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‘उस ने उन से पूछा, यह मूर्ति और नाम किस का है?’
मत्ती 21:20
‘फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं।’—उत्पत्ति 1:26।
‘यह मूर्ति किस की है?’ इसी प्रश्न के द्वारा यीशु ने अपने शत्रुओं की चाल विफल कर दी, जब उन्होंने उसे फँसाना चाहा था, और कर के विषय में कर्तव्य का प्रश्न सुलझा दिया। यह प्रश्न और इसमें निहित सिद्धान्त सब जगह लागू होते हैं। और स्वयं मनुष्य पर यह जितनी सच्चाई से लागू होता है, उतना और कहीं नहीं। वह जिसकी छवि धारण करता है, वही उसकी नियति निश्चित करती है। परमेश्वर का स्वरूप धारण करने के कारण वह परमेश्वर का है: परमेश्वर से प्रार्थना करने ही के लिए वह सृजा गया था। प्रार्थना उस अद्भुत समानता का भाग है जो वह अपने ईश्वरीय मूल-रूप से रखता है; प्रेम की उस संगति के गहरे भेद की, जिसमें त्रिएक परमेश्वर अपना परम आनन्द पाता है, प्रार्थना पृथ्वी पर की छवि और समानता है।
प्रार्थना क्या है, और परमेश्वर के साथ उसकी कैसी अद्भुत सामर्थ्य है, इस पर हम जितना अधिक मनन करते हैं, उतना ही अधिक हम यह पूछने को विवश होते हैं कि मनुष्य कौन और क्या है कि परमेश्वर की युक्तियों में उसे ऐसा स्थान दिया गया। पाप ने उसे इतना गिरा दिया है कि वह अब जो है, उससे हम इस बात की कोई कल्पना नहीं कर सकते कि उसे क्या होना था। हमें मनुष्य की सृष्टि के विषय में परमेश्वर के अपने लेख की ओर लौटना होगा, ताकि वहाँ यह खोजें कि परमेश्वर का अभिप्राय क्या था, और उस अभिप्राय की पूर्ति के लिए मनुष्य को कौन-सी क्षमताएँ दी गई थीं।
मनुष्य की नियति सृष्टि के समय परमेश्वर की भाषा से स्पष्ट प्रकट होती है। वह यह थी कि वह पृथ्वी को भर दे, उसे अपने वश में करे, और उस पर तथा उसमें की सब वस्तुओं पर अधिकार रखे। ये तीनों अभिव्यक्तियाँ हमें दिखाती हैं कि मनुष्य को परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में यहाँ पृथ्वी पर शासन करना था। परमेश्वर के राज-प्रतिनिधि के रूप में उसे परमेश्वर का स्थान भरना था: स्वयं परमेश्वर के अधीन रहकर, उसे बाकी सब कुछ परमेश्वर के अधीन रखना था। परमेश्वर की इच्छा यह थी कि पृथ्वी पर जो कुछ किया जाना था, वह सब उसी के द्वारा किया जाए: पृथ्वी का इतिहास पूरी तरह उसके हाथों में होना था।
ऐसी नियति के अनुरूप ही वह पद था जो उसे ग्रहण करना था, और वह सामर्थ्य जो उसके अधिकार में थी। जब कोई पार्थिव सम्राट किसी दूर के प्रान्त में अपना राज-प्रतिनिधि भेजता है, तो यह समझा जाता है कि वह अपनाई जानेवाली नीति के विषय में सलाह देगा, और उस सलाह के अनुसार कार्य किया जाएगा; कि उसे यह स्वतंत्रता है कि वह नीति को पूरा करने या साम्राज्य की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए आवश्यक सेना और दूसरे साधन माँगे। यदि उसकी नीति स्वीकार न की जाए, तो उसे वापस बुला लिया जाता है, ताकि किसी ऐसे व्यक्ति के लिए स्थान बने जो अपने सम्राट की इच्छाओं को अधिक अच्छी तरह समझता हो; जब तक उस पर भरोसा किया जाता है, उसकी सलाह पर अमल किया जाता है। परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में मनुष्य को शासन करना था; सब कुछ उसकी इच्छा और शासन के अधीन होना था; उसकी सलाह पर और उसके निवेदन पर स्वर्ग को पृथ्वी पर अपनी आशीष देनी थी। उसकी प्रार्थना को वह अद्भुत, यद्यपि सरल और अत्यन्त स्वाभाविक माध्यम होना था, जिसके द्वारा स्वर्ग के राजा और उसके विश्वासयोग्य सेवक मनुष्य के बीच, जो इस संसार का स्वामी था, सम्पर्क बना रहता। संसार की नियतियाँ मनुष्य की अभिलाषाओं, उसकी इच्छा और उसकी प्रार्थना के अधिकार में दे दी गई थीं।
