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केवल यीशु मसीह के बलिदान से निर्दोष ठहराए जाना - गलातियों 5:1-3
केवल यीशु मसीह के बलिदान से
निर्दोष ठहराए जाना
इसलिये इस स्वतंत्रता में, जिसके लिये मसीह ने हमें स्वतंत्र किया है, स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो। देखो, मैं पौलुस तुम से कहता हूँ कि यदि तुम खतना कराओगे, तो मसीह से तुम्हें कुछ लाभ न होगा। फिर भी मैं हर एक खतना करानेवाले को जताए देता हूँ, कि उसे सारी व्यवस्था माननी पड़ेगी। - गलातियों 5:1-3
पिछली बार हमने देखा कि कलीसिया में स्थायी स्थान पाने के लिये हमें प्रभु यीशु मसीह को अपनी नींव के रूप में पाना आवश्यक है। बहुत से लोग परमेश्वर की सन्तान होने का दावा करते हैं, परन्तु वे उस उत्तम बीज के द्वारा, जो प्रकाश देता है और हमें परमेश्वर के यहाँ ग्रहणयोग्य बनाता है, कभी नया जन्म नहीं पा सके हैं; तब परमेश्वर हमें अपनी सन्तान के रूप में स्वीकार करता है। यदि हम सचमुच प्रभु यीशु मसीह से जुड़ना चाहते हैं, तो हमें सुसमाचार के शुद्ध सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए। वह हमारा सिर और हमारा मध्यस्थ होकर हमें पिता परमेश्वर से जोड़ता है। पौलुस दासी की सन्तान और स्वतन्त्र स्त्री की सन्तान, दोनों का उल्लेख क्यों करता है, इस विषय में हम पहले ही कह चुके हैं। वह हमें बताता है कि जो लोग अपने भले कामों के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हैं, वे अपने आपको प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से काट रहे हैं। क्योंकि वे अपने आपको उस काम के लिये बाँध रहे हैं जो असम्भव है, अर्थात् परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करके उसे सन्तुष्ट करना। जबकि हम इतनी निर्बलताओं से भरे हैं कि व्यवस्था की छोटी से छोटी बात को भी पूरा नहीं कर सकते, उस सिद्धता तक पहुँचना तो दूर रहा जो व्यवस्था माँगती है। इसीलिये पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि जो स्वतन्त्रता हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिये मोल ली है, उसे हमें बनाए रखना चाहिए।
अब वह निश्चय ही यहाँ विधि-विधानों की ओर संकेत कर रहा है, तो भी हमें सदा व्यवस्था के मूल उद्देश्य और मुख्य लक्ष्य की ओर लौटना चाहिए। क्योंकि यदि व्यवस्था का सम्बन्ध केवल किसी विशेष पर्व को मनाने या किसी विशेष प्रकार के मांस से परहेज करने से होता, तो यह इतने महत्त्व की बात न होती कि कलीसिया में इतने विवाद उठ खड़े हों। फिर भी पौलुस ने कभी तुच्छ या महत्त्वहीन बातों में अपना समय नहीं गँवाया। उसकी चिन्ता सिद्धान्त की थी; क्योंकि अन्य बातों को अनिवार्य ठहराने का अर्थ अनगिनत लोगों को उद्धार की आशा से बाहर कर देना था। यदि किसी विधि की उपेक्षा करना प्राणघातक पाप है, तो चूकने पर मैं अपराधी ठहरता हूँ, और ऐसे पाप का कोई उपाय नहीं रहता। परमेश्वर मेरा न्यायी है और मुझसे लेखा लेगा; छुटकारे का कोई मार्ग नहीं। यह सच है कि हम सबको व्यवस्था का पालन करना है, फिर भी यदि अपनी कमियों के कारण हम प्रभु यीशु मसीह के पास दौड़ जाएँ, तो उपाय है। सचमुच, उसने हमारी स्वतन्त्रता मोल लेने के लिये अपने आपको व्यवस्था के अधीन किया। उसने हमें छुड़ाने के लिये हमारा श्राप अपने ऊपर ले लिया। इसलिये यदि हम तरह-तरह के अतिरिक्त दायित्व थोप दें, और कहें कि यह या वह करना पाप है, तो हमारा प्रभु यीशु मसीह ऐसी बातों के लिये उस रीति से उपाय न ठहरेगा जैसा मैं कह चुका हूँ। इसके बजाय हम छुटकारे की आशा के बिना श्राप के अधीन ही बने रहेंगे। इसलिये पौलुस के पास गलातियों को यह समझाने का उचित कारण है कि वे स्थिर रहें और अपने आपको फिर दासत्व में लौटने न दें। क्योंकि इससे वे एक अनमोल वरदान खो देंगे, परमेश्वर के अनुग्रह से गिर जाएँगे और प्रभु यीशु मसीह से, जो उद्धार और अनन्त सुख का एकमात्र स्रोत है, अलग हो जाएँगे।
