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व्यवस्था की दासता से स्वतंत्रता - गलातियों 4:21-26
व्यवस्था की दासता से स्वतंत्रता
तुम जो व्यवस्था के अधीन होना चाहते हो, मुझ से कहो, क्या तुम व्यवस्था की नहीं सुनते? क्योंकि लिखा है कि अब्राहम के दो पुत्र हुए; एक दासी से, और दूसरा स्वतंत्र स्त्री से। परन्तु जो दासी से हुआ वह शारीरिक रीति से जन्मा, और जो स्वतंत्र स्त्री से हुआ वह प्रतिज्ञा के अनुसार जन्मा। इन बातों में दृष्टान्त है: क्योंकि ये स्त्रियाँ मानो दो वाचाएँ हैं; एक तो सीनै पहाड़ की, जिससे दासत्व उत्पन्न होता है, और वह हाजिरा है। क्योंकि हाजिरा अरब का सीनै पहाड़ है, और आज के यरूशलेम के तुल्य है, क्योंकि वह अपने बालकों समेत दासत्व में है। पर ऊपर की यरूशलेम स्वतंत्र है, और वह हम सब की माता है। - गलातियों 4:21-26
स्वतंत्रता हम में से हर एक के लिए ऐसी वांछनीय वस्तु है कि उसके बिना हमारा जीवन जीते-जी मृत्यु से कुछ ही अधिक होता, या कम से कम निरन्तर दुःख ही होता। वास्तव में, जहाँ तक हमसे बन पड़ता है, हम पराधीनता और बन्धन से भागते हैं और स्वतंत्रता की लालसा करते हैं, जो पुरानी कहावत के अनुसार अमूल्य निधि है। यदि यह हमारे सांसारिक जीवन के विषय में सत्य है, तो हमारी आत्माओं के अनन्त उद्धार के विषय में यह और भी अधिक सत्य है। फिर भी कितने ही लोग अब तक दासत्व में पड़े हैं, मानो उनके गले में फन्दा पड़ा हो! यद्यपि वे स्वतंत्रता से प्रेम रखने का दावा करते हैं, फिर भी वे ऐसे जीते हैं मानो दासता की बेड़ियों में जकड़े हों। यह स्वतंत्रता विशेष रूप से तब प्रकट होती है जब लोग उस स्वतन्त्रता में आनन्दित हो पाते हैं जो प्रभु यीशु मसीह ने उनके लिए मोल ली है और जो उनकी आत्माओं को विश्राम देती है। सुसमाचार में परमेश्वर घोषणा करता है कि वह हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करने में प्रसन्न होता है, और ऐसा करके वह हमें शैतान के फन्दे से और पाप के अत्याचार से छुड़ाता है। परन्तु बहुत थोड़े ही हैं जो इस दान को, जब वह उनके सामने रखा जाता है, ग्रहण करेंगे, क्योंकि वे पाप की शापित बन्धुआई में पड़े हैं; वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता में झुककर पूर्ण स्वतंत्रता में चलने की अपेक्षा अपनी ही शारीरिक अभिलाषाओं के अधीन रहना अधिक पसन्द करते हैं। इसलिए पौलुस के पास गलातियों को डाँटने का उचित कारण है कि वे व्यवस्था के अधीन जी रहे हैं, क्योंकि वे उस स्वतंत्रता और मुक्ति को ठुकरा रहे हैं जिसका आनन्द उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने के नाते लेना चाहिए था।
अब पौलुस हमें एक प्रतीक, एक सजीव चित्र देता है, जो दिखाता है कि स्वयं व्यवस्था ही मानव-हृदय की दरिद्रता और दुर्दशा को प्रकट करती है; फिर भी गलाती उसी के अधीन बने रहना चाहते हैं! क्योंकि अब्राहम का घराना परमेश्वर की कलीसिया का स्पष्ट प्रतीक है। वह हमें कलीसिया की दशा के विषय में बहुत कुछ बताता है। लिखा है कि अब्राहम के दो पुत्र थे: इश्माएल और इसहाक (उत्पत्ति 16:1 आदि)। इश्माएल अब्राहम की दासी हाजिरा से उत्पन्न हुआ, जो उसे पत्नी होने के लिए दी गई थी। परन्तु यहाँ एक गम्भीर दोष था, क्योंकि अपनी वैध पत्नी सारा के प्रति विश्वासघात करना उसके लिए उचित नहीं था। अब, अब्राहम और हाजिरा के इस मेल का कारण क्या था? यह इसलिए हुआ कि सारा ने उतावली और बिना सोचे-समझे काम किया; उसने समझा कि परमेश्वर उसे सन्तान देने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में बहुत देर लगा रहा है। उसने सोचा कि वह गर्भवती हो ही नहीं सकती। परन्तु परमेश्वर के वचन की उसकी समझ कमज़ोर थी, और उसमें वह धीरज और सन्तोष नहीं था जिसकी विश्वास माँग करता है। संक्षेप में, यह एक निन्दनीय सम्बन्ध था, एक अनुचित मेल, यद्यपि अब्राहम का मूल उद्देश्य बिलकुल यह नहीं था। वह दुष्ट वासना से प्रेरित नहीं हुआ था; उसने तो केवल यह चाहा था कि उसके वंश हो, जिससे संसार का उद्धार निकले। परन्तु ऐसे काम कितने मूर्खतापूर्ण हैं, जब हम परमेश्वर के वचन के आदेश के बिना यह या वह