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यीशु मसीह का पुनरुत्थान - मत्ती 28:1-10
सब्त के बीतने पर, सप्ताह के पहले दिन पौ फटते ही मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम कब्र को देखने आईं। और देखो, एक बड़ा भूईंडोल हुआ; क्योंकि प्रभु का एक दूत स्वर्ग से उतरा, और पास आकर पत्थर को लुढ़का दिया, और उस पर बैठ गया। उसका रूप बिजली के समान और उसका वस्त्र हिम के समान उजला था। उसके भय से पहरुए काँप उठे, और मृतक समान हो गए। स्वर्गदूत ने उन स्त्रियों से कहा, तुम मत डरो; मैं जानता हूँ कि तुम यीशु को जो क्रूस पर चढ़ाया गया था ढूँढ़ती हो। वह यहाँ नहीं है, परन्तु अपने वचन के अनुसार जी उठा है। आओ, यह स्थान देखो जहाँ प्रभु पड़ा था। और शीघ्र जाकर उसके चेलों से कहो कि वह मरे हुओं में से जी उठा है; और देखो, वह तुम से पहले गलील को जाता है; वहाँ तुम उसे देखोगे; देखो, मैंने तुम से कह दिया है। और वे भय और बड़े आनन्द के साथ कब्र से शीघ्र चली गईं, और उसके चेलों को समाचार देने दौड़ीं। और जब वे उसके चेलों को समाचार देने जा रही थीं, तो देखो, यीशु उन्हें मिला और कहा, जय हो। उन्होंने पास आकर उसके पाँव पकड़े और उसे दण्डवत् किया। तब यीशु ने उनसे कहा, मत डरो; जाकर मेरे भाइयों से कहो कि गलील को चले जाएँ, और वहाँ वे मुझे देखेंगे। - मत्ती 28:1-10
पहली दृष्टि में यह बात अजीब लग सकती है कि हमारे प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान का प्रमाण देना चाहा तो अपने चेलों की अपेक्षा स्त्रियों को दर्शन दिया। परन्तु इसमें हमें यह विचार करना चाहिए कि वह हमारे विश्वास की दीनता को परखना चाहता था। क्योंकि हमारी नींव मनुष्य की बुद्धि पर नहीं होनी चाहिए, वरन् जो कुछ हम जानते हैं कि उसी की ओर से आता है, उसे हमें पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ ग्रहण करना चाहिए। दूसरी ओर इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि जब उसने चेलों को सिखाने के लिए उनके पास स्त्रियों को भेजा, तो वह चेलों को दण्ड देना चाहता था, क्योंकि जो शिक्षा उन्होंने उसके मुख से पाई थी, वह परीक्षा के समय उनके कुछ काम न आई। देखो, वे कैसे तितर-बितर हो गए। वे अपने स्वामी को छोड़ देते हैं; भय से घबरा जाते हैं। और परमेश्वर के पुत्र की पाठशाला में तीन वर्ष से अधिक रहने से उन्हें क्या लाभ हुआ? ऐसी कायरता तो बड़े दण्ड के योग्य थी, यहाँ तक कि वे उस ज्ञान से, जो उन्हें पहले मिला था, पूरी तरह वंचित कर दिए जाते, क्योंकि उन्होंने उसे मानो पाँवों तले रौंद डाला और गाड़ दिया था। परन्तु हमारे प्रभु यीशु ने उन्हें कठोर दण्ड देना नहीं चाहा, वरन् कोमल ताड़ना द्वारा उन्हें उनका दोष दिखाने के लिए उसने स्त्रियों को उनकी शिक्षिका ठहराया। वे तो पहले ही से सारे जगत में सुसमाचार सुनाने के लिए चुनी जा चुकी थीं (वे सचमुच कलीसिया की पहली शिक्षिकाएँ हैं), परन्तु चेले ऐसे कायर निकले और इतने घबराए हुए पाए गए कि उनका विश्वास मानो मर गया था, इसलिए यह बिलकुल उचित था कि वे जान लें कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के मुख से कोई शिक्षा सुनने के योग्य नहीं हैं। इसलिए ध्यान दो कि वे स्त्रियों के पास क्यों भेजे गए, जब तक कि वे अपने दोषों को भली-भाँति पहचान न लें, और यीशु मसीह उन्हें उनके पद और विशेषाधिकार में फिर से स्थापित न कर दे, परन्तु अनुग्रह ही से। इसके अतिरिक्त (जैसा मैं कह चुका हूँ) हम सब को सामान्य रूप से यह प्रेरणा दी जाती है कि जो गवाही परमेश्वर की ओर से हमारे पास भेजी जाती है, उसे ग्रहण करें, चाहे बोलनेवाले व्यक्ति तुच्छ हों, या संसार की दृष्टि में उनकी कोई साख या प्रतिष्ठा न हो। जैसे जब कोई मनुष्य नोटरी या सरकारी अधिकारी चुना या नियुक्त किया जाता है, तो जो वह करता है वह प्रामाणिक माना जाता है। कोई यह नहीं कहेगा कि यह या वह बात उसके विरोध में है। क्योंकि पद के कारण मनुष्यों में उसका आदर होता है। तो क्या परमेश्वर का पद पृथ्वी के राजाओं से कम ऊँचा होगा, यदि वह केवल उन्हीं को अपना गवाह ठहराए जिन्हें वह चाहता है, और जिनके कहे हुए को बिना विरोध या उत्तर के ग्रहण किया जाए? निश्चय ही ऐसा ही होना चाहिए, नहीं तो हम स्वयं परमेश्वर के भी विद्रोही ठहरेंगे। इसलिए सबसे पहले हमें यही स्मरण रखना है।
इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान दें कि यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्त्रियों को दर्शन दिया और उन्हें सम्मान का पहला स्थान मिला, तौभी उसने अपने पुनरुत्थान की यथेष्ट गवाही स्वयं दी, ऐसी कि यदि हम अपनी आँखें बन्द न कर लें, कान न मूँद लें, और किसी दुर्भावना से हठीले और मूर्ख बनने की इच्छा न करें, तो विश्वास के इस सिद्धान्त के विषय में हमें भरपूर निश्चय प्राप्त है, जैसा कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण भी है। क्योंकि जब सन्त पौलुस उन लोगों के अविश्वास का खण्डन करता है जो अब भी सन्देह करते थे कि यीशु मसीह जी उठा या नहीं, तो वह केवल स्त्रियों का ही उल्लेख नहीं करता, वरन् कैफा और याकूब का, फिर बारह प्रेरितों का, फिर पाँच सौ से अधिक चेलों का उल्लेख करता है जिन्हें हमारे प्रभु यीशु ने दर्शन दिया। तो फिर यदि हम पाँच सौ से अधिक गवाहों की बात पर विश्वास न करें, जो इसके लिए मनुष्य की ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर की सर्वोच्च महिमा की ओर से चुने गए थे, तो हम अपनी दुर्भावना और विद्रोह का क्या बहाना कर सकते हैं? और हमारे प्रभु यीशु ने उन पर केवल एक ही बार नहीं, वरन् अनेक बार प्रकट किया कि वह जीवित है। इसलिए प्रेरितों ने जो सन्देह किया और उनका अविश्वास हमारे लिए और भी बड़ी दृढ़ता का कारण होना चाहिए। क्योंकि यदि वे पहली ही बार दिखाई देने पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान पर विश्वास कर लेते, तो कोई कह सकता था कि यह बहुत ही सहज बात थी। परन्तु वे इतने मन्द हैं कि यीशु मसीह को उन्हें फटकारना पड़ता है कि वे निर्बुद्धि और विश्वासहीन लोग हैं, उनके मन ऐसे भारी और मोटे हैं कि वे कुछ नहीं समझते। इसलिए जब प्रेरित विश्वास के इस सिद्धान्त को ग्रहण करने में इतने अनिच्छुक थे, तो इससे हमें और भी निश्चय होना चाहिए। क्योंकि जो बात उन्हें मानो बलपूर्वक मनवाई गई, वही अब हमारे लिए उसे मान लेने का उचित कारण है। जैसा कहा गया है, “हे थोमा, तू ने तो देखा है, इसलिए विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।” अब जब ऐसा कहा गया है कि हमारे प्रभु यीशु ने दो स्त्रियों को दर्शन दिया, तो सन्त पौलुस के उस दूसरे वचन पर विचार करें, ताकि हम जानें कि हमें उन लोगों के कारण ठोकर नहीं खानी चाहिए जो बोलते हैं, कि उनके कहे को उनके व्यक्तित्व की महत्ता या हैसियत के अनुसार मानें, वरन् हमें अपनी आँखें और अपनी बुद्धि ऊपर उठाकर अपने आप को परमेश्वर के अधीन करना चाहिए, जो हम पर पूर्ण प्रभुत्व रखने के सर्वथा योग्य है, और यह कि हम उसके वचन के बन्दी हों। क्योंकि यदि हम सीखने को तैयार नहीं हैं, तो निश्चय है कि हम सुसमाचार की शिक्षा से कभी लाभ न उठा सकेंगे। और जब हम उसे ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर हमें बताता और जिसकी गवाही देता है, तो इसे मूर्खता नहीं समझना चाहिए। क्योंकि जब हम आज्ञाकारिता के द्वारा उसकी पाठशाला में और विश्वास में आगे बढ़ना सीख लेंगे, तब जान लेंगे कि सारी बुद्धि की पूर्णता यही है कि हम इस प्रकार उसके आज्ञाकारी हों।
अब हम इस कथा पर आएँ जो यहाँ वर्णित है। कहा गया है कि “सब्तों के पहले दिन मरियम मगदलीनी अपनी संगिनी के साथ कब्र पर आई,” अर्थात् सप्ताह के पहले दिन। क्योंकि यहूदी शनिवार को, जिसे वे सब्त कहते हैं, विश्राम का दिन मानते हैं, जैसा कि इस शब्द का अर्थ भी है, और फिर सारे सप्ताह के अगले दिनों के नाम रखते हैं: सब्त के बाद का पहला दिन, दूसरा दिन, इत्यादि। अब क्योंकि वे दिन का आरम्भ सूर्यास्त से गिनते हैं, इसलिए कहा गया है कि मरियमों ने सब्त के बीत जाने पर सुगन्धित द्रव्य मोल लिए और अगले दिन कब्र पर आने की तैयारी की। और वे केवल दो ही नहीं थीं। यह सच है कि सन्त यूहन्ना केवल मरियम मगदलीनी का नाम लेता है। सन्त मत्ती उनमें से दो का नाम लेता है, और सन्त लूका से हम देखते हैं कि वहाँ बहुत सी स्त्रियाँ थीं। परन्तु यह सब भली-भाँति मेल खाता है। क्योंकि मरियम मगदलीनी अगुवाई कर रही थी, और दूसरी मरियम का नाम यहाँ विशेष रूप से इसलिए लिया गया है कि वह उसके सबसे निकट चल रही थी। इस बीच कई स्त्रियाँ हमारे प्रभु यीशु की देह पर सुगन्धित द्रव्य लगाने आई थीं, परन्तु विशेष रूप से यहाँ कहा गया है कि वे कब्र को देखने आई थीं कि जानें भीतर पहुँचने और प्रवेश करने का कोई मार्ग होगा या नहीं। इसी कारण यहाँ दो विशेष रूप से चिह्नित की गई हैं।