अब इस वरदान के स्वरूप और गुणों का अनुभव करने के लिये हमें परमेश्वर में अपने आपको छिपाना सीखना चाहिए। यहाँ मैं एक उदाहरण देता हूँ। यदि मनुष्यों द्वारा हम पर कुछ नियम और दायित्व रखे जाएँ, तो वे परमेश्वर के सामने हमारी स्वतन्त्रता को कम नहीं करते। जो कुछ व्यवस्था और सुव्यवस्था से सम्बन्ध रखता है, और जो वर्जित या आज्ञापित है, उसका पालन सामान्य हित के लिये होना चाहिए। यदि कोई कर्त्तव्य माँगा जाता है, तो हमें उसे करना चाहिए, और इस प्रकार समाज में एक दूसरे की सेवा करनी चाहिए। इसलिये ध्यान दो, कि जो बातें व्यवस्था और सुव्यवस्था से सम्बन्ध रखती हैं, वे चाहती हैं कि हम एकता और मेल के साथ व्यवहार करें, और ऐसे दृढ़ बन्धन में रहें कि अपने पड़ोसियों की सेवा करें, और स्वार्थ से केवल अपने हित को न देखें। परन्तु जब आत्मिक स्वतन्त्रता की बात आती है, तो उसके स्वरूप और प्रभावों का अनुभव करने के लिये हमें भीड़ से अलग होना पड़ता है। मैं कहता हूँ कि हम में से हर एक को व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के सामने आना है, क्योंकि एक दिन हम स्वर्गीय न्यायी के सामने लेखा देंगे। हमें अपने भीतर जाँचना और पूछना चाहिए कि मैं परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने अपने आपको कैसे प्रस्तुत करूँ? यदि मेरे जीवन को व्यवस्था के अनुसार जाँचा जाए, तो हाय मुझ पर! मैं असंख्य अपराधों का दोषी हूँ; ऐसा कि यदि लाख मृत्युएँ भी हों तो वे मेरे किए हुए पापों का दण्ड चुकाने के लिये पर्याप्त न होंगी। फिर भी परमेश्वर मुझ पर अपनी कृपा दिखाना चाहता है, और प्रभु यीशु मसीह के नाम से मुझे दया के साथ ग्रहण करना चाहता है। इसलिये जब मैं उसके पास जाता हूँ, तो सिर उठाकर आ सकता हूँ, क्योंकि यीशु मसीह के बलिदान के द्वारा, जिसने मेरे पाप का मूल्य चुकाया और मुझे पूरा छुटकारा दिया, मैं निर्दोष और क्षमा किया हुआ ठहराया गया हूँ। यही पहली बात है, यही वह रीति है जिससे मुझे परमेश्वर की सेवा करनी है। निस्सन्देह, मुझे अपना जीवन उसे समर्पित करना है, परन्तु आरम्भ कैसे करूँ? क्योंकि जो सिद्धता वह माँगता है वह मैं उसके पास नहीं ला सकता, उसका सौवाँ भाग भी नहीं! तो भी परमेश्वर मुझे सहता है, और जो अपूर्ण और निर्बल है, यहाँ तक कि जो पाप से मिला हुआ है, उसे भी ग्रहण और स्वीकार करता है। क्यों? क्योंकि वह प्रभु यीशु मसीह के नाम से मुझे अपनी ही सन्तानों में से एक जानकर ग्रहण करता है। मैं कहता हूँ, यदि हम इस स्वतन्त्रता के फल को, जिसकी बात पौलुस करता है, जानना और अनुभव करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के सामने इसी रीति से आना है।
जब पौलुस कहता है, ‘दासत्व के जूए में फिर से न जुतो’, तो वह दिखाता है कि इससे पहले, जब हमें सुसमाचार पर विश्वास न था और हम परमेश्वर के पुत्र के दुःखभोग और मृत्यु का अर्थ नहीं समझते थे, तब हम बन्दियों के समान कसकर बँधे थे और कोई स्वतन्त्रता न भोगते थे। सचमुच, यदि यीशु मसीह बीच में आकर पिता परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ न बनता, तो हमारे प्राण अब भी पीड़ित और संतप्त रहते। क्योंकि हम में से कोई ऐसा नहीं जो यह न माने कि वह दोषी से भी बढ़कर है, और यदि प्रभु यीशु मसीह ने हमें न बचाया होता तो हम इसी दशा में निराशा में डूबे रहते। यदि हम कभी न जानते कि परमेश्वर हम पर कितना दयालु होगा, कि वह हमें शान्ति देगा, और हमें उसे पुकारने का साहस भी, क्योंकि यीशु मसीह हमारे आगे जा चुका है, तो हमारा शोक कैसा होता! दूसरी ओर, यदि हम यह न जानें कि परमेश्वर ने सचमुच हमें ग्रहण किया है और उस आज्ञाकारिता से, जो हम (बड़ी