अध्याय 27

पहले अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश - इफिसियों 1:13-14

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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पहले अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश - इफिसियों 1:13-14

पाँचवाँ उपदेश

पहले अध्याय पर

तुम भी सत्य का वचन, अर्थात् अपने उद्धार का सुसमाचार सुनकर, और उस पर विश्वास करके मसीह में भरोसा रखते हो; और उसी में प्रतिज्ञा की हुई पवित्र आत्मा की छाप तुम पर लगी, जो हमारी मीरास का बयाना है, कि परमेश्वर की मोल ली हुई सम्पत्ति का छुटकारा हो, कि उसकी महिमा की स्तुति हो - इफिसियों 1:13-14

हम अब तक देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने यह घोषित किया है कि हमारे उद्धार का कोई और आधार नहीं, केवल परमेश्वर की मुफ़्त भलाई है; और इस कारण की खोज में कि वह एक को क्यों चुनता और दूसरे को क्यों छोड़ देता है, हमें और कहीं नहीं देखना चाहिए। क्योंकि हमें शोभा देता है कि हम उसकी निरी इच्छा, उसके संकल्प और उसकी अटल आज्ञा से सन्तुष्ट रहें। और जो इससे आगे बढ़ता है, वह अपनी ही ढिठाई के कारण अनिवार्य रूप से ऐसी खाई में गिरेगा कि उसे अनुभव होगा कि जो लोग परमेश्वर की महिमा और उसकी गुप्त युक्ति का आदर पूरी दीनता और श्रद्धा के साथ नहीं कर सकते, वे सब (मैं कहता हूँ) घोर उलझन में ही पड़े रहेंगे। इसलिए जब कभी हम अपने उद्धार का कारण खोजने लगें, तो हम यह सीखें कि उसे पूरी तरह परमेश्वर ही का ठहराएँ।

यह सच है कि परमेश्वर की सन्तान और वारिस होने के लिए हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की देह का अंग होना चाहिए, और यह बात विश्वास से सिद्ध होती है; फिर भी जब तक परमेश्वर हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा न खींचे, हम सुसमाचार पर विश्वास नहीं कर सकते। अब हम देखते हैं कि वह सब मनुष्यों के साथ एक-सा व्यवहार नहीं करता। क्योंकि वह चाहता तो सारे संसार को प्रकाशित कर सकता था और ऐसा कर सकता था कि कोई अविश्वासी रहता ही नहीं; परन्तु हम इसके विपरीत देखते हैं। इसलिए हम इस बात का दृढ़ निश्चय कर लें कि वह जिसे चाहता है उसे चुनता है। क्योंकि यदि कोई मनुष्य यह पूछे कि वह ऐसा क्यों करता है, तो यह अपने आप को बहुत ही ऊँचा उठाना होगा; और यही कारण है कि इतने दुस्साहसी लोग अपनी ही गर्दन तोड़ बैठते हैं, क्योंकि उनका मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि परमेश्वर मनुष्यों पर अपनी ही इच्छा के अनुसार शासन करता है, जैसा करने का उसे पूरा अधिकार है। फिर, सन्त पौलुस ने अब तक यहूदियों और अन्यजातियों को एक ही स्तर पर रखा है, और यह ऐसा विषय है जिस पर और भी लम्बे विवेचन की आवश्यकता है। क्योंकि यह देखकर कि परमेश्वर ने इब्राहीम की सन्तान को चुना था, यह सोचा जा सकता था कि उनमें कोई स्वाभाविक योग्यता थी। यह सच है कि यदि हम उस अनुग्रह पर विचार करें जो परमेश्वर ने यहूदियों पर दिखाया, तो वे संसार के और सब लोगों से कहीं बढ़कर माने जाने योग्य हैं। परन्तु यदि कोई उन्हें वैसा ही ले जैसे वे अपने आप में हैं, तो वह उन्हें सब धार्मिकता से रिक्त पाएगा। क्योंकि हमें सदा इसी बात पर लौटना होगा कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य का बन्धनकारी या ऋणी नहीं है, और उसका यहूदियों को मुफ़्त लेपालकपन के द्वारा ग्रहण करना इस कारण नहीं कि वे और मनुष्यों से अधिक योग्य थे, और न इसलिए कि वे उस पर अपने आप में घमण्ड करें। इसलिए तुम देखते हो कि सन्त पौलुस स्पष्ट रूप से क्यों कहता है कि जिन्होंने बीते समय में यीशु मसीह पर विश्वास किया, वे भी और लोगों के समान परमेश्वर के चुनाव में सम्मिलित हैं, और दूसरे लोग यह घमण्ड नहीं कर सकते कि वे उनसे अधिक योग्य हैं, या उन्होंने उनसे अधिक कमाया है; वरन् सबको इसी बात पर आना होगा कि यहूदियों में से भी और अन्यजातियों में से भी परमेश्वर ने जिसे चाहा उसे चुन लिया, ताकि इस विषय में केवल उसकी दया ही का विचार किया जाए, और सबके मुँह बन्द हो जाएँ और कोई यह न कह सके कि उसने अपनी ओर से कुछ योगदान दिया।

अब जब सन्त पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों के बीच यह तुलना करने लगता है, तो वह कहता है कि यदि कोई इस बात को देखे कि परमेश्वर ने यहूदियों को अपनी निज मीरास के रूप में ग्रहण किया, तो वे एक पवित्र वंश थे, और उसने उन्हें अपनी व्यवस्था और अपनी प्रतिज्ञाएँ दी थीं, जिनके द्वारा वे उन सबसे कहीं उत्तम और ऊँचे पद पर थे जिन्हें उसने त्याग दिया और छोड़ दिया था। परन्तु यदि हम परमेश्वर की ओर देखें, तो मनुष्य का सारा घमण्ड गिरा दिया जाना चाहिए। परन्तु सन्त पौलुस वहाँ केवल हमारे पापों की क्षमा और विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करने की चर्चा करता है, और वह दिखाता है कि इन बातों का कोई और कारण नहीं ठहराया जा सकता, केवल यही कि परमेश्वर ने हम पर तरस खाया। साथ ही, हम पहले गलातियों की पत्री में देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने पतरस से कैसे कहा, ‘हम जन्म से यहूदी हैं।’ [गलातियों 2:15] क्योंकि चूँकि यह एक प्रचलित धारणा थी कि यहूदी इब्राहीम के वंश से उत्पन्न होने के कारण पवित्र वंश हैं, इसलिए वह कहता है, ठीक है, चाहे ऐसा ही हो, फिर भी यीशु मसीह पर विश्वास करने के सिवाय हमारे लिए उद्धार का न कोई शरणस्थान है, न कोई निश्चय; क्योंकि वह जानता था कि मनुष्य अपने आप में पूरी तरह नष्ट और खोए हुए हैं, इसलिए कि वे अपने साथ परमेश्वर के क्रोध और शाप के सिवाय और कुछ नहीं लाते। इसलिए, जैसे उन स्थलों में सन्त पौलुस ने दिखाया है कि यदि मनुष्य यह कल्पना करें कि उनमें कोई पुण्य या योग्यता है तो वे अपने आप को धोखा देते हैं, वैसे ही अब, उसी शिक्षा को और अच्छी तरह पक्का करने के लिए, सब वाद-विवाद को दूर करने के लिए और सब विरोध को पीछे हटाने के लिए, वह हमें इस स्रोत पर ले आता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर न केवल जिसे चाहता है उसे विश्वास देता है, वरन् उसने संसार की सृष्टि से पहले हमें चुन भी लिया है। तुम देखते हो कि हमें मुख्यतः यह ध्यान में रखना है कि सब मनुष्य, बड़े से लेकर छोटे तक, परमेश्वर के ऋणी हैं, और कोई ऐसा पवित्र या उत्तम नहीं जो मनुष्यों की उस सामान्य दशा से छूट का दावा कर सके।