सन्त मत्ती यह भी कहता है कि जब वे दोनों वहाँ थीं, तब स्वर्गदूत ने उन्हें दर्शन दिया। परन्तु क्योंकि उनमें से केवल एक ने बात कही, इसी कारण उसका नाम इस प्रकार विशेष रूप से लिया गया है। अन्त में जब वे लौट रही हैं, तो हमारे प्रभु यीशु उन्हें मिलते हैं, जो उन्हें अपने चेलों के पास भेजते हैं कि सब गलील में इकट्ठे हों, क्योंकि वह वहाँ उन्हें अपना पुनरुत्थान दिखाना चाहता था, और इसलिए भी कि यरूशलेम नगर ने अपनी दुष्टता से अपने आप को ऐसी गवाही से वंचित कर लिया था। यह सच है कि जीवन का सोता अब भी वहीं था, क्योंकि उसी में से व्यवस्था और परमेश्वर का वचन निकला था, परन्तु इस बीच हमारे प्रभु यीशु ने उस नगर में अपने आप को चेलों पर प्रकट करना नहीं चाहा, जब वहाँ की दुष्टता अभी इतनी ताज़ा थी। दूसरी ओर, वह उनके मन की कठोरता के अनुकूल भी होना चाहता था। क्योंकि वे मानो अचम्भे से जकड़े हुए थे, इसलिए देखने की इन्द्रिय पर्याप्त न होती, जब तक कि वह उन्हें अलग न ले जाता, और अपने आप को इस रीति से न दिखाता कि वे पूरी तरह निश्चित हो जाएँ।
अब हम यहाँ फिर देखते हैं कि ये नामित स्त्रियाँ अब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह को अपना स्वामी जानकर दण्डवत् करने नहीं पाई थीं, यद्यपि वे उसकी मृत्यु से व्याकुल थीं। इसलिए हम भली-भाँति निर्णय कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सदा उनके हृदयों में बोया हुआ था। क्योंकि यद्यपि उनका विश्वास निर्बल था, तौभी वे हमारे प्रभु यीशु को कब्र पर ढूँढ़ती हैं। उनमें एक प्रकार की अज्ञानता भी है जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता। क्योंकि उन्हें तो पहले ही अपने मन ऊपर उठाकर उस पुनरुत्थान की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई थी, और जिसके लिए तीसरा दिन विशेष रूप से ठहराया गया था। वे तो ऐसी व्यस्त थीं कि सबसे मुख्य बात को नहीं समझीं, अर्थात् यह कि हमारे प्रभु यीशु को हमारे लिए जीवन और उद्धार प्राप्त करने के लिए मृत्यु पर जय पानी थी। मैं कहता हूँ कि यही मुख्य बात है, क्योंकि इसके बिना (जैसा सन्त पौलुस कहता है) सुसमाचार कुछ भी न होता और हमारा विश्वास पूरी तरह नष्ट हो जाता। इसलिए ये बेचारी स्त्रियाँ, यद्यपि वे जानती हैं कि जो सुसमाचार उन्हें सुनाया गया है वह निरी सच्चाई है, तौभी इतनी व्याकुल और घबराई हुई हैं कि वे नहीं समझतीं कि उसे जी उठना था, और इस कारण वे अपने सुगन्धित द्रव्य लिए हुए कब्र पर आती हैं। अतः यह एक दोष है जो निन्दा के योग्य है। परन्तु तौभी उनकी सेवा परमेश्वर को प्रिय है, क्योंकि जब तक वह उन्हें सुधार न दे, तब तक वह उनके चकित होने को क्षमा करता है। इससे हम देखें कि जब हमारे प्रभु हमारे किए हुए को स्वीकार करते हैं, तौभी हमें उसे अपने श्रेय में गिनकर यह नहीं कहना चाहिए कि हमने उसे कमाया है, वरन् इसके बिलकुल विपरीत, यह उसके प्रचुर अनुग्रह ही की बात है यदि वह उसे स्वीकार करता है जो उसके सामने भेंट करने के योग्य न था। क्योंकि जब परमेश्वर हमारे कामों की कठोरता से जाँच करता है, तब उन्हें दोषी ठहराने का कारण सदा बना रहेगा, इसलिए कि वे सदा किसी न किसी धब्बे से कलंकित रहेंगे। परन्तु परमेश्वर हम पर दया करता है और जो हम उसके सामने चढ़ाने आते हैं, उसे अस्वीकार नहीं करता, चाहे उसमें कैसी ही निर्बलता या दोष क्यों न हो, क्योंकि सब कुछ विश्वास से शुद्ध हो जाता है और हम जानते हैं कि हम यीशु मसीह में उसके ग्रहणयोग्य निष्कारण नहीं हैं। इसलिए यह बात हमें ध्यान में रखनी है।
