अध्याय 15

श्राप कैसे आशीष बन जाता है - गलातियों 3:13-18

Thirty-Six Select Sermons · John Calvin

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श्राप कैसे आशीष बन जाता है - गलातियों 3:13-18

मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, "जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है"; ताकि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुंचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है... - गलातियों 3:13-18

जैसा कि हम देख चुके हैं, यदि हमारे उद्धार की एकमात्र आशा इस शर्त पर टिकी होती कि हम अपना कर्तव्य पूरा करें, तो हम सब दोषी ठहरते; क्योंकि हम सब अनेक प्रकार से चूक गए हैं और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में दोषी हैं। वास्तव में, हम में जो सबसे अधिक पवित्र है वह भी कभी यह दावा नहीं कर सकता कि वह सिद्धता की अवस्था तक पहुंच गया है, कि वह फिर कभी नहीं गिरेगा, और सब निर्बलता से मुक्त है! इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जब परमेश्वर हम से लेखा मांगेगा तब हम सब नाश और दोषी ठहरेंगे। मनुष्य की सच्ची दशा यही है, चाहे वह अपने विषय में कितना ही ऊंचा विचार क्यों न रखता हो! इसलिए हमें उस श्राप से बचने का कोई उपाय चाहिए जिसके अधीन हम हैं। नहीं तो प्रतिदिन परमेश्वर का वचन हमारे कानों में पड़ने से हमें क्या लाभ होगा? वह तो हमें अनन्त मृत्यु की ओर और निकट धकेलेगा। अतः इसलिए कि परमेश्वर का वचन हमें लाभ पहुंचाए और उद्धार पाने में हमारी सहायता करे, हमें मानव जाति पर सुनाए गए दण्ड की आज्ञा से बचने का मार्ग खोजना होगा। पौलुस यहां हमें वह मार्ग दिखाता है: "मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया।" वह हमें दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का काठ पर लटकना व्यर्थ नहीं था, क्योंकि उसने उन सब का श्राप उठाने के लिये दुख सहा जिन्हें वह उद्धार के लिये बुलाने वाला था।

जैसा कि हम कह चुके हैं, हम सब इस श्राप के अधीन हैं, जिसका अर्थ यह है कि हमारे प्रभु के लिये आवश्यक था कि वह हमारे पाप का बोझ अपने ऊपर ले। मूसा की व्यवस्था में लिखा है: "जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है" (व्यवस्थाविवरण 21:23)। प्रभु ने आज्ञा दी थी कि मरे हुओं की लोथें आंखों के सामने से हटा दी जाएं, क्योंकि मनुष्य की देह को इस प्रकार अपवित्र होते देखना लज्जा की बात थी, इसलिये वह चाहता था कि उसे हटा दिया जाए। तौभी जब परमेश्वर ने काठ पर लटकाए जाने वाले सब पर यह श्राप ठहराया, तब वह भली-भांति जानता था कि उसके एकलौते पुत्र के साथ क्या होने वाला है। क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने ऐसी मृत्यु न संयोग से सही और न मनुष्य की सनक के अनुसार। यह सच है कि उसे अविश्वासियों ने क्रूस पर चढ़ाया, परन्तु यह परमेश्वर की इच्छा से ठहराया जा चुका था (प्रेरितों के काम 2:23; 4:28)। जैसा लिखा है, परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं छोड़ा, वरन् हमारे लिये उसे मृत्यु के लिये दे दिया। वास्तव में, यदि उसकी मृत्यु केवल यहूदा ने ठहराई होती, जो उसे दुष्टता से और बलपूर्वक पकड़वा ले गया, तो यह हमारे उद्धार की नींव कदापि नहीं हो सकती थी! हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने ही ऐसा ठहराया था, जैसा कि पतरस प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय की तेईसवीं आयत में और अधिक विस्तार से समझाता है, जहां वह कहता है कि जिन दुष्ट हाथों ने हमारे प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया उन्होंने उतना ही किया जितना परमेश्वर ने अपनी इच्छा में पहले से ठहरा रखा था। इसलिये जब हम पढ़ते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर चढ़ाया गया, तब हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह सब हमारे उद्धार के लिये था, क्योंकि इसी रीति से परमेश्वर हमें अपने साथ मिलाना चाहता था। इसलिये जब परमेश्वर ने कहा, "जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है", तब वह इस बात से अनजान नहीं था कि क्या होने वाला है, क्योंकि सब कुछ निश्चित और पहले से ठहराया जा चुका था।

