पाठ 29 (31 में से)

प्रार्थना में हमारा हियाव

‘उसकी इच्छा के अनुसार;’

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    ‘और हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है। और जब हम जानते हैं, कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हम ने उससे माँगा, वह पाया है।’

    1 यूहन्ना 5:14-15।

    विश्वासपूर्ण प्रार्थना की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक, बहुतों के लिए निस्सन्देह यह है: वे नहीं जानते कि जो कुछ वे माँगते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। जब तक वे इस बात में सन्देह में रहते हैं, तब तक उनमें यह हियाव नहीं हो सकता कि इस निश्चय के साथ माँगें कि वे अवश्य पाएँगे। और वे शीघ्र ही यह सोचने लगते हैं कि यदि एक बार उन्होंने अपने निवेदन प्रगट कर दिए हैं और कोई उत्तर नहीं मिलता, तो सबसे अच्छा यही है कि परमेश्वर पर छोड़ दें कि वह अपनी सुइच्छा के अनुसार करे। यूहन्ना के शब्द, ‘यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है,’ जैसा वे उन्हें समझते हैं, प्रार्थना के उत्तर के विषय में निश्चितता को असम्भव बना देते हैं, क्योंकि वे निश्चित नहीं हो सकते कि वास्तव में परमेश्वर की इच्छा क्या हो सकती है। वे परमेश्वर की इच्छा को उसकी गुप्त युक्ति समझते हैं—मनुष्य भला कैसे उस बात की थाह ले सकता है कि सर्वज्ञानी परमेश्वर का वास्तविक अभिप्राय क्या हो सकता है?

    यह उस बात के ठीक विपरीत है जिसे यूहन्ना ने इस प्रकार लिखते हुए लक्ष्य किया था। वह हमें प्रार्थना में हियाव, भरोसे, और विश्वास के पूरे निश्चय के लिए उभारना चाहता था। वह कहता है, ‘हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है,’ कि हम कह सकें: हे पिता! तू जानता है और मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छा के अनुसार माँगता हूँ: मैं जानता हूँ कि तू मेरी सुनता है। ‘हियाव यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।’ इसी कारण वह तुरन्त जोड़ता है: ‘जब हम जानते हैं कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो यह भी जानते हैं,’ इस विश्वास के द्वारा, ‘कि पाया है,’ कि अब, प्रार्थना करते समय ही, हम ‘वह विनती,’ अर्थात् वे विशेष वस्तुएँ पा लेते हैं जो ‘हम ने उससे माँगी हैं।’ यूहन्ना यह मान लेता है कि जब हम प्रार्थना करते हैं, तो पहले यह पता कर लेते हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हैं या नहीं। वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो सकती हैं, और फिर भी तुरन्त पूरी न हों, या विश्वास की लगातार प्रार्थना के बिना पूरी न हों। हमें इस प्रकार लगे रहने और विश्वास में दृढ़ होने का साहस देने के लिए ही वह हमसे कहता है: यही हमें प्रार्थना में हियाव या भरोसा देता है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है। यह स्पष्ट है कि यदि हमारे लिए यह अनिश्चित बात हो कि हमारी विनतियाँ उसकी इच्छा के अनुसार हैं या नहीं, तो हमें उसके कहे हुए इस वचन की शान्ति नहीं मिल सकती, ‘हम जानते हैं कि जो कुछ हम ने उससे माँगा, वह पाया है।’

