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साधु सुन्दर सिंह जन्म से सिख हैं। सिख कई कारणों से विशेष रुचि के पात्र हैं। पहले-पहल वे एक धार्मिक सम्प्रदाय के रूप में उठे, जिसने बुराइयों को सुधारने और मनुष्यों को एक अधिक सरल और शुद्ध उपासना की ओर वापस ले जाने का संकल्प किया था, और अन्त में वे एक संगठित सैनिक शक्ति के रूप में विकसित हो गए। चार सदियों में उन्हें अनेक और कड़वे अनुभव हुए हैं, परन्तु अपनी जाति का गर्व, शस्त्रों से प्रेम, और अपने धार्मिक सिद्धान्तों से दृढ़ता से चिपके रहना आज तक उनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
कनिंघम अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स’ में कहते हैं:—
सोलहवीं शताब्दी के दौरान, जब पंजाब विदेशी जातियों के बीच सत्ता के लिए अन्तहीन संघर्ष का रंगमंच बना हुआ था, सिखों का धार्मिक सम्प्रदाय, जो अपने उद्गम में दीन और अपने आरम्भिक स्वरूप में आडम्बरहीन था, शस्त्रों के कोलाहल के बीच चुपचाप उठ खड़ा हुआ, और सताव के बावजूद उसने एक महान राज्य की नींव डाली।
सिखों का घर “पाँच नदियों का देश” है, और पंजाब की जनसंख्या की एक उल्लेखनीय बात यह है कि जिस देश पर कभी सिखों का राज्य था, उसी में उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से थोड़ी है। सिख कोई बहुत बड़ा सम्प्रदाय नहीं हैं, फिर भी उनकी शक्ति का अनुमान संख्या से नहीं, बल्कि उनकी एकता, उनके धार्मिक उत्साह की प्रबलता और उनके युद्धप्रिय स्वभाव से लगाया जाना चाहिए। वे बहुत कुछ करने का साहस और बहुत कुछ सहने की क्षमता रखते हैं; वे पराजय से सहज ही निरुत्साहित नहीं होते; और वे आशा के साथ उस दिन की बाट जोहते हैं जब नानक और गोविन्द सिंह का दोहरा मिशन एक प्रभुत्वशाली धर्म बन जाएगा।
सिखों का कुछ और वर्णन पुस्तक के अन्त में मिलेगा, और उससे उन राष्ट्रीय और धार्मिक प्रभावों में से कुछ का पता चलेगा जिनके बीच सुन्दर सिंह का जन्म हुआ। कैप्टन कनिंघम कहते हैं:—
एक सिख सरदार अपने भव्य शरीर और पुरुषोचित चाल-ढाल से उतना विशिष्ट नहीं दिखता जितना कि उसके धर्म का एक आचार्य अपने चेहरे की उस गम्भीर विचारशीलता से दिखता है, जो उसके प्राण के उत्साह को और ईश्वर की निकट उपस्थिति के उसके दृढ़ विश्वास को प्रगट करती है।
धार्मिक विश्वास और सांसारिक आकांक्षा में वे दूसरे भारतीयों से पूरी तरह भिन्न हैं।
ऐसे ही वंश से सुन्दर सिंह उत्पन्न हुए। उनके पिता सरदार शेर सिंह थे, जो वंश से सिख थे और आज तक पटियाला रियासत के रामपुर में एक धनी ज़मींदार हैं, जहाँ 3 सितम्बर, 1889 को सुन्दर का जन्म हुआ; वे परिवार के सबसे छोटे पुत्र थे, परन्तु उन सब से ऊँची नियति के लिए बुलाए गए थे। परिवार के एक सदस्य सरदार ए. नाथ सिंह हैं, जो सिख रियासतों में से एक में एक भारतीय सेना के सेनापति हैं, जबकि दूसरे सदस्य इससे भी ऊँचे पदों तक पहुँचे हैं।
बचपन में सुन्दर का पालन-पोषण बड़े ऐशो-आराम में हुआ। हर वर्ष जब गर्मी का मौसम निकट आता, तो उन्हें परिवार के साथ गर्मियाँ बिताने के लिए हिमालय की ठंडी हवा में, प्रायः शिमला, ले जाया जाता था।
उनकी माता एक सुसंस्कृत और गुणवती महिला थीं; अपनी सहानुभूतियों में वे बहुत उदार विचारों वाली थीं। अमरीकन प्रेस्बिटेरियन मिशन की महिलाओं के साथ उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, और वे उन्हें अपने घर आने की अनुमति देती थीं। अपने आरम्भिक दिनों से ही सुन्दर और उनकी माता के बीच का सम्बन्ध अत्यन्त कोमल था। वे परिवार में सबसे छोटे थे, और वे शायद ही कभी उनसे अलग होते थे। वे प्रायः उनसे कहा करती थीं, “तुम्हें अपने भाइयों की तरह लापरवाह और संसारी नहीं होना है। तुम्हें प्राण की शान्ति खोजनी है और धर्म से प्रेम करना है, और किसी दिन तुम्हें एक पवित्र साधु बनना है।”
अपनी माता के मुँह से वे ऐसे शब्द इतनी बार सुनते थे कि उन्होंने उस जीवन के अतिरिक्त, जिसकी वे चर्चा करती थीं, किसी और जीवन के विषय में कभी सोचा ही नहीं। जहाँ कहीं माता जातीं, उनका नन्हा पुत्र उनके साथ जाता, और वे उसे अपनी जानी हुई सबसे उत्तम बातें सिखाने से कभी नहीं चूकती थीं। सात वर्ष की आयु तक वे संस्कृत में भगवद्गीता आरम्भ से अन्त तक सीख चुके थे। और फिर, चौदह वर्ष की आयु में, सुन्दर ने पृथ्वी पर अपनी सबसे प्रिय मित्र को खो दिया। उन्हें अपनी माता की कोमल संगति की कितनी कमी खली, यह कोई नहीं जानता, परन्तु आज जब वे उनके विषय में बोलते हैं तो उनका स्वर कोमल हो जाता है, और उनका विश्वास है कि यदि वे जीवित होतीं तो उन्हें उस रीति से जीते और कार्य करते देखकर सन्तुष्ट होतीं, जैसे वे आज कर रहे हैं।
