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‘परन्तु मैं ने तेरे लिये बिनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे।’
लूका 22:32।
‘मैं तुम से यह नहीं कहता, कि मैं तुम्हारे लिये पिता से बिनती करूंगा।’—यूहन्ना 16:26।
‘वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है।’—इब्रानियों 7:25।
आत्मिक जीवन की सारी बढ़ोतरी इस बात से जुड़ी है कि हम और स्पष्टता से देखें कि यीशु हमारे लिये क्या है। जितना अधिक मैं यह अनुभव करता हूं कि मसीह को मेरे लिये और मुझ में सब कुछ होना है, और कि मसीह में जो कुछ है वह सचमुच मेरे लिये है, उतना ही अधिक मैं विश्वास का वह सच्चा जीवन जीना सीखता हूं जो अपने आप के लिये मरकर पूरी रीति से मसीह में जीता है। तब मसीही जीवन ठीक रीति से जीने का व्यर्थ संघर्ष नहीं रह जाता, वरन मसीह में विश्राम करना और उसे अपना जीवन जानकर उसमें सामर्थ पाना बन जाता है, ताकि हम लड़ाई लड़ें और विश्वास की विजय प्राप्त करें। यह बात प्रार्थना के जीवन पर विशेष रूप से लागू होती है। जब वह भी केवल विश्वास की व्यवस्था के अधीन आ जाता है, और यीशु में जो परिपूर्णता और सम्पूर्णता है उसके प्रकाश में देखा जाता है, तब विश्वासी समझ जाता है कि अब उसे खिंचाव या चिन्ता-भरी फिक्र का विषय होने की आवश्यकता नहीं, वरन वह इस बात का अनुभव है कि मसीह उसके लिये और उसमें क्या करेगा—मसीह के उस जीवन में सहभागिता, जो जैसे पृथ्वी पर वैसे ही स्वर्ग में, प्रार्थना के रूप में सदा पिता की ओर ऊपर उठता रहता है। और वह प्रार्थना करने लगता है, केवल यीशु के गुणों पर, या उस मध्यस्थता पर भरोसा रखकर नहीं जिसके द्वारा हमारी अयोग्य प्रार्थनाएँ ग्रहणयोग्य बना दी जाती हैं, वरन उस निकट और घनिष्ठ एकता पर भरोसा रखकर जिसके बल पर वह हम में प्रार्थना करता है और हम उसमें। 3 सारा उद्धार स्वयं मसीह है: उसने स्वयं अपने आप को हमें दे दिया है; वह स्वयं हम में जीवित है। क्योंकि वह प्रार्थना करता है, इसलिये हम भी प्रार्थना करते हैं। जैसे चेलों ने, जब उन्होंने यीशु को प्रार्थना करते देखा, उससे विनती की कि जो कुछ वह प्रार्थना के विषय में जानता था उसका उन्हें भी सहभागी बनाए, वैसे ही हम, अब जब हम उसे सिंहासन पर मध्यस्थ के रूप में देखते हैं, जानते हैं कि वह हमें अपने साथ प्रार्थना के जीवन में सहभागी बनाता है।
उसके जीवन की अन्तिम रात में यह बात कितनी स्पष्टता से सामने आती है! अपनी महायाजकीय प्रार्थना (यूहन्ना 17) में वह हमें दिखाता है कि उसे पिता से कैसे और क्या प्रार्थना करनी है, और स्वर्ग पर चढ़ जाने के बाद वह क्या प्रार्थना करेगा। और फिर भी उसने अपने विदाई के उपदेश में बार-बार अपने पिता के पास जाने को उनके प्रार्थना के नए जीवन के साथ भी जोड़ा था। ये दोनों अन्ततः एक-दूसरे से जुड़े होने थे: उसका अपनी अनन्त मध्यस्थता के कार्य में प्रवेश करना, उसके नाम में उनके नए प्रार्थना-जीवन का आरम्भ और सामर्थ होना था। यीशु को उसकी मध्यस्थता में देखना ही हमें उसके नाम में प्रार्थना करने की सामर्थ देता है: प्रार्थना का सारा अधिकार और सारी सामर्थ मसीह की है; वह हमें अपनी मध्यस्थता में सहभागी बनाता है।