तौभी हम यह भी मानें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की कब्र में निश्चय ही कोई और सुगन्ध रही होगी, जो इन द्रव्यों की सुगन्ध से, जिनका यहाँ उल्लेख है, कहीं उत्तम और कहीं प्रबल थी। हम पहले कह चुके हैं कि यहूदी लोग देह पर सुगन्धित द्रव्य लगाने के रीति-रिवाज़ वाले थे, ताकि पुनरुत्थान और स्वर्गीय जीवन की आशा में दृढ़ किए जाएँ। यह इस बात को दिखाने के लिए था कि देह इस हद तक नहीं गलतीं कि अन्तिम दिन तक सुरक्षित न रखी जा सकें, और परमेश्वर उन्हें फिर से बहाल कर सके। परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह को ऐसे सब क्षय से मुक्त रहना था। अब सुगन्धित द्रव्य यह नहीं कर सकते थे, परन्तु क्योंकि यह घोषित किया गया था कि परमेश्वर अपने पवित्र और भक्त जन को सड़ने न देगा, इसी कारण हमारे प्रभु यीशु चमत्कार से सब क्षय से बचाए गए। फिर क्योंकि वह सड़ाहट से मुक्त रहा, इसलिए अब हम पुनरुत्थान की महिमा के विषय में निश्चित और आश्वस्त हैं, जो उसके व्यक्तित्व में हमारे सामने प्रकट हो चुकी है। अतः हम अब देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की कब्र और पुनरुत्थान की सुगन्ध हम तक भी फैल गई है, ताकि हम उससे जीवित हो जाएँ। अब इसके बाद क्या? यह कि हम इन स्त्रियों के समान कब्र को देखने फिर न जाएँ, जिनकी अज्ञानता और निर्बलता से हमें शिक्षा मिलती है, वरन् ऊपर उड़ चलें, क्योंकि वह हमें वहाँ बुलाता और आमन्त्रित करता है, क्योंकि उसने हमें मार्ग दिखाया है, और हमें बताया है कि वह अपने स्वर्गीय राज्य के अधिकार में प्रवेश कर चुका है ताकि हमारे लिए वहाँ स्थान और जगह तैयार करे, जब हम विश्वास के द्वारा उसे वहाँ पाएँगे।
परन्तु हमें वह भी ध्यान देना चाहिए जो सन्त मत्ती आगे जोड़ता है: वह कहता है कि स्वर्गदूत प्रकट हुआ, जिससे पहरुए डर गए और मृतक समान हो गए। स्त्रियाँ भी डर गईं, परन्तु स्वर्गदूत ने इसके बाद उपचार किया। उसने कहा, “तुम मत डरो, क्योंकि तुम यीशु को ढूँढ़ती हो जो क्रूस पर चढ़ाया गया था। वह अपने वचन के अनुसार जी उठा है।” यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्वर इन स्त्रियों की भावना और उनके उत्साह को किस प्रकार स्वीकार करता है, फिर भी जिस बात को वह पसन्द नहीं करता उसे सुधारता है। मेरा अर्थ यह है कि वह उसे स्वर्गदूत के मुख से सुधारता है जो उसके नाम से वहाँ उपस्थित है। हम कह चुके हैं कि यह परमेश्वर की अनोखी कृपा है कि वह हमारी सेवा को, जब वह अधूरी हो, स्वीकार करता है, यद्यपि वह उससे घृणा भी कर सकता था। इस प्रकार वह हमसे उसे ग्रहण करता है जो कुछ मूल्य का नहीं, जैसे पिता अपने बच्चों से वह ग्रहण कर लेता है जो अन्यथा कूड़ा और हँसी-ठट्ठा समझा जाता। देखो, मैं कहता हूँ, परमेश्वर हमारे प्रति कैसा उदार है। परन्तु दूसरी ओर, यह भी सच है कि वह नहीं चाहता कि मनुष्य अपने दोषों में मगन हों और उन्हें हल्का समझें। इसलिए स्वर्गदूत स्त्रियों के इस दोष को सुधारता है। यद्यपि उनका उद्देश्य भला है, तौभी उनके इस विशेष दोष के कारण उन पर दोष लगाया जाता है। इसीलिए सन्त लूका लिखता है कि उन्हें और कठोरता से डाँटा गया। “तुम जीवते को मरे हुओं में क्यों ढूँढ़ती हो?” परन्तु यहाँ हमें यह देखना है कि पहरुए, जो अविश्वासी और दुष्ट मनुष्य थे, जिन्हें परमेश्वर या धर्म का कोई भय न था, भय से जकड़ लिए गए, सम्भवतः मानो एक उन्माद की आत्मा से भी। स्त्रियाँ तो निश्चय डरती हैं, परन्तु उन्हें तुरन्त शान्ति मिल जाती है। देखो, तब, जिन पर परमेश्वर की महिमा प्रकट होती है उनके लिए वह कैसी भयानक है। इसी कारण जब परमेश्वर हम पर अपने आप को प्रकट करता है तो हम अपनी निर्बलता को अनुभव करते हैं, और जबकि पहले हम घमण्ड से फूले हुए थे और इतने ढीठ थे कि अब अपने आप को नश्वर मनुष्य भी न समझते थे, जब परमेश्वर हमें अपनी उपस्थिति का कोई चिह्न देता है, तो हमें अवश्य ही कुचला जाना और यह जानना पड़ता है कि हमारी दशा क्या है, अर्थात् यह कि हम केवल धूल और राख हैं, कि हमारे सारे गुण केवल धुआँ हैं जो तैरकर मिट जाता है। इसलिए यह सब के लिए समान है, चाहे भले हों या बुरे। इसके अतिरिक्त, जब परमेश्वर अविश्वासियों को इस प्रकार भयभीत कर चुकता है, तो उन्हें वहीं निकम्मे मनुष्यों की भाँति छोड़ देता है, क्योंकि वे किसी रीति से उसकी भलाई का अनुभव करने के योग्य नहीं। इसीलिए वे उसकी उपस्थिति से भागते हैं, क्रोधित होते और दाँत पीसते हैं और ऐसे उग्र हो जाते हैं कि सब बोध और विवेक खो बैठते हैं, और पूरी तरह पशु के समान मनुष्य बन जाते हैं। विश्वासी भयभीत होने के बाद उठ खड़े होते और साहस बाँधते हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें शान्ति और आनन्द देता है। अतः यह भय जो विश्वासी परमेश्वर की महिमा की उपस्थिति में अनुभव करते हैं, दीनता की पहली सीढ़ी के सिवा और कुछ नहीं, ताकि वे उसे वह आदर दें जो उसका प्राप्य है, और यह जानकर कि वे कुछ भी नहीं हैं, उसके अधीन हो जाएँ, और अपना सारा भला उसी एक में ढूँढ़ें।
