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प्रथम अध्याय पर चौथा उपदेश - इफिसियों 1:7-10
प्रथम अध्याय पर चौथा उपदेश
परमेश्वर ने हमें अपने प्रिय पुत्र में ग्रहण किया है, जिसके लहू के द्वारा हमें छुटकारा, अर्थात् पापों की क्षमा मिली है; यह उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार है जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ के साथ हम पर बहुतायत से उंडेला, और हमें अपनी इच्छा का भेद बताया (अपनी उसी भली इच्छा के अनुसार जो उसने अपने मन में ठहराई थी, ताकि समय के पूरे होने पर उसे प्रबन्ध में लाए), अर्थात् मसीह में स्वर्ग की और पृथ्वी की सब वस्तुओं को अपने में एकत्र करे। - इफिसियों 1:7-10
मैं पहले ही दिखा चुका हूँ कि परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं कर सकता, केवल उसके एकलौते पुत्र के द्वारा ही कर सकता है। क्योंकि यदि स्वर्ग के स्वर्गदूत भी बिना किसी प्रधान और मध्यस्थ के परमेश्वर की सन्तान गिने जाने के योग्य नहीं हैं, तो हमारा क्या होगा, जो अपने अधर्म के कामों से प्रतिदिन परमेश्वर के क्रोध को भड़काने से नहीं चूकते [यशायाह 59:2]? वरन् हम तो उसी से लड़ते हैं! इसलिए अनिवार्य है कि परमेश्वर हमें अपने एकलौते पुत्र के रूप में देखे, नहीं तो वह हमसे घृणा और अरुचि करने को बाध्य है। संक्षेप में, हमारे पापों ने परमेश्वर और हमारे बीच ऐसी दूरी खड़ी कर दी है कि हम उसके निकट जा ही नहीं सकते, बिना यह अनुभव किए कि उसकी महिमा हमारे विरुद्ध है, मानो हम सब का नाश करने के लिए शस्त्र धारण किए हुए हो।
परन्तु अब यह देखना शेष है कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें अपनी कृपा में कैसे ग्रहण करता है। सन्त पौलुस यही कहना चाहता है जब वह जोड़ता है कि 'उसमें हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् हमारे पापों की क्षमा, परमेश्वर के अनुग्रह के धन के अनुसार मिली है।' यहाँ सबसे पहले हमें यह समझाया गया है कि परमेश्वर की हमारे प्रति जो शत्रुता है, वह हमारे स्वभाव के कारण नहीं, वरन् हमारी भ्रष्टता के कारण है। मैं कहता हूँ कि वह स्वभाव के कारण नहीं है, क्योंकि जब परमेश्वर ने हमें रचा है, तो निश्चय है कि वह हमसे बैर नहीं रख सकता। परन्तु जब मनुष्यजाति पूरी रीति से बिगड़ गई और सब बुराई के वश में कर दी गई, तब परमेश्वर का हमारा प्राणघातक शत्रु और विरोधी ठहरना अनिवार्य हुआ, जब तक हमारे पापों की सुधि उसकी दृष्टि से गाड़ न दी जाए। क्योंकि जब तक हम फिर से बहाल न किए जाएँ, तब तक हम अनन्त मृत्यु के योग्य हैं; इसलिए कि परमेश्वर, जो सारे न्याय और धार्मिकता का सोता है, उस बुराई से घृणा किए बिना नहीं रह सकता जो वह हम में देखता है। इसलिए जब तक हमारे पाप मिटा न दिए जाएँ, तब तक हमारे लिए यह आशा करना असम्भव है कि परमेश्वर हम पर कृपा करे या हमसे प्रेम रखे।
परन्तु यहाँ यह ध्यान दें कि सन्त पौलुस हमारे परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप होने को प्रकट करने के लिए दो शब्द कैसे काम में लाता है। पहले वह फिरौती या छुटकारा रखता है, जिसका अर्थ एक ही है, और उसके पश्चात् पापों की क्षमा रखता है। तो फिर परमेश्वर का क्रोध कैसे शान्त होता है, हम उसके साथ एक कैसे किए जाते हैं, और वह हमें अपनी सन्तान करके कैसे ग्रहण और स्वीकार करता है? सन्त पौलुस कहता है, हमारे पापों की क्षमा के द्वारा। और आगे, क्योंकि क्षमा के लिए छुटकारा आवश्यक है, इसलिए वह दोनों को एक साथ जोड़ देता है।
सच्चाई यह है कि हमारे विषय में परमेश्वर ने अपनी ही निःशुल्क भलाई से हमारे पापों को मिटा दिया है और अपने आप को पूरी रीति से उदार दिखाया है, और इसके लिए हमसे किसी मूल्य की आशा नहीं करता। और सचमुच, ऐसा कौन मनुष्य है जो अपने किए हुए छोटे से छोटे अपराध की भी भरपाई कर सके? यदि हम में से प्रत्येक अपना सारा जीवन केवल किसी एक ही अपराध की भरपाई करने में लगा दे, और इस प्रकार परमेश्वर के हाथ से अनुग्रह पाना चाहे, तो निश्चय है कि यह बात हमारी सब सामर्थ्य से कहीं परे है। इसलिए परमेश्वर को अनिवार्य रूप से हमें बिना किसी बदले या भरपाई की आशा किए दया करके ग्रहण करना पड़ता है। परन्तु इतने पर भी, वह प्रायश्चित्त जो हमारे लिए सेंत-मेंत दिया गया है, परमेश्वर के पुत्र को बहुत महँगा पड़ा। [1 पतरस 1:19] क्योंकि उसे अपना लहू बहाने के सिवाय कोई और मूल्य न मिला, इसलिए उसने देह और आत्मा दोनों से अपने आप को हमारा ज़मानतदार बनाया, और हमारे लिए क्षमादान पाने को परमेश्वर के न्याय के सामने उत्तर दिया। मैं कहता हूँ कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने देह और आत्मा दोनों के साथ इस काम में प्रवेश किया। क्योंकि उसके लिए यही पर्याप्त न होता कि वह मनुष्यों की दृष्टि में ऐसी क्रूर और अपमानजनक मृत्यु सहता, परन्तु आवश्यक था कि वह अपने भीतर ऐसी भयानक पीड़ा भी सहे, मानो परमेश्वर उसका न्यायी हो गया हो, क्योंकि उसने पापियों की ओर से पूरी भरपाई करने के लिए अपने आप को सौंप दिया। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने इस स्थान पर उन दो शब्दों को क्यों जोड़ा है।
