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जब परमेश्वर अपनी कलीसिया को कोई ऐसा सत्य नये सिरे से सिखाना चाहता है जिसे समझा नहीं जा रहा या जिस पर चला नहीं जा रहा, तो वह अधिकतर ऐसा किसी मनुष्य को खड़ा करके करता है, जो वचन और कर्म दोनों में उस सत्य की धन्यता का जीवित गवाह हो। और इसी प्रकार परमेश्वर ने इस उन्नीसवीं शताब्दी में, औरों के साथ-साथ, जॉर्ज मुलर को खड़ा किया है कि वे इस बात के उसके गवाह हों कि वह सचमुच प्रार्थना का सुननेवाला है। मैं ऐसा कोई तरीका नहीं जानता जिससे प्रार्थना के विषय में परमेश्वर के वचन के मुख्य सत्यों को उनके जीवन के, और प्रार्थना के जो अनुभव वे बताते हैं उनके, एक संक्षिप्त अवलोकन से अधिक प्रभावशाली रीति से स्पष्ट और स्थापित किया जा सके।
उनका जन्म प्रशिया में 25 सितम्बर 1805 को हुआ था, और इस प्रकार अब वे अस्सी वर्ष के हैं। उनका आरम्भिक जीवन, धर्मविज्ञान के विद्यार्थी के रूप में हाले विश्वविद्यालय में प्रवेश करने के बाद भी, अत्यन्त दुष्टता से भरा था। जब वे ठीक बीस वर्ष के थे, एक मित्र उन्हें एक संध्या एक प्रार्थना-सभा में ले गया; वहाँ वे गहराई से प्रभावित हुए, और शीघ्र ही उद्धारकर्ता को जानने लगे। इसके कुछ ही समय बाद वे मिशनरी पत्रिकाएँ पढ़ने लगे, और समय पाकर उन्होंने स्वयं को ‘यहूदियों में मसीहियत के प्रचार के लिए लंदन सोसाइटी’ की सेवा के लिए अर्पित किया। उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्वीकार कर लिया गया, परन्तु शीघ्र ही उन्होंने पाया कि वे सब बातों में सोसाइटी के नियमों के अधीन नहीं रह सकते, क्योंकि वे नियम पवित्र आत्मा की अगुवाई के लिए बहुत कम स्वतंत्रता छोड़ते थे। 1830 में आपसी सहमति से यह सम्बन्ध समाप्त हो गया, और वे टेनमथ में एक छोटी मंडली के पास्टर बन गए। 1832 में वे ब्रिस्टल पहुँचाए गए, और बेथेस्दा चैपल के पास्टर रहते हुए ही वे अनाथालय और अन्य कार्य की ओर ले जाए गए, जिसके सम्बन्ध में परमेश्वर ने उन्हें इतनी अद्भुत रीति से अपने वचन पर भरोसा करना, और यह अनुभव करना सिखाया कि परमेश्वर उस वचन को कैसे पूरा करता है।
उनके आत्मिक जीवन के विषय में कुछ उद्धरण उस बात के लिए मार्ग तैयार करेंगे जो हम विशेष रूप से प्रार्थना के सम्बन्ध में उनके अनुभवों में से उद्धृत करना चाहते हैं।
‘इसके सम्बन्ध में मैं यह बताना चाहूँगा कि प्रभु ने बड़े अनुग्रह से मेरे ईश्वरीय जीवन के बिलकुल आरम्भ से ही मुझे आत्मिक बातों में कुछ मात्रा में सरलता और बालक का सा स्वभाव दिया, जिससे यद्यपि मैं पवित्रशास्त्र से अत्यन्त अनजान था, और अब भी समय-समय पर बाहरी पापों से भी पराजित हो जाता था, तौभी मैं छोटी से छोटी बातों को प्रार्थना में प्रभु के पास ले जाने के योग्य किया गया। और मैंने पाया है कि “भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है।” यद्यपि मैं बहुत निर्बल और अज्ञानी था, तौभी अब परमेश्वर के अनुग्रह से मुझमें दूसरों का भला करने की कुछ इच्छा थी, और जिसने कभी इतनी विश्वासयोग्यता से शैतान की सेवा की थी, वह अब मसीह के लिए प्राणों को जीतने का यत्न करने लगा।’
टेनमथ में ही वे यह जानने की ओर ले जाए गए कि परमेश्वर के वचन को कैसे काम में लाएँ, और पवित्र आत्मा पर उस शिक्षक के रूप में भरोसा करें जिसे परमेश्वर ने उस वचन को स्पष्ट करने के लिए दिया है। वे लिखते हैं:—
‘तब परमेश्वर ने मुझे यह दिखाना आरम्भ किया कि आत्मिक बातों में केवल परमेश्वर का वचन ही हमारे न्याय का मापदण्ड है; कि उसकी व्याख्या केवल पवित्र आत्मा ही कर सकता है; और कि हमारे दिनों में भी, जैसे पहले के समयों में, वही अपने लोगों का शिक्षक है। पवित्र आत्मा के कार्य को मैंने उस समय से पहले अनुभव के द्वारा नहीं समझा था।
‘विशेषकर इस पिछली बात को समझने की मेरी शुरुआत ही थी जिसका मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ा; क्योंकि प्रभु ने मुझे इसे अनुभव की कसौटी पर परखने के योग्य किया, इस प्रकार कि मैंने टीकाओं और लगभग हर दूसरी पुस्तक को एक ओर रख दिया, और केवल परमेश्वर का वचन पढ़ा और उसका अध्ययन किया।
‘इसका परिणाम यह हुआ कि पहली ही संध्या, जब मैंने पवित्रशास्त्र पर प्रार्थना और मनन में लगने के लिए अपने आपको अपने कमरे में बन्द किया, मैंने कुछ ही घण्टों में उससे अधिक सीखा जितना मैंने उससे पहले कई महीनों की अवधि में सीखा था।
‘परन्तु विशेष अन्तर यह था कि ऐसा करने से मुझे अपने प्राण के लिए सच्ची शक्ति मिली। अब मैं उन बातों को, जो मैंने सीखी और देखी थीं, पवित्रशास्त्र की कसौटी पर परखने लगा, और पाया कि केवल वे ही सिद्धान्त सचमुच मूल्यवान थे जो उस परख में खरे उतरे।’
परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता के विषय में, अपने बपतिस्मा लेने के सम्बन्ध में, वे इस प्रकार लिखते हैं:—
‘परमेश्वर को अपनी बड़ी दया में यह भाया कि मेरे मन को ऐसी दशा में ले आए कि जो कुछ भी मैं पवित्रशास्त्र में पाऊँ, उसे अपने जीवन में उतारने के लिए मैं तैयार था। मैं कह सकता था, “मैं उसकी इच्छा पर चलूँगा,” और मेरा विश्वास है कि इसी कारण मैंने देखा कि कौन सा “उपदेश परमेश्वर की ओर से है।”