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इफिसियों के पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश - इफिसियों 1:3-4
इफिसियों के पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश
हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है; जैसा उसने जगत की सृष्टि से पहले उसमें हमारा चुनाव किया, कि हम उसके सम्मुख प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। - इफिसियों 1:3-4
हम पहले देख चुके हैं कि सन्त पौलुस हमें किस प्रकार परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने के लिये उभारता है, क्योंकि उसने हमें आशीष दी है, और वह भी सांसारिक रीति से नहीं वरन् आत्मिक रीति से, ताकि हम इसी में सन्तोष करें कि परमेश्वर ने अपनी पितृवत् भलाई और प्रेम हमें दिखाया है, और आशा के द्वारा हमारे लिये स्वर्ग के राज्य का द्वार खोल दिया है। यद्यपि इस संसार में हम बहुत से दुःखों के अधीन हैं, तो भी हमारे लिये यह सन्तोष करने का उचित कारण है कि परमेश्वर ने हमें इस प्रकार चुना और अपने पास बुलाया है; क्योंकि सुसमाचार हमारे लिये यह गवाही देता है कि वह हमारा पिता है [मत्ती 6:9; लूका 11:2], क्योंकि उसने हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से ऐसे जोड़ दिया है जैसे अंग अपने सिर से जुड़े होते हैं।
और अब सन्त पौलुस हमें उस मूल और स्रोत की ओर, या यों कहें कि उस प्रधान कारण की ओर ले जाता है जिसने परमेश्वर को हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। क्योंकि यही काफी नहीं कि परमेश्वर ने सुसमाचार के द्वारा अपनी भलाई और दया के भण्डार हम पर प्रकट किए हैं, ताकि हमें स्वर्गीय जीवन की आशा की ओर खींचे—और यह भी बहुत बड़ी बात है। क्योंकि यदि सन्त पौलुस वह न जोड़ता जो हम अब देखते हैं, तो यह अनुमान लगाया जा सकता था कि परमेश्वर का अनुग्रह सब मनुष्यों के लिये साधारण है, और वह उसे बिना किसी भेद के सब को देता और सब के सामने रखता है, और इसलिये हर मनुष्य के अधिकार में है कि वह उसे अपनी स्वतन्त्र इच्छा से ग्रहण करे, जिससे हममें कुछ योग्यता ठहरेगी। क्योंकि यदि मनुष्यों में इसके सिवा कोई भेद न होता कि कुछ परमेश्वर का अनुग्रह ग्रहण करते हैं और कुछ ठुकरा देते हैं, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता कि परमेश्वर ने समस्त मानवजाति के प्रति उदारता दिखाई है? परन्तु जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के भागी हैं, वे उसे विश्वास के द्वारा पाते हैं। और इस प्रकार तुम देखते हो कि इस विषय में क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता था। परन्तु सन्त पौलुस, मनुष्य की ओर से सारी योग्यता को दूर करने और यह दिखाने के लिये कि सब कुछ परमेश्वर की निरी भलाई और अनुग्रह से आता है, कहता है कि उसने हमें अपने पूर्व-चुनाव के अनुसार आशीष दी है। मानो वह कहता है कि परमेश्वर के अनुग्रह को वैसा ऊँचा करने के लिये जैसा हमें करना चाहिए, हमें उस भिन्नता पर दृष्टि करनी चाहिए जो मनुष्यों में पाई जाती है। क्योंकि कुछ लोगों को सुसमाचार सुनाया जाता है, और दूसरे नहीं जानते कि वह क्या है, वरन् उससे बिलकुल बाहर रखे गए हैं; मानो परमेश्वर एक क्षेत्र में वर्षा करे और दूसरे क्षेत्र को अत्यन्त सूखा रहने दे।
अब यदि यह पूछा जाए कि परमेश्वर एक भाग पर क्यों तरस खाता है और दूसरे को क्यों त्यागता, छोड़ता और तज देता है, तो इसका और कोई उत्तर नहीं सिवाय इसके कि उसे यही भाता है। किसी स्थान में सुसमाचार के प्रचार पर कुछ लोगों के मन जीवित विश्वास से प्रभावित होंगे, और दूसरे जैसे आए थे वैसे ही बिना कुछ लाभ पाए चले जाएँगे, या अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध कठोर कर लेंगे और वह हठ प्रकट कर देंगे जो उनमें पहले से छिपा था। इस भिन्नता का कारण क्या है? यही कि परमेश्वर एक प्रकार के लोगों को अपने पवित्र आत्मा से चलाता है, और दूसरे प्रकार के लोगों को उनकी स्वाभाविक भ्रष्टता में छोड़ देता है।
तो तुम देखते हो कि जिस बात में परमेश्वर की भलाई हम पर सबसे अधिक चमकती है, वह यह है कि हमें सुसमाचार के प्रचार के द्वारा मानो एक चिह्न मिलता है कि उसने हम पर तरस खाया है, हमसे प्रेम करता है, हमें बुलाता है और अपनी ओर आकर्षित करता है। परन्तु जब हमें सुनाई गई शिक्षा हमारे मन और भावना से ग्रहण की जाती है, तब यह और भी अधिक विशेष चिह्न है, जिससे हम जान लेते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता होना चाहता है और उसने हमें अपनी सन्तान करके गोद लिया है। इसलिये बिना कारण नहीं कि सन्त पौलुस इस अंश में कहता है कि हम परमेश्वर की ओर से उसके पूर्व-चुनाव के अनुसार ही आशीषित हुए हैं। क्योंकि ऐसा नहीं कि हम उसके पास आए; ऐसा नहीं कि हमने उसे ढूँढ़ा। परन्तु भविष्यद्वक्ता यशायाह का वचन [65:1] सब प्रकार से पूरा होना अवश्य है, अर्थात् परमेश्वर उन पर अपने आप को प्रकट करता है जिन्होंने उसे नहीं ढूँढ़ा, और जो दूर थे वे उसे अपने निकट देखते हैं, और वह उनसे कहता है, 'देखो, मैं यहाँ हूँ, मैं यहाँ हूँ। यद्यपि तुमने मुझे तुच्छ जाना, तौभी मैं तुम्हारे पास आने की कृपा करता हूँ, क्योंकि मुझे तुम्हारे उद्धार की चिन्ता है।' इस प्रकार हम देखते हैं कि सन्त पौलुस इस अंश में किस ओर संकेत कर रहा था।