इसी कारण स्वर्गदूत कहता है, “मत डरो।” यह वचन ध्यान देने योग्य है। क्योंकि यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, “मैं इस भीड़ को उसकी घबराहट में छोड़ता हूँ, क्योंकि वे किसी दया के योग्य नहीं, परन्तु अब मैं तुम्हारी ओर मुड़ता हूँ और तुम्हारे लिए आनन्द का समाचार लाता हूँ। इसलिए इस भय से छूट जाओ, क्योंकि तुम यीशु मसीह को ढूँढ़ती हो।” जब यह सच है, तो हम सीखें कि अपने प्रभु यीशु को ढूँढ़ें, (जैसा मैं कह चुका हूँ) ऐसी कठोरता के साथ नहीं जैसी इन स्त्रियों में थी जिनकी बात यहाँ हो रही है (और अब उसे कब्र पर ढूँढ़ने जाने का कोई कारण भी नहीं रहा), वरन् हम बिना ढोंग के विश्वास के द्वारा सीधे उसके पास आएँ। और ऐसा करते हुए हम निश्चित रहें कि यह समाचार हमारा है और हमें ही सुनाया गया है। हमें साहस के साथ और बिना भय के आना चाहिए, परन्तु बिना श्रद्धा के नहीं (क्योंकि परमेश्वर की महिमा की आराधना करने के लिए हमारा भय से प्रभावित होना आवश्यक है)। परन्तु फिर भी हम ऐसे भयभीत न हों मानो अविश्वास से पूरी तरह दब गए हों। अतः हम जानें कि जब हम विश्वास के साथ परमेश्वर के पुत्र के पास आएँगे, तो वह हमारी सीमाओं के अनुसार अपने आप को ढाल लेगा, और हम उसमें शान्ति और आनन्द का कारण भी पाएँगे, क्योंकि हमारे लाभ और उद्धार के लिए ही उसने स्वर्गीय जीवन का प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त किया है।
तौभी स्त्रियाँ बड़े आनन्द और बड़े भय के साथ चली गईं। यहाँ फिर उनके विश्वास की निर्बलता प्रकट होती है। मैं कह चुका हूँ कि जिस उद्देश्य की वे आकांक्षा करती थीं वह भला था, परन्तु उन्होंने सही मार्ग नहीं पकड़ा, जैसा हम इस बात से जानते हैं कि वे कायर हैं, और पुनरुत्थान पर विश्वास करें या न करें, इसका निर्णय नहीं कर पातीं। यद्यपि उन्होंने इसकी चर्चा अनेक बार सुनी थी, तौभी वे अपनी भावनाओं पर जय पाकर अन्तिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकतीं कि अब हमारे प्रभु यीशु को कब्र पर ढूँढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं रही। अतः इस भय का मूल देखो। इस प्रकार हम देखते हैं कि यह एक भ्रान्त भाव है। यह सच है (जैसा मैंने संकेत किया) कि हमें परमेश्वर का भय मानना चाहिए कि उसकी महिमा के प्रति श्रद्धा दिखाएँ, उसकी आज्ञा मानें और पूरी तरह दीन हो जाएँ, ताकि वह अपनी महिमा में ऊँचा किया जाए; कि हर एक मुँह बन्द रहे, ताकि केवल वही धर्मी, बुद्धिमान और सर्वशक्तिमान माना जाए। परन्तु यहाँ जिस भय का उल्लेख है, वह दूसरे प्रकार का है, बुरा और निन्दनीय है, क्योंकि वह इन बेचारी स्त्रियों की घबराहट से उत्पन्न हुआ है। फिर भी, यद्यपि वे स्वर्गदूत को देखती और बोलते सुनती हैं, उन्हें यह लगभग स्वप्न के समान लगता है। अब इससे हमें चेतावनी मिलती है कि परमेश्वर हममें इतनी बार काम करता है जब हम यह नहीं जान पाते कि हमें लाभ हुआ या नहीं। क्योंकि हममें इतनी अज्ञानता है कि मानो बादल हमें पूर्ण स्पष्टता तक पहुँचने से रोकते हैं, और हम अनेक कल्पनाओं में उलझे रहते हैं। संक्षेप में, ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर की सारी शिक्षा लगभग निष्फल है। तौभी हम उसमें कुछ आशंका मिली हुई पाते हैं जिससे हमें अनुभव होता है कि परमेश्वर ने हमारे हृदयों में काम किया है। चाहे हमारे पास अनुग्रह की केवल एक छोटी सी चिंगारी हो, तौभी हम हियाव न छोड़ें। वरन् हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह इस थोड़े पर, जिसे उसने आरम्भ किया है, और बढ़ाए, और हमें विश्वास करनेवाला बनाए और हमें दृढ़ करे, जब तक हम सिद्धता तक न पहुँचाए जाएँ, जिससे हम अभी बहुत दूर हैं। यदि स्त्रियों का इस प्रकार भय और आनन्द से भर जाना दोष भी गिना जाए, तौभी हम देखते हैं कि परमेश्वर ने सदा अपने पवित्र आत्मा से उनका संचालन किया, और जो समाचार स्वर्गदूत उनके पास लाया वह पूरी तरह निष्फल नहीं गया।