—और मैं यहाँ प्रसंगवश यह भी कहना चाहूँगा कि जिस खण्ड की ओर मैंने अभी संकेत किया है (यूहन्ना 7:17), वह मेरे लिए हमारे परमपवित्र विश्वास के बहुत से सिद्धान्तों और आज्ञाओं पर एक अत्यन्त उल्लेखनीय व्याख्या रहा है। उदाहरण के लिए: “बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उस की ओर दूसरा भी फेर दे। और यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे, तो उसे दोहर भी ले लेने दे। और जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा। जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उस से मुंह न मोड़। अपने बैरियों से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप दें उन्हें आशीष दो, जो तुम से बैर करें उनका भला करो, और जो तुम्हारा अपमान करें और तुम्हें सताएँ उनके लिये प्रार्थना करो” (मत्ती 5:39-44)। “अपनी संपत्ति बेचकर दान कर दो” (लूका 12:33)। “आपस के प्रेम को छोड़ और किसी बात में किसी के कर्जदार न हो” (रोमियों 12:8)। कोई कह सकता है, “निश्चय ही इन खण्डों को अक्षरशः नहीं लिया जा सकता, क्योंकि तब परमेश्वर के लोग संसार में से कैसे निभ पाएँगे?” यूहन्ना 7:17 में जिस मनोदशा की आज्ञा दी गई है, वह ऐसी आपत्तियों को मिटा देगी। जो कोई प्रभु की इन आज्ञाओं को अक्षरशः पूरा करने के लिए तैयार है, मेरा विश्वास है कि वह मेरे साथ यह देखने की ओर ले जाया जाएगा कि इन्हें अक्षरशः लेना ही परमेश्वर की इच्छा है।—जो लोग इन्हें इस प्रकार लेते हैं, वे निस्सन्देह प्रायः ऐसी कठिनाइयों में पड़ेंगे जिन्हें सहना शरीर के लिए कठिन होगा, परन्तु इनका प्रभाव यह होगा कि वे निरन्तर अनुभव करते रहें कि वे यहाँ परदेशी और यात्री हैं, कि यह संसार उनका घर नहीं है, और इस प्रकार वे और भी अधिक परमेश्वर पर डाल दिए जाएँगे, जो निश्चय ही हमें हर उस कठिनाई में से पार ले जाएगा जिसमें हम उसके वचन की आज्ञा मानने का यत्न करने के कारण पड़ सकते हैं।’
परमेश्वर के वचन के प्रति इस निःसंकोच समर्पण ने उन्हें धन के सम्बन्ध में कुछ विशेष विचारों और आचरण की ओर पहुँचाया, जिन्होंने उनके आगे के जीवन को बड़े सामर्थ्य से प्रभावित किया। इनकी जड़ इस दृढ़ विश्वास में थी कि धन एक ईश्वरीय भण्डारीपन है, और इसलिए सारा धन स्वयं परमेश्वर के साथ सीधी संगति में ही ग्रहण और व्यय किया जाना चाहिए। इसने उन्हें निम्नलिखित चार बड़े नियम अपनाने की ओर पहुँचाया: 1. कोई निश्चित वेतन न लेना, क्योंकि एक तो उसे इकट्ठा करने में प्रायः बहुत कुछ ऐसा होता था जो उस स्वेच्छा-भेंट के विरुद्ध था जिसके द्वारा परमेश्वर की सेवा चलाई जानी चाहिए, और दूसरे उसे ग्रहण करने में यह खतरा था कि जीवित परमेश्वर की अपेक्षा आय के मानवीय साधनों पर अधिक निर्भरता रखी जाए। 2. किसी भी मनुष्य से कभी सहायता न माँगना, चाहे आवश्यकता कितनी ही बड़ी क्यों न हो, परन्तु अपनी आवश्यकताएँ उस परमेश्वर को बताना जिसने अपने दासों की सुधि लेने और उनकी प्रार्थना सुनने की प्रतिज्ञा की है। 3. इस आज्ञा (लूका 12:33) को, ‘अपनी संपत्ति बेचकर दान कर दो,’ अक्षरशः लेना, और कभी धन बचाकर न रखना, परन्तु जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा, वह सब परमेश्वर के कंगालों पर, उसके राज्य के काम पर खर्च करना। 4. रोमियों 13:8 को भी, ‘किसी बात में किसी के कर्जदार न हो,’ अक्षरशः लेना, और कभी उधार पर कुछ न खरीदना, न किसी वस्तु के लिए कर्जदार होना, परन्तु आपूर्ति के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखना।
जीवन की यह रीति आरम्भ में सरल नहीं थी। परन्तु मुलर गवाही देते हैं कि यह प्राण को परमेश्वर में विश्राम दिलाने में, और जब वह पीछे हटने की ओर झुकता था तब उसे स्वयं परमेश्वर के साथ और घनिष्ठ एकता में खींच लाने में, अत्यन्त आशीषमय रही। ‘क्योंकि यह नहीं चलेगा, यह सम्भव ही नहीं है, कि कोई पाप में जीवन बिताए, और उसी समय परमेश्वर के साथ संगति के द्वारा इस वर्तमान जीवन के लिए आवश्यक हर वस्तु स्वर्ग से नीचे खींच ले।’
ब्रिस्टल में बसने के कुछ ही समय बाद, दैनिक पाठशालाओं, संडे स्कूल, मिशन और बाइबल के कार्य में सहायता के लिए ‘स्वदेश और विदेश के लिए पवित्रशास्त्रीय ज्ञान संस्था’ की स्थापना की गई। अनाथालय का कार्य, जिसके कारण श्री मुलर सबसे अधिक जाने जाते हैं, इसी संस्था की एक शाखा बना। 1834 में एक अनाथ बच्चे की दशा ने उनके हृदय को छू लिया, जो उनकी एक पाठशाला में मसीह के पास लाया गया था, परन्तु जिसे एक दरिद्रालय में जाना पड़ा जहाँ उसकी आत्मिक आवश्यकताओं की कोई सुधि न ली जाती। इसके कुछ ही समय बाद फ्रांके की जीवनी पढ़ने पर वे लिखते हैं (20 नवम्बर 1835): ‘आज मेरे हृदय पर यह बात बहुत भारी रूप से रखी गई है कि अब मैं केवल एक अनाथालय की स्थापना के विषय में सोचता ही न रहूँ, परन्तु सचमुच उसमें लग जाऊँ, और इस विषय में प्रभु की इच्छा जानने के लिए मैं बहुत प्रार्थना में रहा हूँ। परमेश्वर इसे स्पष्ट कर दे।’ और फिर, 25 नवम्बर को: ‘कल और आज मैं अनाथालय के विषय में फिर बहुत प्रार्थना में रहा हूँ, और मुझे अधिकाधिक निश्चय होता जा रहा है कि यह परमेश्वर की ओर से है। वह अपनी दया से मेरी अगुवाई करे। तीन मुख्य कारण ये हैं—1. कि परमेश्वर की महिमा हो, यदि उसे मुझे साधन देना भाए, इस बात के प्रगट होने से कि उस पर भरोसा रखना व्यर्थ बात नहीं है; और कि इस प्रकार उसकी सन्तानों का विश्वास दृढ़ हो। 2. पिता-विहीन और माता-विहीन बच्चों का आत्मिक कल्याण। 3. उनका सांसारिक कल्याण।’
कुछ महीनों तक प्रार्थना करने और परमेश्वर की बाट जोहने के बाद, तीस बच्चों के रहने योग्य एक मकान किराये पर लिया गया, और समय पाकर तीन और, जिनमें कुल मिलाकर 120 बच्चे रहते थे। यह कार्य दस वर्ष तक इसी प्रकार चलता रहा, और अनाथों की आवश्यकताओं की आपूर्ति केवल परमेश्वर से ही माँगी और पाई गई। प्रायः वह भारी आवश्यकता और बहुत प्रार्थना का समय होता था, परन्तु विश्वास की परख, जो सोने से भी बहुमूल्य है, परमेश्वर की प्रशंसा और आदर और महिमा का कारण ठहरी। प्रभु अपने दास को बड़ी बातों के लिए तैयार कर रहा था। अपने विधान और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा श्री मुलर इस बात की ओर पहुँचाए गए कि वे 300 बच्चों के रहने योग्य एक अनाथालय के लिए £15,000 की इच्छा करें, और तब तक परमेश्वर की बाट जोहते रहें जब तक उन्हें उससे इसकी निश्चित प्रतिज्ञा न मिल जाए। यह पहला अनाथालय 1849 में खोला गया। 1858 में 950 और अनाथों के लिए दूसरा और तीसरा अनाथालय खोला गया, जिस पर £35,000 खर्च हुए। और 1869 और 1870 में 850 और अनाथों के लिए चौथा और पाँचवाँ अनाथालय, £50,000 के व्यय से, खोला गया, जिससे अनाथों की कुल संख्या 2100 हो गई।