पाप के साथ इन सब में एक भयानक परिवर्तन आ गया—मनुष्य के पतन ने सारी सृष्टि को शाप के अधीन कर दिया। छुटकारे के साथ एक महिमामय पुनर्स्थापना का आरम्भ दिखाई दिया। ज्यों ही परमेश्वर ने अब्राहम में अपने लिए एक ऐसी प्रजा बनानी आरम्भ की जिससे राजा, हाँ, वह महान राजा, निकलनेवाला था, त्यों ही हम देखते हैं कि परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक की प्रार्थना में उन लोगों की नियति निश्चित करने की कैसी सामर्थ्य है जो उसके सम्पर्क में आते हैं। अब्राहम में हम देखते हैं कि प्रार्थना केवल, या मुख्य रूप से भी, अपने लिए आशीष पाने का साधन नहीं है, वरन् मनुष्यों की नियतियों को, और परमेश्वर की उस इच्छा को जो उन पर शासन करती है, प्रभावित करने के उसके राजकीय अधिकार का प्रयोग है। हम एक बार भी अब्राहम को अपने लिए प्रार्थना करते हुए नहीं पाते। सदोम और लूत के लिए, अबीमेलेक के लिए, इश्माएल के लिए उसकी प्रार्थना यह प्रमाणित करती है कि जो मनुष्य परमेश्वर का मित्र है, उसमें अपने आस-पास के लोगों का इतिहास गढ़ने की कैसी सामर्थ्य है।
आरम्भ से मनुष्य की नियति यही थी। पवित्रशास्त्र न केवल हमें यह बताता है, वरन् यह भी सिखाता है कि परमेश्वर मनुष्य को ऐसी ऊँची बुलाहट कैसे सौंप सका। यह इसलिए था कि उसने उसे अपने ही स्वरूप और अपनी समानता में सृजा था। बाहरी शासन उसे भीतरी योग्यता के बिना नहीं सौंपा गया था: अधिकार रखने में, सबका स्वामी होने में परमेश्वर का स्वरूप धारण करने की जड़ उस भीतरी समानता में, अर्थात् उसके स्वभाव में थी। परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक भीतरी मेल और सामंजस्य था, एक आरम्भिक परमेश्वर-सदृशता, जिसने मनुष्य को परमेश्वर और उसके संसार के बीच मध्यस्थ होने की वास्तविक योग्यता दी, क्योंकि उसे भविष्यद्वक्ता, याजक और राजा होना था—परमेश्वर की इच्छा का अर्थ बताने, प्रकृति की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करने, और परमेश्वर के दान को ग्रहण करने और बाँटने के लिए। परमेश्वर का स्वरूप धारण करने के कारण ही वह परमेश्वर का शासन धारण कर सकता था; वह सचमुच परमेश्वर के इतना समान था, परमेश्वर के अभिप्रायों में प्रवेश करने और उसकी योजनाओं को पूरा करने में इतना सक्षम था, कि परमेश्वर उसे यह अद्भुत विशेषाधिकार सौंप सकता था कि संसार को जिस वस्तु की आवश्यकता हो, वह उसे माँगे और पाए। और यद्यपि पाप ने कुछ समय के लिए परमेश्वर की योजनाओं को विफल कर दिया है, तौभी प्रार्थना अब भी वही है जो वह होती यदि मनुष्य कभी न गिरता: मनुष्य की परमेश्वर-सदृशता का प्रमाण, अनन्त अदृश्य परमेश्वर के साथ उसकी संगति का वाहन, वह सामर्थ्य जिसे उस हाथ को थामने की अनुमति दी गई है जो विश्व की नियतियों को थामे हुए है। प्रार्थना केवल दया के लिए याचक की पुकार नहीं है; यह मनुष्य द्वारा अपनी इच्छा की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है—उस मनुष्य द्वारा जो जानता है कि वह ईश्वरीय मूल का है, और इसलिए सृजा गया है और इस योग्य है कि राजा जैसी स्वतंत्रता में अनन्त परमेश्वर की युक्तियों को कार्यान्वित करनेवाला बने।
