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‘हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू ने मेरी सुन ली है। और मैं जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है।’
यूहन्ना 11:41, 42
‘तू मेरा पुत्र है; आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ। मुझ से मांग, और मैं तुझे दूंगा।’—भजन संहिता 2:7, 8।
नये नियम में हम विश्वास और ज्ञान के बीच भेद किया हुआ पाते हैं। ‘क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि की बातें दी जाती हैं; और दूसरे को उसी आत्मा के अनुसार ज्ञान की बातें; और किसी को उसी आत्मा से विश्वास।’ किसी बालक या सीधे-सादे मसीही में थोड़े ज्ञान के साथ बहुत विश्वास हो सकता है। बालक जैसी सरलता सत्य को बिना कठिनाई के ग्रहण कर लेती है, और प्रायः अपने विश्वास का, अपने आप को या दूसरों को, इसके सिवा कोई और कारण देने की अधिक चिन्ता नहीं करती: परमेश्वर ने कहा है। परन्तु परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम न केवल सारे मन से, वरन् सारी बुद्धि से भी उससे प्रेम करें और उसकी सेवा करें; कि हम बढ़ते-बढ़ते उसके सब मार्गों, वचनों और कामों की ईश्वरीय बुद्धि और सुन्दरता की समझ तक पहुँचें। केवल इसी रीति से विश्वासी परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा के पूरी तरह निकट आने और उसकी उचित आराधना करने के योग्य होगा; और केवल इसी रीति से हमारा हृदय छुटकारे में निहित बुद्धि और ज्ञान के भण्डारों को समझ-बूझकर ग्रहण कर सकेगा, और सिंहासन के सामने उठनेवाले गीत के सबसे ऊँचे स्वर में पूरी रीति से सम्मिलित होने के लिए तैयार होगा: ‘आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है!’
हमारे प्रार्थना-जीवन में यह सत्य पूरी रीति से लागू होता है। यद्यपि प्रार्थना और विश्वास इतने सरल हैं कि नया-नया मन फिराया हुआ विश्वासी भी सामर्थ्य के साथ प्रार्थना कर सकता है, तौभी सच्चा मसीही धर्मविज्ञान प्रार्थना की शिक्षा में अपनी कुछ सबसे गहरी समस्याएँ पाता है। प्रार्थना की सामर्थ्य कहाँ तक वास्तविक है? यदि वास्तविक है, तो परमेश्वर प्रार्थना को इतनी बड़ी सामर्थ्य कैसे दे सकता है? प्रार्थना के कार्य का परमेश्वर की इच्छा और उसके निर्णयों के साथ मेल कैसे बैठाया जा सकता है? परमेश्वर की प्रभुसत्ता और हमारी इच्छा में, परमेश्वर की स्वतंत्रता और हमारी स्वतंत्रता में, सामंजस्य कैसे हो सकता है?—ये और ऐसे ही दूसरे प्रश्न मसीही मनन और खोज के लिए उचित विषय हैं। जितनी अधिक गम्भीरता और श्रद्धा से हम ऐसे भेदों के निकट आएँगे, उतना ही अधिक हम आराधनापूर्ण आश्चर्य में गिरकर उसकी स्तुति करेंगे जिसने प्रार्थना में मनुष्य को ऐसी सामर्थ्य दी है।
प्रार्थना के सम्बन्ध में छिपी हुई कठिनाइयों में से एक—एक ऐसी कठिनाई जो, यद्यपि व्यक्त नहीं की जाती, प्रायः वास्तव में प्रार्थना में बाधा डालती है—परमेश्वर की सिद्धता से, अर्थात् अपने से बाहर की हर वस्तु से उसकी पूर्ण स्वतंत्रता से उत्पन्न होती है। क्या वह वह अनन्त सत्ता नहीं जो कुछ भी है, केवल अपने ही कारण है, जो अपने आप को स्वयं निर्धारित करता है, और जिसकी बुद्धिमान और पवित्र इच्छा ने जो कुछ होनेवाला है वह सब निर्धारित कर दिया है? प्रार्थना उस पर कैसे प्रभाव डाल सकती है, या वह प्रार्थना से प्रेरित होकर वह काम कैसे कर सकता है जो अन्यथा न किया जाता? क्या प्रार्थना के उत्तर की प्रतिज्ञा केवल हमारी निर्बलता के प्रति उसका दीन होकर झुकना नहीं है? प्रार्थना की सामर्थ्य के विषय में—उसकी उस सामर्थ्य के विषय में जिससे ‘बहुत कुछ हो सकता है’—जो कुछ कहा गया है, क्या वह हमारे सोचने के ढंग के अनुसार ढाली गई बात से बढ़कर कुछ है, क्योंकि ईश्वर अपने कामों के लिए बाहर के किसी कार्य पर कभी निर्भर नहीं हो सकता? और क्या प्रार्थना की आशीष केवल वही प्रभाव नहीं जो वह स्वयं हम पर डालती है?
