पाठ 30 (31 में से)

मध्यस्थता की सेवकाई

‘याजकों का पवित्र समाज;’

इस पुस्तक में खोजें

    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    ‘याजकों का पवित्र समाज बनकर, ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ, जो यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्राह्य हों।’

    1 पतरस 2:5।

    ‘पर तुम यहोवा के याजक कहलाओगे।’—यशायाह 61:6।

    ‘प्रभु यहोवा का आत्मा मुझ पर है; क्योंकि यहोवा ने मेरा अभिषेक किया है।’ ये यशायाह में यीशु के शब्द हैं। उसके कार्य के फल के रूप में सब छुड़ाए हुए लोग याजक हैं, जो महायाजक के रूप में आत्मा से उसके अभिषेक में उसके साथ सहभागी हैं। ‘यह तो उस उत्तम तेल के समान है, जो हारून की दाढ़ी पर बहकर, उसके वस्त्र की छोर तक पहुँच गया।’ जैसे हारून के हर पुत्र को, वैसे ही यीशु की देह के हर अंग को याजकपद का अधिकार है। परन्तु हर कोई उसका प्रयोग नहीं करता: बहुत से अब भी उससे पूरी तरह अनजान हैं। और फिर भी यह परमेश्वर की सन्तान का सबसे ऊँचा विशेषाधिकार है, उसके, ‘जो बिनती करने को सर्वदा जीवित है,’ सबसे निकट होने और उसके सबसे समान होने का चिह्न। क्या आपको सन्देह है कि क्या सचमुच ऐसा है? सोचिए कि याजकपद किन बातों से बनता है। पहले, याजकपद का कार्य है। इसके दो पक्ष हैं, एक परमेश्वर की ओर, दूसरा मनुष्य की ओर। ‘हर एक याजक मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है’ (इब्रानियों 5:1); या, जैसा मूसा ने कहा है (व्यवस्थाविवरण 10:8, और 21:5, 33:10; मलाकी 2:6 भी देखिए): ‘यहोवा ने लेवी गोत्र को इसलिए अलग किया कि वह यहोवा के सम्मुख खड़ा होकर उसकी सेवा टहल किया करे, और उसके नाम से आशीर्वाद दिया करे।’ एक ओर, याजक को यह सामर्थ्य थी कि परमेश्वर के निकट जाए, उसके भवन में उसके साथ वास करे, और उसके सामने बलिदान का लहू या जलता हुआ धूप चढ़ाए। परन्तु यह काम वह अपने लिए नहीं करता था, वरन् उन लोगों के लिए जिनका वह प्रतिनिधि था। यह उसके कार्य का दूसरा पक्ष है। वह लोगों से उनके बलिदान लेता, उन्हें परमेश्वर के सामने चढ़ाता, और फिर बाहर आकर उसके नाम से आशीर्वाद देता, उन्हें उसकी कृपा का निश्चय दिलाता और उन्हें उसकी व्यवस्था सिखाता था।

    इस प्रकार याजक वह मनुष्य है जो अपने लिए बिलकुल नहीं जीता। वह परमेश्वर के साथ और परमेश्वर के लिए जीता है। उसका काम यह है कि परमेश्वर के सेवक के रूप में उसके भवन, उसके आदर, और उसकी आराधना की चिन्ता करे, और मनुष्यों पर उसके प्रेम और उसकी इच्छा को प्रगट करे। वह मनुष्यों के साथ और मनुष्यों के लिए जीता है (इब्रानियों 5:2)। उसका काम यह है कि उनके पाप और आवश्यकता को पहचाने, और उसे परमेश्वर के सामने ले जाए, उनके नाम से बलिदान और धूप चढ़ाए, उनके लिए क्षमा और आशीष प्राप्त करे, और फिर बाहर आकर उसके नाम से उन्हें आशीर्वाद दे। यही हर विश्वासी की ऊँची बुलाहट है। ‘उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी।’ वे इसी एक उद्देश्य से छुड़ाए गए हैं कि अपने चारों ओर नाश होते हुए करोड़ों लोगों के बीच परमेश्वर के याजक हों, जो बड़े महायाजक यीशु की समानता में, अपने चारों ओर के सब लोगों के लिए परमेश्वर के अनुग्रह के सेवक और भण्डारी हों।

    और फिर याजकपद का चालचलन है, जो उसके कार्य के अनुरूप हो। जैसे परमेश्वर पवित्र है, वैसे ही याजक को विशेष रूप से पवित्र होना था। इसका अर्थ केवल हर अशुद्ध वस्तु से अलग होना ही नहीं, वरन् परमेश्वर के लिए पवित्र होना है, अर्थात् परमेश्वर के लिए अलग किया जाना और उसके उपयोग के लिए उसे सौंप दिया जाना। संसार से अलग होना और परमेश्वर के लिए अलग किया जाना बहुत सी रीतियों से दर्शाया जाता था।