इसे समझने के लिये, पहले उसकी मध्यस्थता के विषय में सोचिए: वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है। पृथ्वी पर याजक के रूप में मसीह का कार्य केवल एक आरम्भ था। हारून के रूप में उसने अपना लहू बहाया; मलिकिसिदक के रूप में वह अब परदे के भीतर जीवित है, ताकि अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार अपना कार्य जारी रखे। जैसे मलिकिसिदक हारून से अधिक महिमावान है, वैसे ही मध्यस्थता के कार्य में ही प्रायश्चित अपनी सच्ची सामर्थ और महिमा पाता है। ‘मसीह वह है जो मर गया, वरन इससे बढ़कर, जो परमेश्वर की दाहिनी ओर भी है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है।’ वह मध्यस्थता एक गहन वास्तविकता है, एक ऐसा कार्य जो नितान्त आवश्यक है, और जिसके बिना छुटकारे का निरन्तर लागू होना सम्भव नहीं। यीशु के देहधारण और पुनरुत्थान में वह अद्भुत मेल-मिलाप हुआ, जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वरीय जीवन और परम सुख का सहभागी बना। परन्तु यहाँ नीचे उसके प्रत्येक अंग में इस मेल-मिलाप का वास्तविक व्यक्तिगत अपनाया जाना, स्वर्ग में विराजमान सिर के द्वारा उसकी ईश्वरीय सामर्थ के निरन्तर प्रयोग के बिना नहीं हो सकता। हर मन-परिवर्तन और पवित्रीकरण में, पाप और संसार पर हर विजय में, उसकी सामर्थ का वास्तविक प्रकटीकरण होता है जो उद्धार करने में सामर्थी है। और उसकी सामर्थ का यह प्रयोग केवल उसकी प्रार्थना के द्वारा होता है: वह पिता से मांगता है, और पिता से पाता है। ‘वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।’ उसके लोगों की ऐसी कोई आवश्यकता नहीं जिसके लिये वह मध्यस्थता में वह न पाता हो जो परमेश्वरत्व को देना है: सिंहासन पर उसकी मध्यस्थता उतनी ही वास्तविक और अनिवार्य है जितनी क्रूस पर थी। उसकी मध्यस्थता के बिना कुछ भी नहीं होता: वह उसका सारा समय और सारी शक्तियाँ ले लेती है, वह पिता की दाहिनी ओर उसका निरन्तर कार्य है।
और हम उसके इस कार्य के लाभों ही में नहीं, वरन स्वयं उस कार्य में भी सहभागी हैं। यह इसलिये कि हम उसकी देह हैं। देह और अंग एक हैं: ‘सिर पांवों से नहीं कह सकता, कि मुझे तुम्हारा प्रयोजन नहीं।’ जो कुछ यीशु है और जो कुछ उसके पास है, उस सब में हम उसके साझी हैं: ‘वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैं ने उन्हें दी है।’ हम उसके जीवन के, उसकी धार्मिकता के, उसके कार्य के सहभागी हैं: हम उसकी मध्यस्थता में भी उसके साझी हैं; यह ऐसा कार्य नहीं जो वह हमारे बिना करता हो।