    परन्तु ठीक यही तो कठिनाई है। एक से अधिक विश्वासी कहते हैं: ‘मैं नहीं जानता कि जो मैं चाहता हूँ वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। परमेश्वर की इच्छा उसकी अनन्त बुद्धि का अभिप्राय है: मेरे लिए यह जानना असम्भव है कि कहीं वह मेरे लिए उससे भिन्न किसी और वस्तु को तो उत्तम नहीं समझता जो मैं चाहता हूँ, या कहीं उसके पास जो मैं माँगता हूँ उसे रोक रखने के कुछ कारण तो नहीं हैं।’ हर कोई अनुभव करता है कि ऐसे विचारों के रहते विश्वास की वह प्रार्थना, जिसके विषय में यीशु ने कहा, ‘जो कोई प्रतीति करे कि जो कुछ वह कहता है वह हो जाएगा, तो जो कुछ वह कहे उसके लिए वही होगा,’ असम्भव हो जाती है। समर्पण की, और परमेश्वर की बुद्धि पर भरोसे की प्रार्थना हो सकती है; विश्वास की प्रार्थना नहीं हो सकती। यहाँ बड़ी भूल यह है कि परमेश्वर की सन्तान वास्तव में यह विश्वास नहीं करतीं कि परमेश्वर की इच्छा को जानना सम्भव है। या यदि वे इस पर विश्वास करते भी हैं, तो उसे जानने के लिए समय और परिश्रम नहीं लगाते। हमें जिस बात की आवश्यकता है वह यह स्पष्ट देखना है कि पिता अपनी बाट जोहनेवाली, सीखने को तत्पर सन्तान की किस रीति से अगुवाई करता है कि वह जान ले कि उसकी विनती उसकी इच्छा के अनुसार है।1 परमेश्वर के पवित्र वचन के द्वारा, जिसे हृदय में, जीवन में, इच्छा में ग्रहण करके रखा गया हो; और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा, जिसे उसके भीतर वास करने और अगुवाई करने में स्वीकार किया गया हो, हम यह जानना सीखेंगे कि हमारी विनतियाँ उसकी इच्छा के अनुसार हैं।

    वचन के द्वारा। परमेश्वर की एक गुप्त इच्छा है, जिसके विषय में हम प्रायः डरते हैं कि कहीं हमारी प्रार्थनाएँ उसके विरुद्ध न हों। प्रार्थना में हमारा सम्बन्ध परमेश्वर की इस इच्छा से नहीं, परन्तु उसकी उस इच्छा से है जो उसके वचन में प्रगट की गई है। गुप्त इच्छा ने क्या ठहराया होगा, और वह हमारी प्रार्थनाओं के उत्तरों को किस प्रकार असम्भव बना सकती है, इस विषय में हमारी धारणाएँ अधिकतर बहुत भ्रामक होती हैं। बालक का-सा विश्वास, इस विषय में कि वह अपनी सन्तान के लिए क्या करने को तैयार है, केवल पिता के इस आश्वासन को थामे रहता है कि उसकी इच्छा प्रार्थना सुनने की, और वह करने की है जिसे उसके वचन पर विश्वास चाहता और ग्रहण करता है। वचन में पिता ने सामान्य प्रतिज्ञाओं के रूप में अपने लोगों के साथ अपनी इच्छा के बड़े सिद्धान्तों को प्रगट किया है। सन्तान को प्रतिज्ञा को लेकर अपने जीवन की उन विशेष परिस्थितियों पर लागू करना है जिनसे उसका सम्बन्ध है। उस प्रगट की गई इच्छा की सीमाओं के भीतर वह जो कुछ माँगता है, उसके विषय में वह जान सकता है कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है, और वह भरोसे के साथ उसकी आशा रख सकता है। अपने वचन में परमेश्वर ने हमें अपनी वह इच्छा और योजनाएँ प्रगट की हैं जो वह हमारे साथ, अपने लोगों के साथ, और संसार के साथ रखता है, और साथ ही उस अनुग्रह और सामर्थ्य की अति बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ भी दी हैं जिनके द्वारा वह अपने लोगों के माध्यम से अपनी योजनाओं को पूरा करेगा और अपना काम करेगा। जैसे-जैसे विश्वास इतना दृढ़ और साहसी होता जाता है कि विशेष परिस्थिति में सामान्य प्रतिज्ञा की पूर्ति का दावा करे, हमें यह निश्चय हो सकता है कि हमारी प्रार्थनाएँ सुनी गई हैं: वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हैं। उदाहरण के रूप में हमारे पाठ के बाद वाले पद में यूहन्ना के शब्दों को लीजिए: ‘यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखे, जिसका फल मृत्यु न हो, तो बिनती करे, और परमेश्वर उसे जीवन देगा।’ यह सामान्य प्रतिज्ञा है; और जो विश्वासी इस प्रतिज्ञा के आधार पर विनती करता है, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करता है, और यूहन्ना उसे यह जानने का हियाव देना चाहता है कि जो विनती वह माँगता है वह उसे मिल गई है।