    यह वस्त्रों में दिखाई देता था: पवित्र वस्त्र, जो स्वयं परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार बनाए गए थे, उन्हें उसका ठहराते थे (निर्गमन 28)। यह उनकी विशेष शुद्धता के विषय में, और मृत्यु और अशुद्धता के हर स्पर्श से मुक्त रहने के विषय में दी गई आज्ञा में दिखाई देता था (लैव्यव्यवस्था 11:22)। बहुत कुछ जो एक साधारण इस्राएली के लिए उचित था, उनके लिए वर्जित था। यह इस आदेश में दिखाई देता था कि याजक में कोई शारीरिक दोष या कलंक न हो; शारीरिक सिद्धता परमेश्वर की सेवा में सम्पूर्णता और पवित्रता का प्रतीक होनी थी। और यह उस व्यवस्था में दिखाई देता था जिसके अनुसार याजकीय गोत्रों को दूसरे गोत्रों के साथ कोई भाग नहीं मिलना था; परमेश्वर ही उनका भाग होना था। उनका जीवन विश्वास का जीवन होना था: परमेश्वर के लिए अलग किए जाकर, उन्हें उसी के लिए, और उसी के सहारे जीना था।

    यह सब इस बात का प्रतीक है कि नये नियम के याजक का चरित्र कैसा होना चाहिए। परमेश्वर के सामने हमारी याजकीय सामर्थ्य हमारे व्यक्तिगत जीवन और चालचलन पर निर्भर है। हमें उन लोगों में से होना चाहिए जिनके पृथ्वी पर के चालचलन के विषय में यीशु कहता है, ‘उन्होंने अपने अपने वस्त्र अशुद्ध नहीं किए।’

    संसार से अपने अलगाव में, उन बातों को त्याग देने के द्वारा जो दूसरों के लिए उचित प्रतीत हो सकती हैं, हमें यह प्रमाणित करना चाहिए कि प्रभु के लिए पवित्र होने का हमारा समर्पण सम्पूर्ण हृदय से और पूरा है। याजक की शारीरिक सिद्धता की समानता हम में भी होनी चाहिए कि हम भी ‘निष्कलंक और निर्दोष’ हों; ‘परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए,’ ‘पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे’ (लैव्यव्यवस्था 21:17-21; इफिसियों 5:27; 2 तीमुथियुस 2:7; याकूब 1:4)। और सबसे बढ़कर, हम पृथ्वी पर के सारे भाग को त्याग देने के लिए सहमत होते हैं; सब कुछ छोड़ देने के लिए, और मसीह की नाईं केवल परमेश्वर को अपना भाग रखने के लिए: ऐसे रखने के लिए मानो हमारे पास कुछ नहीं, और सब कुछ केवल परमेश्वर के लिए थामे रहने के लिए: यही सच्चे याजक का चिह्न है, उस मनुष्य का जो केवल परमेश्वर और अपने संगी मनुष्यों के लिए जीता है।

    और अब याजकपद तक पहुँचने का मार्ग। हारून में परमेश्वर ने उसके सब पुत्रों को याजक होने के लिए चुन लिया था: उनमें से हर एक जन्म से याजक था। और फिर भी वह एक विशेष विधि—अपने संस्कार—के बिना अपने कार्य में प्रवेश नहीं कर सकता था। परमेश्वर की हर सन्तान अपने जन्म के कारण, बड़े महायाजक के साथ अपने लहू के सम्बन्ध के कारण याजक है; परन्तु इतना पर्याप्त नहीं है: वह अपनी सामर्थ्य का प्रयोग केवल उतना ही करेगा जितना वह अपने संस्कार को स्वीकार करता और उसे अनुभव में लाता है।

    हारून और उसके पुत्रों के साथ यह इस प्रकार हुआ (निर्गमन 29): नहलाए जाने और वस्त्र पहनाए जाने के बाद, उनका पवित्र तेल से अभिषेक किया गया। फिर बलिदान चढ़ाए गए, और लहू से दाहिने कान, दाहिने हाथ, और दाहिने पाँव को छुआ गया। और फिर उन पर और उनके वस्त्रों पर एक बार फिर लहू और तेल एक साथ छिड़का गया। और इसी प्रकार, जैसे-जैसे परमेश्वर की सन्तान इस बात में और अधिक पूर्णता से प्रवेश करती है कि वह लहू और वह आत्मा, जिनका वह पहले से सहभागी है, उसके लिए क्या हैं, वैसे-वैसे पवित्र याजकपद की सामर्थ्य उसमें काम करेगी। लहू अयोग्यता की सारी भावना को दूर कर देगा; आत्मा, असमर्थता की सारी भावना को।