ऐसे प्रश्नों का उत्तर खोजते हुए हमें इसकी कुंजी स्वयं परमेश्वर की सत्ता में, पवित्र त्रिएकता के भेद में मिलती है। यदि परमेश्वर केवल एक ही व्यक्ति होता, जो अपने आप में बन्द रहता, तो उसके निकट आने या उस पर प्रभाव डालने का कोई विचार ही न हो सकता। परन्तु परमेश्वर में तीन व्यक्ति हैं। परमेश्वर में हमारे पास पिता और पुत्र हैं, जिनके बीच पवित्र आत्मा में एकता और संगति का जीवित बन्धन है। जब अनन्त प्रेम ने पुत्र को उत्पन्न किया, और पिता ने पुत्र को दूसरे व्यक्ति के रूप में, अपने बराबर और अपने परामर्शदाता के रूप में, अपने निकट स्थान दिया, तब स्वयं ईश्वरत्व के अन्तरतम जीवन में प्रार्थना और उसके प्रभाव के लिए एक मार्ग खुल गया। जैसे पृथ्वी पर, वैसे ही स्वर्ग में भी पिता और पुत्र के बीच का सारा सम्बन्ध देने और लेने का है। और यदि वह लेना भी देने के समान स्वेच्छा से और स्व-निर्धारित हो, तो पुत्र की ओर से माँगना और पाना होना ही चाहिए। ईश्वरीय व्यक्तियों की पवित्र संगति में, पुत्र का यह माँगना परमेश्वर के त्रिगुण धन्य जीवन के महान कार्यों में से एक था। इसीलिए भजन संहिता 2 में हम पढ़ते हैं: ‘आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ: मुझ से मांग, और मैं तुझे दूंगा।’ पिता ने पुत्र को अपने ऊपर प्रभाव डालने का स्थान और सामर्थ्य दी। पुत्र का माँगना कोई दिखावा या छाया मात्र नहीं था, परन्तु जीवन की उन गतियों में से एक था जिनमें पिता और पुत्र का प्रेम मिलता और एक दूसरे को पूर्ण करता था। पिता ने ठान लिया था कि वह अपनी युक्तियों में अकेला न रहेगा: एक पुत्र था जिसके माँगने और स्वीकार करने पर उनकी पूर्ति निर्भर होनी थी। और इस प्रकार स्वयं परमेश्वर की सत्ता और जीवन में एक ऐसा माँगना था जिसका प्रतिबिम्ब और प्रवाह पृथ्वी पर प्रार्थना को होना था। जब यीशु ने कहा, ‘मैं जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है,’ तब उसके कहने में यह बात भी सम्मिलित थी। जैसे पृथ्वी पर यीशु का पुत्रत्व स्वर्ग में उसके पुत्रत्व से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही पृथ्वी पर उसकी प्रार्थना भी स्वर्ग में उसके माँगने की निरन्तरता और प्रतिरूप है। मनुष्य मसीह यीशु की प्रार्थना पिता की गोद में रहनेवाले एकलौते पुत्र के अनन्त माँगने और पृथ्वी पर मनुष्यों की प्रार्थना के बीच की कड़ी है। प्रार्थना का उद्गम और उसका सबसे गहरा स्रोत स्वयं परमेश्वर की सत्ता में है। ईश्वरत्व की गोद में प्रार्थना के बिना कभी कुछ नहीं होता—पुत्र का माँगना और पिता का देना।1
इससे हमें कुछ हद तक यह समझने में सहायता मिल सकती है कि मनुष्य की प्रार्थना, पुत्र के द्वारा आकर, परमेश्वर पर कैसे प्रभाव डाल सकती है। परमेश्वर के निर्णय ऐसे निर्णय नहीं हैं जो उसने पुत्र का, या उसकी विनती का, या उसके द्वारा ऊपर भेजी जानेवाली विनती का ध्यान किए बिना किए हों। कदापि नहीं। प्रभु यीशु पहिलौठा है, सब वस्तुओं का सिर और वारिस: सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिए सृजी गईं, और सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं। पिता की युक्तियों में पुत्र का, सारी सृष्टि के प्रतिनिधि के रूप में, सदा अपना एक स्वर रहा; अनन्त अभिप्राय के निर्णयों में मध्यस्थ और बिनती करनेवाले के रूप में पुत्र की स्वतंत्रता के लिए सदा स्थान छोड़ा गया था, और इस प्रकार उन सब की विनतियों के लिए भी जो पुत्र में होकर पिता के निकट आते हैं।