अब आगे, सन्त पौलुस परमेश्वर की भलाई की महिमा इस बात में करता है कि इफिसियों को उनके साथ इकट्ठा करके एक कर दिया गया जो पहले से परमेश्वर की प्रजा और उसकी कलीसिया के घराने के लोग माने और गिने जाते थे। इफिसियों के सुसमाचार पर विश्वास करने से पहले उनके बीच बड़ा भेद था, जैसा कि दूसरे अध्याय में और विस्तार से दिखाया जाएगा। परन्तु इसके बावजूद कि जो विश्वासी यहूदी पहले ही हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर फिर चुके थे, वे स्वर्ग के स्वर्गदूतों के भाई-बन्धुओं के समान थे, क्योंकि वे उस सिर के अंग थे जो उन दोनों का साझा है, जबकि इसी बीच इफिसियों की दशा यह थी कि वे दीन-हीन अभागे थे, जो उद्धार की सब आशा से बाहर कर दिए गए थे, परमेश्वर के बैरी और विनाश के लिए ठहराए हुए थे, फिर भी परमेश्वर ने उस भेद को मिटा दिया और उन सबको एक ही संगति में बिठा दिया। इसलिए परमेश्वर की भलाई इसी में और भी अधिक प्रकट हुई कि उसने उन्हें, जो नरक की तलहटी में डूबे हुए थे, छुड़ाकर अपनी सन्तान से मिला दिया और अपने स्वर्गीय राज्य का सहभागी और वारिस बना दिया। इसलिए सन्त पौलुस, उनकी चर्चा करके जिन्होंने पहले यीशु मसीह पर विश्वास किया था, हमें स्पष्ट रूप से बताता है कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को इस प्रकार इकट्ठा और स्थापित किया है कि साफ़ प्रकट है कि जो सबसे बड़े हैं वे भी पूरी तरह उसी पर निर्भर हैं और उनके पास उसकी निरी दया के सिवाय टिकने के लिए और कुछ नहीं है; और जो, कहने को, निकाल फेंके गए, यहाँ तक कि घृणित ठहरे थे, उनके पास उसकी महिमा करने का कारण है, क्योंकि उसने उन्हें उस उलझन से छुड़ा लिया जिसमें वे थे।

और आगे, सन्त पौलुस दिखाता है कि जो बात उसने पहले कही थी, वह परमेश्वर के अनुग्रह के प्रभावों के द्वारा हम पर सच प्रमाणित होती है। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारा चुनाव एक गुप्त बात है, और समझ से परे भी। जब मनुष्य उसकी यथासम्भव छानबीन कर चुके, तब भी यदि वे परमेश्वर की अनन्त युक्ति में प्रवेश करने का यत्न करें, तो अपने सब विचारों में निश्चय ही घबरा जाएँगे। और इसलिए हमारे लिए यह उचित नहीं कि पवित्रशास्त्र जहाँ तक हमें ले चलता और मार्ग दिखाता है उससे आगे खोज करें। तुम देखते हो कि परमेश्वर का हमें चुनना उसी में छिपा है, परन्तु फिर भी वह हम पर किए गए अनुग्रह के दानों के द्वारा, जैसे विश्वास, जो पवित्र आत्मा का दान है, उसका प्रमाण हमें देता है। एक बात के विषय में इतना ही।

अब, यदि यह केवल ऐसा ही दान होता जैसे वह अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है, या जैसे वह पृथ्वी से बिना किसी भेद के सब मनुष्यों के लिए फल उपजवाता है, तो भी इसे परमेश्वर के दानों और उपकारों में गिना जाना चाहिए। परन्तु विश्वास एक विशेष दान है जो सब मनुष्यों को साधारणतया नहीं दिया जाता, वरन् परमेश्वर के द्वारा एक निधि के समान रखा गया है कि जिसे वह चाहे उसे दे। और इसका कारण क्या है? हम सब आदम की सन्तान हैं और सब एक ही वंश के हैं। फिर वह कुछ को क्यों प्रकाशित करता है और दूसरों को उनके अन्धेपन में अकेला छोड़ देता है? उसके चुनाव के सिवाय और कोई कारण नहीं। इसलिए, यद्यपि हम तर्क या बुद्धि से यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर ने संसार की सृष्टि से पहले हमें कैसे चुना, फिर भी हम इसे इसलिए जानते हैं कि उसने यह हम पर प्रकट किया है; और जब हम विश्वास में प्रकाशित किए जाते हैं तब अनुभव स्वयं इसकी भरपूर गवाही देता है। इसका क्या कारण है कि मैं सुसमाचार को ग्रहण करता हूँ और उससे लिपटा रहता हूँ, जबकि दूसरे पशुओं की-सी जड़ता में पड़े रहते हैं, या सुसमाचार की शिक्षा से कुढ़ने भी लगते हैं? यदि मैं यह कल्पना करूँ कि यह मेरी अपनी चतुराई के कारण है, तो मैं परमेश्वर की वस्तु की चोरी का दोषी हूँ। क्योंकि हमें सदा उसी बात पर लौटना होगा जो हम देख चुके हैं, और कहना होगा, ‘तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है?’ [1 कुरिन्थियों 4:7]