संक्षेप में, हमें यहाँ यह ध्यान रखना है कि हम कभी न जान पाएँगे कि हमारा उद्धार कहाँ से आता है, जब तक हम अपने मन को परमेश्वर की उस अनन्त युक्ति तक न उठाएँ जिसके द्वारा उसने जिन्हें चाहा उन्हें चुन लिया और शेष को उनकी उलझन और विनाश में छोड़ दिया। अब यह आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ लोग इस शिक्षा को अनोखी और कठोर समझते हैं, क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक समझ के साथ बिलकुल मेल नहीं खाती। यदि कोई दार्शनिकों से पूछे, तो वे सदा यही कहेंगे कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है जो उसके योग्य हैं, और चूँकि सद्गुण उसे भाता है, इसलिये जो उस ओर झुके हैं उन्हें वह अलग करके अपनी प्रजा बना लेता है। तो तुम देखते हो कि अपनी ही कल्पना के अनुसार हम यही निर्णय करेंगे कि परमेश्वर कुछ से प्रेम करने और कुछ से बैर करने में मनुष्यों के बीच प्रत्येक की अपनी योग्यता और पात्रता के सिवा और कोई भेद नहीं रखता। परन्तु साथ ही हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हमारी अपनी समझ में व्यर्थता के सिवा कुछ नहीं है, और हमें परमेश्वर को अपने गज से नहीं नापना चाहिए, और यह बहुत बड़ा दुस्साहस है कि हम परमेश्वर पर ऐसा नियम थोपें कि उसे वही करना उचित हो जो हम सोच सकें और जो हमारी दृष्टि में न्यायसंगत जान पड़े। इसलिये यहाँ विषय परमेश्वर के उन भेदों के आदर का है जो हमारी समझ से परे हैं, और यदि हम ऐसा न करें तो विश्वास के आदि सिद्धान्तों का स्वाद भी कभी न चखेंगे। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारी बुद्धि का आरम्भ सदा नम्रता से होना चाहिए, और इस नम्रता का अर्थ यह है कि हम परमेश्वर के न्याय के निर्णयों को अपने तराज़ू में तौलने न बैठें, और न उनके न्यायी और पंच बनने का साहस करें। हमारे मन की तुच्छता के कारण हमें संयमी होना चाहिए, और चूँकि हम स्थूल और मन्दबुद्धि हैं, इसलिये हमें परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए और वैसे ही कहना चाहिए जैसा पवित्र शास्त्र हमें सिखाता है [भजन संहिता 36:6], हे यहोवा, तेरी युक्तियाँ बड़े गहरे सागर के समान हैं, और कोई मनुष्य उनका लेखा नहीं दे सकता।
तो तुम देखते हो कि कुछ लोग इस शिक्षा को कठोर और अप्रिय क्यों पाते हैं; इसलिये कि वे अपनी ही राय से अत्यन्त बंधे हुए हैं और परमेश्वर की बुद्धि के आगे अपने आप को झुका नहीं सकते कि उसके वचनों को संयम और नम्रता से ग्रहण करें। और सचमुच हमें सन्त पौलुस की इस बात से चेतावनी लेनी चाहिए कि स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के भेदों को नहीं समझता, वरन् उन्हें निरी मूर्खता समझता है [1 कुरिन्थियों 2:14]। और क्यों? इसलिये कि हम उसके सलाहकार नहीं हैं, वरन् हमें उसके पवित्र आत्मा के द्वारा बातें प्रकट होनी चाहिए, नहीं तो हम उन्हें कभी न जानेंगे, और उतनी ही मात्रा में जानेंगे जितनी वह हमें देता है।
सन्त पौलुस यहाँ उन बातों की चर्चा करता है जिन्हें हम अनुभव से जानते हैं, अर्थात् यह कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमारा संचालन करता है, कि वह हमारे दुःखों में हमें शान्ति देता है, और कि वह धीरज के द्वारा हमें दृढ़ करता है। यदि हम उसके पवित्र आत्मा से प्रबुद्ध न होते तो इन सब में से किसी बात को भी न समझ पाते। तब जो इससे कहीं ऊँची बात है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, उसे हम कैसे समझेंगे? जब बात ऐसी है, तो आओ हम सीखें कि जो कुछ हम अपने मस्तिष्क में गढ़ते हैं उसे दूर करके पैरों तले रौंद दें, और जो कुछ परमेश्वर हमसे कहे उसे ग्रहण करने को तैयार रहें, अपने निर्णय को त्यागकर और अपने आप को यह निश्चय दिलाकर कि अपनी ओर से हम घोर मूर्खता के सिवा कुछ नहीं ला सकते। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है।
और वास्तव में हम देखते हैं कि सन्त पौलुस हमें उसी बात पर आने के लिये किस प्रकार उभारता है। 'हे मनुष्य, तू कौन है (वह कहता है) जो परमेश्वर के साथ विवाद करता है?' [रोमियों 9:20]। उन बहुत से उत्तरों को रखने के बाद जो हम देने के आदी हैं, वह कहता है, 'हे मनुष्य'। 'मनुष्य' शब्द से उसका अभिप्राय था कि हम अपनी निर्बलता को पहचानें, क्योंकि हम तो पृथ्वी के कीड़े और सड़न मात्र हैं [भजन संहिता 103:14]। तो फिर परमेश्वर के विरुद्ध उत्तर देने को मुँह खोलना कितना बड़ा दुस्साहस है! क्या यह प्रकृति की सारी व्यवस्था को उलट देना नहीं है? क्या हमारे वश में है कि सूर्य को आकाश से उखाड़ लें, या, जैसा कहते हैं, चन्द्रमा को दाँतों के बीच पकड़ लें? फिर हमारे लिये परमेश्वर से झगड़ना और उसके निर्णयों को, जो हम समझ नहीं सकते, नियन्त्रित करने के लिये तर्क प्रस्तुत करना तो और भी अनुचित है।
