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हमारे प्रभु यीशु मसीह के दुःखभोग पर दूसरा उपदेश - मत्ती 26:40-50
तब वह चेलों के पास आकर उन्हें सोते पाता है, और पतरस से कहता है, क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके? जागते रहो और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो; आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। फिर उसने दूसरी बार जाकर यह प्रार्थना की, कि हे मेरे पिता, यदि यह कटोरा मेरे पीए बिना नहीं हट सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो। तब उसने आकर उन्हें फिर सोते पाया, क्योंकि उन की आँखें नींद से भरी थीं। और उन्हें छोड़कर फिर चला गया, और वही बात कहकर तीसरी बार प्रार्थना की। तब उसने चेलों के पास आकर उनसे कहा, अब सोते रहो, और विश्राम करो: देखो, घड़ी आ पहुँची है, और मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ पकड़वाया जाता है। उठो, चलें; देखो, मेरा पकड़वानेवाला निकट आ पहुँचा है। वह यह कह ही रहा था कि यहूदा जो बारहों में से एक था, आया, और उसके साथ प्रधान याजकों और लोगों के प्राचीनों की ओर से एक बड़ी भीड़ तलवारें और लाठियाँ लिए हुए आई। उसके पकड़वानेवाले ने उन्हें यह पता दिया था, कि जिसको मैं चूमूँ वही है; उसे पकड़ लेना। और तुरन्त उसने यीशु के पास आकर कहा, हे रब्बी, नमस्कार; और उसे बहुत चूमा। और यीशु ने उससे कहा, हे मित्र, तू किस काम के लिये आया है? तब उन्होंने पास आकर यीशु पर हाथ डाले और उसे पकड़ लिया। — मत्ती 26:40-50
हमने आज प्रातःकाल देखा कि परमेश्वर का पुत्र, जिसे हमारा जमानतदार बनकर अपने पिता परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने दण्ड की आज्ञा पाने के लिये खड़ा होना था, ऐसे कठिन संघर्ष को सहने के लिये प्रार्थना के द्वारा बलवन्त किया गया। क्योंकि आवश्यक था कि मानवीय दुर्बलता उसमें प्रकट हो, और जब उसने हमारे उद्धार को सिद्ध करने के लिये अपने आपको धूल तक झुका दिया, तब इससे उसकी ईश्वरीय महिमा में कुछ भी घटी नहीं हुई। अब हमें यह ध्यान देना है कि उसने केवल एक ही बार प्रार्थना नहीं की। इससे हम देखते हैं कि उसने अपने उदाहरण से हमें उभारा है कि यदि हमारी सुनवाई उतनी शीघ्र न हो जितनी हम चाहते हैं, तो हम हियाव न छोड़ें। इसलिये जो लोग इस कारण साहस खो बैठते हैं कि हमारा परमेश्वर उनकी पहली ही इच्छा पर उत्तर नहीं देता, वे प्रकट करते हैं कि वे नहीं जानते कि प्रार्थना क्या है। क्योंकि परमेश्वर की शरण लेने का निश्चित नियम यह है कि उसमें दृढ़ता हो। इसी कारण हमारे विश्वास का मुख्य अभ्यास प्रार्थना है। और विश्वास प्रतीक्षा के बिना टिक नहीं सकता। यह सम्भव नहीं कि जैसे ही हमने अपना मुँह खोला और अपनी विनती कही, परमेश्वर तुरन्त हमारी इच्छा पूरी कर दे। परन्तु आवश्यक है कि वह विलम्ब करे और हमें प्रायः तरसने दे, ताकि हम जानें कि सच्चाई से और बिना दिखावे के उसे पुकारना क्या होता है; ताकि हम यह प्रकट करें कि हमारा विश्वास परमेश्वर के वचन पर ऐसा स्थापित है कि वह लगाम की तरह हमें रोके रखता है, कि जब तक हमारी सहायता करने का उचित समय न आ जाए तब तक हम धीरज से सहते रहें। तो हम भली-भाँति ध्यान दें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने पिता परमेश्वर से केवल एक बार प्रार्थना नहीं की, परन्तु दूसरी बार भी उसके पास लौटा।
इसके अतिरिक्त हमें उस बात पर भी विचार करना है जिसे हम पहले ही छू चुके हैं: अर्थात् यह जानना कि हमारे प्रभु यीशु ने यहाँ कोई साधारण प्रार्थना नहीं की, वरन् मानो वह अपने सब निजी विचारों को एक ओर रख देने के लिये तैयार हुआ। वह जो अपने पिता परमेश्वर की सामर्थ्य है, जिसके द्वारा सारा संसार थामा हुआ है, तो भी, क्योंकि उसे अपने आपको एक दुर्बल मनुष्य दिखाना था, हमारा स्थान लेकर, हमारी जगह वहाँ खड़े होकर; उसने जब यों अपनी प्रार्थना दोहराई तब यह प्रकट किया कि उसने यह तमाशे के लिये नहीं किया (जैसा कि कई अधर्मी लोग कल्पना करते हैं कि जब यीशु मसीह प्रकट हुआ तो उसने कुछ भी दुःख नहीं सहा), परन्तु इसलिये कि हम सीखें कि हम परमेश्वर के हाथ और उसके शाप से इसी उपाय के बिना बच नहीं सकते। अब यहाँ हमें बताया गया है (जैसा कि आज प्रातःकाल बताया गया था) कि हमारा प्रभु यीशु चरम सीमा तक कुचला गया, यहाँ तक कि जो बोझ उसने उठाया था वह असहनीय था, यदि परमेश्वर के आत्मा की अजेय सामर्थ्य उसमें कार्य न करती। हमें यह न सोचना चाहिए कि जब उसने यही शब्द दोहराए तो वह व्यर्थ बकवाद था। क्योंकि दूसरे स्थान में जो कहा गया है कि परमेश्वर से प्रार्थना करते समय हमें लम्बी बकवाद नहीं करनी चाहिए, जैसे वे लोग करते हैं जो मानते हैं कि शब्दों में उलझे रहने से उन्हें बहुत अधिक मिल जाता है, उसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी प्रार्थनाओं में लगे न रहें, परन्तु यह उन लोगों के कपट और अन्धविश्वास को डाँटना है जो मानते हैं कि परमेश्वर के कान के परदे (यों कहें) फाड़कर उसे अपनी इच्छा मनवा लेंगे। देखो, यह मूर्खता संसार में कैसी फैल गई है! फिर, हमारे बीच कितने हैं जो यह जादू-टोना करते हैं, कितने हैं जो अपने आवे मारिया से अधिक कुछ नहीं कहते, और जिन्हें ऐसा लगता है कि जितनी बार वे अपनी प्रभु की प्रार्थना कह लेते हैं उतनी बार उन्होंने बहुत कुछ कमा लिया, और यह कि परमेश्वर उन सब शब्दों को गिन लेगा जिनमें वे प्रार्थना करते समय उलझे रहते हैं! अब मैं इसे सचमुच का जादू-टोना कहता हूँ। क्योंकि वे उस प्रार्थना को, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें दी है, दयनीय रीति से अपवित्र करते हैं, जिसमें उसने एक संक्षिप्त सार में वह सब समाविष्ट कर दिया है जो हम परमेश्वर से माँग सकते हैं और जिसकी इच्छा या माँग करना हमारे लिये उचित है।
तो भी इसका यह अर्थ नहीं कि यदि कोई मनुष्य वेदना से कुचला जाए तो उसे बार-बार परमेश्वर के पास न लौटना चाहिए, और जब वह कुछ आहें भर चुके तो उसके तुरन्त बाद फिर आरम्भ न करे। मान लो कि हम बिना महत्वाकांक्षा और बिना दिखावे के उसके पास आते हैं, और फिर हमारे मन में यह विचार नहीं कि हमने अपनी बकवाद से कुछ पा लिया, परन्तु एक सच्ची भावना हमें प्रेरित करती है, तो हममें सच्ची दृढ़ता है, जैसी हमारे प्रभु यीशु मसीह में थी। अब इस बात पर ध्यान देना है, जैसा कि हम कह चुके हैं, कि हमारी सब प्रार्थनाओं में मुख्य बात यह है कि परमेश्वर हमें इस सीमा तक अपने अधीन कर ले कि हमारी ओर से उसकी भली इच्छा के अनुरूप होने की सहमति हो। निश्चय ही यह हमारे लिये आवश्यक है। देखो हमारे प्रभु यीशु मसीह को, कि यद्यपि उसकी सब भावनाएँ सीधी, पवित्र और धार्मिकता के अनुरूप थीं, तो भी, जहाँ तक वह स्वाभाविक मनुष्य था, उसे उस वेदना और शोक से लड़ना पड़ा जो उसे कुचल सकता था, और उसे अपने आपको अपने पिता परमेश्वर की आज्ञाकारिता के अधीन बन्दी बनाए रखना पड़ा। हमारा क्या होगा जिनके पास द्वेष और विद्रोह के सिवाय कुछ नहीं, और जो ऐसे बिगड़े हुए हैं कि हम अपनी इन्द्रियों को किसी भी बात में ठीक से लगाना नहीं जानते? क्या परमेश्वर पूरी रीति से अप्रसन्न न होगा? जब ऐसा है, तो आओ हम परमेश्वर से प्रार्थना करते समय अपने आपको इस प्रकार रोकना सीखें कि कोई भी अपने मनमाने उतावलेपन को वैसी छूट न दे जैसी वह अपनी अभिलाषाओं के पीछे चलने में लेने का अभ्यस्त है। परन्तु हम जान लें कि यदि हम अपने आपको बन्दी बना सकें, ताकि परमेश्वर हम पर पूर्ण अधिकारी हो, तो हमने बहुत लाभ पाया होगा।
यह भी एक उल्लेखनीय वाक्य है जब हमारा प्रभु यीशु अपने चेलों से कहता है, “जागते रहो और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो; क्योंकि आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।” इस प्रकार उसने यहाँ दिखाया कि परमेश्वर को पुकारने के लिये हमें उकसानेवाली मुख्य प्रेरणा यह है कि हमें लड़ना है, हमारे शत्रु निकट हैं और बलवन्त हैं, और ऊपर से सहायता और बल पाए बिना हम उनका सामना न कर सकेंगे, और परमेश्वर हमारे लिये न लड़े तो नहीं। अब हम जानते हैं कि जब मनुष्य निश्चिन्त होता है तब वह केवल यही चाहता है कि उसे सब सुख-सुविधाएँ मिलें और वह सोता रहे। क्योंकि हम अपनी इच्छा से चिन्ता या उदासी को स्वीकार नहीं करते, जब तक आवश्यकता हम पर उसे थोप न दे। निश्चय ही विश्राम पाना परम भलाई है, नहीं तो हम थककर चूर हो जाएँ। तो भी यह बहुत आवश्यक है कि आवश्यकता हमें जागरूक रहने के लिये विवश करे। इसलिये हमारे प्रभु यीशु ने बिना कारण नहीं कहा कि हमें अनेक भयों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि जो बात उसने अपने चेलों से एक ही बार कही, वह हम सब से सामान्य रूप से सम्बन्ध रखती है, क्योंकि अपने जीवन में हमें सदा अनेक परीक्षाओं का सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिए। क्योंकि यदि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं, तो शैतान हमारा सदा का शत्रु है। इसलिये खुला युद्ध होगा, जो न कभी रुकेगा न थमेगा।
फिर देखें कि हमारा किस प्रकार के शत्रु से सामना है। वह केवल एक नहीं, वरन् उनकी गिनती अनगिनत है। इसके अतिरिक्त शैतान के पास हमें गिराने के अनगिनत उपाय हैं; कभी वह खुलेआम प्रहार करता है, कभी भीतर ही भीतर षड्यन्त्र रचता है, और चतुराई से हमें लाखों बार अचानक आ दबोचेगा, इससे पहले कि हम इसका विचार भी करें। जब, जैसा पौलुस कहता है, हमारे शत्रु वे शक्तियाँ हैं जो हमारे सिर के ऊपर आकाश में बसती हैं, और हम यहाँ बेचारे केंचुओं के समान हैं जो नीचे ही रेंगते हैं, तो यह निश्चय ही हमें चिन्तित करना चाहिए। वैसे ही पतरस भी यह कारण बताता है, कि हमारा शत्रु गर्जनेवाले सिंह के समान है जो शिकार ढूँढ़ता फिरता है और कभी विश्राम नहीं करता। तो हमारे प्रभु यीशु के उस कथन में हमें यही बात देखनी है कि हमें चौकस रहना चाहिए कि परीक्षा में न पड़ें। इसके अतिरिक्त, चाहे हम जागते रहें, चाहे हम अच्छी चौकसी रखें, तो भी हम इससे बच नहीं सकते कि शैतान हमारे विरुद्ध उठे या अनेक और भिन्न-भिन्न रीतियों से हम पर आक्रमण करे। इसलिये हम प्रहारों को दूर ही से नहीं हटा सकते। परन्तु युद्ध में उतरने से पहले हमें चौकस रहना है कि कहीं हम परीक्षा में न डुबा दिए जाएँ।