इसलिए हमें सबसे पहले यह ध्यान देना है कि जब तक हमारे पाप धो न दिए जाएँ और उनकी सुधि पूरी रीति से मिटा न दी जाए, तब तक हम परमेश्वर के हाथ से कोई अनुग्रह नहीं पा सकते और न उसके द्वारा ग्रहण किए जा सकते हैं। इसका कारण यह है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि परमेश्वर जहाँ कहीं पाप को देखता है, वहाँ उससे घृणा किए बिना नहीं रह सकता। इसलिए जब तक वह हमें पापी जानता है, तब तक उसका हमसे अरुचि करना अनिवार्य है, क्योंकि हम में या हमारे स्वभाव में सब प्रकार की बुराई और गड़बड़ी के सिवाय कुछ नहीं है। तब हम उसके शत्रु हैं और वह हमारे विरुद्ध है, जब तक हम उस उपाय तक न पहुँचें जो सन्त पौलुस हमें यहाँ दिखाता है, अर्थात् अपने पापों की क्षमा पाना। इससे हम देखते हैं कि कोई मनुष्य अपने में किसी योग्यता के कारण परमेश्वर का प्रिय नहीं हो सकता। क्योंकि परमेश्वर का हम से प्रेम किस में है? मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह पर दृष्टि डालनी होगी और हमारी ओर बिलकुल नहीं देखना होगा। परन्तु आगे यह भी बताया गया है कि जब तक वह हमें हमारे ऋणों से छुड़ा न दे और हमें गोद न ले ले, तब तक हम परमेश्वर को ग्रहणयोग्य नहीं हैं, यद्यपि हम उसके सामने मृत्यु के योग्य हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमारे उद्धार का ज्ञान (जैसा ज़कर्याह के गीत में कहा गया है) यही है कि परमेश्वर हम पर दयालु है और हमारे उन पापों को क्षमा करता है जिनके कारण हम उसके शत्रु हैं [लूका 1:77]।
यह भी स्मरण रखें कि परमेश्वर की निःशुल्क भलाई के द्वारा हमारे पापों की पूरी क्षमा उस फिरौती के बिना नहीं दी जाती जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने चुकाई, जो सोने या चाँदी में नहीं (जैसा सन्त पतरस अपनी पहली पत्री 1:18 में कहता है), वरन् आवश्यक था कि वह जो निष्कलंक मेम्ना था, इसी उद्देश्य से अपने आप को दे। इसलिए जब कभी हम परमेश्वर की कृपा और दया खोजना चाहें, तो हम अपना सारा मन हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग पर लगा दें, ताकि वहाँ हमें वह उपाय मिले जिससे परमेश्वर का क्रोध शान्त हो। और फिर, जब हमारे पाप ऐसे मूल्य और भरपाई से दूर किए जाते हैं, तो हम समझें कि परमेश्वर से मेल करने के लिए हम अपनी ओर से कुछ भी नहीं ला सकते। और इसमें हम देखते हैं कि शैतान ने अपनी धूर्तता से संसार से उद्धार की सारी आशा कैसे काट दी है, यह विश्वास दिलाकर कि हर मनुष्य को अपना छुटकारा आप देना और परमेश्वर से अपना प्रायश्चित्त आप करना है। और यही वह बात है जिसे पोपवाद में लोग भले काम, पुण्य और गुण कहते हैं। क्योंकि उन्होंने जो भी आविष्कार गढ़े हैं, वे किस उद्देश्य की ओर लगे हैं? वे अपने आप को सब प्रकार से क्यों सताते रहते हैं, यहाँ तक कि मनुष्य दिन-रात कभी नहीं थमता, वरन् अनन्त परिक्रमाएँ और भाषण करता रहता है? इन सब कामों का उद्देश्य परमेश्वर को शान्त करना है। और इस प्रकार पोपवाद में जो सब भले काम गिने जाते हैं, वे पापों की भरपाई करने के साधनों के सिवाय और कुछ नहीं हैं।
परन्तु यह तो उस फिरौती को निष्फल कर देना है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है। क्योंकि इन दोनों बातों के बीच, कहना चाहिए, एक अटूट बन्धन है, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमारे पापों को अपनी सुधि से हटा देता है और उन्हें समुद्र की गहराइयों में डुबा देता है, और साथ ही अपने एकलौते पुत्र के रूप में चढ़ाया गया मूल्य ग्रहण करता है। इसलिए हम एक को दूसरे के बिना नहीं पा सकते। तो यदि हम परमेश्वर को अनुकूल पाना चाहते हैं, तो जानें कि जब तक वह अपनी निःशुल्क भलाई से हमारे सब ऋण क्षमा न कर दे, तब तक हम उसके शत्रु हैं, और यह भी कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसके और हमारे बीच आना पड़ा। [se constitue là au milieu (फ्रेंच)] क्योंकि उसकी मृत्यु का बलिदान हमारे लिए सदा का मेल-मिलाप मोल लेने का काम करता है, इसलिए हमें सदा उसी की शरण में भागना चाहिए।
यह सच है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का सारा जीवन हमारी फिरौती बन गया है, क्योंकि उसने इस संसार में परमेश्वर पिता की जो आज्ञाकारिता दिखाई, वह आदम के अपराध की और उन सब अधर्म के कामों की क्षतिपूर्ति के लिए थी जिनके हम देनदार हैं। परन्तु सन्त पौलुस यहाँ विशेष रूप से उसके लहू की चर्चा करता है, क्योंकि हमें उसकी मृत्यु और दुःखभोग की ओर उस बलिदान के समान जाना पड़ता है जिसमें हमारे सब पापों को मिटा देने की सामर्थ्य है। और इसी कारण परमेश्वर ने व्यवस्था के अधीन प्रतीकों के द्वारा दिखाया कि मनुष्य उसके साथ किसी और रीति से मेल-मिलाप नहीं कर सकते।
अब यह सच है कि यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु में केवल अपना लहू ही नहीं बहाया, वरन् उन भयों और आतंकों को भी सहा जो हम पर पड़ने चाहिए थे। परन्तु सन्त पौलुस यहाँ पवित्रशास्त्र की सामान्य रीति के अनुसार एक विशेष बात के अधीन सारी बात को समेट लेता है। संक्षेप में, हम यह सीखें कि अपनी सारी धार्मिकता इसी में पाएँ कि परमेश्वर ने अपनी निःशुल्क भलाई से हम पर दया दिखाई, और यह दुस्साहस न करें कि अपना कोई गुण उसके सामने रखकर उसे अपना ऋणी बनाएँ, वरन् हमारे लिए यही पर्याप्त हो कि वह हमारी किसी योग्यता के बिना हमें सेंत-मेंत अपने प्रेम में ग्रहण करता है, केवल इस कारण कि हमारे पापों की सुधि उसकी दृष्टि से गाड़ दी गई है। और फिर, हम समझें कि यह हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के बिना नहीं हो सकता, और हमें पूरी रीति से उसी पर ठहरना चाहिए।