अब हमें आगे बढ़ना है। हमारे प्रभु यीशु उन्हें मार्ग में मिले, और उनसे कहा, “मत डरो, परन्तु जाओ, मेरे भाइयों से कहो कि गलील में इकट्ठे हों और वहाँ वे मुझे देखेंगे।” हम इस वचन में और भी भली-भाँति देखते हैं कि परमेश्वर का पुत्र हमें धीरे-धीरे अपनी ओर कैसे खींचता है, जब तक हम पूरी तरह दृढ़ न हो जाएँ, जैसा हमारे लिए आवश्यक है। यह निश्चय ही पर्याप्त था कि स्त्रियों ने स्वर्गदूत के मुख से समाचार सुना, क्योंकि उसमें इस बात के चिह्न थे कि वह परमेश्वर की ओर से भेजा गया है। उसका रूप बिजली के समान था। यह सच है कि वस्त्र की उजलाई और ऐसी बातें परमेश्वर की महिमा को सजीव रूप से व्यक्त नहीं करतीं। तौभी इन स्त्रियों के पास बहुत निश्चित गवाही थी कि जो बोल रहा था वह कोई नश्वर मनुष्य नहीं, वरन् स्वर्ग का दूत था। यह गवाही उनके लिए भली-भाँति पर्याप्त हो सकती थी, परन्तु तौभी निश्चय बहुत अधिक हो गया जब उन्होंने हमारे प्रभु यीशु को देखा, जिसे उन्होंने पहले-पहल परमेश्वर का पुत्र और उसकी अटल सच्चाई जाना। इस प्रकार जो कुछ उन्होंने पहले स्वर्गदूत के मुख से सुना था, उसकी और स्पष्ट पुष्टि हुई। और हम भी इसी प्रकार विश्वास में बढ़ते हैं। क्योंकि आरम्भ से हम नहीं जानते कि परमेश्वर के वचन में कैसी सामर्थ्य और प्रभाव है। परन्तु यदि कोई हमें सिखाए, और भली-भाँति सिखाए, तो हम कुछ सीखते हैं, तौभी वह लगभग कुछ नहीं होता। परन्तु थोड़ा-थोड़ा करके वह उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हम पर अपनी छाप डालता है, और अन्त में वह हमें दिखा देता है कि जो बोलता है वह वही है। तब हम ऐसे दृढ़ हो जाते हैं कि हमारे पास केवल कुछ ज्ञान ही नहीं होता, वरन् हम ऐसे आश्वस्त हो जाते हैं कि जब शैतान जितनी भी युक्तियाँ कर सकता है करता है, तब भी वह हमारे विश्वास को डिगा नहीं पाता, क्योंकि हमें यह निश्चय है कि परमेश्वर का पुत्र हमारा शिक्षक है और हम उस पर टिके हुए हैं, यह जानते हुए कि उसे हम पर पूरा अधिकार है और वह पूर्ण सर्वोच्च अधिकार के योग्य है। हम इन स्त्रियों में यह देखते हैं। यह सच है कि परमेश्वर सब में एक ही रीति से कार्य नहीं करता। कुछ लोग आरम्भ ही से ऐसे खिंच जाते हैं कि वे जान लेते हैं कि परमेश्वर ने उनके लिए असाधारण सामर्थ्य प्रयोग की है। परन्तु प्रायः हमें इस प्रकार सिखाया जाएगा कि हमारी रूखाई और निर्बलता स्पष्ट दिखाई दे, जिससे हमें और भी चेतावनी मिले कि परमेश्वर की महिमा करें और मानें कि हमारे पास जो कुछ है, उसी की ओर से है।
अब उस वचन पर विचार करें जो हमने उद्धृत किया है, “जाओ, मेरे भाइयों से कहो कि गलील में मुझ से मिलें।” हम देखते हैं कि परमेश्वर के पुत्र ने यहाँ मरियम और उसकी संगिनी को केवल इसलिए दर्शन नहीं दिया कि सात-आठ व्यक्तियों पर अपने आप को प्रकट करे, वरन् वह चाहता था कि यह समाचार प्रेरितों तक पहुँचाया जाए, ताकि अब वह हमें भी बताया जाए और हम उसमें सहभागी हों। वास्तव में इसके बिना पुनरुत्थान की यह कथा हमारे किस काम की होती? परन्तु जब कहा गया है कि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को इस प्रकार प्रकट किया, और वह चाहता था कि इसका फल सारे संसार को दिया जाए, तो इसी से हमें कहीं अधिक अच्छी धारणा मिलती है। इसलिए हम निश्चित रहें कि हमारे प्रभु यीशु ने चाहा कि हम उसके पुनरुत्थान के विषय में निश्चित हों, क्योंकि हमारे उद्धार और हमारी धार्मिकता की सारी आशा इसी पर टिकी है, जब हम सचमुच जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु जी उठा है। उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग से हमें हमारी सारी मलिनता से शुद्ध ही नहीं किया, वरन् वह ऐसी निर्बलता की दशा में रह भी नहीं सकता था। उसे अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिखानी थी और मरे हुओं में से जी उठकर परमेश्वर का पुत्र घोषित होना था, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के पहले अध्याय में और अन्य स्थानों में कहता है। इस प्रकार अब हमें निश्चय होना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु ने जी उठकर चाहा कि हम उसके पास आएँ और हमारे लिए मार्ग खुल जाए। और वह हमारे उसे ढूँढ़ने की प्रतीक्षा नहीं करता, वरन् उसने यह प्रबन्ध किया है कि हम सुसमाचार के प्रचार के द्वारा बुलाए जाएँ और यह समाचार उसके उन दूतों के मुख से सुनाया जाए जिन्हें उसने चुना और नियुक्त किया था। ऐसा होने से हम मानें कि आज हम उस धार्मिकता में सहभागी हैं जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में प्राप्त है, ताकि स्वर्गीय महिमा तक पहुँचें, क्योंकि वह हमसे अलग होना नहीं चाहता।
