पाठ 24 (31 में से)

सब पर प्रबल होनेवाली दलील

‘मेरे नाम से;’

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    ‘जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा। यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा। कि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से माँगो, वह तुम्हें दे। मैं तुम से सच सच कहता हूँ, यदि पिता से कुछ माँगोगे, तो वह मेरे नाम से तुम्हें देगा। अब तक तुम ने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो तो पाओगे। उस दिन तुम मेरे नाम से माँगोगे।’

    यूहन्ना 14:13, 14; 15:16; 16:23, 24, 26।

    अब तक चेलों ने मसीह के नाम से नहीं माँगा था, और न ही स्वयं उसने कभी यह शब्द प्रयोग किया था। इसके सबसे निकट का कथन यह है, ‘मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं।’ यहाँ अपने विदाई के वचनों में वह इस शब्द को उन असीम अर्थवाली प्रतिज्ञाओं—‘जो कुछ,’ ‘कुछ भी,’ ‘जो चाहो’—के सम्बन्ध में बिना रुके दोहराता है, ताकि उन्हें और हमें यह सिखाए कि उसका नाम हमारी एकमात्र, परन्तु साथ ही हमारी सर्व-पर्याप्त दलील है। प्रार्थना की सामर्थ्य और उसका उत्तर इस नाम के उचित प्रयोग पर निर्भर है।

    किसी व्यक्ति का नाम क्या है? वह शब्द या अभिव्यक्ति जिसके द्वारा वह व्यक्ति हमारे सामने बुलाया जाता या प्रस्तुत किया जाता है। जब मैं कोई नाम लेता या सुनता हूँ, तो वह सम्पूर्ण मनुष्य को मेरे सामने ले आता है, जो कुछ मैं उसके विषय में जानता हूँ, और वह छाप भी जो उसने मुझ पर छोड़ी है। किसी राजा के नाम में उसका आदर, उसकी सामर्थ्य, उसका राज्य सम्मिलित है। उसका नाम उसकी सामर्थ्य का प्रतीक है। और इसी प्रकार परमेश्वर का हर एक नाम उस अदृश्य की महिमा के किसी अंश को अपने में समाए हुए है और उसे प्रस्तुत करता है। और मसीह का नाम उस सब की अभिव्यक्ति है जो उसने हमारे मध्यस्थ के रूप में किया है, और जो कुछ वह है, और जिसे करने के लिये वह जीवित है।

    और किसी दूसरे के नाम से कोई काम करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है उस दूसरे की सामर्थ्य और अधिकार के साथ, उसके प्रतिनिधि और उसके स्थानापन्न के रूप में आना। हम जानते हैं कि किसी दूसरे के नाम का ऐसा प्रयोग सदा हितों की साझेदारी को मानकर चलता है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को अपने नाम का स्वतंत्र प्रयोग तब तक न करने देगा जब तक उसे पहले यह निश्चय न हो जाए कि उसका आदर और उसका हित उस दूसरे के पास उतना ही सुरक्षित है जितना स्वयं उसके पास।

    और जब यीशु हमें अपने नाम पर अधिकार देता है, उसका स्वतंत्र प्रयोग करने देता है, और यह निश्चय भी दिलाता है कि जो कुछ हम उस नाम से माँगेंगे वह हमें दिया जाएगा, तो इसका क्या अर्थ है? एक व्यक्ति का किसी विशेष अवसर पर दूसरे को अपने नाम से कुछ माँगने की छूट देने की साधारण उपमा यहाँ बिलकुल अधूरी पड़ जाती है,—यीशु गम्भीरता से अपने सब चेलों को यह सामान्य और असीम अधिकार देता है कि वे हर समय, हर उस वस्तु के लिये जो वे चाहें, उसके नाम का स्वतंत्र प्रयोग करें। वह ऐसा नहीं कर सकता था यदि वह यह न जानता कि वह अपने हितों के विषय में हम पर भरोसा कर सकता है, कि उसका आदर हमारे हाथों में सुरक्षित रहेगा। किसी दूसरे के नाम का स्वतंत्र प्रयोग सदा बड़े भरोसे का, घनिष्ठ एकता का चिह्न होता है। जो अपना नाम दूसरे को देता है, वह एक ओर हट जाता है, कि वह दूसरा उसकी ओर से काम करे; जो दूसरे का नाम ले लेता है, वह अपने नाम को मूल्यहीन जानकर छोड़ देता है। जब मैं किसी दूसरे के नाम से जाता हूँ, तो मैं अपने आप का इन्कार करता हूँ, मैं न केवल उसका नाम, वरन् स्वयं उसे और जो कुछ वह है, उसे ले लेता हूँ, अपने और जो कुछ मैं हूँ, उसके स्थान पर।