    परन्तु परमेश्वर की इच्छा की यह समझ कुछ आत्मिक बात है, और उसे आत्मिक रीति से ही परखा जाना चाहिए। यह तर्कशास्त्र का विषय नहीं है कि हम इस प्रकार तर्क करके निष्कर्ष निकाल लें: परमेश्वर ने यह कहा है; मुझे यह मिलना ही चाहिए। और न हर मसीही का वरदान या बुलाहट एक समान है। जबकि प्रतिज्ञा में प्रगट की गई सामान्य इच्छा सब के लिए एक ही है, परमेश्वर के अभिप्राय के अनुसार हर एक के लिए एक विशेष, भिन्न इच्छा भी है। और इसी में पवित्र लोगों की बुद्धि है, कि हम में से हर एक के लिए परमेश्वर की इस विशेष इच्छा को, हमें दिए गए अनुग्रह के परिमाण के अनुसार, जानें, और इस प्रकार प्रार्थना में ठीक वही माँगें जो परमेश्वर ने हर एक के लिए तैयार और सम्भव किया है। इसी बुद्धि को देने के लिए पवित्र आत्मा हम में वास करता है। वचन की सामान्य प्रतिज्ञाओं का हमारी विशेष व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर व्यक्तिगत रूप से लागू किया जाना—इसी के लिए पवित्र आत्मा की अगुवाई हमें दी गई है।

    वचन और आत्मा की शिक्षा के इसी मेल को बहुत से लोग नहीं समझते, और इसलिए यह जानने में कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, दोहरी कठिनाई होती है। कुछ लोग परमेश्वर की इच्छा को किसी भीतरी भावना या दृढ़ धारणा में खोजते हैं, और चाहते हैं कि आत्मा वचन के बिना उनकी अगुवाई करे। दूसरे उसे वचन में खोजते हैं, पर पवित्र आत्मा की जीवित अगुवाई के बिना। दोनों को एक होना चाहिए: केवल वचन में, केवल आत्मा में, परन्तु इन्हीं में सबसे निश्चित रूप से, हम परमेश्वर की इच्छा को जान सकते हैं, और उसके अनुसार प्रार्थना करना सीख सकते हैं। हृदय में वचन और आत्मा का मिलन होना चाहिए: केवल भीतर वास करने के द्वारा ही हम उनकी शिक्षा का अनुभव कर सकते हैं। वचन को हम में वास करना चाहिए, बने रहना चाहिए: हृदय और जीवन को दिन-प्रतिदिन उसके प्रभाव के अधीन रहना चाहिए। आत्मा के द्वारा वचन का जीवित किया जाना बाहर से नहीं, परन्तु भीतर से आता है। केवल वही, जो अपने सम्पूर्ण जीवन में अपने आप को पूरी तरह वचन और परमेश्वर की इच्छा की प्रभुता के अधीन कर देता है, विशेष परिस्थितियों में यह परखने की आशा कर सकता है कि वह वचन और इच्छा उसे हियाव के साथ क्या माँगने की अनुमति देते हैं। और जैसा वचन के साथ, ठीक वैसा ही आत्मा के साथ भी: यदि मैं चाहता हूँ कि प्रार्थना में आत्मा की अगुवाई मुझे यह निश्चय दिलाए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, तो मेरा सम्पूर्ण जीवन उस अगुवाई के अधीन सौंपा हुआ होना चाहिए; केवल इसी प्रकार मन और हृदय आत्मिक और परमेश्वर की पवित्र इच्छा को जानने के योग्य बन सकते हैं। वही, जो वचन और आत्मा के द्वारा परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हुए उसमें जीवन बिताता है, उस इच्छा के अनुसार इस भरोसे के साथ प्रार्थना करना जानेगा कि वह हमारी सुनता है।

