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गवाही का आह्वान - 2 तीमुथियुस 1:8-9
गवाही का आह्वान
इसलिये तू हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझ बन्दी से भी लज्जित न हो, पर परमेश्वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिये दुःख उठाने में मेरे साथ भागी हो; जिसने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से बुलाया; यह हमारे कामों के अनुसार नहीं, परन्तु अपनी ही मनसा और उस अनुग्रह के अनुसार है, जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ, - 2 तीमुथियुस 1:8-9
यद्यपि परमेश्वर सुसमाचार में अपनी महिमा और प्रताप प्रकट करता है, तो भी मनुष्यों की अकृतज्ञता ऐसी है कि हमें इस बात की चेतावनी की आवश्यकता पड़ती है कि हम इस सुसमाचार से लज्जित न हों। और ऐसा क्यों? इसलिये कि परमेश्वर सब सृष्टि से अपने प्रति दण्डवत् की माँग करता है, फिर भी अधिकांश लोग उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; उस शिक्षा को तुच्छ जानते हैं, वरन् उससे बैर तक रखते हैं, जिसके द्वारा वह जाना और पूजा जाना चाहता है। यद्यपि मनुष्य इतने दुष्ट हैं कि अपने सृजनहार के विरुद्ध सिर उठाते हैं, तो भी हम उस बात को स्मरण रखें जो हमें इस स्थान में सिखाई गई है; अर्थात् यह कि हम सुसमाचार से लज्जित न हों; क्योंकि वह परमेश्वर की गवाही है।
यदि सुसमाचार का प्रचार न हो, तो यीशु मसीह मानो गाड़ दिया जाता है। इसलिये जब हम देखें कि सारा संसार मार्ग से इतनी दूर भटका हुआ है, तब हम गवाहों के रूप में खड़े हों, और उसका यह आदर करें, और इस हितकारी शिक्षा में दृढ़ बने रहें। सन्त पौलुस यहाँ अपना निजी उदाहरण हमारे सामने रखता है; इसलिये नहीं कि वह विशेष रूप से अपना अनुमोदन चाहता था, परन्तु इसलिये कि यदि हम परमेश्वर के सेवकों से अपने आप को अलग कर लें, तो हम प्रायः कठिनाई में पड़ जाते हैं। जब परमेश्वर के वचन का कोई सेवक सताया, तंग किया और उत्पीड़ित किया जाता है, तो हम आवश्यकता के समय उसे छोड़ देने पर उतारू हो जाते हैं, यह सोचकर कि वह तो केवल नश्वर मनुष्य है; परन्तु ऐसा करने में हम परमेश्वर को अप्रसन्न करते हैं; क्योंकि यह मनुष्य जो दुःख उठाता है, सुसमाचार का चिह्न धारण किए हुए है; इस प्रकार परमेश्वर का पक्ष धोखे से छोड़ दिया जाता है। इसीलिये सन्त पौलुस तीमुथियुस से कहता है, मुझसे लज्जित न हो।
तीमुथियुस का मन डगमगा सकता था; इसलिये सन्त पौलुस उससे कहता है कि चाहे संसार मुझे तुच्छ जाने, चाहे वे मेरा उपहास करें और मुझसे बैर रखें, तो भी तुझे इन बातों से विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि मैं यीशु मसीह का बन्दी हूँ। संसार मेरी निन्दा करे; यह मेरे अपराधों के कारण नहीं है; परमेश्वर मेरे पक्ष का समर्थन करता है; क्योंकि वह सचमुच उसी का है। मैं अपने बुरे कामों के कारण दुःख नहीं उठाता, क्योंकि उसका सत्य सदा मेरे साथ है। इसलिये मेरे सताए जाने का कारण यह है कि मैंने परमेश्वर के वचन का पक्ष लिया है और अब भी उसका पक्ष लेता हूँ। तुझे संसार के न्याय के अनुसार नहीं चलना चाहिए, क्योंकि मनुष्य बुरी भावनाओं के बहाव में बह जाते हैं। इसलिये तेरे लिये इतना ही पर्याप्त हो कि मैं मानो परमेश्वर के पुत्र का बंधक हूँ; कि वह मेरे व्यक्तित्व को महिमा देता है; कि यदि वह संसार की दृष्टि में निन्दनीय है, तो भी परमेश्वर और उसके पवित्र स्वर्गदूतों के सम्मुख वह आदर पाने से नहीं रुकता।