इन दोनों बातों को सावधानी से एक साथ थामे रखना चाहिए — कि परमेश्वर ने कहा है कि जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है, परन्तु यह उसी की इच्छा थी कि उसका अपना पुत्र इस प्रकार दुख उठाए। यह क्यों? उसने हमारे स्थान पर हमारा प्रतिनिधि बनकर हमारा बोझ अपने ऊपर उठा लिया, और हमारे लिये मानो पापियों में प्रधान बन गया। यीशु मसीह हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाने के लिये श्रापित बना। पहली दृष्टि में यह कठोर और विचित्र लग सकता है कि महिमा का प्रभु, जिसके हाथ में सर्वोच्च अधिकार है, और जिसके सामने स्वर्ग के सब स्वर्गदूत कांपते और दण्डवत् करते हैं, वह श्राप के अधीन हो। परन्तु हमें स्मरण करना चाहिए कि पौलुस ने कुरिन्थियों की पहली पत्री में क्या लिखा, अर्थात् यह कि सुसमाचार की शिक्षा उस मानव जाति के लिये मूर्खता है जो अपने आप को बुद्धिमान समझती है (1 कुरिन्थियों 1:18, 23)। वास्तव में इसी रीति से परमेश्वर हमारी मूर्खता के कारण हमें दीन करता है। क्योंकि हमारे आसपास के आकाश और पृथ्वी में, यदि हम ध्यान देना चाहें, तो भली और बुद्धिमानी की बहुत शिक्षा है; फिर भी हम अन्धे हैं और सृष्टि में प्रकट परमेश्वर की बुद्धि की ओर से आंखें मूंद लेते हैं। इसीलिये उसने हमें अपनी ओर खींचने के लिये एक नया मार्ग खोला है — एक ऐसी बात के द्वारा जिसे हम मूर्खता समझते हैं! इसलिये परमेश्वर के पुत्र पर पड़े श्राप के विषय में यहां जो हम पढ़ते हैं, उसे अपनी मानवीय बुद्धि से नहीं परखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें ऐसे भेद में आनन्दित होना और परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए कि उसने हमारे प्राणों से इतना प्रेम रखा कि अपनी ओर से अपार मूल्य चुकाकर उन्हें छुड़ा लिया। इससे हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा घटती नहीं, और न पवित्र शास्त्र उसे जो प्रताप देता है वह धुंधला होता है; वरन् यह शिक्षा हमें और भी अधिक उसकी महिमा करने का अवसर देती है। हां, हम सब ऐसा ही करें, क्योंकि यहां हमारा प्रभु यीशु मसीह (जैसा पौलुस कहता है) अपने अपार प्रताप में प्रकट होने को अपने लिये लूट की वस्तु नहीं समझता (फिलिप्पियों 2:6)। उसने स्वेच्छा से अपने आप को शून्य कर दिया; उसने न केवल मनुष्य का स्वभाव धारण किया और मनुष्य बना, वरन् परमेश्वर और मनुष्य दोनों की दृष्टि में अत्यन्त लज्जाजनक मृत्यु भी सह ली। हमारे छुटकारे के लिये ऐसी चरम पीड़ा सहना उसने स्वीकार किया, तो हम उसे कितने प्रिय रहे होंगे! यदि हम इसका कुछ भी स्वाद चख सकें, तो हम उस अकथनीय अनुग्रह को सदा बड़ा मानते रहेंगे जो सारी मानवीय समझ से परे है। तौभी, यद्यपि हम इसे पूरी रीति से नहीं समझ सकते, और इसकी सौवीं बात ही थाह पा सकते हैं, फिर भी यह जानकर हमें आनन्द होता है कि हम इसका कुछ अर्थ, चाहे वह कितना ही थोड़ा क्यों न हो, समझ सकते हैं!

फिर भी, यह मनुष्य की दुष्टता और हठ को कैसा उजागर करता है! क्योंकि जब पौलुस घोषणा करता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे लिये श्राप बना, तो यह हमारे ऊपर से यों ही बह जाता है। ऐसे लोग भी हैं जो इतने भ्रष्ट हैं कि वे इसे निन्दा करने का अवसर बना लेते हैं, और जब सुनते हैं कि मसीह ने हमें किस रीति से छुड़ाया है तो सुसमाचार को ही पूरी तरह त्याग देते हैं। ऐसे लोग कहते हैं, "क्या! क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर का पुत्र, जो सब भलाई का सोता और हमें पवित्र करनेवाला है, श्रापित हुआ?" उनकी समझ में परमेश्वर ने अनुचित और अव्यवस्थित रीति से काम किया है! परन्तु (जैसा मैं कहता आया हूं) परमेश्वर को इस 'मूर्खता' तक झुकना पड़ा क्योंकि हमने उसकी बुद्धि को नहीं माना, यद्यपि मार्ग स्पष्ट दिखाई देता था; इस प्रकार वह हमारी ही अज्ञानता को प्रकट करता है! हम परमेश्वर के भेदों पर आश्चर्य ही कर सकते हैं, क्योंकि उनका अर्थ हम से छिपा और विचित्र प्रतीत हो सकता है; ऐसे आश्चर्यकर्मों के सामने हमारी बुद्धि हार जाती है और हमारे तर्क की शक्ति घबरा जाती है!