    किसी व्यक्ति के नाम का ऐसा प्रयोग किसी कानूनी एकता के आधार पर हो सकता है। एक व्यापारी अपना घर और व्यवसाय छोड़कर जाते समय अपने प्रधान मुंशी को एक सामान्य अधिकार दे देता है, जिसके द्वारा वह व्यापारी के नाम से हज़ारों पाउण्ड निकाल सकता है। मुंशी यह अपने लिये नहीं, केवल व्यवसाय के हित में करता है। इसलिये कि व्यापारी उसे ऐसा व्यक्ति जानता है और उस पर ऐसा भरोसा रखता है जो पूरी तरह उसके हितों और व्यवसाय के प्रति समर्पित है, वह अपना नाम और अपनी सम्पत्ति उसके हाथ में सौंपने का साहस करता है। जब प्रभु यीशु स्वर्ग को गया, तो उसने अपना काम, पृथ्वी पर अपने राज्य का प्रबन्ध, अपने सेवकों के हाथों में छोड़ दिया। वह इसके सिवा और कुछ नहीं कर सकता था कि उन्हें अपना नाम भी दे, ताकि वे अपने व्यवसाय के उचित संचालन के लिये जिन-जिन वस्तुओं की उन्हें आवश्यकता हो, वे सब प्राप्त कर सकें। और उन में यीशु के नाम का लाभ उठाने की आत्मिक सामर्थ्य ठीक उतनी ही होती है जितना वे अपने आप को केवल स्वामी के हितों और उसके काम के लिये जीने को सौंप देते हैं। इस नाम का प्रयोग सदा इस बात को मानकर चलता है कि हम ने अपने हित उसे सौंप दिए हैं जिसका हम प्रतिनिधित्व करते हैं।

    या नाम का ऐसा प्रयोग जीवन की एकता के आधार पर हो सकता है। व्यापारी और उसके मुंशी के विषय में यह एकता अस्थायी है। परन्तु हम जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की एकता नाम की एकता देती है: बालक के पास पिता का नाम इसलिये है कि उस में पिता का जीवन है। और बहुधा किसी भले पिता की सन्तान को उस नाम के कारण जो वह धारण करती थी, दूसरों ने आदर दिया है या उसकी सहायता की है। परन्तु यह अधिक समय तक न टिकता यदि यह पता चलता कि यह केवल एक नाम है, और पिता का चरित्र उस में नहीं है। नाम और चरित्र या आत्मा में मेल होना चाहिए। जब ऐसा होता है, तब पिता के मित्रों पर बालक का दोहरा अधिकार होगा: चरित्र उस प्रेम और आदर को सुरक्षित करता और बढ़ाता है जो पहले नाम के कारण दिया गया था। यीशु और विश्वासी के साथ भी ऐसा ही है: हम एक हैं, उसके साथ हमारा एक ही जीवन, एक ही आत्मा है; इसी कारण हम उसके नाम से आ सकते हैं। उस नाम का प्रयोग करने में हमारी सामर्थ्य, चाहे परमेश्वर के साथ हो, या मनुष्यों के साथ, या दुष्टात्माओं के साथ, हमारी आत्मिक जीवन-एकता के माप पर निर्भर है। नाम का प्रयोग जीवन की एकता पर टिका है; यीशु का नाम और उसका आत्मा एक हैं। 2