इसी कारण वह अपने चेलों को अपने भाई कहता है। निश्चय यह एक आदरणीय उपाधि है। और यह उन्हीं के लिए रखी गई थी जिन्हें हमारे प्रभु यीशु ने अपने सेवक ठहराया था। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने यह शब्द उस भ्रातृ-सम्बन्ध को दिखाने के लिए प्रयोग किया जो वह उनके प्रति बनाए रखना चाहता था। और इस प्रकार वह हमारे साथ भी एक है, जैसा सन्त यूहन्ना द्वारा और भी स्पष्ट बताया गया है। वास्तव में हमें भजन संहिता 22 की ओर ले जाया जाता है, जिसमें से यह वचन लिया गया है: मैं तेरे नाम का वर्णन अपने भाइयों से करूँगा; इस वचन को प्रेरित ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व पर लागू करके, उन्हें भाई कहने में केवल बारह प्रेरितों को ही सम्मिलित नहीं किया, वरन् यह उपाधि हम सब को सामान्य रूप से देता है जो परमेश्वर के पुत्र के पीछे चलते हैं, और वह चाहता है कि हम ऐसे सम्मान में सहभागी हों। इसी कारण जब हमारे प्रभु यीशु कहते हैं “मैं अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास, अपने पिता और तुम्हारे पिता के पास जाता हूँ,” तो यह थोड़े से लोगों के लिए नहीं कहा गया, वरन् विश्वासियों की सारी मण्डली को सम्बोधित है। अब हमारे प्रभु यीशु, यद्यपि वह हमारा अनन्त परमेश्वर है, तौभी मध्यस्थ की हैसियत से अपने आप को दीन करके हमारे निकट आता है, और हमारे साथ सब कुछ साझा रखता है, अर्थात् अपने मनुष्य स्वभाव के विषय में। क्योंकि यद्यपि वह स्वभाव से परमेश्वर का पुत्र है और हम केवल गोद लिए हुए हैं, और वह भी अनुग्रह से, तौभी यह संगति स्थायी है कि जो हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, वही उसके द्वारा हमारा भी है, निश्चय ही भिन्न-भिन्न रूपों में। क्योंकि हमें अपने सिर जितना ऊँचा उठाए जाने की आवश्यकता नहीं। यहाँ कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। यदि मानव देह में सिर सब अंगों के ऊपर न होता, तो वह एक विकृति होती, वह एक अस्त-व्यस्त पिण्ड होता। यह भी उचित है कि हमारे प्रभु यीशु अपनी सर्वोच्च स्थिति बनाए रखें, क्योंकि वह परमेश्वर का एकलौता पुत्र है, अर्थात् स्वभाव से। परन्तु यह हमारे उससे भाईचारे में जुड़े होने में बाधा नहीं बनता, ताकि हम पूरे भरोसे के साथ बेधड़क परमेश्वर को पुकार सकें कि वह हमें उत्तर देगा, क्योंकि हमें उस तक निजी और अपनेपन की पहुँच प्राप्त है। अतः हम देखते हैं कि इस वचन का क्या अर्थ है जब हमारे प्रभु यीशु अपने चेलों को भाई कहते हैं, अर्थात् यह कि इससे हमें आज उनके साथ यह विशेषाधिकार साझा मिलता है, अर्थात् विश्वास के द्वारा। और इससे परमेश्वर के पुत्र की सामर्थ्य और महिमा में कोई कमी नहीं आती, जब वह अपने आप को हम जैसे दीन प्राणियों के साथ जोड़ता है, और मानो हमारे साथ गिना जाना स्वीकार करता है। क्योंकि हमें और भी आनन्द से भर जाना चाहिए, जब हम देखते हैं कि वह कैसी भलाई दिखाता है, जब हम देखते हैं कि मरे हुओं में से जी उठकर उसने हमारे लिए स्वर्गीय महिमा प्राप्त कर ली है, जिसे हमारे लिए प्राप्त करने के लिए उसने अपने आप को भी दीन किया, वरन् मानो कुछ भी न बन जाना स्वीकार किया। अब, जब हमारे प्रभु यीशु हमें अपने भाई स्वीकार करने की कृपा करते हैं ताकि हमें परमेश्वर तक पहुँच प्राप्त हो, तो हम उसे ढूँढ़ें, और पूरे भरोसे के साथ उसके पास आएँ, क्योंकि हमें इतने स्नेह से बुलाया गया है। अर्थात् ऐसा कहें तो, वह हमें खींचने के लिए केवल वचन ही का प्रयोग नहीं करता, वरन् दृश्य संस्कार भी जोड़ता है, ताकि हमें उतना ही आगे ले जाया जाए जितना हम चल सकें। और वास्तव में हम चाहे कितने ही निर्बल और मन्द हों, तौभी यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास न आएँ तो अपनी शिथिलता का कोई बहाना नहीं कर सकते। यह वह मेज़ है जो उसने हमारे लिए तैयार की है। और किस उद्देश्य से? यह हमारे शरीरों और पेटों को तृप्त करने के लिए नहीं, यद्यपि उसमें भी परमेश्वर घोषणा करता है कि उसे हमारी पितृवत् चिन्ता