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प्रस्तावना

एन्ड्रयू मरे · वेलिंगटन, 28 अक्टूबर 1895

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    ‘मुझ में बने रहो’—इस आज्ञा से जुड़ी हुई सब प्रतिज्ञाओं में से कोई भी प्रतिज्ञा इससे ऊँची नहीं, और कोई भी हम से इतनी जल्दी यह अंगीकार नहीं करवाती कि ‘यह नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ,’ जितनी यह प्रतिज्ञा: ‘यदि तुम मुझ में बने रहो, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’ परमेश्वर के सम्मुख सामर्थ्य, पूरी रीति से उसमें बने रहनेवाले जीवन की सबसे ऊँची उपलब्धि है।

    और मसीह के समान जीवन के सब गुणों में से कोई भी गुण उस काम में उसके अनुरूप होने से अधिक ऊँचा और अधिक महिमामय नहीं है, जिसमें वह अब पिता की उपस्थिति में निरन्तर लगा रहता है—अर्थात् उसकी सब पर प्रबल होनेवाली मध्यस्थता। हम जितना अधिक उसमें बने रहेंगे, और उसकी समानता में बढ़ते जाएँगे, उतना ही अधिक उसका याजकीय जीवन हम में सामर्थ्य के साथ कार्य करेगा, और हमारा जीवन वैसा ही बन जाएगा जैसा उसका है—एक ऐसा जीवन जो मनुष्यों के लिये सदा विनती करता और प्रबल होता है।

    ‘तू ने हमें परमेश्वर के लिये राजा और याजक बनाया है।’ राजा और याजक दोनों में मुख्य बात है—सामर्थ्य, प्रभाव, आशीष। राजा में यह सामर्थ्य नीचे की ओर आती है; याजक में यह सामर्थ्य ऊपर की ओर उठती है, और परमेश्वर के सम्मुख प्रबल होती है। हमारे धन्य याजक-राजा, यीशु मसीह में, राजकीय सामर्थ्य याजकीय सामर्थ्य पर आधारित है: ‘वह पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है।’ हम में भी, जो उसके याजक और राजा हैं, बात इससे भिन्न नहीं है: मध्यस्थता की प्रार्थना ही में कलीसिया को अपनी सबसे ऊँची सामर्थ्य पानी और काम में लानी है; इसी में कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को यह प्रमाणित करना है कि वह उस इस्राएल का वंशज है, जिसने एक प्रधान के समान परमेश्वर से और मनुष्यों से भी सामर्थ्य पाई, और प्रबल हुआ।

    यह पुस्तक इस गहरी अनुभूति के साथ लिखी गई है कि मसीही जीवन में प्रार्थना का स्थान और उसकी सामर्थ्य बहुत कम समझी जाती है। मुझे पक्का निश्चय है कि जब तक हम प्रार्थना को मुख्य रूप से अपने ही मसीही जीवन को बनाए रखने का साधन समझते रहेंगे, तब तक हम पूरी रीति से नहीं जान पाएँगे कि उसे क्या होना है। परन्तु जब हम उसे उस काम का सबसे ऊँचा भाग समझना सीख लेंगे जो हमें सौंपा गया है—अन्य सब कामों की जड़ और बल—तब हम देखेंगे कि ठीक रीति से प्रार्थना करने की कला के समान और कुछ भी नहीं जिसका अध्ययन और अभ्यास करने की हमें इतनी आवश्यकता हो। यदि मैं कुछ भी हद तक यह दिखाने में सफल हुआ हूँ कि प्रार्थना के विषय में हमारे प्रभु की शिक्षा किस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ती है, और उस अन्तिम रात की अद्भुत प्रतिज्ञाओं (यूहन्ना 14:16) का उन कामों से, जो हमें उसके नाम में करने हैं, उन बड़े कामों से, और बहुत फल लाने से कैसा स्पष्ट सम्बन्ध है, तो हम सब यह मान लेंगे कि जब कलीसिया अपने आप को मध्यस्थता के इस पवित्र काम के लिये सौंप देगी, केवल तभी हम आशा कर सकते हैं कि मसीह की सामर्थ्य उसके पक्ष में प्रगट होगी। मेरी प्रार्थना है कि परमेश्वर इस छोटी सी पुस्तक का उपयोग करके अपनी कुछ सन्तानों पर सामर्थ्य और प्रभाव के उस अद्भुत स्थान को और अधिक स्पष्ट कर दे, जिसे ग्रहण करने के लिये वह उनकी बाट जोह रहा है, और जिसकी बाट एक थका हुआ संसार भी जोह रहा है।