इस कार्य के अतिरिक्त, परमेश्वर ने उन्हें अन्य कार्यों के लिए—पाठशालाओं और मिशनों के भरण-पोषण, बाइबल और ट्रैक्ट वितरण के लिए—लगभग उतना ही दिया है जितना अनाथालयों के निर्माण और अनाथों के पालन-पोषण के लिए दिया। कुल मिलाकर इन पचास वर्षों में उन्होंने परमेश्वर के कार्य में खर्च करने के लिए परमेश्वर से दस लाख पाउंड स्टर्लिंग से भी अधिक पाया है। आइए, हम ध्यान से देखें कि जब उन्होंने परमेश्वर के वचन और पवित्र आत्मा की अगुवाई की आज्ञा मानकर £35 प्रति वर्ष का अपना छोटा सा वेतन छोड़ दिया, तब वे कितना कम जानते थे कि परमेश्वर आज्ञाकारिता और विश्वास के प्रतिफल के रूप में उन्हें क्या देने की तैयारी कर रहा था; और यह वचन उनके लिए कितनी अद्भुत रीति से पूरा होने वाला था: ‘तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊँगा।’
और ये बातें हमारे लिए दृष्टान्त के रूप में हुई हैं। परमेश्वर हमें बुलाता है कि हम जॉर्ज मुलर की सी चाल चलें, जैसे वे मसीह की सी चाल चलते हैं। उनका परमेश्वर हमारा परमेश्वर है; वही प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए हैं; प्रेम और विश्वास की वही सेवा, जिसमें उन्होंने परिश्रम किया, हर ओर से हमें पुकार रही है। आइए, प्रार्थना की पाठशाला के अपने पाठों के सम्बन्ध में हम उस रीति का अध्ययन करें जिससे परमेश्वर ने जॉर्ज मुलर को प्रार्थना के मनुष्य के रूप में ऐसी सामर्थ्य दी: हम उसमें उन कुछ पाठों का अत्यन्त उल्लेखनीय उदाहरण पाएँगे जिनका अध्ययन हम धन्य गुरु के साथ वचन में करते आए हैं। विशेष रूप से हमारे मन पर उसका यह पहला बड़ा पाठ अंकित होगा कि यदि हम उसके पास उस रीति से आएँ जो उसने बताई है, ऐसी निश्चित विनतियों के साथ जिन्हें आत्मा ने वचन के द्वारा हम पर परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होने के रूप में प्रगट किया है, तो हम पूरे भरोसे के साथ विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ हम माँगेंगे, वह हो जाएगा।
प्रार्थना और परमेश्वर का वचन।
हम एक से अधिक बार देख चुके हैं कि परमेश्वर का हमारी वाणी सुनना इस बात पर निर्भर है कि हम उसकी वाणी सुनें। (देखिए पाठ 22 और 23।) जब हम कोई विशेष विनती करते हैं, तो केवल यही आवश्यक नहीं कि हमारे पास उसके आधार के रूप में कोई विशेष प्रतिज्ञा हो, परन्तु हमारा सारा जीवन वचन के प्रभुत्व के अधीन होना चाहिए: वचन हममें बसा रहना चाहिए। इस विषय में जॉर्ज मुलर की गवाही अत्यन्त शिक्षाप्रद है। वे हमें बताते हैं कि परमेश्वर के वचन के सच्चे स्थान की, और उसके साथ आत्मा की शिक्षा की खोज, उनके आत्मिक जीवन में एक नये युग का आरम्भ थी। इसके विषय में वे लिखते हैं:—
‘अब पवित्रशास्त्र के अनुसार सोचने की रीति यह होती: परमेश्वर ने स्वयं लेखक बनने की कृपा की है, और मैं उस बहुमूल्य पुस्तक से अनजान हूँ जिसे उसके पवित्र आत्मा ने उसके दासों के माध्यम से लिखवाया है, और उसमें वह है जो मुझे जानना चाहिए, और जिसका ज्ञान मुझे सच्चे सुख की ओर ले जाएगा; इसलिए मुझे इस अत्यन्त बहुमूल्य पुस्तक को, पुस्तकों की इस पुस्तक को, बार-बार पढ़ना चाहिए, अत्यन्त लगन से, अत्यन्त प्रार्थनापूर्वक, और बहुत मनन के साथ; और इस अभ्यास में मुझे अपने जीवन भर लगे रहना चाहिए। क्योंकि मैं जानता था, यद्यपि मैं उसे बहुत कम पढ़ता था, कि मैं उसके विषय में लगभग कुछ भी नहीं जानता। परन्तु इस प्रकार करने और परमेश्वर के वचन के विषय में अपनी अज्ञानता के कारण उसका और अधिक अध्ययन करने की ओर प्रेरित होने के बदले, उसे समझने में मेरी कठिनाई ने, और उसमें मुझे मिलने वाले थोड़े से आनन्द ने, मुझे उसे पढ़ने के विषय में लापरवाह बना दिया (क्योंकि वचन का बहुत प्रार्थनापूर्ण पठन केवल अधिक ज्ञान ही नहीं देता, परन्तु उसे पढ़ने में हमारे आनन्द को भी बढ़ाता है); और इस प्रकार, बहुत से विश्वासियों के समान, अपने ईश्वरीय जीवन के पहले चार वर्षों में मैंने व्यवहार में जीवित परमेश्वर के वचनों की अपेक्षा अप्रेरित मनुष्यों की रचनाओं को अधिक पसन्द किया। परिणाम यह हुआ कि मैं ज्ञान और अनुग्रह दोनों में बालक ही बना रहा। ज्ञान में, मैं कहता हूँ; क्योंकि समस्त सच्चा ज्ञान आत्मा के द्वारा वचन से ही प्राप्त होना चाहिए। और क्योंकि मैंने वचन की उपेक्षा की, इसलिए लगभग चार वर्ष तक मैं ऐसा अज्ञानी रहा कि अपने पवित्र विश्वास की मूल बातों को भी स्पष्ट रूप से नहीं जानता था। और ज्ञान की इस कमी ने मुझे परमेश्वर के मार्गों में स्थिरता से चलने से बड़े दुःखद रूप से रोके रखा। क्योंकि जब अगस्त 1829 में प्रभु को यह भाया कि वह मुझे सचमुच पवित्रशास्त्र तक ले आए, तब मेरा जीवन और चाल-चलन बहुत भिन्न हो गया। और यद्यपि तब से मैं जो हो सकता था और जो मुझे होना चाहिए था, उससे बहुत पीछे रह गया हूँ, तौभी परमेश्वर के अनुग्रह से मैं पहले की अपेक्षा उसके बहुत निकट जीवन बिताने के योग्य किया गया हूँ। यदि ऐसे कोई विश्वासी इसे पढ़ें जो व्यवहार में पवित्रशास्त्र की अपेक्षा दूसरी पुस्तकों को अधिक पसन्द करते हैं, और जो परमेश्वर के वचन की अपेक्षा मनुष्यों की रचनाओं में कहीं अधिक आनन्द लेते हैं, तो वे मेरी हानि से चेतावनी पाएँ। यदि प्रभु को यह भाए कि इस पुस्तक के माध्यम से वह अपने कुछ लोगों को इस ओर ले आए कि वे अब पवित्रशास्त्र की उपेक्षा न करें, परन्तु उसे वह प्राथमिकता दें जो वे अब तक मनुष्यों की रचनाओं को देते आए हैं, तो मैं समझूँगा कि यह पुस्तक बहुत भलाई का साधन बनी है।