कुछ ऐसे लोग हैं जो पूर्वनिर्धारण की इस शिक्षा को, जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है, सच तो मान लेंगे, क्योंकि वे पवित्र आत्मा का खण्डन करने का साहस नहीं करते, तौभी चाहते हैं कि यह गाड़ दी जाए ताकि इसकी चर्चा कभी न हो। परन्तु वे पवित्र आत्मा को, जिसने इसे भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा, वरन् परमेश्वर के एकलौते पुत्र के मुख से भी कहा, नियन्त्रित करने में अपने आप को मूर्खों के सिवा और कुछ नहीं दिखाते। क्योंकि जब हमारा प्रभु हमें हमारे उद्धार का निश्चय दिलाना चाहता है, तो वह हमें इसी अनन्त चुनाव की ओर लौटा ले जाता है; और वैसे ही जब वह विश्वास के वरदान को ऊँचा करना चाहता है, एक बार यूहन्ना के दसवें अध्याय में और दूसरी बार छठवें में। इसलिये इस प्रकार के लोग बहुत देर से आते हैं कि परमेश्वर को चुप कराएँ और पवित्र शास्त्र से उन बातों को मिटा दें जो वहाँ प्रकट की गई हैं। क्योंकि सारा पवित्र शास्त्र लाभदायक है [2 तीमुथियुस 3:16]। सन्त पौलुस ने यह व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के विषय में कहा। इसलिये हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सुसमाचार में कुछ भी अनावश्यक नहीं, और न कुछ ऐसा है जो किसी भले प्रयोजन को सिद्ध न करे और जिससे हम विश्वास और परमेश्वर के भय में उन्नति न पा सकें।
परन्तु यह शिक्षा वहाँ इसी प्रकार निहित है, और पवित्र आत्मा इसे ऊँचे और स्पष्ट स्वर में कहता है। जो सुसमाचार को काट-छाँटकर उसमें से कुछ निकाल देना चाहते हैं वे मानीवादी (मनिकी) ही होंगे। क्योंकि जो उन्हें न भाया उसे उन्होंने अलग कर दिया और अनेक टुकड़ों से जोड़कर एक सुसमाचार गढ़ लिया, और उसमें केवल वही रहने दिया जो उन्हें स्वयं भला लगा। अब यदि ऐसे विधर्मियों ने उन बातों को, जिन्हें अटूट बन्धन में एक साथ रखना चाहिए, अलग करने में परमेश्वर के विरुद्ध शैतानी हठ दिखाई है, तो वे भी दुर्भावनापूर्ण और हठीले हैं जो आजकल चाहते हैं कि चुनाव की शिक्षा पर चुप्पी रखी जाए। क्योंकि वे, यदि सम्भव होता, तो परमेश्वर का मुँह बन्द कर देते, और जब भी वह कोई ऐसी बात कहे जो उन्हें न भाए, उसके मुँह पर मुहर लगा देते।
फिर, कोई उनकी मूर्खता को स्पष्ट देख सकता है, क्योंकि परमेश्वर की भलाई को बड़ा दिखाने के लिये सन्त पौलुस के पास इससे उत्तम कोई प्रमाण न था। सो यदि और कोई कारण न होता, तो भी यही उत्तम होता कि सारा संसार उलझन में पड़ जाए, परन्तु यह शिक्षा चुप न कराई जाए। क्योंकि क्या यह उचित है कि परमेश्वर अपनी दयाओं का असीम भण्डार हमारी आँखों के सामने रखे, और फिर भी उसकी चर्चा न की जाए, वरन् उसे पैरों तले कुचल दिया जाए?
परन्तु दो कारण और भी हैं जो दिखाते हैं कि इस शिक्षा का प्रचार अनिवार्य है, और इससे हमें इतना बड़ा लाभ मिलता है कि जो कुछ सन्त पौलुस यहाँ दिखाता है उससे अनजान रहने की अपेक्षा हमारा कभी जन्म ही न लेना कहीं उत्तम होता। क्योंकि दो बातें हैं जिन पर हमें मुख्य रूप से ध्यान लगाना चाहिए और जिनमें अपना सारा अध्ययन और प्रयत्न लगाना हमें शोभा देता है, और वे उन सब बातों का सार ही हैं जो परमेश्वर हमें पवित्र शास्त्र में सिखाता है। एक तो परमेश्वर की वैसी महिमा करना जैसी वह योग्य है, और दूसरी हमारे उद्धार का निश्चय, ताकि हम पूरी स्वतन्त्रता के साथ उसे पिता कहकर पुकार सकें [रोमियों 8:15]। यदि ये दो बातें हममें न हों, तो हम पर हाय, क्योंकि हममें न विश्वास है न धर्म। हम परमेश्वर के विषय में अच्छी बातें कह सकते हैं, परन्तु वह झूठ ही होगा।
पहली बात के विषय में मैं तुम से पहले ही कह चुका हूँ कि परमेश्वर का अनुग्रह भली भाँति नहीं जाना जाता, सिवाय इसके कि परमेश्वर के चुनाव को मानो अपनी आँखों के सामने रखा जाए। क्योंकि मान लो कि परमेश्वर सब मनुष्यों को एक-सा खींचता है, और जो उद्धार पाना चाहते हैं उन्हें अपनी स्वतन्त्र इच्छा और स्वप्रेरणा से आना चाहिए। यदि ऐसा है, तो निश्चय ही हम इसके योग्य हैं कि परमेश्वर के हाथ से ग्रहण किए जाएँ, और वह प्रत्येक मनुष्य से उसकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करे। परन्तु परमेश्वर की भलाई कैसे ऊँची ठहरेगी? केवल इसी रीति से कि वह अपनी निरी उदारता से हमसे आगे बढ़कर चलता है और सब कुछ के होते हुए भी हमसे प्रेम करता है, न हमारे व्यक्तित्व में और न हमारे कामों में कोई ऐसा कारण पाकर कि वह हमसे प्रेम करे। यदि यह सच है, तो चुनाव अवश्य होना चाहिए: परमेश्वर एक प्रकार के लोगों को इसलिये लेता है कि उसे ऐसा करना भला लगता है, और दूसरे को छोड़ देता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि यह अत्यन्त निश्चित बात है कि परमेश्वर की महिमा वैसी प्रकट और प्रकाशित नहीं होती जैसी होनी चाहिए, जब तक यह न जाना जाए कि वह अपनी भलाई और प्रेम वहीं उँडेलता है जहाँ उसकी इच्छा होती है।