निर्बलता के साथ) उसे देना चाहते हैं, सन्तुष्ट है, तो हम एक दूसरी रस्सी से बँधे हैं, जो हमारा गला घोंट देगी। सब अविश्वासियों की यही दशा है। अब सुसमाचार ने दिखा दिया है कि परमेश्वर हम से प्रेम करता है, और अपनी भलाई से हमें अपनी सन्तान के रूप में सेंत-मेंत ग्रहण करता है। इसलिये पौलुस हमें चेताता है कि हम मनुष्यों के अत्याचार से कुचले न जाएँ, परन्तु व्यवस्था की उन कठोर बाध्यताओं से छुड़ाए जाएँ जो हमें दासत्व में डालती हैं। अब जब यीशु मसीह ने हमें स्वतन्त्र किया है, तो हमें अपनी इस विशेष स्थिति को थामे रहना है।
अब हम उस कारण पर विचार करें जो वह देता है: ‘देखो, मैं पौलुस तुम से कहता हूँ कि यदि तुम खतना कराओगे, तो मसीह से तुम्हें कुछ लाभ न होगा।’ यह कथन, जो बताता है कि खतना मनुष्यों को हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा मोल लिए गए उद्धार में किसी भी भाग से काट सकता है, बहुत कठोर है। तथापि हमें सबसे पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि जब पौलुस यहाँ खतने की बात करता है, तो उसका संकेत उस क्रिया की ओर नहीं, उसके उद्देश्य की ओर है। जो भरमानेवाले गलातियों के बीच घुस आए थे और सुसमाचार की शुद्धता को बिगाड़ रहे थे, वे चाहते थे कि वे यह मानें कि व्यवस्था का पालन करने के लिये मनुष्य का खतना होना आवश्यक है। पौलुस यहीं रुककर कहता है कि यदि हम परमेश्वर के लिये यह काम करने को विवश और बाध्य किए जाएँ और उसके साथ इस वाचा में प्रवेश करें, तो यीशु मसीह से हमें लाभ न होगा। यह हमारे ध्यान के योग्य है। आज हम कहते हैं कि लोगों को कुछ नियम मानने की आज्ञा देना, इस आधार पर कि उनकी चूक प्राणघातक पाप है, नारकीय अत्याचार है! वैसे ही, केवल इसलिये कुछ वर्जित करना कि वह मनुष्यों को नहीं भाता, अत्याचार है। किसी ने यह ठहराया कि हम लेंट मनाएँ, और किसी और ने यह कि हम वर्ष में एक बार अपने सब पाप मान लें। अब यदि हम इसका विरोध करें, तो पोप के अनुयायी, जैसा मैं कह चुका हूँ, क्रोध से पागल हो उठेंगे, और यह नहीं सोचेंगे कि हम इस मत पर इतना बल देने के लिये क्यों उभारे गए हैं। क्यों? क्योंकि वे बाहरी क्रिया से आगे नहीं देखते। फिर भी हमें और गहराई से देखना चाहिए। पोप के अनुयायी आज्ञा देते हैं कि हम प्राणघातक पाप के दण्ड पर पालन करें, जिससे हम समझें कि परमेश्वर को ग्रहणयोग्य बनने के लिये यह हमारा दायित्व है; हमने कर्त्तव्य निभाने के आधार पर उसके साथ वाचा बाँधी है। पोप-तन्त्र में भरे हुए शैतानी सिद्धान्तों के अनुसार, जिसने अपना कर्त्तव्य पूरा किया उसने परमेश्वर को अपना कर्ज़दार बना लिया। हम अनुग्रह केवल अपनी योग्यता से पा सकते हैं, और अपने पापों और अधर्मों की स्मृति को हम अपने पाप का प्रायश्चित्त करके, और इस प्रकार परमेश्वर के क्रोध को शान्त करके, मिटा सकते हैं। इसलिये हम देखते हैं कि यदि हम अपना क्षमादान आप पा सकें, तो यीशु मसीह का कोई मूल्य नहीं रह जाता और वह हमें किंचित् भी लाभ नहीं पहुँचा सकता। क्यों? क्योंकि यदि हम उसकी मृत्यु के बलिदान के द्वारा अपने पापों की क्षमा नहीं चाहते, तो यीशु मसीह हमारी धार्मिकता नहीं है। हमें निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर हमारा पिता है, और प्रभु यीशु मसीह के द्वारा गोद लिए जाकर हम शान्त विवेक से उसे पुकार सकते हैं।