तो आओ हम सीखें कि यद्यपि विश्वासी और परमेश्वर की सन्तान विश्राम पाना चाहते हैं, तो भी उन्हें यहाँ आराम से रहने की इच्छा न करनी चाहिए। परन्तु उनके लिये यही बहुत है कि परमेश्वर उनकी दुर्बलता में अपनी सामर्थ्य सिद्ध करता है, जैसा कि पौलुस भी कहता है कि उसे इसमें से होकर निकलना पड़ा। मैं कहता हूँ, यह परमेश्वर की सब सन्तानों की दशा है कि वे इस संसार में लड़ें, क्योंकि वे विरोध के बिना परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परन्तु यद्यपि वे दुर्बल हैं, यद्यपि वे रोके जा सकते हैं, यहाँ तक कि प्रायः गिराए भी जाते हैं, तो भी वे इसी में सन्तुष्ट रहें कि परमेश्वर का हाथ उनकी सहायता और टेक बनता है, और वे सदा इस प्रतिज्ञा का सहारा लें कि हमारा विश्वास सारे संसार पर जयवन्त होगा। फिर हमारे सामने जो उपाय रखा गया है वह भी यही है कि हम लड़ें। निश्चय ही शैतान हम पर आक्रमण करने के लिये सदा नए-नए आरम्भ करता है, परन्तु यीशु मसीह भी हमें जागते रहने की आज्ञा देता है। इसके अतिरिक्त वह दिखाता है कि जो लोग अपने बल पर घमण्ड करते हैं वे एक भी विजय पाने से पहले शैतान से लाखों बार हराए जाएँगे। तब क्या चाहिए? यह कि, पूरी दीनता के साथ यह मानते हुए कि हम कुछ नहीं कर सकते, हम अपने परमेश्वर के पास आएँ।
तो यही हमारे सच्चे हथियार हैं। वही है जो हमारे सारे भय और आतंक को दूर करता है। वही है जो हमें निश्चयता और दृढ़ संकल्प दे सकता है कि अन्त तक हम सुरक्षित और भले-चंगे बने रहेंगे, अर्थात् जब हम परमेश्वर को पुकारते हैं। जैसा सुलैमान कहता है, (नीतिवचन 18:10) “यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, और धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से सुरक्षित रहता है।”
भविष्यद्वक्ता योएल भी कहता है, “चाहे संसार उलट-पलट हो जाए, तो भी जो कोई यहोवा का नाम लेगा वह उद्धार पाएगा।” यह विशेष रूप से हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य पर लागू होता है, ताकि हम पूरी रीति से निश्चित हो जाएँ कि यद्यपि हमारा उद्धार मानो अधर में लटका हो, और यद्यपि हम मानो हज़ारों जोखिम देखें, तो भी परमेश्वर हमें सदा अपनी रक्षा में रखेगा, और हम अनुभव करेंगे कि उसकी सामर्थ्य सदा हमारे निकट और हमारी सहायता के लिये तैयार है, बशर्ते हम उसे मुँह और मन की प्रार्थना के द्वारा खोजें। तो संक्षेप में यही बात है जो हमें स्मरण रखनी है। कि हम इस शिक्षा में और अच्छी रीति से दृढ़ हो जाएँ, इसके लिये ध्यान दें कि हमारे प्रभु यीशु ने प्रार्थना करते समय केवल अपने लिये और अपने निजी प्रयोजन के लिये परमेश्वर को नहीं पुकारा, परन्तु उसने हमारी सब विनतियों और प्रार्थनाओं को इस प्रकार समर्पित कर दिया कि वे पवित्र ठहरें और परमेश्वर उन्हें स्वीकार करे और ग्रहणयोग्य माने। जैसा यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय में कहा है, वह अपने आपको पवित्र करता है कि हम सब उसमें पवित्र किए जाएँ। निश्चय ही हमें यह भी निष्कर्ष निकालना चाहिए कि उसने इसलिये प्रार्थना की कि उसकी प्रार्थना आज भी प्रभावी हो, और उसकी पूरी शक्ति बनी रहे, और इस रीति से हम सब सुने जाएँ।
यह विचार तब बहुत मूल्यवान है जब वह यह जोड़ता है, “आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।” क्योंकि यह दिखाने के लिये है कि सब को उस सलाह की आवश्यकता है जो उसने यहाँ अपने चेलों को दी। क्योंकि बहुत से लोग सोचते हैं कि यदि उनमें कोई भली अभिलाषा है तो उन्होंने सब कुछ पा लिया। इससे वे उदासीन हो जाते हैं। शीघ्र ही उन्हें ऐसा आलस्य और ठण्डापन आ घेरता है कि वे परमेश्वर से पीछे हट जाते हैं और उसकी सहायता को तुच्छ जानते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर प्रायः अपने आपको हटा लेता और अपनी सामर्थ्य को छिपा लेता है। क्योंकि यह भली बात है कि जो मनुष्य अपने आप पर बहुत भरोसा रखते हैं वे अपने को निराश पाएँ, और परमेश्वर उनके अहंकार और मूर्खतापूर्ण कल्पना का उपहास करे। इसलिये कि क्या बड़े क्या छोटे सब जानें कि वे परमेश्वर की सहायता के बिना नहीं रह सकते, और जो कुछ अनुग्रह उन्हें मिले हैं, उनमें जो कुछ परमेश्वर ने डाला है उसे वही बनाए रखे और उसे और भी बढ़ाए कि वे दृढ़ किए जाएँ, यहाँ कहा गया है, “आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।” अर्थात् जब हम अपने भीतर कुछ भली इच्छा अनुभव करते हैं, और परमेश्वर हमें पहले ही मार्ग पर चला चुका है, और उसने हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाया है, तो हम अनुभव करें कि वह सचमुच अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारा संचालन करता है। इसलिये, यद्यपि हमारे पास यह सब कुछ हो, तो भी हमें प्रार्थना करने में ढीला न होना चाहिए। और क्यों नहीं? आओ विचार करें कि क्या हमारे भीतर केवल आत्मा ही है। निश्चय ही हम बहुत सी निर्बलताएँ शेष पाएँगे। यद्यपि परमेश्वर पहले ही ऐसा कार्य कर चुका हो कि हमारे पास उसका धन्यवाद करने और उसकी भलाई की बड़ाई करने के लिये कुछ हो; तो भी सिर झुकाने और यह देखने का कारण है कि यदि वह हमें छोड़ दे तो हम बहुत शीघ्र, मैं यह नहीं कहता कि दुर्बल, परन्तु बिलकुल मूर्छित हो जाएँगे।