तो सन्त पौलुस उस वचन में मनुष्य का सारा अभिमान गिरा देता है, ताकि कोई अपने को आगे न बढ़ाए और न यह दावा करे कि उसके पास अपना कुछ है। वह कहता है, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हममें अपनी कोई योग्यता है, वरन् सब कुछ परमेश्वर की ओर से आता और उसी से निकलता है। इसलिए इस पाठ में सन्त पौलुस अनुभव से दिखाता है कि इफिसियों को परमेश्वर ने कैसे चुना था, और उनके लिए उचित था कि वे अपना सारा विश्वास उसी पर, अर्थात् परमेश्वर की मुफ़्त भलाई पर स्थापित करें। और वह कहता है कि इसका प्रमाण तुम्हारे पास यह है कि तुमने सुसमाचार की शिक्षा सुनी और उस पर विश्वास किया। परन्तु यह कैसे हुआ? वह दिखाता है कि उन पर पवित्र आत्मा की छाप लगना आवश्यक था। अब, यदि उन पर छाप लगी, तो अवश्य ही पवित्र आत्मा का पहले से कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए परमेश्वर की अनन्त युक्ति जैसी गहरी भूलभुलैया में घुसना व्यर्थ है। क्योंकि वह हमें, मानो उँगली से, दिखा देता है कि उसने हमें कैसे चुना है, कम से कम तब, यदि हम उसके प्रति कृतघ्न नहीं हैं, वरन् जो भलाई उसने हमारे साथ की है उसे मानते हैं और अपने मन में पूरी तरह निश्चित और दृढ़ हैं कि इसका और कोई कारण नहीं, केवल यह कि उसने अनादि काल से हम पर अपनी छाप लगा दी है; दूसरे शब्दों में, यह कि उसने हमें अपनी निज सन्तान के रूप में अपने लिए अलग रख छोड़ा है। तो हम सन्त पौलुस का अभिप्राय देखते हैं; इसलिए हम यह सीखें कि जब केवल यह मान लेने की बात हो कि हमारे पास जो कुछ है वह सब परमेश्वर की निरी दया से है, तब लम्बी भूमिकाएँ न बाँधें। क्योंकि हमारा जो विश्वास है वही इसे भली-भाँति दिखा देता है, क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) वह हमारी अपनी बुद्धि की सूझ से नहीं आता, वरन् ऊपर से दान के रूप में आता है, और ऐसा दान जो परमेश्वर सबको बिना भेद के नहीं देता, वरन् केवल उन्हीं को जिन्हें वह चाहता है।

फिर, यहाँ बहुत-से शब्द हैं जो तौलने के योग्य हैं। क्योंकि एक ओर सन्त पौलुस पवित्र आत्मा के अनुग्रह की महिमा करना चाहता है, यह दिखाकर कि हमारा हमारे प्रभु यीशु मसीह में, या उन सब लाभों में जो उसने हमारे लिए मोल लिए हैं, कोई भाग या अंश नहीं हो सकता, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें हमारे उद्धार का अधिकारी न बना दे। यह तो एक बात है। फिर भी सन्त पौलुस यह भी दिखाने से नहीं चूकता कि सुसमाचार के द्वारा हमें कैसा अनमोल लाभ मिलता है, क्योंकि वह उसे ‘सत्य का वचन’ और ‘उद्धार का सुसमाचार’ कहता है। क्योंकि पहले तो उसका अभिप्राय हमें निश्चय दिलाना था, ताकि हमारे पास बिना सन्देह और विवेक की किसी खटक के परमेश्वर को पुकारने का अचूक आधार हो। क्योंकि जब तक हम इस सन्देह में हैं कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है या बैर, तब तक हमारे लिए सच्चे मन से उससे प्रार्थना करना असम्भव है, और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमारा उद्धार बिलकुल नष्ट हो जाता है, जैसा भविष्यद्वक्ता योएल ने कहा है। [योएल 2:32] और पवित्रशास्त्र में यह एक सामान्य शिक्षा है कि हम उद्धार तब तक नहीं पा सकते जब तक प्रार्थनाओं और विनतियों के द्वारा परमेश्वर की शरण न लें। परन्तु यदि हमारे पास उक्त निश्चय न होता तो हम उससे वंचित रह जाते, जैसा हम तीसरे अध्याय में और विस्तार से देखेंगे।

इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम पूरी तरह निश्चित हों कि परमेश्वर हमारा पिता है, और वह हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण करता है। और हम इस बात के विषय में कैसे निश्चित हो सकेंगे जब तक कि सुसमाचार की शिक्षा सब बातों में इतनी पक्की न हो कि उसे सन्देह में डालना हमारे लिए उचित ही न हो? इसलिए सन्त पौलुस उसे सत्य का वचन कहता है। निःसन्देह और सत्य बातें भी हैं, क्योंकि जब परमेश्वर हमें धमकाता है तब भी वह दिखावे के लिए या व्यर्थ ऐसा नहीं करता, क्योंकि उसकी प्रतिज्ञाओं और उसकी धमकियों दोनों की निश्चित और अटल पूर्ति होती है। परन्तु चूँकि इस समय का विषय हमारे भीतर के सब अविश्वास को सुधारना है, जिसकी ओर हम इतने झुके हुए हैं, इसलिए सन्त पौलुस ने सुसमाचार को सत्य की शिक्षा कहा है; मानो वह कहता हो, मेरे मित्रो, परमेश्वर अपनी इच्छा के विषय में तुम्हारे लिए विश्वासयोग्य साक्षी है, क्योंकि सुसमाचार तो मानो उसका अपना हृदय तुम्हें दिखाना है। इसलिए उसी पर टिके रहो। फिर वह यह भी कहता है कि हमारा उद्धार सुसमाचार में लिपटा हुआ है, और यह इसलिए कि हम उससे प्रेम रखें और उसका मोल समझें। क्योंकि क्या हम इतने नासमझ या पूरे पागल होंगे कि अपने ही कल्याण का तिरस्कार करें? फिर भी वह कहता है कि यह सब परमेश्वर की निरी दया और अनन्त चुनाव से आता है, जो हमसे दूर और अज्ञात है, परन्तु हम उसे सुसमाचार के द्वारा जानते हैं जो उसका साधन और उपकरण है। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह का अपने आप को बलिदान करके संसार को परमेश्वर पिता से मिलाना किस काम का होता, यदि हम विश्वास के द्वारा उसके भागी न बनाए जाते? अब विश्वास कोई ऐसी धारणा नहीं जो मनुष्य अपने मस्तिष्क में गढ़ ले, वरन् यह दृढ़ प्रतीति है कि परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता और न हमें धोखा दे सकता है, और यह कि इसका भय नहीं करना चाहिए कि यदि हम उसकी बाट जोहें तो हमारी आशा अन्त में भली-भाँति पूरी न होगी। इसलिए संक्षेप में, सन्त पौलुस का आशय यह दिखाना था कि यदि हम सुसमाचार की शिक्षा से लाभ उठाना जानें, तो हम फिर न व्याकुल और न घबराए हुए रहेंगे, वरन् पूरे मन से परमेश्वर को पुकार सकेंगे, और अपने आपको सब बातों में उसका ऐसा ऋणी और उससे ऐसा बँधा हुआ मानेंगे कि हमें इस बात का कोई भय न रहेगा कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, कि हम उससे ग्रहण किए गए हैं, और कि हम उससे जो भी प्रार्थनाएँ करते हैं उन सबमें वह हमारी सुनता है। पहली बात के विषय में इतना ही।