और यदि यह विचार आए कि पिता पर प्रभाव डालने की पुत्र की यह स्वतंत्रता और सामर्थ्य ईश्वरीय निर्णयों की अपरिवर्तनीयता के विरुद्ध है, तो हम यह न भूलें कि परमेश्वर के साथ मनुष्य के समान कोई ऐसा भूतकाल नहीं जिससे वह अटल रूप से बँधा हो। परमेश्वर अपने भूत और भविष्य सहित समय में नहीं रहता; समय के भेदों का उससे कोई सम्बन्ध नहीं जो अनन्तकाल में वास करता है। और अनन्तकाल एक सदा-वर्तमान ‘अब’ है, जिसमें भूत कभी बीतता नहीं, और भविष्य सदा उपस्थित रहता है। हमारी मानवीय निर्बलता के अनुरूप बात करने के लिए पवित्रशास्त्र को बीते हुए निर्णयों और आनेवाले भविष्य की चर्चा करनी पड़ती है। वास्तव में, परमेश्वर की युक्ति की अपरिवर्तनीयता सदा उसकी इस स्वतंत्रता के साथ पूर्ण सामंजस्य में है कि वह जो चाहे सो करे। पुत्र और उसके लोगों की प्रार्थनाएँ अनन्त निर्णयों में इस प्रकार सम्मिलित नहीं की गईं कि उनका प्रभाव केवल दिखावटी हो; वरन् इस प्रकार कि पिता का हृदय पुत्र के द्वारा उठनेवाली हर प्रार्थना को सुनने के लिए खुला और स्वतंत्र रहता है, और परमेश्वर सचमुच अपने आप को प्रार्थना के द्वारा वह करने के लिए प्रेरित होने देता है जो वह अन्यथा न करता।
ईश्वरीय प्रभुसत्ता और मानवीय स्वतंत्रता का यह पूर्ण सामंजस्य और मेल हमारे लिए एक अथाह भेद है, क्योंकि परमेश्वर, जो सनातन है, हमारे सब विचारों से परे है। परन्तु हमारे लिए यह सान्त्वना और बल का कारण हो कि हमें निश्चय है कि पिता और पुत्र की अनन्त संगति में प्रार्थना की सामर्थ्य का उद्गम और उसकी निश्चितता है, और कि पुत्र के साथ हमारी एकता के द्वारा हमारी प्रार्थना ग्रहण की जाती है और धन्य त्रिएकता के भीतरी जीवन में अपना प्रभाव डाल सकती है। परमेश्वर के निर्णय कोई लोहे का ढाँचा नहीं हैं जिसके विरुद्ध मनुष्य की स्वतंत्रता व्यर्थ संघर्ष करती रहे। नहीं। परमेश्वर स्वयं जीवित प्रेम है, जिसने अपने पुत्र में मनुष्य बनकर उस सब के साथ, जो मानवीय है, अत्यन्त कोमल सम्बन्ध जोड़ा है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा जो कुछ मानवीय है उसे प्रेम के ईश्वरीय जीवन में उठा लेता है, और अपने आप को स्वतंत्र रखता है कि संसार पर अपने शासन में हर मानवीय प्रार्थना को उसका स्थान दे।
ऐसे विचारों के भोर के प्रकाश में पवित्र त्रिएकता की शिक्षा अब कोई अमूर्त कल्पना नहीं रहती, वरन् उस मार्ग का जीवित प्रकटीकरण बन जाती है जिसके द्वारा यह सम्भव हुआ कि मनुष्य परमेश्वर की संगति में उठा लिया जाए, और उसकी प्रार्थना इस पृथ्वी पर परमेश्वर के शासन में एक वास्तविक कारक बन जाए। और हम मानो दूर से उस प्रकाश की झलकियाँ पा सकते हैं जो अनन्त जगत से ऐसे वचनों पर चमकता है: ‘उसी के द्वारा एक ही आत्मा में पिता के पास हमारी पहुँच होती है।’
समापन प्रार्थना
हे सनातन परमेश्वर! हे त्रिएक और त्रिगुण पवित्र! मैं गहरी श्रद्धा के साथ, मुँह ढाँपे हुए, तेरे ईश्वरीय अस्तित्व के पवित्र भेद के सामने आराधना करना चाहता हूँ। और हे परम महिमामय परमेश्वर, यदि तुझे यह भाए कि तू उस भेद में से कुछ भी प्रकट करे, तो मैं भय और काँपते हुए झुकना चाहता हूँ, कि कहीं ऐसा न हो कि तेरी महिमा पर मनन करते हुए मैं तेरे विरुद्ध पाप करूँ।