इसके आगे सन्त पौलुस जोड़ता है कि 'सब कुछ परमेश्वर के अनुग्रह के धन के अनुसार हुआ है।' वह बिना कारण यहाँ परमेश्वर की उस दया की बड़ाई नहीं करता जो वह हमें कृपा में ग्रहण करने में दिखाता है। क्योंकि हम एक ओर देखते हैं कि मनुष्य अपने मूर्खतापूर्ण घमण्ड के कारण जानबूझकर अपने आप को कैसे धोखा देते हैं। क्योंकि अधिकतर लोगों ने सदा यही कल्पना की है कि वे अपनी भरपाइयों के द्वारा परमेश्वर के साथ अपना प्रायश्चित्त आप कर सकते हैं, और मैं नहीं जानता कि और कैसी-कैसी बहानेबाज़ियाँ वे गढ़ते हैं। इसलिए जब मनुष्य अपनी ही कल्पनाओं में इतना भटक गए हैं, तो सन्त पौलुस इस सबको दूर करने के लिए कहता है कि हमें परमेश्वर के अनुग्रह के धन पर मोहित हो जाना चाहिए। वह सीधे कह सकता था कि परमेश्वर सब कुछ अपने अनुग्रह से करता है, परन्तु वह यहाँ बड़े भण्डार का उल्लेख करता है, ताकि मनुष्य ऐसे मूर्ख न बनें कि जब उनकी आवश्यकता दस लाख मुद्राओं की हो, तब वे मानो केवल एक कौड़ी लेकर आएँ। और सचमुच, जब पोप के अनुयायी अपनी भरपाइयों की बात करते हैं, तो वे यह नहीं कहते कि वे सब बातों में उसे पूरी तरह कर सकते हैं, परन्तु उनका मत यह है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के साथ वे अपनी ओर से भी कुछ लाएँगे, और टुकड़े-टुकड़े करके इतना कर लेंगे कि परमेश्वर सन्तुष्ट और शान्त हो जाएगा। इस प्रकार तुम देखते हो कि पोपवाद में कैसा शैतानी मत राज्य करता है, क्योंकि वे मिस्सों पर भरोसा रखते हैं, बहुत सी प्रार्थनाएँ बड़बड़ाते हैं, तीर्थयात्रा पर घूमते-फिरते हैं, यह पर्व और वह पर्व मनाते हैं, न जाने कैसी-कैसी भक्तियाँ करते हैं, नियम के अनुसार टाट के वस्त्र पहनते हैं,--यह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग की कमी को पूरा करने के लिए, मानो वह सर्वपर्याप्त न हो।
परन्तु सन्त पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर की भलाई, जैसी वह यीशु मसीह में हमें दिखाई गई है, ऐसा बड़ा धन है कि और सब बातों को उसके आगे हट जाना और पैरों तले कुचला जाना चाहिए। और जब परमेश्वर ऐसी बड़ी उदारता दिखाता है कि हमें उस पर पूरी रीति से मोहित हो जाना चाहिए, तो क्या यह घोर धृष्टता नहीं कि हम अपना तुच्छ कूड़ा-कर्कट लाएँ, मानो हमारा तीर्थयात्रा पर जाना और कुछ और भक्तियाँ करना किसी मोल या भलाई का हो? क्या यह ऐसा नहीं मानो यीशु मसीह का लहू हमारे उद्धार के लिए पर्याप्त मूल्य न हो, मैं कहता हूँ, पर्याप्त मूल्य और फिरौती? तो तुम देखते हो कि एक ओर सन्त पौलुस यहाँ उन व्यर्थ कल्पनाओं के सब अवसर काट देना चाहता था जो मनुष्य यह मानकर गढ़ते हैं कि वे अपनी भरपाइयों और चुकौतियों से परमेश्वर का क्रोध शान्त कर सकते हैं, और दूसरी ओर वह हमारी दुर्बलता की सहायता करना चाहता था। क्योंकि यद्यपि हम अपने गुणों के विषय में आश्चर्यजनक बातें मान लेने और अपने आप को यह विश्वास दिलाने की ओर झुके रहते हैं कि परमेश्वर हमारा बड़ा ऋणी है, तौभी जब सचमुच मन से परमेश्वर को पुकारने और उस पर भरोसा रखने की बात आती है, तब यदि शैतान हमें निराशा की ओर उकसाए और हम क्लेशों और परीक्षाओं में उछाले जाएँ, तो हम ऐसे घबरा जाते हैं कि पवित्रशास्त्र की सब प्रतिज्ञाएँ और हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के विषय में हमसे जो कुछ कहा जाता है, वह हमें कोई आशा नहीं दे सकता। इसलिए सन्त पौलुस अविश्वास के इस दोष को, जो हम में बहुत गहरा जड़ पकड़े हुए है, दूर करने के लिए यहाँ परमेश्वर की भलाई के बड़े भण्डार हमारे सामने रखता है, ताकि हमारे मन में जितना भी घमण्ड उत्पन्न हो सके, वह मानो निगल लिया जाए, क्योंकि परमेश्वर हम पर इतनी बड़ी कृपा की बहुतायत दिखाने की कृपा करता है।
और इसी कारण वह जोड़ता है कि 'उसने उसी अनुग्रह को सारे ज्ञान और समझ के साथ हम पर बहुतायत से उंडेला।' इन शब्दों से वह हमें समझाता है कि हम किस रीति से उसके स्वामी होते हैं जिसका उसने पहले उल्लेख किया था। देखो, हमारा सारा सुख और हमारा परम कल्याण इसी में है कि हम परमेश्वर से मेल कर लें, ताकि वह हमें अपनी सन्तान स्वीकार करे, और हमारे लिए यह उचित हो कि हम पूरी स्वतन्त्रता से उसे अपना पिता कहकर पुकारें। परन्तु जिससे हम इतनी दूर हैं, उसे हम कैसे पाएँगे? कहा गया है कि यद्यपि हम कुछ भी मूल्य के नहीं, वरन् कुछ कर भी नहीं सकते, तौभी जो कुछ हम में घटता है वह सब हम यीशु मसीह में पाएँगे, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग हमारे सब कुकर्मों की सुधि मिटा देने के लिए पर्याप्त बलिदान होगा।
तौभी, क्या इससे यह निकलता है कि सब मनुष्य उस लाभ के भागी हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिया? नहीं, क्योंकि अविश्वासियों का उसमें न कोई भाग है न अंश। अतः यह उन्हीं का विशेष अधिकार है जिन्हें परमेश्वर अपने पास इकट्ठा करता है। सन्त पौलुस भी हमें दिखाता है कि विश्वास अनिवार्य है, नहीं तो मसीह से हमें कुछ लाभ न होगा [गलातियों 5:4]। इसलिए यद्यपि सामान्य दृष्टि से मसीह संसार का छुड़ाने वाला है, तौभी उसकी मृत्यु और दुःखभोग से किसी को लाभ नहीं, सिवाय उनके जो उसे ग्रहण करते हैं जो सन्त पौलुस यहाँ दिखाता है। और इस प्रकार हम देखते हैं कि जब हम एक बार उन लाभों को जान लेते हैं जो मसीह ने हमारे लिए लाए, और जिन्हें वह अपने सुसमाचार के द्वारा प्रतिदिन हमें देता है, तो हमें विश्वास के द्वारा उससे जुड़ना भी चाहिए। क्योंकि यहूदी, तुर्क और पोप के अनुयायी, और ऐसे सब लोग, मसीह से कटे और अलग हैं और अपनी ही भ्रष्टता में सड़ते हैं, क्योंकि वे यह दुस्साहस करते हैं कि अपने आप से आश्चर्यकर्म करें। क्योंकि पोप के अनुयायियों, यहूदियों, तुर्कों और जितने भी अन्यजाति कभी हुए, उन सब में यह सामान्य सिद्धान्त है कि उन्हें परमेश्वर का क्रोध शान्त करना है। और कैसे? अपने ही गढ़े हुए और हर एक के अपने मस्तिष्क में कल्पित अनेक साधनों से। इसलिए ऐसे लोगों का मसीह में कोई भाग नहीं। अतः यदि विश्वास वह कुंजी है जो उस धन का भोग करने का द्वार खोलती है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस ने अभी की है, तो इसी रीति से हम उतने धनी बनाए जाएँगे जितना हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है, ताकि यदि हम विश्वास के द्वारा मसीह से जुड़े हैं, तो हमें किसी बात की घटी न हो।