मैंने अभी कहा कि उसके वचन का प्रचार हमारे लिये एक अनुपम उपकार है। और इसी कारण व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में इतनी बार कहा गया है कि परमेश्वर ने किसी और जाति से वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा अब्राहम के वंश से किया, कि उसने उन्हें चुनने और गोद लेने की कृपा की, जिसकी व्यवस्था ने पक्की गवाही दी। इसलिये इस्राएलियों को उभारा गया कि वे परमेश्वर की स्तुति करें क्योंकि उसने उन्हें अपनी व्यवस्था देने की कृपा की [व्यवस्थाविवरण 4:7], और इस बीच बेचारे अन्यजातियों को वैसे ही छोड़ दिया जैसे वे ऐसे लोग हों जो उसके नहीं थे। परन्तु यह इससे भी कहीं बड़ा और विशेष अधिकार है जब वह हमें उस वचन से लाभ उठाने देता है। क्योंकि यह निश्चित है कि जो बातें हमें सुनाई जानी चाहिए उनसे हमारे कान प्रतिदिन भरे जा सकते हैं और हम उनसे कभी बेहतर न होंगे, जब तक परमेश्वर हमारे भीतर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमसे न बोले।
तो इस विषय में परमेश्वर दोहरा अनुग्रह दिखाता है। एक तो तब जब वह हमें सुसमाचार सुनाने के लिये मनुष्य खड़े करता है, क्योंकि कोई मनुष्य अपने आप यह करने के योग्य और समर्थ नहीं। इसलिये आवश्यक है कि परमेश्वर ऐसे लोग भेजे जो हमें उसके पास बुलाएँ और हमारे सामने उद्धार की आशा रखें। परन्तु फिर भी, इस सब के बावजूद, भली भाँति ध्यान दें कि हम विश्वास नहीं कर सकते जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने आप को हम पर प्रकट न करे और मनुष्य के मुँह से हमारे कानों से बोलने के अतिरिक्त पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों से न बोले। और इसी कारण भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, 'हमारे समाचार की प्रतीति किसने की? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?' [यशायाह 53:1]। वह दिखाता है कि संसार में विश्वास तब तक नहीं जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से मनुष्यों के मन और हृदय में कार्य न करे। और इसी कारण हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है कि कोई उसके पास नहीं आ सकता जब तक पिता उसे खींच न ले; परन्तु जिसने मेरे पिता से सीखा है (वह कहता है), वही अपने आप को मेरे अधीन करता है [यूहन्ना 6:44]। एक शब्द में, हम स्पष्ट देखते हैं कि परमेश्वर हम पर दयालु ठहरता है जब वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें प्रकाशित करने की कृपा करता है कि हम उसके सुसमाचार के विश्वास की ओर खिंच आएँ।
यदि यह साधारण रूप से और सब मनुष्यों के साथ बिना भेद के किया जाता, तब भी हमारे पास परमेश्वर की महिमा करने का कारण होता। परन्तु अब जब हम देखते हैं कि कुछ कठोर हो जाते हैं और कुछ चंचल, और कुछ सुनी हुई बात से कोई लाभ पाए बिना अपने मार्ग चले जाते हैं, और दूसरे बिलकुल जड़ हैं, तो निश्चय ही इससे परमेश्वर का अनुग्रह हम पर और भी प्रकट होता है, जैसा सन्त लूका कहता है कि सन्त पौलुस के प्रचार पर जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे उतनों ने विश्वास किया [प्रेरितों के काम 13:48]। निश्चय ही लोगों की एक बड़ी भीड़ ने सन्त पौलुस का उपदेश सुना, और बिना किसी सन्देह के उसमें अपनी ओर से ऐसा अनुग्रह था कि पत्थरों तक को भी हिला देता। तौभी इसके होते हुए बहुत से लोग अपने अविश्वास और हठ में बने रहे; दूसरों ने विश्वास किया।
अब सन्त लूका स्पष्ट कहता है कि ऐसा नहीं था कि कुछ लोग दूसरों से अधिक चतुर थे, या उनमें दूसरों की अपेक्षा सद्गुण की ओर अधिक झुकाव था, परन्तु परमेश्वर ने उन्हें विशेष रूप से उद्धार के लिये ठहराया था। इसलिये एक शब्द में हम देखते हैं कि मनुष्य की सारी योग्यताएँ समाप्त होकर पैरों तले डाल दी जानी चाहिए, नहीं तो परमेश्वर को वह स्तुति न मिलेगी जिसका वह अधिकारी है। इसके अतिरिक्त हमें समझना चाहिए कि विश्वास हमारी ओर से नहीं आता, क्योंकि यदि आता तो हमारे कामों में कुछ योग्यता ठहरती। यह सच है कि विश्वास के द्वारा हम मानते हैं कि हममें दुर्दशा के सिवा कुछ नहीं है, कि हम दोषी और श्रापित हैं, और हम अपने साथ अपने पापों की स्वीकृति के सिवा कुछ नहीं लाते। परन्तु फिर भी, यदि हमें विश्वास अपनी ही पहल से मिलता, तो हमारा विश्वास योग्यता की वस्तु ठहरता। इसलिये हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि मनुष्यों के लिये विश्वास करना असम्भव है जब तक ऊपर से उन्हें न दिया जाए।