    भला होता कि मसीही लोग देख पाते कि वे इस विचार से अपनी कितनी अपार हानि करते हैं कि चूँकि सम्भवतः उनकी प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है, इसलिए उन्हें बिना उत्तर के ही सन्तुष्ट रहना चाहिए। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि बिना उत्तर की प्रार्थना का बड़ा कारण यह है कि हम ठीक रीति से प्रार्थना नहीं करते: ‘तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो।’ उत्तर न देकर, पिता हमें बताता है कि हमारी प्रार्थना में कुछ गड़बड़ है। वह हमें सिखाना चाहता है कि हम उसे खोज निकालें और उसे मान लें, और इस प्रकार हमें सच्ची विश्वासपूर्ण और प्रबल प्रार्थना के लिए शिक्षित करे। वह अपना उद्देश्य तभी प्राप्त कर सकता है जब वह हमें यह देखने तक ले आए कि उत्तर के रोके जाने के लिए हम दोषी हैं; हमारा लक्ष्य, या हमारा विश्वास, या हमारा जीवन वैसा नहीं है जैसा होना चाहिए। परन्तु परमेश्वर का यह अभिप्राय तब तक विफल होता रहता है जब तक हम यह कहकर सन्तुष्ट रहते हैं: शायद इसलिए कि मेरी प्रार्थना उसकी इच्छा के अनुसार नहीं है, वह मेरी नहीं सुनता। आह, आइए अब हम अपनी बिना उत्तर की प्रार्थनाओं का दोष परमेश्वर की गुप्त इच्छा पर नहीं, परन्तु अपने बुरी रीति से माँगने पर डालें। वह वचन, ‘तुम पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो,’ प्रभु के दीपक के समान हो, जो हृदय और जीवन को जाँचकर यह परखे कि क्या हम सचमुच उन लोगों के समान हैं जिन्हें मसीह ने निश्चित उत्तरों की अपनी प्रतिज्ञाएँ दीं। आइए हम विश्वास करें कि हम जान सकते हैं कि हमारी प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। आइए हम अपना हृदय सौंप दें कि पिता का वचन उसमें अधिकाई से बसे, कि मसीह का वचन हम में बना रहे। आइए हम दिन-प्रतिदिन उस अभिषेक के साथ जीएँ जो हमें सब बातें सिखाता है। आइए हम अपने आप को बिना किसी संकोच के पवित्र आत्मा को सौंप दें, जब वह हमें मसीह में बने रहना, पिता की उपस्थिति में वास करना सिखाता है, और हम शीघ्र ही समझ जाएँगे कि पिता का प्रेम कैसे लालायित रहता है कि सन्तान उसकी इच्छा को जाने, और इस भरोसे में कि उस इच्छा में वह सब सम्मिलित है जिसे करने की प्रतिज्ञा उसकी सामर्थ्य और प्रेम ने की है, यह भी जाने कि जो विनतियाँ हम उससे माँगते हैं वह उन्हें सुनता है। ‘हमें जो हियाव होता है, वह यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।’

    समापन प्रार्थना

    धन्य स्वामी! इस धन्य पाठ के लिए मैं अपने सम्पूर्ण हृदय से तेरा धन्यवाद करता हूँ, कि प्रार्थना के उत्तरों से भरे जीवन का मार्ग परमेश्वर की इच्छा से होकर जाता है। हे प्रभु! मुझे सिखा कि मैं इस धन्य इच्छा को उसमें जीकर, उससे प्रेम करके, और सदा उसे पूरी करके जानूँ। इस प्रकार मैं उस इच्छा के अनुसार प्रार्थनाएँ चढ़ाना सीखूँगा, और परमेश्वर की धन्य इच्छा के साथ उनके मेल में प्रार्थना में अपना हियाव और उत्तर ग्रहण करने में अपना भरोसा पाऊँगा।