इस बात के लिये कि परमेश्वर का पुत्र हमारे लिये श्राप बना, हमारी पापमय दशा की और गहरी जांच आवश्यक है। वास्तव में हम यह समझने लगते हैं कि हम परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं, अर्थात् जब तक हमारे पाप और अधर्म प्रभु यीशु मसीह के लहू से शुद्ध न हो जाएं। क्योंकि यदि स्वर्ग के सब स्वर्गदूत भी हमारे उत्तरदायी ठहराए जाते, तो उनका चुकाया हुआ मूल्य अपर्याप्त होता। हमारे पापों का प्रायश्चित करने में समर्थ केवल प्रभु यीशु मसीह है। परन्तु जब वह इस संसार में आया, तो उसने ईश्वरीय और स्वर्गीय सामर्थ्य के प्रदर्शन से हमारा अनन्त मृत्यु का ऋण नहीं चुकाया। तो फिर वह कैसे आया? निर्बलता में; वरन् इतना ही नहीं, वह श्रापित भी हुआ। यदि ऐसा न होता, तो हमारे बोझ हमें कुचल डालते और सब अथाह कुण्ड में नाश हो जाते। जब हम समझते हैं कि परमेश्वर का पुत्र, वह निष्कलंक मेम्ना, सारी धार्मिकता का दर्पण और सोता, हमारे लिये श्रापित हुआ, तो क्या हमें अपने सब पापों का विचार करके भय से कांप नहीं उठना चाहिए, और जब तक परमेश्वर अपने अनुग्रह और अपार दया से हमें न बचाए तब तक निराशा में डूबे नहीं रहना चाहिए? इसलिये हम जान लें कि जब परमेश्वर कहता है कि उसने हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया है, तो वह हमें पूर्ण दीनता की अवस्था में लाने के लिये है। जब तक हम पहले अपने आप पर भरोसा खो न दें और अपने भीतर की बातों से लज्जित न हों, तब तक हम कभी दीन नहीं हो सकते। तब हम भयभीत और खोए हुए होते हैं, यह जानते हुए कि परमेश्वर का क्रोध हमारे ऊपर तब तक लटका है जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उपाय हम पर लागू न किया जाए। इसलिये हमारा सारा जीवन परमेश्वर की दृष्टि में घृणित है और प्रभु यीशु मसीह को छोड़ उसके साथ मेल-मिलाप का कोई उपाय नहीं, जो हम पर का श्राप दूर करता और उसे स्वयं उठा लेता है। अब, जब-जब हम यह खण्ड पढ़ें, हमें उठकर परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने खड़ा होना चाहिए, यह जानते हुए कि यदि हम जैसे हैं वैसे ही रहे तो एक गड्ढा हमें निगल जाने को तैयार है। हम अपनी खोई हुई दशा को अनुभव करें और परमेश्वर के सामने लज्जित हों। इसके अतिरिक्त, हम उस अनुग्रह की बड़ाई करें जो परमेश्वर के पुत्र ने हमारे लिये मोल लिया, और सावधान रहें कि उसके मूल्य को किसी भी रीति से घटाएं नहीं, चाहे वह श्राप ही क्यों न बना। इसके विपरीत, यह हमें उभारे कि उसकी जो भी प्रशंसा उचित है वह सब उसे चढ़ाएं, क्योंकि उसने प्रमाणित कर दिया कि हमारा उद्धार उसके लिये कितना अनमोल है।

इसके अतिरिक्त, हम अपने उद्धार की ऐसी प्रतिज्ञा-पत्र और हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम के ऐसे प्रदर्शन का उचित मूल्य जानें, और इसमें सन्देह न करें कि जब हम उसके पास आते हैं तो हम उसे ग्रहणयोग्य हैं। क्योंकि जैसा पतरस अपनी पहली पत्री में दिखाता है, उसने हमें ऐसे मूल्य पर छुड़ाया है — चांदी या नाशमान वस्तुओं से नहीं, परन्तु प्रभु यीशु मसीह से, जो हमारे लिये छुड़ौती बना (1 पतरस 1:18)। इसलिये हमें भरोसा रखना चाहिए कि जब-जब हम उसके नाम से दया मांगने आएंगे, वह हमें दी जाएगी। परन्तु यदि हम यह मानकर आएं कि हमारे पास कुछ भी पुण्य है, तो क्या लाभ? हम जानते हैं कि पिता पुत्र से कितना प्रेम रखता है, और उसकी दृष्टि में उसकी मृत्यु कितनी मूल्यवान थी। इसी कारण हम पूरा भरोसा रख सकते हैं कि परमेश्वर हमें क्षमा करेगा और हम पर कृपालु और दयालु होगा, यदि हम उस बात से लिपटे रहें जो पौलुस यहां हमें दिखाता है: अर्थात् यह कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिये कुछ भी उठा न रखा, यहां तक कि हमारा श्राप उठा लिया।

परन्तु आओ, पौलुस जो आगे कहता है उस पर ध्यान दें: "ताकि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुंचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।" अब्राहम का उल्लेख करके वह प्रकट करता है कि प्रतिज्ञा पहले उन्हीं की थी जो उसके वंश में उत्पन्न हुए। क्योंकि उद्धार का दान यहूदियों के लिये था, जब तक परमेश्वर ने और सब के लिये द्वार न खोल दिए, और अपना सुसमाचार चारों ओर न फैला दिया, कि सब लोग उस छुटकारे में सहभागी हों जो प्रभु यीशु मसीह ने मोल लिया। क्योंकि यद्यपि यह प्रतिज्ञा मूल में यहूदियों की थी और उन्हीं के लिये विशेष थी, तौभी वह सारे संसार पर लागू की गई। यह कैसे सम्भव हुआ? इसलिये कि प्रतिज्ञा का उद्गम आत्मा में था और वह रीति-विधियों के पालन पर निर्भर नहीं थी। हमें आत्मा की ओर संकेत करके पौलुस उन सब झूठी शिक्षाओं को मिटा देता है जो भरमानेवाले सिखाते थे, जो व्यवस्था और सुसमाचार को मिलाना चाहते थे। वह प्रकट कर रहा है कि अब ये सब बातें अनावश्यक हैं, अर्थात् बलिदान, खतना और इसी प्रकार की बातें। इसका यह तर्क नहीं कि व्यवस्था में जो कुछ लिखा है उसे पढ़ने से हमें लाभ नहीं हो सकता: नहीं, परन्तु उसका आचरण रद्द हो चुका है। इसी कारण हम कह सकते हैं कि आज हमारे लिये प्रतिज्ञा आत्मिक है, क्योंकि अब हमें बीते दिनों के प्रतिरूपों और छायाओं की आवश्यकता नहीं रही। अब तो हमें केवल अपने परमेश्वर से सहभागिता के लिये बुलाया और निमंत्रित किया जाता है। अब हम पूरे भरोसे के साथ उसे पुकार सकते हैं, क्योंकि उसके द्वारा गोद लिए जाकर हम पूरी रीति से प्रभु यीशु मसीह पर टिके हैं, जो एकमात्र नींव है जिसे सुसमाचार मान्य ठहराता है; हमें अपनी सब आवश्यक बातें उसी में मिलती हैं। वस्तुतः पौलुस इस खण्ड से हमें यही सिखाना चाहता है।