जो गवाही हम यीशु मसीह के प्रति देनदार हैं, उसमें हम उसे धोखा न दें, अपने मुँह बन्द करके, जब उसके आदर और उसके सुसमाचार के अधिकार की रक्षा करना आवश्यक हो। वरन् जब हम अपने भाइयों को परमेश्वर के कार्य के कारण पीड़ित देखें, तो उनके साथ जुड़ जाएँ और उनके क्लेश में उनकी सहायता करें। जो आँधियाँ उठती हैं, उनसे हम डगमगाएँ नहीं, परन्तु अपने उद्देश्य में सदा स्थिर बने रहें; और परमेश्वर के पुत्र के गवाहों के रूप में खड़े रहें, क्योंकि वह इतना अनुग्रहकारी है कि इतने उत्तम कार्य में हमें काम में लाता है। हम भली-भाँति ध्यान दें कि मनुष्य अपने पापों के कारण दुःख उठा रहे हैं या परमेश्वर के सत्य के कारण। जब हम किसी को सताया हुआ देखें, तो हमें उसे तुच्छ नहीं जानना चाहिए, ऐसा न हो कि हम परमेश्वर के प्रति अन्याय करें: हमें यह पता लगाना चाहिए कि मनुष्य किस कारण दुःख उठा रहे हैं। यदि वे शुद्ध विवेक से चलते रहे हैं और फिर भी उन पर दोष लगाया जाता है, यदि वे इसलिये पीड़ित किए जाते हैं कि वे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तो यही उस सबको दूर करने के लिये बहुत है जो दुष्ट संसार उनके विरुद्ध कह सकता है। इसलिये सन्त पौलुस आगे कहता है, "सुसमाचार के लिये दुःख उठाने में भागी हो।"
ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो स्वेच्छा से क्लेश से बचना न चाहे; यह मानव स्वभाव के अनुसार है; और यद्यपि हम निष्कपट होकर मानते हैं कि यह एक अनुपम अनुग्रह है जो परमेश्वर तब देता है जब वह मनुष्यों को क्लेश सहने और अपने पक्ष की रक्षा करने के योग्य बनाता है, तो भी हममें से कोई ऐसा नहीं जो स्वेच्छा से अपनी गर्दन को सताव से बाहर न खींचना चाहे। क्योंकि हम उस पाठ की ओर ध्यान नहीं देते जो सन्त पौलुस हमें देता है, जो कहता है कि सुसमाचार अपने साथ क्लेश लाता है। यीशु मसीह स्वयं अपने शरीर में क्रूस पर चढ़ाया गया, और उसकी शिक्षा बहुत सी विपत्तियों से जुड़ी हुई है। यदि उसे भाता, तो वह अपनी शिक्षा को बिना किसी विरोध के ग्रहण करवा सकता था। परन्तु पवित्रशास्त्र का पूरा होना अवश्य था: "तू अपने शत्रुओं के बीच में शासन कर" (भजन संहिता 110)।
हमें उसके पास इसी शर्त पर आना है; कि हम बहुत से झगड़े-झंझट सहने को तैयार रहें; क्योंकि जब वह दुष्टों को अपने पास बुलाता है, तब वे उसके विरुद्ध सिर उठाते हैं। इसलिये हमारे लिये यह असम्भव है कि हमें बिना क्लेश के सुसमाचार मिले। हमें अभ्यास कराया जाना है; हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के झण्डे तले लड़ना है। तो क्या वह मनुष्य अपने उद्धार को नहीं त्यागता, जो मसीह के क्रूस से छुटकारा पाना चाहता है? जीवन की आशा किस में है? केवल इसी में कि हम परमेश्वर के पुत्र के बलिदान से मोल लिए गए हैं। तब वह चाहेगा कि हम उसके समान बनाए जाएँ, और उसके स्वरूप में बदल दिए जाएँ।
हमें अपने भाइयों से लज्जित नहीं होना चाहिए; जब हम उनके विषय में बुरी बातें सुनें और उन्हें संसार से ठुकराया हुआ देखें, तब हम सदा उनके साथ रहें और उन्हें दृढ़ करने का यत्न करें; क्योंकि सुसमाचार बिना क्लेश के नहीं हो सकता; जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ। परमेश्वर को यही भाता है कि मनुष्य इस प्रकार बँट जाएँ। परन्तु वह सब को विश्वास की एकता के लिये बुलाता है; और सुसमाचार की शिक्षा मेल-मिलाप का सन्देश है; फिर भी विश्वासी उसके पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से खिंचे चले आते हैं (जैसा हम आगे और विशेष रूप से देखेंगे); परन्तु अविश्वासी अपनी कठोरता में बने रहते हैं: इस प्रकार आग भड़कती है; जैसे जब आकाश में बिजली गरजती है तो उथल-पुथल अवश्य होती है, वैसे ही सुसमाचार के प्रचार के समय होता है।