    या जो एकता नाम के प्रयोग का अधिकार देती है, वह प्रेम की एकता हो सकती है। जब कोई दुल्हन, जिसका जीवन दरिद्रता में बीता है, दूल्हे के साथ जुड़ जाती है, तो वह अपना नाम छोड़ देती है कि उसके नाम से पुकारी जाए, और अब उसे उस नाम का प्रयोग करने का पूरा अधिकार है। वह उसके नाम से खरीदारी करती है, और वह नाम अस्वीकार नहीं किया जाता। और ऐसा इसलिये होता है कि दूल्हे ने उसे अपने लिये चुन लिया है, इस भरोसे पर कि वह उसके हितों का ध्यान रखेगी: अब वे एक हैं। और इसी प्रकार स्वर्गीय दूल्हा इस से कम कुछ न कर सकता था; जब उसने हम से प्रेम किया और हमें अपने साथ एक कर लिया, तो वह इसके सिवा और क्या कर सकता था कि जो उसका नाम धारण करते हैं, उन्हें यह अधिकार दे कि वे उस नाम को पिता के सामने प्रस्तुत करें, या अपनी सब आवश्यकताओं के लिये उसे लेकर स्वयं उसके पास आएँ। और ऐसा कोई नहीं जो सचमुच यीशु के नाम में जीने के लिये अपने आप को दे देता है, और उसे निरन्तर बढ़ते हुए माप में यह आत्मिक योग्यता न मिले कि वह उस नाम से जो चाहे माँगे और पाए। किसी दूसरे का नाम धारण करने का अर्थ यह है कि मैं ने अपना नाम, और उसके साथ अपना स्वतंत्र जीवन छोड़ दिया है; परन्तु तब उतने ही निश्चय से इसका अर्थ यह भी है कि जो नाम मैं ने अपने नाम के स्थान पर लिया है, उस में जो कुछ है, वह सब मेरा हो गया है।

    ऐसे दृष्टान्त हमें दिखाते हैं कि वह प्रचलित विचार कितना अधूरा है जिस में किसी दूत की कल्पना की जाती है जो दूसरे के नाम से माँगने को भेजा गया हो, या किसी अपराधी की जो किसी ज़ामिन के नाम की दुहाई देता हो। नहीं, यीशु स्वयं पिता के पास है; हम किसी अनुपस्थित व्यक्ति के नाम से नहीं आते। जब हम स्वयं यीशु से प्रार्थना करते हैं, तब भी वह उसी के नाम से होनी चाहिए। नाम व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है; नाम से माँगने का अर्थ है स्वयं उसके साथ हित और जीवन और प्रेम की पूर्ण एकता में, ऐसे व्यक्ति के रूप में माँगना जो उस में और उसके लिये जीता है। केवल यीशु के नाम को मेरे हृदय और जीवन में अविभाजित प्रभुता मिल जाए, तो मेरा विश्वास बढ़कर इस निश्चय तक पहुँच जाएगा कि जो कुछ मैं उस नाम से माँगूँ, वह अस्वीकार नहीं किया जा सकता। नाम और माँगने की सामर्थ्य साथ-साथ चलते हैं: जब यीशु का नाम वह सामर्थ्य बन गया है जो मेरे जीवन पर राज्य करती है, तब परमेश्वर के साथ प्रार्थना में भी उसकी सामर्थ्य दिखाई देगी।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि सब कुछ इस नाम के साथ हमारे अपने सम्बन्ध पर निर्भर है: जो सामर्थ्य उसकी मेरे जीवन पर है, वही सामर्थ्य उसकी मेरी प्रार्थनाओं में होगी। पवित्रशास्त्र में एक से अधिक कथन हैं जो यह बात हम पर स्पष्ट कर सकते हैं। जब वह कहता है, ‘सब कुछ प्रभु यीशु के नाम से करो,’ तो हम देखते हैं कि यह उस दूसरे कथन, ‘सब कुछ माँगो,’ का प्रतिरूप कैसे है। उसके नाम से सब कुछ करना और सब कुछ माँगना, ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। जब हम पढ़ते हैं, ‘हम लोग अपने परमेश्वर का नाम लेकर चलते रहेंगे,’ तो हम देखते हैं कि नाम की सामर्थ्य को सारे जीवन पर कैसे राज्य करना चाहिए; केवल तभी प्रार्थना में उसकी सामर्थ्य होगी। परमेश्वर होंठों की ओर नहीं, वरन् जीवन की ओर देखता है कि यह नाम हमारे लिये क्या है। जब पवित्रशास्त्र ‘ऐसे मनुष्यों’ की बात करता है ‘जिन्होंने अपने प्राण प्रभु यीशु के नाम के लिये दे दिए हैं,’ या ऐसे व्यक्ति की जो ‘प्रभु यीशु के नाम के लिये मरने को भी तैयार’ है, तो हम देखते हैं कि इस नाम के साथ हमारा सम्बन्ध कैसा होना चाहिए: जब वह मेरे लिये सब कुछ है, तब वह मेरे लिये सब कुछ प्राप्त करेगा। यदि मैं उसे अपना सब कुछ लेने दूँ, तो वह मुझे अपना सब कुछ लेने देगा।