इस सन्देश को दृढ़ करने के लिये वह एक और बात जोड़ता है जो प्रमाणित करती है कि सुसमाचार उद्धार के मार्ग का सिद्ध प्रकाशन है, और हमें हमारे परमेश्वर के मुफ़्त अनुग्रह के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की सीधी-सादी शिक्षा के सिवा और किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं। वह हमें बताता है कि व्यवस्था उद्धार की मुफ़्त प्रतिज्ञा के चार सौ तीस वर्ष बाद दी गई। अब हम जानते हैं कि मनुष्यों के बीच किया हुआ कोई वाचा-पत्र, यदि वह प्रामाणिक है, तो चाहे कुछ भी हो अटल रहना चाहिए। इसलिये यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यवस्था उसे रद्द करने के लिये नहीं दी गई जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अब्राहम और उसके वंश से (और परिणामस्वरूप हम सब से) की थी। पहले-पहल हम पौलुस के इस तर्क पर प्रश्न उठा सकते हैं, यह सोचकर कि दूसरा अनुबन्ध पहले को रद्द कर देगा। मनुष्य जैसे ही कोई समझौता कर लेते हैं, वैसे ही उनके मन में दूसरे विचार आ सकते हैं और वे अपना मन बदल सकते हैं, जिससे पहला अनुबन्ध निरस्त और व्यर्थ हो जाता है। यही बात विधियों और नियमों पर भी लागू होती है, क्योंकि पहली व्यवस्था को दूसरी आसानी से तोड़कर अमान्य कर सकती है। परन्तु पौलुस एक ऐसी बात मानकर चलता है जिस पर विचार करना आवश्यक है, अर्थात् यदि किसी मनुष्य ने कोई प्रतिज्ञा की हो और गम्भीरता से अपने आप को किसी काम के लिये बाध्य कर लिया हो, तो वह पीछे नहीं हट सकता — वह समझौता दृढ़ बना रहना चाहिए। हां, यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से अपने पहले निर्णयों को बदलने पर राजी हो जाएं, तो वह दूसरी बात है। वास्तव में यदि हम यह ध्यान रखें कि मनुष्य मामूली सनक पर कितनी हल्के से अपने विचार बदल लेते हैं, तो ऐसा उदाहरण यहां लगभग असंगत है। परन्तु पौलुस यह मानकर चलता है कि जिस 'व्यक्ति' की बात हो रही है उसने ऐसा वाचा-पत्र बांधा है जो बना रहेगा, और जिस पर बाद में किसी भी रीति से कोई विवाद या उल्लंघन नहीं होगा। यदि पक्षों में से कोई उस मूल वाचा को तोड़ दे, तो इसे भयंकर विश्वासघात गिना जाएगा जिसे सब मनुष्य एक समान असहनीय ठहराएंगे, क्योंकि वह समझौता इतनी गम्भीरता और औपचारिकता से लिखा गया था कि उसे बिना ज़रा सा भी विरोध किए निभाना और बनाए रखना अनिवार्य है। अब क्या यह सम्भव है कि परमेश्वर में उस मनुष्य से भी कम स्थिरता हो, जो उसकी तुलना में केवल व्यर्थता है? इसलिये मैं यह निष्कर्ष निकालता हूं कि सुसमाचार की प्रतिज्ञा अटल है, क्योंकि वह मुफ़्त प्रतिज्ञा व्यवस्था के आने से पहले दी गई थी।

यह सब यदि और विस्तार से न समझाया जाए तो हमें उलझन में डाल सकता है। व्यवस्था और सुसमाचार के बीच पौलुस जो भेद करता है उसकी चर्चा हम पिछले अध्ययनों में कर चुके हैं। जब परमेश्वर ने उद्धार की प्रतिज्ञा की, तो वह इस शर्त पर थी कि हम उसकी सेवा करें और उसके प्रति अपना कर्तव्य पूरी रीति से निभाएं। परन्तु यह सम्भव नहीं; इसलिये व्यवस्था के द्वारा हम उद्धार की सब आशा से बाहर कर दिए गए हैं। ऐसा नहीं कि परमेश्वर अपनी ओर से विश्वासघाती है: यह हम हैं जो उसकी मांगें पूरी नहीं करते! यह उस मनुष्य के समान है जो कहता है, "मैं तुम्हें माल बेचने को तैयार हूं, इस शर्त पर कि तुम्हारे पास पैसे हों।" इस प्रकार जिसके पास एक पैसा भी नहीं वह माल में से कुछ भी नहीं खरीद सकता, क्योंकि आरम्भ में यही शर्त रखी गई थी। उसी प्रकार परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि यदि हम उसकी सेवा करें तो हम उद्धार के अधिकारी होंगे, परन्तु इससे हमें कुछ लाभ नहीं, क्योंकि जो वह मांगता है उसे हम पूरा नहीं कर सकते। वास्तव में हम अधर्म से इतने भरे हैं, उसकी दृष्टि में इतने अशुद्ध और दूषित हैं, कि वह बिल्कुल न्यायपूर्वक हमें घृणा की दृष्टि से देखता है। इसलिये हम सब व्यवस्था के अधीन दोषी ठहरे हैं। तौभी परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जो हमें पापों की क्षमा देता है, हमें मुफ़्त और अनुग्रह से ग्रहण करता है। वास्तव में वह बहुत चाहता है कि जो अनुग्रह हमें दिया जा रहा है उसे हम ग्रहण करें और अपने आप पर नहीं, पूरी तरह प्रभु यीशु मसीह पर टिके रहें।