    आइए हम देखें कि याजक पर लहू लगाए जाने में क्या नया था। यदि कभी उसने एक पश्चातापी के रूप में क्षमा चाहते हुए अपने पाप के लिए बलिदान चढ़ाया था, तो लहू वेदी पर छिड़का गया था, परन्तु उसकी देह पर नहीं। परन्तु अब, याजकीय संस्कार के लिए, लहू के साथ और भी निकट सम्पर्क होना था; कान और हाथ और पाँव एक विशेष विधि के द्वारा उसकी सामर्थ्य के अधीन लाए गए, और सम्पूर्ण व्यक्ति परमेश्वर के लिए अधिकार में लिया गया और पवित्र किया गया। और इसी प्रकार, जब वह विश्वासी, जो मुख्यतः प्रायश्चित के ढकने पर छिड़के गए लहू के विषय में ही सोचकर सन्तुष्ट रहा था कि क्षमा के लिए उसे उसी की आवश्यकता है, परमेश्वर के पास पूरी याजकीय पहुँच खोजने की ओर ले जाया जाता है, तब वह लहू की सामर्थ्य के और भी पूर्ण और स्थायी अनुभव की आवश्यकता अनुभव करता है, जो सचमुच हृदय पर छिड़का जाकर उसे बुरे विवेक से शुद्ध करता है, यहाँ तक कि उसका ‘विवेक उसे फिर पापी न ठहराए’ (इब्रानियों 10:2), क्योंकि वह सब पाप से शुद्ध करता है। और जैसे-जैसे वह इसका आनन्द लेने लगता है, वैसे-वैसे उसमें परमेश्वर के पास अत्यन्त घनिष्ठ पहुँच के अपने अद्भुत अधिकार की, और इस पूरे निश्चय की चेतना जागती है कि उसकी मध्यस्थता की प्रार्थनाएँ ग्रहणयोग्य हैं।

    और जैसे लहू अधिकार देता है, वैसे ही आत्मा सामर्थ्य देता है, और विश्वासपूर्ण मध्यस्थता के योग्य बनाता है। वह हम में याजकीय आत्मा फूँकता है—परमेश्वर के आदर और प्राणों के उद्धार के लिए जलता हुआ प्रेम। वह हमें यीशु के साथ ऐसा एक कर देता है कि उसके नाम में प्रार्थना एक वास्तविकता बन जाती है। वह हमें विश्वासपूर्ण और हठपूर्ण प्रार्थना के लिए बल देता है। मसीही जितना अधिक सचमुच मसीह के आत्मा से भरा होता है, उतना ही अधिक स्वाभाविक रूप से वह अपने आप को याजकीय मध्यस्थता के जीवन के लिए सौंप देगा। प्रिय संगी मसीहियो! परमेश्वर को ऐसे याजकों की आवश्यकता है, बड़ी आवश्यकता है, जो उसके निकट आ सकें, जो उसकी उपस्थिति में जीते हों, और अपनी मध्यस्थता के द्वारा दूसरों पर उसके अनुग्रह की आशीषें उतार लाएँ। और संसार को ऐसे याजकों की आवश्यकता है, बड़ी आवश्यकता है, जो नाश होनेवालों का बोझ उठाएँ, और उनके लिए मध्यस्थता करें।