अब, यदि सुसमाचार क्लेश लाता है, और यीशु मसीह की यही इच्छा है कि जो कुछ उसने अपने शरीर में सहा, वह उसके अंगों में पूरा हो, और वे प्रतिदिन क्रूस पर चढ़ाए जाएँ, तो क्या हमारे लिये उचित है कि हम उस स्थिति से अपने आप को हटा लें? जब ऐसा है कि उद्धार की सारी आशा सुसमाचार में है, तब हमें उसी पर टिके रहना चाहिए; और सन्त पौलुस की बात पर ध्यान देना चाहिए; अर्थात् जब हम अपने भाइयों को संकट में और दुष्टों से निन्दित होते देखें, तब हमें उनकी सहायता करनी चाहिए; और बुरे नाम की ऐसी प्रतिष्ठा पाने के बजाय, कि हम उनसे मुँह फेर लें जो उस कारण के लिये दुःख उठा रहे हैं जो उनका भी है और हमारा भी, हमें उनके साथी होना और संसार की झिड़कियाँ और ठट्ठे सहना चुनना चाहिए।
हम दुर्बल पड़ जाने और यह सोचने के प्रवृत्त हैं कि ज्योंही हमारे शत्रु हम पर आक्रमण करेंगे, हम सताव में निगल लिए जाएँगे: परन्तु सन्त पौलुस ध्यान दिलाता है कि हम अपने परमेश्वर की सहायता और सहारे से वंचित न होंगे। वह तुरन्त हमें हथियारबन्द करता है और हमें अजेय सामर्थ्य देता है कि हम निश्चल और दृढ़ बने रहें। इसी कारण सन्त पौलुस आगे कहता है, "परमेश्वर की सामर्थ्य के अनुसार।" परन्तु जैसा हम कह चुके हैं, हर मनुष्य कोई आड़ या ओट पाकर प्रसन्न होगा, जिससे वह सताव से अपने को हटा ले। यदि परमेश्वर मुझे अनुग्रह दे, तो मैं उसके नाम के लिये सहर्ष दुःख उठाऊँ; मैं जानता हूँ कि यह सबसे बड़ी आशीष है जो मुझे मिल सकती है।
हर मनुष्य यह मान लेगा: परन्तु वे जोड़ देते हैं कि हम दुर्बल हैं, और अपने शत्रुओं की क्रूरता से शीघ्र गिरा दिए जाएँगे। परन्तु सन्त पौलुस यह कहकर यह बहाना दूर कर देता है कि परमेश्वर हमें बल देगा, और हमें अपने बल पर दृष्टि नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि यह निश्चित है कि यदि हम कभी अपने शत्रुओं से मुठभेड़ में न आएँ, तो हम अपनी ही छाया से डरेंगे। जब हम इस दुर्बलता को जानते हैं, तो आओ हम उपाय की ओर बढ़ें। हमें विचार करना चाहिए कि अपने शत्रुओं का सामना करना कितना कठिन है; इसलिये आओ हम परमेश्वर के सम्मुख दीन बनें और उससे प्रार्थना करें कि वह अपना हाथ बढ़ाए और हमारे सब क्लेशों में हमें थामे रहे। यदि यह शिक्षा हमारे हृदयों में भली-भाँति अंकित हो जाती, तो हम दुःख उठाने के लिये अब से कहीं अधिक तैयार होते।
परन्तु हम उसे भूल जाने को प्रवृत्त हैं; वरन् जब उसकी चर्चा होती है तब हम कान बन्द कर लेते और आँखें मूँद लेते हैं। हम ढोंग करते हैं कि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें बल दे, पर हम उस सामर्थ्य की ओर, जिसकी चर्चा सन्त पौलुस करता है, अपनी दृष्टि नहीं ले जा सकते; हम यह सोचने को प्रवृत्त हैं कि हमारा उससे कुछ लेना-देना नहीं; यद्यपि प्रभु ने हमें दिखाया है कि उसकी सामर्थ्य सदा हमें थामे रखेगी। इसलिये हमारी दुर्बलता हमें क्रूस से और सताव से हटने का कारण न बने; क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपने हाथों में ले लिया है, और हमारी कमियों को पूरा करने की प्रतिज्ञा की है। सन्त पौलुस यहाँ एक ऐसा पाठ जोड़ता है जो हमें बहुत लज्जित करे, यदि हम सताव सहकर यीशु मसीह की महिमा करने के लिये प्रेरित न हों; वह कहता है, "परमेश्वर ने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से बुलाया।"