‘इस विषय को छोड़ने से पहले मैं केवल इतना और कहना चाहूँगा: यदि पाठक परमेश्वर के वचन को बहुत कम समझता है, तो उसे उसे बहुत अधिक पढ़ना चाहिए; क्योंकि आत्मा वचन की व्याख्या वचन के द्वारा करता है। और यदि उसे वचन पढ़ने में थोड़ा ही आनन्द आता है, तो ठीक यही कारण है कि उसे उसे बहुत पढ़ना चाहिए; क्योंकि पवित्रशास्त्र का बार-बार पढ़ना उसमें आनन्द उत्पन्न करता है, यहाँ तक कि हम उसे जितना अधिक पढ़ते हैं, उतना ही अधिक पढ़ने की इच्छा करते हैं।
‘सबसे बढ़कर, उसे अपने मन में यह बात पक्की कर लेने का यत्न करना चाहिए कि केवल परमेश्वर ही अपने आत्मा के द्वारा उसे सिखा सकता है, और इसलिए, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि आशीषों के लिए उससे विनती की जाए, उसे उचित है कि वह पढ़ने से पहले, और पढ़ते समय भी, परमेश्वर की आशीष माँगे।
‘इसके अतिरिक्त, उसे अपने मन में यह भी पक्का कर लेना चाहिए कि यद्यपि पवित्र आत्मा सबसे उत्तम और पर्याप्त शिक्षक है, तौभी यह शिक्षक सदा ठीक उसी समय नहीं सिखाता जब हम चाहते हैं, और इसलिए हमें कुछ खण्डों की व्याख्या के लिए उससे बार-बार विनती करनी पड़ सकती है; परन्तु अन्त में वह हमें निश्चय सिखाएगा, यदि हम सचमुच प्रार्थनापूर्वक, धीरज से, और परमेश्वर की महिमा को ध्यान में रखकर ज्योति खोज रहे हैं।’ 4
उनकी दैनिकी में हम बार-बार इस बात का उल्लेख पाते हैं कि वे अपने आत्मिक जीवन के पोषण के लिए वचन पर दो-दो और तीन-तीन घण्टे प्रार्थना में बिताते थे। इसके फल के रूप में, जब उन्हें प्रार्थना में शक्ति और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती, तो अलग-अलग प्रतिज्ञाएँ उनके लिए किसी पुस्तक से लिए गए इतने तर्क मात्र नहीं थीं जिन्हें परमेश्वर के सामने प्रयोग किया जाए, परन्तु वे जीवित वचन थे जिन्हें उन्होंने पिता की जीवित वाणी को अपने से कहते सुना था, और जिन्हें अब वे जीवित विश्वास के साथ पिता के पास ला सकते थे।
प्रार्थना और परमेश्वर की इच्छा।
नये विश्वासियों के लिए सबसे बड़ी कठिनाइयों में से एक यह जानना है कि वे कैसे पता लगाएँ कि जो वे चाहते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। मैं इसे उन सबसे बहुमूल्य पाठों में से एक गिनता हूँ जो परमेश्वर जॉर्ज मुलर के अनुभव के द्वारा सिखाना चाहता है, कि जिन बातों के विषय में उसका वचन सीधे कुछ नहीं कहता, उनके विषय में भी वह यह प्रगट करने को तैयार है कि वे हमारे लिए उसकी इच्छा हैं, और हम उन्हें माँग सकते हैं। आत्मा की शिक्षा—वचन के बिना या उसके विरुद्ध नहीं, परन्तु उससे ऊपर और उससे आगे की, उसके अतिरिक्त किसी बात के रूप में, जिसके बिना हम परमेश्वर की इच्छा को नहीं देख सकते—हर विश्वासी की विरासत है। वचन के द्वारा, और केवल वचन के द्वारा ही, आत्मा सिखाता है, और सामान्य सिद्धान्तों या प्रतिज्ञाओं को हमारी विशेष आवश्यकता पर लागू करता है। और केवल आत्मा, और आत्मा ही, वचन को सचमुच हमारे मार्ग के लिए उजियाला बना सकता है, चाहे वह हमारे दैनिक चाल-चलन में कर्तव्य का मार्ग हो, या परमेश्वर के निकट आने में विश्वास का मार्ग। आइए, हम यह देखने का यत्न करें कि वह कैसी बालक की सी सरलता और सीखने की तत्परता थी जिसमें परमेश्वर की इच्छा का पता उसके दास पर इतनी निश्चितता और इतनी स्पष्टता से प्रगट हुआ।
पहले अनाथालय के निर्माण के विषय में, और इस निश्चय के विषय में कि यह परमेश्वर की इच्छा है, वे मई 1850 में, उसके खुलने के ठीक बाद, उन बड़ी कठिनाइयों की चर्चा करते हुए जो सामने थीं, और यह कि स्वाभाविक दृष्टि से उनका दूर होना कितना कम सम्भव दिखाई देता था, लिखते हैं: ‘परन्तु यद्यपि मेरे सामने की स्थिति, यदि मैं उसे स्वाभाविक दृष्टि से देखता, मुझे अभिभूत कर देती, तौभी मुझे एक बार भी यह सन्देह करने नहीं दिया गया कि इसका अन्त कैसे होगा। क्योंकि जैसे आरम्भ से ही मुझे निश्चय था कि यह परमेश्वर की इच्छा है कि मैं उसके लिए यह बड़ा अनाथालय बनाने के कार्य में लगूँ, वैसे ही आरम्भ से ही मुझे ऐसा निश्चय था कि यह सब पूरा हो जाएगा, मानो वह अनाथालय पहले से ही भर चुका हो।’
जिस रीति से उन्होंने यह पता लगाया कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह दूसरे अनाथालय के निर्माण के उनके वृत्तान्त में विशेष स्पष्टता से सामने आती है; और मैं पाठक से विनती करता हूँ कि वह उस पाठ का ध्यान से अध्ययन करे जो यह वृत्तान्त देता है:—
‘5 दिसम्बर 1850।—इन परिस्थितियों में मैं केवल यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि प्रभु अपनी कोमल दया में शैतान को मुझ पर लाभ उठाने न दे। परमेश्वर के अनुग्रह से मेरा हृदय कहता है: हे प्रभु, यदि मुझे निश्चय हो सकता कि यह तेरी इच्छा है कि मैं इस विषय में आगे बढ़ूँ, तो मैं आनन्द से ऐसा करता; और दूसरी ओर, यदि मुझे निश्चय हो सकता कि ये व्यर्थ, मूर्खतापूर्ण, घमण्ड भरे विचार हैं, कि ये तेरी ओर से नहीं हैं, तो मैं तेरे अनुग्रह से इनसे घृणा करता, और इन्हें पूरी रीति से अलग कर देता।
‘मेरी आशा परमेश्वर पर है: वह मेरी सहायता करेगा और मुझे सिखाएगा। तौभी, मेरे साथ उसके पिछले व्यवहारों को देखते हुए, यदि वह मुझे इस मार्ग में और भी अधिक विस्तार से परिश्रम करने के लिए बुलाए, तो यह मेरे लिए न कोई अनोखी बात होगी, न आश्चर्य की।
‘अनाथ-कार्य को बढ़ाने के विचार इस कारण नहीं उठे हैं कि हाल में बहुत धन आया है; क्योंकि पिछले दिनों मुझे लगभग सात सप्ताह तक परमेश्वर की बाट जोहनी पड़ी है, जब कि थोड़ा, तुलना में बहुत ही थोड़ा आया, अर्थात् जितना आया उससे लगभग चार गुना बाहर जा रहा था; और यदि प्रभु ने पहले से मुझे बड़ी रकमें न भेजी होतीं, तो हम सचमुच संकट में पड़ जाते।
‘हे प्रभु! तेरा दास इस विषय में तेरी इच्छा कैसे जाने? क्या तू उसे सिखाने की कृपा करेगा!