अब यह सच है कि गलातियों को भरमानेवाले अब भी चाहते थे कि यीशु मसीह जगत का उद्धारकर्ता जाना जाए। वे व्यवस्था और सुसमाचार दोनों को मानते थे, इसलिये उन्होंने वे सब पदवियाँ थामे रखीं जो यीशु मसीह की थीं। तथापि वे मानते थे कि हमारे उद्धार का एक भाग परमेश्वर को शान्त करने के साधन के रूप में योग्यता से कमाया जाना है। इस प्रकार यीशु मसीह ने केवल वह पूरा किया जो घटता था। परन्तु इससे बेचारे व्याकुल विवेकवाले प्राण अब भी वैसे ही रहते हैं। आज पोप-तन्त्र में भी यही बात है। पोप अपने याजकवर्ग की सारी गन्दगी के साथ उन भरमानेवालों से, जिनके विरुद्ध पौलुस यहाँ तर्क करता है, कुछ भिन्न नहीं, सिवाय इसके कि वे अपनी धारणाओं को आगे बढ़ाने और स्वीकार्य बनाने के लिये मूसा की व्यवस्था का अधिकार लेते थे। जिन लोगों की पौलुस यहाँ आलोचना करता है वे यह तर्क दे रहे थे कि उन्हें खतने की विधि का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर एक का खतना होना आवश्यक है। क्यों? ताकि परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहरें; कि अपना कर्त्तव्य निभाकर वे उसे ग्रहणयोग्य हों। तब यीशु मसीह की क्या भूमिका है? वह एक प्रकार की पूरक है; वे यह नहीं कहते कि उसका कोई प्रयोजन नहीं, परन्तु यह कि जब मनुष्य अपने आपको निर्दोष और निरपराध ठहरा चुकें, तब वह अन्तर को पूरा करता है, और केवल तब जब उन्हें अतिरिक्त सहायता चाहिए! पौलुस के विरोधी भरमानेवालों की बोली यही थी। और पोप? मूसा की विधिक व्यवस्था के स्थान पर वह कहता है कि हमें उसका आदेश मानना है, और उसकी परिषदें जो ठहराएँ, या इस या उस व्यक्ति के निर्णय। वह ऐसे निर्देशों को प्राणघातक पाप के दण्ड पर अनिवार्य बना देता है। यदि हमने परमेश्वर को अप्रसन्न किया है, तो वह कहता है कि परमेश्वर की आज्ञा के पालन के बदले हम प्रायश्चित्तों के द्वारा अपने आपको छुड़ा सकते हैं। उसका प्रायश्चित्त का विचार यह नहीं कि जो व्यवस्था में आज्ञापित है उसे पूरा किया जाए, परन्तु जितना माँगा गया है उससे भी अधिक करना; इसी रीति से हम परमेश्वर की दृष्टि में निर्दोष और उसके ग्रहणयोग्य ठहरते हैं। इसलिये हम देख सकते हैं कि पोप ने वही शैतानी सिद्धान्त थाम रखा है जो इन लोगों ने चलाना चाहा था। सचमुच, उसका पाप तो और भी बुरा है, क्योंकि अपने अधिकार के लिये वह मूसा की व्यवस्था को नहीं, बल्कि अपनी ही मनगढ़न्त बातों को, जो उसके अपने मन में गढ़ी गई हैं, आधार बनाता है!
पौलुस इस सबका विरोध करता है, और कहता है कि यदि वे परमेश्वर के साथ ऐसी वाचा चाहें तो मसीह से उन्हें कुछ लाभ न होगा। क्यों? क्योंकि मानो वे मसीह को बाँट रहे हैं, और जो पूरा उसका अपना है उसका आधा ही उसे दे रहे हैं। वह हमारी धार्मिकता है और वही हमारी शान्ति है (1 कुरिन्थियों 1:30; इफिसियों 2:14)। इस शब्द ‘धार्मिकता’ का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर हमें प्रभु यीशु मसीह के द्वारा सेंत-मेंत ग्रहण कर सकता है। यदि हम कहें कि हम अपनी योग्यता से परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं, और यीशु मसीह केवल हमारी घटी को पूरा करता है, तो क्या हम उसे दो टुकड़े नहीं कर रहे, और जहाँ तक हमारा वश है उसके अंग-अंग अलग नहीं कर रहे? हमें ऐसा नहीं करना है, और न दूसरों को करने देना है। इसके अतिरिक्त, हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे पापों का मूल्य चुकाया है, और परमेश्वर से मेल-मिलाप होने का इसके सिवाय कोई उपाय नहीं कि हम जानें कि उसने हमें अनन्त मृत्यु के दण्ड से छुड़ाया और बचाया है। यदि हम समझें कि अपनी योग्यता से हम अपना छुटकारा मोल ले सकते हैं, और यह मानें कि शेष उसकी ओर से एक छोटे जोड़ के रूप में आएगा, तो हम खुलेआम उसका उपहास कर रहे हैं, जो घृणित है। हम देखते हैं कि पौलुस क्यों कहता है कि ऐसी परिस्थिति में यीशु मसीह से लाभ न होगा; वह चाहता है कि मनुष्य ऐसा यीशु मसीह गढ़कर, जो अपना काम आंशिक ही पूरा करता है, अपने आपको धोखा देना छोड़ दें। नहीं; हमें उसे वैसा ही ग्रहण करना है जैसा पिता परमेश्वर ने उसे हम पर प्रगट किया है। वह हमें इसलिये दिया गया है कि हम और किसी पर भरोसा न रखें, परन्तु केवल उसी की शरण लें। हमें इतने