अब पौलुस पूछता है, "कौन अधिक प्राचीन है — उद्धार की मुफ़्त प्रतिज्ञा या व्यवस्था?" हम दोनों के बीच का अन्तर जानते हैं। अब यदि व्यवस्था अधिक प्राचीन होती, तो उसे दृढ़ रहना चाहिए था, क्योंकि परमेश्वर कभी नहीं बदलता और उसमें परिवर्तन की छाया नहीं। परन्तु यदि मुफ़्त प्रतिज्ञा पहले आई और व्यवस्था के ठहराए जाने से पहले दी गई, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि परमेश्वर ने अपना मन नहीं बदला, और न अपनी पहली प्रतिज्ञा वापस ली। वह इस वाचा का उन्मूलन नहीं चाहता, क्योंकि ऐसा करना उसकी कृपा और दया को वापस लेना होता। यदि एक समय उसने अपनी उदारता से मनुष्यों को पुण्य के आधार से भिन्न किसी आधार पर उद्धार देने के लिये अपने आप को बांधा, और फिर मन बदल लिया मानो वह चाहता हो कि हम अपने भले कर्मों से उसे धनी बनाएं, तो यह बेतुका होता! पौलुस हमें बताता है कि मुफ़्त प्रतिज्ञा व्यवस्था से पहले दी गई। इसलिये यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यवस्था प्रतिज्ञा में कुछ भी नहीं बदलती; उसका स्वभाव और उसकी शक्ति ज्यों की त्यों बनी रहती है। यद्यपि यह सच है कि जब हमारे पिता अब्राहम से प्रतिज्ञा की गई तब प्रभु यीशु मसीह अभी पृथ्वी पर जन्मा नहीं था, तौभी वह हमारा मध्यस्थ होने के लिये पहले ही चुना जा चुका था, क्योंकि उसी के द्वारा हम परमेश्वर से मिलाए जाने वाले थे।

अब, कहीं ऐसा न हो कि हम सोचें कि व्यवस्था अनावश्यक रही होगी, या परमेश्वर के मन में परिवर्तन हुआ होगा, पौलुस आगे इसी विषय को सम्बोधित करता है। हम उलझन में न पड़ें; यद्यपि एक घण्टे में, या एक दिन में भी, सब कुछ समझाना सम्भव नहीं, फिर भी इस समय हमारे लिये इस एक बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना काफ़ी है: कि हमें अपने पुत्र ठहराने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने व्यवस्था से पहले की थी। वास्तव में यह हमारे पुण्य या निजी योग्यता को देखकर नहीं की गई थी; परमेश्वर ने यह अपनी ही भलाई और दया से किया और हम से कुछ भी आशा नहीं रखी, क्योंकि वह जानता था कि हम घोर पाप के सिवा और कुछ नहीं हैं। इस प्रतिज्ञा की नींव प्रभु यीशु मसीह में थी, जिसका पद पहले से मध्यस्थ का था, जो हमें पिता परमेश्वर तक पहुंच दिलाता है। यह कहने के बाद हम निष्कर्ष निकालते हैं कि यह प्रतिज्ञा जगत के अन्त तक बनी रहेगी। यह बात मुख्यतः इसलिये कहनी पड़ती है कि यहूदी अपनी विरासत पर घमण्ड करते थे। पौलुस उन्हें बताना चाहता है कि उनके पिता अब्राहम के पास व्यवस्था नहीं थी, फिर भी वह सन्तुष्ट था, यद्यपि उसने निश्चय ही बलिदान आदि चढ़ाए। परन्तु यद्यपि अन्त में उसका खतना हुआ, तौभी जब उसे प्रतिज्ञा मिली उस समय कोई लिखित विधि नहीं थी और खतना भी नहीं था। क्योंकि यद्यपि जब अब्राहम को प्रतिज्ञा मिली तब उसका खतना नहीं हुआ था, तौभी वह खतने के बिना केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया गया। इसलिये पौलुस यहूदियों को दिखाता है कि अपने आप को शेष मानवजाति से अलग श्रेणी में गिनना और अपनी आशा को व्यवस्था के प्रतिरूपों और छायाओं पर रखना अत्यन्त मूर्खता है, क्योंकि उनका पिता अब्राहम, जो कलीसिया का प्रधान पूर्वज था, उसी रीति से धर्मी ठहराया गया जिस रीति से आज के लोग। दूसरे शब्दों में, वह केवल परमेश्वर की दया से धर्मी ठहराया गया, क्योंकि उसने पहचान लिया था कि वह एक दीन पापी है, आदम में खोया हुआ और दोषी ठहरा हुआ है, और जिस एकमात्र आशीष की वह आशा कर सकता था वह यह थी कि प्रभु यीशु मसीह के नाम में की गई प्रतिज्ञा में सम्मिलित किया जाए। हमें यही स्मरण रखना है।