11 दिसम्बर।—ऊपर की बातें लिखने के बाद पिछले छः दिनों में मैं दिन-प्रतिदिन इस विषय में परमेश्वर की बाट जोहता रहा हूँ। सामान्यतः यह बात सारे दिन न्यूनाधिक मेरे हृदय पर रही है। जब मैं रात को जागता रहा हूँ, तब भी यह मेरे विचारों से दूर नहीं रही। तौभी यह सब बिना किसी उत्तेजना के है। इसके विषय में मैं पूरी रीति से शान्त और स्थिर हूँ। यदि मुझे निश्चय हो सकता कि प्रभु चाहता है कि मैं इस सेवा में आगे बढ़ूँ, तो मेरा प्राण ऐसा करने में आनन्दित होता; क्योंकि तब अनगिनत कठिनाइयों के होते हुए भी सब कुछ भला होता; और उसके नाम की महिमा होती।
‘दूसरी ओर, यदि मुझे निश्चय हो जाता कि प्रभु चाहता है कि मैं सेवा के अपने वर्तमान क्षेत्र से सन्तुष्ट रहूँ, और कि मुझे कार्य को बढ़ाने के विषय में प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, तो उसके अनुग्रह से मैं बिना किसी प्रयास के आनन्द से इसे स्वीकार कर लेता; क्योंकि उसने मेरे हृदय को ऐसी दशा में पहुँचा दिया है कि इस विषय में मैं केवल उसे प्रसन्न करना चाहता हूँ। इसके अतिरिक्त, अब तक मैंने इस बात की चर्चा अपनी प्रिय पत्नी से भी नहीं की है, जो बीस वर्ष से अधिक समय से मेरे आनन्द, दुःख और परिश्रम की सहभागी रही है; और न ही सम्भावना है कि मैं कुछ समय तक ऐसा करूँगा: क्योंकि मैं इस विषय पर बातचीत किए बिना चुपचाप प्रभु की बाट जोहना अधिक उचित समझता हूँ, ताकि इस प्रकार उसकी आशीष से मैं और सरलता से बाहरी बातों के प्रभाव से बचा रहूँ। इस विषय में मेरी प्रार्थना का मुख्य भार यह है कि प्रभु मुझे कोई भूल करने न दे, और कि वह मुझे अपनी इच्छा पूरी करना सिखाए।
‘26 दिसम्बर।—पिछला अनुच्छेद लिखे पन्द्रह दिन बीत गए हैं। तब से हर दिन मैं इस विषय में प्रार्थना करता रहा हूँ, और वह भी परमेश्वर की सहायता से अच्छी मात्रा की लगन के साथ। इन दिनों में जागते हुए शायद ही कोई घण्टा बीता हो जिसमें यह बात न्यूनाधिक मेरे सामने न रही हो। परन्तु यह सब उत्तेजना की छाया तक के बिना है। मैं इसके विषय में किसी से बातचीत नहीं करता। अब तक मैंने अपनी प्रिय पत्नी से भी ऐसा नहीं किया है। इससे मैं अब भी अपने आपको रोके रहता हूँ, और इस विषय में केवल परमेश्वर ही से व्यवहार करता हूँ, ताकि कोई बाहरी प्रभाव और कोई बाहरी उत्तेजना मुझे उसकी इच्छा की स्पष्ट खोज तक पहुँचने से रोक न सके। मुझे पूर्ण और अत्यन्त शान्तिपूर्ण निश्चय है कि वह मुझे अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से दिखाएगा। आज संध्या मैंने परमेश्वर की इच्छा जानने का यत्न करने के लिए फिर एक विशेष गम्भीर प्रार्थना का समय बिताया है। परन्तु यद्यपि मैं प्रभु से निरन्तर विनती और याचना करता रहता हूँ कि वह इस कार्य में मुझे धोखा खाने न दे, तौभी मैं कह सकता हूँ कि इसके परिणाम के विषय में, अर्थात् यह कि मुझे इस विषय में आगे बढ़ना चाहिए, मेरे मन में शायद ही कोई सन्देह शेष है। तौभी, क्योंकि यह उन अत्यन्त महत्वपूर्ण कदमों में से एक है जो मैंने कभी उठाए हैं, मैं समझता हूँ कि इस विषय में मैं कितनी भी सावधानी, प्रार्थनाशीलता और सोच-विचार से काम लूँ, वह अधिक नहीं होगा। मुझे इसकी कोई जल्दी नहीं है। यदि यह उसकी इच्छा हो, तो परमेश्वर के अनुग्रह से मैं इस बात की ओर एक भी कदम उठाने से पहले, या किसी से इसकी चर्चा करने से पहले भी, वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकता हूँ; और दूसरी ओर, यदि प्रभु मुझे आज्ञा दे, तो मैं कल ही काम में लग जाऊँगा। मन की यह शान्ति, इस विषय में अपनी कोई इच्छा न रखना, इसमें केवल अपने स्वर्गीय पिता को प्रसन्न करने की इच्छा रखना, इसमें केवल उसके आदर की, न कि अपने आदर की, खोज करना; हृदय की यह दशा, मैं कहता हूँ, मेरे लिए इस बात का पूर्ण निश्चय है कि मेरा हृदय किसी शारीरिक उत्तेजना के अधीन नहीं है, और कि यदि मुझे इसी प्रकार आगे बढ़ते रहने में सहायता मिलती रही, तो मैं परमेश्वर की इच्छा को पूरी रीति से जान लूँगा। परन्तु यह लिखते हुए मैं साथ ही यह जोड़े बिना नहीं रह सकता कि मैं सचमुच यह आदर और महिमामय सौभाग्य चाहता हूँ कि प्रभु मुझे अधिकाधिक काम में लाए।
‘मैं चाहता हूँ कि मुझे 300 के बदले एक हजार अनाथों के लिए पवित्रशास्त्र की शिक्षा का प्रबन्ध करने की अनुमति मिले। मैं चाहता हूँ कि 300 के बदले एक हजार अनाथों के सामने नियमित रूप से पवित्रशास्त्र की व्याख्या करूँ। मैं चाहता हूँ कि यह बात और भी अधिक बहुतायत से प्रगट हो कि परमेश्वर अब भी प्रार्थना का सुननेवाला और उत्तर देनेवाला है, और कि वह अब भी वैसा ही जीवित परमेश्वर है जैसा वह सदा था और सदा रहेगा, जब वह केवल प्रार्थना के उत्तर में, मुझे 700 अनाथों के लिए एक भवन और उनके भरण-पोषण के साधन देने की कृपा करेगा। यह अन्तिम विचार मेरे मन में सबसे महत्वपूर्ण बात है। इस सारे विषय में प्रभु का आदर ही मेरे लिए मुख्य बात है; और ठीक इसी कारण, यदि इस कार्य में आगे न बढ़ने से उसकी अधिक महिमा होती, तो मैं उसके अनुग्रह से एक और अनाथालय के विषय में सारे विचार छोड़ देने में पूरी तरह सन्तुष्ट रहता। निश्चय ही, पवित्र आत्मा के द्वारा प्राप्त ऐसी मनोदशा में, हे मेरे स्वर्गीय पिता, तू अपनी सन्तान को भूल करने न देगा, धोखा खाने देना तो दूर की बात है। परमेश्वर की सहायता से मैं इस विषय में दिन-प्रतिदिन प्रार्थना में उसकी बाट जोहता रहूँगा, जब तक वह मुझे कार्य करने की आज्ञा न दे।