हम यह इसलिये करते हैं कि हम उसके जीवन के सहभागी हैं: ‘मसीह जो हमारा जीवन है;’ ‘अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है।’ उसमें और हम में जो जीवन है वह एक ही है, बिल्कुल वही। हम में उसका जीवन सदा प्रार्थना करने वाला जीवन है। जब वह उतरकर हम पर अधिकार कर लेता है, तो वह अपना स्वभाव नहीं खोता; हम में भी वह सदा प्रार्थना करने वाला जीवन है—ऐसा जीवन जो निरन्तर परमेश्वर से मांगता और पाता है। और यह इस प्रकार नहीं कि प्रार्थना की दो अलग-अलग धाराएँ ऊपर उठती हों, एक उसकी ओर से और एक उसके लोगों की ओर से। नहीं, वरन जीवन की यह वास्तविक एकता प्रार्थना की एकता भी है: जो वह प्रार्थना करता है वह हम में से होकर जाती है, जो हम प्रार्थना करते हैं वह उसमें से होकर जाती है। वह सोने का धूपदान लिये हुए स्वर्गदूत है: ‘उसको बहुत धूप दिया गया,’ जो ग्रहणयोग्य प्रार्थना का भेद है, ‘कि वह उसे सब पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के साथ सोने की वेदी पर चढ़ाए।’ हम उसमें, उस मध्यस्थता करने वाले में, जीते हैं और बने रहते हैं।
एकलौता पुत्र ही एकमात्र है जिसे प्रार्थना करने का अधिकार है: केवल उसी से कहा गया, ‘मांग, और तुझे दिया जाएगा।’ जैसे अन्य सब बातों में परिपूर्णता उसी में वास करती है, वैसे ही सच्ची प्रार्थना की परिपूर्णता भी; केवल उसी के पास प्रार्थना की सामर्थ है। और जैसे आत्मिक जीवन की बढ़ोतरी इस बात को और स्पष्टता से देखने में है कि सारा धन उसी में है, और कि हम भी उसमें हैं, ताकि जो कुछ हमारा उसमें है उसे हर क्षण पाते रहें, अनुग्रह पर अनुग्रह, वैसे ही प्रार्थना-जीवन के साथ भी है। यीशु की मध्यस्थता में हमारा विश्वास केवल यह न हो कि जब हम प्रार्थना नहीं करते या नहीं कर सकते तब वह हमारे स्थान पर प्रार्थना करता है, वरन यह कि वह, हमारे जीवन और हमारे विश्वास का कर्ता होकर, हमें अपने साथ एक स्वर में प्रार्थना करने की ओर खींचता है। हमारी प्रार्थना इस अर्थ में भी विश्वास का कार्य होनी चाहिए, कि जैसे हम जानते हैं कि यीशु अपना सारा जीवन हम में पहुंचाता है, वैसे ही वह प्रार्थना की उस परिपूर्णता में से, जो केवल उसी की है, हमारी प्रार्थना को हमारे भीतर फूंकता है।
बहुत से विश्वासियों के आत्मिक जीवन में वह एक नया युग था जब उन पर यह प्रगट हुआ कि मसीह कितनी सच्चाई और पूर्णता से उनका जीवन था, और उनके विश्वासयोग्य और आज्ञाकारी बने रहने के लिये जमानतदार के रूप में खड़ा था। तभी उन्होंने पहली बार वास्तव में विश्वास का जीवन जीना आरम्भ किया। यह खोज भी कम धन्य न होगी कि मसीह हमारे प्रार्थना-जीवन का भी जमानतदार है, सारी प्रार्थना का केन्द्र और साकार रूप, जो उसके द्वारा पवित्र आत्मा के माध्यम से उसके लोगों को पहुंचाई जानी है। ‘वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है’—देह के सिर के रूप में, उस नए और जीवित मार्ग के अगुवे के रूप में जिसे उसने खोल दिया है, हमारे विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले के रूप में। वह अपने छुड़ाए हुए लोगों के जीवन के लिये हर बात में अपना ही जीवन उनमें देकर प्रबन्ध करता है: वह उनके प्रार्थना के जीवन की चिन्ता करता है, उन्हें अपने स्वर्गीय प्रार्थना-जीवन में उठा लेकर, और अपना प्रार्थना-जीवन उनके भीतर देकर और बनाए रखकर। ‘मैं ने तेरे लिये बिनती की,’ इसलिये नहीं कि तेरा विश्वास अनावश्यक हो जाए, वरन ‘इसलिये कि तेरा विश्वास जाता न रहे:’ हमारा विश्वास और विश्वास की प्रार्थना उसी के विश्वास और प्रार्थना में जड़ पकड़े हुए है। बात यह है, ‘यदि तुम मुझ में बने रहो,’ अर्थात् उस सदा जीवित मध्यस्थ में, और मेरे साथ और मुझ में प्रार्थना करो, तो ‘जो चाहो मांगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’