तौभी सन्त पौलुस ने यहाँ 'ज्ञान' और 'समझ' ये दो शब्द बिना कारण नहीं रखे। क्योंकि वे हमें दिखाते हैं कि सुसमाचार की शिक्षा हमें सब सिद्धता तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है, और जो कुछ उससे ऊपर जोड़ा जाए, वह गोबर, मैल और सड़ाहट के सिवाय कुछ नहीं। संक्षेप में, सन्त पौलुस का सुसमाचार को इन दो आदरणीय नामों से पुकारना इसलिए है कि हर मनुष्य शान्ति से उस बात पर कान लगाए जो परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के द्वारा उसे सिखाता है, और हम ऐसे सीखने वाले हों कि उसके मुँह से निकली बात के सिवाय और कुछ जानने का साहस न करें, वरन् सारी सादगी से जो कुछ वह कहे उसे ग्रहण करें और उसी पर दृढ़ रहें, चाहे सारा संसार हमें तुच्छ जाने और सब मनुष्य हमारे विरोध में खड़े हों। हम संसार की चतुराइयों को मूल्यवान न समझें, जैसा बहुत से लोग करते हैं जिनके कान खुजलाते हैं और जो सदा कुछ नया सुनना चाहते हैं। इसलिए, ताकि हम इस प्रकार हल्के न हों, या उस से अधिक जानने की मूर्ख लालसा के वश में न हों जितना उचित है, हम ध्यान से देखें कि सन्त पौलुस यहाँ कैसे कहता है कि यदि हम ने सुसमाचार से एक बार लाभ उठा लिया, तो हम वहाँ ज्ञान की सारी परिपूर्णता पाएँगे, ताकि हम और सब बातों को न केवल अनावश्यक, वरन् हानिकारक जानकर ठुकरा दें, क्योंकि उनके द्वारा हम उस शुद्ध शिक्षा से फेर दिए जाएँगे जिसके द्वारा परमेश्वर की इच्छा है कि हम उससे जुड़े रहें। सारांश यह कि सन्त पौलुस यहाँ यह दिखाना चाहता था कि जब परमेश्वर हमें अपने एकलौते पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के ज्ञान में बुलाने की कृपा करता है, तब वह हम पर अनमोल उपकार करता है, और जब वह हमारे पास है, तब हमें और सब बातों को तुच्छ जानना चाहिए और यह या वह जानने की मूर्ख लालसा से व्याकुल न होना चाहिए, क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारे सारे ज्ञान की पूरी सिद्धता हमारे प्रभु यीशु मसीह को जानना है।
और अब तुम यह भी देखते हो कि कुलुस्सियों से क्यों कहा गया कि वह (पौलुस) एक विश्वासयोग्य शिक्षक रहा है, यहाँ तक कि मनुष्यों को ज्ञान की सिद्धता तक पहुँचाया। [कुलुस्सियों 1:25] वह मानता है कि वह बोलने में अनाड़ी और साधारण था [2 कुरिन्थियों 11:6], और उसमें न वह ज्ञान था न वह वाक्पटुता जिसकी संसार में बड़ी प्रशंसा होती है; तौभी वह घोषणा करता है कि यदि उसकी शिक्षा ग्रहण की जाए, तो वह मनुष्यों की आत्माओं के पूरे पोषण के लिए सार से भरपूर पाई जाएगी, और उसमें और कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं। आज जब हम ये बातें सुनते हैं, तो हमें चेतावनी लेनी चाहिए कि अपने आप को रोकें और उस विशाल और मूर्खतापूर्ण जिज्ञासा को दबाएँ जो हम में बहुत गहरी जड़ पकड़े हुए है, ताकि हम सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा से लिपटे रहें और पूरी रीति से उसी पर ठहरें। इस प्रकार तुम देखते हो कि वस्तुतः इस अंश से हमें क्या ग्रहण करना है।
इसके अतिरिक्त, हम उस बात पर ध्यान दें जिसका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ, अर्थात् यह कि जितनी बार सुसमाचार का प्रचार होता है, उतनी बार परमेश्वर का अनुग्रह हम पर उंडेला जाता है। यदि हम उसकी उस भलाई और उदारता को पहचानते हैं जो वह पृथ्वी को सींचने के द्वारा हमें दिखाता है ताकि वह हमारी देह के पोषण के लिए फल दे, तो हम और भी अधिक समझ सकते हैं कि जब परमेश्वर हमारे पास उद्धार का वचन भेजता है, तब वह हमारी आत्माओं के स्वास्थ्य के लिए हमें केवल सींचता ही नहीं, वरन् हमें इतना गहरा पिलाता है कि हम पूरी रीति से तृप्त हो सकें। क्योंकि सन्त पौलुस यह कहना पर्याप्त नहीं समझता कि हम निष्फल होते हुए भी सुसमाचार के द्वारा कुछ ताज़गी पाते हैं, परन्तु वह कहता है कि यह ऐसा है मानो परमेश्वर हम पर जल की बहुतायत बरसाए, और हम उससे ऐसे सींचे और ताज़ा किए जाएँ कि उसके द्वारा अन्त तक टिके रहने के लिए पोषण और बल पाएँ। और इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर की भलाई का हमें कितना मूल्य समझना चाहिए जब वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें अपनी ओर खींचने की कृपा करता है, और यह भी कि इसी रीति से हमें उन लाभों के अधिकार में आना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिए, जैसे वह उन्हें अपने वचन के द्वारा हमें देता है और चाहता है कि हम उन्हें विश्वास के द्वारा ग्रहण करें।
अब, इस विषय की और विस्तृत व्याख्या के लिए, वह तुरन्त जोड़ता है कि परमेश्वर का ऐसा करना 'इसलिए है कि उसने अपनी इच्छा का भेद हम पर प्रकट किया, अर्थात् अपनी उसी भली इच्छा के अनुसार जो उसने पहले अपने मन में ठहराई थी।' यहाँ एक और बात है जो सुसमाचार के मूल्य को और भी बढ़ाती है, अर्थात् यह कि उसमें हमें वे भेद मिले हैं जो पहले परमेश्वर में छिपे थे। और सन्त पौलुस केवल यहीं इस रीति से नहीं बोलता, परन्तु हम दूसरे अध्याय में इसका और भी पूरा वर्णन देखेंगे। और केवल इस पत्री में ही नहीं, वरन् और सब स्थानों में भी, वह दिखाता है कि जब सुसमाचार का प्रचार होता है तब हमें मानो मोहित हो जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर वहाँ उन बातों को खोलता है जो पहले सब मनुष्यों की समझ से परे थीं, और जिन पर कोई मनुष्य कभी विश्वास न करता या जिनकी कल्पना न करता। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि उसने केवल अब्राहम की वंशावली को इस प्रकार चुना है मानो उसने शेष सारे संसार को ठुकरा दिया हो। इसलिए यह आश्चर्यजनक बात थी जब उसने अपना अनुग्रह सब मनुष्यों पर समान रूप से उंडेला। [रोमियों 16:25; 1 कुरिन्थियों 2:7; 4:1; इफिसियों 6:19; कुलुस्सियों 1:29] फिर भी हम जानते हैं कि जब यीशु मसीह संसार में आया, तब वे ही लोग पूरी तरह भ्रष्ट हो चुके थे, और परमेश्वर की शिक्षा ऐसी बिगड़ गई थी कि यहूदियों में अन्धविश्वास के सिवाय कुछ न था। तब ऐसा प्रतीत हुआ कि सब कुछ सुधार की आशा से परे जा चुका है, कि अचानक, सब मनुष्यों की आशा से परे, सब जातियों को उद्धार दिया गया। देखो, मसीह जो पहले गहरे अन्धकार में छिपा था, और ऐसे गहरे अन्धकार में कि इसकी कोई आशा न थी कि वह कभी उससे निकलेगा, धार्मिकता के सूर्य के समान उदय हुआ कि संसार को प्रकाश दे। [मलाकी 4:2]
इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि सुसमाचार में हम परमेश्वर की इच्छा का भेद जानते हैं। यह सच है कि पहली दृष्टि में सुसमाचार में सरलता के सिवाय कुछ न दिखाई देता था। और इसी कारण बहुत से ठट्ठा करने वाले समझते हैं कि सुसमाचार की बातें केवल मूर्खों के लिए हैं, और वे घमण्ड करते हैं कि वे यीशु मसीह की सारी शिक्षा से कहीं अधिक सूक्ष्म बातें अपने ही स्वप्नों में गढ़ सकते हैं। परन्तु ऐसे लोग उसका स्वाद चखने के योग्य नहीं जो यहाँ हमें दिखाया गया है, क्योंकि उनका घमण्ड उन्हें पूरी तरह अन्धा कर देता है और उन्हें पूरे मूर्ख बना देता है। जो हो, तौभी विश्वासी स्पष्ट देखते हैं कि सुसमाचार की शिक्षा में ईश्वरीय महिमा है। और इसी कारण सन्त पौलुस इसी अंश में हमें समझाता है कि हमारा उसके पास आना कोई साधारण बात सीखने के लिए नहीं, वरन् संसार से ऊपर उठने के लिए होना चाहिए। क्योंकि जब तक हम संसार से ऊपर न उठें और उन बातों का आदर न करें जो परमेश्वर अपने पवित्र मुँह से कहता है, तब तक हम न कभी परमेश्वर के सामने सीखने योग्य होंगे और न उसकी पाठशाला में लाभ उठाने को तैयार होंगे। संक्षेप में, हमारे विश्वास का आरम्भ और द्वार नम्रता है। परन्तु मनुष्य सचमुच अपने आप को कैसे दीन कर सकते हैं, जब तक वे यह न जानें कि जो बातें परमेश्वर उनसे कहता है वे उनकी अपनी बुद्धि और क्षमता से कहीं ऊपर हैं? तो तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का लक्ष्य यह है कि हम सुसमाचार का आदर करें, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि यह हमारा काम नहीं कि निर्णय करें कि परमेश्वर ने भला कहा या बुरा। क्योंकि हमें पूरा विश्वास होना चाहिए कि जो कुछ भी उससे आता है वह अनन्त ज्ञान है, ऐसा ज्ञान जो पूरी रीति से निर्दोष है। इसलिए, ताकि हम में अपने विषय में सब घमण्ड गिरा दिया जाए, और हम परमेश्वर के नाम से प्रचारित शिक्षा का गम्भीरता और नम्रता से आदर करना सीखें, सन्त पौलुस ने जान-बूझकर यह भेद रखा है।
अब, ताकि हम जानें कि हम परमेश्वर के कितने ऋणी हैं, वह इस वाक्यांश को दोहराता है, 'उसकी भली इच्छा के अनुसार', जिसे वह पहले रख चुका था। और यह इसलिए किया गया कि मनुष्य अपनी योग्यता के विषय में जो भी धारणा बना सकते हैं उसे दूर और बन्द कर दिया जाए। क्योंकि परमेश्वर की भली इच्छा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता जब तक मनुष्य सब योग्यता से रोक न दिए जाएँ और उसके पास बिलकुल खाली न आएँ। क्योंकि जैसे ही हम परमेश्वर के पास कुछ भी लाने का साहस करते हैं, तो निश्चय ही यह अपने आप को आगे बढ़ाना है, जिससे परमेश्वर का अनुग्रह धुँधला पड़ जाता है और उसकी वह शोभा और श्रेष्ठता नहीं रहती जो होनी चाहिए। इसलिए, ताकि मनुष्य सब व्यर्थ भरोसे से बचें, सन्त पौलुस हमें फिर परमेश्वर की भली इच्छा की ओर लौटा देता है, मानो वह कहता हो कि संसार में सुसमाचार के प्रचार का और कोई कारण नहीं, सिवाय परमेश्वर की उदार और निःशुल्क भलाई के। फिर भी, मनुष्यों के सारे दुस्साहस को दबाने के लिए, वह जोड़ता है कि 'परमेश्वर ने उक्त आज्ञा को और अपनी इच्छा की उस उच्च अगम्य युक्ति को पहले से अपने ही में ठहराया था।' क्योंकि इसका क्या कारण है कि बहुत से मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध प्रश्न करने, विवाद करने और वकालत करने में इतनी स्वतन्त्रता लेते हैं, सिवाय इसके कि उन्हें ऐसा लगता है कि वे ऐसी बातों से निपट रहे हैं जो उन पर खुली और जानी-पहचानी होनी चाहिए? इसलिए यह देखकर कि हम इतने मूर्ख और ढीठ हैं कि परमेश्वर की युक्ति की जाँच करने का साहस करते हैं, सन्त पौलुस कहता है कि वह मुहरबन्द पत्र है, परमेश्वर की युक्ति उसी के अपने भीतर है, और सृजे हुए प्राणियों के लिए इतना ऊँचा उठना उचित नहीं। यदि वे ऐसा करें, तो अपना नाश करने और अपनी गर्दन तोड़ने का यह सबसे निश्चित मार्ग है।
यह सच है कि हम परमेश्वर की इच्छा को जानने में अपना सारा परिश्रम लगा सकते हैं, परन्तु हमें उससे आगे नहीं बढ़ना चाहिए जितना उसने अपने वचन में प्रकट किया है, क्योंकि उसका वचन हमारा प्रकाश है। परन्तु जहाँ परमेश्वर चुप रहता है, वहाँ वह चाहता है कि हम अपने आप को रोकें और मानो बन्दी बने रहें, और आगे न बढ़ें, क्योंकि यदि हम उससे अधिक जानने का यत्न करें जितना हमें दिया गया है, अर्थात् उससे अधिक जितना हमें जानना चाहिए और जितना उसके वचन के द्वारा हमें बताया गया है, तो यह केवल एक भूलभुलैया में, वरन् नरक की तह में, और गहरे और गहरे प्रवेश करना होगा। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि इस पद में सन्त पौलुस का अर्थ यह है कि जब कभी परमेश्वर अपना अभिप्राय अपने ही पास रखता है, तब हमारा कर्तव्य है कि सिर झुकाएँ और उसके विषय में अनजान रहकर सन्तुष्ट रहें। क्योंकि यह शापित बुद्धि है, ऐसी बुद्धि जो हमें नरक के गड्ढे में भेजती है, जब हम उससे अधिक जानने का साहस करते हैं जितना परमेश्वर ने हमें सिखाया है। और इसके विपरीत, जब हम वहाँ से आगे कुछ जानने का भार अपने ऊपर नहीं लेते जहाँ तक परमेश्वर का वचन हमारी अगुवाई और संचालन करता है, तब हम अपने अज्ञान में संसार के सब बुद्धिमानों से अधिक बुद्धिमान हैं।
