्य थे। हम जानते हैं कि हम उससे बच नहीं सकते जो भविष्यद्वक्ता यशायाह ने लिखा है, कि हर एक घुटना परमेश्वर के सामने टिकेगा। (यशायाह 45:23।) जब परमेश्वर जगत का न्यायी है, तो हम उसके मुख और उसके प्रताप के सामने कैसे ठहर सकते हैं? हम में से एक भी ऐसा नहीं जिसे अपने आप को एक लाख बार दोषी ठहराना न पड़े। जब हमें संसार में केवल एक वर्ष जीते हुए हुआ है, तब भी एक लाख दोष हो चुके हैं, जिनके कारण हम दोषी ठहराए जाने के योग्य हैं। ऐसा कोई नहीं जिसके हृदय पर यह गवाही खुदी न हो, और जो इसका कायल न हो। अब परमेश्वर, जो हम से कहीं अधिक स्पष्ट देखता है, वह हमें कैसे दोषी न ठहराएगा, जब हर एक को अपने आप को दोषी ठहराना पड़ता है, और इतने प्रकार से? परन्तु यहाँ हमारा प्रभु यीशु इस चरम सीमा तक झुकाया जाता है कि एक पार्थिव न्यायी के सामने, वरन् एक अपवित्र मनुष्य के सामने, एक ऐसे मनुष्य के सामने जो केवल अपने लोभ और अपनी महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित था, उस पर दोष लगाया जाए। इसलिये जब परमेश्वर का पुत्र इस सीमा तक दीन किया गया, तो हम जानें कि यह इसलिये है कि हम सिर उठाकर परमेश्वर के सामने आ सकें, और वह हमें ग्रहण करे, और भय हमें उसके न्याय-आसन से पीछे न हटाए, परन्तु हम निडर होकर उसके निकट जाने का साहस करें, यह जानते हुए कि वहाँ हम दया से ग्रहण किए जाएँगे। हम यह भी जानते हैं कि यीशु मसीह ने अधिकार, सामर्थ्य और सर्वोच्च प्रभुता पाई कि जगत का न्यायी हो। और जब वह पीलातुस से इस प्रकार दोषी ठहराया जाता है, तो यह इसलिये है कि आज हम निडर होकर उसके पास आ सकें, यह जानते हुए कि उसे हमारा न्याय करने का अधिकार दिया गया है। चूँकि वह वहाँ खड़ा हुआ, हम जानें कि वह हमारी दण्डाज्ञा उठाना चाहता था और उसका अभिप्राय अपने आप को निर्दोष ठहराने के लिये मुकद्दमा करना न था, यह भी भली भाँति जानते हुए कि उसे दोषी ठहराया जाना आवश्यक था, वरन् हमारे व्यक्तित्व में। क्योंकि यद्यपि वह निष्कलंक और निर्दोष था, उसने हमारे सब पाप अपने ऊपर उठा लिए। इसलिये हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि वह वहाँ ऐसे खड़ा रहा मानो वह दोषी ठहराया जा चुका हो। क्योंकि अन्यथा वह मध्यस्थ का काम न कर सकता था, सिवाय इसके कि वह दण्डाज्ञा स्वीकार करे और माने कि हमारे व्यक्तित्व में वह दोषी ठहराए जाने के योग्य था। तो हमारे प्रभु यीशु मसीह की चुप्पी का यही अर्थ है, कि आज हम परमेश्वर को पूरे स्वर से पुकार सकें, और सब दोषों और अपराधों की क्षमा उससे माँग सकें।
अब आओ, हम अपने परमेश्वर के प्रताप के सामने दीन श्रद्धा से झुकें।