और निश्चय ही सन्त पौलुस जब कहता है 'परमेश्वर का धन्यवाद हो', तब वह यहाँ एक ऐसी बात बताता है जो भली भाँति ध्यान देने योग्य है। और किस कारण? इसी कारण कि उसने हमें यीशु मसीह में ऐसा धनी किया कि हमारा जीवन सुखी और धन्य है। और फिर वह जोड़ता है, 'उसके हमारे चुनाव के अनुसार'। क्या विश्वास उन आत्मिक धनों में सम्मिलित नहीं जिनका सन्त पौलुस उल्लेख करता है? निश्चय ही, और (इससे भी बढ़कर) वह उनमें प्रधान है। क्योंकि विश्वास ही के द्वारा हम पवित्र आत्मा पाते हैं; विश्वास ही के द्वारा हम अपनी विपत्तियों में धीरजवन्त होते हैं; विश्वास ही के द्वारा हम परमेश्वर के आज्ञाकारी बनते हैं; विश्वास ही के द्वारा हम उसकी सेवा के लिये पवित्र किए जाते हैं। संक्षेप में, उन सब आत्मिक लाभों में जो परमेश्वर हमें देता है, विश्वास सदा प्रधान बना रहता है।
अब हम सन्त पौलुस के क्रम को भली भाँति स्मरण रखें। वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें बाकी सब के समान विश्वास भी दिया है, अपने हमारे चुनाव के अनुसार। तो हम देखते हैं कि विश्वास परमेश्वर के चुनाव पर निर्भर है, नहीं तो हमें सन्त पौलुस को झूठा ठहराना पड़ेगा। और इसलिये पहली बात के विषय में तुम देखते हो कि जो लोग पूर्वनिर्धारण की स्पष्ट और खुली चर्चा सह नहीं सकते, वे परमेश्वर के अनुग्रह के प्राणघातक शत्रु हैं और अपनी पूरी सामर्थ्य से उसे धुँधला कर देंगे। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) उसे छिपाना सारे धर्म को उलट देना है।
दूसरी बात हमारे उद्धार का निश्चय है। पोप-मतवादी कहते हैं कि हमें इस पर सन्देह करना चाहिए और हम परमेश्वर के पास केवल इस आशा के साथ आ सकते हैं कि वह हमें ग्रहण करेगा; परन्तु इसका निश्चय करना, यह हमें नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह बहुत बड़ा दुस्साहस होगा। परन्तु जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तो हमें उसे पिता कहना चाहिए, कम से कम तब, यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के शिष्य हैं, क्योंकि उसी ने हमें ऐसा करना सिखाया है।
अब क्या हम उसे अटकल से पिता कहते हैं, या अपने भीतर हमें निश्चय है कि वह हमारा पिता है? यदि नहीं, तो हमारी प्रार्थनाओं में कपट के सिवा कुछ न होगा, और पहला शब्द जो हम बोलते हैं वह झूठ होगा। इसलिये पोप-मतवादी कभी नहीं जानते कि परमेश्वर से प्रार्थना करना क्या है, क्योंकि वे अपने उद्धार का निश्चय नहीं कर सकते। परन्तु (जैसा हम तीसरे अध्याय में विशेष रूप से देखेंगे) पवित्र शास्त्र दिखाता है कि परमेश्वर से ठीक रीति से प्रार्थना करने के लिये हमें यीशु मसीह पर विश्वास होना चाहिए, जो हमें भरोसा देता है, और उस भरोसे पर हम तुरन्त साहस पा लेते हैं। जो भी हो, हमें न झिझकना चाहिए और न सन्देह करना चाहिए, वरन् अपने भीतर पूरी तरह निश्चित और आश्वस्त होना चाहिए कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान गिनता है। और यह कैसे हो सकता है सिवाय इसके कि हम उसकी दया को विश्वास के द्वारा अपनाएँ, जैसा वह हमें अपने सुसमाचार में देता है, और अपने आप को यह भी निश्चय दिलाएँ कि हम उसके अनन्त चुनाव में दृढ़ किए गए हैं? क्योंकि यदि हमारा विश्वास हम पर निर्भर होता, तो निश्चय ही वह शीघ्र हमारे हाथ से निकल जाता; और यदि वह ऊपर से सम्भाला न जाता तो झटक दिया जा सकता था। और यद्यपि हम विश्वास के द्वारा रखे या सुरक्षित रखे जाते हैं, जैसा सन्त पतरस कहता है [1 पतरस 1:5], तौभी रखनेवाला परमेश्वर ही है। यदि हमारा विश्वास परमेश्वर के अनन्त चुनाव में दृढ़ न होता, तो निश्चय है कि शैतान उसे हर क्षण हमसे छीन सकता था। यद्यपि आज हम संसार में सबसे दृढ़ होते, तौभी कल गिर सकते थे। परन्तु हमारा प्रभु यीशु हमें सब परीक्षाओं के विरुद्ध दृढ़ करने का उपाय बताता है, जब वह कहता है: तुम अपने आप से मेरे पास नहीं आते, परन्तु स्वर्गीय पिता तुम्हें मेरे पास लाता है; और जब मैंने तुम्हें अपनी रखवाली में ले लिया है, तो अब न डरो, क्योंकि मैं तुम्हें अपने पिता परमेश्वर की मीरास जानता हूँ, और जिसने तुम्हारा भार मुझे सौंपा और तुम्हें मेरे हाथ में दिया वह सबसे बड़ा है [यूहन्ना 10:28-29]। तो हम देखते हैं कि परमेश्वर की महिमा प्रकट करने के अतिरिक्त हमारा उद्धार भी परमेश्वर के अनन्त पूर्वनिर्धारण से निश्चित होता है, जो हमें इस बात पर विचार करने के लिये प्रेरित करने को पर्याप्त कारण होना चाहिए जो सन्त पौलुस इस स्थान पर उसके विषय में कहता है।
यह सच है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि बहुत से लोग झगड़ते हैं जब सुनते हैं कि परमेश्वर ने जिन्हें उसे भला लगा उन्हें चुन लिया और बाकी सब को ठुकरा दिया। क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर के पास आनेवाले थोड़े ही हैं; तो फिर उसने बाकी को क्यों ठुकरा दिया? सचमुच यह तो ऐसा कहना है कि परमेश्वर की इच्छा हमारे नियम के लिये पर्याप्त नहीं। हमें पहले यह ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर किसी भी व्यक्ति का कुछ भी देनदार नहीं। क्योंकि यदि हम एक बार यह मान लें कि वह हमारा संसार में सबसे थोड़ा भी ऋणी है, तो हम उसकी व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं। परन्तु चूँकि