देखो! परमेश्वर ने हमें नरक के गड्ढे से निकाल लिया है! हम बिलकुल त्यागे हुए और दोषी ठहराए हुए थे: परन्तु वह हमारे लिये उद्धार लाया है, और हमें उसका भागी होने के लिये बुलाया है। इसलिये जब परमेश्वर ने अपने आप को इतना उदार दिखाया है, तब यदि हम अपनी ओर से उसकी ओर पीठ फेर लें, तो क्या यह लज्जाजनक दुर्भावना नहीं? आओ हम सन्त पौलुस के उस दोषारोपण को भली-भाँति ध्यान में रखें जो उसने अस्थिर लोगों के विरुद्ध किया है; उनके विरुद्ध जो सुसमाचार के कारण अपने ऊपर होनेवाले आक्रमणों को सहना नहीं चाहते। निःसन्देह उसका मन विश्वासियों को आगे के समय के लिये शान्ति देना था; इसलिये वह दिखाता है कि परमेश्वर उनके लिये पहले ही क्या कर चुका है।
जब परमेश्वर हमें अपनी भलाई का कोई चिह्न देता है, तो इसलिये कि हम उसके हाथ से फिर वैसी ही आशा रखें; और तब तक प्रतीक्षा करें जब तक वह उसे पूरा न कर दे जो उसने आरम्भ किया है। इसलिये यदि परमेश्वर ने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से बुलाया, तो क्या हम समझते हैं कि वह हमें आधे मार्ग में छोड़ देगा? जब उसने हमें हमारा उद्धार दिखा दिया, और हमें अपना सुसमाचार दिया जिसके द्वारा वह हमें अपने राज्य में बुलाता और हमारे लिये द्वार खोलता है; जब वह यह सब कर चुका, तो क्या हम समझते हैं कि वह हमें यहीं छोड़ देगा, और हमारा उपहास करेगा, और हमें अपने अनुग्रह से वंचित कर देगा या उसे निष्फल कर देगा? नहीं, नहीं; परन्तु हम आशा रखें कि वह अपने कार्य को सिद्ध करके पूरा करेगा।
इसलिये आओ हम अच्छे साहस के साथ आगे बढ़ें; क्योंकि परमेश्वर हमारी ओर अपनी सामर्थ्य प्रकट कर चुका है। हम इसमें सन्देह न करें कि वह उसे बनाए रखेगा, और हमें शैतान और अपने शत्रुओं पर पूर्ण विजय मिलेगी; और पिता परमेश्वर ने सारी सामर्थ्य यीशु मसीह के हाथों में दी है, जो हमारा सिर और सेनापति है; ताकि हम उसमें भागी हों। इस प्रकार हम सन्त पौलुस का अभिप्राय देखते हैं। परमेश्वर ने गवाही दी है, और हम अनुभव से जानते हैं, कि वह आवश्यकता के समय हमें कभी निराश न करेगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि उसने हमारा उद्धार पहले ही कर दिया है, इस रूप में कि उसने हमें सुसमाचार के लिये बुलाया और पाप से छुड़ाया। उसने हमें पवित्र बुलाहट से बुलाया है; अर्थात् उसने मनुष्यजाति की सामान्य उथल-पुथल में से हमें अपने लिये चुन लिया है।
प्रभु ने जब हमें अपनी ओर खींच लिया है, तो क्या वह हमें थामे न रखेगा और अन्त तक हमारी अगुवाई न करेगा? यह परमेश्वर की सामर्थ्य की निश्चित पुष्टि है; कि हम उसे सदा सहायता के लिये तैयार पाते हैं: इसलिये हम उस पर भरोसा रखते हैं, यह जानकर कि हम उसकी सामर्थ्य का अनुभव पहले ही कर चुके हैं। कि हम इस शिक्षा से लाभ उठाएँ, आओ हम सबसे पहले यह जान लें कि जब परमेश्वर ने हमें अपने सत्य का ज्ञान दिया है, तो यह वैसा ही है मानो उसने हमें पहले ही दिखा दिया हो कि हम उसकी स्वर्गीय मीरास के हैं, और हम उसी के हैं और उसकी भेड़-बकरियों में से हैं। यदि हम इस बात का निश्चय रखें और इसमें दृढ़ रहें, तो हम इस कार्य में सदा आगे बढ़ते जाएँगे, यह जानकर कि हम उसकी रक्षा में हैं। उसके पास हमारे सब शत्रुओं को जीतने की पर्याप्त शक्ति है, जिससे हमारा उद्धार निश्चित होता है।