इसलिए सन्त पौलुस की उपदेश के अनुसार हम सुसमाचार की शिक्षा पर इस प्रकार टिकना सीखें कि मानो परमेश्वर हमें प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा हो और आकाश हमारे लिए खुल गया हो। और हम सदा यह स्मरण रखें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के अपने ही मुख से यह कहा गया है कि जब कभी सुसमाचार के प्रचार के द्वारा मनुष्यों के पाप क्षमा किए जाते हैं, तो वही बात उसी समय स्वर्ग में भी पक्की कर दी जाती है। [मत्ती 16:19; यूहन्ना 20:23] इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें कितना निश्चय होना चाहिए, कि हम फिर इस विषय में सन्देह न करें कि परमेश्वर हमारी सुनेगा या नहीं। परन्तु जैसे सुसमाचार हमें विश्वास करना सिखाता है, वैसे ही सन्त पौलुस हमें यह भी दिखाता है कि हमें उसे एक अतुल्य निधि के रूप में मूल्यवान जानना चाहिए, क्योंकि वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है, जैसा वह रोमियों की पत्री के पहले अध्याय में कहता है। [रोमियों 1:16] तो जब हम अपने आप में खोए हुए और नष्ट हैं, और हमें फिर परमेश्वर की ओर बुला लाने का सुसमाचार के सिवाय और कोई उपाय नहीं, तो हम उस निधि का बड़ा मूल्य समझें और इस बात का ध्यान रखें कि उससे लाभ उठाएँ। और ऐसा करते हुए हम शैतान का और उन सब परीक्षाओं का भी, जो वह हमारे विरुद्ध करता है, निडर होकर तिरस्कार करें, क्योंकि परमेश्वर ने हमें बुलाया है और हमें अपने पितृ-प्रेम और हमारे प्रति अपनी भली इच्छा का पर्याप्त प्रमाण दिया है।

परन्तु आओ, मैं जिस दूसरी बात का उल्लेख कर चुका हूँ उस पर आएँ। क्योंकि सन्त पौलुस दिखाता है कि परमेश्वर का हमारे लिए सुसमाचार का प्रचार होने देने के अतिरिक्त, यह भी आवश्यक है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा और एक विशेष अनुग्रह से कार्य करे। और वास्तव में हम बहुतों को पाएँगे जो यह बात बड़ी सरलता से मान लेंगे कि परमेश्वर हमारे पास अपना सुसमाचार भेजने को अपने ही मुफ़्त अनुग्रह के सिवाय और किसी कारण से प्रेरित नहीं हुआ; परन्तु साथ ही वे यह अनुमान लगाते हैं कि कुछ लोग इसे ग्रहण करते और कुछ नहीं करते, इसका कारण यह है कि उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रभुत्व है, और इस प्रकार परमेश्वर का अनुग्रह घट जाता है। क्योंकि परमेश्वर हमें अपना अनुग्रह ऐसे नहीं देता जैसे कोई मनुष्य छोटे बच्चों के सामने सेब रख दे कि जो सबसे तेज़ दौड़े वही आकर ले जाए। यदि परमेश्वर उसे इस प्रकार उछाल दे, तो यह निश्चित है कि हमारे उद्धार का बहुत बड़ा भाग हमारी अपनी शक्ति और चतुराई का फल होता, और उसकी प्रशंसा हम ही को मिलती।

अब, सन्त पौलुस यह दिखा चुकने के बाद कि परमेश्वर ने हमें अपने स्वर्गीय राज्य की मीरास के लिए बुलाया है और प्रतिदिन बुलाता है, और कि उसका ऐसा करना उसके अपने निरे और मुफ़्त अनुग्रह से होता है, आगे यह जोड़ता है कि हमें उसके पवित्र आत्मा के प्रभाव में रहना चाहिए। यह सच है कि वह यहाँ पवित्र आत्मा के अनुग्रह का केवल एक ही भाग रखता है, पर इसका कारण यह है कि दूसरा भाग वह पहले रख चुका है; क्योंकि उसने इस स्थल में अपने तर्क की किसी बात को नहीं भुलाया, वरन् उसने परमेश्वर की मुफ़्त भलाई से आरम्भ किया जिससे हम सब भरे हैं, और दिखाया कि विश्वास मुफ़्त चुनाव के उसी सोते से फूटता है। परन्तु अब, दूसरे भाग के लिए, वह यह जोड़ता है कि परमेश्वर का हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित करना, कि जब हम अन्धे थे तब उसने अपना अनुग्रह हमारे हृदयों में अंकित किया और उन्हें झुकाकर अपनी आज्ञाकारिता में लगा लिया, हमारे लिए पर्याप्त नहीं है, वरन् इसके अतिरिक्त उसे हमें स्थिर करना और हमारे विश्वास को दृढ़ करना भी आवश्यक है, हमें अन्त तक टिके रहने की अजेय दृढ़ता देकर।

तो तुम देखते हो कि सन्त पौलुस हमें कहाँ ले जा रहा है। हमारे पवित्र आत्मा के हाथ से विश्वास पाने और उसके हमें अपने अनुग्रह से प्रकाशित करने के अतिरिक्त, जिसके विषय में मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर हमें इस प्रकार सुरक्षित भी रखता है कि हम गिर न पड़ें। इसे और अच्छी तरह समझने के लिए हमें पहले उस बात का स्मरण करना चाहिए जिसका पहले ही और विस्तार से विवेचन हो चुका है, अर्थात् यह कि जब तक परमेश्वर हमें हमारी अपनी दशा और दुर्दशा में अकेला छोड़ता है, तब तक हम अन्धे अभागे हैं जो अन्धकार में भटकते फिरते हैं, और हमें चाहे जो प्रचार किया या कहा जाए, हम अपनी पशुता में अटल बने रहते हैं। क्योंकि शारीरिक मनुष्य परमेश्वर की या अपने उद्धार की किसी भी बात को कभी न समझेगा। [1 कुरिन्थियों 2:14] तो तुम देखते हो कि जब तक परमेश्वर हम पर दया करके हमें ज्योति और समझ का आत्मा नहीं देता, तब तक हम स्वर्गीय ज्योति से पूरी तरह वंचित और बहिष्कृत हैं। पहली बात के विषय में इतना ही। और चूँकि उस बात की चर्चा पहले हो चुकी है, इसलिए केवल उसकी याद दिला देना ही पर्याप्त है।