करने का प्रयत्न करते हैं। जब हम अपनी ही उतावली लालसाओं से चलाए जाते हैं, तब अनेक पाप होते हैं। इस प्रकार इश्माएल दासी हाजिरा से एक ऐसे अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ जिससे परमेश्वर प्रसन्न नहीं था। इसहाक इश्माएल के बहुत समय बाद सारा से उत्पन्न हुआ, क्योंकि इसहाक के जन्म के समय इश्माएल शायद सोलह वर्ष का था। पौलुस (मूसा के वृत्तान्त के अनुसार) हमें बताता है कि इसहाक प्रतिज्ञा के अनुसार उत्पन्न हुआ और इश्माएल शारीरिक रीति से। अब इसका अर्थ यह नहीं कि अब्राहम इसहाक का पिता नहीं था, परन्तु यह कि वह ईश्वरीय सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ; क्योंकि अब्राहम क्षीण हो चुका था; वरन् वह अधमरा था और उसमें कोई बल शेष न था! वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी भी लगभग उतनी ही आयु की थी; वह अपने लगभग नब्बे वर्ष के जीवन भर बाँझ रही थी। जब स्वर्गदूतों ने उसे यह सन्देश दिया, तब उसके गर्भवती होने और जन्म देने की बात हँसी की बात समझी गई (उत्पत्ति 18:12)। इसलिए इसहाक प्रतिज्ञा के अनुसार उत्पन्न हुआ, क्योंकि परमेश्वर ने एक आश्चर्यकर्म किया कि वह प्रभु यीशु को इस जगत में भेजे; प्रकृति के नियमों के अनुसार नहीं, परन्तु केवल परमेश्वर की भलाई से और उसकी सिद्ध इच्छा के अनुसार।
इस प्रकार अब्राहम के घराने में हमें कलीसिया का एक चित्र मिलता है: दो स्त्रियाँ, जिन में से प्रत्येक ने एक पुत्र को जन्म दिया। हाजिरा के विषय में पौलुस हमें बताता है कि वह सीनै पहाड़ का प्रतिरूप है, जहाँ व्यवस्था दी गई थी, और हमें बताया जाता है कि यह अरब में था, यह दिखाने के लिए कि यह उस पवित्र देश में नहीं था जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों के निज भाग के लिए चुना था। सारा यरूशलेम का प्रतिरूप है। वह कहता है कि वर्तमान नगर नहीं, क्योंकि वह पहचान में न आने जितना बदल चुका है। उसके निवासियों ने अपने आप को व्यवस्था और शुद्ध शिक्षा से अलग कर लिया है। अब, जब मैं व्यवस्था कहता हूँ, तो उसे उस अर्थ में नहीं कहता जिस अर्थ में पौलुस इस पत्री में उसका उल्लेख करता है—वह व्यवस्था जो दासत्व उत्पन्न करती है—मेरा तात्पर्य उस वाचा से है जो परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अपने लोगों से बाँधी। क्योंकि पौलुस के समय का यरूशलेम यीशु मसीह को ठुकरा चुका था और इस कारण परमेश्वर के साथ अपनी वाचा तोड़ चुका था, इसलिए पौलुस कहता है कि उसे हाजिरा और सीनै कहना पड़ेगा। वह कह रहा है कि यहूदी अपने मन्दिर और बलिदानों आदि पर घमण्ड करते हैं, और इस पर भी कि वे परमेश्वर की चुनी हुई और चुने हुए प्रजा हैं, फिर भी वे मानो पवित्र देश से निकाले और बहिष्कृत किए हुए हैं, और व्यवस्था से उनका सम्बन्ध अर्थहीन है। क्योंकि यदि हम पौलुस के समय के यरूशलेम को देखते, तो जान लेते कि वह सीनै के समान था। परन्तु एक और यरूशलेम है: 'ऊपर की यरूशलेम'। यह उस कलीसिया के अनुरूप है जिसके द्वारा हम परमेश्वर की दृष्टि में नया जन्म पाते हैं। कलीसिया सुसमाचार के अविनाशी बीज के द्वारा स्वतंत्र सन्तान उत्पन्न करती है। क्योंकि वह 'हम सब की माता' है। फिर पौलुस यशायाह के वचन उद्धृत करता है, 'हे बाँझ, तू जो नहीं जनती, आनन्द कर' (यशायाह 54:1)। अब यशायाह यहाँ किसी विशेष स्त्री की बात नहीं कर रहा, परन्तु परमेश्वर की कलीसिया की, और इस चित्र को उपमा के रूप में काम में ला रहा है। एक समय कलीसिया बहुत उच्छृंखल हो गई थी, और इसलिए यशायाह हमें बताता है कि मानो उसे त्याग दिया गया था। परमेश्वर और उसके लोगों के बीच मानो एक प्रकार का तलाक हो गया था। परन्तु भविष्यद्वक्ता कलीसिया को आश्वासन देता है कि वह एक दिन उसे बढ़ाएगा, और उसकी सन्तान उससे अधिक होगी जितनी तब होती यदि वह सदा समृद्ध और फलती-फूलती रहती। यह तब हुआ जब सारे संसार में सुसमाचार का प्रचार किया गया। क्योंकि कलीसिया में केवल अब्राहम की सन्तान, या कोई एक विशेष जाति ही सम्मिलित नहीं है; वरन् सुसमाचार के पवित्र बीज के द्वारा उसने परमेश्वर के लिए हर जाति और देश से, यहाँ तक कि हमारे अपने देश से बहुत दूर के लोगों में से भी, असंख्य सन्तान उत्पन्न की है। क्योंकि परमेश्वर ने अपना सामर्थ्य सारे भूमण्डल में प्रकट किया है। जो वचन हमने उद्धृत किया है उसका यही अर्थ है।