एक शब्द में, हमारा प्रभु यीशु यहाँ यह दिखाना चाहता था कि जो सबसे सिद्ध हैं, जो सबसे आगे बढ़ चुके हैं, और जिन पर परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह और सामर्थ्य उँडेले हैं, उन्हें भी दीन रहना चाहिए, और भय और सावधानी के साथ चलना चाहिए, हर घड़ी परमेश्वर को पुकारना चाहिए, यह जानते हुए कि यह पर्याप्त नहीं कि उसने आरम्भ किया है, यदि वह पूरा न करे। निश्चय ही हर भलाई उसी की ओर से आनी चाहिए। जब उसने भली इच्छा दी है तो उसे और पूरी रीति से पूर्ण करना भी जारी रखना चाहिए, क्योंकि अन्त तक स्थिर रहना सबसे अनोखा और सबसे दुर्लभ वरदान है। इसी कारण हमारे प्रभु यीशु ने हमें उभारना चाहा। अब यदि वे जो आत्मिक कहे जा सकते हैं, अर्थात् जिनमें परमेश्वर की सेवा करने की उत्कट धुन है, जो उसकी शरण लेने के पूरे अभ्यस्त हैं, जो मुँह और मन से परमेश्वर की प्रार्थना में अभ्यासी हैं, तो भी इतने दुर्बल हैं कि यदि वे परमेश्वर को न पुकारें तो एक ही क्षण में नाश हो सकते हैं; तो उनका क्या होगा जो अब भी ऐसे सांसारिक और दयनीय रीति से दबे हुए हैं कि वे अपने पाँव घसीट भी नहीं सकते, और जिनमें मुश्किल से कोई भली प्रेरणा या एक भी भला विचार होता है? उन्हें इनाम के लिये कैसा संघर्ष करना पड़ेगा! तो हम में से हर एक अपने आपको जाँचे, और हम पाएँगे कि परमेश्वर से प्रार्थना करने के विषय में हम इतने ढीले और मन्द हैं कि कभी-कभी भावना से अधिक रीति-रस्म ही होती है। यह देखकर हम ऐसे दोष और ऐसी शिथिलता के कारण अपने आप से अप्रसन्न होना सीखें। हम ऐसी भ्रष्टता से घृणा भी करें, हम परमेश्वर को पुकारने का यत्न करें, और अपने मन को ऊपर उठाएँ, और उस उपाय को खोजें जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है। तो संक्षेप में यही बात है जो हमें स्मरण रखनी है।
अब जब कहा गया है कि चेले तीसरी बार भी सो गए, यद्यपि उन्हें इतनी तीव्रता से उभारा गया था (उससे परे जो हमने आज प्रातःकाल कहा, अर्थात् यह कि हम देखते हैं कि यीशु मसीह ने हमारे उद्धार को सिद्ध करने के लिये कोई और साथी नहीं ढूँढ़ा) तो आओ हम यह भी विचार करें कि हम कितने मन्द हैं। क्योंकि यह निश्चित है कि हममें इन तीनों से जिनका यहाँ उल्लेख है अधिक सामर्थ्य नहीं, और तो भी वे मण्डली में सबसे उत्तम थे, और वे जिन्हें यीशु मसीह ने बारहों का सिरमौर ठहराया था, जिन्हें सारे संसार में सुसमाचार का प्रचार करना था। यद्यपि इस प्रकार का अच्छा आरम्भ पहले से था, तो भी हम देखते हैं कि वे कैसे दुर्बल पड़ गए। अब यह इसलिये है कि हम केवल परमेश्वर के पुत्र की शरण लें, और उसमें वह सब ढूँढ़ें जिसकी हममें घटी है, और जब हम अपने भीतर ऐसी दुर्बलता अनुभव करें तो साहस न खोएँ। सच है कि प्रेरितों का उदाहरण हमें अपनी चापलूसी करने का कोई अवसर नहीं देता (जैसा कि बहुत लोग कहेंगे कि उन्हें भी उतना ही सोने का अधिकार है जितना पतरस, यूहन्ना और याकूब को था), वरन् हमें अपने दोषों से अप्रसन्न करता है, ताकि हम सदा जानें कि हमारा प्रभु यीशु हमें ग्रहण करने को तैयार है, बशर्ते हम उसके पास आएँ। इसके अतिरिक्त, वह विशेष कारण सदा बना रहता है जो हमने आज प्रातःकाल बताया, कि आवश्यक था कि वह सब कुछ जो मनुष्य है झुक जाए, ताकि हम जानें कि हमारे उद्धार की पूर्ति उसी में है जो परमेश्वर की ओर से हमारा मध्यस्थ ठहराया गया। हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के निकट होते हैं तब हमें और भी अधिक चौकस रहना चाहिए। क्योंकि संसारी लोगों का, और उनका जिन्हें परमेश्वर ने सड़े हुए अंगों के समान पूरी रीति से काट डाला और त्याग दिया है, कोई बड़ा संघर्ष नहीं होता। क्योंकि शैतान का उन पर पहले ही अधिकार है। और इसीलिये वे आराम से सो सकते हैं। परन्तु जैसे-जैसे हमारा प्रभु यीशु हम पर यह अनुग्रह करता है कि हमें अपने पास बुलाए, और परिचित रीति से हमारे निकट आए, वैसे-वैसे शैतान की ओर से लड़ाइयाँ भी भड़कती हैं, क्योंकि वह हमें परमेश्वर के पुत्र की आज्ञाकारिता से पीछे खींचना चाहता है। जब (मैं कहता हूँ) वह देखता है कि हम सही मार्ग पर हैं, तब हम पर और भी कठोर आक्रमण होते हैं। इसलिये हर एक अपने आपको तैयार करे, यह जानते हुए कि वह परमेश्वर की ओर से किस काम के लिये बुलाया गया, और उसका दायित्व क्या है। तो संक्षेप में यही है जो हमें स्मरण रखना है।