अब एक और बात है, और वह यह कि जब हम परमेश्वर के अनुग्रह को विश्वास के द्वारा एक बार ग्रहण कर चुके, जिससे हम जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह वही है जिसमें हमें वह सब मिलता है जो हमें पूरी तरह सुखी बनाने के लिए चाहिए, तो इस सत्य में हमारा स्थिर किया जाना बहुत आवश्यक है। और क्यों? देखें कि मनुष्य कैसे चंचल होते हैं। जो परमेश्वर के पीछे चलने के लिए सबसे अधिक तैयार है, वह भी शीघ्र गिर जाएगा, क्योंकि हम इतने निर्बल हैं कि यदि परमेश्वर हमें सामर्थी हाथ से थामे न रखे, तो शैतान हर पल हमें पछाड़ देगा। और इसी कारण कहा जाता है कि जब परमेश्वर हमें चुन चुका और हमारे प्रभु यीशु मसीह को सौंप चुका, तो वह हमें थामे रखने में अपनी सामर्थ्य प्रकट करता है। क्योंकि यदि वह हमारे लिए न लड़े, तो हाय, हमारा क्या होगा? हम पूरी तरह नाश हो जाएँगे, और केवल एक ही चोट से नहीं, वरन् जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अनगिनत गिरावटें होंगी। जैसे ही हम उद्धार के मार्ग में आते, वैसे ही हम अपनी निर्बलता, हल्केपन और अस्थिरता के कारण उससे बाहर कर दिए जाते, यदि हम रोके न जाते और यदि परमेश्वर हममें इस प्रकार कार्य न करता कि हम उसके पवित्र आत्मा के द्वारा शैतान और संसार के सब आक्रमणों पर जय पा सकें। इस प्रकार विश्वास के विषय में परमेश्वर का आत्मा हममें दो प्रकार का कार्य करता है। क्योंकि वह हमें प्रकाशित करता है कि हम उन बातों को समझें जो अन्यथा हमसे छिपी रहतीं, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरी आज्ञाकारिता से ग्रहण करें। यह उसके कार्य का पहला भाग है। दूसरा यह कि वही आत्मा हममें बना रहना और हमें अन्त तक दृढ़ता देना चाहता है, ताकि हम अपनी राह के बीच में पीछे न हटें। तो सन्त पौलुस अब इसी की चर्चा कर रहा है।

मानो वह कहता हो, मेरे मित्रो, तुम परमेश्वर के अनुग्रह को जान चुके हो और उसका अनुभव कर चुके हो, और उसने तुम्हें अपने सुसमाचार का आज्ञापालन करने को खींचा है। क्योंकि यदि वह तुम पर दयालु न ठहरता तो तुम कभी उसके पास न आते। परन्तु यह भी निश्चित जान लो कि वह अपने अनुग्रह को इसमें बढ़ाता है कि तुम्हें उसमें टिके रहने का सामर्थ्य देता है। क्योंकि यदि तुम केवल तीन दिन, या तीन वर्ष, या उससे अधिक भी बने रहते, तो परमेश्वर का इसमें तुम्हारी सहायता करना अनिवार्य था, नहीं तो तुम सदा बेचारे अभागों की नाईं, बुद्धि के हार माने हुए, बिना किसी निश्चय के इधर-उधर डोलते रहते, जब तक परमेश्वर यह प्रतिज्ञा न करता कि वह तुम्हारी चिन्ता करेगा और तुम्हें निरन्तर चलाता रहेगा, यहाँ तक कि तुम अपनी राह के अन्त तक पहुँचकर अपनी दौड़ पूरी कर लो। इसी कारण वह यहाँ कहता है कि उन पर पवित्र आत्मा की छाप लगी। अब हमें उस अलंकार को ध्यान से समझना चाहिए जो सन्त पौलुस काम में लाता है। क्योंकि हम जानते हैं कि दस्तावेज़ों पर मुहरों से पुष्टि की जाती है, और यह सब समयों में होता रहा है। यह सच है कि मनुष्य उस प्रकार नहीं लिखते थे जैसे आजकल लिखते हैं। तो भी वे अपने हाथ से हस्ताक्षर करने के बदले अपनी मुहर या अँगूठी सौंप देते थे। और इसी रीति से वे वसीयतनामे, और अन्य लेख, और सब वाचाएँ प्रकाशित करते थे।

इसी सम्बन्ध में सन्त पौलुस कहता है कि हमारे हृदयों में छाप लगनी चाहिए। यह सच है कि ठीक-ठीक कहा जाए तो उसे यह कहना चाहिए था कि सुसमाचार पर छाप लगी। तो भी, हमें यह समझाने के लिए कि दोष हमारा ही है और हमीं से उत्पन्न होता है, और यह कि सुसमाचार अपने आप में पर्याप्त अधिकार रखनेवाली शिक्षा है, उसका आशय यह दिखाना था कि परमेश्वर का अपने सत्य पर छाप लगाना हमारे कठोर हृदय और अस्थिरता के कारण है, क्योंकि जब तक वह हमें दृढ़ न करे तब तक हम डोलते हुए सरकण्डों की नाईं हर हवा से हिलते रहते हैं। परन्तु जो भी हो, हम यह ध्यान दें कि पवित्र आत्मा मानो वह मुहर है जिससे वह अपने सत्य को हमारे लिए पक्का करता है।