हम अपनी दुर्बलता के कारण न डरें, क्योंकि परमेश्वर ने हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा की है। हमें इस पर विचार करना और जो हमसे कहा गया है उसे ग्रहण करने का यत्न करना चाहिए। प्रभु हमारे उद्धार को पूरा करेगा! वह सतावों के बीच हमारी सहायता करेगा और हमें उन पर जयवन्त होने की सामर्थ्य देगा । जब हमें एक बार इन बातों का निश्चय हो जाए, तो प्रलोभनों के विरुद्ध हमें दृढ़ करने के लिये बहुत वाक्पटुता की आवश्यकता न होगी। हम अपने सब शत्रुओं पर जयवन्त होंगे: चाहे संसार को ऐसा प्रतीत हो कि हम पाँवों तले रौंदे गए और बिलकुल कुचल दिए गए। परन्तु हमें उस घोषणा पर आना चाहिए जो सन्त पौलुस उस उद्धार और पवित्र बुलाहट के विषय में जोड़ता है जिसकी चर्चा हमने की है। वह कहता है, "हमारे कामों के अनुसार नहीं, परन्तु अपनी ही मनसा और अनुग्रह के अनुसार।"
क्योंकि जब उसने हमें उद्धार के लिये बुलाया, तब उसने हमारे कामों या हमारी योग्यता का कोई विचार नहीं किया। उसने यह केवल अनुग्रह से किया। इसलिये यदि हम उसकी माँगों की अवज्ञा करें तो हम और भी निरुत्तर ठहरेंगे, क्योंकि हम न केवल अपने प्रभु यीशु मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं, परन्तु जगत की सृष्टि से पहले ही उसे हमारे उद्धार की चिन्ता थी। हम यहाँ ध्यान दें कि सन्त पौलुस हमारी अकृतज्ञता को दोषी ठहराता है, यदि हम परमेश्वर के प्रति इतने विश्वासघाती हों कि उसके सुसमाचार की गवाही न दें; जबकि उसने हमें इसी के लिये बुलाया है। और इस मनसा को और भली-भाँति व्यक्त करने के लिये प्रेरित जोड़ता है कि यह "मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ; संसार के आरम्भ होने से पहले; संसार के अपने चलन या आरम्भ से पहले: यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर प्रकट किया गया।
जब इस महान उद्धारकर्ता ने दर्शन दिया, तो वह अनुग्रह जो पहले छिपा था, वरन् मनुष्य के ज्ञान की पहुँच से परे था, स्पष्ट और प्रकट कर दिया गया। और यह कैसे? परमेश्वर के पुत्र ने मृत्यु का नाश किया, और अनन्त जीवन भी ले आया! और हमें उसे खोजने के लिये दूर जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सुसमाचार हमें उसी तक पहुँचाता है। जब परमेश्वर हमें उद्धार का यह सन्देश भेजता है, तो हमें केवल उस मीरास को ग्रहण करना है जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है। आओ हम अपने मुँह खोलें, कि वह उन्हें भर दे; आओ हम अपने हृदय खोलें और सुसमाचार की इस गवाही को भीतर आने दें; और स्वर्ग के राज्य की अमरता हमारे भीतर वास करेगी; यद्यपि हम निर्धन, नाज़ुक पात्र हैं, और हममें भ्रष्टता और सड़न के सिवा कुछ नहीं; तो भी हम इस अमरता को अभी से थाम लेते हैं और उसकी निश्चित गवाही रखते हैं, जब हम उस अनुग्रह को स्वीकार कर सकते हैं जो सुसमाचार में प्रस्तावित है।
कि हम जो यहाँ निहित है उसे और अच्छी तरह समझें, आओ हम ध्यान दें कि "मनसा" शब्द परमेश्वर की सनातन आज्ञप्ति को सूचित करता है; जिसका कोई भी कारण नहीं। क्योंकि जब हम परमेश्वर की युक्तियों की बात करते हैं, तब हमें इस पर विवाद करने की आवश्यकता नहीं कि उसे किसने प्रेरित किया: मानो हम कारणों की कल्पना करें और कहें, यही कारण है कि परमेश्वर ने इस प्रकार ठहराया है; यही हेतु है कि वह इसे ऐसा ही चाहता था। परमेश्वर चाहता है कि हम ऐसी संयमशीलता रखें कि उसकी केवल इच्छा ही हमारे लिये सब कारणों के बदले पर्याप्त हो। जब कहा जाता है कि परमेश्वर ने ऐसा ठहराया है, तो चाहे हमारी आँखें चौंधिया जाएँ और बात हमें विचित्र लगे, और हमें कोई कारण न दिखाई दे कि ऐसा क्यों हो, तो भी हमें दोष नहीं निकालना चाहिए। हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि जो कुछ परमेश्वर ठहराता है उसे करें, और कभी न पूछें कि क्यों।