वह अपनी ओर से हमारे प्रति किसी बाध्यता में नहीं, वरन् हम उसके सब कुछ के ऋणी हैं और वह हमारा कुछ नहीं, तो अब देखें कि हम अपने सारे झगड़े से क्या पाएँगे। क्योंकि यदि हम परमेश्वर को विवश करना चाहें कि वह सब मनुष्यों से एक-सा व्यवहार करे, तो उसे नश्वर प्राणियों से भी कम स्वतन्त्रता होगी। यदि कोई धनी है, तो वह अपनी सम्पत्ति के साथ जो चाहे कर सकता है। यदि वह किसी को दान दे, तो क्या यह उचित है कि इसके लिये उस पर कानून में मुकदमा चले, और हर मनुष्य उससे उतनी ही राशि माँगे? फिर, कोई मनुष्य किसी ऐसे को आगे बढ़ाना चाहता है जिसे वह प्रिय मानता है। अब यदि सब कंगाल आकर माँग करें कि वह उनके लिये उतना ही करे मानो यह उसका कर्तव्य हो, तो क्या यह हास्यास्पद न होगा? देखो, मनुष्य संसार के सबसे दूर के परदेशी को भी अपना पुत्र और वारिस बना सकता है, और वह ऐसा करने को स्वतन्त्र है। और ध्यान दो, परमेश्वर तो सब मनुष्यों पर उदार है, क्योंकि वह अपना सूर्य भलों और बुरों दोनों पर उदय करता है [मत्ती 5:45]। वह केवल एक निश्चित संख्या के लोगों को रख छोड़ता है जिन्हें अपनी सन्तान करके गोद लेने का विशेषाधिकार देता है। अब उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाने से हमें क्या मिलेगा? यदि कोई कहे कि तब तो वह पक्षपाती ठहरेगा, तो ऐसा नहीं है [कुलुस्सियों 3:25]। क्योंकि वह धनियों को चुनकर कंगालों को छोड़ नहीं देता; वह कुलीनों और भद्र पुरुषों को तुच्छ और नीच पदवाले लोगों की अपेक्षा नहीं चुनता [1 कुरिन्थियों 1:26]। और इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि परमेश्वर के यहाँ कोई पक्षपात है, क्योंकि अयोग्यों को चुनने में उसकी दृष्टि केवल अपनी निरी भलाई पर रहती है। न वह यह विचार करता है कि कोई दूसरे से अधिक योग्य है या नहीं, वरन् जिसे चाहता है उसे लेता है।
और हम क्या चाहें? तो यह उचित कारण है कि हम परमेश्वर की इच्छा से सन्तुष्ट रहें और अपने आप को रोकें और उसे छोड़ दें कि जिसे चाहे चुने, क्योंकि उसकी इच्छा ही सारी समता और न्याय का परम मानक है। और इस प्रकार तुम देखते हो कि सारे संसार के मुँह बन्द हो गए [रोमियों 3:19]। और यद्यपि दुष्ट और अधर्मी कुड़कुड़ाएँ और दोष निकालें, या निन्दा भी करें, तौभी परमेश्वर अपनी धार्मिकता और अपनी असीम बुद्धि को स्थिर रखने के लिये पर्याप्त सामर्थी है, और जब वे अपनी बकवास कर चुकेंगे तब अन्त में लज्जित होना उनके लिये निश्चित है। हमारे लिये, हम देखते हैं कि सन्त पौलुस यहाँ क्या कहता है। क्योंकि जब वह कहता है कि परमेश्वर ने हमें आशीष दी है, तब यह कोई अस्पष्ट शिक्षा नहीं। सचमुच, चूँकि उसने अपने पवित्र आत्मा से हमें सुसमाचार के विश्वास से प्रबुद्ध किया और हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का भागी बनाया, इसी से (वह कहता है) उसने दिखाया कि उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन लिया था। और इसलिये हम समझें कि परमेश्वर के अनुग्रह की ठीक महिमा करने के लिये हमें (जैसा मैंने पहले कहा) इसी सोते और मूल कारण तक, अर्थात् चुनाव तक पहुँचना चाहिए।
अब हमें आगे बढ़ना है, क्योंकि उस सारी योग्यता और पात्रता को जो मनुष्य जताना चाहें और अच्छी रीति से दूर करने के लिये, चूँकि हम सदा अपने ऊपर कुछ न कुछ आरोपित करने की ओर झुके रहते हैं और अपने आप को शून्य बनाया जाना सह नहीं सकते, वह कहता है, 'जगत की सृष्टि से पहले'। तो चूँकि ऐसे विचार से हम अपने आप को वह मान बैठते हैं जो हमारे पास नहीं है, इसलिये आवश्यक था कि सन्त पौलुस यहाँ ऐसी सब हास्यास्पद मूर्खता को गिरा दे। और इसी कारण वह कहता है कि जब हम अभी जन्मे भी न थे तब हम अपनी ओर से अपने आप को आगे नहीं बढ़ा सकते थे। वास्तव में परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, तो हम तब उसके पास क्या ला सकते थे? यह सच है कि पोप-मतवादी इस विषय में बड़ी चतुराई दिखाते हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें उद्धार के लिये चुना जिन्होंने अभी उसके योग्य कुछ नहीं किया था, परन्तु फिर भी उन्हीं को चुना जिनके विषय में उसने पहले से देखा कि वे उसके योग्य ठहरेंगे। इस प्रकार वे मानते हैं कि चुनाव से पहले, न क्रम में न समय में, कोई योग्यता नहीं थी, परन्तु परमेश्वर ने (जिसके लिये सब कुछ खुला है) जान लिया कि कौन इसके योग्य होगा। ऐसा कहने से वे परमेश्वर के चुनाव का इनकार नहीं करते। और इसलिये यह दिखाने के लिये कि ये अभागे लोग जो आजकल इसकी चर्चा सह नहीं सकते, देहधारी शैतान हैं और पोप-मतवादियों से अधिक उग्र और नीच दुष्टता का समर्थन करते हैं, हमें ध्यान देना चाहिए कि पोप-मतवादी मानते हैं कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले भी उन्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया जिन्हें उसने भला समझा। वे इस पर स्थिर रहते हैं, जिसका ये शैतान इनकार करते हैं और इस प्रकार उसकी युक्ति को उलटकर परमेश्वर