    हे पिता! तेरी इच्छा है कि तेरी सन्तान तेरी उपस्थिति और आशीष का आनन्द ले। तेरी इच्छा है कि तेरी सन्तान के जीवन में सब कुछ तेरी इच्छा के अनुरूप हो, और पवित्र आत्मा यह उसमें उत्पन्न करे। तेरी इच्छा है कि तेरी सन्तान प्रार्थना के स्पष्ट उत्तरों के दैनिक अनुभव में जीए, कि वह तेरे साथ जीवित और सीधी संगति का आनन्द ले। तेरी इच्छा है कि तेरा नाम तेरी सन्तानों में और उनके द्वारा महिमा पाए, और जो तुझ पर भरोसा रखते हैं उनमें वह महिमा पाएगा। हे मेरे पिता! तेरी यह इच्छा हर उस बात में जो मैं माँगता हूँ, मेरा भरोसा हो।

    धन्य उद्धारकर्ता! मुझे इस इच्छा की महिमा पर विश्वास करना सिखा। वह इच्छा अनन्त प्रेम है, जो ईश्वरीय सामर्थ्य के साथ हर उस मानवीय इच्छा में अपना अभिप्राय पूरा करता है जो अपने आप को उसके अधीन कर देती है। हे प्रभु! मुझे यह सिखा। तू मुझे यह दिखा सकता है कि वचन की हर प्रतिज्ञा और हर आज्ञा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा है, और उसकी पूर्ति स्वयं परमेश्वर ने मेरे लिए सुनिश्चित कर दी है। इस प्रकार परमेश्वर की इच्छा मेरे लिए वह दृढ़ चट्टान बन जाए जिस पर मेरी प्रार्थना और उत्तर का मेरा निश्चय सदा टिका रहे। आमीन।

    टिप्पणी।

    परमेश्वर की इच्छा के विषय में प्रायः बड़ी उलझन रहती है। लोग सोचते हैं कि जो परमेश्वर चाहता है वह अनिवार्य रूप से होकर ही रहेगा। ऐसा कदापि नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों के लिए बहुत सी आशीषें चाहता है, जो उन तक कभी नहीं पहुँचतीं। वह उन्हें अत्यन्त सच्चाई से चाहता है, परन्तु वे उन्हें नहीं चाहते, और वे उन तक नहीं पहुँच सकतीं। यही स्वतंत्र इच्छा के साथ मनुष्य की सृष्टि का, और छुटकारे में उसकी इच्छा के नवीनीकरण का भी बड़ा भेद है, कि परमेश्वर ने बहुत सी बातों में अपनी इच्छा के पूरा होने को मनुष्य की इच्छा पर निर्भर कर दिया है। परमेश्वर की उस इच्छा में से जो उसकी प्रतिज्ञाओं में प्रगट की गई है, उतनी ही पूरी होगी जितनी हमारा विश्वास ग्रहण करता है। प्रार्थना वह शक्ति है जिसके द्वारा वह होता है जो अन्यथा न होता। और विश्वास वह शक्ति है जिसके द्वारा यह निर्णय होता है कि परमेश्वर की इच्छा में से कितनी हम में पूरी होगी। जब एक बार परमेश्वर किसी प्राण पर प्रगट कर देता है कि वह उसके लिए क्या करने को तैयार है, तो उस इच्छा के पूरा होने का उत्तरदायित्व हम पर आ जाता है।