अब मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि हमें इसकी कितनी अधिक आवश्यकता है। क्योंकि यद्यपि हम यह मानते हैं कि परमेश्वर का वचन बिना विरोध या उत्तर के ग्रहण किए जाने के योग्य है, तो भी हम सन्देह करना नहीं छोड़ते। और हम यह बात अपने अनुभव से भली-भाँति जान लेते हैं। क्योंकि जब कभी कोई कष्ट या झंझट आता है, तब हम बौखलाए हुए लोगों के समान हो जाते हैं; जबकि यदि हम परमेश्वर की भलाई के विषय में उन रीतियों से, जिनसे वह हमें उसका निश्चय दिलाता है, पूरी तरह आश्वस्त होते, तो यह निश्चित है कि हम ऐसे किसी भय में न पड़ते। इसलिए वे सब परीक्षाएँ जो हमें हिला देती हैं, भली-भाँति दिखाती हैं कि हम सुसमाचार से वैसा लाभ नहीं उठाते जैसा उठाना चाहिए। और इसलिए परमेश्वर अपनी ओर से उसे अपने पवित्र आत्मा के द्वारा सामर्थ्य देना और उसे हमारे हृदयों में ऐसा निश्चित अंकित कर देना चाहता है कि हम स्थिर रहें, और वही स्थिरता शैतान के उन सब प्रयासों और युक्तियों से जो वह हमारे विश्वास को उलटने के लिए कभी करे या रचे, गिराई न जा सके।

परन्तु हम इस बात को और भी अच्छी तरह समझेंगे यदि अपनी निर्बलता की वैसी निरन्तर जाँच करते रहें जैसी मैं पहले कह चुका हूँ। क्योंकि हम इस संसार के सब तर्क उठा सकते हैं, फिर भी हम इस बात का वैसा पूरा और सिद्ध निश्चय कभी न पा सकेंगे जैसा पाना चाहिए, कि परमेश्वर हम पर दया करेगा और इस संसार के सब खतरों के बीच हमारी रक्षा करेगा। क्योंकि हम यहाँ मानो समुद्र में हैं। आँधियाँ और तूफ़ान हर पल हम पर टूटते हैं, और हम सदा निगल लिए जाने के संकट में हैं। तब हम शैतान को कैसे ललकार सकते हैं, जब हम बेचारी भेड़ों के समान हैं जिनके पास न कवच है, न हथियार, न सहायता का और कोई साधन? हम जीवन और मृत्यु दोनों में कैसे आनन्द मना सकते हैं, यह जानते हुए कि यदि हम पर प्रामाणिक रीति से भली-भाँति छाप न लगी हो तो शैतान हमारे विरुद्ध कुछ भी कर सकता है? इसलिए, इस पाठ में यह चेतावनी पाने के अतिरिक्त कि हम सब अहंकार और घमण्ड से छुटकारा पाएँ, जिससे केवल परमेश्वर ही की स्तुति और बड़ाई हो, हम सन्त पौलुस के शब्दों से यह भी निकाल सकते हैं कि हमारे पास शत्रु का सामना करने और भली-भाँति लड़ने के हथियार हैं, और यद्यपि हमारा शत्रु सामर्थी और बलवन्त है, फिर भी वह हम पर कभी जय न पाएगा, जब तक हम इस कथन से लाभ उठाते रहें कि परमेश्वर का आत्मा सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं के सत्य और निश्चय पर हममें छाप लगाता है।

अब सन्त पौलुस एक और अलंकार जोड़ता है, यह कहकर कि परमेश्वर का आत्मा बयाने के समान है। और हमें यह अनोखा न लगे कि सन्त पौलुस ने इस शिक्षा को इतना पक्का किया है, क्योंकि शैतान ने संसार के आरम्भ से कभी न छोड़ा कि मनुष्यों को उनकी अपनी बुद्धि और बल की किसी मूर्खतापूर्ण धारणा से फुलाए रखे। आदम के गिरने का कारण यही था कि वह अपने लिए उचित से ऊँचा उठना और परमेश्वर से बुद्धिमान होना चाहता था, जिसकी परमेश्वर ने उसे कोई अनुमति नहीं दी थी। हमारा हाल भी वैसा ही है, और शैतान अब भी आक्रमण करता जाता है। देखो उसने किस छल से मनुष्यजाति को गिराया, और उसका सारा प्रयत्न अब भी यही है कि हमें विश्वास दिलाए कि हम यह और वह कर सकते हैं। इसलिए सन्त पौलुस को मनुष्यों को अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपनी धार्मिकता की उस झूठी और शापित धारणा से छुड़ाना और उन्हें यह दिखाना पड़ा कि वे सब बातों में पवित्र आत्मा के ऋणी हैं। इसके विषय में इतना ही।

दूसरे, हम ऐसे मूर्ख और मिट्टी में सने हुए हैं कि शिक्षा को हमारे लिए सुगम बनाना पड़ा [mâcher (Fr.) (चबाना, चर्वण करना)], और हम परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण दानों के विषय में, जो अदृश्य हैं, उससे अधिक नहीं समझ सकते जितना अपनी आँखों से देखते और अपने हाथों से छूते हैं। इसलिए सन्त पौलुस के लिए आवश्यक था कि वह अलंकारों के द्वारा यह दिखाए कि परमेश्वर का पवित्र आत्मा ही है जो हमें सुसमाचार का और उसमें निहित सब लाभों का अधिकारी बनाता है, और अन्त तक उनमें हमें सम्भाले रखता है।

अब हम जानते हैं कि अनुबन्ध बयाना देने से पक्के किए जाते हैं, जिसे लोग साधारणतः अग्रिम धन कहते हैं। [Denier á Dieu (Fr.) (परमेश्वर के लिए कौड़ी)] तो जब भूमि, घर, मीरास या सामान मोल लेने में, यद्यपि मनुष्य का केवल वचन ही पर्याप्त होना चाहिए, मनुष्य ऐसे दुष्ट हैं कि यदि उन्हें किसी बात में अपनी हानि दिखे तो वे अपनी बात से पलटते लज्जित नहीं होंगे। इसलिए बयाना देने की यह रीति जोड़ी गई, और यह मानो ऐसा है कि पूरा दाम चुका दिया गया हो, ताकि अनुबन्ध रद्द न किया जा सके। तो सन्त पौलुस का यहाँ अर्थ यह है कि परमेश्वर का आत्मा हमारे उद्धार की पूरी जमानत का काम करता है। और किस लिए? वह कहता है, ‘तुम्हारी मीरास के लिए, तुम्हारे छुटकारे के दिन तक।’ यह सच है कि हम पहले ही परमेश्वर के वारिस हैं, क्योंकि हम उसकी सन्तान हैं। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि रोमियों के आठवें अध्याय [पद 24] में कहा गया है कि हमारा उद्धार आशा में बन्द है। इसलिए हम अभी उसे देख या भोग नहीं सकते, जैसा कुलुस्सियों के तीसरे अध्याय [पद 3] के अनुसार है, जहाँ कहा गया है कि हम उन मरे हुओं के समान हैं जो इस संसार से चले गए हैं, और हमारा जीवन मसीह यीशु में परमेश्वर के साथ छिपा हुआ है। इसलिए, यद्यपि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, फिर भी इस समय हमें उसका पूरा भोग प्राप्त नहीं है।