परन्तु क्योंकि मनुष्यों के सिर व्यस्त रहते हैं और वे जिज्ञासा में बहुत पड़ते हैं, सन्त पौलुस हमें परमेश्वर की मनसा तक ले जाता है; और साफ़-साफ़ बताता है कि हमें उस पर इतनी गहराई से विचार करना है कि हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते कि जान सकें किसने उसे प्रेरित किया। वह केवल अपनी धर्ममय इच्छा से प्रेरित हुआ; जो सब धार्मिकता का मानक है। इसलिये इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारा उद्धार हमारी योग्यताओं पर निर्भर नहीं: जब परमेश्वर ने हमें अपने लिये चुना, तब उसने कभी न जाँचा कि हम क्या थे, और न यह कि हम किस योग्य थे; परन्तु उसकी अपनी मनसा थी; अर्थात् उसने हमारे उद्धार का कारण अपने सिवा कहीं नहीं खोजा। सन्त पौलुस स्पष्ट दिखाता है कि "मनसा" शब्द इसी आज्ञप्ति को सूचित करता है। परन्तु क्योंकि मनुष्य अपने भीतर के अहंकार के कारण अपने आप को इससे रोक नहीं सकते कि अपनी कोई योग्यता गढ़ लें, इसलिये वे सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें खोजने के लिये बाध्य है: परन्तु सन्त पौलुस तीखे शब्दों में कहता है, मनसा और अनुग्रह। यह वैसा ही है मानो उसने कहा हो, स्वतन्त्र मनसा।
इसलिये यह हमारे सब कामों को गिरा देने के लिये है: कि हम इतने मूर्ख और हठी न हों कि सोचें कि परमेश्वर ने हमें इसलिये चुना कि हममें कुछ ऐसा था जो इसके योग्य था। नहीं, नहीं; परन्तु हमें जानना चाहिए कि जब परमेश्वर ने हमें उद्धार के लिये चुना, तब वह अपने आप से आगे कभी न गया। क्योंकि उसने देखा कि हममें दण्ड के सिवा कुछ नहीं: इसलिये उसने केवल अनुग्रह और अपार दया से हमारी दुर्दशा पर दृष्टि करने और हमारी सहायता करने से सन्तोष किया; यद्यपि हम योग्य न थे। इसके और अच्छे प्रमाण के लिये सन्त पौलुस कहता है कि यह अनुग्रह हम पर संसार के आरम्भ से पहले हुआ।
इससे हम देखते हैं कि मनुष्य कितने बुद्धिहीन हैं जब वे यह मानने की डींग मारते हैं कि वे अपने उद्धार के स्वयं कारण हैं; और परमेश्वर की भलाई से आगे निकल गए, या उससे पहले थे, और उससे जा मिले। हमारा उद्धार किस पर टिका है? क्या उस चुनाव और चयन पर नहीं जो सनातन से हुआ है? परमेश्वर ने हमें हमारे होने से पहले चुना। तब हम क्या कर सकते थे? क्या हम योग्य बनाए गए थे, क्या हम परमेश्वर के पास आने के लिये भली-भाँति तैयार थे? नहीं, हम देखते हैं कि हमारा उद्धार ज्ञान, विवेक और अच्छी अभिलाषाओं के होने के बाद आरम्भ नहीं होता; परन्तु वह परमेश्वर की सनातन आज्ञप्ति में स्थापित है, जो जगत के किसी भी अंश के बनने से पहले की थी।
तब हम क्या कर सकते हैं? क्या हमारे पास अपने आप को आगे बढ़ाने का कोई उपाय है? क्या हम परमेश्वर को कोई अवसर दे सकते हैं कि वह हमें बुलाए और संसार के शेष लोगों से अलग करे? तो क्या हम आश्चर्यजनक रूप से भूल में नहीं हैं, जब हम सोचते हैं कि हममें अपनी कोई योग्यता है, और परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला करने के लिये अपनी योग्यताओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, और इस प्रकार अपने ही बल पर उसके पास पहुँचने के लिये तैयार हैं? हमें भली-भाँति ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस यहाँ किस उद्देश्य से परमेश्वर के चुनाव का उल्लेख करता है; यह कहते हुए कि अनुग्रह हम पर मसीह यीशु में संसार के आरम्भ से पहले हुआ। जो लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के चुनाव की शिक्षा को मिटा दें, वे यथासम्भव जगत के उद्धार को नष्ट करते हैं।