है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह दिखाते हैं कि सचमुच वही जगत का जीवन है। यदि हम प्रतिदिन विश्राम और भोजन पाते हैं, तो उसमें भी हमारे प्रभु यीशु अपनी भलाई हम पर प्रकट करते हैं। परन्तु इस मेज़ में, जो यहाँ हमारे लिए सजाई गई है, वह एक विशेष विचार दिखाता है, क्योंकि यह हमें दिखाने के लिए है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के भाई हैं, अर्थात् जैसे उसने हमें अपने साथ जोड़ा (जैसा वह सन्त यूहन्ना के 17वें अध्याय में कहता है) वैसे ही उसने हमें परमेश्वर अपने पिता से भी जोड़ा है, और हमें पूरी तरह बताता है कि वही हमारा भोजन और पेय है, कि हम उसी के सार से पोषित किए जाते हैं ताकि हमारा सारा आत्मिक जीवन उसी में हो। और यह उससे कहीं अधिक है जितना यदि वह हमें सौ बार अपने भाई कहता।
इसलिए हम उस एकता को समझें जो हमारी अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ है, अर्थात् वह हमारे साथ साझा जीवन रखना चाहता है, और जो उसका है वह हमारा हो, यहाँ तक कि वह हम में वास करना चाहता है, कल्पना में नहीं, वरन् वास्तव में; सांसारिक रीति से नहीं, वरन् आत्मिक रीति से; और किसी भी दशा में वह अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से ऐसा कार्य करता है कि हम उससे उससे भी अधिक जुड़े हैं जितने किसी देह के अंग होते हैं। और जैसे वृक्ष की जड़ अपना सार और अपनी सामर्थ्य सब डालियों में पहुँचाती है, वैसे ही हम अपने प्रभु यीशु मसीह से सार और जीवन खींचते हैं। और इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि हमारा फसह का मेम्ना क्रूस पर चढ़ाया और बलि किया गया है, इसलिए अब इसके सिवा कुछ नहीं बचता कि हम पर्व मनाएँ और बलिदान में भाग लें। और जैसे प्राचीन काल में व्यवस्था के अधीन जब बलि चढ़ाई जाती थी तो वे खाते थे, वैसे ही अब हमें भी आना चाहिए और इस बलिदान में, जो हमारे छुटकारे के लिए चढ़ाया गया है, अपना भोजन और आत्मिक आहार लेना चाहिए। यह सच है कि हम यीशु मसीह को उसकी देह में नहीं खाते, वह हमारे दाँतों के नीचे नहीं आता, जैसा पोप के अनुयायियों ने कल्पना की है, परन्तु हम रोटी को एक निश्चित और अचूक चिह्न के रूप में ग्रहण करते हैं कि हमारे प्रभु यीशु अपनी देह से हमें आत्मिक रीति से पोषित करते हैं; हम दाखरस की एक बूँद लेते हैं यह दिखाने के लिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से हमें आत्मिक रीति से सम्भाला जाता है। परन्तु हम भली-भाँति ध्यान दें कि सन्त पौलुस क्या जोड़ता है, कि जैसे व्यवस्था के प्रतीकों के अधीन खमीरी रोटी खाने की, जिसका आटा कड़वा हो, अनुमति नहीं थी, अब जब हम ऐसी छायाओं के अधीन नहीं रहे, तो हमें बैर और दुष्टता के और अपनी सारी भ्रष्टता के खमीर को निकाल देना चाहिए, और ऐसी रोटी या टिकिया रखनी चाहिए (वह कहता है) जिसमें कड़वाहट न हो। और कैसे? पवित्रता और सच्चाई में। इसलिए जब हम इस पवित्र मेज़ के निकट आते हैं, जिसके द्वारा परमेश्वर का पुत्र हमें दिखाता है कि वही हमारा भोजन है, कि वह अपने आप को हमारा पूरा और सम्पूर्ण आहार करके हमें देता है, और चाहता है कि अब हम उस बलिदान में भाग लें जो उसने हमारे उद्धार के लिए एक ही बार सदा के लिए चढ़ाया, तो हमें यह देखना चाहिए कि हम अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता को उसके साथ मिलाने के लिए न लाएँ, वरन् उन्हें त्याग दें, और केवल पूरी तरह शुद्ध होना चाहें, ताकि हमारे प्रभु यीशु हमें अपनी देह के अंग मानें, और इस रीति से हम भी उसके जीवन के सहभागी हों। इसी प्रकार आज हमें इस पवित्र भोज का उपयोग करना चाहिए जो हमारे लिए तैयार किया गया है। अर्थात् यह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग तक, और फिर उसके पुनरुत्थान तक ले जाए, और हम जीवन और उद्धार के विषय में ऐसे आश्वस्त हों कि जैसे उस विजय के द्वारा जो उसने मरे हुओं में से जी उठकर प्राप्त की, हमें धार्मिकता दी गई है और स्वर्ग का द्वार हमारे लिए खोला गया है, ताकि हम साहस के साथ अपने परमेश्वर के निकट जाएँ और अपने आप को उसके सामने अर्पित करें, यह जानते हुए कि वह सदा हमें अपनी सन्तान जानकर ग्रहण करेगा।
अब हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने दीन श्रद्धा से दण्डवत् करें।