    क्या आप इस पवित्र कार्य के लिए अपने आप को अर्पित करने को तैयार हैं? आप जानते हैं कि यह कैसा समर्पण माँगता है—मसीह की नाईं सब कुछ त्याग देने से कम कुछ नहीं, कि परमेश्वर के प्रेम के उद्धार देनेवाले अभिप्राय मनुष्यों के बीच पूरे हों। आह, अब उन लोगों में से न रहिए जो उद्धार पा लेने पर सन्तुष्ट हो जाते हैं, और बस उतना ही काम करते हैं जितना स्वयं को गरम और सजीव बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो। आह, किसी भी बात को अपने आप को पूरी तरह और केवल याजक होने के लिए सौंप देने से आपको रोकने न दीजिए—और कुछ नहीं, परमप्रधान परमेश्वर के याजकों से कम कुछ नहीं। अयोग्यता का, असमर्थता का विचार आपको रोके, इसकी आवश्यकता नहीं। लहू में, सिद्ध छुटकारे की वस्तुगत सामर्थ्य आप में काम करती है: आत्मा में, एक ईश्वरीय जीवन के रूप में उसका पूरा आन्तरिक व्यक्तिगत अनुभव सुनिश्चित है। लहू एक अनन्त योग्यता प्रदान करता है जो आपकी प्रार्थनाओं को पूर्णतः ग्रहणयोग्य बनाती है: आत्मा एक ईश्वरीय क्षमता प्रदान करता है, जो आपको ठीक परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करना सिखाती है। हर याजक जानता था कि जब वह पवित्रस्थान की व्यवस्था के अनुसार बलिदान चढ़ाता था, तो वह ग्रहण किया जाता था: लहू और आत्मा की छाया तले आपको यह निश्चय है कि यीशु के नाम में प्रार्थना के विषय में दी गई सारी अद्भुत प्रतिज्ञाएँ आप में पूरी होंगी। बड़े महायाजक के साथ एकता में बने रहकर, ‘आप जो चाहें माँगेंगे, और वह आपके लिए हो जाएगा।’ आपके पास धर्मी जन की उस प्रभावशाली प्रार्थना को करने की सामर्थ्य होगी जिसके प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है। आप न केवल संसार के लिए कलीसिया की सामान्य प्रार्थना में सम्मिलित होंगे, वरन् अपने क्षेत्र में प्रार्थना में अपना विशेष कार्य उठाने के योग्य भी होंगे—याजकों के रूप में, परमेश्वर के साथ उसका निपटारा करने, उत्तर को ग्रहण करने और जानने, और इस प्रकार उसके नाम से आशीर्वाद देने के योग्य। आइए, भाई, आइए, और याजक बनिए, केवल याजक, पूरी तरह याजक। अब इस पूरी चेतना में प्रभु के सामने चलने का यत्न कीजिए कि आप मध्यस्थता की पवित्र सेवकाई के लिए अलग किए गए हैं। यही परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप में ढल जाने का सच्चा आनन्द है।

    समापन प्रार्थना

    हे मेरे धन्य महायाजक, उस समर्पण को ग्रहण कर जिसके द्वारा मेरा प्राण अब तेरे सन्देश का उत्तर देना चाहता है।

    मैं तेरे पवित्र लोगों के पवित्र याजकपद पर विश्वास करता हूँ, और इस पर कि मैं भी एक याजक हूँ, जिसे पिता के सामने उपस्थित होने की, और उस प्रार्थना के द्वारा जिसके प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है, अपने चारों ओर नाश होनेवालों पर आशीष उतार लाने की सामर्थ्य है।

    मैं तेरे बहुमूल्य लहू की सामर्थ्य पर विश्वास करता हूँ, कि वह सब पाप से शुद्ध करता है, मुझे परमेश्वर के प्रति सिद्ध भरोसा देता है, और विश्वास के पूरे निश्चय में मुझे निकट ले आता है कि मेरी मध्यस्थता की प्रार्थना सुनी जाएगी।

    मैं आत्मा के अभिषेक पर विश्वास करता हूँ, जो हे मेरे बड़े महायाजक, प्रतिदिन तुझ से उतरता है, कि मुझे पवित्र करे, मुझे मेरी याजकीय बुलाहट की चेतना से और प्राणों के प्रति प्रेम से भर दे, मुझे सिखाए कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार क्या है, और विश्वास की प्रार्थना कैसे की जाए।

    मैं विश्वास करता हूँ कि, जैसे तू, हे मेरे प्रभु यीशु, स्वयं सब बातों में मेरा जीवन है, वैसे ही तू मेरे प्रार्थना-जीवन का जामिन भी है, और तू स्वयं मुझे मध्यस्थता के अपने अद्भुत कार्य की संगति में ऊपर खींच लेगा।

    इसी विश्वास में मैं आज के दिन अपने आप को अपने परमेश्वर को उसके अभिषिक्त याजकों में से एक के रूप में सौंपता हूँ, कि उसके सम्मुख खड़ा होकर पापियों के लिए मध्यस्थता करूँ, और बाहर आकर उसके नाम से आशीर्वाद दूँ।

    पवित्र प्रभु यीशु! मेरे समर्पण को ग्रहण कर और उस पर मुहर लगा। हाँ, हे प्रभु, तू अपने हाथ मुझ पर रख, और स्वयं मुझे अपने इस पवित्र कार्य के लिए अलग कर। और मुझे मनुष्यों के बीच परमप्रधान परमेश्वर के याजक की चेतना और चरित्र के साथ चलने दे।

    जो हम से प्रेम रखता है, और जिसने अपने लहू के द्वारा हमें पापों से धोया है, और हमें अपने पिता परमेश्वर के लिए राजा और याजक भी बना दिया है; उसी की महिमा और पराक्रम युगानुयुग रहे। आमीन।

    ↑ ऊपर जाएँ ↑ विषय-सूची ← पुस्तकें

    ↑