    ‘जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा।’ यीशु इस प्रतिज्ञा को अक्षरशः कहता है। मसीहियों ने इसे सीमित करने का यत्न किया है: यह बहुत अधिक खुली जान पड़ती थी; मनुष्य पर इतना बिना शर्त भरोसा करना कदापि सुरक्षित नहीं लगता था। हम यह न समझे कि ‘मेरे नाम से’ यह शब्द अपनी रक्षा आप ही है। यह एक आत्मिक सामर्थ्य है जिसका प्रयोग कोई भी उस से आगे नहीं कर सकता जितनी योग्यता वह उस नाम में जीने और काम करने के द्वारा प्राप्त करता है। जैसे-जैसे हम मनुष्यों के सामने उस नाम को धारण करते हैं, वैसे-वैसे हमें परमेश्वर के सामने उसका प्रयोग करने की सामर्थ्य मिलती है। ओह, आइए हम परमेश्वर के पवित्र आत्मा के लिये विनती करें कि वह हमें दिखाए कि इस नाम का अर्थ क्या है, और उसका उचित प्रयोग क्या है। आत्मा ही के द्वारा वह नाम, जो स्वर्ग में सब नामों में श्रेष्ठ है, हमारे हृदय और जीवन में भी सर्वोच्च स्थान पाएगा।

    यीशु के चेलो! आज के पाठ आपके हृदयों में गहरे उतर जाएँ। स्वामी कहता है: केवल मेरे नाम से प्रार्थना करो; जो कुछ तुम माँगोगे, वह दिया जाएगा। स्वर्ग आपके लिये खुला है; आत्मिक जगत के भण्डार और उसकी शक्तियाँ आपके आस-पास के मनुष्यों के लिये आपके हाथ में सौंप दी गई हैं। ओह आइए, हम यीशु के नाम से प्रार्थना करना सीखें। जैसे चेलों से, वैसे ही वह हम से कहता है, ‘अब तक तुम ने मेरे नाम से नहीं माँगा; माँगो तो पाओगे।’ यीशु का हर एक चेला अपने राजकीय याजकपद के अधिकारों का लाभ उठाने का यत्न करे, और जो सामर्थ्य उसके हाथ में सौंपी गई है, उसका प्रयोग अपने दायरे और अपने काम के लिये करे। मसीही लोग जागें और यह सन्देश सुनें: आपकी प्रार्थना वह प्राप्त कर सकती है जो अन्यथा रोक लिया जाएगा, वह पूरा कर सकती है जो अन्यथा अधूरा रह जाता है। ओह जागिए, और इस नाश होते हुए संसार के लिये स्वर्ग के भण्डार खोलने के लिये यीशु के नाम का प्रयोग कीजिए। राजा के सेवकों के रूप में उसके नाम का प्रयोग करना सीखिए: ‘जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा।’