हे पिता! मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू यह नाम न केवल पृथ्वी पर अपनी सन्तानों के पिता के रूप में धारण करता है, वरन् इसलिए भी कि तू अनादि काल से अपने एकलौते पुत्र के साथ पिता के रूप में विद्यमान रहा है। मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि पिता होने के नाते तू हमारी प्रार्थना सुन सकता है, क्योंकि तू ने अनादि काल से अपनी युक्तियों में अपने पुत्र के माँगने को स्थान दिया है। मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि हमने पृथ्वी पर उसमें देखा है कि स्वर्ग में तेरे साथ उसकी कैसी धन्य संगति थी; और किस प्रकार अनादि काल से तेरी सारी युक्तियों और निर्णयों में उसकी प्रार्थना और उनके उत्तरों के लिए स्थान छोड़ा गया था। और सबसे बढ़कर मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि ऊपर तेरे सिंहासन पर उसके सच्चे मानवीय स्वभाव के द्वारा, और यहाँ नीचे हमारे मानवीय स्वभाव में तेरे पवित्र आत्मा के द्वारा, एक ऐसा मार्ग खोला गया है जिसके द्वारा आवश्यकता की हर मानवीय पुकार परमेश्वर के जीवन और प्रेम तक उठाई जा सकती है और उसे छू सकती है, और उत्तर में जो कुछ वह माँगे, पा सकती है।
हे धन्य यीशु! तुझ में, जो पुत्र है, प्रार्थना का मार्ग खोला गया है, और तू हमें उत्तर का निश्चय देता है; हम तुझ से बिनती करते हैं, अपने लोगों को प्रार्थना करना सिखा। ओह, हर दिन यही हमारे पुत्रत्व का चिह्न हो कि तेरे समान हम भी जानें कि पिता सदा हमारी सुनता है। आमीन।
टिप्पणी।
‘“परमेश्वर प्रार्थना सुनता है।” प्रार्थना का यही सबसे सरल दृष्टिकोण सारे पवित्रशास्त्र में अपनाया गया है। वह हमारे हृदय और जीवन पर प्रार्थना के परावर्ती प्रभाव पर ज़ोर नहीं देता, यद्यपि वह एक कार्य के रूप में प्रार्थना और एक दशा के रूप में प्रार्थना के बीच के सम्बन्ध को भरपूरी से दिखाता है। वरन् वह बड़ी स्पष्टता के साथ प्रार्थना के वस्तुनिष्ठ या वास्तविक उद्देश्यों को निर्धारित करता है—परमेश्वर से आशीष, वरदान और छुटकारे पाना। यीशु कहता है, “मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।”
‘यह विचार चाहे कितना ही सच्चा और मूल्यवान हो कि परमेश्वर ने, जो सब बातों को पहले से जानता और पहले से ठहराता है, हमारी प्रार्थनाओं को भी घटनाओं की, अर्थात् कारण और परिणाम की, श्रृंखला की कड़ियों के रूप में, एक वास्तविक शक्ति के रूप में, पहले से जान लिया और ठहरा दिया है, तौभी हमें निश्चय है कि यह वह प्रकाश नहीं जिसमें मन इस महान विषय पर शान्ति पा सके, और न हम यह सोचते हैं कि यहाँ वह आकर्षण-शक्ति है जो हमें प्रार्थना की ओर खींचे। वरन् हमें लगता है कि ऐसा विचार हमारा ध्यान उस लक्ष्य से हटा देता है जिससे प्रार्थना की प्रेरणा, जीवन और बल आते हैं। जीवित परमेश्वर, जो समकालीन है और केवल अनन्त ही नहीं,1 वह जीवित, दयालु, पवित्र परमेश्वर, अपने आप को प्राण पर प्रकट करनेवाला परमेश्वर, वह परमेश्वर जो कहता है, “मेरे दर्शन के खोजी हो;” यही वह चुम्बक है जो हमें खींचता है, केवल यही हृदय और होंठों को खोल सकता है। . .
‘परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह में हमें इस कठिनाई का पूरा समाधान मिलता है। उसने पृथ्वी पर प्रार्थना की, और केवल मनुष्य के रूप में नहीं, वरन् देहधारी परमेश्वर के पुत्र के रूप में। पृथ्वी पर उसकी प्रार्थना केवल उसकी उस प्रार्थना का प्रकटीकरण है जो अनादि काल से थी, जब ईश्वरीय युक्ति में वह मसीह के रूप में ठहराया गया। . . . पुत्र सब वस्तुओं का वारिस ठहराया गया। अनादि काल से परमेश्वर का पुत्र मार्ग, अर्थात् मध्यस्थ था। वह—अपनी अपूर्ण भाषा में कहें तो—अनादि काल से संसार की ओर से पिता से बातें कर रहा था।’—सफ़ीर, द हिडन लाइफ़ (छिपा हुआ जीवन), अध्याय 6। द लॉर्ड्स प्रेयर (प्रभु की प्रार्थना), पृ. 12 भी देखें।
1क्या इसे यह कहना अधिक उचित न होगा कि वह समकालीन है, क्योंकि वह अनन्त है—इस बाद वाले शब्द के सही अर्थ में?