में सन्तुष्ट रहना है कि वह हमारा सिर है, और हमें अपना सर्वस्व लेकर पिता परमेश्वर की सेवा करनी है, यह जानते हुए कि यद्यपि वह कुछ भी नहीं ठहरता, तो भी प्रभु यीशु मसीह में हमारे गोद लिए जाने के कारण वह उससे प्रसन्न है। यही बात हमें और हमारे सब कामों को परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बनाती है। मैं कहता हूँ, हमें, यद्यपि हम निकम्मे हैं, और हमारे कामों को, यद्यपि वे व्यर्थ हैं। परमेश्वर उनसे प्रसन्न है क्योंकि वह यह हिसाब नहीं लेता कि हम क्या हैं, या हमने क्या किया है, और न हमारे कामों के गुण या मात्रा का। उसकी रुचि इसमें है कि हम उसके एकलौते पुत्र की देह के अंग होकर उसके पास आए हैं, और उस बलिदान पर, जिससे उसने हमें मोल लिया, पूरी रीति से टिके हुए हैं।
इसीलिये पौलुस इसी बात की और अधिक पुष्टि के लिये यह जोड़ता है, ‘फिर भी मैं हर एक खतना करानेवाले को जताए देता हूँ, कि उसे सारी व्यवस्था माननी पड़ेगी।’ वह कहता है कि यदि हम इस रीति से अपने आपको धर्मी ठहराना चाहें, तो मसीह से हमें लाभ न होगा। यहाँ हमें उस बात का बहुत सीधा और स्पष्ट कथन मिलता है जो पौलुस ने पहले कही थी, और हमें इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि लोगों को यह समझाना कठिन है कि यदि वे मसीह का उपयोग केवल अंश में करना चाहें तो वह उनके लिये बिलकुल निकम्मा है। क्योंकि यद्यपि तुर्कों और अन्यजातियों ने यीशु मसीह को जाना भी नहीं, फिर भी उनका मत पोप के अनुयायियों के मत जैसा ही है, और हम उनके बीच बहुत समानता पाएँगे। क्योंकि इस जगत में कभी कोई अन्यजाति ऐसी नहीं हुई जिसने यह माना हो कि हम परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। वे सदा अपने भले कामों पर घमण्ड करते आए हैं और यह समझते आए हैं कि उनका उद्धार उन्हीं पर निर्भर है। इसलिये अन्यजाति सदा यही मानते आए हैं कि वे परमेश्वर की दृष्टि में अनुग्रह पा सकते हैं और कृपा के योग्य ठहर सकते हैं। इसी कारण उन्होंने उसके लिये बलिदान चढ़ाए, यह न जानते हुए कि वे प्रभु यीशु मसीह का एक प्रतिरूप हैं, इस आशा से कि परमेश्वर के लिये प्रायश्चित्त ला सकें। यहूदियों ने भी, व्यवस्था के सच्चे अर्थ को अशुद्ध और भ्रष्ट करके, यही किया। पोप के अनुयायी आज उन्हीं का अनुकरण करते हैं। उन्हें निश्चय है कि परमेश्वर उनके कामों को ग्रहण करता है, और किसी प्रकार उनका ऋणी है। वे उसके साथ ऐसी वाचा बाँधते हैं जिसके अनुसार वह उनके कामों को ग्रहण करने को विवश है, चाहे वे उसके प्रति चूक गए हों। (क्योंकि एक ओर तो वे सहज ही मान लेते हैं कि वे सब कुछ सिद्धता से नहीं कर सकते, परन्तु दूसरी ओर वे दावा करते हैं कि जितना परमेश्वर ने माँगा है उससे अधिक कर सकते हैं, और यही मूल्य के रूप में काम आता है!) अब, क्योंकि मनुष्यों को यह समझाना कठिन है कि यीशु मसीह आंशिक भुगतान के रूप में काम नहीं आ सकता, इसलिये हमें इस खण्ड पर और भी अधिक ध्यान देना चाहिए, जहाँ पौलुस हमें बताता है कि जिसका खतना हुआ है वह सारी व्यवस्था पूरी करने का कर्ज़दार है।
पहले तो, जब पौलुस खतने की बात करता है, तो वह उसकी बात नहीं कर रहा जो परमेश्वर ने ठहराया था। भला उसने अब्राहम से यह क्यों माँगा? यह उस धार्मिकता की मुहर थी जो विश्वास से मिलती है, जैसा पौलुस आप रोमियों की चौथी पत्री में कहता है (रोमियों 4:11)। जब अब्राहम का खतना हुआ, तो वह सारी व्यवस्था मानने का कर्ज़दार नहीं बना: इसके विपरीत, यह उसके पापों की क्षमा पाने के लिये था, और उसे यह निश्चय दिलाने के लिये कि परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह के नाम से उसे अपनी सन्तानों में से एक जानकर ग्रहण करता है। इसलिये खतने ने हमारे पिता अब्राहम को स्वतन्त्र किया! उसने यह क्यों किया? क्योंकि यह एक