    समापन प्रार्थना

    धन्य प्रभु! ऐसा लगता है मानो जो भी पाठ तू मुझे देता है, उस में अर्थ की ऐसी भरपूरी और गहराई है कि यदि मैं केवल वही एक पाठ सीख लूँ, तो मैं ठीक-ठीक प्रार्थना करना जान जाऊँगा। आज मुझे फिर ऐसा लगता है मानो मुझे हर दिन केवल एक ही प्रार्थना की आवश्यकता है: हे प्रभु! मुझे सिखा कि तेरे नाम से प्रार्थना करने का क्या अर्थ है। मुझे ऐसे जीना और काम करना, ऐसे चलना और बोलना, ऐसे सब कुछ यीशु के नाम से करना सिखा, कि मेरी प्रार्थना भी उस धन्य नाम से होने के सिवा और कुछ हो ही न सके।

    और हे प्रभु! मुझे यह बहुमूल्य प्रतिज्ञा दृढ़ता से थामे रहना सिखा कि जो कुछ हम तेरे नाम से माँगें, वह तू करेगा, और पिता देगा। यद्यपि मैं उस अद्भुत एकता को अब तक पूरी तरह नहीं समझता, और उस तक पूरी तरह पहुँचना तो और भी दूर की बात है, जिसका अर्थ तू तब रखता है जब तू कहता है, मेरे नाम से, तौभी मैं इस प्रतिज्ञा को तब तक दृढ़ता से थामे रहना चाहता हूँ जब तक यह मेरे हृदय को इस निःसन्देह निश्चय से न भर दे: यीशु के नाम से कुछ भी।

    हे मेरे प्रभु! तेरा पवित्र आत्मा मुझे यह सिखाए। तू ने उसके विषय में कहा था, ‘सहायक, जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा।’ वह जानता है कि तेरे नाम से स्वर्ग से भेजे जाने का क्या अर्थ है, कि वह तेरे सेवकों में उस नाम की सामर्थ्य को प्रकट करे और उसका आदर करे, केवल उसी नाम का प्रयोग करे, और इस प्रकार तेरी महिमा करे। हे प्रभु यीशु! तेरा आत्मा मुझ में वास करे, और मुझे भर दे। मैं अपना सारा अस्तित्व उसके शासन और उसकी अगुवाई को सौंपना चाहता हूँ, हाँ, सौंपता हूँ। तेरा नाम और तेरा आत्मा एक हैं; उसके द्वारा तेरा नाम मेरे जीवन और मेरी प्रार्थना का बल होगा। तब मैं तेरे नाम के निमित्त सब कुछ छोड़ सकूँगा, तेरे नाम से मनुष्यों से और परमेश्वर से बात कर सकूँगा, और यह प्रमाणित कर सकूँगा कि यह सचमुच वह नाम है जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

    हे प्रभु यीशु! ओह, अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मुझे अपने नाम से प्रार्थना करना सिखा। आमीन।