जो पाप ने नष्ट किया, उसे अनुग्रह ने फिर से स्थापित कर दिया है। जो पहले आदम ने खोया, उसे दूसरे ने फिर से जीत लिया है। मसीह में मनुष्य अपना मूल पद फिर से पा लेता है, और कलीसिया, मसीह में बनी रहकर, इस प्रतिज्ञा की वारिस होती है: ‘जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’ ऐसी प्रतिज्ञा पहले स्थान में किसी भी रीति से उस अनुग्रह या आशीष से सम्बन्ध नहीं रखती जिसकी हमें अपने लिए आवश्यकता है। उसका सम्बन्ध हमारे उस पद से है जो स्वर्गीय दाखलता की फलवन्त डालियों के रूप में हमारा है, जो उसी के समान केवल पिता के काम और महिमा के लिए जीती हैं। यह उनके लिए है जो उसमें बने रहते हैं, जिन्होंने स्वयं को त्यागकर उसके आज्ञाकारिता और आत्म-बलिदान के जीवन के साथ उसी में अपना निवास बना लिया है, जिन्होंने अपना प्राण खोकर उसे उसमें पाया है, जो अब पूरी तरह पिता और उसके राज्य के हितों के लिए समर्पित हैं। ये ही वे हैं जो समझते हैं कि किस प्रकार उनकी नई सृष्टि ने उन्हें उनकी मूल नियति पर लौटा दिया है, परमेश्वर के स्वरूप और समानता को फिर से स्थापित कर दिया है, और उसके साथ अधिकार रखने की सामर्थ्य को भी। ऐसे लोगों के पास सचमुच यह सामर्थ्य है कि वे, हर एक अपने-अपने दायरे में, स्वर्ग की सामर्थ्यों को यहाँ पृथ्वी पर प्राप्त करें और बाँटें। पवित्र साहस के साथ वे बता सकते हैं कि वे क्या चाहते हैं: वे परमेश्वर की उपस्थिति में याजकों के रूप में जीते हैं; राजाओं के रूप में आनेवाले युग की सामर्थ्य उनके अधिकार में आने लगती है। 1 वे इस प्रतिज्ञा की पूर्ति में प्रवेश करते हैं: ‘जो कुछ चाहो मांगो, वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’
हे जीवते परमेश्वर की कलीसिया! तेरी बुलाहट उससे कहीं ऊँची और पवित्र है जितना तू जानती है। तेरे सदस्यों के द्वारा, जो परमेश्वर के लिए राजा और याजक हैं, परमेश्वर संसार पर शासन करना चाहता है; उनकी प्रार्थनाएँ स्वर्ग की आशीष देती भी हैं और रोकती भी हैं। अपने चुने हुओं में, जो केवल स्वयं उद्धार पाकर ही सन्तुष्ट नहीं रहते, परन्तु अपने आप को पूरी रीति से सौंप देते हैं ताकि उनके द्वारा, ठीक जैसे पुत्र के द्वारा, पिता अपनी सारी महिमामय युक्ति पूरी करे—अपने इन चुने हुओं में, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते हैं, परमेश्वर यह प्रमाणित करना चाहता है कि मनुष्य की मूल नियति कितनी अद्भुत थी। पृथ्वी पर परमेश्वर का स्वरूप धारण करनेवाले के रूप में पृथ्वी सचमुच उसके हाथ में दी गई थी। जब वह गिरा, तो उसके साथ सब कुछ गिर गया: सारी सृष्टि मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। परन्तु अब वह छुड़ाया गया है; मूल गौरव की पुनर्स्थापना आरम्भ हो गई है। यह वास्तव में परमेश्वर का अभिप्राय है कि उसके अनन्त अभिप्राय की पूर्ति, और उसके राज्य का आना, उसके उन लोगों पर निर्भर हो जो मसीह में बने रहकर उसमें—अपने सिर, उस महान याजक-राजा में—अपना स्थान ग्रहण करने को तैयार हैं, और अपनी प्रार्थनाओं में इतने साहसी हैं कि कह सकें कि वे अपने परमेश्वर से क्या करवाना चाहते हैं। पृथ्वी पर परमेश्वर का स्वरूप धारण करनेवाले और उसके प्रतिनिधि के रूप में छुड़ाए हुए मनुष्य को अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा इस पृथ्वी का इतिहास निर्धारित करना है। मनुष्य इसलिए सृजा गया, और अब फिर से इसलिए छुड़ाया गया है, कि वह प्रार्थना करे, और अपनी प्रार्थना के द्वारा अधिकार रखे।
समापन प्रार्थना
हे प्रभु! मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे? और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले? क्योंकि तू ने उसे स्वर्गदूतों से थोड़ा ही कम बनाया है, और महिमा और प्रताप का मुकुट उसके सिर पर रखा है। तू ने उसे अपने हाथों के कार्यों पर प्रभुता दी है; तू ने उसके पांव तले सब कुछ कर दिया है। हे यहोवा हमारे प्रभु, तेरा नाम सारी पृथ्वी पर क्या ही प्रतापमय है!