की महिमा का पूरा नाश कराना चाहते हैं। पोप-मतवादी (कम से कम उनमें से जो अपने चाल-चलन में दूसरों से बढ़ गए हैं, और मैं उन भिक्षुओं और साधुओं तक की बात कहता हूँ जो विद्वान धर्मशास्त्री कहलाते हैं) इससे भी अधिक मानते हैं—कि परमेश्वर का यह चुनाव स्वतन्त्र है और उसने किसी मनुष्य को किसी और कारण से नहीं चुना सिवाय इसके कि उसे यही भाया। परन्तु तुरन्त बाद वे सब कुछ गड्ड-मड्ड कर देते हैं और सब को उलझन में डाल देते हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि जब परमेश्वर ने जिसे चाहा उसे चुना, तो उसने ऐसा इसलिये किया कि उन्हें योग्य बनाए। और इसी पर वे अपनी सारी योग्यताएँ आधारित करते हैं, यहाँ तक कि वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मनुष्य अपनी ही सामर्थ्य से स्वर्ग का राज्य जीत सकते हैं। वे मानते तो हैं कि चुनाव के विषय में यह स्वतन्त्र दान है, परन्तु वे सदा अपनी उस मूर्खतापूर्ण कल्पना पर लौट आते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें पहले से देखा जो भलाई करेंगे।
परन्तु वह उसे कैसे पहले से देखता जो हो ही नहीं सकता था? क्योंकि हम जानते हैं कि आदम की सारी सन्तान भ्रष्ट है, और हममें भलाई करने का एक अच्छा विचार भी करने की कुशलता नहीं, तो भलाई आरम्भ करने की सामर्थ्य हममें और भी कम है। यदि परमेश्वर एक लाख वर्ष हमारी बाट जोहता, यदि हम संसार में इतने समय तक रह सकते, तो भी निश्चित है कि हम कभी उसके पास न आते और न अपनी ही दण्डाज्ञा के लिये बुराई को निरन्तर बढ़ाने के सिवा और कुछ करते। संक्षेप में, मनुष्य संसार में जितना अधिक जीता है, उतना ही गहरा अपने आप को अपनी दण्डाज्ञा में डुबोता है। और इसलिये परमेश्वर उसे पहले से नहीं देख सकता था जो हममें तब तक नहीं था जब तक उसने स्वयं उसे हममें न डाला।
तो हम परमेश्वर के पास कैसे आते हैं? हम उसकी आज्ञा कैसे मानते हैं? हमारा वह शान्त मन कैसे होता है जो विश्वास के अनुसार अपने आप को सौंप देता है? ये सब बातें उसी से आती हैं, और इसलिये यह निष्कर्ष निकलता है कि सब कुछ उसे स्वयं करना पड़ता है। इसलिये ध्यान दें कि यह कहने में कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, सन्त पौलुस पहले से उस बात को मानकर चलता है जो सच है, अर्थात् यह कि परमेश्वर हममें उस बुराई के सिवा जो वहाँ थी और कुछ नहीं देख सकता था, क्योंकि उसके पाने के लिये भलाई की एक बूँद भी न थी। सो जब उसने हमें चुना है, तो इसे उसके स्वतन्त्र अनुग्रह का अत्यन्त स्पष्ट चिह्न मानो। और इसी कारण रोमियों के नवें अध्याय में, जहाँ वह जुड़वाँ याकूब और एसाव की चर्चा उस समय करता है जब वे अभी अपनी माँ के गर्भ में थे और उन्होंने न भला किया था न बुरा, कहा गया कि बड़ा छोटे की सेवा करेगा, ताकि सब कुछ उसकी ओर से हो जिसने उन्हें बुलाया, और उनके कामों की ओर से नहीं [रोमियों 9:11-12]।
तो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस वहाँ विस्तार से वह दिखाता है जिसे यहाँ संक्षेप में छूता है, अर्थात् यह कि चूँकि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुना, इसी से वह पर्याप्त रूप से दिखाता है कि एक मनुष्य दूसरे से अधिक योग्य या श्रेष्ठ नहीं; कि उसने योग्यता की ओर दृष्टि नहीं की। इसलिये, चूँकि याकूब और एसाव में भेद उनके भला या बुरा करने से पहले हुआ, वह कामों से नहीं परन्तु बुलानेवाले से हुआ। इसलिये सारी स्तुति परमेश्वर को दी जानी चाहिए और मनुष्य के लिये कुछ भी बचाकर न रखा जाए। और इस प्रकार तुम फिर एक बार देखते हो कि जब सन्त पौलुस कहता है कि हम जगत की सृष्टि से पहले चुने गए, तो हमें यहाँ क्या ध्यान देना है।
वह इस बात को और भी उत्तम रीति से यह कहकर पक्का करता है कि यह यीशु मसीह में किया गया। यदि हम अपने आप में चुने जाते, तो कहा जा सकता था कि परमेश्वर ने हममें कोई गुप्त सद्गुण पाया जो मनुष्यों को अज्ञात था। परन्तु जब उसने हमें अपने से बाहर चुना, अर्थात् हमारे अपने से बाहर हमसे प्रेम किया, तो हम इसका क्या उत्तर देंगे? यदि मैं किसी मनुष्य की भलाई करता हूँ, तो इसलिये कि मैं उससे प्रेम करता हूँ। और यदि मेरे प्रेम का कारण ढूँढ़ा जाए, तो वह यह होगा कि हम स्वभाव में समान हैं, या कोई और उचित कारण। परन्तु हमें परमेश्वर में इसके समान कुछ कल्पना नहीं करनी चाहिए। और यहाँ स्पष्ट रूप से हमें बताया भी गया है, क्योंकि सन्त पौलुस कहता है कि हम यीशु मसीह में चुने गए हैं। तो क्या हमसे प्रेम करने की कृपा करते समय परमेश्वर की दृष्टि हम पर थी? नहीं! नहीं! क्योंकि तब तो वह हमसे पूरी तरह घृणा करता। यह सच है कि हमारी दुर्दशा को देखकर उसे हम पर तरस और करुणा आई कि हमें छुड़ाए, परन्तु यह इसलिये था कि वह हमसे पहले ही हमारे प्रभु यीशु मसीह में प्रेम कर चुका था। इसलिये परमेश्वर के सामने अपना आदर्श और दर्पण अवश्य रहा होगा जिसमें वह हमें देखे, अर्थात् हमें चुनने और बुलाने से पहले उसने पहले हमारे प्रभु यीशु मसीह को देखा होगा।