इसके बाद, हमें उस प्रतिज्ञा पर सावधानी से विचार करना चाहिए जो सीधे अब्राहम से की गई, जिससे उस पर प्रकट हुआ कि पृथ्वी की सब जातियां उसके वंश के द्वारा आशीष पाएंगी (उत्पत्ति 12:3)। अब यहां दो मुख्य बातें कही गई हैं। एक यह कि आशीष की प्रतिज्ञा केवल अब्राहम के पार्थिव वंशजों के लिये नहीं (जैसा हम देख चुके हैं), वरन् सामान्य रूप से सारे संसार के लिये है। इसलिये हम जो अन्यजाति की जड़ से उत्पन्न हुए हैं (अर्थात् उनसे जो अशुद्ध हैं और जिन्हें आरम्भ में स्वर्ग के राज्य से निकाल दिया गया था), हम भी इस प्रतिज्ञा में भागी हो सकते हैं। यद्यपि हम उस पवित्र वंश के नहीं हैं जिसे परमेश्वर ने आरम्भ में चुना, तौभी अब उद्धार हम तक भी पहुंचता है। यह कैसे? क्योंकि प्रतिज्ञा की गई थी कि पृथ्वी की सब जातियां आशीष पाएंगी। ऐसी दशा में क्या हम ऐसे बोलने का साहस कर सकते हैं मानो परमेश्वर ने अपना उदार हाथ खींच लिया है और केवल अब्राहम के वंशजों को ही खोजता है, जबकि वह पहले ही घोषणा कर चुका था कि ठीक समय आने पर वह अपने आप को मानवजाति का उद्धारकर्ता और पिता प्रकट करेगा? इसलिये यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है: यद्यपि यह प्रतिज्ञा अब्राहम से की गई, वह केवल उसके शारीरिक वंशजों पर ही नहीं, वरन् सब मनुष्यों पर लागू होती थी, यद्यपि यह पहले-पहल प्रकट नहीं हुआ, क्योंकि समय की पूर्णता नहीं आई थी, जैसा हम अगले अध्याय में देखेंगे।

दूसरी बात यह है कि अब्राहम से जिस आशीष की प्रतिज्ञा हुई वह उसके वंश के लिये थी। पौलुस कहता है कि वह बहुवचन में 'वंशों' की नहीं, परन्तु एक वंश की चर्चा करता है; इसलिये हमें निष्कर्ष निकालना होगा कि वह यीशु मसीह की ओर संकेत कर रहा है। हम शायद यह सोच बैठते कि पौलुस एक ऐसी बात को बहुत बड़ा बना रहा है जिसका कोई विशेष महत्व नहीं; आखिर 'वंश' शब्द का अर्थ केवल सन्तान है, किसी एक मनुष्य की ओर संकेत नहीं, न दस की, न चालीस की! निश्चय ही वह लोगों की पूरी जाति की बात करता है, क्योंकि अब्राहम का वंश वही जाति है जो उससे उत्पन्न हुई। वास्तव में यह इतनी बड़ी भीड़ थी कि कहा गया कि वह बारह जातियों के तुल्य है (उत्पत्ति 17:6); क्योंकि जब हम किसी जाति की बात करते हैं तो लगभग एक लाख पुरुषों की बात करते हैं, और अकेले यहूदा के गोत्र में इससे अधिक थे! इसलिये ऐसा प्रतीत होगा कि जब पौलुस कहता है कि यह केवल एक मनुष्य की ओर संकेत करता है, तब उसने ठीक से विचार नहीं किया कि 'वंश' शब्द से परमेश्वर का क्या अभिप्राय था। परन्तु हमें पौलुस के निष्कर्षों को तौलना चाहिए ताकि जानें कि वे सही और दृढ़ता से स्थापित हैं; वास्तव में हम देखेंगे कि उसका तर्क पूर्णतः निर्दोष है।

अब्राहम का केवल एक ही पुत्र नहीं था; इश्माएल के बाद उसके इसहाक हुआ। और उसके बड़े पुत्र का क्या हुआ? उसे उसके घर से निकाल दिया गया, जैसा हम अगले अध्याय पर विचार करते समय देखेंगे। इस प्रकार यह इश्माएल, जिसे अब्राहम के घराने के पहिलौठे के सब विशेषाधिकार प्राप्त थे, परदेशी के समान निकाल दिया गया, जैसा लिखा है, "इस दासी और इसके पुत्र को निकाल दे; क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के संग भागी न होगा" (उत्पत्ति 21:10)। इसके बाद उससे और सन्तान उत्पन्न हुईं (उत्पत्ति 25:1 आदि)। उसने हर एक को उसका ठहराया हुआ भाग दिया और फिर उन्हें विदा कर दिया। केवल इसहाक अब्राहम के पास रहा। समय आने पर इसहाक के दो सन्तान हुईं, एक ही गर्भ से उत्पन्न जुड़वां (उत्पत्ति 25:22-23)। पहिलौठा एसाव, जिसे अधिकार मिलना चाहिए था, ठुकरा दिया गया और अब्राहम का वंशज नहीं गिना गया; इस प्रकार प्रतिज्ञा की आशीषों में उसका कोई भाग न रहा। तब केवल याकूब रह गया, क्योंकि उसके पिता ने अनजाने और भूल से उसे आशीर्वाद दिया, फिर घोषणा की कि वह उस आशीर्वाद को वापस नहीं ले सकता और न अपने कहे को बदल सकता है, क्योंकि वह पवित्र आत्मा का साधन बना था (उत्पत्ति 27:37)। यदि हम 'वंश' शब्द को अब्राहम से उत्पन्न होने वालों पर लागू करें, तो इसमें निश्चय ही इश्माएली और हागरी (जैसा उन्हें कहा जाता है) और उन जैसे लोग भी आ जाएंगे। यदि ऐसा होता, तो उनके सेवक एदोमी लोग भी उसके घराने का भाग गिने जा सकते थे। परन्तु इन लोगों से तो विरासत छीन ली गई। इसलिये 'अब्राहम का वंश' इस वाक्यांश को कुछ भिन्न रीति से समझना चाहिए।