पौलुस हमें बताता है कि ये बातें 'दृष्टान्त' हैं। यहाँ हमें पहली बात यह कहनी है कि पौलुस पवित्रशास्त्र के शाब्दिक अर्थ का इनकार करना नहीं चाहता था। कुछ लोग हैं जिन्हें पवित्रशास्त्र की अनोखी व्याख्याएँ ढूँढ़ने में एक विचित्र आनन्द मिलता है। शाब्दिक व्याख्या को अनदेखा करके वे सम्पूर्ण को ही नष्ट कर देते हैं। इसी से सत्य के अनगिनत विकार और बिगाड़ उत्पन्न होते हैं। आज झूठे रूपक भरे पड़े हैं; अनेक लोग उन्हें अपना लेते हैं, तौभी वे शैतानी गढ़न्तों के सिवा और कुछ नहीं। क्योंकि ऐसे सिद्धान्त स्वीकार किए और सराहे जाते हैं, इसलिए लोग शैतान के मोहजाल में पड़े रहते हैं। कैसे उत्तम व्याख्याता बनते हैं ये! फिर भी वे इतने सफल कैसे हैं? बात यह है कि यदि कोई शिक्षा न स्वर्ग की हो न पृथ्वी की, तो बेचारे अज्ञानी प्राणियों के लिए दोनों के बीच लटके रहना सहज है! पौलुस यह नहीं चाहता कि हम मूसा के इसहाक और इश्माएल के वृत्तान्त को कोई मनगढ़न्त कल्पना समझें—नहीं, वह यह दिखा रहा है कि यह ऐतिहासिक वृत्तान्त कलीसिया की दशा को प्रकट करता है, यद्यपि उन दिनों एकमात्र कलीसिया जिस पर परमेश्वर का अधिकार था वह अब्राहम के घराने की थी। (निस्सन्देह सालेम भी था, जिसका राजा मलिकिसिदक था, परन्तु उस समय यह स्पष्ट रूप से समझा नहीं गया था। इसलिए परमेश्वर ने अब्राहम के द्वारा एक प्रजा को अपनाना चुना, और यह प्रकट करना कि वह चाहता है कि जिस प्रजा को उसने शेष मनुष्यजाति से अलग किया है वही उसे पुकारे।) परन्तु हमें मूसा के वृत्तान्त को ठण्डे मन से, बिना आगे देखे नहीं पढ़ना चाहिए, अर्थात् बिना यह विचारे कि इस परिवार पर क्या बीता और उसे कलीसिया पर लागू किए बिना।
अब हम मुख्य विषय पर आएँ—व्यवस्था। जब पौलुस अब्राहम की दासी हाजिरा की तुलना सीनै पहाड़ से और उस व्यवस्था से करता है जो उस पहाड़ पर दी गई, तो वह व्यवस्था के सार की बात नहीं कर रहा। क्योंकि व्यवस्था में उद्धार की अनेक प्रतिज्ञाएँ हैं जो प्रभु यीशु मसीह में पूरी हुईं; पौलुस स्वयं कई अन्य स्थानों में यह घोषित करता है, जैसा हम पहले देख चुके हैं। यदि हम व्यवस्था को उसके उचित और वैध उपयोग में लें और लागू करें, तो हम उसे एक अविनाशी, जीवनदायक बीज के रूप में देखेंगे, जिसके द्वारा परमेश्वर हमारा पिता बनता और हमें स्वतंत्र करता है। व्यवस्था केवल बाहरी बातों के सम्बन्ध में दासत्व उत्पन्न करती है, जैसा हम पहले चर्चा कर चुके हैं। हमारे पूर्वज, यद्यपि वे परमेश्वर की सन्तान और स्वर्ग के राज्य के वारिस थे, ठीक हमारी ही तरह, फिर भी वे संरक्षकों और भण्डारियों के अधीन थे। वे छोटे बालकों के समान थे, जो प्रभु यीशु मसीह के आने तक अपूर्ण थे। उनकी विधियाँ लगामों या रस्सियों के समान थीं, जो उनका पालन करनेवालों को उस स्वतंत्रता के आनन्द से रोकती थीं जो आज हमें प्रभु यीशु मसीह के द्वारा प्राप्त है। फिर भी, जब पौलुस व्यवस्था के दासत्व उत्पन्न करने की बात कहता है, तो वह यहाँ उस रीति की बात कर रहा है जिससे गलातियों ने व्यवस्था का दुरुपयोग किया, क्योंकि वह आगे कहता है कि ऐसे दासत्व में रहनेवाले अन्त में परमेश्वर के घराने और मीरास से निकाले और बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। इस प्रकार, यद्यपि हमारे पूर्वज बाहरी बातों के विषय में दासत्व में जीए, तौभी वे स्वतंत्र थे; क्योंकि आत्मा ने उन्हें ऐसा विश्वास दिया जिसने उनकी दासता पर जय पाई, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है। विश्वास के बिना वे उद्धार की हर आशा से कट जाते। सारांश यह कि पौलुस यहाँ व्यवस्था का उल्लेख इस नकारात्मक रीति से इसलिए करता है कि इन कपटियों ने उसकी विशेष व्याख्या की थी, उसे छोटे-छोटे नियमों के पालन तक सीमित करके और उसके पालन को पुण्य ठहराकर बिगाड़ डाला था। ऐसा करके वे लोगों के विवेक को इतनी कसकर जकड़ रहे थे कि वे लगभग दम घुटने की स्थिति में थे!
