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“जो मैं ने उस से सुना है, वही . . . कहता हूँ . . . जैसे पिता ने मुझे सिखाया, वैसे ही ये बातें कहता हूँ” (यूहन्ना 8:26, 28)।
“जो कुछ मैं तुझ से कहता हूँ उसे यहोवा की बात समझकर मान ले; तब . . . तेरा प्राण बचेगा” (यिर्मयाह 38:20)।
अपने सामने पड़ी लम्बी यात्रा का कोई अनुमान न होते हुए, साधु 1918 के आरम्भ में मद्रास आए, इस विचार से कि तिब्बत के लिए प्रस्थान करने से पहले कुछ स्थानों पर हो आएँ। परन्तु उनकी ख्याति उनसे पहले ही पहुँच चुकी थी, और सारे दक्षिण भारत से उनके पास निमन्त्रणों की झड़ी लग गई। मद्रास के एक सज्जन ने स्वेच्छा से कुछ सप्ताहों के लिए उनके दुभाषिए का काम करने का प्रस्ताव रखा, जिसके कारण उन्होंने अपनी योजनाएँ बदल दीं और एक ऐसा कार्यक्रम स्वीकार कर लिया जिसमें आगे चलकर त्रावणकोर और सीलोन भी सम्मिलित हो गए।
हर दिन चारों ओर से उनके पास नई-नई विनतियाँ आती रहीं, और उन्हीं में से वह बड़ी सुसमाचार-प्रचार यात्रा निकली, जो न केवल दक्षिण भारत और सीलोन में से होकर, बल्कि बर्मा, संघीय मलय राज्यों, चीन और जापान में से होकर भी गई।
दक्षिण भारत के विशाल मसीही समुदाय ने उनके कार्य के लिए एक बहुत बड़ा क्षेत्र प्रदान किया, और जाति या मत के भेद की परवाह किए बिना हर जगह हज़ारों लोग उनकी सभाओं में उमड़ पड़े। उनका कार्य विविध और कठोर था। अकसर दिन का काम इतनी जल्दी आरम्भ होता और इतनी देर तक चलता कि उन्हें भोजन के लिए भी मुश्किल से समय मिलता, और अपने नये नियम के अध्ययन के लिए भी कोई अवकाश न रहता। जिन स्थानों पर उन्होंने कई दिन बिताए, वहाँ के लोग उनके जाने के बाद वैसे ही विश्राम करते थे जैसे कोई मनुष्य अच्छा भोजन करने के बाद करता है; परन्तु किसी भी स्थान पर लोगों ने यह नहीं सोचा कि साधु को विश्राम की आवश्यकता है।
कार्यक्रमों से भरे लम्बे दिनों के बाद नाव, बैलगाड़ी या रेलगाड़ी से थका देने वाली रात भर की यात्रा होती थी। पहुँचते ही नये दिन का काम आरम्भ हो जाता और प्रस्थान तक चलता रहता। सार्वजनिक सभाएँ प्रायः सुबह और शाम होती थीं, और उनके बीच घंटों तक साधु बैठकर आगन्तुकों से मिलते और भेंट-वार्ताएँ करते, जिनमें वे सलाह देते, अपने सामने रखी गई धार्मिक समस्याओं को सुलझाते, और जहाँ तक उनसे हो सकता, खोजियों के प्रश्नों के उत्तर देते। ऐसे अवसरों पर उपस्थित लोगों की संख्या एक व्यक्ति से लेकर सौ या उससे भी अधिक तक होती थी। इन भेंटों का मूल्य उनमें सम्मिलित होने वालों की गवाही से प्रमाणित होता था, और इस तथ्य से भी कि साधु किसी स्थान पर जितना अधिक ठहरते, उनसे मिलने के इच्छुक लोगों की संख्या उतनी ही अधिक होती जाती थी।
एक स्थान पर, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में लोग आत्मिक मार्गदर्शन के लिए उनके पास आते थे, जिस छात्रावास में वे ठहरे थे वहाँ के एक विद्यार्थी ने आगन्तुकों को भीतर आने देने का काम सँभालकर उनकी देखभाल करना अपना आनन्दमय कर्तव्य बना लिया। वह युवक साधु के कमरे के दरवाज़े की चाबी अपने पास रखता था, और जब भक्ति या भोजन का समय आता, तो थोड़ा-बहुत एकान्त और विश्राम निश्चित हो जाता था।