यीशु की मध्यस्थता में हमारी संगति का विचार हमें उस बात का स्मरण दिलाता है जो उसने हमें पहले भी एक से अधिक बार सिखाई है, कि ये सब अद्भुत प्रार्थना-प्रतिज्ञाएँ अपना लक्ष्य और अपना औचित्य परमेश्वर की महिमा में पाती हैं, जो उसके राज्य के प्रगट होने और पापियों के उद्धार में होती है। जब तक हम केवल या मुख्य रूप से अपने ही लिये प्रार्थना करते हैं, तब तक उस अन्तिम रात की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिये एक मुहरबन्द पुस्तक ही बनी रहेंगी। ये प्रतिज्ञाएँ दाखलता की फल लाने वाली डालियों को दी गई हैं; उन चेलों को जो संसार में वैसे ही भेजे गए जैसे पिता ने उसे भेजा, ताकि नाश होते हुए मनुष्यों के लिये जीएँ; उसके विश्वासयोग्य सेवकों और घनिष्ठ मित्रों को जो उस कार्य को उठा लेते हैं जिसे वह पीछे छोड़ जाता है, जो अपने प्रभु के समान गेहूँ के उस दाने के समान बन गए हैं जो अपना जीवन खोता है ताकि उसे कई गुना बढ़ाए;—ऐसे ही लोगों को ये प्रतिज्ञाएँ दी गई हैं। आइए, हम में से हर एक यह पता लगाए कि वह कार्य क्या है, और वे कौन-से प्राण हैं जो हमारी विशेष प्रार्थनाओं को सौंपे गए हैं; आइए, हम उनके लिये अपनी मध्यस्थता को परमेश्वर के साथ अपनी संगति का जीवन बनाएँ, तब हम न केवल प्रार्थना में सामर्थ की प्रतिज्ञाओं को अपने लिये सच्चा होते पाएँगे, वरन तभी हम पहली बार अनुभव करने लगेंगे कि मसीह में हमारा बने रहना और हम में उसका बने रहना हमें मनुष्यों को आशीष देने और उनका उद्धार करने के उसके अपने आनन्द में किस प्रकार सहभागी बनाता है।
हे हमारे धन्य प्रभु यीशु की परम अद्भुत मध्यस्थता, जिसके हम न केवल सब कुछ के लिये ऋणी हैं, वरन जिसमें हम सक्रिय साझीदार और सहकर्मी बनाकर ले लिये गए हैं! अब हम समझते हैं कि यीशु के नाम में प्रार्थना करना क्या है, और उसमें ऐसी सामर्थ क्यों है। उसके नाम में, उसके आत्मा में, स्वयं उसमें, उसके साथ पूर्ण एकता में। हे मनुष्य मसीह यीशु की अद्भुत, सदा सक्रिय और परम प्रभावशाली मध्यस्थता! कब हम पूरी रीति से उसमें ले लिये जाएँगे और सदा उसमें प्रार्थना करेंगे?
समापन प्रार्थना
हे धन्य प्रभु! दीन आराधना में मैं फिर तेरे सामने झुकना चाहता हूं। तेरे छुटकारे का सारा कार्य अब प्रार्थना में बदल गया है; जो कुछ तू ने अपने लहू से मोल लिया उसे बनाए रखने और बाँटने में जो कुछ अब तुझे व्यस्त रखता है, वह केवल प्रार्थना है। तू प्रार्थना करने के लिये सर्वदा जीवित है। और क्योंकि हम तुझ में हैं और तुझ में बने रहते हैं, इसलिये पिता के पास सीधी पहुंच सदा खुली है, हमारा जीवन निरन्तर प्रार्थना का जीवन हो सकता है, और हमारी प्रार्थना का उत्तर निश्चित है।