अब, पौलुस ने इस विषय को पहले अवसर पर पर्याप्त रूप से समझाया है, परन्तु हमारे लिए यह लाभदायक होगा कि जो उसने कहा उसे हम स्मरण करें। उसने व्यवस्था और सुसमाचार के बीच भेद दिखाया; क्योंकि जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहराया जाना चाहते हैं वे कल्पना करते हैं कि यदि वे परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करें तो परमेश्वर उनका ऋणी हो जाता है। उन्होंने यह प्रतिज्ञा सुनी है कि यदि मनुष्य व्यवस्था का पालन करे तो वह जीवित रहेगा (लैव्यव्यवस्था 18:5)। वे व्यवस्था-पालन में कठोर हैं और यहाँ तक मानते हैं कि परमेश्वर जो कुछ माँगता और चाहता है वह सब उन्होंने पूरा कर लिया है। ऐसी प्रतिज्ञा अपने सामने रखकर वे अपने प्रतिफल की बाट जोहते हैं, अब वे उद्धार को मुफ़्त दान नहीं मानते, परन्तु यह मानते हैं कि परमेश्वर ने जो कुछ प्रतिज्ञा की है वह सब उन्होंने कमाया है। इस प्रकार अनन्त जीवन उनके सब पुण्य कर्मों का अपेक्षित प्रतिफल बन जाता है। व्यवस्था के विषय में इतना ही। जहाँ तक सुसमाचार का सम्बन्ध है, जब हम पाप और शैतान के शाप से, वरन् उस दण्ड-आज्ञा से भी जो व्यवस्था के कारण हम पर आती है, छुड़ाए जाते हैं, तब परमेश्वर हमारा पिता बनता है। क्योंकि लिखा है कि जिन्होंने व्यवस्था का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया वे शापित हैं, जैसा हम पहले कह चुके हैं (व्यवस्थाविवरण 27:26)। इस प्रकार सब दोषी हैं; सारा संसार निराशा में बिना उपाय के डूबा है, जब तक कि परमेश्वर बेचारे पापियों पर से दण्ड-आज्ञा को न हटाए और जो दण्ड-आज्ञा उसने उन पर सुनाई है उसे रद्द न कर दे। अब हम समझ गए कि जब पौलुस यहाँ व्यवस्था का उल्लेख करता है तो उसका क्या अर्थ है। वह यह नहीं कह रहा कि मूसा की शिक्षाएँ किसी मनुष्य के परमेश्वर की सन्तान होने के लिए अपर्याप्त हैं, या व्यवस्था में मनुष्यजाति के अनन्त उद्धार की कोई प्रतिज्ञाएँ नहीं हैं, परन्तु केवल यह कि मसीह के इस जगत में आने से पहले स्वतंत्रता का वह पूर्ण आनन्द नहीं था जो आज हमें प्राप्त है। इससे बढ़कर, वह हमें उन कपटियों द्वारा व्यवस्था के दुरुपयोग की सूचना दे रहा है जिन्होंने उसके उद्देश्य को ग़लत समझा था। वे सोचते थे कि उसके पालन से वे परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते और उसकी कृपा पा सकते हैं। परन्तु पौलुस हमें बताता है कि हम तब तक दासत्व में रहते हैं जब तक किसी और प्रकार के बीज, अर्थात् सुसमाचार, के द्वारा छुड़ाए न जाएँ।
अब, जब पौलुस कहता है कि हाजिरा या सीनै 'आज के यरूशलेम' के अनुरूप है, तो उसका अभिप्राय उस नगर से है जो कभी परमेश्वर का पवित्रस्थान था, और इसलिए जिसे स्वर्गीय और शुद्ध शिक्षा का सोता होना चाहिए था। क्योंकि यशायाह और मीका दोनों हमें बताते हैं कि 'सिय्योन से व्यवस्था, और यरूशलेम से यहोवा का वचन निकलेगा' (यशायाह 2:3; मीका 4:2)। परन्तु यहूदी अशुद्ध हो गए और उन्होंने सच्ची शिक्षा की शुद्धता में अपने गढ़न्त और व्याख्याएँ मिला दीं। उन्होंने तो जीवन के सोते, यीशु मसीह, को भी ठुकरा दिया। इसलिए पौलुस हमें बताता है कि यह यरूशलेम दासी हाजिरा और सीनै पहाड़ के समान है, जो केवल दण्ड ही ला सकता है। यह ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यह हमें दिखाता है कि परमेश्वर ने कभी किसी स्थान पर ऐसी कृपा नहीं की कि वह उसके निवासियों की अकृतज्ञता को, उनके द्वारा उसके उपकारों के दुरुपयोग के लिए, दण्ड न दे सके—वे दया के कार्य जो उसने उनके हाथ में सौंपे थे। यह वही यरूशलेम है, जो परमेश्वर का पवित्र नगर, उसका राजभवन, उसका निवास, उसके वास का स्थान कहलाता है—ये सब वर्णन पवित्रशास्त्र में मिलते हैं, (भजन संहिता 48:1-3, 132:13; मत्ती 4:5, 27:53)। फिर भी पौलुस हमें बताता है कि वह सीनै के समान हो गया है, एक दूर और उजाड़ क्षेत्र में, पवित्र देश की सीमाओं से बाहर, एक बंजर पहाड़, जिसे परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों की मीरास और विश्रामस्थान के रूप में चुना था।