आओ, इस विषय पर क्षण भर सोचें। विश्वास के बिना कलीसिया को कौन एक करेगा? अब्राहम के आत्मिक वंश को पहचानने का कोई निश्चित उपाय न होता। हम उन्हें शेष मनुष्यजाति से कैसे अलग करते? एकमात्र उपाय यह है कि हम सिर के पास आएं, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह के पास। देह की एकता उसके सिर पर, उसके छुड़ानेवाले पर, निर्भर है। इसी कारण पौलुस कहता है कि प्रतिज्ञा बहुवचन में वंश की नहीं, परन्तु एक मनुष्य की बात करती है, जिसके पास हमें आना है यदि हम उसके आत्मिक लोगों को पाना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि हम परमेश्वर की कलीसिया को ढूंढ़ना चाहें, तो हमें प्रभु यीशु मसीह से आरम्भ करना होगा, क्योंकि उसके अपने लोग उसी के चारों ओर इकट्ठे किए जाएंगे। जितने उसकी देह के हैं और विश्वास के द्वारा उससे लिपटे हैं वे परमेश्वर की सन्तान और उसके सेवक हैं। वे ही सचमुच अब्राहम का वंश हैं। इसकी और पूरी चर्चा रोमियों की पत्री के नौवें अध्याय की छठी आयत में है, जहां लिखा है, "वे सब इस्राएली नहीं, जो इस्राएल के वंश के हैं।" यह कैसे? वास्तव में प्रतिज्ञा की सन्तान केवल एक ही थी: इसहाक। इसलिये हमें प्रभु यीशु मसीह के पास आना चाहिए, क्योंकि उसी में परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएं 'हां' और 'आमीन' हैं, और पूर्णतः दृढ़ और निश्चित हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। उसके बिना हम सब खो जाते। इसी कारण कुलुस्सियों के पहले अध्याय की बीसवीं आयत में लिखा है कि प्रभु यीशु मसीह का काम स्वर्ग और पृथ्वी में जो कुछ बिखरा था उसे एक साथ इकट्ठा करना था; उसके बिना हम सब घबराहट में पड़ जाते।

अब हम पौलुस के तर्क की रेखा को कहीं अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। इससे पहले कि व्यवस्था संसार को दी जाती, अर्थात् इससे पहले कि हमें उसमें लिखी सब बातों के पालन के हमारे कर्तव्य की जानकारी मिलती, परमेश्वर अपनी प्रसन्नता पहले ही प्रकट कर चुका था। मानवजाति को खोई और दोषी ठहरी हुई देखकर उसने चाहा कि अपने चुने हुओं को अपने पास लाए और उन पर दया करे। यह केवल एक जाति के लिये नहीं, वरन् 'सब जातियों' के लिये था, जैसा पवित्र शास्त्र घोषित करता है। और उस दया का स्रोत प्रभु यीशु मसीह है। वास्तव में जब अब्राहम जीवित था, तब हमारा प्रभु यीशु मसीह मध्यस्थ ठहराया जा चुका था, ताकि उसके द्वारा हमारे विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध शान्त हो। इसलिये जब हम उसके नाम से अनुग्रह मांगने आते हैं, तो वह हमें दिया जाएगा और हमारी आशाएं निराश न होंगी। यह पहले ही स्थापित हो चुका था और, आनन्द की बात है कि कुछ भी नहीं बदला; हम निश्चित हो सकते हैं कि आज भी परमेश्वर हमें ग्रहण करता है यदि हम प्रभु यीशु मसीह में पूरी तरह जड़ पकड़े और नींव पर स्थिर हैं। क्योंकि उसके नाम में बांधी गई वाचा नहीं बदलेगी — वह स्थायी है और सदा प्रभावी रहेगी। इसलिये हम निःसंकोच परमेश्वर के सामने आ सकते हैं और उसे अपना पिता कहकर पुकार सकते हैं, क्योंकि उसने हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है; इसलिये नहीं कि हम में कुछ योग्य था, वरन् केवल उसकी दया से हम विश्वास के द्वारा प्रभु यीशु मसीह से जुड़े हैं।