यह वह सबसे उपयुक्त साधन है जिसे शैतान हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू की सामर्थ्य को बिगाड़ने के लिये, सुसमाचार को निष्फल करने और नष्ट करने के लिये, वरन् परमेश्वर की भलाई को मनुष्य की स्मृति से मिटा देने के लिये काम में लाता है। शैतान के पास उनसे अधिक उपयुक्त साधन नहीं जो पूर्वनियति के विरुद्ध लड़ते हैं; और अपने क्रोध में यह सहन नहीं कर सकते कि उसकी चर्चा की जाए, या उसका प्रचार वैसा किया जाए जैसा किया जाना चाहिए। यदि हम पोप के अनुयायियों से घृणा करते हैं (और सचमुच उनसे घृणा की ही जानी चाहिए), क्योंकि उन्होंने पवित्रशास्त्र को अपवित्र किया है, और सारे संसार को अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा से संक्रमित करके सुसमाचार के सत्य और परमेश्वर की उपासना को बिगाड़ा और विकृत किया है, तो उनसे और भी अधिक घृणा की जानी चाहिए जो परमेश्वर के चुनाव को निष्फल करने का यत्न करते हैं; और टेढ़े-मेढ़े और घुमावदार मार्गों से मनुष्यों को उसकी स्पष्ट और खुली चर्चा करने से, और जैसा उसका प्रचार होना चाहिए वैसा करने से रोकने का प्रयास करते हैं।
विश्वासियों का उद्धार किस में निहित है? केवल परमेश्वर के स्वतन्त्र चुनाव में? क्या हम यह न चाहेंगे कि लोग प्रचार करें कि परमेश्वर ने अपनों को केवल अपनी भलाई से चुना है, बिना किसी भी बात का विचार किए? क्या हम इसे ऐसा भेद नहीं मानेंगे जिस तक पहुँचा नहीं जा सकता, जो उतना ही हमें दिखाया और बताया गया है जितना परमेश्वर ने प्रकट करना चाहा? यदि हम इसे न मानें, तो हम शैतान के साथ षड्यन्त्र में सम्मिलित होते हैं; मानो यीशु मसीह ने व्यर्थ दुःख उठाया, और जो पीड़ा उसने सही उससे जगत को कुछ लाभ न हुआ। हम यहाँ ध्यान दें कि यदि परमेश्वर का चुनाव मिटा दिया जाए, तो सुसमाचार का प्रचार नहीं हो सकता, वह अपवित्र सुसमाचार या मुहम्मद की शिक्षा ठहरता है, न कलीसिया रहती है और न मसीही धर्म।
पवित्र आत्मा जो यहाँ बोलता है, यदि यह शिक्षा ग्रहण न की जाए तो उसे अवश्य झूठा ठहराना पड़ेगा। इसलिये आओ हम दृढ़ता से लड़ें; क्योंकि यही हमारे उद्धार की नींव है। यदि नींव ही नष्ट कर दी जाए, तो हम भवन कैसे बना सकते और उसे कैसे बनाए रख सकते हैं? सन्त पौलुस हमें यहाँ दिखाता है कि हमें किस सामर्थ्य से लड़ना है, और हम इस मीरास तक कैसे पहुँचेंगे जो हमारे लिये इतने मोल पर मोल ली गई: वह हमें दिखाता है कि हम परमेश्वर की महिमा के अधिकार में कैसे प्रवेश करेंगे और इस भवन और विश्वास को कैसे पूरा करेंगे। मेरे मित्रो, हमें उस अनुग्रह पर स्थापित होना है जो हम पर आज या कल नहीं, परन्तु संसार के आरम्भ से पहले हुआ।
यह सच है कि परमेश्वर आज हमें बुलाता है, परन्तु उसका चुनाव पहले से चला आ रहा है; वरन् परमेश्वर ने हमें हमारे कामों का कोई विचार किए बिना चुना, क्योंकि हम पहले कुछ भी नहीं कर सकते थे: परन्तु हम सब बातों के लिये उसके ऋणी हैं; क्योंकि उसने हमें विनाश के अथाह गड्ढे से निकाला, जिसमें हम डाले गए थे और जहाँ से बच निकलने की सारी आशा जा चुकी थी। इसलिये हमारे लिये उचित कारण है कि अपने आप को पूरी तरह उसके अधीन कर दें, उसकी भलाई पर भरोसा रखें, और उस से पूरी तरह मोहित हो जाएँ। जैसा मैंने पहले कहा, आओ हम इस नींव को दृढ़ता से थामे रहें, जब तक हम नहीं चाहते कि हमारा उद्धार नष्ट हो जाए और मिट्टी में मिल जाए। यह शिक्षा हमारे लिये लाभदायक है यदि हम इसे अपने उपयोग में भली-भाँति ला सकें।