‘2 जनवरी 1851।—एक सप्ताह पहले मैंने पिछला अनुच्छेद लिखा था। इस सप्ताह में भी मुझे दिन-प्रतिदिन, और हर दिन एक से अधिक बार, एक और अनाथालय के विषय में प्रभु का मार्गदर्शन खोजने में सहायता मिलती रही है। मेरी प्रार्थना का भार अब भी यही रहा है कि वह अपनी बड़ी दया में मुझे भूल करने से बचाए रखे। पिछले सप्ताह पवित्रशास्त्र के मेरे क्रमिक पठन में नीतिवचन की पुस्तक आई है, और इस विषय के सम्बन्ध में निम्नलिखित खण्डों से मेरा हृदय ताज़ा हुआ है: “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा” (नीतिवचन 3:5, 6)। परमेश्वर के अनुग्रह से मैं अपने सब कामों में प्रभु को स्मरण करता हूँ, और विशेष रूप से इस बात में; इसलिए मुझे यह सान्त्वनापूर्ण निश्चय है कि मेरी सेवा के इस भाग के विषय में, कि मैं इसमें लगूँ या नहीं, वह मेरे लिए सीधा मार्ग निकालेगा। फिर: “सीधे लोग अपनी खराई से अगुवाई पाते हैं” (नीतिवचन 11:3)। परमेश्वर के अनुग्रह से मैं इस कार्य में सीधा हूँ। मेरा सच्चा उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि मेरी ठीक अगुवाई की जाएगी। फिर: “अपने कामों को यहोवा पर डाल दे, इस से तेरी कल्पनाएं सिद्ध होंगी” (नीतिवचन 16:3)। मैं अपने कामों को प्रभु पर डालता हूँ, और इसलिए आशा करता हूँ कि मेरी कल्पनाएँ सिद्ध होंगी। मेरा हृदय अधिकाधिक एक शान्त, स्थिर और दृढ़ निश्चय पर पहुँच रहा है कि प्रभु अनाथ-कार्य में मुझे और आगे काम में लाने की कृपा करेगा। हे प्रभु, तेरा दास यहाँ है।’
जब बाद में उन्होंने दो और भवन, संख्या 4 और 5, बनाने का निर्णय किया, तब वे फिर इस प्रकार लिखते हैं:—
‘पिछला अनुच्छेद लिखे बारह दिन बीत गए हैं। मैं अब भी दिन-प्रतिदिन अनाथ-कार्य को बढ़ाने के विषय में प्रभु की बाट जोहने के योग्य किया गया हूँ, और इस पूरी अवधि में भी मैं पूर्ण शान्ति में रहा हूँ, जो इस बात का परिणाम है कि इस विषय में मैं केवल प्रभु के आदर की, और अपने संगी मनुष्यों के सांसारिक और आत्मिक लाभ की खोज करता हूँ। यदि केवल मुझे निश्चय हो जाए कि परमेश्वर की इच्छा यही है कि मैं ऐसा करूँ, तो उसके अनुग्रह से मैं बिना किसी प्रयास के इस सारे विषय के सब विचारों को अलग रख सकता हूँ; और दूसरी ओर, यदि वह ऐसा ही चाहे, तो तुरन्त आगे बढ़ जाऊँगा। मैंने अब तक यह बात पूरी रीति से अपने ही तक रखी है। यद्यपि अब लगभग सात सप्ताह हो गए हैं जब से दिन-प्रतिदिन न्यूनाधिक मेरा मन इसमें लगा रहा है, और जब से मैं प्रतिदिन इसके विषय में प्रार्थना करता रहा हूँ, तौभी एक भी मनुष्य इसे नहीं जानता। अब तक मैंने अपनी प्रिय पत्नी से भी इसकी चर्चा नहीं की है, ताकि इस प्रकार चुपचाप परमेश्वर की बाट जोहते हुए, इस विषय पर जो कुछ मुझसे कहा जाए, उससे मैं प्रभावित न होऊँ। आज की संध्या विशेष रूप से प्रार्थना के लिए अलग की गई है, जिसमें मैंने प्रभु से एक बार फिर विनती की कि वह इस बात में मुझे भूल करने न दे, और शैतान के द्वारा धोखा खाने देना तो और भी कम। मैंने यह भी यत्न किया है कि एक और अनाथालय बनाने के विरुद्ध सब कारण, और उसके पक्ष में सब कारण, मेरे मन के सामने से होकर गुजरें: और अब स्पष्टता और निश्चितता के लिए उन्हें लिख रहा हूँ। . . .
‘तौभी, पिछले नौ कारण मेरे लिए चाहे कितने ही भारी हों, यदि एक और कारण न होता तो वे मुझे निर्णय पर न पहुँचाते। वह यह है। महीनों तक इस विषय पर विचार करने, और इसे इसके सब पहलुओं में और इसकी सब कठिनाइयों के साथ देखने, और फिर बहुत प्रार्थना के बाद अन्ततः इस विस्तार का निर्णय करने की ओर ले जाए जाने के बाद, मेरा मन शान्ति में है। वह बालक, जिसने अपने स्वर्गीय पिता से बार-बार विनती की है कि वह उसे धोखा खाने न दे, और न कोई भूल ही करने दे, इस निर्णय के विषय में शान्ति में है, पूर्ण शान्ति में है; और इस प्रकार उसे यह निश्चय है कि सप्ताहों और महीनों तक बहुत प्रार्थना के बाद जिस निर्णय पर वह पहुँचा है, वह पवित्र आत्मा की अगुवाई है; और इसलिए वह आगे बढ़ने का संकल्प करता है, पूरे निश्चय से विश्वास करते हुए कि वह लज्जित न होगा, क्योंकि वह परमेश्वर पर भरोसा रखता है। उसकी कठिनाइयाँ बहुत और बड़ी हो सकती हैं; पूरा उत्तर प्राप्त होने से पहले हजारों और दस हजारों प्रार्थनाएँ परमेश्वर तक पहुँच चुकी हो सकती हैं; विश्वास और धीरज का बहुत अभ्यास आवश्यक हो सकता है; परन्तु अन्त में फिर यह देखा जाएगा कि उसका दास, जो उस पर भरोसा रखता है, लज्जित नहीं हुआ।’
प्रार्थना और परमेश्वर की महिमा।
हमने एक से अधिक बार इस सत्य पर बल देने का यत्न किया है कि जहाँ हम साधारणतः अपनी प्रार्थनाओं के न सुने जाने का कारण इस बात में खोजते हैं कि जो वस्तु हम माँगते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है, वहाँ पवित्रशास्त्र हमें चेतावनी देता है कि हम उसका कारण अपने आप में खोजें—इस बात में कि हम ठीक दशा में नहीं हैं, या ठीक आत्मा से नहीं माँगते। वस्तु तो पूरी रीति से उसकी इच्छा के अनुसार हो सकती है, परन्तु माँगना, अर्थात् विनती करनेवाले की आत्मा, नहीं; तब हमारी नहीं सुनी जाती। जैसे सब पाप की बड़ी जड़ स्वयं और स्वार्थ की खोज है, वैसे ही कोई भी बात, हमारी अधिक आत्मिक इच्छाओं में भी, परमेश्वर को उत्तर देने से इतनी प्रभावशाली रीति से नहीं रोकती जितनी यह: कि हम अपने सुख या अपनी महिमा के लिए प्रार्थना करते हैं। सामर्थ्य पाने और प्रबल होने के लिए प्रार्थना को परमेश्वर की महिमा के लिए माँगना चाहिए; और मनुष्य ऐसा केवल तभी कर सकता है जब वह परमेश्वर की महिमा के लिए जी रहा हो।