यह सच है कि परमेश्वर में केवल एक ही और सरल इच्छा है। परन्तु वह उसे हमारी क्षमता के अनुसार और जहाँ तक हमारे लिए उचित और लाभदायक है, हम पर प्रकट करता है। जैसा हम देख चुके हैं, पापों की क्षमा ऐसी बात है जिसे हम छोड़ नहीं सकते, और इसीलिए ज़कर्याह उसे उद्धार का ज्ञान कहता है। फिर, हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि हमारे पापों की क्षमा कहाँ खोजी जाए। क्योंकि यदि हमारे पास यीशु मसीह नहीं, तो हम अब भी परमेश्वर के शत्रु बने रहते हैं [लूका 1:77], हमारा कोई प्रायश्चित्त नहीं, न अपने में कोई विश्राम है, और परमेश्वर का न्याय हमें अवश्य व्याकुल करेगा; परन्तु यीशु मसीह हमारी शान्ति है। इसके अतिरिक्त, जब हम उन बातों को जान लेते हैं जिनकी गवाही परमेश्वर का वचन हमें देता है, तब हमें साथ ही उन भेदों का आदर भी करना चाहिए जो हम से छिपे हैं, जैसा पहले कहा जा चुका है और परमेश्वर के चुनाव की चर्चा के समय फिर कहा जाएगा। और सन्त पौलुस यहाँ फिर 'पहले से ठहराना' शब्द रखता है, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर ने संसार की सृष्टि से पहले हमें पूर्वनियत किया है, और तौभी वह बात छिपी थी। हाँ, निश्चय, परन्तु अब वह हम पर प्रकट की गई है, वह कहता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि वस्तुतः हमें यह स्मरण रखना है कि हम सुसमाचार के ज्ञान में अपनी चतुराई से, या अपने आप को आगे बढ़ाने से, या किसी गुण के द्वारा परमेश्वर को अपना ऋणी बनाने से नहीं बुलाए गए; परन्तु परमेश्वर ने अपनी असीम भलाई से हमें ज्योति देने की कृपा की। और उसने यह इसलिए नहीं किया कि अचानक उसके मन में आ गया, जैसे वे मनुष्य जो क्षणिक आवेग में संकल्प कर लेते हैं, परन्तु इसलिए कि उसने अपनी ही युक्ति में उसे इस प्रकार ठहराया था, समय से भी पहले।
और यदि हमारे मन बेचैन होकर हमें जिज्ञासु होने और यह कहने को उकसाएँ, कैसे? क्या परमेश्वर ने हमें पहले से चुन लिया था? तो उसने हमें इसे पहले क्यों न दिखाया? ऐसा क्यों हुआ कि यह अब से पहले न जाना गया?--तो ताकि हम ऐसे ढीठ न हों, सन्त पौलुस कहता है कि यह अभिप्राय, कहना चाहिए, परमेश्वर में बन्द था, जब तक वह हम पर प्रकट न किया गया। और इसलिए, संक्षेप में, हमारे लिए उससे अधिक जानना उचित नहीं जितना सुसमाचार में हमें बताया गया है; और इसके अतिरिक्त, हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम उसका आदर करें। और इसी कारण यह जोड़ा गया है कि यह समय की परिपूर्णता में सत्य का प्रबन्ध करने के लिए किया गया।
अब इससे सन्त पौलुस दिखाता है कि मनुष्य चाहे अपने आप को कितना ही सताएँ, परन्तु वे अपने उद्देश्य में असफल रहेंगे, और उनके सारे विचार और कल्पनाएँ उन्हें धोखा देंगी, यदि वे उससे अधिक जानना चाहते रहें जितना जानने की अनुमति परमेश्वर ने उन्हें दी है। क्योंकि यदि कोई मनुष्य यह पूछे कि परमेश्वर ने इस बात में और अधिक जल्दी क्यों नहीं की, तो वह दिखाता है कि वह परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान होना चाहता है। और क्या यह शैतानी घमण्ड नहीं? क्या वह सृजा हुआ प्राणी, जब अपने आप को इतना ऊँचा उठाता है, पृथ्वी पर टिके रहने के योग्य है? इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि बातों का प्रबन्ध करना परमेश्वर का काम है। क्योंकि यदि कोई मनुष्य अपने घर में कह सकता है, मैं चाहता हूँ कि मेरे लोगों का पालन-पोषण इस प्रकार हो, मैं चाहता हूँ कि वे यह पेय पिएँ, मैं चाहता हूँ कि वे एक विशेष प्रकार की रोटी खाएँ, मैं चाहता हूँ कि वे इस रीति से सोएँ; तो हमें परमेश्वर को ऐसा करने देना कितना और अधिक उचित है, क्योंकि उसे पृथ्वी के कीड़ों से कम अधिकार क्यों हो? इसलिए हम परमेश्वर को अनुमति दें कि वह अपनी कलीसिया और अपने चुने हुओं के उद्धार का प्रबन्ध वैसे करे जैसा उसे भला लगे। और इसलिए फिलहाल, जो कुछ वह हमें दिखाना चाहे उसे हम पूरी रीति से पर्याप्त मानकर ग्रहण करें। क्योंकि इस विषय में हमारा न्यायी या निर्णायक बनना हमारा काम नहीं कि हम समयों, वर्षों, महीनों या दिनों को नापें, परन्तु हमें सन्तोष होना चाहिए कि परमेश्वर ऐसा ही चाहता है।
कोई मनुष्य इस विषय पर तर्क करेगा और कहेगा, 'क्या! आदम के पतन और मसीह के आने के बीच चार हज़ार वर्ष बीत गए, और क्या परमेश्वर जगत के छुड़ाने वाले को पहले भेजकर बात को सुधार नहीं सकता था? देखो कितने अभागे लोग अन्धकार में भटकते रहे; देखो जलप्रलय से मनुष्यजाति का विनाश हुआ जिसने सब कुछ निगल लिया, और फिर भी इस बीच यीशु मसीह छिपा रहा। इसके अतिरिक्त, केवल थोड़े से मनुष्यों ने उसका स्वाद केवल प्रतीकों और छायाओं के द्वारा चखा। क्योंकि केवल यहूदी ही थे जो छुड़ाने वाले की बाट जोहते थे और उसके द्वारा उद्धार पाते थे, और उन्हें भी अपने पापों की क्षमा का और इस बात का निश्चय करने के लिए कि परमेश्वर उन पर प्रसन्न है, बछड़ों, भेड़ों और अन्य पशुओं का उपयोग करना पड़ा।'