इसके अतिरिक्त, जब कहा गया है “सोते रहो और विश्राम करो, घड़ी आ पहुँची है” तो यह मानो इस बात की घोषणा है कि यदि परमेश्वर उन पर चौकसी न रखता तो वे शीघ्र ही अचानक आ घेरे जाते। तो भी वह उन्हें यह कहकर डाँटता है, “यह क्या? देखो तुम कहाँ हो। क्योंकि शैतान मनुष्य के विनाश के लिये सब प्रकार का यत्न कर रहा है, और मेरे व्यक्तित्व में परमेश्वर का राज्य पुनः प्राप्त होना है, नहीं तो सारी सृष्टि नाश हो जाएगी। फिर भी तुम यहाँ सो रहे हो।” अब इस चेतावनी से उस समय तो कुछ लाभ न हुआ। परन्तु जैसे-जैसे समय बीता, चेलों ने जान लिया कि उन्हें अपने उद्धार की सारी स्तुति परमेश्वर ही को देनी चाहिए, क्योंकि उनकी कृतघ्नता ऐसी पशु-सी कायरता में प्रकट हुई थी। तो अब हमें भी चेतावनी दी जाती है (जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ) कि परमेश्वर के पुत्र को हमारा छुड़ानेवाला अकेले ही और बिना किसी सहायता के प्रकट होना था। इसके अतिरिक्त, यह भी सीखें कि यह नितान्त आवश्यक है कि परमेश्वर हमारी चौकसी करे, तब भी जब हम सोते हों। क्योंकि कितनी बार ऐसा होगा कि शैतान ने हमें लाखों बार दबोच लिया होता? फिर भी उसका सामना करने का हमारे पास क्या उपाय है, जब तक परमेश्वर हम पर तरस न खाए, यद्यपि वह हमें मानो संवेदनहीन अवस्था में पड़ा हुआ देखता है। इसलिये इससे हमें भटक जाने और परमेश्वर से प्रार्थना में बात करना छोड़ देने का अवसर न मिलना चाहिए। परन्तु हमें भजन संहिता के इस वचन को सदा स्मरण रखना चाहिए,
“जो इस्राएल की रक्षा करता है, वह न ऊँघेगा और न सोएगा।” (भजन संहिता 121:4।)
तो हम अपनी ओर से जागते रहें, जैसा कि इस उपदेश से हमें उभारा जाता है। परन्तु हम जान लें कि हम स्वयं चाहे कितने ही जागरूक हों, परमेश्वर को फिर भी सावधानी से चौकसी रखनी होगी। नहीं तो हमारे शत्रु शीघ्र ही हम पर जयवन्त हो जाएँगे।
इसके बाद यीशु मसीह अपने चेलों से कहता है, “उठो, चलें; मेरा पकड़वानेवाला निकट आ पहुँचा है।” वह नहीं चाहता कि वे उसका साथ दें (जैसा हम पहले कह चुके हैं), सिवाय इसके कि वे देखें कि वह उनके लिये, और मनुष्य जाति के लिये, अपने आपको नहीं बचाता। क्योंकि उसने अपने आपको सब प्रहार झेलने के लिये प्रस्तुत किया और उन्हें उनसे बचा लिया, क्योंकि आवश्यक था कि यह वचन पूरा हो, “उसने उनमें से किसी को नाश न होने दिया, जिन्हें स्वर्गीय पिता ने उसे दिया और उसकी देखरेख और रक्षा में सौंप दिया था।” परन्तु इससे वह प्रकट करता है कि वह अपनी इच्छा से मृत्यु के पास गया, उसी के अनुसार जो हमने आज प्रातःकाल कहा, कि आज्ञाकारिता का बलिदान हमारे सब विद्रोहों को मिटाने के काम आना था। यदि यीशु मसीह अपनी इच्छा से अपने पिता परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने के लिये अर्पित न होता, तो उसकी मृत्यु और दुःखभोग हमारे किसी काम के न होते। परन्तु वह इस पर दृढ़ रहता है और प्रकट करता है कि जैसे उसने हमारा छुटकारा पूरा करने के लिये हमारा स्वभाव धारण किया, वैसे ही अब चरम कार्य में वह अपने पद से चूकना नहीं चाहता था।
वृत्तान्त के अनुसार, “जिसने उसे पकड़वाया था, उसने यहूदा के द्वारा यह पता दिया था कि वही यीशु है और वह पकड़ा जाए, और आकर वह उसे चूमता है और उससे कहता है, ‘हे रब्बी, नमस्कार!’” अब ध्यान दें कि यह अभिवादन की एक रीति थी। जैसे कुछ जातियों में लोग गले मिलते हैं, दूसरी जातियों में हाथ मिलाते हैं। यहूदी इस चुम्बन के पूरे अभ्यस्त थे, जैसा पवित्रशास्त्र से देखा जाता है। इसके अतिरिक्त, यह बात अनोखी लगेगी कि यहूदा, जो थोड़ी ही देर पहले, अर्थात् उसी रात, यीशु मसीह की मण्डली का सदस्य था, लौटकर उसे ऐसे चूमता है मानो वह किसी दूर की यात्रा से आया हो। परन्तु वह इस रीति का प्रयोग इसलिये करता है कि वह वहाँ घबराए हुए मनुष्य के रूप में आता है। और इसीलिये दूसरा सुसमाचार-लेखक कहता है, “रब्बी, रब्बी, नमस्कार!” तो वह यह दिखावा करता है कि उसे बहुत खेद है कि उसका स्वामी इस प्रकार घेरा गया है। जब वह देखता है कि इतनी भीड़ उसे अचानक पकड़ने आई है, तो वह निकट आता है और यीशु मसीह को चूमता है, मानो कह रहा हो, “हे मेरे स्वामी, वे आपको ढूँढ़ रहे हैं, ये रहे आपके शत्रु जो आपको घेरे हुए हैं, वे आपको मिटा डालना चाहते हैं, एक बार आप पर हाथ डालते ही आप मनुष्यों के बीच से काट डाले जाएँगे।” तो यह तरस और करुणा का एक चिह्न है जो यहूदा दिखाता है।