यह सब उससे भली-भाँति मेल खाता है जो सन्त यूहन्ना अपनी पत्री में कहता है। वह कहता है, ‘हम जानते हैं।’ इससे वह दिखाता है कि हमारा विश्वास सन्देह में नहीं है, फिर भी वह जोड़ता है कि वह अभी देखा नहीं गया, परन्तु हमें उस दिन की बाट जोहनी है जब हम परमेश्वर के समान होंगे, और तब हमारे पास ज्योति होगी कि हम उसे पूरी सिद्धता से देखें जिस पर अब हम केवल विश्वास करते हैं। [1 यूहन्ना 3:2] फिर, हम देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में कैसे कहा कि जब तक हम इस पृथ्वी की तीर्थयात्रा में हैं, हम, कहने को, परमेश्वर से अलग हैं। [2 कुरिन्थियों 5:6] और क्यों? वह कहता है कि हम आशा में चलते हैं, और उस वस्तु को ऐसे नहीं देखते मानो वह उपस्थित हो, वरन् उसे विश्वास से देखते हैं। संक्षेप में, यद्यपि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गए हैं (जैसा यूहन्ना के पाँचवें अध्याय [पद 24] में कहा गया है), फिर भी हम असंख्य मृत्युओं से लड़ते हैं, क्योंकि हम उनसे घिरे हुए हैं।

और सन्त पौलुस इस स्थल में दोनों को भली-भाँति जोड़ता है। क्योंकि एक ओर वह कहता है कि हम अब तक अपने छुटकारे और मीरास तक नहीं पहुँचे, और फिर भी साथ ही वह दिखाता है कि हम इस सब के होते हुए भी उसके विषय में निश्चित हैं, और केवल हमारी अपनी कृतघ्नता ही हमें परमेश्वर में पूरी रीति से घमण्ड करने से और पूरे हृदय से यह कहने से रोकती है कि हमें सन्देह नहीं कि हम स्वर्गीय जीवन तक पहुँचेंगे, क्योंकि हमारे पास पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी गारण्टी है और हम अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसे जुड़े हैं कि उसकी सारी सम्पत्ति हमारी है, क्योंकि वह हमारी ही है और विश्वास के द्वारा हमें दी जाती है।

इसलिए आओ, हम ध्यान से देखें कि सन्त पौलुस के इन शब्दों में क्या निहित है। वह कहता है कि पवित्र आत्मा हमारी गारण्टी है। जब ऐसा है तो हमें अपने छुटकारे के विषय में निश्चित होना ही चाहिए, जिसका पूरा अधिकार हमें अन्तिम दिन मिलेगा। और बातों की वास्तविक स्थिति ही इसे भली-भाँति दिखा देती है। क्योंकि हम तो पृथ्वी के बेचारे कीड़े हैं, सड़ाहट और भ्रष्टता से घिरे हुए। हम उतनी ही विपत्तियों से घिरे हैं जितनी देखने में दयनीय हैं। संसार हमें कोसता है, और हमारा और हमारी सादगी का उपहास करता है। हमें भूख और प्यास सहनी पड़ती है। प्रायः ऐसा लगता है कि परमेश्वर ने हमें त्याग दिया है और मानो हमें काट डाला है, और वह हम पर तरस खाना भी नहीं चाहता। हम संसार के सबसे तुच्छ प्राणी प्रतीत होते हैं। बाहरी रूप से हमारी दशा ऐसी ही है। और इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हमारे पास कोई उपचार हो जिससे हम इतनी उलझनों और मनोव्यथाओं के बीच अपने को निश्चित कर सकें। इसी कारण सन्त पौलुस जानबूझकर कहता है कि पवित्र आत्मा हमारी गारण्टी है। इसलिए, यद्यपि संसार हमें, जैसा वे कहते हैं, पाँव तले रौंदने की छूट अपने को देता है; यद्यपि हमारा प्रभु हमें अनेक परीक्षाओं में परखता रहता है; यद्यपि वह हमें ऐसा दीन करता है कि लगता है कि हम वध के लिए ठहराई गई भेड़ों के समान हैं, ऐसे कि हम निरन्तर मृत्यु के द्वार पर रहते हैं, [nous avons toujours Ia mon entre les dents (Fr.) (मृत्यु दाँतों के बीच)] तो भी हम एक अच्छे उपचार से रहित नहीं हैं। और क्यों? जब पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में राज्य करता है, तो हमारे पास हमारी सब परीक्षाओं के बीच भी स्तुति करने की कोई बात है, रोमियों की पत्री के आठवें अध्याय [पद 15] के कथन के अनुसार, कि एक बार यह निश्चय हो जाने पर कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान मानता है, हम न केवल उसे पुकार सकते हैं, वरन् पीड़ित और सताए जाने पर भी हम इस बात के विषय में सदा और अचूक रूप से निश्चित बने रहना नहीं छोड़ते कि वह हमारा पिता है जो हमें स्वर्ग की महिमा तक ले जाएगा; क्योंकि यह भी एक ऐसा मार्ग है जिससे हमारी आशा परखी जाती है।

फिर, हमें यह चेतावनी भी मिलती है कि हम धीरज से चलें, और चूँकि परमेश्वर ने हमें अपना पवित्र आत्मा गारण्टी के रूप में दिया है, इसलिए हमें उतना उतावला और अधीर नहीं होना चाहिए जितना हम होते आए हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करे, तो हम तुरन्त शिकायत करने लगते हैं, और कुछ भी सहना हमें बहुत बुरा लगता है, क्योंकि हम देखते हैं कि हम स्वभाव से कितने कोमल और संवेदनशील हैं। परन्तु हमें धीरज से सहना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर यह नहीं चाहता कि हम, कहने को, एक ही छलाँग में उसके राज्य में पहुँच जाएँ, वरन् चाहता है कि हम इस संसार को काँटों और झाड़ियों के बीच से पार करें, कि हमें निकलने में बहुत कठिनाई हो और हम बड़े संकट में पड़ें। चूँकि वह चाहता है कि हम ऐसे मार्ग से ले जाए जाएँ, और फिर भी हमें ऐसा उत्तम उपचार देता है जो हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, अर्थात् यह कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अजेय स्थिरता से दृढ़ करता है, इसलिए हम तब तक लड़ने को तैयार खड़े रहें जब तक विजय का समय पूरी तरह न आ जाए।