और इसलिये, संक्षेप में, सन्त पौलुस यह दिखाने के बाद कि हम परमेश्वर के पास कुछ नहीं ला सकते, परन्तु उसने अपने स्वतन्त्र अनुग्रह से पहले ही जगत की सृष्टि से पहले हमें चुनकर कार्य किया, एक और अधिक निश्चित प्रमाण जोड़ता है, अर्थात् यह कि उसने यह हमारे प्रभु यीशु मसीह में किया, जो मानो सच्चा अभिलेख है। क्योंकि परमेश्वर का हमें चुनने की कृपा करना, अर्थात् अनन्तकाल से ऐसा करने की कृपा करना, मानो हमारा लिखित पंजीकरण था। और पवित्र शास्त्र परमेश्वर के चुनाव को जीवन की पुस्तक कहता है। जैसा मैंने पहले कहा, यीशु मसीह अभिलेख का काम करता है। उसी में हम लिखे गए हैं और परमेश्वर से उसकी सन्तान स्वीकार किए गए हैं। तो चूँकि परमेश्वर की दृष्टि हम पर यीशु मसीह के व्यक्तित्व में थी, इससे निष्कर्ष निकलता है कि उसने हममें ऐसा कुछ नहीं पाया जिसे हम उसके सामने रख सकें कि वह हमें चुने। संक्षेप में, यही वह बात है जो हमें सदा स्मरण रखनी चाहिए।
इसके बाद आता है कि यह 'इसलिये कि हम परमेश्वर के सम्मुख प्रेम में शुद्ध और निर्दोष हों'। 'प्रेम' शब्द को परमेश्वर से जोड़ा जा सकता है, मानो कहा गया हो कि हमें और कोई कारण न मिलेगा कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बनाने की कृपा क्यों की, सिवाय उसके अपने स्वतन्त्र प्रेम के। या फिर (जैसा अधिक सम्भव जान पड़ता है) सन्त पौलुस हमें यहाँ दिखाता है कि विश्वासियों की सच्ची सिद्धता और पूर्णता क्या है, अर्थात् परमेश्वर के सम्मुख सारी धार्मिकता में चलना। हम अभी पूरी व्याख्या नहीं कर सकते, परन्तु संक्षेप में यह बता देना काफी होगा कि सन्त पौलुस का क्या अभिप्राय था। क्योंकि वह यहाँ दिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर का चुनाव स्वतन्त्र है और मनुष्यों की सारी योग्यता, कामों और गुणों को गिराकर शून्य कर देता है, तौभी वह हमें बुराई करने और उच्छृंखल जीवन बिताने, या बेलगाम हो जाने की छूट नहीं देता, वरन् उस बुराई से जिसमें हम डूबे थे हमें निकालने का काम करता है। क्योंकि स्वभाव से हम परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते; दुष्टता सदा हममें राज्य करेगी; और हम शैतान के बन्धनों और अत्याचार के नीचे दबे हुए हैं। इसलिये परमेश्वर को हममें कार्य करना और हमें बदलना होगा, क्योंकि सारी भलाई उसके चुनाव से आती है, सन्त पौलुस कहता है।
तो तुम देखते हो कि वह विश्वासियों को जहाँ पहुँचाना चाहता था वह यह था कि वे जान लें कि जैसे परमेश्वर ने उन्हें अपने स्वतन्त्र अनुग्रह से चुना, वैसे ही वह उन्हें सब प्रकार की दुष्टता में अपने आप को सौंप देने की छूट नहीं देता, वरन् उन्हें अपने लिये निष्कलंक रखना और बचाए रखना चाहता है। क्योंकि परमेश्वर का हमें चुनना और उसके साथ ही हमें पवित्रता के लिये बुलाना अलग न होनेवाली रीति से जुड़ी हुई बातें हैं, जैसा सन्त पौलुस दूसरे स्थान पर कहता है कि हम अशुद्धता और मलिनता के लिये नहीं बुलाए गए, वरन् सारी भक्ति और पवित्रता में परमेश्वर के लिये समर्पित होने के लिये [1 थिस्सलुनीकियों 4:7]।
अब, चूँकि हम इस समय सारी व्याख्या नहीं कर सकते, आओ इस शिक्षा से लाभ उठाने का यत्न करें। और चूँकि हम अब अपने प्रभु यीशु मसीह का भोज ग्रहण करने की तैयारी करने पर हैं, जो हमारे चुनाव का, और हमारे उद्धार की आशा का, और परमेश्वर के स्वतन्त्र प्रेम के इस स्रोत और सोते से निकलनेवाले सब आत्मिक लाभों का हमारे लिये प्रतिभू है, आओ जान लें कि वहाँ वह अपने धन हमारे सामने इसलिये प्रकट करता है कि हम उनका दुरुपयोग करें, वरन् इस उद्देश्य से कि हमारे हाथों उनके कारण उसकी महिमा हो, केवल हमारे मुँह से ही नहीं वरन् हमारे सारे जीवन से भी। और चूँकि हम सब कुछ उसी से पाते हैं, आओ हम यह भी सीखें कि उसके हों और अपने आप को उसकी आज्ञाकारिता में सौंप दें, कि वह हमें शान्ति से अपनाए। और आओ हम सदा इसी लक्ष्य की ओर दृष्टि रखें, अर्थात् इस बात की पक्की स्वीकृति पाना कि वह हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण करता और मानता है, उसके चिह्न धारण करके और सचमुच यह दिखाकर कि उसे पिता कहकर पुकारने में हम सचमुच उसके पवित्र आत्मा के चलाए चलते हैं। इस प्रकार तुम सचमुच देखते हो कि इस अंश में जब तक आगे का भाग न आए, हमें क्या ध्यान रखना है।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के आगे अपने दोषों को स्वीकार करते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि हम उसके भय में निरन्तर उन्नति करें और उसी में अधिकाधिक दृढ़ होते जाएँ; और इस बीच हमारी निर्बलताओं को ऐसा सह ले कि हम सदा उसका अनुग्रह पाते रहें, जब तक कि वह हमें सब वस्तुओं का अधिकारी न ठहरा दे, उस समय जब वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमारे पापों को दूर करके पूरी तरह मिटा चुका होगा। और इसलिये आओ हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता।