फिर कहा गया है कि यीशु मसीह उसे डाँटता है, “हे मित्र, तू किस काम के लिये आया है?” मानो वह कह रहा हो, “अरे दुष्ट, तू जो मेरी मेज़ पर मेरे साथ रहा है, तू मानो मेरे ही लहू का रहा है, जब हम परमेश्वर की सन्तान के रूप में एक थे (क्योंकि मैं तेरा सिर होकर तुझे अपना अंग जानता था), और फिर भी तू मुझे पकड़वाने आया है, और वह भी चुम्बन से।” इस पर ध्यान दें कि परमेश्वर के पुत्र को चिह्नित किया जाना आवश्यक था, ताकि पवित्रशास्त्र और भी अच्छी रीति से प्रमाणित हो, और यह जाना जाए कि वही है जिसे परमेश्वर ने हमारा छुड़ानेवाला चुना। क्योंकि यह सब दाऊद के व्यक्तित्व में पहले से चित्रित किया गया था, जो मानो परमेश्वर के पुत्र का दर्पण और प्रतिमा था। अब वह कहता है कि जिन्होंने उसे सताया और पीड़ित किया वे परदेशी या वे लोग नहीं थे जिन्होंने खुल्लमखुल्ला अपने आपको उसका शत्रु ठहराया, परन्तु “वह (वह कहता है) जो मेरी मेज़ पर रोटी खाता था, उसने विश्वासघात के लिये अपनी एड़ी उठाई है, उसने मुझे घेर लिया है, उसने मुझसे झूठा विश्वासघात किया है।” वरन्, वह भी (जैसा वह दूसरे स्थान में कहता है) जो मेरे साथ परमेश्वर के भवन को एक संग जाया करता था।” मानो परमेश्वर ने कहा कि वहाँ केवल निजी और मानवीय मित्रता ही नहीं थी, जैसी साथ रहनेवालों के बीच होती है, परन्तु वहाँ परमेश्वर के नाम को समर्पित पवित्र भाईचारा था। तो पवित्र आत्मा हमें यही दिखाना चाहता था कि परमेश्वर के पुत्र पर कुछ ऐसा नहीं बीता जिसकी पहले से साक्षी न दी गई हो और जिसका पहले से चित्रण न हुआ हो, ताकि हम और भी निश्चित हों कि यह वही है जो अनादिकाल से परमेश्वर की ओर से ठहराया गया था, क्योंकि उस पर ऐसे अचूक चिह्न हैं।
इसके अतिरिक्त, यहूदा के व्यक्तित्व में हम देखते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया सदा अनेक विश्वासघातों के अधीन रहेगी। निश्चय ही यह कोई छोटी बात है कि शैतान अपने सारे साज-सामान के साथ हमारा शत्रु है, और वह सब जो हम पहले कह चुके हैं, और उनका भी होना जो परमेश्वर के विरुद्ध खुलकर लड़ते हैं और केवल उसकी कलीसिया का गड़बड़ चाहते हैं। यह कोई छोटी बात है (मैं कहता हूँ) कि हमें ऐसे शत्रुओं से लड़ना है, परन्तु परमेश्वर इस बात में भी हमारे धीरज को परखना चाहता है कि हमारे बीच सदा घर के शत्रु रहें, जो विश्वासघात और बेवफ़ाई से भरे हैं। यद्यपि यह महामारी घृणित है, तो भी कलीसिया कभी इससे शुद्ध न होगी। निश्चय ही हमें इससे चौकस रहना चाहिए, और हर एक को जहाँ तक उसके वश में है ऐसी दुर्गन्ध और छूत को खुरचकर हटाने का यत्न करना चाहिए। परन्तु जब हम सब कर चुकेंगे, तब भी परमेश्वर सदा यही होने देगा कि यहूदा बने रहें। क्योंकि जब यह दाऊद में चित्रित हुआ, और हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरा हुआ, तो हमें उसके अनुरूप होना है (जैसा पौलुस कहता है), क्योंकि वह मानो परमेश्वर के घराने का कुलचिह्न धारण करता है, क्योंकि वह सब विश्वासियों में पहिलौठा है। इसलिये हमें इस दशा में उसके साथ सहभागी होना है। परन्तु हम यहाँ देख सकते हैं कि यह घबराए हुए विवेक से होता है, जब परमेश्वर ने वहाँ व्याकुलता, उन्माद या मूढ़ता की आत्मा डाल दी, जैसा कि वह अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रायः इसकी चर्चा करता था। इसलिये यहूदा हमें उनका दण्ड दिखाता है जो जान-बूझकर परमेश्वर से लड़ते हैं, कि वे ऐसे नष्ट हो जाएँ कि उनमें न तो बुद्धि की समझ रहे और न विवेक। तो भी वे कपट से सब कुछ छिपाने का यत्न करते हैं, यहाँ तक कि कहते हैं कि परमेश्वर उन्हें विवश करता है और उन्हें उनकी अन्तिम दण्डाज्ञा तक ले जाता है। पहली दृष्टि में निश्चय ये दोनों बातें विरोधी लगती हैं: (1) कि मनुष्य जंगली साँड़ की नाईं परमेश्वर पर टूट पड़ने आता है, भूल गया है कि सूर्य पर थूकने से उसे कुछ लाभ नहीं होगा, कि वह प्रायः प्रकृति से बैर साधना चाहता है, और (2) फिर भी बहानों के पीछे छिपने का यत्न करता है, और सोचता है कि अपने कपट से कुछ पा लेगा। कोई कहेगा कि ये दोनों बातें साथ-साथ नहीं हो सकतीं। परन्तु वे यहूदा में देखी जाती हैं। क्योंकि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह की स्वर्गीय सामर्थ्य का अनुभव किया था, उसने इतने चमत्कार देखे थे, और अपनी ओर से उसने भी वे किए थे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से भी। तो यह जानते हुए कि परमेश्वर के पुत्र को जीवन और मृत्यु दोनों पर पूरा अधिकार है, वह उसे पकड़वाता है, और कहता है कि उसने ठीक किया। नहीं तो वह तुरन्त बच निकलता। इसलिये यहूदा बुद्धि और विवेक से पूरी रीति से भ्रष्ट हो गया है, और मानो उन्मत्त है। इसलिये वह केवल एक चुम्बन से और इन मीठे शब्दों से, “हाय मेरे स्वामी,” कहकर, अब भी अपने आपको बहानों से बचने नहीं देता, यह सोचकर कि इस उपाय से वह छूट जाएगा। परन्तु शैतान अपने चाकरों की आँखों में इसी प्रकार चकाचौंध डालता है।
तो पहले हम यह सीखें कि अपने आपको दीन करें, ताकि कोई इस अत्यन्त कठोर चट्टान से न टकराए। अर्थात् हम अपने प्रभु यीशु मसीह से युद्ध न करें। तो हम सावधानी से जागते रहें, कि कहीं हम इस शैतानी क्रोध में न अड़े रहें, कहीं हम सत्य से न लड़ें, और कहीं हम अपने विवेक से न झगड़ें, ऐसा कि हम जान-बूझकर परमेश्वर का क्रोध भड़काएँ, मानो हम उसे ललकारना चाहते हों। हम इससे चौकस रहें। हम अपने कपट और अपनी कल्पित बातों में अपनी ऐसी चापलूसी न करें कि अन्त में उन्हीं से ठगे और धोखा खाएँ। क्योंकि हम देखते हैं कि यहूदा के साथ क्या हुआ (जैसा वृत्तान्त में कहा गया है), कि आवश्यक नहीं था कि कोई न्यायी उसे दोषी ठहराए, आवश्यक नहीं था कि उसे मुकर जाने को विवश किया जाए। परन्तु उसने मान लिया कि उसने निर्दोष लहू बेचा और पकड़वाया है। तो भी उसने अपने कुकर्म की क्षमा नहीं माँगी, परन्तु निराश होकर चला गया कि फाँसी लगाए और वह फट गया। तो हम भली-भाँति सचेत रहें कि शैतान को ऐसा अवसर न दें कि जब हम अपने पापों में सोए हों तब वह हमारी आँखें नोच ले, और इस उपाय से परमेश्वर के हाथ से बच निकलने की आशा न रखें। परन्तु हम यह सारा बहाना दूर कर दें।