यरूशलेम में, जो कभी परमेश्वर का चुना हुआ और ऐसी उत्तम उपाधियों से आशीषित नगर था, ऐसा परिवर्तन हुआ यह देखकर, आज जो लोग सुसमाचार को ठुकराते हैं उनका क्या होगा? चाहे उन्होंने बड़ा सम्मान पाया हो, परमेश्वर उन्हें सहज ही नीचे गिराकर अपमान में डाल सकता है। देखो उन नगरों के विषय में क्या कहा गया है जहाँ यीशु ने सुसमाचार सुनाया, जैसे कफरनहूम और अन्य; वे इस बात का गर्व कर सकते थे कि उद्धार का सन्देश सबसे पहले उन्होंने सुना, या कि यीशु मसीह ने यरूशलेम से भी अधिक वहाँ प्रचार किया। परन्तु हमें बताया गया है कि ऐसे नगर 'अधोलोक में उतारे जाएँगे' (मत्ती 11:23)। यह उनके विद्रोह और बुराई में हठपूर्वक डटे रहने के कारण था; उस अनुग्रह को ग्रहण करने से उनके इनकार के कारण जो सुसमाचार के प्रचार में उन्हें दिया गया था। हम जानते हैं कि यिर्मयाह ने शीलो के विषय में क्या कहा (यिर्मयाह 7:12)। देखो, यहूदी इस बात पर घमण्ड करते थे कि उनके पास मन्दिर और वेदी समेत यरूशलेम नगर है। परन्तु यिर्मयाह उनसे कहता है कि शीलो को जाकर देखो—वह स्थान जहाँ इतने वर्षों तक सन्दूक ठहरा रहा। लोग सब ओर से वहाँ परमेश्वर की आराधना करने और अपने बलिदान लाने आया करते थे, परन्तु अब वहाँ वे क्या देखते? परमेश्वर के प्रतिशोध की एक भयावह स्मृति, क्योंकि उन्होंने उन भली वस्तुओं का दुरुपयोग किया था जिनसे परमेश्वर ने आरम्भ में उन्हें आशीष दी थी।
अब आओ, इसे अपनी शिक्षा के लिए लागू करें, ताकि हम भय और बुद्धि के साथ चलना सीखें, क्योंकि परमेश्वर हम पर अनुग्रहकारी रहा है कि हमारे बीच बसा और हम पर राज्य करने के लिए अपना राजसिंहासन स्थापित किया। हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी आज्ञा मानें और संयम और नम्रता के साथ उसके पंखों की छाया में शरण लें। यदि हम यह सोचें कि वह हमारा ऋणी है, तो हम उसके सामने ढीठ, हठी और अभिमानी हो जाएँगे। हम उन दानों का दुरुपयोग करेंगे जो उसने हमारे कल्याण के लिए ठहराए थे, और ऐसी दुष्टता बिना दण्ड के नहीं रह सकती। इसलिए यरूशलेम का उदाहरण हमें चेतावनी देता है कि हम शान्ति से अपने परमेश्वर की आज्ञाकारिता में झुकें और उसे अपने ऊपर राज्य करने दें। अब जब उसने अपनी आत्मिक आशीषें हम पर उण्डेल दी हैं, तब हमें हर प्रकार से विनम्र रहना चाहिए, न कि घमण्ड या अहंकार से फूल उठना चाहिए। वास्तव में यह हमें उस पर अपनी निर्भरता स्वीकार करने और अपने आप को दीन करने के लिए प्रेरित करे।
प्रसंगवश, हम देख सकते हैं कि पोप के अनुयायी परमेश्वर को रोम से जोड़ना चाहते हैं तो कितने मूर्ख हैं; क्योंकि वे कहते हैं कि वह 'प्रेरितीय आसन' है। परन्तु पतरस के विषय में उनके दावे झूठ और कथा-कहानियों के सिवा और कुछ नहीं हैं। यह तो निश्चित है कि पौलुस रोम में बन्दी बनाकर रखा गया था, और यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि वह वहीं मरा, परन्तु रोम को अलग करनेवाली बात बस इतनी ही है। वहाँ सुसमाचार पर आक्रमण हुआ, और शैतान की वह माँद शहीदों के लहू से सराबोर हो गई, मानो परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के लिए। यहीं मनुष्यों ने सत्य से लड़ने का षड्यन्त्र रचा, और जहाँ तक उनसे हो सका, प्रभु यीशु मसीह के नाम और स्मृति को मिटा डालना चाहा। रोम का दावा करने योग्य सारा गौरव यही है! ये लोग कल्पना करते हैं कि यरूशलेम की सारी सम्मानजनक उपाधियाँ रोम की हैं, जबकि पवित्रशास्त्र में इसे ठहराने के लिए एक अक्षर तक नहीं है। कहीं वे हमें नहीं बताते कि परमेश्वर वहाँ राज्य करता है, या उसने उसकी दीवारों के भीतर बसना चुना है; कहीं उसे 'माता' नहीं कहा गया, न ही उसके लिए कोई विशेष सम्मान बताया गया—ऐसा कुछ भी नहीं! पौलुस यह अवश्य कहता है कि रोमियों के विश्वास की चर्चा सब कहीं फैली हुई थी और उनकी अच्छी ख्याति थी (रोमियों 1:8), परन्तु वह मुट्ठी भर लोगों की बात कर रहा है। क्योंकि रोम में जो शासन करते थे वे निश्चय ही मसीही नहीं थे, फिर भी छिपने के स्थानों में एक छोटा सा समूह इकट्ठा था, और पौलुस इन्हीं की सराहना और आदर करता है। इसलिए हमें कभी यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि सारा रोम परमेश्वर की कलीसिया का था! हमने देखा कि यरूशलेम का क्या हुआ—उसकी तुलना हाजिरा और सीनै से की गई, अर्थात् वह एक अपवित्र और दूषित स्थान बन गया था। उसकी पवित्रता कब की भुलाई जा चुकी थी, क्योंकि वह सुसमाचार की शुद्ध शिक्षाओं में बनी नहीं रही।