    टिप्पणी।

    ‘मसीह के नाम से प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ केवल उद्धारकर्ता की मध्यस्थता पर विश्वास के साथ परमेश्वर के सामने उपस्थित होना नहीं हो सकता। जब चेलों ने यीशु से कहा कि उन्हें प्रार्थना करना सिखाए, तो उसने उन्हें विनतियाँ दीं। और बाद में यीशु ने उन से कहा, “अब तक तुम ने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा।” जब तक आत्मा नहीं आया, तब तक प्रभु की प्रार्थना की सात विनतियाँ मानो उनके भीतर सोई पड़ी थीं। जब पवित्र आत्मा के द्वारा मसीह उनके हृदयों में उतरा, तब वे ठीक उन्हीं आशीषों की लालसा करने लगे जिन्हें मसीह हमारे महायाजक के रूप में पिता से अपनी प्रार्थना के द्वारा हमारे लिये प्राप्त करता है। और ऐसी विनतियों का उत्तर सदा मिलता है। पिता जो कुछ मसीह माँगता है, उसे देने को सदा तैयार है। मसीह का आत्मा सदा हमें सिखाता और प्रेरित करता है कि हम वे विनतियाँ करें जिन्हें मसीह पक्का करके पिता के सामने प्रस्तुत करता है। इसलिये मसीह के नाम से प्रार्थना करने का अर्थ है अपनी धार्मिकता के विषय में मसीह के साथ एक हो जाना, और पवित्र आत्मा के भीतर वास करने के द्वारा अपनी इच्छाओं में मसीह के साथ एक हो जाना। आत्मा में प्रार्थना करना, पिता की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करना, मसीह के नाम से प्रार्थना करना—ये एक ही अर्थ के कथन हैं। पिता तो आप ही हम से प्रीति रखता है, और हमारी सुनने को तैयार है: दो मध्यस्थ, ऊपर सहायक मसीह, और भीतर सहायक पवित्र आत्मा, उसके प्रेम के दान हैं।

    ‘यह विचार पहले-पहल उस अधिक प्रचलित विचार से कम सांत्वना देनेवाला लग सकता है, जो मसीह के नाम से प्रार्थना को मुख्यतः मसीह की योग्यता पर हमारे भरोसे से जोड़ता है। उस मत का दोष यह है कि वह उद्धारकर्ता की मध्यस्थता की प्रार्थना को पिता की इच्छा के साथ, और प्रार्थना में भीतर वास करनेवाले आत्मा की सहायता के साथ नहीं जोड़ता। न ही वह मसीह की मध्यस्थता को पूरी तरह समझता है; क्योंकि मध्यस्थता केवल इस बात में नहीं कि मसीह के कारण पवित्र पिता मुझ पर और मेरी प्रार्थना पर ध्यान दे सकता है; वरन् इस बात में भी है कि मसीह स्वयं मेरी विनतियों को अपनी विनतियों के रूप में प्रस्तुत करता है, जिन्हें वह मेरे लिये चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे सब आशीषें मेरे लिये उसके बहुमूल्य लहू से मोल ली गई हैं।

    ‘हर प्रार्थना में एक आवश्यक शर्त यह है कि हम उसे यीशु के नाम से, अर्थात् हमारे लिये उसकी इच्छा के अनुसार, पिता की इच्छा के अनुसार, आत्मा की शिक्षा के अनुसार, प्रस्तुत कर सकें। और इस प्रकार आत्म-परीक्षा के बिना, मनन के बिना, आत्म-त्याग के बिना—संक्षेप में, आत्मा की सहायता के बिना—मसीह के नाम से प्रार्थना करना असम्भव है।’—साफ़िर, ‘प्रभु की प्रार्थना’, पृ. 411, 142।

    2 ‘जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे,’ अर्थात् मेरे स्वभाव में; क्योंकि परमेश्वर के यहाँ वस्तुएँ अपने स्वभाव के अनुसार पुकारी जाती हैं। हम मसीह के नाम से तब नहीं माँगते जब किसी विनती के अन्त में यह कह देते हैं, ‘यह मैं यीशु मसीह के नाम से माँगता हूँ,’ वरन् तब जब हम उसके स्वभाव के अनुसार प्रार्थना करते हैं, जो प्रेम है, जो अपनी भलाई नहीं चाहता, वरन् केवल परमेश्वर की इच्छा और सब प्राणियों की भलाई चाहता है। ऐसा माँगना हमारे हृदयों में स्वयं उसके आत्मा की पुकार है।—जूक्स, ‘नया मनुष्य’।

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