इसके अतिरिक्त, हम जानें कि निश्चय भजन संहिता 2:12 में हमें परमेश्वर के पुत्र को चूमने की आज्ञा दी गई है, परन्तु वह इसलिये कि हम उसे अपने राजा के रूप में, और उसके रूप में जिसका सब सृष्टि पर सर्वोच्च अधिकार है, श्रद्धांजलि दें। क्योंकि “चूमो” शब्द का अर्थ केवल श्रद्धा और इस गम्भीर घोषणा से है कि हम उसी के हैं। जैसा उसने कहा, “तुम मुझे गुरु कहते हो, और ठीक कहते हो।” परन्तु उसके पास आते समय हम सचेत रहें कि जब हम अब भी उसके शत्रु हैं तब उसे केवल जीभ की नोक से गुरु न कहें, उसके प्रति झूठी श्रद्धा न दिखाएँ कि उसके विरुद्ध लात मारें और उसे ठुकरा दें। अर्थात् हम अपनी बेवफ़ाई से हठीले और चिड़चिड़े न हों, परन्तु दिखाएँ कि हमने उसकी कलीसिया में अपने आपको केवल इसलिये बनाए रखना चाहा है कि अपने परमेश्वर की सेवा करें। तो हम इस सब की चेतावनी पाएँ। इसके अतिरिक्त, यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह का वचन यहूदा पर तुरन्त प्रभावी नहीं हुआ, तो भी अन्त में इसी वचन के बल से उसे किसी और दण्ड की प्रतीक्षा किए बिना फाँसी लगानी पड़ी।
वास्तव में, यूहन्ना हमें बताता है कि हमारे प्रभु यीशु ने बिजली की नाईं प्रहार किया, यद्यपि उसने उन सब के विरुद्ध जो उसे ढूँढ़ने आए थे केवल एक ही शब्द का प्रयोग किया, जब उसने कहा, “मैं हूँ।” वहाँ पिलातुस की भेजी हुई एक टुकड़ी है। वहाँ याजकों की इकट्ठी की हुई एक सेना है। वे लाठियों, तलवारों और अन्य हथियारों से सज्जित होकर वहाँ आते हैं। यीशु मसीह अकेला है। वह उस मेम्ने के समान है जो वध-स्थान को ले जाया जाता है, जैसा यशायाह कहता है। और वह कौन-सा शब्द प्रयोग करता है? “मैं हूँ।” और सब गिरा दिए जाते हैं। सब तुरन्त गिर पड़ते हैं। और यह गिरना कैसे होता है? इससे हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु, यद्यपि वह कुछ समय के लिये दीन किया गया, यहाँ तक कि सब कुछ से रिक्त हुआ, तो भी जब उसे उचित लगा तब अपनी स्वर्गीय सामर्थ्य को, कि अपने सब शत्रुओं को गिरा दे, यदि वह चाहता, बनाए रखने से कभी न चूका। आओ हम अपने समय की तुलना उससे करें जो उस समय किया गया। यीशु मसीह को बाँधा और जकड़ा जाना था (जैसा हम आगे देखेंगे)। उसे अपने शत्रुओं को राज्य करने देना था। क्योंकि शैतान ने उन्हें हर प्रकार के क्रोध और क्रूरता के लिये उकसाने को लगाम ढीली कर दी थी। यही है जो लूका कहता है, “यह अन्धकार का राज्य है।” जो भी हो, जब उसने कहा “मैं हूँ” तब उसके शत्रुओं को घबरा जाना पड़ा। तो तब क्या होगा जब वह अपनी महिमा में अपने सब स्वर्गदूतों के साथ आएगा? जब वह उन सब को जिन्होंने उसका विरोध किया उसके पाँव की चौकी बनाने आएगा? जब वह भयानक मुख और अगम्य क्रोध के साथ आएगा? जैसा पौलुस 2 थिस्सलुनीकियों 1:8 में कहता है। तो परमेश्वर की महिमा और हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचन के दुष्ट तुच्छ जाननेवाले उसके सामने कैसे ठहर सकेंगे? जब उसने इस प्रकार अपने शत्रुओं को गिरा दिया, तब वह दुःख सहने को तैयार था और उसने कोई बचाव न किया। मैं कहता हूँ, अपने पिता परमेश्वर का भी नहीं। जैसा उसने कहा, वह माँग सकता था कि दस लाख स्वर्गदूत उसके पास भेजे जाएँ। परन्तु वह रुका रहा। फिर भी निश्चय वह दिखाना चाहता था कि अपनी आवाज़ मात्र से वह हर एक को जो उसके विरोध में था गिरा सकता था, यदि वह चाहता।
इससे हमें सिखाया जाता है कि हम हमारे प्रभु यीशु के वचन का भय मानें। यद्यपि वह यहाँ दृश्य रीति से हमारे बीच बातचीत नहीं करता, तो भी क्योंकि सुसमाचार उसके अधिकार से प्रचार किया जाता है और वह कहता है, “जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है;” आओ हम जो कुछ उसके नाम से हमें सुनाया जाता है उसे पूरी श्रद्धा से ग्रहण करना और अपने आपको उसके अधीन करना सीखें। हम पाएँगे कि यही वचन, जिसने पहरेदारों को और उन्हें जो उसके विरुद्ध आए थे गिरा दिया, हमारी एकमात्र नींव और टेक होगा। क्योंकि हम आनन्द कैसे कर सकते हैं, सिवाय तब जब परमेश्वर का पुत्र हम पर प्रकट हो, और हम देखें कि वह हमारे निकट है, और वह हमें दिखाए कि वह कौन है, और उसके पिता परमेश्वर ने उसे हमारे पास क्यों भेजा है? तो इसी वचन “मैं हूँ” में हम जानें, जब हमारे प्रभु यीशु को भाएगा कि वह अपने सब विश्वासियों पर जैसा प्रकट होता है वैसा प्रकट हो, कि इसी वचन में वह हमें बताता है कि वह हमें अपने पास क्यों बुलाता है, वह हमारे पास क्यों उतरा है, और अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हम में क्यों वास करता है, और इसी में हमारी सारी भलाई और सारा विश्राम है। परन्तु यदि हम बहुत से अधर्मी लोगों की नाईं चिड़चिड़े होकर परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानना चाहें, तो निश्चित रहें कि वह एक वज्र होगा जो हमें नरक की गहराई में गिरा देगा। इसलिये हम डरें, और फिर भी हमारा प्रभु यीशु हमारे लिये द्वार खोले, और हमसे किसी और रीति से कहे, “मैं यहाँ हूँ,” जैसा उसने उन से नहीं कहा जो पहले ही उसके प्रकट शत्रु थे। हम उसके पास आना सीखें।