संस्कार था जो उसे परमेश्वर की सेंत-मेंत की दया का स्मरण दिलाता था। जिनसे पौलुस यहाँ तर्क करता है उन्होंने खतने को योग्यता का काम समझा, और उससे परमेश्वर की कृपा पाने की आशा रखी। उन्होंने इसे एक ऐसी वाचा के रूप में देखा जो कहती है, ‘मैंने यह करके तेरे प्रति अपनी निष्ठा घोषित कर दी है, और अब मैं प्रतिफल चाहता हूँ’। यदि हम परमेश्वर के साथ ऐसी वाचा बाँधें, तो हम सारी व्यवस्था मानने के कर्ज़दार हैं। दूसरे शब्दों में, पौलुस यह कह रहा है कि हम परमेश्वर से मोल-भाव नहीं कर सकते। मनुष्य यह न सोचें कि वे अंश में परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं, और इसलिये वह उनका ऋणी है। वह इसके लिये बाध्य नहीं कि उन्होंने यह या वह किया है, इसलिये उन्हें अपने स्वर्गलोक में आने दे। नहीं, नहीं, पौलुस कहता है, हमें स्वर्ग तक बहुत भिन्न साधनों से पहुँचना है; हमें परमेश्वर के साथ परस्पर वाचा का यह विचार नहीं रखना है, जो उसे व्यवस्था के अनिवार्य पालन के बदले हमें अनन्त जीवन देने का ऋणी बनाता है। यदि हमने यही माना है, तो हम सारी व्यवस्था मानने के कर्ज़दार हैं।
संक्षेप में, पौलुस यहाँ उस शैतानी सिद्धान्त से जूझता है जो आज पोप-तन्त्र में प्रबल है। वे आंशिक धार्मिकता की बात करते हैं, जिसका अर्थ है कि उसका एक भाग परमेश्वर के अनुग्रह से आता है, और दूसरा भाग योग्यता के कामों से पूरा किया जाता है। यह कैसे हो सकता है? आखिर यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस जगत में कभी कोई मनुष्य ऐसा नहीं हुआ जिसने परमेश्वर की सारी व्यवस्था पूरी की हो। अनुभव इसे कितने स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है! चूँकि पोप के अनुयायी इस सच्चाई को जानते हैं, क्योंकि जैसा मैं कहता हूँ, यह अत्यन्त प्रत्यक्ष है कि कोई मनुष्य सारी व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता, वे ढिठाई से कहते हैं, ‘अरे, हम नहीं मानते कि कोई मनुष्य हर प्रकार से पूर्णतः धर्मी हो सकता है, इसलिये यीशु मसीह अंश में हमारी धार्मिकता और हमारा छुड़ानेवाला है। शेष हम अपने भले कामों से कमाते हैं!’ पौलुस कहता है, लज्जा, लज्जा! यदि तुम समझते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा ऐसा समझौता है जिसके द्वारा तुमने उससे कुछ कमाया है, और प्रतिफल के योग्य हो क्योंकि तुमने उसे अपना ऋणी बना लिया है; यदि मैं कहता हूँ, तुम इतने लालची हो कि कहो, ‘मैंने यह किया, अब तू वह कर’, तो तुमने अपने आपको सारी व्यवस्था मानने का कर्ज़दार बना लिया है। ये मूर्खता की धारणाएँ हैं; मनुष्य यह सोचकर अपने आपको धोखा देते हैं कि परमेश्वर उनके सब कामों को ग्रहण करता है, पर जो उन्होंने नहीं किया उस सब को अनदेखा कर देगा। उदाहरण के लिये, कोई मनुष्य सौ पाउण्ड का कर्ज़दार है, और उसे चुकाना है। फिर भी वह सोचता है कि उसके महाजन को सन्तुष्ट होना चाहिए यदि वह उसे चार पाउण्ड दे दे, और कहता है, ‘लो। इसे भुगतान समझो’। फिर वह उसे छह और लाता है, फिर दस। अन्त में, बहुत झंझट के बाद, उसने देय राशि का तिहाई या चौथाई चुका दिया। अब यदि वह यह मानता कि ऐसा करके उसने अपने आपको कर्ज़ से छुड़ा लिया है, तो क्या यह दुष्ट कृतघ्नता न होती? उसके मित्र ने आवश्यकता के समय उसकी सहायता के लिये अपनी थैली खोल दी थी, और उसे सम्भालने के लिये कुछ भी नहीं बचाया। फिर भी वह कर्ज़ से मुक्त होना चाहता है क्योंकि उसने न जाने क्या लौटा दिया है, यह कहकर कि ‘लो, इसे भुगतान समझो’, जबकि उसने कुल राशि का चौथाई भी नहीं चुकाया। हम देख सकते हैं कि यह हास्यास्पद होगा। तो फिर उनका क्या, जो अपनी योग्यता के बल पर परमेश्वर के साथ हिसाब करना चाहते हैं? क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, और पौलुस ने हमारे लिये यह पहले ही उद्धृत किया है, कि जो कोई उन सब बातों को पूरा नहीं करता जो व्यवस्था में लिखी हैं, वह श्रापित है।