यदि कोई पूछे कि यह कैसे होता है, तो हम उस बात की शरण लें जो यहाँ एक ही शब्द में कही गई है, अर्थात् यह कि समय अभी पूरा नहीं हुआ था। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था। और यह ठीक वही बात है जो हम गलातियों की पत्री में देख चुके हैं, जहाँ सन्त पौलुस ने उन सब मूर्खतापूर्ण अटकलों को दबा दिया जिनसे मनुष्य यह चाहकर भटकते हैं कि अपने आप को उससे ऊँचा उठाएँ जितना उनके लिए उचित है [4:3]। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालें कि समयों और ऋतुओं को ठहराना परमेश्वर का ही विशेष अधिकार है, और हमें उसके ठहराए हुए समय के सिवाय किसी और को ठहराया हुआ समय नहीं मानना चाहिए। क्योंकि यद्यपि सर्दी और गर्मी प्रतिवर्ष हमारे साथ होती हैं, तौभी यदि गर्मी कुछ देर से आए, तो हमें अपने आप को रोकना चाहिए और परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाना नहीं चाहिए। हम कह सकते हैं, हाय, यदि परमेश्वर हमारे पास गर्मी भेजना चाहे तो बहुत स्वागतयोग्य होगा। परन्तु इस बीच हमें पूरा निश्चय रखना चाहिए--शासन करना परमेश्वर का काम है, और सारी प्रभुता और अधिकार उसी का है।
यदि हमें प्रकृति के उस क्रम के विषय में, जो हम में सामान्य है और जिसमें परमेश्वर हमें परिचित रीति से अपने आप को दिखाता है, इतनी नम्रता से व्यवहार करना चाहिए, तो जब हम स्वर्ग के राज्य के भेदों, अपनी आत्माओं के अनन्त उद्धार और इस उच्च रहस्य के प्रश्न पर आएँ कि परमेश्वर का पुत्र खोई हुई और नष्ट हुई वस्तुओं को बहाल करने आया है, तब हमें क्या करना चाहिए? क्या उस समय हमारे लिए यह उचित नहीं कि अपने आप को दीन करें, और जो कुछ परमेश्वर हमें बताए उसे नम्रता से ग्रहण करें, और जानें कि वह किस बात से प्रसन्न है?
इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने यहाँ विशेष रूप से समय की परिपूर्णता की चर्चा क्यों की, मानो वह कहता हो कि हम सुसमाचार में कभी लाभ नहीं उठा सकते जब तक हम परमेश्वर को इतना आदर न दें कि केवल उसकी इच्छा से सन्तुष्ट रहें, ताकि हम उसके विरुद्ध उत्तर देने को आगे न आएँ, न अपनी झंझट से उसका सामना करें, वरन् उसकी युक्ति को सारे ज्ञान, सारे अधिकार और सारी न्यायशीलता का नियम मानकर उसकी महिमा करें।
और इसे और अच्छी रीति से दिखाने के लिए सन्त पौलुस तुरन्त जोड़ता है कि यह 'स्वर्ग की और पृथ्वी की सब वस्तुओं को यीशु मसीह के द्वारा अपने में एकत्र करने' के लिए था। 'एकत्र करना' इस शब्द से सन्त पौलुस हमें दिखाना चाहता था कि जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें बहाल न करे, तब तक हम सब कैसी भयंकर बिखरी हुई दशा में हैं। और यह केवल हमारे विषय में ही नहीं, वरन् सब अन्य सृजे हुए प्राणियों के विषय में भी है। संक्षेप में, यह ऐसा है मानो उसने कहा हो कि प्रकृति का सारा क्रम आदम के पाप के कारण लगभग बिगड़ गया है, और सब वस्तुएँ क्षीण और अव्यवस्थित हो गई हैं, जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह में बहाल न किए जाएँ। क्योंकि यद्यपि हम सब सृजे हुए प्राणियों में परमेश्वर का अद्भुत ज्ञान, सामर्थ्य, भलाई, न्याय और धार्मिकता देखते हैं, तौभी ऊँचे और नीचे सब में पाप के चिह्न हैं, और सब सृजे हुए प्राणी विनाश के अधीन हैं, और सब कुछ अव्यवस्थित है क्योंकि परमेश्वर हमसे घृणा करता और हमें ठुकराता है [रोमियों 8:22]। इसलिए बहाली यीशु मसीह के द्वारा होनी चाहिए। और सन्त पौलुस यहाँ जिस एकत्र करने की बात कहता है उसका अर्थ यही है, ताकि हम अपने आप से घृणा करना और उस गड़बड़ी पर लज्जित होना सीखें जो हम में है और जिससे हमारे पापमय जीवन के कारण सारा संसार भर गया है; और इसके अतिरिक्त परमेश्वर की भलाई को और भी अधिक बड़ा मानना सीखें। एक ओर, पवित्र आत्मा इस पद में हमें चेतावनी देता है कि न केवल हम स्वयं बिखरी हुई दशा में हैं, परन्तु हमने सारे संसार को भी उसी दशा में पहुँचा दिया है और अपने पापों से प्रतिदिन उसे वहीं रखते हैं, और इसका कोई और उपाय नहीं सिवाय इसके कि यीशु मसीह सब कुछ सुधारे और ऐसा एकत्र करना और मेल कराना करे कि हम फिर अपने परमेश्वर से जुड़ जाएँ।
तो इस अंश में हमारे ध्यान देने की पहली बात यही है। यह सच है कि यह बात थोड़े शब्दों में कही गई है, परन्तु इस पर और विस्तार से मनन करने की आवश्यकता है। क्योंकि यही वह बात है जिसमें हमें भोर और सन्ध्या दोनों समय लगा रहना चाहिए, कि जब हम अपने आप को देखें तो इस प्रकार सोचें--हे अभागे प्राणी, तू कौन है? क्योंकि तू देखता है कि तू अपने जन्म से ही अपने परमेश्वर से अलग है। देख, तू उसका शत्रु और उसके क्रोध का उत्तराधिकारी है, और इसके अतिरिक्त तुझ में कुछ भी ऐसा नहीं जो बुराई और कुटिलता की ओर न झुकता हो। तुझे न केवल अपने ही व्यक्ति में इस गड़बड़ी का अनुभव करना चाहिए, वरन् यह भी समझना चाहिए कि तेरी कुटिलता के कारण सारे संसार में और सब कुछ अव्यवस्थित है।
इसलिए हम अपने आप को दीन करें और लज्जित हों, और साथ ही यह स्वीकार करें कि हम परमेश्वर के कितने ऋणी हैं कि उसने अपने एकलौते पुत्र में हमें एकत्र करने की कृपा की--हमें, जिन्होंने उन वस्तुओं को, जिन्हें उसने इतने अच्छे क्रम में रखा था, इतना टुकड़े-टुकड़े कर दिया।
और इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ केवल मनुष्यों की ही चर्चा नहीं करता, जो पाप के कारण पहले से परमेश्वर से अलग हो चुके थे, परन्तु 'स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं' की भी, जिनमें वह स्वर्गदूतों तक को सम्मिलित करता है [कुलुस्सियों 1:20]। क्योंकि यद्यपि उनमें परमेश्वर की महिमा चमकती है और वे कभी उससे अलग नहीं हुए, तौभी उनका हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा एकत्र किया जाना आवश्यक था, और वह दो कारणों से। क्योंकि यद्यपि वे कभी भटके नहीं, और न अपनी उत्पत्ति की दशा से गिरे जो वे थे, और परमेश्वर की धार्मिकता उनमें सदा ऐसी प्रकट होती है कि वे मानो उसके दर्पण और आदर्श हैं, तौभी यदि परमेश्वर उन्हें कठोरता से देखना चाहता, तो वे अपने आप को उस धार्मिकता की सिद्धता से बहुत कम पाते जो उसमें है, जैसा अय्यूब की पुस्तक में कहा गया है [4:18]।
इसके अतिरिक्त, इससे जुड़ा एक और कारण भी है, अर्थात् यह कि स्वर्गदूतों में वह स्थिरता और दृढ़ता न होती जो आवश्यक थी, यदि यीशु मसीह ने उन्हें ऐसा स्थिर न किया होता कि वे कभी न गिरें। तो तुम देखते हो कि एक रीति से वे एकत्र किए गए। परन्तु जिस एकत्र करने की बात सन्त पौलुस यहाँ करता है, वह उनके हमारे साथ फिर एक होने के विषय में है। क्योंकि हम जानते हैं कि जब से हम परमेश्वर के राज्य से निकाले गए, हम उद्धार की सारी आशा से कट गए, यहाँ तक कि स्वर्गदूतों को तुरन्त हमारा शत्रु बनना पड़ा, और वे अब भी वैसे ही रहते, यदि उस सिर के द्वारा, जो हम दोनों का सामान्य है, उनके साथ हमारा मेल न होता।
और यहाँ तुम यह भी देखते हो कि याकूब को दिखाई गई सीढ़ी के विषय में क्यों कहा गया है कि परमेश्वर उसके ऊपर खड़ा था और स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को छूता था, और स्वर्गदूत उस पर चढ़ते और उतरते थे [उत्पत्ति 28:12]। अब हमारा प्रभु यीशु मसीह सच्चा जीवित और अनन्त परमेश्वर है जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को छूता है, क्योंकि उसके व्यक्तित्व में परमेश्वर ने अपने ईश्वरीय सार और मनुष्य के स्वभाव को एक साथ जोड़ दिया है। इस प्रकार तुम देखते हो कि स्वर्ग खुला है, ताकि स्वर्गदूत हमसे परिचित होने लगें, और यहाँ तक कि हमारे सेवक बनें, जैसा इब्रानियों की पत्री में कहा गया है [1:14], क्योंकि हमारी आत्माओं की देखभाल उन्हें सौंपी गई है और (जैसा चौंतीसवें भजन में कहा गया है) वे हमारे चारों ओर छावनी डालते और चौकसी करते हैं, और हमारे रक्षक हैं। तो तुम देखते हो कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्ग के स्वर्गदूतों से फिर कैसे जुड़ गए हैं। और इसी कारण उसने कहा 'अब से तुम स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र को अपने स्वर्गदूतों के साथ अपनी महिमा में उतरते देखोगे' [यूहन्ना 1:51]। इससे वह हमें समझाता है कि स्वर्ग हमारे लिए बन्द था और हम भी परमेश्वर के हाथ से कोई कृपा पाने के योग्य न थे, परन्तु अब वह हमारा सिर होने आया है और उसने अपने पिता और हमारे बीच प्रायश्चित्त किया है, और मध्यस्थ का काम अपने ऊपर लिया है और केवल विश्वासियों का ही नहीं, वरन् स्वर्गदूतों का भी सिर बन गया है, और सब कुछ फिर ऐसे एकत्र कर दिया है कि जबकि शैतान के दूत हमारे विरुद्ध युद्ध करते और हमारे विनाश की युक्ति करने से नहीं थमते, स्वर्गदूत हमें थामने के लिए असीम सामर्थ्य से सज्जित हैं [कुलुस्सियों 2:10]। और यद्यपि हम उन्हें अपनी आँखों से नहीं देखते, तौभी हमें निश्चय विश्वास करना चाहिए कि वे हमारे उद्धार के लिए चौकसी करते हैं।
नहीं तो क्या होता? क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान गरजने वाले सिंह के समान है और हमें फाड़ खाने के सिवाय और कुछ नहीं चाहता [1 पतरस 5:8]। हम देखते हैं कि हमें घेरने के लिए उसके पास कितनी युक्तियाँ हैं। इसलिए स्वर्गदूतों को हमारी रक्षा के लिए असीम सामर्थ्य की आवश्यकता है। यह भी आवश्यक है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की सुरक्षा में रखे जाएँ जो उनका भी सिर है और हमारा भी। इस प्रकार तुम संक्षेप में देखते हो कि इस पद में, जहाँ वह कहता है कि हम फिर एकत्र किए गए हैं, सन्त पौलुस जो हमें बताना चाहता था वह यह है कि हम पहले बिखरे हुए थे, और हम न केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा परमेश्वर से मेल कर लिए गए हैं, वरन् अब स्वर्गदूतों से भी फिर जुड़ गए हैं, ऐसे कि वे हमारे भाई और साथी बन गए हैं, और परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी है कि हमारे सब मार्गों में हमें चलाएँ और थामें, और हमारी चौकसी करें, और उन सब शत्रुओं का सामना करने के लिए जो हमारे विरुद्ध युद्ध करते हैं निरन्तर लड़ते रहें, जब तक हम सब स्वर्ग के विश्राम में एकत्र न हो जाएँ [भजन संहिता 91:13]।
अब हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने अपराधों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि वह हमें सच्चे पश्चात्ताप की ओर खींचे और हमें जीवन भर उसी में बनाए रखे, और साथ ही हम उस पर भरोसा रखना न छोड़ें और उसके सामने अपने आप को निडर होकर प्रस्तुत करें, क्योंकि हमारे पाप उस लहू से मिटा दिए गए हैं जो उन्हें धोने के लिए बहाया गया, और हम इस शिक्षा के अनुसार अपने आप को ऐसा ढालें कि जीवन भर यह मानते रहें कि जब उसने हमें ऐसे मूल्य पर मोल लिया है, तो हमें अपने आप को पूरी रीति से उसकी सेवा में सौंप देना चाहिए; और जब उसने हमारे प्रति अपने आप को ऐसा भला छुड़ाने वाला दिखाया है, तो हम सन्देह न करें कि वह दिन-प्रतिदिन अपनी भलाई को बनाए रखेगा, उस काम की पूर्ण समाप्ति तक जो उसने आरम्भ किया है, और सब आक्रमणों में हमें दृढ़ करेगा, जब तक वह हमें शैतान और उसके सब सहायकों की क्रूरता से छुड़ा न ले, वरन् हमें संसार से बिलकुल निकालकर उस धन्य आनन्द का भागी न बना दे जिसके लिए वह हमें बुलाता है।
और वह प्रसन्न हो कि यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् सब लोगों और जातियों को भी दे।