हे प्रभु परमेश्वर! पाप ने मनुष्य को कितना नीचे गिरा दिया है। और उसने उसकी बुद्धि को कितना भयानक रूप से अन्धकारमय कर दिया है कि वह अपनी ईश्वरीय नियति को भी नहीं जानता—कि वह तेरा सेवक और प्रतिनिधि हो। हाय! कि तेरे लोग भी, जब उनकी आँखें खुल जाती हैं, अपनी बुलाहट को स्वीकार करने और परमेश्वर के साथ सामर्थ्य पाने का यत्न करने के लिए इतने कम तैयार रहते हैं, ताकि मनुष्यों के साथ भी उनकी सामर्थ्य हो और वे उन्हें आशीष दे सकें।
हे प्रभु यीशु! तुझ ही में पिता ने मनुष्य को फिर से महिमा और प्रताप का मुकुट पहनाया है, और हमारे लिए वह बनने का मार्ग खोला है जो वह हमें बनाना चाहता है। हे प्रभु, अपने लोगों पर दया कर, और अपने निज भाग की सुधि ले! अपनी कलीसिया में सामर्थ्य के साथ कार्य कर, और अपने विश्वासी चेलों को सिखा कि वे अपने राजकीय याजकपद में, और प्रार्थना की उस सामर्थ्य में जिसे तू ने ऐसी अद्भुत प्रतिज्ञाएँ दी हैं, आगे बढ़ें, ताकि तेरे राज्य की सेवा करें, जातियों पर शासन करें, और पृथ्वी पर परमेश्वर के नाम को महिमामय बनाएँ। आमीन।
1 ‘परमेश्वर मनुष्यों की सन्तानों में से याजकों को ढूँढ़ रहा है। मानवीय याजकपद उसकी अनन्त योजना के आवश्यक भागों में से एक है। मनुष्य के द्वारा सृष्टि पर शासन करना उसका अभिप्राय है; मनुष्य के द्वारा सृष्टि की आराधना को चलाते रहना भी उतना ही उसके अभिप्राय का भाग है। ‘याजकपद स्वर्ग और पृथ्वी के बीच ठहराई हुई कड़ी है, पापी और परमेश्वर के बीच सम्पर्क का माध्यम। ऐसा याजकपद, जहाँ तक प्रायश्चित का सम्बन्ध है, केवल परमेश्वर के पुत्र के हाथों में है; जहाँ तक इसे सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच संचार का माध्यम होना है, यह छुड़ाए हुए मनुष्यों के—परमेश्वर की कलीसिया के—हाथों में भी है। ‘परमेश्वर राजाओं को ढूँढ़ रहा है। स्वर्गदूतों की श्रेणियों में से नहीं। पतित मनुष्य को ही उसके विश्व के शासक उसे देने होंगे। मानवीय हाथों को राजदण्ड धारण करना होगा, मानवीय सिरों को मुकुट पहनना होगा।—डॉ. एच. बोनार, द रेंट वेल (फटा हुआ परदा)।