तो व्यवस्था के अधीन हमारे दायित्व क्या हैं? उसका सिद्धता से पालन करना। और इसे कौन पूरा कर सकता है? एक भी नहीं जो एक ही आवश्यकता को सिद्धता से पूरा कर सके। फिर भी ये कपटी क्या करते हैं, जो समझते हैं कि वे अपने ही कामों से योग्य ठहर सकते हैं? वे यह और वह करते हैं, इस आशा से कि कम से कम अंश में तो धर्मी हों। परमेश्वर इनमें से कुछ भी ग्रहण न करेगा। उसने अपने ही मुँह से जो यह वचन कहा है, उसे वह कभी वापस न लेगा, ‘श्रापित वह है जो इस व्यवस्था के वचनों को पूरा करने के लिये उन पर स्थिर नहीं रहता’ (व्यवस्थाविवरण 27:26)। इसीलिये पौलुस यहाँ आग्रह करता है कि जिसका खतना हुआ है वह सारी व्यवस्था मानने का कर्ज़दार है। मानो वह कह रहा हो, ‘अब और अपने आपको धोखा न दो। परमेश्वर के पास दो मार्ग नहीं। उसने व्यवस्था में घोषित किया है कि जो उसे सिद्धता से पूरा नहीं करता वह श्रापित है।’ एक भी सफल नहीं हुआ, इसलिये हम सब इस श्राप के अधीन हैं। केवल एक उपाय है, और वह है प्रभु यीशु मसीह के पास आना। यह मानना गलत है कि यीशु मसीह का मूल्य आंशिक है, जबकि हम न जाने अपना कुछ थामे रहें। हमें तो यह मानना चाहिए कि जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें छुड़ा न लिया और हमने अपनी सारी आवश्यकता उसी में न ढूँढ़ ली, तब तक हम श्राप के अधीन हैं। हमें यह मानना चाहिए कि हमारे सब काम व्यर्थ हैं, और परमेश्वर की दृष्टि में दुर्गन्धयुक्त हैं, जब तक वह हमें अपनी सन्तान न स्वीकार करे, और हमें विवेक की स्वतन्त्रता में चलने के योग्य न करे, यह जानते हुए कि उस क्षमा के बल पर जो उसने हमारे लिये प्राप्त की, हमारे पाप क्षमा किए गए हैं। अब परमेश्वर हमारे पापों और अधर्मों को हमारे ऊपर नहीं गिनता, क्योंकि वह हमें अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में जैसे हम हैं वैसा देखता है।
इस प्रकार पौलुस उसे सिद्ध करने निकलता है जो उसने पहले कहा था, कि जिनका खतना हुआ है उन्हें यीशु मसीह से कुछ लाभ नहीं। क्यों? क्योंकि यदि वे कामों के द्वारा उद्धार चाहते हैं, तो उन्हें वह सब पूरा करना होगा जो परमेश्वर माँगता है, टुकड़े-टुकड़े नहीं (जैसा वे कहते हैं)। उन्हें बिना कुछ छोड़े सारी व्यवस्था पूरी करनी होगी। इसे कौन कर सकता है? यदि हम सबसे पवित्र और सिद्ध मनुष्य को चुन लें जो हमें मिल सके, तो वह भी जो आज्ञापित है उसका सौवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सकता। इसलिये मनुष्य उद्धार की किसी भी आशा से वंचित हैं जब तक वे अपनी सारी ‘योग्यताओं’ से खाली होकर न आएँ और पूरी रीति से प्रभु यीशु मसीह पर न टिक जाएँ, यह जानते हुए कि जब तक वे उन सब बातों को त्याग न दें जिन पर पहले भरोसा रखते थे, तब तक वे उसके द्वारा या उसके अनुग्रह से धर्मी नहीं ठहराए जा सकते।
इसके अतिरिक्त, जब पौलुस यहाँ खतने की बात करता है, तो उसका अर्थ इन भरमानेवालों द्वारा फैलाया गया उसका भ्रान्त रूप है, जो यह समझते थे कि वे परमेश्वर की कृपा जीत रहे हैं और व्यवस्था पूरी कर रहे हैं। इसी प्रकार आज, वे सब जो पोप के आदेशों का पालन करते हैं, प्रभु यीशु मसीह के अधिकार को उलट रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि शुक्रवार को या उपवास के दिनों में मांस न खाने के कारण कोई मनुष्य दोषी ठहरेगा; फिर भी, यदि वह अन्धविश्वास से मांस से परहेज करता है, और मानता है कि ऐसा करके वह परमेश्वर की कृपा कमा रहा है, तो वह प्रभु यीशु मसीह को ठुकरा रहा है। वह हमें हमारे सहायक के रूप में दिया गया था, कि हमें पिता परमेश्वर से मिला दे। उसने हमें स्वतन्त्र किया है ताकि हमें मनुष्यों की परम्पराओं की आवश्यकता