जॉर्ज मुलर में हमारे पास लिखित इतिहास के सबसे उल्लेखनीय उदाहरणों में से एक है, जिसमें परमेश्वर का पवित्र आत्मा एक मनुष्य को प्रार्थना के एक क्रम के आरम्भ में ही, सोच-समझकर और व्यवस्थित रूप से, परमेश्वर की महिमा को अपना पहला और एकमात्र लक्ष्य बनाने की ओर ले गया। आइए, जो वे कहते हैं उस पर हम भली-भाँति मनन करें, और वह पाठ सीखें जो परमेश्वर उनके द्वारा हमें सिखाना चाहता है:—
‘मेरे सामने लगातार ऐसे उदाहरण आते रहे जिनसे यह प्रमाणित होता था कि हमारे दिनों में परमेश्वर की सन्तानों को जिन विशेष बातों की आवश्यकता थी, उनमें से एक यह थी कि उनका विश्वास दृढ़ किया जाए।
‘इसलिए मैं लालायित था कि मेरे पास कुछ ऐसा हो जिसकी ओर मैं अपने भाइयों का ध्यान एक दृश्य प्रमाण के रूप में दिला सकूँ कि हमारा परमेश्वर और पिता वही विश्वासयोग्य परमेश्वर है जैसा वह सदा था; और उन सब के लिए जो उस पर भरोसा रखते हैं, अपने आपको हमारे दिनों में भी पहले के समान जीवित परमेश्वर प्रमाणित करने को उतना ही तैयार है जितना सदा था।
‘मेरी आत्मा लालायित थी कि मैं उनका विश्वास दृढ़ करने का साधन बनूँ, न केवल परमेश्वर के वचन से उसकी इच्छा और सामर्थ्य के उदाहरण देकर कि वह उन सब की सहायता करता है जो उस पर निर्भर रहते हैं, परन्तु प्रमाणों के द्वारा उन्हें यह दिखाकर भी कि वह हमारे दिनों में भी वैसा ही है। मैं जानता था कि परमेश्वर का वचन पर्याप्त होना चाहिए, और अनुग्रह से वह मेरे लिए पर्याप्त था; तौभी मैंने समझा कि मुझे अपने भाइयों की सहायता के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए।
‘इसलिए मैंने अपने आपको इस बात के लिए बाध्य समझा कि मैं मसीह की कलीसिया का सेवक बनूँ, उसी विशेष बात में जिसमें मुझ पर दया हुई थी; अर्थात् परमेश्वर की बात पर विश्वास करने और उस पर निर्भर रहने के योग्य होने में। इस कार्य का पहला उद्देश्य यह था, और अब भी है: कि परमेश्वर की महिमा इस तथ्य के द्वारा हो कि मेरी देखरेख में रहने वाले अनाथों को, किसी से माँगे बिना, केवल प्रार्थना और विश्वास के द्वारा, उनकी आवश्यकता की सब वस्तुएँ मिलती हैं; जिससे यह देखा जा सके कि परमेश्वर अब भी विश्वासयोग्य है, और अब भी प्रार्थना सुनता है।
‘इन पिछले दिनों में मैंने फिर अनाथालय के विषय में बहुत प्रार्थना की है, और बार-बार अपने हृदय को जाँचा है; कि यदि इसे स्थापित करने में मेरी कुछ भी इच्छा अपने आपको सन्तुष्ट करने की हो, तो मैं उसे पहचान लूँ। क्योंकि मैं केवल प्रभु की महिमा चाहता हूँ, इसलिए यदि यह बात उसकी ओर से न हो, तो मैं अपने भाई के माध्यम से शिक्षा पाकर प्रसन्न होऊँगा।
‘जब मैंने 1835 में अनाथ-कार्य आरम्भ किया, तो मेरा मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की महिमा था, इस बात का व्यावहारिक प्रमाण देकर कि केवल प्रार्थना और विश्वास के माध्यम से क्या-क्या पूरा किया जा सकता है, ताकि इस प्रकार सारी कलीसिया का भला हो, और एक लापरवाह संसार को इस कार्य में यह दिखाकर परमेश्वर की बातों की वास्तविकता देखने की ओर ले जाया जाए, कि जीवित परमेश्वर अब भी, 4000 वर्ष पहले के समान, जीवित परमेश्वर है। मेरे इस उद्देश्य का बहुतायत से आदर हुआ है। इस प्रकार बहुत से पापी मन फिराकर परमेश्वर की ओर आए हैं, संसार के सब भागों में परमेश्वर की बहुत सी सन्तानों को इस कार्य से लाभ पहुँचा है, ठीक जैसी मैंने आशा की थी। परन्तु कार्य जितना बढ़ा है, आशीष भी उतनी ही बड़ी रही है, और ठीक उसी रीति से दी गई है जिस रीति से मैंने आशीष की बाट जोही थी: क्योंकि लाखों लोगों का ध्यान इस कार्य की ओर खिंचा है; और कई दसियों हजार लोग इसे देखने आए हैं। यह सब मुझे इस बात की इच्छा की ओर ले जाता है कि प्रभु के नाम की और भी बड़ी महिमा करने के लिए मैं इसी मार्ग में और आगे, और आगे परिश्रम करता रहूँ। कि सब समयों में उसी की ओर देखा जाए, उसी की बड़ाई हो, उसी की सराहना हो, उसी पर भरोसा रखा जाए, उसी पर निर्भर रहा जाए—यही इस सेवा में मेरा लक्ष्य है; और विशेष रूप से इस प्रस्तावित विस्तार में। ताकि यह देखा जा सके कि एक दरिद्र मनुष्य केवल परमेश्वर पर भरोसा रखकर प्रार्थना के द्वारा कितना कुछ करा सकता है; और ताकि इस प्रकार परमेश्वर की दूसरी सन्तान उस पर निर्भर रहकर परमेश्वर का काम करने की ओर प्रेरित हों; और ताकि परमेश्वर की सन्तान अपनी-अपनी व्यक्तिगत स्थितियों और परिस्थितियों में उस पर अधिकाधिक भरोसा रखने की ओर प्रेरित हों—इसी लिए मैं इस और आगे के विस्तार की ओर ले जाया गया हूँ।’
प्रार्थना और परमेश्वर पर भरोसा।
और भी बातें हैं जिनके विषय में मैं यह दिखाकर प्रसन्न होता कि श्री मुलर के वृत्तान्त में क्या मिलता है, परन्तु एक और ही पर्याप्त होगी। वह है परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर दृढ़ और अटल भरोसे का पाठ, जो लगातार बनी रहने वाली प्रार्थना का रहस्य है। यदि एक बार हमने, वचन में आत्मा की शिक्षा के अधीन होकर, परमेश्वर की प्रतिज्ञा को थाम लिया है, और विश्वास कर लिया है कि पिता ने हमारी सुन ली है, तो हमें किसी भी देरी या प्रतिकूल दिखने वाली परिस्थितियों के कारण अपने विश्वास में डगमगाने नहीं देना चाहिए।