बड़े केन्द्रों में, जहाँ कॉलेज और हाई स्कूल थे, सुबह और शाम की सभाओं के बीच उनमें जाया जाता और विद्यार्थियों को सम्बोधित किया जाता था। मसीहियों की टोलियों से मिलने के लिए निजी घरों के निमन्त्रण स्वीकार करने का अर्थ था कठिन दिनों के अन्त में अतिरिक्त काम। दक्षिण में, जहाँ इतनी सारी द्रविड़ भाषाएँ बोली जाती हैं, भाषा की बाधा एक कठिनाई थी। जहाँ कहीं सम्भव होता, भेंट-वार्ताएँ अंग्रेज़ी में की जातीं, परन्तु इनमें से बहुतों में, और सार्वजनिक सभाओं में भी, साधु को अकसर दुभाषिए के माध्यम से बोलना पड़ता था, और वह भी सदा सबसे अच्छा नहीं होता था। ऐसे व्यक्ति के लिए जो स्वभाव से इतना उत्साही हो, अपने सन्देश से इतना भरा हुआ हो, और प्राणों के लिए इतना व्याकुल हो, भाषा की यह कठिनाई बहुत वास्तविक थी; परन्तु ऐसे समयों में उन्हें देखकर कोई उनकी भावनाओं का अनुमान नहीं लगा सकता था।
साधु ऐसे चेले नहीं खोजते जो उनके उदाहरण पर चलें। उनका यह मानना ठीक ही है कि ऐसा जीवन अपनाने के लिए मनुष्य को परमेश्वर की ओर से स्पष्ट बुलाहट मिली होनी चाहिए। सब लोगों को उनकी सलाह सन्तुलित, बुद्धिमानी की, और जिन लोगों को दी जाती है उनके अनुकूल होती है। स्त्रियों से बातें करते समय उनकी भक्त माता का उदाहरण, जिन्होंने उनका पालन-पोषण धर्म के प्रति श्रद्धा के साथ किया, जीवन का एक निरन्तर दृष्टान्त बना रहता है। वे अकसर कहते हैं, “यदि एक गैर-मसीही माता अपने पुत्र के लिए इतना कर सकती है, तो आप मसीही माताएँ अपने पुत्रों के लिए उससे कितना अधिक कर सकती हैं?” स्वयं नये नियम से गहरा प्रेम करते हुए, वे कहते हैं कि मसीही लोग उनसे अधिक उससे प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने कभी उसे फाड़ा और जलाया नहीं जैसा उन्होंने एक बार किया था, बल्कि उन्हें उसका आदर करना और उससे प्रेम करना सिखाया गया है। जब उनके श्रोता उन्हें यह कहते सुनते हैं, तो उनमें से कितनों का विवेक उन्हें कचोटने लगता है, यह वे नहीं जानते!
दक्षिण भारत में साधु के ठहरने के समय यह कोई असाधारण बात नहीं थी कि हिन्दू रात के सन्नाटे के घंटों में उन्हें खोजते हुए आते, जब दूसरे लोग सोते होते और वे उनकी सेवा में “खर्च करते और खर्च हो जाते।” जिन स्थानों पर वे गए थे वहाँ के लोगों से उन्हें मिलने वाले पत्रों की संख्या के कारण उनके समय और बल पर माँगें बढ़ती गईं, और उनसे प्रार्थना करने की विनतियाँ तो अनगिनत थीं।
हज़ारों मसीहियों ने, जिन्होंने साधु सुन्दर सिंह को देखा है, उनमें यह देखा है कि जो मनुष्य अपने प्राण और देह समेत स्वयं को अपने उद्धारकर्ता के अधीन कर देता है, परमेश्वर उसे क्या बना सकता है; और जब तक वे दिखाई देते रहते हैं, लोग उन्हें देखते-देखते कभी नहीं थकते। वे जहाँ कहीं भी गए हैं, लोगों ने उन्हें और उनके सन्देश को बड़े आनन्द के साथ ग्रहण किया है, और केवल यही खेद रहा कि वे अपने कार्य को दृढ़ करने के लिए अधिक समय तक नहीं ठहर सके। उनके कार्य के परिणाम कितने गहरे और दूरगामी हैं, यह केवल परमेश्वर ही जानता है, परन्तु इसमें कोई एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं कर सकता कि उनका आना ठीक समय पर हुआ और परमेश्वर ने ही उन्हें भेजा। वे मनुष्यों के सामने मसीह के प्रति आत्म-समर्पण वाले भक्तिपूर्ण जीवन का, और उसकी सेवा में आत्म-त्याग का, सच्चा आदर्श रखते हैं।