यह सच है कि हमारा विश्वास अब भी प्रबल होता जाता है, परन्तु हमें अभी उसका पूरा फल नहीं मिलता, और न हम पूरी तरह उसका भोग करते हैं। इसलिए हमें अपने मन में ठान लेना चाहिए कि हम निरन्तर लड़ें और कराहें, और फिर भी साथ ही आनन्द भी मनाएँ। और क्यों? अपने हृदयों में आनन्द मनाना और फिर भी सन्त पौलुस के साथ यह पुकारना, ‘हाय, मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?’ ये परस्पर विरोधी बातें नहीं हैं। इसलिए हम में से हर एक शोक करे, और मन में खेद भी करे, क्योंकि हम अब तक अपनी बुरी लालसाओं और अपने भीतर के अनेक दोषों के वशीभूत हैं। फिर भी हम यह कहना और परमेश्वर का धन्यवाद करना भी न छोड़ें, और इससे सन्तुष्ट रहें कि उसने हमें ऐसी प्रबन्ध-सामग्री दी है जो हमारे लिए भली-भाँति पर्याप्त होनी चाहिए, और जो कार्य उसने आरम्भ किया है उसे पूरा और सिद्ध करने की बाट जोहें, क्योंकि उसका पवित्र आत्मा हममें इस प्रकार इस प्रतिज्ञा के साथ बसा हुआ है कि हम अन्त तक कभी उससे रहित न होंगे। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें यहाँ कैसे प्रोत्साहित किया जाता है कि हम लगाम अपने दाँतों में दबाकर ऐसी दृढ़ता से चलें कि संसार के सब दुःख हमें अपनी दौड़ पर चलने से तब तक न रोकें जब तक हम लक्ष्य तक न पहुँच जाएँ।

और इसी कारण सन्त पौलुस जानबूझकर छुटकारे की बात करता है। यह सच है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा छुड़ाए गए हैं, और वह हमारे छुटकारे के लिए हमें दिया गया है, जैसा अन्य स्थलों में कहा गया है, [1 कुरिन्थियों 1:30; 1 तीमुथियुस 2:6] पर उसका प्रभाव और पूरा भोग हमें अब तक नहीं मिला। इसलिए दोहरा छुटकारा है— एक जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में पूरा हुआ, और दूसरा जिसकी हम बाट जोहते हैं और जो उसके दोबारा आने पर हमें दिखाया जाएगा। इसीलिए सन्त पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय [पद 23] में कहता है कि यद्यपि हम कराहते हैं और पीड़ा में दबे हैं, फिर भी हमें इससे निराश नहीं होना चाहिए और न इसे अनोखा समझना चाहिए, क्योंकि सारी सृष्टि (वह कहता है) हमारा साथ देती है, और ठीक प्रसव-पीड़ा से तड़पती स्त्री के समान है। क्योंकि हम देखते हैं कि आदम के पाप के कारण सारा संसार नाश के अधीन है। तो जब ऐसा है, तब हम अपनी कराहों में डगमगाएँ नहीं, वरन् अपनी भावनाओं को संयम में रखें, कि हम इसी से सन्तुष्ट रहें कि हमारा छुटकारा हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में हमारे लिए मोल ले लिया गया है, और हम उस पर भरोसा रखें कि जो कार्य उसने अपने में हमारे लिए पूरा किया है वही वह हममें और हमारी देहों में भी पूरा करेगा। तो सन्त पौलुस का आशय यह है कि जितने समय हम इस क्षणभंगुर जीवन से उठा लिए जाने और सब दुःखों से, विशेषकर पाप की दासता से, जो सबसे भारी बोझ है, छुड़ाए जाने की बाट जोहते हैं, परमेश्वर का आत्मा हमारी गारण्टी है। इसलिए जब तक हम उन सब बातों से छुड़ाए न जाएँ, तब तक हमें इसी पर टिके रहना चाहिए कि परमेश्वर का आत्मा हममें बसता है।

और ‘मोल लिए हुए छुटकारे’ के विषय में, इसे खरीदा हुआ छुटकारा भी समझा जा सकता है, क्योंकि यह बोलने की बहुत सामान्य रीति है; जैसे ‘प्रतिज्ञा का आत्मा’ कहने का अर्थ है वह आत्मा जो सब प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है; या ‘परमेश्वर के भय का आत्मा’, क्योंकि वही हमें उसकी धार्मिकता का आज्ञाकारी बनाता है। उसी रीति से जब वह मोल लिए हुए छुटकारे की बात करता है, तो कहा जा सकता है कि यह वह छुटकारा है जो हमारे लिए मोल लिया गया, यह दिखाने के लिए कि यदि हम इसका प्रभाव अपने भीतर अनुभव करें, कि हमें उन बातों के विषय में कोई सन्देह न हो जो यीशु मसीह ने हमारे लिए की हैं, तो हमें यह भय न करना चाहिए कि उसने व्यर्थ दुःख उठाया। क्योंकि निश्चय ही उसका दुःख उठाना हमारे लिए किसी काम का न होता, यदि वह हम तक न पहुँचता कि हमारे लाभ का कारण बने और हम उसका आनन्द उठाएँ। इसलिए, हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में जो मोल लिया गया, वह यही है।

और फिर भी, इसी बीच, जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हमें अपने आप को संयम में रखना चाहिए, ताकि हम अपनी कृतघ्नता के कारण उस उपकार को, जो परमेश्वर हमें देता है, ठुकरा न दें, अर्थात् क्लेशों में हमारा आनन्द मनाना—क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा उद्धार निश्चित है—या परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत और उसकी निन्दा न करें, वरन् शान्ति से चलते रहें जब तक हम अपनी वर्तमान दासता से छुड़ाए न जाएँ, और जब तक अपने प्रभु यीशु मसीह में इकट्ठा होकर पूरी तरह स्वतन्त्र न किए जाएँ।

अब आओ, हम अपनी भलाई करनेवाले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका अनुभव और भी अधिक कराए, यहाँ तक कि हमें अपने भीतर की सड़ाहट से पूरी घृणा हो जाए, ताकि हम, यह पाकर कि हममें सब प्रकार के अधर्म के अथाह गड्ढे के सिवाय और कुछ नहीं, उसकी धार्मिकता की शरण लेना और उसे उसके स्रोत पर खोजना सीखें, और यह मानें कि वह हमारे प्रति दयालु पिता प्रमाणित हुआ है, इसमें सन्देह न करते हुए कि इसके द्वारा उसका यह भी अभिप्राय था कि हमें निश्चय दिलाए कि उसने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें गोद ले लिया था, ताकि हम सच्ची दृढ़ता के साथ उसे पुकारते रहें और ऐसा करना कभी न छोड़ें।

और इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता।

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