‘मेरी दैनिक प्रार्थनाओं का पूरा उत्तर अभी पूरा होने से बहुत दूर था; तौभी प्रभु की ओर से प्रार्थना में लगे रहने के लिए बहुतायत से प्रोत्साहन दिया गया था। परन्तु मान लीजिए कि जितना मिला उससे बहुत कम भी आया होता, तौभी, पवित्रशास्त्र के आधार पर, बहुत प्रार्थना और आत्म-परीक्षा के बाद, एक निष्कर्ष पर पहुँच जाने के पश्चात्, मुझे इस उद्देश्य के विषय में विश्वास और धीरज के अभ्यास में बिना डगमगाए आगे बढ़ते रहना चाहिए था; और इसी प्रकार परमेश्वर की सब सन्तानों को, जब एक बार उन्हें सन्तोष हो जाए कि जो कुछ वे प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाते हैं वह उसकी इच्छा के अनुसार है, तब तक विश्वास करती हुई, आशा रखती हुई, लगातार बनी रहने वाली प्रार्थना में लगे रहना चाहिए जब तक आशीष न मिल जाए। इस प्रकार मैं स्वयं अब कुछ आशीषों के लिए परमेश्वर की बाट जोह रहा हूँ, जिनके लिए मैंने दस वर्ष और छः महीने से, एक दिन का भी अन्तर डाले बिना, प्रतिदिन उससे विनती की है। कुछ व्यक्तियों के मन फिराने के विषय में पूरा उत्तर अभी तक नहीं मिला है, यद्यपि इस बीच मुझे प्रार्थना के हजारों उत्तर मिले हैं। मैंने कुछ और व्यक्तियों के मन फिराने के लिए लगभग दस वर्ष से, कुछ के लिए छः या सात वर्ष से, कुछ के लिए तीन या दो वर्ष से भी, बिना अन्तर डाले प्रतिदिन प्रार्थना की है; और उन व्यक्तियों के विषय में अभी तक उत्तर नहीं मिला है, जब कि इस बीच मेरी हजारों प्रार्थनाओं के उत्तर मिले हैं, और ऐसे प्राणों का भी मन फिरा है जिनके लिए मैं प्रार्थना करता रहा था। मैं इस बात पर विशेष बल उन लोगों के लाभ के लिए देता हूँ जो यह समझते होंगे कि मुझे केवल परमेश्वर से माँगना भर है, और तुरन्त पा लेना है; या कि मैं किसी भी बात के विषय में प्रार्थना करूँ, और उत्तर निश्चय आ जाएगा। मनुष्य केवल उन्हीं प्रार्थनाओं के उत्तर पाने की आशा कर सकता है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हों; और तब भी, धीरज और विश्वास का अभ्यास बहुत वर्षों तक कराया जा सकता है, जैसे मेरे धीरज और विश्वास का उस विषय में अभ्यास हो रहा है जिसकी चर्चा मैंने की है; और तौभी मैं प्रतिदिन प्रार्थना में लगा रहता हूँ, और उत्तर की आशा करता हूँ, और ऐसे निश्चय से उत्तर की आशा करता हूँ कि मैंने प्रायः परमेश्वर को धन्यवाद दिया है कि वह उसे निश्चय देगा, यद्यपि अब उन्नीस वर्ष से इस प्रकार विश्वास और धीरज का अभ्यास हो रहा है। प्रिय मसीहियो, नई लगन के साथ अपने आपको प्रार्थना में लगाने के लिए उत्साहित हो जाइए, यदि केवल आपको निश्चय हो कि आप ऐसी बातें माँगते हैं जो परमेश्वर की महिमा के लिए हैं।
‘परन्तु सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि स्कॉटलैंड से आए 6 पाउंड 6 शिलिंग 6 पेंस ने, जहाँ तक अब जाना जा सकता है, नये अनाथालयों को सुसज्जित करने और चलाने के लिए आवश्यक सारा साधन मुझे पूरा कर दिया। छः वर्ष और आठ महीने तक मैं दिन-प्रतिदिन, और सामान्यतः प्रतिदिन कई बार, प्रभु से माँगता रहा हूँ कि वह अनाथ-कार्य के इस विस्तार के लिए आवश्यक साधन मुझे दे, जो 1861 के वसन्त में किए गए अनुमानों के अनुसार लगभग पचास हजार पाउंड प्रतीत होते थे: इस रकम का कुल योग अब मुझे मिल चुका था। मैं प्रभु की स्तुति और बड़ाई करता हूँ कि उसने कार्य का यह विस्तार मेरे हृदय में डाला, और इसके लिए मुझे साहस और विश्वास दिया; और सबसे बढ़कर, कि उसने दिन-प्रतिदिन मेरे विश्वास को बिना डगमगाए सम्भाले रखा। जब धन का अन्तिम भाग मिला, तब मुझे पूरी रकम के विषय में उससे अधिक निश्चय नहीं था जितना उस समय था जब मुझे इस बड़ी रकम के लिए एक भी दान नहीं मिला था। आरम्भ में ही, बहुत धीरज से और हृदय को जाँचते हुए परमेश्वर की बाट जोहने के द्वारा एक बार उसकी इच्छा का पता लगा लेने के बाद, मुझे इस बात का ऐसा पूरा निश्चय था कि वह इसे पूरा करेगा, मानो वे दोनों भवन, उनमें रहने वाले सैकड़ों अनाथों सहित, पहले से ही मेरे सामने हों। इस विषय के सम्बन्ध में नये विश्वासियों के लिए मैं यहाँ कुछ बातें कहता हूँ: 1. प्रभु की सेवा में, या अपने व्यवसाय में, या अपने परिवारों में नये कदम उठाने में धीमे रहिए: हर बात को भली-भाँति तौलिए; सब कुछ पवित्रशास्त्र के प्रकाश में और परमेश्वर के भय में तौलिए। 2. जो भी कदम आप उठाने का विचार करते हैं, उसके विषय में परमेश्वर की इच्छा का पता लगाने के लिए यत्न कीजिए कि आपकी अपनी कोई इच्छा न हो, जिससे आप सच्चाई से कह सकें कि यदि वह केवल आपको शिक्षा देने की कृपा करे, तो आप परमेश्वर की इच्छा पूरी करने को तैयार हैं। 3. परन्तु जब आप पता लगा लें कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, तो उसकी सहायता माँगिए, और उसे लगन से, लगातार, धीरज से, विश्वास से, आशा के साथ माँगिए; और आप उसके अपने समय और अपनी रीति से उसे निश्चय पाएँगे।
‘यह समझना भूल होगी कि हमें केवल धन के विषय में ही कठिनाई होती है: सैकड़ों दूसरी आवश्यकताएँ और दूसरी कठिनाइयाँ आती हैं। ऐसा दिन विरला ही होता है जिसमें कोई कठिनाई या कोई आवश्यकता न हो; परन्तु प्रायः एक ही दिन में बहुत सी कठिनाइयों और बहुत सी आवश्यकताओं का सामना करना और उन पर जय पानी होती है। इन सब का सामना प्रार्थना और विश्वास से किया जाता है, जो हमारा सार्वभौमिक उपाय है; और हम कभी लज्जित नहीं हुए। प्रभु यीशु के नाम में परमेश्वर के सामने चढ़ाई गई धीरज भरी, लगातार बनी रहने वाली, विश्वास भरी प्रार्थना ने सदा, देर-सबेर, आशीष पहुँचाई है। परमेश्वर के अनुग्रह से, मैं कोई भी आशीष पाने के विषय में निराश नहीं होता, बशर्ते मुझे निश्चय हो कि वह किसी वास्तविक भलाई के लिए, और परमेश्वर की महिमा के लिए होगी।
4 ये उद्धरण चार खण्डों वाली एक कृति, द लॉर्ड्स डीलिंग्स विद जॉर्ज मुलर (जॉर्ज मुलर के साथ प्रभु के व्यवहार), जे. निस्बेट & कं., लंदन, से लिए गए हैं।