    कुछ लोग डरते हैं कि इससे मनुष्य के हाथों में बहुत अधिक शक्ति रख दी जाती है। परन्तु मसीह यीशु में सारी शक्ति मनुष्य के हाथों में रख दी गई है। सारी प्रार्थना और सारी सामर्थ्य की कुंजी उसी की है, और जब हम यह समझना सीख लेंगे कि वह ठीक उतना ही हमारे साथ है जितना पिता के साथ, और कि हम भी ठीक उतने ही उसके साथ एक हैं जितना वह पिता के साथ, तब हम देखेंगे कि यह कितना स्वाभाविक, उचित और सुरक्षित है कि जो उसमें वैसे ही बने रहते हैं जैसे वह पिता में, उन्हें ऐसी सामर्थ्य दी जाए। मसीह पुत्र ही को यह अधिकार है कि जो चाहे माँगे: उसमें बने रहने और उसके हम में बने रहने के द्वारा (एक ऐसी ईश्वरीय वास्तविकता में जिसकी हमें बहुत कम समझ है) ही उसका आत्मा हम में वह फूँकता है जो वह हमारे द्वारा माँगना और पाना चाहता है। हम उसके नाम में प्रार्थना करते हैं: प्रार्थनाएँ सचमुच हमारी हैं और उतनी ही सचमुच उसकी भी।

    फिर दूसरे लोग डरते हैं कि यह विश्वास करना कि प्रार्थना में ऐसी सामर्थ्य है, परमेश्वर की स्वतंत्रता और प्रेम को सीमित करना है। आह, काश हम जानते कि हम उसकी स्वतंत्रता और उसके प्रेम को किस प्रकार सीमित कर रहे हैं, जब हम उसे उस एकमात्र रीति से काम करने नहीं देते जिससे वह, अब जब उसने हमें अपने साथ संगति में ले लिया है, काम करना चुनता है—हमारी प्रार्थनाओं और हमारे विश्वास के द्वारा। सेवकाई के एक भाई ने एक बार, जब हम इसी विषय पर बात कर रहे थे, पूछा कि क्या इसमें यह खतरा नहीं है कि हम यह सोचने लगें कि प्राणों के प्रति हमारा प्रेम और उन्हें आशीषित होते देखने की हमारी इच्छा ही परमेश्वर के प्रेम और उन्हें आशीष देने की परमेश्वर की इच्छा को प्रेरित करती है। हम ठीक उसी समय कुछ बड़े जल-पाइपों के पास से गुज़र रहे थे, जिनके द्वारा पहाड़ की एक बड़ी धारा से पानी पहाड़ियों और घाटियों के ऊपर से होकर कुछ दूरी पर स्थित एक नगर तक ले जाया जा रहा था। उत्तर दिया गया, ज़रा इन पाइपों को देखिए; इन्होंने पानी को पहाड़ियों से नीचे बहने के लिए तत्पर नहीं बनाया, न ही इन्होंने उसे आशीष और ताज़गी देने की उसकी शक्ति दी: यह तो उसका स्वभाव ही है। वे केवल इतना कर सकते थे कि उसकी दिशा निश्चित करें: उनके द्वारा नगर के निवासियों ने कहा कि वे वह आशीष वहाँ चाहते हैं। और ठीक इसी प्रकार, प्रेम करना और आशीष देना परमेश्वर का स्वभाव ही है। नीचे की ओर, और सदा नीचे की ओर, उसका प्रेम अपनी जीवन देनेवाली और ताज़गी देनेवाली धाराओं के साथ आने को लालायित रहता है। परन्तु उसने प्रार्थना पर छोड़ दिया है कि वह बताए कि आशीष कहाँ आए। उसने यह अपने विश्वासी लोगों को सौंप दिया है कि वे जीवन के जल को सूने स्थानों तक पहुँचाएँ: आशीष देने की परमेश्वर की इच्छा मनुष्य की इस इच्छा पर निर्भर है कि वह बताए कि आशीष कहाँ उतरे। ‘उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी।’ ‘और हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है। और जब हम जानते हैं, कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हम ने उससे माँगा, वह पाया है।’

    1इसका उदाहरण इस पुस्तक के अन्त में जॉर्ज मूलर के लेखों से लिए गए अंशों में देखिए।

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