इसलिए हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जो परमेश्वर के सबसे निकट हैं और जिन्होंने उसके साथ घनिष्ठ सहभागिता का आनन्द लिया है, वे भी यदि पवित्रता में स्थिर न रहें तो परायों के समान निकाल दिए जाएँगे; क्योंकि पवित्रता वह बन्धन है जो हमें अपने परमेश्वर से दृढ़ता से बाँधे रखता है। हम देख सकते हैं कि प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा आज रोम में ठुकराई जाती है, पाँव तले रौंदी जाती है, तुच्छ और घृणित समझी जाती है। इसके अतिरिक्त, सुसमाचार के शिक्षक वहाँ आग से सताए जाते हैं और उनका लहू बहाया जाता है। अब वहाँ कोई सच्चा धर्म है ही नहीं, क्योंकि वह दुष्टता और भ्रष्टाचार से भरा है। यदि कोई मनुष्य रोम में जाकर परमेश्वर के भय के साथ लौटे, और उसके हृदय में कोई अच्छा बीज बोया गया हो, तो यह एक चमत्कार होगा। यह स्पष्ट है कि रोम नरक की ही गुफा है। परमेश्वर करे कि लोग उस नगर की ओर जाने की अपेक्षा अपनी गर्दनें तुड़वा लें! क्योंकि इस समय तो फ्रांस देश भी उसके अधर्म से संक्रमित हो चुका है। फ्रांस के अधिकांश लोग कुत्तों और सूअरों के सिवा और कुछ नहीं रहे, उनमें पशुओं से अधिक सच्चा धर्म नहीं है। इसलिए हमारे पास और भी अधिक कारण है कि हम इस चेतावनी पर ध्यान दें और बुद्धि और परमेश्वर के भय में चलें, इस बात में सावधान रहें कि अपनी अकृतज्ञता के कारण हम उन विशेषाधिकारों से वंचित न हो जाएँ जो हमें मिले हैं। परमेश्वर कभी हम पर अपना भयंकर प्रतिशोध न उण्डेले, और हमें अपमान और लज्जा की विजय-स्मारकें न बनाए। यरूशलेम का, जिसने पहले ऐसा बड़ा सम्मान पाया था, पौलुस का यही वर्णन है।
यह भी ध्यान दो कि अब्राहम के चित्र के अधीन परमेश्वर घोषणा करता है कि वह अपने सब लोगों का पिता है। इसलिए हम परमेश्वर से जन्मे हैं, इस अर्थ में कि हम उसकी कलीसिया के हैं। फिर भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर हमारा पिता है, जब तक कि हम सचमुच उस अविनाशी बीज के द्वारा नया जन्म न पाएँ, जो अकेला जीवन और अनन्त उद्धार की प्रतिभूति है। हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि परमेश्वर के घराने के सदस्य होते हुए भी अवैध सन्तान के समान होना कैसे सम्भव है? उत्तर यह है कि हमने अपने अधर्म और दुष्टता से परमेश्वर के वचन को, जो उसका बीज है, बिगाड़ दिया है। पतरस इसे इसी प्रकार वर्णन करता है (1 पतरस 1:23)। हाँ, यह सच है कि वचन, क्योंकि वह परमेश्वर से निकलता है, अपने आप में निष्कलंक है। वह पवित्रता से दमकता है, और उसमें परमेश्वर की धार्मिकता, भलाई और दया के सब भण्डार भरे हैं। परमेश्वर के वचन का यही स्वभाव है, परन्तु हमने उसका मूल्य घटा दिया और उसे अपनी ही सनक और कल्पनाओं के अनुसार बदल डाला, और अपनी अशुद्धता मिला दी। इसलिए यद्यपि हम अपने आप को परमेश्वर की सन्तान समझें, तौभी हम जारज सन्तान हैं, जैसा हम आज दोपहर को, परमेश्वर की इच्छा हुई तो, और विस्तार से देखेंगे। क्योंकि पौलुस आगे दिखाता है कि इश्माएल, यद्यपि ज्येष्ठ पुत्र था, अन्त में अपने ही परिवार से निकाल दिया गया। यह इसलिए हुआ कि वह अवैध था, क्योंकि वह हाजिरा से उत्पन्न हुआ था। इसलिए हमें यह सीखना है कि हम परमेश्वर के वचन पर उसकी शुद्धता में विश्वास के द्वारा परमेश्वर के घराने में जन्म लें; तब परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे मन को प्रकाशित करता है, जो हम पर परमेश्वर की इच्छा प्रकट करता है। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के वचन को अपनी धारणाओं के अनुसार पहचान से परे बदल डालें, तो यद्यपि वह अब भी परमेश्वर का बीज कहलाए, पर वास्तव में वह वैसा न होगा, क्योंकि वह बिगाड़ दिया गया है।