इसके अतिरिक्त, हम यह भी सीखें कि आज कलीसिया में जो विश्वासघात हम देखते हैं, वे हमें चाहे कितने ही असह्य क्यों न हों, उन्हें धीरज से ऐसे सहें कि हम दिखाएँ कि हम सचमुच परमेश्वर के पुत्र से लिपटे हुए हैं, क्योंकि वह हमारा सिर है। तब हमारे पास उसका सत्य हो। हम एक दूसरे के साथ ऐसा व्यवहार करें कि सच्ची एकता और भाईचारे में एक हो जाएँ। यही है जो हमें स्मरण रखना है।
परन्तु और जो कुछ भी हो, हम इस अंश से स्मरण रखने योग्य मुख्य शिक्षा को स्वीकार करें: अर्थात् यह कि परमेश्वर के पुत्र ने हमारे विद्रोहों का प्रायश्चित्त करने के लिये सब बातों में और सब के द्वारा अपने आपको आज्ञाकारी बनाया। सच है (जैसा मैंने कहा है) कि उसकी देह के सब अंगों को उसके उदाहरण से संचालित होना चाहिए। यह उचित भी है, कि जब वह जिसका पूर्ण अधिकार और श्रेष्ठता है इतना दीन हुआ, तो हम जीवन और मृत्यु तक अपने परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार रहें। फिर भी हम जानें कि यहाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता विशेष है, अर्थात् उस फल और प्रभाव के कारण जो उससे उत्पन्न हुआ। प्रेरितों ने यीशु मसीह की मृत्यु को उदाहरण के रूप में भली-भाँति चुना है। क्योंकि जब उन्हें सुसमाचार की गवाही के लिये लड़ना पड़ा तब वे अपनी आवश्यकताओं के लिये दृढ़ किए गए। तब वे सोए हुए नहीं थे। हम उनकी चौकसी देखते हैं, और यह कि वे अपनी बुलाहट के पीछे चलने को तैयार थे। उन्हें न तो यातनाओं का भय था और न उस मृत्यु का जो उनके सामने रखी गई जब परमेश्वर ने उन्हें अपने नाम की महिमा के लिये और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंगीकार के लिये बुलाया। तो भी उन्होंने मुख्यतः इस बात पर बल दिया कि हमारे छुड़ानेवाले का लहू बहाए जाने से हम अपने सब दागों से धोए और शुद्ध किए गए हैं, कि उसने परमेश्वर अपने पिता को हमारे सब कर्ज़ चुका दिए जिनसे हम बँधे थे, कि उसने हमारे लिये सिद्ध धार्मिकता प्राप्त की।
तो हम सिर और अंगों के बीच का भेद पहचानें। हम सीखें कि यद्यपि स्वभाव से हम पूरी रीति से बुराई में लिप्त हैं, और यद्यपि परमेश्वर ने हमें आंशिक रूप से नया जन्म दिया हो, तो भी हमारा शरीर परमेश्वर के विरुद्ध झुँझलाना नहीं छोड़ता। फिर भी हमारे प्रभु यीशु मसीह में जो आज्ञाकारिता हम देखते हैं उसके बल से हम अपने परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बने रहना नहीं छोड़ते। यदि हम अब भी वह भला नहीं करते जो चाहते हैं, परन्तु बुराई प्रायः हमें धकेलती है, और बहुत सी चूकें हों, या हम भला करने में बहुत ढीले हों, तो हम देखें कि परमेश्वर के पुत्र ने हमारे सब दोषों का प्रायश्चित्त करने के लिये क्या सहा। हम ध्यान दें कि वह किस रीति से लड़ा कि जब हमारे अपराध और पाप उस पर आरोपित किए गए तब उसमें कोई विरोध न था, जैसा आज प्रातःकाल और विस्तार से समझाया गया था। तो हम देखें कि हमारे प्रभु यीशु ने सब बातों में और सब के लिये किस प्रकार सन्तोष किया, परन्तु हम आज, यद्यपि परमेश्वर की आज्ञा मानने का परिश्रम कर चुके हैं, सफल नहीं हो पाते, वरन् सदा पंख लटकाए रहते हैं, तो हमें निरन्तर यही दोहराना चाहिए: कि हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बने रहना नहीं छोड़ेंगे और हमारी अपूर्णताएँ हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता से सदा मिटाई जाती रहेंगी, ताकि वे परमेश्वर के सामने लेखे में न आएँ। इसके अतिरिक्त, हर एक अपने विश्वास और प्राप्त अनुग्रह के परिमाण के अनुसार तब तक लड़ने का यत्न करे जब तक हम स्वर्गीय विश्राम में न पहुँच जाएँ। यह देखकर कि हमारी निर्बलताएँ अब भी इतनी बड़ी हैं, यह मानते हुए कि हम एक भी भला विचार करना नहीं जानेंगे, और यह कि ठोकर खाकर हम अपने आपको उठा नहीं सकेंगे, जब तक परमेश्वर हमारी ओर अपना हाथ न बढ़ाए और हर क्षण हमें दृढ़ न करे, हम चेताए जाएँ कि प्रार्थना करें कि वह हम में अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह बढ़ाए; जैसा उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, और यीशु मसीह को हमारे सिर और सेनापति के रूप में हमारे सामने रखता है, ताकि उस विजय तक पहुँचने के बाद जो उसने हमारे लिये प्राप्त की, जिसका फल हम पहले ही चख रहे हैं, हम उसे सिद्धता में अनुभव करें।
अब हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन श्रद्धा से झुकेंगे।