हे धन्य प्रभु! तू ने अपने लोगों को प्रार्थना के जीवन में अपने सहकर्मी होने के लिये बुलाया है। तू ने अपने आप को अपने लोगों के साथ जोड़ लिया है और उन्हें अपनी देह के रूप में मध्यस्थता की उस सेवकाई में अपने साथ सहभागी बनाता है, जिसके द्वारा ही संसार तेरे छुटकारे के फल और पिता की महिमा से भर सकता है। पहले से कहीं अधिक स्वतंत्रता के साथ मैं तेरे पास आता हूं, हे मेरे प्रभु, और तुझ से विनती करता हूं: मुझे प्रार्थना करना सिखा। तेरा जीवन प्रार्थना है, तेरा जीवन मेरा है। हे प्रभु! मुझे प्रार्थना करना सिखा, तुझ में, तेरे समान।
और, हे मेरे प्रभु! मुझे विशेष रूप से यह जानने दे, जैसी तू ने अपने चेलों से प्रतिज्ञा की थी, कि तू पिता में है, और मैं तुझ में, और तू मुझ में। पवित्र आत्मा की जोड़ने वाली सामर्थ मेरे सारे जीवन को तुझ में और तेरी मध्यस्थता में बने रहना बना दे, कि मेरी प्रार्थना उसकी प्रतिध्वनि हो, और पिता मुझे तुझ में और तुझे मुझ में सुने। हे प्रभु यीशु! हर बात में तेरा मन मुझ में हो, और हर बात में मेरा जीवन तुझ में हो। तब मैं वह नाली बनने के लिये तैयार हो जाऊंगा जिसके द्वारा तेरी मध्यस्थता संसार पर अपनी आशीष उण्डेलती है। आमीन।
टिप्पणी।
‘यीशु के नाम में प्रार्थना के नए युग को मसीह आत्मा के उण्डेले जाने के समय के रूप में बताता है, जिसमें चेले छुटकारे की व्यवस्था की अधिक प्रकाशित समझ में प्रवेश करते हैं, और यीशु के साथ अपनी एकता के विषय में उतने ही स्पष्ट रूप से सचेत हो जाते हैं जितना पिता के साथ उसकी एकता के विषय में। यीशु के नाम में उनकी प्रार्थना अब सीधे स्वयं पिता से होती है। यीशु कहता है, “मैं तुम से यह नहीं कहता, कि मैं तुम्हारे लिये बिनती करूंगा, क्योंकि पिता तो आप ही तुम से प्रीति रखता है;” जबकि आत्मा के आने से पहले के समय के विषय में उसने पहले कहा था: “मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा।” इस प्रकार इस प्रार्थना का केन्द्रीय विचार यह अन्तर्दृष्टि है कि हम मसीह में परमेश्वर के साथ जोड़े गए हैं, जो दोनों ओर से परमेश्वर और हमारे बीच एकता का जीवित बन्धन है (यूहन्ना 17:23: “मैं उनमें और तू मुझ में”), ताकि यीशु में हम पिता को अपने साथ जुड़ा हुआ, और अपने आप को पिता के साथ जुड़ा हुआ देखें। यीशु मसीह हम पर केवल मन में सत्य के द्वारा ही नहीं, वरन हमारी अन्तरतम व्यक्तिगत चेतना में जीवित व्यक्तिगत मेल-मिलाप के रूप में प्रगट हुआ हो, ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसमें परमेश्वर का पितृत्व और पिता-प्रेम मानव स्वभाव के साथ, और मानव स्वभाव परमेश्वर के साथ, पूर्ण रूप से जुड़ गया है। ऐसा नहीं कि पिता से सीधी प्रार्थना के साथ मसीह की मध्यस्थता अलग कर दी जाती है; परन्तु अब उसे किसी बाहरी वस्तु के रूप में, जो हमसे बाहर विद्यमान है, नहीं देखा जाता, वरन हमारे भीतर एक वास्तविक, जीवित, आत्मिक अस्तित्व के रूप में, ताकि हमारे लिये मसीह, अर्थात् मध्यस्थ, सचमुच हम में मसीह बन गया है।