    इसी से सम्बन्धित एक और सच्चाई है जो प्रार्थना पर यीशु की शिक्षा का अध्ययन करते समय अद्भुत स्पष्टता के साथ मुझ पर प्रगट हुई। वह यह है: कि पिता विश्वास की हर एक प्रार्थना को सुनने के लिये, और जो कुछ हम चाहें, और जो कुछ हम यीशु के नाम में माँगें, वह हमें देने के लिये बाट जोहता है। हम अपने परमेश्वर के अद्भुत प्रेम और उसकी बड़ी बड़ी प्रतिज्ञाओं को सीमित करने के इतने आदी हो गए हैं कि हम अपने प्रभु के सबसे सरल और सबसे स्पष्ट कथनों को भी उन शर्तवाले वाक्यांशों के बिना नहीं पढ़ पाते, जिनसे हम उनकी रक्षा और व्याख्या करते हैं। यदि कोई एक बात है जो मेरी समझ में कलीसिया को सीखने की आवश्यकता है, तो वह यह है कि परमेश्वर चाहता है कि प्रार्थना का उत्तर मिले, और कि मनुष्य के मन में यह बात चढ़ी ही नहीं कि परमेश्वर अपनी उस सन्तान के लिये क्या कुछ करेगा जो अपने आप को यह विश्वास करने के लिये सौंप देती है कि उसकी प्रार्थना सुनी जाएगी। परमेश्वर प्रार्थना सुनता है; यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे सब लोग मानते हैं, परन्तु जिसका अर्थ बहुत थोड़े लोग समझते हैं, या जिसकी सामर्थ्य का बहुत थोड़े लोग अनुभव करते हैं। यदि मैंने जो कुछ लिखा है वह मेरे पाठक को स्वामी के वचनों की ओर जाने, और उसकी अद्भुत प्रतिज्ञाओं को जैसी वे लिखी हैं, वैसे ही सरलता से और शब्दशः ग्रहण करने के लिये उभारे, तो मेरा उद्देश्य पूरा हो गया।

    और फिर केवल एक बात और। इन पिछले वर्षों में हज़ारों लोगों ने यह सीखकर अकथनीय आशीष पाई है कि मसीह किस प्रकार पूरी रीति से हमारा जीवन है, और किस प्रकार वह हम में वह सब कुछ होने और करने का भार अपने ऊपर लेता है जिसकी हमें आवश्यकता है। मैं नहीं जानता कि क्या हमने अब तक इस सच्चाई को अपने प्रार्थना-जीवन पर लागू करना सीखा है। बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि उनमें विश्वास से प्रार्थना करने की, वह प्रभावशाली प्रार्थना करने की सामर्थ्य नहीं जिससे बहुत कुछ हो सकता है। जो सन्देश मैं उन तक पहुँचाना चाहता हूँ वह यह है कि धन्य यीशु उन्हें यह सिखाने के लिये बाट जोह रहा है, हाँ, लालायित है। मसीह हमारा जीवन है: स्वर्ग में वह प्रार्थना करने के लिये सर्वदा जीवित है; हम में उसका जीवन सदा प्रार्थना करनेवाला जीवन है, यदि हम केवल इसके लिये उस पर भरोसा रखें। मसीह हमें केवल अपने उदाहरण से, शिक्षा से, आज्ञा से, प्रतिज्ञाओं से ही नहीं, परन्तु स्वयं अपने आप को—उस सदा जीवित मध्यस्थ को—हमारे जीवन के रूप में दिखाकर प्रार्थना करना सिखाता है। जब हम इस बात पर विश्वास करते हैं, और जाकर अपने प्रार्थना-जीवन के लिये भी उसमें बने रहते हैं, तभी ठीक रीति से प्रार्थना न कर पाने के हमारे भय दूर हो जाएँगे, और हम आनन्द और जयवन्त होकर अपने प्रभु पर भरोसा रखेंगे कि वह हमें प्रार्थना करना सिखाए, और स्वयं ही हमारी प्रार्थना का जीवन और सामर्थ्य बने।

    परमेश्वर हमारी आँखें खोले कि हम देख सकें कि मध्यस्थता की वह पवित्र सेवकाई क्या है, जिसके लिये हम उसके राज-पदधारी याजकों के समाज के रूप में अलग किए गए हैं। वह हमें एक बड़ा और दृढ़ हृदय दे कि हम विश्वास करें कि हमारी प्रार्थनाएँ कैसा सामर्थी प्रभाव डाल सकती हैं। और जब हम यीशु को देखें—जो प्रार्थना करने के लिये सदा जीवित है, जो प्रार्थना करने के लिये हम में जीवित है, और जो हमारे प्रार्थना-जीवन का ज़ामिन ठहरा है—तो अपनी बुलाहट को पूरा कर पाने के विषय में हमारा सब भय दूर हो जाए।

    एन्ड्रयू मरे

    वेलिंगटन, 28 अक्टूबर 1895

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