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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
“परमेश्वर को … जिस ने अपने अनुग्रह से मुझे बुला लिया, यह अच्छा लगा कि मुझ में अपने पुत्र को प्रगट करे, कि मैं अन्यजातियों में उसका सुसमाचार सुनाऊँ।”— गलातियों 1:15-16।
“तुम … यरूशलेम … में मेरे गवाह होगे।”—प्रेरितों के काम 1:8।
अब सुन्दर ऐसे पूर्ण आत्म-त्याग और दुःख के जीवन में प्रवेश कर चुका था, जैसा इस संसार में थोड़े ही मनुष्यों के भाग में आता है। हिन्दू धर्म से मसीह तक का उसका मार्ग आरम्भ से अन्त तक काँटों से भरा रहा था। परन्तु काँटों का मुकुट पहने यीशु के उस दर्शन के बाद, और उस शान्ति को ग्रहण करने के बाद जो उसका उद्धारकर्ता लाया था, उसके लिए कोई भी वस्तु त्याग देने के लिए बहुत बड़ी न जान पड़ती थी। डॉ. वॉट्स के अमर शब्दों में :—
यदि प्रकृति का सारा राज्य मेरा होता, तो वह भी बहुत ही छोटी भेंट होती; ऐसा अद्भुत, ऐसा ईश्वरीय प्रेम माँगता है मेरा प्राण, मेरा जीवन, मेरा सर्वस्व।
उसके उत्साही स्वभाव को ‘सर्वस्व’ से कम कुछ भी सन्तुष्ट न कर सकता था; और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उसी भावना से साधु-जीवन में प्रवेश करते हुए उसने निश्चय किया—जैसा वह स्वयं कहता है—कि “उसके अनुग्रह के बने रहते” वह, जब तक मसीह के लिए बिताने को उसके पास जीवन है, कोई और जीवन नहीं जिएगा।
यद्यपि वह आयु में अभी बालक ही था, फिर भी साधु सुन्दर
सिंह का हृदय तब भी, जैसे आज भी, मनुष्यों के प्राणों के लिए एक ईश्वरीय लगन से भरा हुआ था; और प्रभु यीशु के प्रति उसकी तीव्र भक्ति और प्रेम ने उसे प्रेरित किया कि वह अपने परिश्रम का पहला क्षेत्र अपने ही गाँव को चुने, जहाँ से उसे कुछ ही समय पहले निकाल दिया गया था। अपने परिवार के द्वारा ठुकराए जाने के कुछ ही महीने बाद वह युवा साधु रामपुर की जानी-पहचानी गलियों में लौट आया, और वहाँ हर गली में उसने उद्धारकर्ता की सामर्थ्य की और उस नये पाए हुए आनन्द की विश्वासयोग्यता से गवाही दी जो उसे उसमें मिला था। इतना ही नहीं, रामपुर के ज़नाना घरों के द्वार भी उसके लिए खुल गए, और वह घर-घर जाकर स्त्रियों को वही अद्भुत कहानी सुनाता रहा। वहाँ से वह अकेले ही आसपास के गाँवों में गया, और हर जगह लोगों को निडर होकर उस महान शान्ति की गवाही दी जो केवल यीशु मसीह के द्वारा ही मिल सकती है।
इसके बाद वह पंजाब के बहुत-से अन्य नगरों और गाँवों में होते हुए अपनी यात्रा पर आगे बढ़ता गया, और धीरे-धीरे अफ़गानिस्तान और कश्मीर की ओर बढ़ा। यह एक लम्बा और अत्यन्त कठिन दौरा था, और साधु-जीवन की कठिनाइयों का अभ्यस्त न होने के कारण सुन्दर ने मार्ग की ठण्ड और अभावों से बहुत कष्ट उठाया। इसके अतिरिक्त काम भी कठिन था, क्योंकि उसके सन्देश को बहुत कम प्रतिसाद मिलता था। फिर भी अफ़गानिस्तान के प्राचीन नगर जलालाबाद में उसकी भेंट कुछ पठानों से हुई, जो उसके विनाश की योजना बनाते-बनाते अन्त में उसका सन्देश ग्रहण करने को तैयार हो गए। इसका विवरण आगे के एक अध्याय में मिलेगा।
यहाँ तक ऐसा प्रतीत होता है मानो परमेश्वर ने थोड़ा-थोड़ा करके सुन्दर को उन सब वस्तुओं से छुड़ा लिया था जो जीवन में प्रिय होती हैं। सम्बन्धी, धन, घर—सब मसीह के लिए चले गए थे। मसीहियों के नये संसार में प्रवेश करने पर जो आराम और लगभग निश्चित उन्नति उसकी हो सकती थी, उसका भी उसके लिए कोई मूल्य न रहना था, जो पहाड़ों के बीच बसे अन्यजाति गाँवों में मसीह को प्रकट करने के लिए अपने पहले दौरे पर निकल पड़ा था। ठण्ड उसके पतले कपड़ों को भेद जाती थी, काँटे और पत्थर उसके नंगे पैरों को काट डालते थे। रातें आतीं, पर कड़कड़ाती हवाओं और मूसलाधार वर्षा से आश्रय मिलने का कोई निश्चय न होता; और धुँधली भोर अक्सर ऐसे भूख और कष्ट के दिन लेकर आती जैसे उसने कभी नहीं जाने थे। उसका उत्साही प्राण भी उस कठिनाई के सामने काँप उठा जो इतना कम फल लाती जान पड़ती थी; क्योंकि अक्सर उसके सन्देश को झुठला दिया जाता, और उसे स्वयं बाहर निकाल दिया जाता कि वह भूखा रहकर गुफाओं में या जंगल में मिल सकनेवाले किसी भी टूटे-फूटे आश्रय में रात बिताए। उसके साधु के वस्त्र उसे हर जगह प्रवेश दिला देते थे, परन्तु अक्सर जब यह पता चलता कि वह मसीही है, तो सुन्दर को भूखा और असहाय गाँवों से खदेड़ दिया जाता—जिए या मरे।
परन्तु कोई भी बात उसे निरुत्साहित नहीं कर सकती। ख़तरे के, या स्वयं मृत्यु के सामने भी पीछे हटने में असमर्थ, साधु सुन्दर सिंह भारत के सबसे अन्धकारमय कोनों में और उसके पार के प्रदेशों में अपना महान मिशन आगे बढ़ाता रहता है। वर्ष-प्रतिवर्ष उसने मैदानों और पहाड़ों में, नगरों और गाँवों में, और भारत की सीमाओं पर बिखरे हुए लोगों और घुमन्तू जातियों के बीच मनुष्यों के प्राणों के लिए परिश्रम किया है। इन्हीं लोगों के बीच उसने इतने कड़े दुःख उठाए हैं, परन्तु इन्हीं के बीच उसे न केवल मसीह को प्रकट करने का, बल्कि मनुष्यों को उसके चरणों तक ले आने का परम आनन्द भी मिला है। उसका मुख्य कार्य ग़ैर-मसीहियों के बीच हुआ है, जिनके लिए परमेश्वर की बुलाहट को वह स्पष्ट और निस्सन्देह अनुभव करता है।