तथापि परमेश्वर का अनुग्रह पाने और उद्धार का निश्चय रखने के लिये हमें अपने मूल्य के विषय में अपनी सब धारणाओं को त्याग देना होगा। इस खण्ड में विश्वास के विषय में जो घोषित है उस पर हमें ध्यान देना चाहिए, क्योंकि केवल विश्वास के द्वारा ही हम ऐसी आशीष का आनन्द उठा सकते हैं। विश्वास (जैसा हम समझा चुके हैं) का अर्थ है कि हम परमेश्वर की दया को ग्रहण करें। परन्तु जब तक हम अपनी दरिद्रता के बोध से छुए न जाएं, तब तक हमें विश्वास नहीं हो सकता, क्योंकि प्रभु यीशु मसीह हमारे लिये श्राप बनकर हमारे श्रापित दशा का चित्र हमारे सामने रखता है। इसलिये विश्वास पश्चाताप के बिना नहीं रह सकता, क्योंकि जब तक हमारी आत्माओं में हमें दोषी न ठहराया जाए और हम अपने आप पर शोक करने न लगें, तब तक हमारा परमेश्वर के पास उद्धार ढूंढ़ते हुए आना और उससे अपनी दयनीय दशा पर तरस खाने को कहना सम्भव नहीं। जो कपटी अपने पापों में मतवाले होकर लोटते हुए परमेश्वर का उपहास करते हैं, वे यह आशा न रखें कि यीशु मसीह उन्हें अपना मानकर ग्रहण करेगा; क्योंकि ऐसे लोग उसके निकट आ भी नहीं सकते। वास्तव में उसका निमंत्रण उन्हीं के लिये है जो थके और बोझ से दबे हैं (मत्ती 11:28), जो और नहीं सह सकते और अपने पापों के बोझ तले लड़खड़ाते हैं। प्रभु यीशु मसीह के पास हमें इसी रीति से आना है, अपने किसी पुण्य के साथ नहीं; क्योंकि सारी रीति-विधि की व्यवस्था और जितने बलिदान हम चढ़ा सकते हैं वे हमारे उद्धार में कुछ भी योगदान नहीं दे सकते। वरन् इससे पहले कि परमेश्वर हम पर दया करे, हमें दीनता की अवस्था में आना होगा और अपनी दयनीय दशा को पूरी तरह जानना होगा। पहले हम नीचे किए जाते हैं कि हम उस श्राप को देख सकें जिसके अधीन हम हैं, इससे पहले कि हम इस बात पर आनन्द करें कि हम अपार मूल्य देकर मोल लिए गए हैं। हमारे सारे अध्ययन में हमारा यही विषय रहा है।

इस प्रकार विश्वास के द्वारा ही हम आत्मा की प्रतिज्ञा को प्राप्त करते हैं और प्रभु यीशु मसीह से जुड़ जाते हैं। हम अब्राहम के आत्मिक वंश का भाग बन जाते हैं। यद्यपि हम शारीरिक रीति से उसके घराने के वंशज नहीं, तौभी यह काफ़ी है कि हम विश्वास के द्वारा उसके साथ जुड़े हैं। वास्तव में हम अविनाशी बीज से नया जन्म पा चुके हैं, जैसा पतरस कहता है, अर्थात् परमेश्वर के वचन, पवित्र शास्त्र, से (1 पतरस 1:23)। बदल जाने पर हम समझते हैं कि परमेश्वर हमें अपने एकलौते पुत्र की देह का अंग जानकर ग्रहण करता है। यद्यपि हम अन्यजाति के वंश से हैं, तौभी हम उसकी कलीसिया से जोड़े जा सकते हैं, क्योंकि केवल विश्वास ही अपेक्षित है। यहां मनुष्य के गुणों और पुण्यों का सारा घमण्ड समाप्त हो जाना चाहिए, और मनुष्यों को मान लेना चाहिए कि जब तक वे परमेश्वर को उसके ठहराए हुए मार्ग से न खोजें तब तक वे पूरी तरह घबराहट में पड़े रहेंगे। यह कहकर, आओ हम सीखें कि अस्थिर मनुष्यों के समान इधर-उधर न उड़ाए जाएं, जो उस बात से सन्तुष्ट नहीं होते जो परमेश्वर ने घोषित की है, वरन् सदा उसमें अपनी गढ़ी हुई कुछ बात जोड़ना चाहते हैं। हमें ऐसे अपवित्र मिश्रण से सावधान रहना चाहिए। परमेश्वर की इच्छा हो तो मैं भोजन के बाद इस पर और विस्तार से कहने का विचार रखता हूं। यीशु मसीह हमारे लिये पर्याप्त हो, क्योंकि हमारा उद्धार पूरी तरह उसी पर निर्भर है; यदि हमारा उसमें भाग है तो हमें किसी बात की घटी न होगी। पौलुस इस पत्री में बार-बार इसी बात की ओर लौटता है। इसके अतिरिक्त, वह चाहता है कि हम परमेश्वर की सच्चाई को दृढ़ता से थामे रहें, यह जानकर कि वह उसमें कुछ जोड़ने की अनुमति नहीं देती। यदि हम उसमें कुछ जोड़ें, तो उस वाचा को जिस पर हमारा उद्धार निर्भर है, हम भ्रष्ट, विकृत और झूठा कर देंगे। प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण कर लेने के बाद हम से अपेक्षा है कि हम पूरी रीति से उसी में बने रहें, क्योंकि यही एक मनुष्य हम सब के लिये पर्याप्त अनुग्रह रखता है। उसमें हम निडर होकर परमेश्वर को पुकार सकते हैं, यह जानते हुए कि यद्यपि हम आदम की श्रापित जाति के वंशज हैं, तौभी यीशु मसीह में हम आशीष पाते हैं। वह अब हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करता है और मुफ़्त में गोद लेता है। वह चाहता है कि यह सन्देश सारे संसार में सुना जाए — अब एक खुला द्वार और निर्बाध पहुंच है जिससे हम उसके निकट आ सकते हैं।

अब आओ हम अपने महान परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने पापों को मानें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए, कि हम उनसे घृणा करें। हम अपना जीवन उसका आदर और सेवा कठोर आज्ञाकारिता में करने की खोज और प्रयत्न में बिताएं। और क्योंकि अपनी बड़ी निर्बलता के कारण हम अपने आप को छुड़ा नहीं सकते, वह हमें तब तक सम्भाले रहे जब तक वह हमें शरीर की सब अशुद्धताओं से छुड़ा न ले, और अपनी धार्मिकता का वस्त्र न पहना दे। वास्तव में उसने अब हम में यह काम आरम्भ कर दिया है और हमें दृढ़ आधार देता है कि जो उसने आरम्भ किया है उसे वह पूरा भी करेगा। इसलिये हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर और हमारे स्वर्गीय पिता, इत्यादि।

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