इस प्रकार, आज ऐसे अनेक लोग हैं जो अपने आप को मसीही कहते हैं पर झूठे दिखावे के अधीन जीते हैं। उदाहरण के लिए, पोप के अनुयायी कहते हैं कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और पवित्रशास्त्र से लगे रहना चाहते हैं, परन्तु प्रकट है कि उन्होंने उसे तोड़-मरोड़ दिया है। पवित्रशास्त्र को सारे उचित आदर के साथ ग्रहण करने के स्थान पर वे उसे अपनी सुविधा के अनुसार मरोड़ते हैं, और उसका उपहास करते और उस पर ठट्ठे भी उड़ाते हैं! जैसा हम पहले एक अवसर पर कह चुके हैं, वे निन्दापूर्वक पवित्रशास्त्र के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वह मोम की नाक हो जिसे वे जिस आकार में चाहें ढाल सकते हैं! उन्होंने अपनी चालाकियों से सब कुछ गड़बड़ कर दिया है! वास्तव में, पोप के अनुयायी जिसे परमेश्वर की सेवा कहते हैं वह उनके अपने ही मनों में रचा गया है। परमेश्वर की आज्ञा और ठहराव के अनुसार जीवन को व्यवस्थित करने की बात ही नहीं है। नहीं, उसे सिंहासन से उतार दिया गया है, और वे उसकी वैध प्रभुता हड़प लेते हैं और अपने लिए ऐसा अधिकार मानते हैं कि विवेकों को दबाते हैं और जो भी नियम उन्हें अच्छे लगें गढ़ लेते हैं। यह पाप शब्दों में कहने के लिए बहुत बड़ा और बहुत बुरा है। तो पोप के अनुयायी अपने विश्वास के अनुच्छेद कैसे बनाते हैं? अवश्य ही उसके अनुसार जो उन्होंने स्वयं निश्चित किया है, क्योंकि उनमें निश्चय ही ऐसा कुछ नहीं जो पवित्रशास्त्र से लिया गया हो! इसकी चिन्ता नहीं कि पवित्रशास्त्र में क्या लिखा है; उनके अपने निष्कर्ष हैं, जिन्हें वे स्वर्ग की वाणी ही मानते हैं, क्योंकि वे शीघ्र ही सर्वमान्य तथ्यों के रूप में ग्रहण कर लिए जाते हैं। जब वे ऐसी बकवास के लिए हमारी स्वीकृति चाहते हैं, तो कहते हैं कि सबसे पहले, ये परम्परा से प्राप्त शिक्षाएँ हैं: हमें उनकी प्राचीनता के आगे झुकना चाहिए मानो वह उन्हें हमारे लिए बाध्यकारी ठहराती है, और तब वे ऊपर से पवित्रशास्त्र के कुछ अंश भी उद्धृत कर देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रसंग से निकाल लिया है। परन्तु यह उपहास है, क्योंकि उन्होंने जान-बूझकर परमेश्वर के वचन को अशुद्ध किया है। निश्चय ही छोटे बच्चे भी, ऐसी बड़ी और स्पष्ट अज्ञानता को देखकर, उनके मुँह पर थूकते!
इस प्रकार, पोप के अनुयायी उसके अच्छे उदाहरण हैं जिसे पौलुस यहाँ समझा रहा है। अर्थात् ऐसे अनेक हैं जो घमण्ड करते हैं कि वे परमेश्वर की सन्तान और कलीसिया के सेवक हैं, पर वास्तव में अवैध हैं। वे भ्रष्ट बीज से उत्पन्न हैं, क्योंकि उस शुद्ध शिक्षा से लगे रहने के बदले जो उस नए जन्म को ला सकती थी जो अनन्त जीवन की ओर ले जाता है, उन्होंने अपनी ही शिक्षाएँ जोड़ दीं और इस प्रकार परमेश्वर के वचन की सम्पूर्णता भंग कर दी। जब हम कहते हैं कि पौलुस का तर्क आज पोप के अनुयायियों में प्रमाणित होता है, तो हम बात को बहुत नहीं खींच रहे। क्योंकि इस समय उनसे हमारा सबसे बड़ा झगड़ा किस बात का है? वह स्वतंत्र इच्छा, पुण्य के सेवा-कर्मों, पाप के लिए दण्ड चुकाने, और इसी प्रकार की बातों का है। पोप के अनुयायी कहते हैं कि हम अपने ही प्रयासों से परमेश्वर की दृष्टि में कृपा पा सकते हैं, और हमें पवित्र आत्मा की सहायता और सहारे की आवश्यकता नहीं। हाँ, वे मानते हैं कि कुछ सहयोग होता है, और कि परमेश्वर एक सीमा तक हमारे भीतर कार्य करता है; परन्तु वे कहते हैं कि हम उसके सहायक हैं, और यदि हमारा सद्गुण परमेश्वर की कृपा पाने में हमारी सहायता न करे तो हम अत्यन्त निर्बल और निकम्मे होंगे। वे यह भी कहते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह तब तक निष्प्रभावी है जब तक हम उसमें अपने किए का कुछ न जोड़ें। इस प्रकार वे पुण्य पर आधारित शिक्षा खड़ी कर रहे हैं; स्वर्ग के राज्य में पहुँचने का एकमात्र मार्ग परमेश्वर को प्रसन्न करना है। जो पाप तुमने किए हैं उनकी कीमत चुकाने के लिए तुम्हें व्यक्तिगत पुण्य चाहिए। पोप के अनुयायी यही उगलते हैं! इसके अतिरिक्त, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह कहना निन्दा है कि परमेश्वर की व्यवस्था का पूर्ण रीति से पालन करना असम्भव है। वे दावा करते हैं कि कोई भी, यदि वह प्रयत्न करे, उसकी माँगों का पूरी तरह पालन कर सकता है। हाँ, अन्धकार में जीते हुए इस प्रकार डींग मारना सहज है, क्योंकि ये बातें कहनेवाले स्वयं दुष्ट व्यभिचारी, पियक्कड़, निन्दक, और हर प्रकार के घोर और पापमय आचरण में लिप्त लोग हैं। हम भली-भाँति जानते हैं कि ये भिक्षु, कपटी, ठग और कीड़े-मकोड़े कितने पवित्र हैं!