न रहे। बहुत से लोग पोप के आदेश इसलिये मानते हैं कि वे समझते हैं कि किसी विशेष दिन मांस खाना प्राणघातक पाप है, और परहेज करके वे परमेश्वर की दया के योग्य ठहरते हैं क्योंकि उन्होंने उसे सन्तुष्ट किया है। वे तो यह भी समझते हैं कि जब वे पाप-स्वीकार करते हैं, या यह या वह करते हैं, तो वे यीशु मसीह का आदर कर रहे हैं! वे मानते हैं कि स्वर्ग का द्वार उनके लिये बन्द रहेगा जब तक वे पाप-स्वीकार से उसे न खोलें, और यह सोचते हैं कि इस रीति से वे परमेश्वर को शान्त कर सकते हैं। इस प्रकार इन बातों पर विश्वास करके वे अपने आपको (जैसा मैं कह चुका हूँ) कर्ज़दार बना लेते हैं, और उस अनुग्रह को ठुकरा देते हैं जो प्रभु यीशु मसीह ने उनके लिये प्राप्त किया।
अब हम इस शिक्षा को अपने लाभ के लिये लागू करें। पहली बात, हम जानते हैं कि परमेश्वर ने सुसमाचार में घोषित किया है कि जब कभी हम उसके पास आएँ (जब तक कि हम हवा में हिलते सरकण्डों के समान व्याकुल और विचलित न हों), तो हमें उसे अपना पिता जानकर, जिसने हमें अपनी सन्तान बना लिया है, खुले मन और निडरता से पुकारना है। दूसरी बात, उसे प्रसन्न करने का हमारे लिये एकमात्र मार्ग यह है कि हमारे पाप क्षमा किए जाएँ। कैसे? यीशु मसीह ने पूरा मूल्य चुका दिया है, और हमें पूर्ण क्षमा दी है। तथापि हम जानते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि हम लगाम उतार दें और अपनी इच्छा पूरी करें, जंगली पशुओं के समान जो परमेश्वर से वश में नहीं किए जा सकते। नहीं, बल्कि हमें स्वतन्त्रता से, उसकी आज्ञा मानने की इच्छा लेकर, उसके पास आना है। हमें इसका निश्चय चाहिए कि वह हमें अपनी सन्तान जानकर ग्रहण करता है और हमें इतनी करुणा से सँभालता है कि जो हम करते हैं, यद्यपि वह निकम्मा है, उसे हमारे प्रति अपने पिता-तुल्य प्रेम के कारण स्वीकार करता है। यदि हमें यह निश्चय न हो, तो परमेश्वर की सेवा का विचार हमें दाँत पीसने पर विवश करेगा। परन्तु यदि हमें विश्वास हो कि परमेश्वर हम पर कृपादृष्टि रखता है; कि यद्यपि हम निर्बल हैं और उसकी स्वीकृति के योग्य कुछ नहीं कर सकते, तो भी वह प्रभु यीशु मसीह के नाम से हमें ग्रहण करता है, तो हम अवश्य साहस से भर जाएँगे। हम जहाज़ के उस पाल के समान होंगे जो हवा से तनकर भर गया हो! इस प्रकार, जब हम जानेंगे कि परमेश्वर हम से प्रसन्न है और हमारे कामों को ग्रहण करता है, और यह नहीं चाहता कि हम विवश होकर दासत्व में पड़ें, तब हमारे हृदय उसकी आज्ञा मानने को दौड़ेंगे, उस जहाज़ के समान जिसे उसका पाल आगे बढ़ाता है। वह प्रसन्न है कि हम उसकी सन्तान हैं, और कि हम उसकी आज्ञा मानना चाहते हैं। यह जानकर हम अपने परमेश्वर की सेवा और भी अधिक उत्साह से कर सकते हैं। उसके अनुग्रह को अपनी नींव बनाकर, हम उसके आनन्द से इतने भर जाते हैं कि स्तुति का बलिदान चढ़ा सकें। उसी प्रकार, प्रार्थना में उसे ढूँढ़कर हम जान सकते हैं कि वह हमें उत्तर देगा, और बदले में, उन अनमोल दानों के लिये, जो वह प्रतिदिन हमें देता है, उसका धन्यवाद कर सकते हैं।
अब आओ, हम अपने महान परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने पापों को मानें, और प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए, कि हम सचमुच दीन हों और अपने आपको पूरी रीति से प्रभु यीशु मसीह को दे दें। उसके पास आकर हम सुसमाचार के विश्वास में बने रहें, और किसी रीति से पीछे न हटें। जब सच्चे पश्चाताप की आवश्यकता हमें छुए, तब वह हमारी निर्बलता में हमें सँभाले। हम उसके सामने काँपें और कराहें, उस दिन तक जब वह हमें इस नश्वर देह से, जो बन्दीगृह के समान हमें पाप के दासत्व में जकड़े रखती है, छुड़ाएगा। इस प्रकार हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर और हमारे स्वर्गीय पिता, इत्यादि
