अध्याय 10 (30 में से)

प्रचार के लिए बुलाया गया

श्रीमती आर्थर पार्कर

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    “क्योंकि मैं ने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूँ।”—1 कुरिन्थियों 2:2।

    पंजाब, कश्मीर, बलूचिस्तान और अफ़गानिस्तान में होकर की गई अपनी लम्बी और कठिन यात्रा के बाद बहुत थका हुआ साधु लौट आया और कोटगढ़ पहुँचा, जो हिमालय में शिमला से आगे एक छोटा-सा स्थान है; वहाँ वह कुछ समय विश्राम के लिए ठहरा। यह छोटा-सा स्थान सदा सुन्दर सिंह के साथ जुड़ा रहेगा, क्योंकि अपने कार्य-जीवन के आरम्भ में उसने वहाँ परिश्रम किया था; और आज भी अपने दौरों के बीच थोड़े विश्राम के लिए, या तिब्बत और नेपाल के बन्द देशों की अपनी कठिन यात्राओं पर निकलने से पहले, वह कोटगढ़ ही जाता है।

    1906 की गर्मियों में सुन्दर की भेंट श्री स्टोक्स से हुई, जो कोटगढ़ के पास ठहरे हुए थे। यह धनी अमेरिकी सज्जन भारत के लोगों के बीच परिश्रम करने और परमेश्वर की महिमा के लिए भारत आए थे। साधु से मिलकर उनका हृदय प्रज्वलित हो उठा, और उनमें यह इच्छा भर गई कि वे उसके कठिन जीवन में उसके साथ सम्मिलित हों। प्रार्थना और विचार के बाद श्री स्टोक्स ने यह कदम उठाया, और दोनों साधुओं ने एक साथ काँगड़ा घाटी में होकर यात्रा की।

    भोजन और आश्रय मिलना कठिन था, और दोनों भाइयों ने बहुत कष्ट उठाया, परन्तु उनका काम अच्छा था और उनकी संगति मधुर। इसी यात्रा में सुन्दर सिंह बीमार पड़ गया। दोनों साधु कई सौ मील एक साथ यात्रा कर चुके थे, एक-सी कठिनाइयाँ बाँटते हुए; अक्सर उन्हें साधारण गन्दी सरायों में शरण लेनी पड़ती, और अक्सर वे अत्यन्त रूखे-सूखे और मोटे भोजन पर—और वह भी बहुत थोड़ा—गुज़ारा करते। वे एक बहुत ही अस्वास्थ्यकर प्रदेश से होकर जा रहे थे, जब सुन्दर को ज्वर और पेट में तीव्र पीड़ा ने आ घेरा। जाड़ा देकर आनेवाले बुख़ार से काँपता हुआ, ज्वर से जलता हुआ और निरन्तर पीड़ा में, वह अपने आप को घसीटता रहा, यहाँ तक कि अन्त में वह और चल न सका। वह लगभग अचेत होकर मार्ग पर गिर पड़ा, और श्री स्टोक्स ने उसे अधिक आरामदायक स्थिति में लिटाया और साथ ही पूछा कि वह कैसा है। साधु के होठों से कभी कोई शिकायत नहीं निकलती, चाहे उसकी दशा कैसी भी हो; और श्री स्टोक्स को उसका उत्तर सुनकर तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ। दुर्बल स्वर में, परन्तु मुस्कुराते हुए, साधु ने उत्तर दिया, “मैं बहुत आनन्दित हूँ। उसके लिए दुःख उठाना कितना मधुर है।” जो लोग साधु को सबसे अच्छी तरह जानते हैं, वे जानते हैं कि यही उसके जीवन का मूल स्वर है।

    जहाँ यह घटना हुई वह एक बीहड़ और जंगली स्थान था, और श्री स्टोक्स बड़ी कठिनाई में पड़ गए; परन्तु वे बीमार को कुछ मील दूर एक यूरोपीय के घर तक पहुँचाने में सफल हो गए, जहाँ सेवा-शुश्रूषा से वह फिर स्वस्थ हो गया। वह दयालु मेज़बान उस समय धर्म की कोई परवाह नहीं करता था, परन्तु दिन-प्रतिदिन उसने साधु का उदाहरण देखा और उसके होठों से ऐसी बातें सुनीं जिनसे वह गहराई से सोचने लगा, यहाँ तक कि वह सच्चे अर्थ में परिवर्तित मनुष्य बन गया। इस प्रकार यह बीमारी एक प्राण के उद्धार के लिए आशीष बनी, जिसने मसीह यीशु में आनन्द और शान्ति पाई।

    श्री स्टोक्स के पास एक मैजिक लालटेन थी, जिसे साधु ने उधार लेकर रामपुर और अन्य स्थानों में रात के समय सड़कों पर प्रचार के लिए प्रयोग किया, जब बड़ी संख्या में लोग चित्र देखने और उनकी व्याख्या सुनने के लिए इकट्ठे होते थे। इस प्रकार बिना थके, रात-दिन, दोनों साधु एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहे; अपनी अधिकांश यात्रा वे रात में करते थे, क्योंकि सूर्य इतना प्रचण्ड था कि श्री स्टोक्स अपने खुले सिर पर उसकी किरणें सह नहीं सकते थे। इसी समय श्री स्टोक्स ने साधु के कार्य की इतनी सराहना करते हुए चर्चा की—उस साधु की, जो बालक से कुछ ही बड़ा था, फिर भी अपने सन्देश से इतना भरा हुआ था कि वह जहाँ कहीं जाता, लोग एक विचित्र विवशता से उसकी बातें सुनने को बाध्य हो जाते।

    1907 में दोनों साधुओं ने सुबाथू के कोढ़ी-आश्रम में परिश्रम किया, और उसी वर्ष बाद में वे लाहौर गए ताकि वहाँ के प्लेग शिविर में प्लेग से पीड़ित लोगों के बीच काम करें। उन्होंने दिन-रात बिना रुके परिश्रम किया, अपने लिए केवल थोड़े-से घण्टों का विश्राम रखा, और वे घण्टे भी बीमारों और मरते हुए लोगों के बीच भूमि पर लेटकर बिताए।

    अगले वर्ष श्री स्टोक्स छुट्टी पर अमेरिका चले गए और सुन्दर फिर एक बार अकेला रह गया। लाहौर से वह सिन्ध गया, और राजपूताना होते हुए फिर उत्तर भारत लौटा; और फिर जब गर्मी का मौसम निकट आया, तो उसने बन्द देश तिब्बत की अपनी पहली यात्रा की। इन सब स्थानों में सुसमाचार निरन्तर सुनाया गया, और जो कोई भी साधु के सम्पर्क में आया, वह यह सुने बिना नहीं लौटा कि यीशु पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया।

    तिब्बत से लौटने के बाद उसके मन में पलिश्तीन जाने की बड़ी इच्छा हुई, इस विश्वास के साथ कि जिस स्थान पर उसके उद्धारकर्ता ने जीवन बिताया और प्राण दिए, उसे देखने से उसे और भी पूर्ण और उत्तम सेवा की प्रेरणा मिलेगी। परन्तु जब वह बम्बई पहुँचा तो उसने पाया कि यह सम्भव नहीं है; इसलिए 1909 में वह मार्ग में प्रचार करता हुआ मध्य प्रान्त होकर उत्तर भारत लौट आया।

    अपना नया नियम पढ़ते हुए साधु सुन्दर सिंह

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