जहाँ तक हमारा प्रश्न है, हम कहेंगे कि हम पाप के दास होकर जन्मे हैं और शैतान के अत्याचारी शासन के अधीन हैं। हम उसकी पकड़ में इतने कसकर जकड़े हैं कि भलाई करने का एक भी धर्ममय विचार तक हमारे भीतर नहीं आ सकता। हमारा स्वभाव पूरी तरह बुराई की ओर झुका है, ठीक उस गधे के समान जो अपना जुआ और बोझ ढोता है, फिर भी हमारा पाप पूरी तरह हमारी अपनी इच्छा से निकलता है। हम पाप में जन्मे हैं और इसलिए और कुछ कर नहीं सकते; हम निरन्तर परमेश्वर को अप्रसन्न करते रहते हैं जब तक वह अपने पवित्र आत्मा से हमें छुड़ाकर अपनी स्वतंत्रता न दे। इसके अतिरिक्त, हम मानते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करना असम्भव है, परन्तु व्यवस्था केवल हमारा कर्तव्य प्रकट करती है; उसमें प्रत्येक को अपना दण्ड पढ़ना है। हमें दुष्कर्मियों की रीति से चुपचाप परमेश्वर के सामने आना है, ताकि जो अपराध हमने किए हैं उनके लिए अनुग्रह पाएँ। हम लज्जा का वस्त्र पहने आते हैं और मानते हैं कि हम खो गए हैं, कि परमेश्वर हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के द्वारा बचाए। संक्षेप में, हम कहते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में अपने आप को निर्दोष ठहराना हमारी सामर्थ्य से बिलकुल परे है। परन्तु वह हमारी सहायता को आता है; वह हमारी जाँच-पड़ताल नहीं करता और न हमसे लेखा लेता है। जब हमने उसे अप्रसन्न किया है, तब पाप का दण्ड चुकाने का हमारे प्रभु यीशु मसीह के बलिदान के सिवा और कोई उपाय नहीं। शुद्ध होने का एकमात्र मार्ग यह है कि हम उसके लहू में अपने को धोएँ।
इसलिए जब हम पोप के अनुयायियों और अपने बीच के विवाद के बिन्दुओं पर विचार करते हैं, तब हमें पौलुस की शिक्षा का व्यावहारिक प्रयोग दिखाई देता है। यद्यपि वे परमेश्वर के नाम के साथ अपने को जोड़ते हैं, और झूठा दावा करते हैं कि उसका आदर करते हैं, और यद्यपि वे कहते हैं कि वे उसकी सन्तान हैं क्योंकि वे पवित्रशास्त्र को मानते हैं, तौभी वे दिखाते हैं कि उनकी माता हाजिरा और सीनै है, और वे अब तक दासत्व में हैं। उनके गले में अब भी जुआ है, और वे उस स्वतंत्रता को ग्रहण करने के लिए परमेश्वर के पास आना नहीं चाहते जो वह देता है। वे अपने पुण्यों से और व्यवस्था को पूरा करने का प्रयत्न करके अपने आप को धर्मी ठहराकर उस वस्तु को हड़पना अधिक पसन्द करते हैं जिसे परमेश्वर ने केवल अपने लिए रख छोड़ा है। इसलिए वे दासी की सन्तान हैं और उन्हें दास ही रहना होगा; उनका अन्त सदा के लिए निकाल दिया जाना है। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, इस शिक्षा के निहितार्थ हम आगे चलकर देखेंगे, परन्तु संक्षेप में यह इस बात से सम्बन्ध रखती है कि हमारे छुटकारे का एकमात्र साधन सुसमाचार है। हमारा प्रभु यीशु मसीह स्वयं यूहन्ना के सुसमाचार के आठवें अध्याय में घोषित करता है कि हमें स्वतंत्र करना उसी का काम है, और यह विशेषाधिकार उसे पिता परमेश्वर ने दिया है कि वह हमें सब दण्ड-आज्ञा से छुड़ाए। इसलिए हमें प्रभु यीशु मसीह के पास आना और अपनी सारी आवश्यकता की वस्तुएँ उसी में पाना चाहिए, क्योंकि उसी के द्वारा हम व्यवस्था के जुए से छूटते हैं। यह जुआ हमारे उठाने के लिए बहुत भारी है: वह न केवल हमें दबाता है, वरन् सचमुच हमें नरक के गड्ढे में डुबो देता है। इस प्रकार यह छुटकारा हमें केवल उस बीज के द्वारा मिलता है जो नया जन्म और पूर्ण स्वतंत्रता लाता है। हम परमेश्वर की सन्तान बनते हैं, और न केवल संसार की दृष्टि में, वरन् स्वर्गदूतों के सामने भी ऐसे ही जाने जाते हैं। हम अन्त में उस मीरास को पाएँगे जो हमारे लिए इतनी बड़ी कीमत पर प्राप्त की गई है, और जिसे हम अपने पुण्यों से कभी अधिकार में नहीं ले सकते थे। वह केवल उसी के द्वारा प्राप्त हो सकती है जिसका वह सब कुछ है, जिसने सुसमाचार के द्वारा, जिसे हम प्रतिदिन सुनते हैं, हमें वह मीरास दी है।
अब आओ, हम अपने महान परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने पापों को मानें, और प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें पहले से कहीं अधिक अनुभव करने में सहायता दे। तब हम सच्चे पश्चाताप के द्वारा अधिकाधिक बढ़ें और परिपक्व हों, ताकि उसके पास आते समय पूर्ण नम्रता से और बिना कपट के आएँ। हम अपने पाप से इतना लज्जित हों कि प्रभु यीशु मसीह के सिवा कोई और उपाय न खोजें। चूँकि हमारे महान परमेश्वर ने हमें ग्रहण किया है और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में अपने लेपालकपन के अनुग्रह की मुहर लगा दी है, इसलिए हम सुसमाचार की शुद्धता को बनाए रखें और अपने गढ़न्त से कुछ न जोड़ें। हमारी अपनी धारणाओं से कुछ भी न बिगड़े, परन्तु पवित्र आत्मा हमें विश्वास में आज्ञाकारी बनाए रखे। इस प्रकार, जैसे उसने हम पर अपनी कृपा दिखाना आरम्भ किया है, हम भी अपनी ओर से अटल होकर सिद्धता का लक्ष्य रखें। इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर और स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