जो नहीं चाहते कि हम परमेश्वर के चुनाव की चर्चा करें, वे कहेंगे कि यह आवश्यक नहीं। परन्तु ऐसे लोगों ने परमेश्वर की भलाई का कभी स्वाद नहीं चखा, और न वे जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आना क्या होता है। यदि हम नहीं जानते कि हमारा उद्धार इसलिये हुआ कि परमेश्वर को भाया कि संसार के आरम्भ से पहले हमें चुने, तो हम वह कैसे जान सकते हैं जो सन्त पौलुस हमसे कहता है; अर्थात् यह कि हम अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को सौंप दें, कि वह अपनी इच्छा के अनुसार हमारा प्रबन्ध करे, और हम उसकी सेवा में जिएँ और मरें? हम उसके नाम की बड़ाई कैसे कर सकते हैं? हम कैसे मान सकते हैं कि हमारा उद्धार केवल उसी से आता है, कि वही उसका आरम्भ है, और हमने उसमें उसकी कोई सहायता नहीं की? हम इसे अपने मुँह से कह सकते हैं, परन्तु जब तक हम इसे वैसा न मानें जैसा यहाँ बताया गया है, यह केवल कपट होगा।
इसलिये आओ हम सीखें कि परमेश्वर के चुनाव की शिक्षा, जिससे हमें सिखाया जाता है कि उसने हमें संसार के आरम्भ से पहले पूर्वनियत किया, खुलकर और पूरी तरह प्रचार की जानी चाहिए, उस सारे संसार के होते हुए भी जो उसके विरुद्ध खड़ा हो। और केवल इतना ही नहीं, परन्तु हमें जानना चाहिए कि यह हमारे लिये बहुत लाभदायक शिक्षा है; क्योंकि जब तक हम वहाँ तक न पहुँचें, हम परमेश्वर की अनन्त भलाई को थाम नहीं सकते।
जब तक यह बात भली-भाँति स्पष्ट न की जाए, परमेश्वर की दया सदा छिपी रहेगी। मैं कहता हूँ, जब तक यह हमारे लिये स्पष्ट न किया जाए कि उसने हमें हमारे जन्म से पहले, और इससे पहले कि हम उसके आगे बढ़ पाते, चुन लिया था।
मनुष्य प्रायः कहेंगे कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं, और हम इस योग्य नहीं कि परमेश्वर हम पर ऐसी बड़ी दया दिखाए: वे यह भी कहेंगे, उस छुटकारे में, जो परमेश्वर ने अपने पुत्र में किया है, किसका भाग और अंश है? उन्हीं का जो चाहते हैं; जो परमेश्वर को खोजते हैं; उन्हीं का जो अपने आप को उसके अधीन करते हैं। जिनके कुछ अच्छे उद्देश्य हैं, और जो रूखे नहीं; जो भले स्वभाव के हैं और जिनमें कुछ अच्छी भक्ति है। जब मनुष्य ऐसा मिश्रण करते हैं, और सोचते हैं कि वे परमेश्वर और उसके अनुग्रह के लिये किसी ऐसी बात के कारण बुलाए गए हैं जो उनके अपने भीतर है, कि वे कुछ ऐसा लाते हैं जो उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य ठहराए जिससे वे उद्धार पा सकें, तो परमेश्वर का अनुग्रह धुँधला और टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाता है।
यह ऐसा अपवित्र कार्य है जिसे प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। इसी कारण मैंने कहा कि परमेश्वर की भलाई कभी पूरी तरह नहीं जानी जाएगी जब तक यह चुनाव हमारे सामने न रखा जाए; और हमें यह न सिखाया जाए कि हम इस समय इसलिये बुलाए गए हैं कि परमेश्वर को भाया कि हमारे जन्म से पहले हम पर अपनी दया बढ़ाए। इस शिक्षा की और विस्तार से व्याख्या होनी चाहिए; परन्तु क्योंकि इस समय समय इसकी अनुमति नहीं देता, हम इस पर दिन के उत्तर भाग में ध्यान देंगे।