‘जब मसीह में परमेश्वर और मसीह में हमारे बीच इस एकता की चेतना अब भी नहीं होती, या दोष के बोध से धुँधली पड़ गई होती है, तब विश्वास की प्रार्थना हमारे प्रभु की ओर सहायक के रूप में देखती है, जो हमारे लिये पिता से प्रार्थना करता है। (यूहन्ना 16:26 की तुलना यूहन्ना 14:16, 17; 9:20; लूका 21:32; 1 यूहन्ना 2:1 से कीजिए।) प्रार्थना में मसीह को इस प्रकार सहायक के रूप में लेना, यूहन्ना 16:26 के अनुसार, पूर्ण रूप से उसके नाम में प्रार्थना के समान नहीं है। मसीह की पैरवी का उद्देश्य यह है कि वह हमें उसके साथ, और उसमें पिता के साथ, उस आन्तरिक, स्वावलम्बी जीवन-एकता की ओर ले चले, जिसके बल पर मसीह वह है जिसमें परमेश्वर हमारे साथ सीधे सम्बन्ध में प्रवेश करता है और अपने आप को हमारे साथ जोड़ता है, और जिसमें हम सब परिस्थितियों में परमेश्वर के साथ सीधे सम्बन्ध में प्रवेश करते हैं। इसी प्रकार यीशु के नाम में प्रार्थना इस बात में नहीं है कि हम उसकी आज्ञा पर प्रार्थना करें: जब से प्रभु ने चेलों को अपनी “हे हमारे पिता” वाली प्रार्थना दी थी तब से वे इसी प्रकार प्रार्थना करते आए थे, फिर भी वह कहता है, “अब तक तुम ने मेरे नाम से प्रार्थना नहीं की।” केवल तब, जब मसीह की मध्यस्थता पवित्र आत्मा के भीतर वास करने के द्वारा हमारे भीतर जीवन और सामर्थ बन जाती है, और इस प्रकार उसका मन, जैसा वह उसके वचन और कार्य में प्रगट हुआ, हमारी व्यक्तिगत चेतना और इच्छा पर अधिकार करके उसे भर देता है, यहाँ तक कि विश्वास और प्रेम में हम यीशु को अपने भीतर उस मेल कराने वाले के रूप में रखते हैं जिसने वास्तव में हमें परमेश्वर के साथ एक कर दिया है: केवल तभी उसका नाम, जिसमें उसका स्वभाव और उसका कार्य सम्मिलित था, हम में (न केवल हमारे लिये) सत्य और सामर्थ बन जाता है, और यीशु के नाम में हमें पिता के पास वह स्वतंत्र, सीधी पहुंच मिलती है जिसके सुने जाने का निश्चय है। यीशु के नाम में प्रार्थना पिता के साथ एक पुत्र की स्वतंत्रता है, जैसे यीशु के पास पहिलौठे के रूप में यह थी। हम यीशु के स्थान पर प्रार्थना करते हैं, इस अर्थ में नहीं कि हम अपने आप को उसके स्थान पर रख सकते हैं, वरन इस हद तक कि हम उसमें हैं और वह हम में। हम सीधे पिता के पास जाते हैं, परन्तु केवल इस रूप में कि पिता मसीह में है, इस रूप में नहीं कि मानो वह मसीह से अलग हो। इसलिये जहाँ कहीं भीतरी मनुष्य मसीह में नहीं जीता और उसे जीवित जन के रूप में अपने पास उपस्थित नहीं रखता, जहाँ उसका वचन अपनी आत्मिक सामर्थ में हृदय पर राज्य नहीं करता, जहाँ उसका सत्य और जीवन हमारे प्राण का जीवन नहीं बन गया है, वहाँ यह सोचना व्यर्थ है कि “तेरे प्रिय पुत्र के निमित्त” जैसा कोई सूत्र कुछ काम आएगा।’—क्रिस्टलिखे एथिक (Christliche Ethik), डॉ. आई. टी. बेक, ट्यूबिंगन, खण्ड 3, 39।
3 मसीह को ऐसे सहायक या मध्यस्थ के रूप में रखने में, जो हमसे बाहर खड़ा है, और उसे अपने भीतर रखने में—जहाँ हम उसमें बने रहते हैं और वह हम में, पवित्र आत्मा के द्वारा जो उसके साथ हमारी एकता को सिद्ध करता है, ताकि हम स्वयं उसके नाम में सीधे पिता के पास आ सकें—जो अन्तर है, उसके विषय में ऊपर दी गई ट्यूबिंगन के बेक की टिप्पणी देखिए।
